अंतिम सांस गिन रहे जटायु ने कहा कि मुझे पता था कि मैं रावण से नही जीत सकता लेकिन तो भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली पीढियां मुझे कायर कहती

अंतिम सांस गिन रहे जटायु ने कहा कि मुझे पता था कि मैं रावण से नही जीत सकता लेकिन तो भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली पीढियां मुझे कायर कहती

🙏जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले… तो काल आया और जैसे ही काल आया …
तो गीधराज जटायु ने मौत को ललकार कहा, —

” खबरदार ! ऐ मृत्यु ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना… मैं मृत्यु को स्वीकार तो करूँगा… लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकता… जब तक मैं सीता जी की सुधि प्रभु ” श्रीराम ” को नहीं सुना देता…!

मौत उन्हें छू नहीं पा रही है… काँप रही है खड़ी हो कर…
मौत तब तक खड़ी रही, काँपती रही… यही इच्छा मृत्यु का वरदान जटायु को मिला।

किन्तु महाभारत के भीष्म पितामह छह महीने तक बाणों की शय्या पर लेट करके मौत का इंतजार करते रहे… आँखों में आँसू हैं … रो रहे हैं… भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं…!
कितना अलौकिक है यह दृश्य … रामायण मे जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं…
प्रभु ” श्रीराम ” रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं…
वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान ” श्रीकृष्ण ” हँस रहे हैं… भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं… ?

अंत समय में जटायु को प्रभु ” श्रीराम ” की गोद की शय्या मिली… लेकिन भीष्म पितामह को मरते समय बाण की शय्या मिली….!
जटायु अपने कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहा है….

प्रभु ” श्रीराम ” की शरण में….. और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं….
ऐसा अंतर क्यों?…

ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म पितामह ने द्रौपदी की इज्जत को लुटते हुए देखा था… विरोध नहीं कर पाये थे …!
दुःशासन को ललकार देते… दुर्योधन को ललकार देते… लेकिन द्रौपदी रोती रही… बिलखती रही… चीखती रही… चिल्लाती रही… लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे… नारी की रक्षा नहीं कर पाये…!

उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और ….
जटायु ने नारी का सम्मान किया…
अपने प्राणों की आहुति दे दी… तो मरते समय भगवान ” श्रीराम ” की गोद की शय्या मिली…!

जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं … उनकी गति भीष्म जैसी होती है …
जो अपना परिणाम जानते हुए भी…औरों के लिए संघर्ष करते है, उसका माहात्म्य जटायु जैसा कीर्तिवान होता है।

🙏 गलत का विरोध जरूर करना चाहिए। ” सत्य परेशान जरूर होता है, पर पराजित नही ” ।🙏🏻

बलराम की पत्नी रेवती की कहानी : प्राचीनकाल में समय यात्रा का प्रमाणहिन्दू धर्म ग्रन्थों, 

बलराम की पत्नी रेवती की कहानी : प्राचीनकाल में समय यात्रा का प्रमाण
हिन्दू धर्म ग्रन्थों, कथाओं में समय यात्रा कोई नयी बात नहीं है. हजारों सालों से ये कहानियाँ हम सुनते चले आ रहे हैं, जबकि Western world में यह नयी बात है. महाभारत में राजा काकुदमी की कहानी (Raja Kakudami story) इसका प्रमाण है.
प्राचीन काल में भारत के कुसस्थली नामक राज्य (आधुनिक द्वारका, गुजरात) में काकुदमी नामक राजा राज करते थे. राजा की एक अत्यत सुंदर पुत्री थी, जिसका नाम रेवती था. रेवती का जन्म अग्निकुंड की दिव्य अग्नि से हुआ था. रेवती मात्र एक सामान्य सुंदर लड़की न थी, वो शुभलक्षणों युक्त, सदाचारी, शील गुणों से परिपूर्ण प्रतिभावान युवती थी.

जब रेवती विवाह योग्य हुई तो राजा काकुदमी को उसके विवाह की चिंता हुई. अपनी असाधारण कन्या के लिए कोई भी वर उन्हें उपयुक्त न लगता था. अनन्तः राजा काकुदमी ने अपनी कन्या रेवती के साथ ब्रह्मलोक जाने का निश्चय किया. उन्हें आशा थी कि परमपिता ब्रह्मा ही स्वयं रेवती के लिए कोई सुयोग्य वर बता सकते हैं.

जब राजा काकुदमी ब्रह्मलोक पहुंचे तो ब्रह्मा जी की सभा में गन्धर्वो द्वारा नृत्य-संगीत की प्रस्तुति हो रही थी. राजा काकुदमी ने विचार किया कि इस कार्यक्रम के समाप्त होने के बाद ब्रह्मा जी से वो अपना आशय प्रकट करेंगे.

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद राजा काकुदमी ब्रह्मा जी के समक्ष पहुंचे, उन्हें झुककर प्रणाम किया और उनसे अपने आने का कारण व्यक्त किया. साथ ही राजा काकुदमी ने कुछ सम्भावित वरों की एक सूची भी ब्रह्मदेव को दी.

