भाईयों का प्रेम

भाईयों का प्रेम

दो भाई थे । आपस में बहुत प्यार था। खेत अलग-अलग थे..आजु बाजू में। बड़ा भाई शादीशुदा था…छोटा अकेला।

एक बार खेती बहुत अच्छी हुई..अच्छी फ़सल हुई। अपने खेत में काम करते करते बड़े भाई ने बगल के खेत में काम करते छोटे भाई को खेत देखने का कहकर खाना खाने चला गया..!!

उसके जाते ही छोटा भाई सोचने लगा..खेती तो अच्छी हुई है…इस बार अनाज भी बहुत हुआ है… पर.. मैं तो अकेला हूँ, बड़े भाई की तो गृहस्थी है..पूरा परिवार है..मेरे लिए तो मेरे ये अनाज जरुरत से ज्यादा है..भैया के साथ तो भाभी बच्चे है..उन्हें जरुरत ज्यादा है..!!

ऐसा विचारकर वह अपने 10 बोरे अनाज..बड़े भाई के अनाज की ढेर में डाल देता है..!! तब तक बड़ा भाई भोजन करके आता है और उसके आते ही छोटा भाई भोजन के लिए चला जाता है..।

छोटे भाई के जाते ही वह बड़ा भाई विचारता है कि..मेरा गृहस्थ जीवन तो अच्छे से चल रहा है…छोटे भाई को तो अभी गृहस्थी जमाना है… उसे अभी जिम्मेदारिया सम्हालनी है…!! मै इतने अनाज का क्या करूँगा…ऐसा विचारकर उसने अपने ढ़ेर से 10 बोरे अनाज
छोटे भाई के ढ़ेर में डाल दिया…

दोनों भाईयों के मन में हर्ष था…!!अनाज उतना का उतना ही था..पर….अपनत्व स्नेह वात्सल्य बढ़ा हुआ था…।

सोच अच्छी रखेंगें तो प्रेम अपने आप बढेगा..!! अगर ऐसा प्रेम भाई भाई में हुआ तो दुनिया की कोई भी ताकत आपके परिवार को तोड़ नही सकती…और ऐसा परिवार ही धरती का स्वर्ग बन जाएगा..।

जब तक रिश्ते में दोनो ओर से देने की भावना बनी रहेगी रिश्ता बना रहेगा, जिस दिन भी किसी एक मे लेने की भावना आ गयी, रिश्तों में दूरी बढ़ने लगेगी। ज़रूरत, इच्छा, चाहत—हम इन भावों के साथ नहीं जन्मे होते है, जब हम बड़े होने लगते हैं तो ये तो हमें सामाजिक परिवेश की परिस्थितियां देती हैं। जब सांसारिक परिस्थितियाँ हमारे सपनों की चंचल-सी दुनिया के साथ लड़ बैठती हैं तो हम उस मंथन में रस्सी-से बन जाते हैं। हम उस दुपट्टे से हो जाते हैं जिसकी हर सलवट में कहीं अधूरे सच तो कहीं अप्राकृतिक भाव छिपे होते हैं। स्वार्थी बन जाते है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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💐💐पांच मिनट💐💐

एक बार एक व्यक्ति को रास्ते में यमराज मिल गये वो व्यक्ति उन्हें पहचान नहीं सका। यमराज ने पीने के लिए व्यक्ति से पानी माँगा, बिना एक क्षण गंवाए उसने पानी पिला दिया। पानी पीने के बाद यमराज ने बताया कि वो उसके प्राण लेने आये हैं लेकिन चूँकि तुमने मेरी प्यास बुझाई है इसलिए मैं तुम्हें अपनी किस्मत बदलने का एक मौका देता हूँ।

यह कहकर यमराज ने एक डायरी देकर उस आदमी से कहा कि तुम्हारे पास 5 मिनट का समय है।

इसमें तुम जो भी लिखोगे वही हो जाएगा लेकिन ध्यान रहे केवल 5 मिनट।

उस व्यक्ति ने डायरी खोलकर देखा तो उसने देखा कि पहले पेज पर लिखा था कि उसके पड़ोसी की लॉटरी निकलने वाली है और वह करोड़पति बनने वाला है।

उसने वहां लिख दिया कि उसके पड़ोसी की लॉटरी न निकले।

अगले पेज पर लिखा था कि उसका एक दोस्त चुनाव जीतकर मंत्री बनने वाला है, तो उसने लिख दिया कि उसका दोस्त चुनाव हार जाए।

इस तरह, वह पेज पलटता रहा और अंत में उसे अपना पेज दिखाई दिया।

जैसे ही उसने कुछ लिखने के लिए अपना पेन उठाया यमराज ने उस व्यक्ति के हाथ से डायरी ले ली और कहा वत्स तुम्हारा पांच मिनट का समय पूरा हुआ, अब कुछ नहीं हो सकता।

