निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय.

निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय.

“आपको कुछ लोग ऐसे भी मिले हुए होंगे, जो आपकी पीठ पीछे आपकी निंदा करते होंगे। उनसे घृणा न करें। वे तो मुफ्त में आपको आपके दोषों की जानकारी देते हैं, और आपकी शुद्धि करते हैं।”

आज आप किसी बड़े वकील साहब से सलाह लेने जाएं, तो लाखों रुपया देना पड़ता है। सलाह इतनी महंगी हो गई है। फिर भी उस सलाह का लाभ होगा, या नहीं, यह कहना कठिन है। ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति आप को मुफ्त में अच्छी सलाह देवे, आपके दोष बतावे, और आपका शुद्धिकरण करे, तो आपको कितना बड़ा लाभ होगा!

“वह व्यक्ति चाहे आपके सामने आपका दोष बतावे, चाहे आपकी पीठ पीछे बतावे, और वाया वाया जानकारी आप तक पहुंचे। तो भी आप को उस में लाभ ही है।”
आप उस व्यक्ति द्वारा बताई गई अच्छी सलाह पर अथवा उसके बताए गए दोष पर खूब गहराई से चिंतन करें, विचार करें, कि “उसने जो आपका दोष बताया है, क्या वह सही है? क्या वह दोष वास्तव में आपके अंदर है? यदि है, तो उस सत्य को स्वीकार करें, और उस दोष को दूर करें। इससे आप की शुद्धि हो जाएगी आपका जीवन पवित्र होगा। आपके दुख दूर हो जाएंगे। उस दोष के कारण जो आप गलतियां करते थे, जो आपसे अपराध होते थे, वे गलतियां/ अपराध दूर हो जाएंगे। अर्थात भविष्य में आप वैसी गलतियां नहीं करेंगे। और उनके दंड से भी बच जाएंगे।”

इससे क्या पता चला, कि यदि कोई व्यक्ति मुफ्त में आपको दोष बताता है, तो उस से घृणा नहीं करनी चाहिए, बल्कि उस का उपकार मानना चाहिए।

दूसरा पक्ष — “उसके द्वारा बताया गया दोष यदि आपके अंदर नहीं है। तब तो चिंता की कोई बात ही नहीं है? तब कोई चिंता नहीं करनी चाहिए। तब तो आपको मस्त प्रसन्न रहना चाहिए।”
क्योंकि मनुष्य अल्पज्ञ है। उसके जानने में अनेक बार भूलें हो सकती हैं। कभी-कभी वह अज्ञानता से भी आप पर झूठा आरोप लगा सकता है। कभी जानबूझकर भी।

चाहे अनजाने में लगाए अथवा जानबूझकर लगाए, उसके कर्म का फल तो वही भोगेगा। परंतु आपको तो उसकी बात से लाभ उठा लेना चाहिए। जैसा कि ऊपर बताया गया है।

“यदि आप ऐसा करेंगे तो आपके दोष कम होते जाएंगे, और आप में अच्छे गुण आते जाएंगे। परिणाम – आपका दुख कम होता जाएगा, और सुख बढ़ता जाएगा।”

दो पोटली

💐💐दो पोटली💐💐

एक बार भगवान ने जब इंसान की रचना की तो उसे दो पोटली दी। कहा एक पोटली को आगे की तरफ लटकाना और दूसरी को कंधे के पीछे पीठ पर। आदमी दोनों पोटलियां लेकर चल पड़ा।

हां, भगवान ने उसे ये भी कहा था कि आगे वाली पोटली पर नजर रखना पीछे वाली पर नहीं। समय बीतता गया। वह आदमी आगे वाली पोटली पर बराबर नजर रखता। आगे वाली पोटली में उसकी कमियां थीं और पीछे वाली में दुनिया की।

वे अपनी कमियां सुधारता गया और तरक्की करता गया। पीछे वाली पोटली को इसने नजरंदाज कर रखा था।

एक दिन तालाब में नहाने के पश्चात, दोनों पोटलियां अदल बदल हो गई। आगे वाली पीछे और पीछे वाली आगे आ गई।

अब उसे दुनिया की कमियां ही कमियां नजर आने लगी। ये ठीक नहीं, वो ठीक नहीं। बच्चे ठीक नहीं, पड़ोसी बेकार है, सरकार निक्कमी है आदि-आदि। अब वह खुद के अलावा सब में कमियां ढूंढने लगा।