ब्रह्मा जी उनकी बात और वह सूची देखकर हँसने लगे. ब्रह्देव बोले – हे राजन ! समय की गति अद्भुत होती है. ब्रह्मांड के अलग-अलग स्थानों में समय की गति अलग-अलग होती है. जितनी देर आपने ब्रह्मलोक में प्रतीक्षा की और समय व्यतीत किया, उतने समय में पृथ्वी पर 27 युग बीत चुके हैं. अब ये सूची किसी काम की नहीं क्योंकि ये सभी वर तो पृथ्वी पर वर्षों पूर्व मर चुके हैं.

इसके बाद ब्रह्मदेव बोले – हे राजन ! अब आप पिता-पुत्री ही शेष बचे हो, पृथ्वी पर आपका राजपाट, घर-परिवार, मित्रगण, सेना, धन-सम्पत्ति भी कभी के नष्ट हो चुके हैं. आपको तो अब जल्द ही अपनी कन्या का विवाह करना पड़ेगा नहीं तो कलयुग आने वाला है.

राजा काकुदमी यह सब जानकर दंग रह गये और किंकर्तव्यविमूढ़ से हो गये. तब ब्रह्मा जी ने उन्हें दिलासा दिया और बताया कि इस समय पृथ्वी पर स्वयं जगतपालन कर्ता भगवान विष्णु कृष्ण और बलराम के रूप में विद्यमान हैं. ब्रह्मदेव ने कहा कि आपकी कन्या रेवती के लिए बलराम जी ही सबसे उपयुक्त वर हैं.

इसके पश्चात राजा काकुदमी कन्या रेवती के साथ पृथ्वी पर आ गये. पृथ्वी पर आकर उन्हें महान आश्चर्य हुआ. उनके अनुसार तो उन्हें आने जाने में केवल कुछ समय ही लगा था लेकिन अब तो पूरी पृथ्वी का स्वरुप ही बदल चुका है.

पृथ्वीलोक का मौसम, वातावरण और बनावट अब पहले जैसे न थी और मनुष्यों के गुणों, आकार और बुद्धि में भी भारी परिवर्तन आ चुका था.

इस विषय में भगवतपुराण में वर्णन है – अब पृथ्वी पर पहले के समान जीव-जन्तु, जानवर और पेड़-पौधे न थे, वर्तमान में तो सभी का आकार पहले से काफी कम हो गया था. मनुष्य भी अब पहले जैसे शक्तिशाली और दीर्घकाया के न थे, साथ ही उनके बुद्धि और आध्यात्मिकता का भी काफी ह्रास हो चुका है.
बलराम और रेवती का विवाह – Balram Revati story in Hindi :
राजा काकुदमी अब बिना देर करते रेवती के साथ बलराम जी से मिलने पहुँचे और उन्हें सब बातों से अवगत कराया. रेवती और बलराम अवश्य ही एक दूसरे के लिए सुयोग्य वर थे, लेकिन एक छोटी सी समस्या थी. रेवती पूर्वयुग में पैदा होने के कारण आकार में बलराम जी से बहुत लम्बी और विशालकाय थीं.
बलराम जी ने इसका भी समाधान निकाल दिया. उन्होंने अपना हल उठाया जोकि उनका प्रमुख अस्त्र है. बलराम जी ने अपने दिव्य हल से राजकुमारी रेवती के सिर और कन्धो को स्पर्श कराया.

क्षण भर में ही रेवती का आकार घटकर बलराम जी के लिए उपयुक्त आकार में हो गया. इसके पश्चात श्री बलराम और रेवती विवाह विधिपूर्वक सम्पन्न हुआ और वो पति-पत्नी सम्बन्ध में बंध गये.

ये पौराणिक कहानी एक आश्चर्यजनक प्रणाम है कि हमारे पूर्वज समयकाल-यात्रा से अनभिज्ञ न थे. ब्रह्मलोक में समय पृथ्वी की अपेक्षा धीमी गति से बढ़ता था. कहा भी गया है कि ब्रह्मा जी का एक दिन और रात 2 कल्प के बराबर होता है. 2 कल्प करीब 8 करोड़ वर्ष के बराबर होता है. कहानी के अनुसार राजा काकुदमी और रेवती ने केवल कुछ क्षण ही व्यतीत किये थे.

आधुनिक विज्ञान में आइंस्टीन के बाद से समय यात्रा के सिद्धांत को काफी बल मिला. आज के वैज्ञानिकों की टाइम ट्रेवल के सम्बन्ध में कई मान्यताएं हैं.

ऐसा कहा जाता है कि अगर आप अन्तरिक्ष में ब्लैकहोल में प्रवेश करके वापस आयें तो उतने समय में पृथ्वी पर कई वर्ष बीत चुके होंगे. Einstein कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति अत्यधिक तेजी से ट्रेवल करता है तो वो समय से आगे निकल सकता है.