तुमने अपना पूरा समय दूसरों का बुरा करने में व्यतीत कर दिया और अपना जीवन खतरे में डाल दिया।

अंतत: तुम्हारा अंत निश्चित है। यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत पछताया लेकिन सुनहरा मौका उसके हाथ से निकल चुका था।

💐💐शिक्षा💐💐
यदि ईश्वर ने आपको कोई शक्ति प्रदान की है तो कभी किसी का बुरा न सोचे, और न ही बुरा करें। दूसरों का भला करने वाला सदा सुखी रहता है और ईश्वर की कृपा सदा उस पर बनी रहती है..!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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गर्द

“बेटा!.गाड़ी साफ कर दूं?”
रंजीत ने जैसे ही फ्यूल भरवाने के लिए अपनी कार पेट्रोल पंप पर रोका एक बुजुर्ग भागकर उसकी गाड़ी के करीब आया।
“नहीं अंकल!.अभी थोड़ी जल्दी में हूँ।”
यह कहते हुए रंजीत ने उस बुजुर्ग को टालना चाहा लेकिन वह बुजुर्ग उससे विनती करने लगा..
“बेटा दस मिनट भी नहीं लगेंगे!.थोड़ा ठहर जाओ मैंने आज सुबह से अभी तक कुछ नहीं खाया है,. दस-बीस रुपए दे देना बस!”
बुजुर्ग की हालत देख रंजीत को उस पर दया आ गई “अंकल!.मैं आपको रुपए दे देता हूंँ आप कुछ खा लीजिएगा!”

यह कहते हुए रंजीत ने अपनी जेब से बटुआ निकाल लिया लेकिन बुजुर्ग ने यह कहते हुए रुपए लेने से इंकार कर दिया कि..
“बेटा!.मैं भीख नहीं ले सकता।”
“अंकल!. यह भीख नहीं है,. मैं आपकी इज्जत करता हूंँ!.आप मेरे पिता समान है,. लेकिन आपने सुबह से कुछ नहीं खाया है इसलिए मैं आपको यह कुछ रुपए देना चाहता हूंँ।”
“नहीं बेटा!. आप जाइए,. मैं इंतजार करूंगा!. आप नहीं तो कोई और सही!. किसी ना किसी को तो मेरी मेहनत की जरूरत होगी।”
यह कहते हुए वह बुजुर्ग वापस मुड़ गया।
उस बुजुर्ग का आत्मसम्मान और स्वाभिमान देख रंजीत हैरान हुआ।
वह बुजुर्ग उसे कोई आम इंसान नहीं लगा इसलिए रंजीत अपनी कार छोड़ उस बुजुर्ग के पीछे आया..
“अंकल!.क्या मैं आपसे दो मिनट बात कर सकता हूंँ?”
“बोलो बेटा!”
“आप कहां रहते हो?”
“यहीं!”
“यहां कहां?”
“यह पेट्रोल पंप ही मेरा ठिकाना है!.मैं यही रहता हूंँ।”
“आपका कोई घर-द्वार भी तो होगा ना?”
“घर था!. लेकिन अब नहीं रहा।”
“मैं कुछ समझा नहीं अंकल?”
“बच्चों को पढ़ाने और लायक बनाने के चक्कर में मैं अपना घर बेचकर एक किराए के मकान में रहने लगा था।”
“अंकल!.अब आपके बच्चे कहां रहते हैं?” रंजीत को जिज्ञासा हुई।
“एक विदेश में है और दूसरा यहीं इसी शहर में!”
“अंकल!.आप उनके साथ क्यों नहीं रहते?”
“बेटा!. उनके घर में मेरे रहने लायक कोई जगह नहीं है!”
“क्यों अंकल?”
“मेरा एक बेटा इंजीनियर है और एक डॉक्टर!”
“मुझे लगता है उन दोनों की कमाई अच्छी खासी होगी!. है ना अंकल?”
“हांँ बेटा!. मेरा एक बेटा इसी शहर में डॉक्टर है!. साठ हजार रुपए किराया देकर एक बंगले में रहता है!. पच्चीस-पैतीस लाख की गाड़ी से चलता है,. लेकिन मेरे लिए उसके पास कुछ नहीं है।”
यह कहते-कहते उस बुजुर्ग की आंखों में आंसू छलक आए।
“अंकल!.आप अपने बच्चों पर आपको गुजारा भत्ता देने के लिए कोर्ट में मुकदमा दायर क्यों नहीं करते?. आख़िर आपने अपना सब कुछ दे कर उन्हें कमाने लायक बनाया है।”
रंजीत ने उस बुजुर्ग को सलाह दी और उसकी बात सुनकर वह बुजुर्ग मुस्कुराया..
“बेटा!. मैंने उनकी परवरिश पर जो कुछ भी खर्च किया वह सब कुछ अपनी मर्जी से किया था!. अगर मैं वह सब कुछ उन पर मुकदमा करके मांग भी लूं तो उन सब चीजों का अब मैं करूंगा क्या?”
“फिर भी अंकल!.आपको उनसे कुछ ना कुछ तो मिलना ही चाहिए।”
“बेटा!.दो रोटी तो मैं अपनी मेहनत से आज भी कमा लेता हूंँ!.रही मुकदमा दायर करने की बात तो अदालत में मुकदमा दायर कर बच्चों के प्रति स्नेह और माता-पिता के प्रति सम्मान नहीं मांगा जा सकता इस बात का अंदाजा मुझे भी है।”
उस बुजुर्ग की बात सुनकर रंजीत नतमस्तक हो गया उसे अब कुछ कहते नहीं बन रहा था लेकिन फिर भी उसने अपनी बात को दूसरी ओर मोड़ दिया..
“अंकल!.अब मैं इतनी देर ठहर ही गया हूंँ तो आप मेरी कार पर जमी धूल साफ कर दीजिए।”
वह बुजुर्ग अपने हाथ में थामे साफे से झटपट उसकी कार पर जमीन गर्द को साफ करने लगा लेकिन उस बुजुर्ग की जिंदगी पर जमीन गर्द को साफ करने में असमर्थ रंजीत मन ही मन सोच रहा था कि,..
एक अकेला गरीब पिता अपने बच्चों को लायक बनाने की हिम्मत रखता है लेकिन जवान होने पर वही बच्चे सक्षम होने के बावजूद अपने बुजुर्ग हो चुके माता-पिता को संभालने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाते!