परिणाम ये हुआ कि कोई नहीं सुधरा, पर उसका पतन होने लगा। वह चक्कर में पड़ गया कि ये क्या हुआ है? वो वापस भगवान के पास गया। भगवान ने उसे समझाया कि जब तक तेरी नजर अपनी कमियों पर थी, तू तरक्की कर रहा था। जैसे ही तूने दूसरों में मीन-मेख निकालने शुरू कर दिए, वहीं से तेरा पतन शुरू हो गया।

शिक्षा:-
हकीकत यही है कि हम किसी को नहीं सुधार सकते, हम अपने आपको सुधार लें इसी में हमारा कल्याण है। हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा। हम यही सोचते हैं कि सबको ठीक करके ही शांति प्राप्त होगी, जबकि खुद को ठीक नहीं करते..!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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ईमानदार  बालक

एक छोटे से गांव में नंदू नाम का एक बालक अपने निर्धन माता पिता के साथ रहता था।

एक दिन दो भाई अपनी फसल शहर में बेचकर ट्रैक्टर से अपने गांव आ रहे थे।

फसल बेचकर जो पैसा मिला वो उन्होंने एक थैली💰 में रख लिया था। अचानक एक गड्डा आ गया और ट्रैक्टर उछला और थैली नीचे गिर गई ।

जिसे दोनों भाई देख नहीं पाएं और सीधे चले गए।

उधर बालक नंदू खेलकूद पर रात के अंधेरे में अपने घर जा रहा था।

अचानक उसका पैर किसी वस्तु से टकरा गया। देखा तो पता चला कि किसी की थैली है। जब नंदू ने उसे खोलकर देखा तो थैली में नोट भरे हुए थे।

वो हैरान हो गया। वह सोचने लगा की पता नहीं किसकी थैली है। उसने सोचा कि अगर यही छोड़ गया तो कोई और इसे उठा ले जाएगा

वो मन ही मन सोचने लगा ‘जिसकी यह थैली है उसे कितना अधिक दुख और कष्ट हो रहा होगा।

हालाँकि लड़का उम्र से छोटा था और निर्धन माँ बाप का बेटा था। लेकिन उसमे सूझबूझ काफी अच्छी थी।

वह थैली को उठाकर अपने घर ले आया। उसने थैली को झोपड़ी में छुपा कर रख दिया।
फिर वापस आकर उसी रास्ते पर खड़ा हो गया उसने सोचा।
कोई ढूंढता हुआ आएगा तो पहचान बताने पर में थैली उसे दे दूंगा।

इधर जब थोड़ी देर बाद दोनों भाई घर पहुंचे तो ट्रैक्टर में थैली नहीं थी । दोनों भाई यह जान निराश होते हुए बहुत दुखी होने लगे।

पूरे साल की कमाई थैली में भरी थी।

उन्होंने विचार किया किसी को मिला भी होगा तो कोई बताएगा भी नहीं।

शायद अभी वह किसी के हाथ ना लगा हो यह सोच दोनों भाई टॉर्च लेकर उसी रास्ते पर वापस र चले जा रहे थे।

छोटा बालक नंदू उन्हें रास्ते में मिला। उसने उन दोनों से कुछ भी नहीं पूछा। लेकिन उसे शंका हुई की शायद वह थैली इन्हीं की हो।

तब उसने उनसे पुछा ‘आप लोग क्या ढूंढ रहे हैं? उन्होंने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया।

उसने दोबरा पूछा ‘आप दोनों क्या ढूढ़ रहै हो। उन्होंने कहा? अरे कुछ भी ढूंढ रहे हैं तू जा तुझे क्या मतलब।

दोनों आगे बढ़ते जा रहे थे। नंदू उनके पीछे चलने लगा। वो समझ गया था कि नोटों वाली थैली संभवत इन्हीं की ही है।

उसने तीसरी बार फिर पूछा, तो चिल्लाकर एक भाई ने कहा ‘अरे चुप हो जा और हमें अपना काम करने दे। दिमाग को और खराब ना कर।

अब नंदू को पूरा विश्वास हो गया कि वो थैली अवश्य ही इन्हीं की ही है।

फिर उसने पूछा ‘आपकी थैली 💰खो गई है क्या ?

