गहरी दिल की गुफाओं में, महाराज तुम्हें देखूं ।
महाराज तुम्हें देखूं, सिरताज तुम्हें देखें ॥
गुलशन के मालिक हो, सृष्टि के पालक हो।
जड़ चेतन क्या दाता, कण-कण में व्यापक हो॥
हर देश दिशाओं में, महाराज तुम्हें देखूं ॥
चांद सूरज सितारों में, कुदरत के नजारों में।
नव आकाश की गंगा हो, सतरंग की फुहारों में ॥
घनघोर घटाओं में, महाराज तुम्हें देखूं ॥
तुम जलचर थलचर में, किरपा के सागर हो।
हर जीव में नूर तेरा, हर थाहें उजागर हो ॥
नदिया, दरियाओं में, महाराज तुम्हें देखूं ॥
एक अर्ज मेरी दाता, चरणों में बसा लेना।
इस भूल भुलइया में, लाल गिरे को उठा लेना ॥
सपनों की लहरों में, महाराज तुम्हें देखूं ॥