इसी उधेड़बुन में खड़े रंजीत ने उस बुजुर्ग के सामने एक ऑफर रखा..
“अंकल मेरे पास गाड़ियों का एक शोरूम है!.अगर आप चाहे तो वहां गाड़ियों की देखभाल का काम कर सकते हैं।”
रंजीत की बात सुनकर उस बुजुर्ग के हाथ रुक गए वह मुस्कुराया..
“बेटा!.आप बहुत दयालु हो लेकिन मुझे किसी की दया की जरूरत नहीं है।”
रंजीत ने आगे बढ़कर उस बुजुर्ग का हाथ अपने हाथों में लेकर उसे आश्वस्त किया..
“नहीं अंकल!.वहां भी आपको आपकी मेहनत के बदले ही रुपए मिलेंगे।”
एक अजनबी से इतनी आत्मीयता पाकर उस बुजुर्ग के चेहरे पर गजब का स्वाभिमान था।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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समर्पण का भाव

समर्पण का भाव

एक बार एक बेहद ख़ूबसूरत महिला समुद्र के किनारे रेत पर टहल रही थी।
समुद्र की लहरों के साथ कोई एक बहुत चमकदार पत्थर छोर पर आ गया।
महिला ने वह नायाब सा दिखने वाला पत्थर उठा लिया।
वह पत्थर नहीं असली हीरा था।
महिला ने चुपचाप उसे अपने पर्स में रख लिया।
लेकिन उसके हाव-भाव पर बहुत फ़र्क नहीं पड़ा।
पास में खड़ा एक बूढ़ा व्यक्ति बडे़ ही कौतूहल से यह सब देख रहा था।

अचानक वह अपनी जगह से उठा और उस महिला की ओर बढ़ने लगा।
महिला के पास जाकर उस बूढ़े व्यक्ति ने उसके सामने हाथ फैलाये और बोला :—-
मैंने पिछले चार दिनों से कुछ भी नहीं खाया है।
क्या तुम मेरी मदद कर सकती हो???
उस महिला ने तुरंत अपना पर्स खोला और कुछ खाने की चीज ढूँढ़ने लगी।
उसने देखा बूढ़े की नज़र उस पत्थर पर है जिसे कुछ समय पहले उसने समुद्र तट पर रेत में पड़ा हुआ पाया था।

महिला को पूरी कहानी समझ में आ गयी।
उसने झट से वह पत्थर निकाला और उस बूढ़े को दे दिया।
बूढ़ा सोचने लगा कि कोई ऐसी क़ीमती चीज़ भला इतनी आसानी से कैसे दे सकता है???
बूढ़े ने गौर से उस पत्थर को देखा वह असली हीरा था
बूढ़ा सोच में पड़ गया।

इतने में औरत पलट कर वापस अपने रास्ते पर आगे बढ़ चुकी थी।
बूढ़े ने उस औरत से पूछा :— क्या तुम जानती हो कि
यह एक बेशकीमती हीरा है???
महिला ने जवाब देते हुए कहा :—- जी हाँ और मुझे यक़ीन है कि यह हीरा ही है।
लेकिन मेरी खुशी इस हीरे में नहीं है बल्कि मेरे भीतर है।
समुद्र की लहरों की तरह ही दौलत और शोहरत आती जाती रहती है।