दोनों भाई एकदम रुक गए और बोले हां। नंदू बोला ‘पहले थैली की पहचान बताइए।

जब उन्होंने पहचान बताई तो बालक उन्हें अपने घर ले गया। छुपाई हुई थैली लाकर उन दोनों भाइयों को सौंप दी।

दोनों भाइयों के प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। नंदू की इमानदारी पर दोनों बड़े हैरान थे।
उन्होंने इनाम के तौर पर कुछ रुपए देने चाहे, पर नंदू ने मना कर दिया बोला ‘यह तो मेरा कर्तव्य था।

दूसरे के दिन वह दोनों भाई नंदू के स्कूल पहुंच गए।

उन्होंने बालक के अध्यापक को यह पूरी घटना सुनाते हुए कहा, हम सब विद्यार्थियों के सामने उस बालक को धन्यवाद देने आए।

अध्यापक के नेत्रों से आंसू झरने लगे। उन्होंने बालक की पीठ थपथपाई और पूछा ‘बेटा, पैसे से भरे थैले के बारे में अपने माता पिता को क्यों नहीं बताया ?

नंदू बोला, गुरूजी मेरे माता-पिता निर्धन हैं ।

कदाचित उनका मन बदल जाता तो हो सकता है रुपयों को देख कर उसे लौटने नहीं देते और यह दोंनो भाई बहुत निराश हो जाते।

यह सोच मैंने घरवालों को थैली के बारे में कुछ भी नहीं बताया। सभी ने नंदू की बड़ी प्रशंसा की और कहा बेटा धन्यवाद तूने गरीब होकर भी ईमानदारी को नहीं छोड़ा।

शिक्षा:-इस कहानी का सार यही है कि सबसे बड़ा गुण इमानदारी का है। ईमानदार होना हमें सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति की स्थिति में ले जाता है।

जिस प्रकार इस छोटे से बालक ने अपने ईमान को नहीं खोया भले ही उसकी गरीबी कष्टदाई थी।

लेकिन ईमानदार व्यक्ति छोटा हो या बड़ा ईमानदारी का गुण ही जीवन के सबसे बड़े गहने हैं।

ईमानदारी से ही हमारे व्यक्तित्व को बहुत प्रसिद्धि मिलती है। ईमानदार मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्तम रचना है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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बुद्धिमान साधू

बुद्धिमान साधू

किसी राजा के द्वार पर एक साधु आया और द्वारपाल से बोला कि भीतर जाकर राजा से कहे कि उनका भाई आया है।

द्वारपाल ने समझा कि शायद ये कोई दूर के रिश्ते में राजा का भाई हो जो संन्यास लेकर साधुओं की तरह रह रहा हो!

सूचना मिलने पर राजा मुस्कुराया और साधु को भीतर बुलाकर अपने पास बैठा लिया।

साधु ने पूछा – कहो अनुज,क्या हाल-चाल हैं तुम्हारे?

“मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं भैया?”, राजा बोला।

साधु ने कहा- जिस महल में मैं रहता था, वह पुराना और जर्जर हो गया है। कभी भी टूटकर गिर सकता है। मेरे 32 नौकर थे वे भी एक-एक करके चले गए। पाँचों रानियाँ भी वृद्ध हो गयीं और अब उनसे कोई काम नहीं होता…

यह सुनकर राजा ने साधु को 10 सोने के सिक्के देने का आदेश दिया।

साधु ने 10 सोने के सिक्के कम बताए।

तब राजा ने कहा, इस बार राज्य में सूखा पड़ा है, आप इतने से ही संतोष कर लें।

साधु बोला- मेरे साथ सात समंदर पार चलो वहां सोने की खदाने हैं। मेरे पैर पड़ते ही समुद्र सूख जाएगा… मेरे पैरों की शक्ति तो आप देख ही चुके हैं।

अब राजा ने साधु को 100 सोने के सिक्के देने का आदेश दिया।

साधु के जाने के बाद मंत्रियों ने आश्चर्य से पूछा, “ क्षमा करियेगा राजन, लकिन जहाँ तक हम जानते हैं आपका कोई बड़ा भाई नहीं है, फिर आपने इस ठग को इतना इनाम क्यों दिया?”