Astronauts इस तथ्य का सही उदाहरण हैं, वे पृथ्वी से दूर तेजी से घूमते हुए Space Station में काफी समय व्यतीत करते हैं. विज्ञान के अनुसार जब यह Astronauts पृथ्वी पर वापस आते हैं तो उनकी उम्र में कुछ सेकंड का अंतर आ चुका होता है.

ये सब Modern Science की जटिल गणना और Analysis के बाद पता लगा पाया है, जबकि हमारे आदिग्रन्थों में यह कितने सटीक तरीके से Time Travel कहानी के माध्यम से बताई गयी है. कम से कम अब तो हमें अपने महान इतिहास पर गर्व होना ही चाहिए.

सद्गुरु की कृपा,,,,

सद्गुरु की कृपा,,,,

एक बार एक चोर ने गुरु से नाम ले लिया, और बोला गुरु जी चोरी तो मेरा काम है ये तो नहीं छूटेगी मेरे से..
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अब गुरु जी बोले ठीक है मैं तुझे एक दूसरा काम देता हुँ, वो निभा लेना…
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बोले पराई इस्त्री को माता बहन समझना..
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चोर बोला ठीक है जी ये मैं निभा लूंगा।
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एक राजा के कोई संतान नहीं थी तो उसने अपनी रानी को दुहागण कर रखा था
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10-12 साल से बगल मे ही एक घर दे रखा उसमे रहती और साथ ही सिपाहियों को निगरानी रखने के लिए बोल दिया।
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उसी चोर का उस रानी के घर मे चोरी के लिए जाना हुआ.. रानी ने देखा के चोर आया है।
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उधर सिपाहियों ने भी देख लिया के कोई आदमी गया है रानी के पास…
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राजा को बताया राजा बोला मैं छुप-छुप के देखूंगा… अब राजा छुप छुप के देखने लगा।
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रानी बोली चोर को कि तुम किस पे आये हो..
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चोर बोला ऊंट पे..

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रानी बोली की तुम्हारे पास जितने भी ऊंट हैं मैं सबको सोने चांदी से भरवां दूंगी बस मेरी इच्छा पुरी कर दो।
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चोर को अपने गुरु का प्रण याद आ गया.. बोला नहीं जी.. आप तो मेरी माता हो..
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जो पुत्र के लायक वाली इच्छा हो तो बताओ और दूसरी इच्छा मेरे बस की नहीं है।
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राजा ने सोचा वाह चोर होके इतना ईमानदार…
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राजा ने उसको पकड़ लिया और महल ले गया.. बोला मैं तेरी ईमानदारी से खुश हुँ तू वर मांग..
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चोर बोला जी आप दोगे पक्का वादा करो..
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राजा बोला हाँ मांग..
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चोर बोला मेरी मां को जिसको आपने दुहागण कर रखा है उसको फिर से सुहागन कर दो..
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राजा बड़ा खुश हुआ उसने रानी को बुलाया.. और बोला रानी मैंने तुझे भी बड़ा दुख दिया है तू भी मांग ले कुछ भी आज..
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रानी बोली के पक्का वादा करो दोगे और मोहर मार के लिख के दो के जो मांगूंगी वो दोगे।
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राजा ने लिख के मोहर मार दी।
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रानी बोली राजा हमारे कोई औलाद नहीं है इस चोर को ही अपना बेटा मान लो और राजा बना दो।
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अब सतसंगियों गुरु के एक वचन की पालना से राज दिला दिया।
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अगर हमारा विश्वास है तो दुनिया की कोई ताक़त नहीं जो हमें डिगा दे.. सतगुरु के वचनों अनुसार चलते रहे।

कभी सप्तर्षि तारामंडल में वशिष्ठ को ध्यान से देखिये, उनके निकट एक कम प्रकाश वाली तारिका दिखाई देगी।

कभी सप्तर्षि तारामंडल में वशिष्ठ को ध्यान से देखिये, उनके निकट एक कम प्रकाश वाली तारिका दिखाई देगी।
वह अरुंधति हैं। महर्षि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति।
महर्षि कर्दम और देवहूति की संतान अरुंधति ।
भगवान कपिल की बड़ी दीदी अरुंधति।
सप्तर्षि तारामंडल में अपने पति के साथ युगों-युगों से विराजमान एकमात्र स्त्री।
भारतीय सभ्यता ने कितने हजार वर्षों पूर्व उन सात तारों के समूह को सात महान ऋषियों का नाम देकर सप्तर्षि कहा, यह ज्ञात नहीं।
पर तब से अब तक वशिष्ठ और अरुंधति में सूत भर भी दूरी नहीं बढ़ी, यह तय है।
परम्परा में है कि नवविवाहित जोड़े को वशिष्ठ और अरुंधति की तरह साथ-साथ युगों-युगों तक चमकने का आशीर्वाद दिया जाता है।
दक्षिण में एक परम्परा है कि विवाह के समय वर वधु को अरुंधति की पहचान कराता है। यह परम्परा हमारी ओर भी है, पर इधर वर-वधु ध्रुवतारा देखते हैं। वैसे मुझे लगता है अपने साथी के साथ वशिष्ठ-अरुंधति को निहारना ज्यादा सार-प्रद है।
कल्पना कीजिये कि चांदनी रात्रि में आप किसी पार्क में या छत पर अपने साथी का हाथ पकड़ कर टहल रहे हैं, और आपके साथ साथ आपके माथे पर टहल रहे हैं दुनिया के सबसे बुजुर्ग पति-पत्नी वशिष्ठ और अरुंधति।
केवल सोच कर देखिये, आपको लगेगा कि आपके साथ रात मुस्कुरा रही है।