अगर अपनी खुशी इनसे जोड़ेंगे तो कभी खुश नहीं रह सकते।बूढ़े व्यक्ति ने हीरा उस महिला को वापस कर दिया और कहा कि यह हीरा तुम रखो और
मुझे इससे कई गुना ज्यादा क़ीमती वह समर्पण का भाव दे दो
जिसकी वजह से तुमने इतनी आसानी से यह हीरा मुझे दे दिया!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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हमारे कभी न खत्म होने वाले काम

हमारे कभी न खत्म होने वाले काम
🏵️🌼🍥 *

एक दिन एक व्यक्ति पहाड़ पर घूमने गया जहाँ एक साध्वी ध्यान कर रही थी। उसने उन्हें दंडवत किया और उनसे पूछा “इतनी एकांत जगह पर आप यहां अकेले क्या कर रही हैं?”🌼

साध्वी ने जवाब दिया:- यहां मेरे पास बहुत काम है।”
🍥 “यहां आपके पास काम कैसे हो सकता है?
मुझे यहां आस-पास कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है?”
🏵️ “मुझे दो बाज और दो चील को प्रशिक्षित करना है, दो खरगोशों को सिखाना है, एक साँप को अनुशासित करना है, एक गधे को प्रेरित करना है और एक शेर को वश में करना है।”
🏵️ 🍥 “और, वे कहाँ गए हैं कि मैं,उन्हें देख नहीं पा रहा?”
🏵️ “ये सभी मेरे भीतर हैं।”

* बाज हर चीज पर पैनी नजर रखते हैं मेरी दोनों आँखें जो मेरे दोनों बाज हैं, उन्हें सिखाना है कि जो कुछ भी मेरे सामने है, अच्छा या बुरा, उनमें से केवल अच्छी चीजों को देखना है। मेरे दोनों हाथ मेरी दो चील हैं जो अपने पंजों से चोट पहुँचा सकते हैं और विनाश कर सकते हैं, मुझे उन्हें किसी को भी चोट न पहुँचाने के लिए प्रशिक्षित करना है।मेरे दोनों पैर मेरे दो खरगोश हैं। वे स्वेच्छा से भ्रमण करना चाहते हैं और कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं करना चाहते हैं। मुझे उन्हें दुख या ठोकर लगने पर भी शांत रहना सिखाना है।
🏵️ गधा हमेशा थका हुआ, जिद्दी होता है और हर बार चलने पर बोझ नहीं उठाना चाहता। वह मेरा शरीर है। मुझे इससे मेहनती बनना है।मेरी जुबान साँप के समान है। साँप को वश में करना सबसे कठिन है। यद्यपि यह 32 दाँत स्वरूप सलाखों के साथ एक मजबूत पिंजरे में बंद है, फिर भी यह हमेशा किसी को भी डंक मारने, काटने और जहर उगलने को तैयार रहती है। मुझे इसे अनुशासित करना है।मेरे पास एक शेर भी है। ओह, कितना गर्व, व्यर्थ, वह सोचता है कि “वह राजा है।” मुझे उसे वश में करना है। और वह मेरा अहंकार है।
🏵️ मेरे पास कितने काम हैं, जिन्हें खत्म करने
में शायद मेरा जीवन ही लग जाए।
🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️
बहुत फर्क होता है-
किसी को “जानने और समझने में”
जानता वो है “जो साथ होता है”
और समझता वो है “जो पास होता है”।
🏵️

सच्चा धन, पुत्र, वही जो परमार्थ करे

सच्चा धन, पुत्र, वही जो परमार्थ करे

एक सेठ बड़ा साधु सेवी था। जो भी सन्त महात्मा नगर में आते वह उन्हें अपने घर बुला कर उनकी सेवा करता।

एक बार एक महात्मा जी सेठ के घर आये। सेठानी महात्मा जी को भोजन कराने लगी। सेठ जी उस समय किसी काम से बाज़ार चले गये।

भोजन करते करते महात्मा जी ने स्वाभाविक ही सेठानी से कुछ प्रश्न किये। पहला प्रश्न यह था कि तुम्हारा बच्चे कितने हैं ? सेठानी ने उत्तर दिया कि ईश्वर की कृपा से चार बच्चे हैं।

महात्मा जी ने दूसरा प्रश्न किया कि तुम्हारा धन कितना है? उत्तर मिला कि महाराज! ईश्वर की अति कृपा है लोग हमें लखपति कहते हैं।

महात्मा जी जब भोजन कर चुके तो सेठ जी भी बाज़ार से वापिस आ गये और सेठ जी महात्मा जी को विदा करने के लिये साथ चल दिये। मार्ग में महात्मा जी ने वही प्रश्न सेठ से भी किये जो उन्होंने सेठानी से किये थे।