राजन ने समझाया, “ देखो, भाग्य के दो पहलु होते हैं। राजा और रंक। इस नाते उसने मुझे भाई कहा।

जर्जर महल से उसका आशय उसके बूढ़े शरीर से था… 32 नौकर उसके दांत थे और 5 वृद्ध रानियाँ, उसकी 5 इन्द्रियां हैं।

समुद्र के बहाने उसने मुझे उलाहना दिया कि राजमहल में उसके पैर रखते ही मेरा राजकोष सूख गया…क्योंकि मैं उसे मात्र दस सिक्के दे रहा था जबकि मेरी हैसियत उसे सोने से तौल देने की है। इसीलिए उसकी बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर मैंने उसे सौ सिक्के दिए और कल से मैं उसे अपना सलाहकार नियुक्त करूँगा
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

शिक्षा:-
मित्रों, इस प्रसंग से हमें ये सीख मिलती है कि किसी व्यक्ति के बाहरी रंग रूप से उसकी बुद्धिमत्ता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता इसलिए हमें सिर्फ किसी ने खराब कपडे पहने हैं या वो देखने में अच्छा नहीं है; उसके बारे में गलत विचार नहीं बनाने चाहियें।

रावण, विभीषण व कुंभकर्ण

रावण, विभीषण व कुंभकर्ण


जब हम ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं, हमें उस ज्ञान पर मान हो जाता है और हम अहंकार, दंभ से ग्रस्त हो जाते हैं।

भौतिक शरीर तीन गुणों से संचालित होता है और उसके कर्म इन्हीं तीन के संतुलन – असंतुलन से निर्धारित होते हैं।

ज्ञान के कारण अहंकार होने पर हम रावण बन जाते हैं।


विभीषण और कुंभकरण यह दोनों हमारे अंतर्मन की अवस्थाएं हैं।
अहंकार से ग्रस्त होकर हम जब भी कोई कदम उठाते हैं तो हमारे भीतर का ..+विभीषण हमें बार-बार आगाह करता है। तमोगुण की अधिकता के कारण हमारा अहंकार इतना प्रभावी हो जाता है कि वह इस विभीषण को बलपूर्वक चुप कराता रहता है और विभीषण फिर भी न माने तो हमारा अहंकार उसे लात मार कर निकाल देता है।


दूसरी और हमारे ही अंतर्मन में एक कुंभकरण भी है जो हमारे इस रवैये से क्षुब्ध एवं निराश होकर निद्रा अवस्था में चला जाता है अर्थात निष्क्रिय हो जाता है और हमें अच्छे बुरे का भेद समझाना बंद कर देता है।

विभीषण, कुंभकरण और रावण यह हमारे भीतर व्याप्त “सत -रज – तम ” के संतुलन और असंतुलन से होने वाली अवस्थाएं हैं।

गुरु कृपा का वर्णन करना इतना आसान नहीं तो भी कुछ महीने पहले मैंने अपने भावों को शब्दों में पिरोया था – जिसको सभी ने पसन्द किया और आज हर ग्रुप में यह पोस्ट हो रहा है! मैं खुद पुनः इसे पोस्ट कर रहा हूँ!

गुरु कृपा का वर्णन करना इतना आसान नहीं तो भी कुछ महीने पहले मैंने अपने भावों को शब्दों में पिरोया था – जिसको सभी ने पसन्द किया और आज हर ग्रुप में यह पोस्ट हो रहा है! मैं खुद पुनः इसे पोस्ट कर रहा हूँ!

गुरु-कृपा क्या है?
पैसा, आलीशान घर, महंगी गाड़ियां और धन-दौलत गुरु-कृपा नहीं है।

इस जीवन में अनेक संकट और विपदाएं जो हमारी जानकारी के बिना ही गायब हो जाती हैं,
वह गुरु-कृपा है।

कभी-कभी सफ़र के दौरान भीड़ वाली जगह में धक्का-मुक्की के बावजूद हम किसी तरह से गिरते-गिरते बच जाते हैं और संतुलन बना लेते हैं। वह संतुलन जिसने हमें गिरने से बचाया,
वह गुरु-कृपा है।

जब कभी एक समय का भोजन भी मिलना मुश्किल हो, फिर भी हमें पेट भर खाने को मिले,
वह गुरु-कृपा है।

जब आप अनेक मुश्किलों के बोझ तले दबे हों, फिर भी आप इनका सामना करने का सामर्थ्य महसूस करें,
वह सामर्थ्य गुरु-कृपा है।

जब आप बिल्कुल हार मानने ही वाले हों और ये सोच लें कि अब सब कुछ ख़त्म हो चुका है। तभी, उसी क्षण, आपको आशा की एक किरण दिखाई देने लगे और आप फिर से संघर्ष के लिए तैयार हो जाएं,
वह आशा गुरु-कृपा है।