किसी का साथ होना, किसी के साथ चलना स्वयं में ही एक पूर्ण भाव है। और यदि समाज ने दो लोगों को हाथ पकड़ा कर साथ चलने की अनुमति दी है, तो इस भाव को पूरी तरह से जी लेना चाहिए।
किसी भी कारण से यदि आप एक दिन के लिए भी इस साथ को छोड़ते हैं, या दूर होते हैं तो आप अपनी वियुक्त विराग में खो जाते हैं।
शोकाकुल महसूस करते हैं।
वशिष्ठ और अरुंधति दो युग्म तारे हैं, जो एक दूसरे की परिक्रमा करते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे एक दूसरे का हाथ पकड़ कर गोल-गोल घूमती दो लड़कियां।
कितना मनोहारी है न?
एक आदर्श गृहस्थ जीवन ऐसा ही होता है जहाँ पति-पत्नी दोनों एक दूसरे की परिक्रमा करें।
एक दूसरे की सुनें, उनकी मानें। यदि दोनों में कोई एक, हमेशा दूसरे के पीछे पीछे चले तो यह दासत्व होता है, पर दोनों यदि साथ चलें तो वह गृहस्थी आदर्श हो जाती है।
तभी तो फेरों के समय बारी-बारी से दोनों आगे चलते हैं : संगच्छध्वम् संवदध्वम् संवोमनांसजानताम् का आत्म प्रबोधन ले ।
जिस विषय में जो निष्णात है, परिपूर्णता से कर सकता है,
वही करे।
जहाँ पुरुष कोई कार्य पूर्णता से निष्पादित कर सकता है वहाँ पुरुष, जहाँ स्त्री कर सकती है वहाँ स्त्री…
अरुंधति महर्षि वशिष्ठ के गुरुकुल की संचालिका थीं, उनके सभी छात्रों की माता।
वे उनकी प्रतिष्ठा का आधार थीं। किसी भी स्त्री या पुरुष की प्रतिष्ठा उससे अधिक उसके साथी के व्यवहार से तय होती है।
पति पत्नी का कोई जोड़ा युवा अवस्था में जितना सुन्दर दिखता है, और वृद्धावस्था में उतना ही पवित्र।
युवा दम्पति को साथ देख कर प्रेम का भाव उपजता है, तो वृद्ध दम्पत्ति को साथ और सुखी देख कर श्रद्धा उपजती है। इस श्रद्धा को भी समय-समय पर अपने अंदर उतारते रहना चाहिए।
तो अब जब भी रात्रि में आप पति/पत्नी के साथ छत पर बैठें तो एक बार साथ-साथ निहारिये उस जोड़े को।
अपने आदि ॠषि युगल को ।
मैं कह रहा हूँ।
मैं मानता हूँ कि,
दोनों की तरह ,
युगाब्दियों तक ,
प्रकाशित रह
चमकते रहेंगे।
और,
आर्ष भाव से,
संपूज्य
रहेंगे।

अखण्ड सनातन समिति

अखण्ड सनातन समिति

क्रमांक=०६

🕉️सनातन धर्म का इतिहास जानो🕉️

🛕माँ हरसिद्धि मंदिर (उज्जैन) म.प्र. ⛳

🔶51 फीट ऊंचे 2 दीप स्तंभों को जलाने में लगता है 60 लीटर तेल और 4 किलो रुई 2 वर्ष पहले 51 फीट ऊंचे 2 दीप स्तंभों को जलाने में लगता है 60 लीटर तेल और 4 किलो रुई|

🔶मध्य प्रदेश के उज्जैन में हरसिद्धि मंदिर है जो माता के 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती की कोहनी गिरी थी। मंदिर प्रांगण में स्थापित 2 दीप स्तंभ। ये दीप स्तंभ लगभग 51 फीट ऊंचे हैं। दोनों दीप स्तंभों में मिलाकर लगभग 1 हजार 11 दीपक हैं। मान्यता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने करवाई थी।

🔶विक्रमादित्य का इतिहास करीब 2 हजार साल पुराना है। इस दृष्टिकोण से ये दीप स्तंभ लगभग 2 हजार साल से अधिक पुराने हैं

🔶उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के परम भक्त थे। किवदंती है कि हर बारह साल में एक बार वे अपना सिर माता के चरणों में अर्पित कर देते थे, लेकिन माता की कृपा से पुन: नया सिर मिल जाता था।