पहला प्रश्न था कि तुम्हारे बच्चे कितने हैं? सेठ जी ने कहा महाराज! मेरा एक पुत्र है। महात्मा जी दिल में सोचने लगे कि ऐसा लगता है सेठ जी झूठ बोल रहे हैं। इसकी पत्नी तो कहती थी कि हमारे चार बच्चे हैं और हमने स्वयं भी तीन-चार बच्चे आते-जाते देखे हैं और यह कहता है कि मेरा एक ही पुत्र है।

महात्मा जी ने दुबारा वही प्रश्न किया, सेठ जी तुम्हारा धन कितना है? सेठ जी ने उत्तर दिया कि मेरा धन पच्चीस हज़ार रूपया है। महात्मा जी फिर चकित हुए इसकी सेठानी कहती थी कि लोग हमें लखपति कहते हैं। इतने इनके कारखाने और कारोबार चल रहे हैं और यह कहता है मेरा धन पच्चीस हज़ार रुपये है।

फिर महात्मा जी ने तीसरा प्रश्न किया कि सेठ जी! तुम्हारी आयु कितनी है? सेठ ने कहा-महाराज मेरी आयु चालीस वर्ष की है महात्मा जी यह उत्तर सुन कर हैरान हुए सफेद इसके बाल हैं, देखने में यह सत्तर-पचहत्तर वर्ष का वृद्ध प्रतीत होता है और यह अपनी आयु चालीस वर्ष बताता है। सोचने लगे कि सेठ अपने बच्चों और धन को छुपाये परन्तु आयु को कैसे छुपा सकता है?

महात्मा जी रह न सके और बोले-सेठ जी! ऐसा लगता है कि तुम झूठ बोल रहे हो?

सेठ जी ने हाथ जोड़कर विनय की महाराज! झूठ बोलना तो वैसे ही पाप है और विशेषकर सन्तोंं के साथ झूठ बोलना और भी बड़ा पाप है।

आपका पहला प्रश्न मेरे बच्चों के विषय में था। वस्तुतः मेरे चार पुत्र हैं किन्तु मेरा आज्ञाकारी पुत्र एक ही है। भक्ति भाव पूजा पाठ में लगा हुआ है मैं उसी एक को ही अपना पुत्र मानता हूँ। जो मेरी आज्ञा में नहीं रहते कुसंग के साथ रहते हैं वे मेरे पुत्र कैसे? दूसरा प्रश्न आपका मेरा धन के विषय में था। महाराज! मैं उसी को अपना धन समझता हूँ जो परमार्थ की राह में लगे। मैने जीवन भर में पच्चीस हज़ार रुपये ही परमार्थ की राह में लगाये हैं वही मेरी असली पूँजी है। जो धन मेरे मरने के बाद मेरे पुत्र बन्धु-सम्बन्धी ले जावेंगे वह मेरा क्यों कर हुआ? तीसरे प्रश्न में आपने मेरी आयु पूछी है। चालीस वर्ष पूर्व मेरा मिलाप एक संत जी से हुआ था। उनकी सेवा चरण-शरण ग्रहण करके गुरु धारण किए मैं तब से भजन-अभ्यास और साधु सेवा कर रहा हूँ। इसलिये मैं इसी चालीस वर्ष की अवधि को ही अपनी आयु समझता हूँ।

जब कभी सन्त सज्जन महापुरुषों का मिलाप होता है उनकी संगति में जाकर मालिक की याद आती है, वास्तव में वही घड़ी सफल है। शेष दिन जीवन के निरर्थक हैं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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“दो यात्रियों का वार्तालाप।

दोनों यात्री हैं परंतु दोनों के कथन का भाव अलग-अलग है।” 🏵️

दो प्रकार की यात्रा होती है।
एक – घूमने फिरने वाले लोगों की सड़क या रेल मार्ग की यात्रा।
और दूसरी – आध्यात्मिक यात्रा। इसका लक्ष्य मोक्ष होता है।

एक बार, रेल सड़क मार्ग से जाने वाला एक यात्री, जो देश भर में सैर सपाटा करने निकला था, वह घूमते घूमते एक साधु महाराज की कुटिया में पहुंच गया। उसने सोचा, कि “यहां थोड़ी देर विश्राम कर लूं, कुछ भोजन कर लूं। फिर आगे की यात्रा करूंगा।”

वह साधु महाराज की कुटिया के अंदर गया। उसने देखा, कि
“टेबल कुर्सी फर्नीचर आदि कुछ नहीं है। एक पुरानी सी चटाई है, जिस पर साधु महाराज बैठे हैं, और अपने प्रभु चिंतन में मस्त हैं।”

उस यात्री ने पूछा, “महाराज! आपका टेबल कुर्सी आदि फर्नीचर कहां है?”
यह प्रश्न सुनकर साधु महाराज ने, यात्री के प्रश्न का उत्तर देने से पहले, उसी से प्रतिप्रश्न किया कि “आपका फर्नीचर कहां है?”
उस घूमने वाले यात्री ने कहा, “मैं तो यात्री हूं। मैं फर्नीचर नहीं रखता।”
साधु महाराज ने कहा, “मैं भी यात्री हूं। मैं भी फर्नीचर नहीं रखता।”