जब विपत्ति के समय आपके सभी सगे-संबंधी आपको अकेला छोड़ दें, एक गुरु-बंधु (कोई मित्र या गुरु को मानने वाला भाई-बहन) आए और आपसे कहे- “तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं।”,
उस गुरु-बंधु के हिम्मत देने वाले शब्द गुरु-कृपा है।

जब आप कामयाबी के शिखर पर हों, पैसा और ख़ुशियां भरपूर हों, उस वक़्त भी आप स्वयं को ज़मीन से जुड़ा और विनम्र महसूस करें,
वह गुरु-कृपा है।

केवल धन, ऐश्वर्य और सफलता का होना ही गुरु-कृपा नहीं हैं, लेकिन जब आपके पास ये चीज़ें न हों, फिर भी आप ख़ुशी, संतुष्टि और स्वयं को धन्य महसूस करें,
वह गुरु-कृपा है।

आप हैं और आपके जीवनकाल में ही आपके मार्गदर्शन के लिय समय के सद्गुरु हों, उनका दिव्य ज्ञान हो, आपके ह्रदय में स्वयं अपने लिये सेवा, सत्संग और अभ्यास के अवसर तलाशने की प्रबल आकांशा हो,
वह गुरु-कृपा है।

गुरु द्वारा प्र्द्दत्त ज्ञान का प्रतिदिन अभ्यास करने तथा वह आनन्द और लोग भी महसूस करें – यह भाव प्रतिपल बना रहे!
वह गुरु-कृपा है।
👏👏👏

छोटी सी बात

रामू अपने काम में बहुत होशियार होने के बावजूद बड़ा ही आलसी था। जब देखो आलस के मारे सोता रहता था। उसकी इस आदत से उसकी पत्नी चंदा बड़ी दुखी थी। वह अकसर उसे समझाती, “तुम अपने हर काम में इतनी देर करते हो, तभी तो आज तक तुम्हारे पास एक दुकान तक नहीं है। मुझे तो डर है, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे आलसीपन की वजह से भूखे मरने की नौबत आ जाए।”

एक दिन रामू और चंदा में झगड़ा हुआ तो रामू गुस्से से बोला, “मैं आज ही शहर जाकर कोई काम ढूंढूगा और एक दिन बड़ा आदमी बनूंगा, देखना। फिर मेरे पास आलीशान मकान-दुकान सब कुछ होगा। लोग तब मेरे जैसा बनना चाहेंगे।”

सच में उस दिन रामू ने जो कहा वही किया। वह घर छोड़कर स्टेशन की तरफ चल दिया। वहां उसने टिकट लिया। तभी उसे सामने से एक पूरी-छोले बेचने वाला नजर आया। उसके मुंह में पानी आ गया। उसने पूरी-छोले खरीदे और जमकर खाया। पेट भरने के बाद उसे नींद सताने लगी। वहीं अपनी गठरी सिर के नीचे दबाकर वह खर्राटे भरने लगा।

ट्रेन कब आई और कब चली गई, रामू को कुछ पता नहीं चला। तभी मनकू काका उधर से गुजरे। उन्होंने रामू को सोते देखा। उन्होंने जाकर चंदा को बताया। चंदा स्टेशन पर पहुंची और रामू को जगाकर बोली, “काश, तुम बड़े बोल न बोलते।” नींद का मारा रामू अब भी कुछ समझ नहीं पाया। वह पूछने लगा, “क्या ट्रेन आ गई?”

उसकी बात सुनकर मनकू काका बोले, “चंदा, इसे कुछ कहने-सुनाने से तो अच्छा है, तुम ईश्वर से इसके लिए प्रार्थना करो कि यह आलस्य छोड़ दे। यह नहीं समझ पा रहा कि आलस्य घुन की तरह जीवन को खोखला कर देता है। जब पता चलता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।”

रामू ने कहा, “काका, मैं खुद बदलना चाहता हूं, लेकिन पता नहीं मुझे क्या हो जाता है। मुझे उस समय ध्यान नहीं रहता कि क्या ठीक है और क्या गलत, जब कुछ करने का मौका आता है तब!”