🔶बारहवीं बार जब उन्होंने अपना सिर चढ़ाया तो वह फिर वापस नहीं आया। इस कारण उनका जीवन समाप्त हो गया। आज भी मंदिर के एक कोने में 11 सिंदूर लगे रुण्ड पड़े हैं। कहते हैं ये उन्हीं के कटे हुए मुण्ड हैं।

महान बलिदानी- बंदा बैरागी

महान बलिदानी- बंदा बैरागी

27 अक्टूबर/जन्म -दिवस

आज बन्दा बैरागी का जन्म दिवस है। कितने हिन्दू युवाओं ने उनके अमर बलिदान की गाथा सुनी है? बहुत कम। क्यूंकि वामपंथियों द्वारा लिखे गए पाठयक्रम में कहीं भी बंदा बैरागी का भूल से भी नाम लेना उनके लिए अपराध के समान है। फिर क्या वीर बन्दा वैरागी का बलिदान व्यर्थ जाएगा ?क्या हिन्दू समय रहते जाग पाएगा ?क्या आर्य हिन्दू जाति अपने पुर्वजों का ऋण उतारने के लिये संकल्पित होगी ?

इस लेख के माध्यम से जाने बंदा बैरागी के अमर बलिदान की गाथा।

बन्दा बैरागी का जन्म 27 अक्तूबर, 1670 को ग्राम तच्छल किला, पुंछ में श्री रामदेव के घर में हुआ। उनका बचपन का नाम लक्ष्मणदास था। युवावस्था में शिकार खेलते समय उन्होंने एक गर्भवती हिरणी पर तीर चला दिया। इससे उसके पेट से एक शिशु निकला और तड़पकर वहीं मर गया। यह देखकर उनका मन खिन्न हो गया। उन्होंने अपना नाम माधोदास रख लिया और घर छोड़कर तीर्थयात्रा पर चल दिये। अनेक साधुओं से योग साधना सीखी और फिर नान्देड़ में कुटिया बनाकर रहने लगे।

इसी दौरान गुरु गोविन्दसिंह जी माधोदास की कुटिया में आये। उनके चारों पुत्र बलिदान हो चुके थे। उन्होंने इस कठिन समय में माधोदास से वैराग्य छोड़कर देश में व्याप्त मुस्लिम आतंक से जूझने को कहा। इस भेंट से माधोदास का जीवन बदल गया। गुरुजी ने उसे बन्दा बहादुर नाम दिया। फिर पाँच तीर, एक निशान साहिब, एक नगाड़ा और एक हुक्मनामा देकर दोनों छोटे पुत्रों को दीवार में चिनवाने वाले सरहिन्द के नवाब से बदला लेने को कहा।

बन्दा हजारों सिख सैनिकों को साथ लेकर पंजाब की ओर चल दिये। उन्होंने सबसे पहले श्री गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने वाले जल्लाद जलालुद्दीन का सिर काटा। फिर सरहिन्द के नवाब वजीरखान का वध किया। जिन हिन्दू राजाओं ने मुगलों का साथ दिया था, बन्दा बहादुर ने उन्हें भी नहीं छोड़ा। इससे चारों ओर उनके नाम की धूम मच गयी।

उनके पराक्रम से भयभीत मुगलों ने दस लाख फौज लेकर उन पर हमला किया और विश्वासघात से 17 दिसम्बर, 1715 को उन्हें पकड़ लिया। उन्हें लोहे के एक पिंजड़े में बन्दकर, हाथी पर लादकर सड़क मार्ग से दिल्ली लाया गया। उनके साथ हजारों सिख भी कैद किये गये थे। इनमें बन्दा के वे 740 साथी भी थे, जो प्रारम्भ से ही उनके साथ थे। युद्ध में वीरगति पाए सिखों के सिर काटकर उन्हें भाले की नोक पर टाँगकर दिल्ली लाया गया। रास्ते भर गर्म चिमटों से बन्दा बैरागी का माँस नोचा जाता रहा।

काजियों ने बन्दा और उनके साथियों को मुसलमान बनने को कहा; पर सबने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। दिल्ली में आज जहाँ हार्डिंग लाइब्रेरी है,वहाँ 7 मार्च, 1716 से प्रतिदिन सौ वीरों की हत्या की जाने लगी। एक दरबारी मुहम्मद अमीन ने पूछा – तुमने ऐसे बुरे काम क्यों किये, जिससे तुम्हारी यह दुर्दशा हो रही है ?