इन दोनों यात्रियों के शब्द तो एक समान हैं, परंतु भाव दोनों का अलग-अलग है।
“घूमने वाला यात्री कुर्सी टेबल आदि फर्नीचर इस कारण से नहीं रखता, क्योंकि वह यात्रा में बाधक है।”
और “दूसरा मोक्ष की ओर चलने वाला यात्री साधु महाराज भी कुर्सी टेबल आदि फर्नीचर इसलिए नहीं रखता, क्योंकि वह मोक्ष की यात्रा में भी बाधक है।
सार यह हुआ कि दोनों प्रकार की यात्राओं में अधिक सामान बाधक है।”

अब इन दोनों का भाव अलग-अलग होते हुए भी, एक बात दोनों में समान है, कि “यात्रा में सामान कम से कम रखना चाहिए, जिससे कि यात्रा में कठिनाई न हो और यात्रा सुखद रहे।”

इस दृष्टांत पर आप भी चिंतन कीजिएगा। वैसे तो सभी ही मोक्ष लक्ष्य वाले यात्री ही हैं। परंतु कोई व्यक्ति इस बात को समझ जाता है, कि मैं मोक्ष लक्ष्य वाला यात्री हूं। और कोई व्यक्ति नहीं समझ पाता।

“जो स्वयं को मोक्ष लक्ष्य वाली यात्रा का यात्री नहीं समझ पाता, वह संसार की यात्रा करता रहता है। और जो मोक्ष को लक्ष्य समझ लेता है, वह आध्यात्मिक यात्रा करता है। यदि आप भी मोक्ष वाली यात्रा के यात्री हों, तो अपना फर्नीचर आदि सामान धीरे धीरे कम करते जाएं। और यदि रेल सड़क की यात्रा वाले यात्री हों, तो भी यात्रा में सामान कम रखें। क्योंकि जितना सामान कम रखेंगे, उतने अधिक सुखी रहेंगे।”
भूले मन समझ के लड़ लदनिया,
थोडा लाद बहुत मत लादे,
टूट जाये तेरि गरदनिया,
—–🌼–🌸–

ताश के पत्तों का मर्म

ताश के पत्तों का मर्म

हम ताश खेलते है, अपना मनोरंजन करते है। पर शायद कुछ ही लोग जानते होंगे कि ताश का आधार वैज्ञानिक है व साथ साथ ही प्राकृति से भी जुड़ा हुआ है:-

आयताकार मोंटे कागज़ से बने पत्ते चार प्रकार के …..ईंट, पान, चिड़ी, और हुक्म, प्रत्येक 13 पत्तों को मिलाकर कुल 52 पत्ते होते हैं।
पत्ते…. एक्का से दस्सा, गुलाम, रानी एवं राजा ।

  1. 52 पत्ते …….52 सप्ताह
  2. 4 प्रकार के पत्ते …….4 ऋतु
  3. प्रत्येक रंग के 13 पत्ते….प्रत्येक ऋतु में 13 सप्ताह
  4. सभी पत्तों का जोड़ ..1 से 13 = 91 × 4 = 364
  5. एक जोकर….. 364+1= 365 दिन…1 वर्ष
  6. दूसरा जोकर गिने..365 +1=366 दिन..लीप वर्ष
  7. 52 पत्तों में 12 चित्र वाले पत्ते – 12 महिने
  8. लाल और काला रंग … दिन और रात! 💥 पत्तों का अर्थ

1 दुक्की – पृथ्वी और आकाश

  1. तिक्की- ब्रम्हा, विष्णू, महेश
  2. चौकी – चार वेद (अथर्व वेद, सामवेद, ऋग्वेद, अथर्ववेद)
  3. पंजी – पंच प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान)
  4. छक्की – षड रिपू (काम, क्रोध, मद, मोह, मत्सर, लोभ)
  5. सत्ती- सात सागर
  6. अटठी- आठ सिद्धी
  7. नव्वा- नौ ग्रह
  8. दस्सी- दस इंद्रियां
  9. गुलाम- मन की वासना
  10. रानी- माया
  11. राजा – सबका शासक
  12. एक्का- मनुष्य का विवेक

गर्द

गर्द

“बेटा!.गाड़ी साफ कर दूं?”
रंजीत ने जैसे ही फ्यूल भरवाने के लिए अपनी कार पेट्रोल पंप पर रोका एक बुजुर्ग भागकर उसकी गाड़ी के करीब आया।
“नहीं अंकल!.अभी थोड़ी जल्दी में हूँ।”
यह कहते हुए रंजीत ने उस बुजुर्ग को टालना चाहा लेकिन वह बुजुर्ग उससे विनती करने लगा..
“बेटा दस मिनट भी नहीं लगेंगे!.थोड़ा ठहर जाओ मैंने आज सुबह से अभी तक कुछ नहीं खाया है,. दस-बीस रुपए दे देना बस!”