काका ने समझाया, “यह भी आदत है। इसे खत्म करने के लिए भी खुद से थोड़ी जबरदस्ती करनी पड़ेगी। लोहे की सलाख टेढ़ी हो जाए, तो उसे आग में डालकर ठोकना-पीटना पड़ता है। तुम भी ऐसा ही करो। तुम्हारी जीत होगी। बहुत से लोगों ने ऐसा किया है । इसके बाद उनकी जिंदगी बदल गई। सोचो, पक्का इरादा करो, अपनाओ और सब हो जाएगा। छोटी-सी बात है यह।”

रामू ने काका की बात मानी। छोटी-छोटी बातों पर काम किया और जो चाहा उसे पा लिया।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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गांव- में एक कीड़ा पाया जाता है, जिसे गोबरैला कहा जाता है। उसे गाय, भैंसों के ताजे गोबर की बू बहुत भाती है!

गांव- में एक कीड़ा पाया जाता है, जिसे गोबरैला कहा जाता है। उसे गाय, भैंसों के ताजे गोबर की बू बहुत भाती है!

वह सुबह से गोबर की तलाश में निकल पड़ता है और सारा दिन उसे जहां कहीं गोबर मिल जाता है, वहीं उसका गोला बनाना शुरू कर देता है। शाम तक वह एक बड़ा सा गोला बना लेता है। फिर उस गोले को ढ़केलते हुए अपने बिल तक ले जाता है।

लेकिन बिल पर पहुंच कर उसे पता चलता है कि गोला तो बहुत बड़ा बन गया मगर उसके बिल का द्वार बहुत छोटा है।

बहुत परिश्रम और कोशिशों के बाद भी वह उस गोले को बिल के अंदर नहीं ढ़केल पाता, और उसे वहीं पर छोड़कर बिल में चला जाता है।

यही हाल हम मनुष्यों का भी है। पूरी जिंदगी हम दुनियाभर का माल- जमा करने में लगे रहते हैं और जब अंत समय आता है, तो पता चलता है कि ये सब तो साथ नहीं ले जा सकते और तब हम उस जीवन भर की कमाई को बड़ी हसरत से देखते हुए इस संसार से विदा हो जाते हैं।
यह सच ही कहा है कि –
पुण्य किसी को दगा नहीं देता और पाप किसी का सगा नहीं होता।
जो कर्म को समझता है, उसे धर्म को समझने की जरूरत नहीं पड़ती।

संपत्ति के उत्तराधिकारी कोई भी या अनेक हो सकते हैं, लेकिन कर्मों के उत्तराधिकारी केवल और केवल हम स्वयं ही होते हैं!

इसलिए
उसकी खोज करें जो हमारे साथ जाना है, उसे हासिल करने में ही समझदारी है।

ऋण मुक्ति

एक धर्मशाला में पति-पत्नी अपने छोटे-से नन्हें-मुन्ने बच्चे के साथ रुके। धर्मशाला कच्ची थी। दीवारों में दरारें पड़ गयी थीं आसपास में खुला जंगल जैसा माहौल था। पति-पत्नी अपने छोटे-से बच्चे को प्रांगण में बिठाकर कुछ काम से बाहर गये। वापस आकर देखते हैं तो बच्चे के सामने एक बड़ा नाग कुण्डली मारकर फन फैलाये बैठा है। यह भयंकर दृश्य देखकर दोनों हक्के-बक्के रह गये। बेटा मिट्टी की मुट्ठी भर-भरकर नाग के फन पर फेंक रहा है और नाग हर बार झुक-झुककर सहे जा रहा है।

माँ चीख उठी ,
बाप चिल्लायाः-

“बचाओ… बचाओ… हमारे लाड़ले को बचाओ।”
लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गयी। उसमें एक निशानेबाज था। ऊँट गाड़ी पर बोझा ढोने का धंधा करता था।

वह बोलाः “मैं निशाना तो मारूँ, सर्प को ही खत्म करूँगा लेकिन निशाना चूक जाय और बच्चे को चोट लग जाय तो मैं जिम्मेदार नहीं। आप लोग बोलो तो मैं कोशिश करूँ?”