बन्दा ने सीना फुलाकर सगर्व उत्तर दिया – मैं तो प्रजा के पीड़ितों को दण्ड देने के लिए परमपिता परमेश्वर के हाथ का शस्त्र था। क्या तुमने सुना नहीं कि जब संसार में दुष्टों की संख्या बढ़ जाती है, तो वह मेरे जैसे किसी सेवक को धरती पर भेजता है।

बन्दा से पूछा गया कि वे कैसी मौत मरना चाहते हैं ? बन्दा ने उत्तर दिया, मैं अब मौत से नहीं डरता; क्योंकि यह शरीर ही दुःख का मूल है। यह सुनकर सब ओर सन्नाटा छा गया। भयभीत करने के लिए उनके पाँच वर्षीय पुत्र अजय सिंह को उनकी गोद में लेटाकर बन्दा के हाथ में छुरा देकर उसको मारने को कहा गया।

बन्दा ने इससे इन्कार कर दिया। इस पर जल्लाद ने उस बच्चे के दो टुकड़ेकर उसके दिल का माँस बन्दा के मुँह में ठूँस दिया; पर वे तो इन सबसे ऊपर उठ चुके थे। गरम चिमटों से माँस नोचे जाने के कारण उनके शरीर में केवल हड्डियाँ शेष थी। फिर 9 जून, 1716 को उस वीर को हाथी से कुचलवा दिया गया। इस प्रकार बन्दा वीर बैरागी अपने नाम के तीनों शब्दों को सार्थक कर बलिपथ पर चल दिये।

बंदा बैरागी जैसे महान वीरों ने हमारे धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। खेदजनक बात यह है कि उनकी महान जीवन से आज की हमारी युवा पीढ़ी अनभिज्ञ है। यह एक सुनियोजित षड़यंत्र है कि जिन जिन महापुरुषों से हम प्रेरणा ले सके उनके नाम तक विस्मृत कर दिए जाये। इस लेख को इतना शेयर कीजिये कि भारत का बच्चा बच्चा बंदा बैरागी के महान जीवन से प्रेरणा ले सके।

🚩जय हो बन्दा बैरागी की🚩

सीता विवाह और राम का राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त में किया गया। फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ न राज्याभिषेक।

सीता विवाह और राम का राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त में किया गया। फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ न राज्याभिषेक।

जब मुनि वशिष्ठ से इसका जवाब मांगा गया तो उन्होंने साफ कह दिया।

“सुनहु भरत भावी प्रबल,
बिलखि कहेहूं मुनिनाथ।

लाभ हानि, जीवन मरण,
यश अपयश विधि हाँथ।”

अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।

न राम के जीवन को बदला जा सका, न कृष्ण के।
न ही शिव ने सती के मृत्यु को टाल सके! जबकि महा मृत्युंजय मंत्र उन्ही का आवाहन करता है।

रामकृष्ण परमहंस भी अपने कैंसर को न टाल सके।
न रावण ने अपने जीवन को बदल पाया और ही न कंस। जबकि दोनों के पास समस्त शक्तियाँ थी।

मानव अपने जन्म के साथ ही जीवन-मरण, यश-अपयश, लाभ-हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह रंग, परिवार समाज, देश स्थान सब पहले से ही निर्धारित कर के आता है।

साथ ही साथ अपने विशेष गुण धर्म, स्वभाव, और संस्कार सब पूर्व से लेकर आता है।।

इसलिए यदि अपने जीवन मे परिवर्तन चाहते हैं तो –
अपने कर्म बदलें।
आप के मदद के लिए स्वयं आपकी आत्मा और परमात्मा दोनों खड़े है।

उसे पुकारें। वह परमात्मा ही आप का सच्चा साथी है।
अपने परमपिता परमात्मा से ज्यादा शुभ चिंतक भला कौन हो सकता है हमारा ?
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

सुंदरकांड की इस प्रसंग को अवश्य पढ़ें।

सुंदरकांड की इस प्रसंग को अवश्य पढ़ें।

“मैं न होता तो क्या होता”

अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण उन्हों ने देखा मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर वे गदगद हो गये। वे सोचने लगे। यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता तो सीता जी को कौन बचाता???

बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मै न होता तो क्या होता ? परन्तु ये क्या हुआ सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं।

आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है की उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है। अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा।

जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है।

आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नही जायेगा पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता, पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि…
मै न होता तो क्या होता🙏

!! जय श्री राम !!

*एक सन्यासी घूमते-फिरते एक दुकान पर आये | दुकान में अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे |*

*एक सन्यासी घूमते-फिरते एक दुकान पर आये | दुकान में अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे |*

*सन्यासी ने एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए* *दुकानदार” से पूछा, “इसमें क्या है?”*

*दुकानदार ने कहा, “इसमें नमक है।”*

*सन्यासी ने फिर पूछा, “इसके* *पास वाले में क्या है ?”*

*दुकानदार ने कहा, “इसमें हल्दी है।”*

*इसी प्रकार सन्यासी पूछ्ते गए और दुकानदार बतलाता रहा।*

*अंत मे पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया, सन्यासी ने पूछा,* *”उस अंतिम डिब्बे में क्या है?”*

*दुकानदार बोला, “उसमें श्रीकृष्ण हैं।”*

*सन्यासी ने हैरान होते हुये पूछा, “श्रीकृष्ण !! भला यह* *”श्रीकृष्ण” किस वस्तु का नाम है भाई? मैंने तो इस नाम के* *किसी सामान के बारे में कभी नहीं सुना !”*