बुजुर्ग की हालत देख रंजीत को उस पर दया आ गई “अंकल!.मैं आपको रुपए दे देता हूंँ आप कुछ खा लीजिएगा!”
यह कहते हुए रंजीत ने अपनी जेब से बटुआ निकाल लिया लेकिन बुजुर्ग ने यह कहते हुए रुपए लेने से इंकार कर दिया कि..
“बेटा!.मैं भीख नहीं ले सकता।”
“अंकल!. यह भीख नहीं है,. मैं आपकी इज्जत करता हूंँ!.आप मेरे पिता समान है,. लेकिन आपने सुबह से कुछ नहीं खाया है इसलिए मैं आपको यह कुछ रुपए देना चाहता हूंँ।”
“नहीं बेटा!. आप जाइए,. मैं इंतजार करूंगा!. आप नहीं तो कोई और सही!. किसी ना किसी को तो मेरी मेहनत की जरूरत होगी।”
यह कहते हुए वह बुजुर्ग वापस मुड़ गया।
उस बुजुर्ग का आत्मसम्मान और स्वाभिमान देख रंजीत हैरान हुआ।
वह बुजुर्ग उसे कोई आम इंसान नहीं लगा इसलिए रंजीत अपनी कार छोड़ उस बुजुर्ग के पीछे आया..
“अंकल!.क्या मैं आपसे दो मिनट बात कर सकता हूंँ?”
“बोलो बेटा!”
“आप कहां रहते हो?”
“यहीं!”
“यहां कहां?”
“यह पेट्रोल पंप ही मेरा ठिकाना है!.मैं यही रहता हूंँ।”
“आपका कोई घर-द्वार भी तो होगा ना?”
“घर था!. लेकिन अब नहीं रहा।”
“मैं कुछ समझा नहीं अंकल?”
“बच्चों को पढ़ाने और लायक बनाने के चक्कर में मैं अपना घर बेचकर एक किराए के मकान में रहने लगा था।”
“अंकल!.अब आपके बच्चे कहां रहते हैं?” रंजीत को जिज्ञासा हुई।
“एक विदेश में है और दूसरा यहीं इसी शहर में!”
“अंकल!.आप उनके साथ क्यों नहीं रहते?”
“बेटा!. उनके घर में मेरे रहने लायक कोई जगह नहीं है!”
“क्यों अंकल?”
“मेरा एक बेटा इंजीनियर है और एक डॉक्टर!”
“मुझे लगता है उन दोनों की कमाई अच्छी खासी होगी!. है ना अंकल?”
“हांँ बेटा!. मेरा एक बेटा इसी शहर में डॉक्टर है!. साठ हजार रुपए किराया देकर एक बंगले में रहता है!. पच्चीस-पैतीस लाख की गाड़ी से चलता है,. लेकिन मेरे लिए उसके पास कुछ नहीं है।”
यह कहते-कहते उस बुजुर्ग की आंखों में आंसू छलक आए।
“अंकल!.आप अपने बच्चों पर आपको गुजारा भत्ता देने के लिए कोर्ट में मुकदमा दायर क्यों नहीं करते?. आख़िर आपने अपना सब कुछ दे कर उन्हें कमाने लायक बनाया है।”
रंजीत ने उस बुजुर्ग को सलाह दी और उसकी बात सुनकर वह बुजुर्ग मुस्कुराया..
“बेटा!. मैंने उनकी परवरिश पर जो कुछ भी खर्च किया वह सब कुछ अपनी मर्जी से किया था!. अगर मैं वह सब कुछ उन पर मुकदमा करके मांग भी लूं तो उन सब चीजों का अब मैं करूंगा क्या?”
“फिर भी अंकल!.आपको उनसे कुछ ना कुछ तो मिलना ही चाहिए।”
“बेटा!.दो रोटी तो मैं अपनी मेहनत से आज भी कमा लेता हूंँ!.रही मुकदमा दायर करने की बात तो अदालत में मुकदमा दायर कर बच्चों के प्रति स्नेह और माता-पिता के प्रति सम्मान नहीं मांगा जा सकता इस बात का अंदाजा मुझे भी है।”
उस बुजुर्ग की बात सुनकर रंजीत नतमस्तक हो गया उसे अब कुछ कहते नहीं बन रहा था लेकिन फिर भी उसने अपनी बात को दूसरी ओर मोड़ दिया..