पुत्र के आगे विषधर बैठा है ! ऐसे प्रसंग पर कौन-सी माँ-बाप इनकार करेगे?
वह सहमत हो गये और माँ बोलीः “भाई ! साँप को मारने की कोशिश करो,अगर गलती से बच्चे को चोट लग जायेगी तो हम कुछ नहीं कहेंगे।”

ऊँटवाले ने निशाना मारा। साँप जख्मी होकर गिर पड़ा, मूर्च्छित हो गया। लोगों ने सोचा कि साँप मर गया है। उन्होंने उसको उठाकर बाड़ में फेंक दिया।
रात हो गयी। वह ऊँटवाला उसी धर्मशाला में अपनी ऊँटगाड़ी पर सो गया।
रात में ठंडी हवा चली। मूर्च्छित साँप सचेतन हो गया और आकर ऊँटवाले के पैर में डसकर चला गया। सुबह लोग देखते हैं तो ऊँटवाला मरा हुआ था।
दैवयोग से सर्पविद्या जानने वाला एक आदमी वहाँ ठहरा हुआ था। वह बोलाः “साँप को यहाँ बुलवाकर जहर को वापस खिंचवाने की विद्या मैं जानता हूँ। यहाँ कोई आठ-दस साल का निर्दोष बच्चा हो तो उसके चित्त में साँप के सूक्ष्म शरीर को बुला दूँ और वार्तालाप करा दूँ।
गाँव में से आठ-दस साल का बच्चा लाया गया। उसने उस बच्चे में साँप के जीव को बुलाया।

उससे पूछा गया – “इस ऊँटवाले को तूने काटा है ?” बच्चे में मौजूद जीव ने कहा – “हाँ।”

फिर पूछा कि ,- “इस बेचारे ऊँट वाले को क्यों काटा?”

बच्चे के द्वारा वह साँप बोलने लगाः “मैं निर्दोष था। मैंने इसका कुछ बिगाड़ा नहीं था। इसने मुझे निशाना बनाया तो मैं क्यों इससे बदला न लूँ?”

वह बच्चा तुम पर मिट्टी डाल रहा था उसको तो तुमने कुछ नहीं किया !”
बालक रूपी साँप ने कहा- ” बच्चा तो मेरा तीन जन्म पहले का लेनदार है।
तीन जन्म पहले मैं भी मनुष्य था, वह भी मनुष्य था। मैंने उससे तीन सौ रुपये लिए थे लेकिन वापस नहीं दे पाया। अभी तो देने की क्षमता भी नहीं है। ऐसी भद्दी योनियों में भटकना पड़ रहा है,आज संयोगवश वह सामने आ गया तो मैं अपना फन झुका -झुकाकर उससे माफी मांग रहा था। उसकी आत्मा जागृत हुई तो धूल की मुट्ठियाँ फेंक-फेंककर वह मुझे फटकार दे रहा था कि ‘लानत है तुझे ! कर्जा नहीं चुका सका….’ उसकी वह फटकार सहते-सहते मैं अपना ऋण अदा कर रहा था।

हमारे लेन-देन के बीच टपकने वाला वह ऊँट वाला कौन होता है? मैंने इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था फिर भी इसने मुझ पर निशाना मारा। मैंने इसका बदल लिया।”

सर्प-विद्या जाननेवाले ने साँप को समझाया, “देखो, तुम हमारा इतना कहना मानों, इसका जहर खींच लो।उस सर्प ने कहा – “मैं तुम्हारा कहना मानूँ तो तुम भी मेरा कहना मानो। मेरी तो वैर लेने की योनि है। और कुछ नहीं तो न सही,मुझे यह ऊँटवाला पाँच सौ रुपये देवे तो अभी इसका जहर खींच लूँ। उस बच्चे से तीन जन्म पूर्व मैंने तीन सौ रुपये लिये थे, दो जन्म और बीत गये, उसके सूद के दौ सौ मिलाकर कुल पाँच सौ लौटाने हैं।

“किसी सज्जन ने पाँच सौ रूपये उस बच्चे के माँ-बाप को दे दिये। साँप का जीव वापस अपनी देह में गया, वहाँ से सरकता हुआ मरे हुए ऊँटवाले के पास आया और जहर वापस खींच लिया। ऊँटवाला जिंदा हो गया।

इस कथा से स्पष्ट होता है कि इतना व्यर्थ खर्च नहीं करना चाहिए कि सिर पर कर्जा चढ़ाकर मरना पड़े और उसे चुकाने के लिए फन झुकाना पड़े, मिट्टी से फटकार सहनी पड़े।

_जब तक आत्मज्ञान नहीं होता तब तक कर्मों का ऋणानुबंध चुकाना ही पड़ता है। अतः निष्काम कर्म करके ईश्वर को संतुष्ट करें। अपने आत्मा- परमात्मा का अनुभव करके यहीं पर, इसी जन्म में शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त करें।।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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हृदय में भगवान

