दरबार हजारों देखे हैं, तेरे दर-सा कोई दरबार नहीं।
जिस गुलशन में तेरा नूर न हो, ऐसा तो कोई गुलज़ार नहीं ॥
अरशों पै फरिश्ते रहते हैं, दिन-रात झुके तेरे कदमों पर।
ऐसा तो कोई बशर ही नहीं, तेरे दर का जो ख़िदमतगार नहीं ॥
दुनिया से भला हम क्या मांगें, दुनिया खुद एक भिखारिन है।
मांगेंगे तो अंतर्यामी से, जहां होता कभी इनकार नहीं ॥
वह आँख तो आँख नहीं होती, जिस आँख में शर्मो हया ही नहीं।
वह दिल नहीं पत्थर होता है, जिस दिल में तुम्हारा प्यार नहीं ॥
हसरत है कि वक्ते रूखसत पै, जब दम यह मेरा निकलता हो।
बस एक नजारा काफी है, और कुछ भी मुझे दरकार नहीं ॥