*दुकानदार सन्यासी के भोलेपन पर हंस कर बोला,* *”महात्मन ! और डिब्बों मे तो* *भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं | पर यह* *डिब्बा खाली है| हम खाली को खाली नहीं कहकर* *श्रीकृष्ण कहते हैं !”*

*संन्यासी की आंखें खुली की* *खुली रह गई ! जिस बात के* *लिये मैं दर-दर भटक रहा था, वो बात मुझे आज एक व्यापारी से समझ आ रही है।* *वो सन्यासी उस छोटे से किराने के दुकानदार के चरणों* *में गिर पड़ा, ओह, तो खाली में श्रीकृष्ण रहता है !*

*सत्य है ! भरे हुए में श्रीकृष्ण को स्थान कहाँ ?*

*काम, क्रोध, लोभ, मोह, लालच, अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष और भली-बुरी, सुख-दुख की बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा ? जय श्री कृष्ण🙏🙏🙏🙏🌷

पिता का आशीर्वाद और उसआशीर्वाद की परीक्षा

पिता का आशीर्वाद और उस
आशीर्वाद की परीक्षा

गुजरात के खंभात के एक व्यापारी की यह सत्य घटना है।

जब मृत्यु का समय सन्निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धनपाल को बुलाकर कहा कि बेटा –
मेरे पास धनसंपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं ,पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि,
तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी।

बेटे ने सिर झुका कर पिताजी के पैर छुए।

पिता ने सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया, और संतोष से अपने प्राण त्याग कर दिए।

अब घर का खर्च बेटे धनपाल को संभालना था।उसने एक छोटी सी ठेला गाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया। धीरेधीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा।

अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी।
उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है क्योंकि उन्होंने जीवन में दुख उठाया, पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी, इसलिए उनकी वाणी में बल था, और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए। और मैं सुखी हुआ।

उसके मुंह से बारबार यह बात निकलती थी।

एक दिन एक मित्र ने पूछा कि, तुम्हारे पिता में इतना बल था तो वह स्वयं संपन्न क्यों नहीं हुए? सुखी क्यों नहीं हुए?

धर्मपाल ने कहा कि मैं पिता की ताकत की बात नहीं कर रहा हूं, मैं उनके आशीर्वाद की ताकत की बात कर रहा हूं।

इस प्रकार वह बारबार अपने पिता के आशीर्वाद की बात करता तो लोगों ने उसका नाम ही रख दिया “बाप का आशीर्वाद”

धनपाल को इससे बुरा नहीं लगता वह कहता कि मैं अपने पिता के आशीर्वाद के काबिल निकलूं, यही चाहता हूं।

ऐसा करते हुए कई साल बीत गए। वह विदेशों में व्यापार करने लगा। जहां भी व्यापार करता, उससे बहुत लाभ होता।

एक बार उसके मन में आया कि मुझे लाभ ही लाभ होता है तो मैं एक बार नुकसान का अनुभव करूं।

तो उसने अपने एक मित्र से पूछा कि ऐसा व्यापार बताओ कि जिसमें मुझे नुकसान हो।

मित्र को लगा कि इसको अपनी सफलता का और पैसों का घमंड आ गया है।इसका घमंड दूर करने के लिए इसको ऐसा धंधा बताऊं कि इस को नुकसान ही नुकसान हो।

तो उसने उसको बताया कि
तुम भारत में लोंग खरीदो और जहाज में भरकर अफ्रीका के जंजीबार में जाकर बेचो।

धर्मपाल को यह बात ठीक लगी।

जंजीबार तो लौंग का देश है। वहां से लौंग भारत में आते हैं और यहां 10-12 गुना भाव पर बिकते हैं।

भारत में खरीद करके जंजीबार में बेचे तो साफ नुकसान सामने दिख रहा है।

परंतु धर्मपाल ने तय किया कि मैं भारत में लौंग खरीद कर, जंजीबार खुद लेकर जाऊंगा। देखूं कि पिता के आशीर्वाद कितना साथ देते हैं।

नुकसान का अनुभव लेने के लिए उसने भारत में लोंग खरीदे और जहाज में भरकर खुद उनके साथ जंजीबार द्वीप पहुंचा।

जंजीबार में सुल्तान का राज्य था।

धर्मपाल जहाज से उतर कर के और लंबे रेतीले रास्ते पर जा रहा था वहां के व्यापारियों से मिलने को।

उसे सामने से सुल्तान जैसा व्यक्ति पैदल सिपाहियों के साथ आता हुआ दिखाई दिया।

उसने किसी से पूछा कि यह कौन है?