यह घटना जयपुर के एक वरिष्ठ डॉक्टर की आपबीती है, जिसने उनका जीवन बदल दिया। वह हृदय रोग विशेषज्ञ हैं। उनके द्वारा बताई प्रभु कृपा की कहानी के अनुसार:-

एक दिन मेरे पास एक दंपत्ति अपनी छः साल की बच्ची को लेकर आए। निरीक्षण के बाद पता चला कि उसके हृदय में रक्त संचार बहुत कम हो चुका है।
मैंने अपने साथी डाक्टर से विचार करने के बाद उस दंपत्ति से कहा – 30% संभावना है बचने की ! दिल को खोलकर ओपन हार्ट सर्जरी करनी पड़ेगी, नहीं तो बच्ची के पास सिर्फ तीन महीने का समय है !

      माता पिता भावुक हो कर बोले, "डाक्टर साहब ! इकलौती बिटिया है। ऑपरेशन के अलावा और कोई चारा नहीं है,

मैंने अन्य कोई विकल्प के लिए मना कर दिया
दंपति ने कहा आप ऑपरेशन की तैयारी कीजिये।”

      सर्जरी के पांच दिन पहले बच्ची को भर्ती कर लिया गया। बच्ची मुझ से बहुत घुलमिल चुकी थी, बहुत प्यारी बातें करती थी। उसकी माँ को प्रार्थना में अटूट विश्वास था। वह सुबह शाम बच्ची को यही कहती, बेटी घबराना नहीं। भगवान बच्चों के हृदय में रहते हैं। वह तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे।

      सर्जरी के दिन मैंने उस बच्ची से कहा, "बेटी ! चिन्ता न करना, ऑपरेशन के बाद आप बिल्कुल ठीक हो जाओगे।" बच्ची ने कहा, "डाक्टर अंकल मैं बिलकुल नहीं डर रही क्योंकि मेरे हृदय में भगवान रहते हैं, पर आप जब मेरा हार्ट ओपन करोगे तो देखकर बताना भगवान कैसे दिखते हैं ?" मै उसकी बात पर मुस्कुरा उठा।

      ऑपरेशन के दौरान पता चल गया कि कुछ नहीं हो सकता, बच्ची को बचाना असंभव है, दिल में खून का एक कतरा भी नहीं आ रहा था। निराश होकर मैंने अपनी साथी डाक्टर से वापिस दिल को स्टिच करने का आदेश दिया।

      तभी मुझे बच्ची की आखिरी बात याद आई और मैं अपने रक्त भरे हाथों को जोड़ कर प्रार्थना करने लगा, "हे ईश्वर ! मेरा सारा अनुभव तो इस बच्ची को बचाने में असमर्थ है, पर यदि आप इसके हृदय में विराजमान हो तो आप ही कुछ कीजिए।" 

      मेरी आँखों से आँसू टपक पड़े। यह मेरी पहली अश्रु पूर्ण प्रार्थना थी। इसी बीच मेरे जूनियर डॉक्टर ने मुझे कोहनी मारी। मैं चमत्कार में विश्वास नहीं करता था पर मैं स्तब्ध हो गया यह देखकर कि दिल में रक्त संचार पुनः शुरू हो गया।

      मेरे 60 साल के जीवन काल में ऐसा पहली बार हुआ था। आपरेशन सफल तो हो गया पर मेरा जीवन बदल गया। होश में आने पर मैंने बच्ची से कहा, "बेटा ! हृदय में भगवान दिखे तो नहीं पर यह अनुभव हो गया कि वे हृदय में मौजूद हर पल रहते हैं।

      इस घटना के बाद मैंने अपने आपरेशन थियेटर में प्रार्थना का नियम निभाना शुरू किया। मैं यह अनुरोध करता हूँ कि सभी को अपने बच्चों में प्रार्थना का संस्कार डालना ही चाहिए।
       हे परम् पिता तुम ही- सुधि ले रहे जन जन की।

कुछ कहने से पहले ही – सब जानते हो मन की।।

बस हमें भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और न ही किसी काम के लिए भजन सिमरन में ढील देनी हैं। वह मालिक अपने आप ही हमारे काम सिद्ध और सफल करेगा।

इसीलिए हमें भी मन से हार नहीं माननी चाहिए और निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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