“अंकल!.अब मैं इतनी देर ठहर ही गया हूंँ तो आप मेरी कार पर जमी धूल साफ कर दीजिए।”
वह बुजुर्ग अपने हाथ में थामे साफे से झटपट उसकी कार पर जमीन गर्द को साफ करने लगा लेकिन उस बुजुर्ग की जिंदगी पर जमीन गर्द को साफ करने में असमर्थ रंजीत मन ही मन सोच रहा था कि,..
एक अकेला गरीब पिता अपने बच्चों को लायक बनाने की हिम्मत रखता है लेकिन जवान होने पर वही बच्चे सक्षम होने के बावजूद अपने बुजुर्ग हो चुके माता-पिता को संभालने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाते!
इसी उधेड़बुन में खड़े रंजीत ने उस बुजुर्ग के सामने एक ऑफर रखा..
“अंकल मेरे पास गाड़ियों का एक शोरूम है!.अगर आप चाहे तो वहां गाड़ियों की देखभाल का काम कर सकते हैं।”
रंजीत की बात सुनकर उस बुजुर्ग के हाथ रुक गए वह मुस्कुराया..
“बेटा!.आप बहुत दयालु हो लेकिन मुझे किसी की दया की जरूरत नहीं है।”
रंजीत ने आगे बढ़कर उस बुजुर्ग का हाथ अपने हाथों में लेकर उसे आश्वस्त किया..
“नहीं अंकल!.वहां भी आपको आपकी मेहनत के बदले ही रुपए मिलेंगे।”
एक अजनबी से इतनी आत्मीयता पाकर उस बुजुर्ग के चेहरे पर गजब का स्वाभिमान था।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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अच्छे और बुरे लोगों की पहचान

अच्छे और बुरे लोगों की पहचान

बहुत समय पहले की बात है। नदी के तट पर एक गांव बसा था और उसी के नजदीक एक संत का आश्रम था। एक बार संत अपने शिष्यों के साथ नदी में स्नान कर रहे थे, तभी एक राहगीर वहां आया और संत से पूछने लगा, ‘‘महाराज, मैं परदेस से आया हूं और इस जगह पर नया हूं। क्या आप बता सकते हैं कि इस गांव में किस तरह
के लोग रहते हैं?’’

यह सुनकर संत ने उससे कहा, ‘‘भाई, मैं तुम्हारे सवाल का जवाब बाद में दूंगा। पहले तुम मुझे यह बताओ कि तुम अभी जहां से आए हो, वहां किस प्रकार के लोग रहते हैं?’’

इस पर वह व्यक्ति बोला, ‘‘उनके बारे में क्या कहूं महाराज! वहां तो एक से एक कपटी, दुष्ट और बुरे लोग बसे हुए हैं।’’
तब संत ने उससे कहा, ‘‘तुम्हें इस गांव में भी बिल्कुल उसी तरह के लोग मिलेंगे-कपटी, दुष्ट और बुरे।’’

इतना सुनकर वह राहगीर आगे बढ़ गया। कुछ समय बाद वहां से एक और राहगीर का गुजरना हुआ। वह भी किसी नई जगह पर बसने की इच्छा रखता था। उसने संत से पूछा, ‘‘महात्मन, मुझे यहां की आबोहवा ठीक लगती है। क्या आप बता सकते हैं कि इस गांव में कैसे लोग रहते हैं?’’
संत ने उससे भी वही सवाल पूछा, जो उन्होंने पहले राहगीर से पूछा था। इस पर राहगीर ने जवाब दिया, ‘‘महात्मन, मैं जहां से आया हूं, वहां तो बहुत ही सभ्य, सुलझे और नेक दिल इंसान रहते हैं।’’

तब संत ने उससे कहा, ‘‘तुम्हें यहां भी उसी तरह के लोग मिलेंगे। सभ्य, सुलझे हुए और नेकदिल। तुम्हें यहां रहने में कोई परेशानी नहीं होगी।’’ इतना सुनते ही वह राहगीर संत को प्रणाम कर आगे बढ़ गया।

शिष्य यह सब देख रहे थे। राहगीर के जाते ही उन्होंने संत से पूछा, ‘‘गुरुदेव, आपने दोनों राहगीरों को एक ही स्थान के बारे में अलग-अलग बातें क्यों बताईं?’’

इस पर संत ने उनसे कहा, ‘‘वत्स, आमतौर पर हम चीजों को वैसे नहीं देखते, जैसी वे हैं। बल्कि उन्हें हम उसी हिसाब से देखते हैं, जैसे कि हम खुद हैं। हर जगह हर प्रकार के लोग होते हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस तरह के लोगों को देखना चाहते हैं। अगर हम अच्छाई देखना चाहें तो हमें अच्छे लोग मिलेंगे और बुराई देखना चाहें तो बुरे।’’

यह सुनकर शिष्यों को उनकी बात का मर्म समझ में आ गया और उन्होंने जीवन में सिर्फ अच्छाइयों पर ध्यान केंद्रित करने का निश्चय किया।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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