उन्हें कहा कि यह सुल्तान हैं।

सुल्तान ने उसको सामने देखकर उसका परिचय पूछा।

उसने कहा कि मैं भारत के गुजरात के खंभात का व्यापारी हूं और यहां पर व्यापार करने आया हूं ।

सुल्तान ने उसको व्यापारी समझ कर उसका आदर किया और उससे बात करने लगा।

धर्मपाल ने देखा कि सुल्तान के साथ सैकड़ों सिपाही हैं, परंतु उनके हाथ में तलवार, बंदूक आदि कुछ भी न होकर बड़ीबड़ी छलनियां है। उसको आश्चर्य हुआ।
उसने विनम्रतापूर्वक सुल्तान से पूछा कि आपके सैनिक इतनी छलनी लेकर के क्यों जा रहे हैं।

सुल्तान ने हंसकर कहा कि बात यह है कि आज सवेरे मैं समुद्र तट पर घूमने आया था। तब मेरी उंगली में से एक अंगूठी यहां कहीं निकल कर गिर गई।
अब रेत में अंगूठी कहां गिरी पता नहीं। तो इसलिए मैं इन सैनिकों को साथ लेकर आया हूं। यह रेत छानकर मेरी अंगूठी उसमें से तलाश करेंगे।

धर्मपाल ने कहा – अंगूठी बहुत महंगी होगी।

सुल्तान ने कहा -नहीं, उससे बहुत अधिक कीमत वाली अनगिनत अंगूठी मेरे पास हैं, पर वह अंगूठी एक फकीर का आशीर्वाद है।
मैं मानता हूं कि मेरी सल्तनत इतनी मजबूत और सुखी उस फकीर के आशीर्वाद से है।
इसलिए मेरे मन में उस अंगूठी का मूल्य सल्तनत से भी ज्यादा है।

इतना कह कर के सुल्तान ने फिर पूछा कि बोलो सेठ-
इस बार आप क्या माल ले कर आये हो।

धर्मपाल ने कहा कि –
लौंग
लों ऽ ग !

सुल्तान के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।
यह तो लौंग का ही देश है सेठ।
यहां लौंग बेचने आये हो?
किसने आपको ऐसी सलाह दी। जरूर वह कोई आपका दुश्मन होगा। यहां तो एक पैसे में मुट्ठी भर लोंग मिलते हैं।

यहां लोंग को कौन खरीदेगा? और तुम क्या कमाओगे?

धर्मपाल ने कहा कि
मुझे यही देखना है कि यहां भी मुनाफा होता है या नहीं।
मेरे पिता के आशीर्वाद से आज तक मैंने जो धंधा किया, उसमें मुनाफा ही मुनाफा हुआ। तो अब मैं देखना चाहता हूं कि उनके आशीर्वाद यहां भी फलते हैं या नहीं।

सुल्तान ने पूछा कि -पिता के आशीर्वाद…? इसका क्या मतलब…?

धर्मपाल ने कहा कि
मेरे पिता सारे जीवन ईमानदारी और प्रामाणिकता से काम करते रहे ,परंतु धन नहीं कमा सके। उन्होंने मरते समय मुझे भगवान का नाम लेकर मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिए थे कि तेरे हाथ में धूल भी सोना बन जाएगी।

ऐसा बोलतेबोलते धर्मपाल नीचे झुका और जमीन की रेत से एक मुट्ठी भरी और सम्राट सुल्तान के सामने मुट्ठी खोलकर उंगलियों के बीच में से रेत नीचे गिराई तो….
धर्मपाल और सुल्तान दोनों का आश्चर्य का पार नहीं रहा।

उसके हाथ में एक हीरेजड़ित अंगूठी थी।

यह वही सुल्तान की गुमी हुई अंगूठी थी।

अंगूठी देखकर सुल्तान बहुत प्रसन्न हो गया।
बोला, वाह खुदा “आप की करामात का पार नहीं। आप पिता के आशीर्वाद को सच्चा करते हो।

धर्मपाल ने कहा कि
फकीर के आशीर्वाद को भी वही परमात्मा सच्चा करता है।

सुल्तान और खुश हुआ। धर्मपाल को गले लगाया और कहा कि मांग सेठ।आज तू जो मांगेगा मैं दूंगा।

धर्मपाल ने कहा कि आप 100 वर्ष तक जीवित रहो और प्रजा का अच्छी तरह से पालन करो। प्रजा सुखी रहे। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए।

सुल्तान और अधिक प्रसन्न हो गया। उसने कहा कि सेठ
तुम्हारा सारा माल में आज खरीदता हूं और तुम्हारी मुंहमांगी कीमत दूंगा।

सीख —
इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि पिता के आशीर्वाद हों तो दुनिया की कोई ताकत कहीं भी तुम्हें पराजित नहीं होने देगी।
पिता और माता की सेवा का फल निश्चित रूप से मिलता है।
आशीर्वाद जैसी और कोई संपत्ति नहीं।

बालक के मन को जानने वाली मां और भविष्य को संवारने वाले पिता यही दुनिया के दो महान ज्योतिषी है, बस इनका सम्मान करो तो तुमको भगवान के पास भी कुछ मांगना नहीं पड़ेगा। अपने बुजुर्गों का सम्मान करें, यही भगवान की सबसे बड़ी सेवा है..🙏🏽