सन्तान सुख

सन्तान सुख

एक बुजुर्ग आदमी स्टेशन पर गाड़ी में चाय बेचता है। गाड़ी में चाय बेच कर वो अपनी झोपड़ी में चला गया। झोपड़ी में जा कर अपनी बुजुर्ग पत्नी से कहा कि दूसरी ट्रेन आने से पहले एक और केतली चाय की बना दो।

दोनों बहुत बुजुर्ग है। आदमी बोला कि काश !! हमारी कोई औलाद होती, तो वो हमें इस बुढ़ापे में कमा कर खिलाती।

औलाद ना होने के कारण हमें इस बुढ़ापे में भी काम करना पड़ रहा है। ये बात सुनकर उसकी पत्नी की आँखों में आँसू आ गए।

उसने चाय की केतली भर कर अपने पति को दे दी।

बुजुर्ग आदमी चाय की केतली ले कर वापिस स्टेशन पर गया।

उसने वहाँ प्लेटफॉर्म पर एक बुजुर्ग दंपती को सुबह से लेकर शाम तक बेंच पर बैठे देखा। वो दोनों किसी भी गाड़ी में नही चढ़ रहे थे।

तब वो चाय वाला बुजुर्ग उन दोनों के पास गया और उनसे पूछने लगा कि आपको कौन सी गाड़ी से जाना है? मैं आप को बता दूंगा की आप की गाड़ी कब और कहां आयेगी?

तब वो बुजुर्ग दंपति बोले कि हमें कहीं नही जाना है। हमें हमारे छोटे बेटे ने यहां एक चिट्ठी दे कर भेजा है और कहा है कि हमारा बड़ा बेटा हमें लेने स्टेशन आएगा और अगर बड़ा बेटा ना पहुंचे तो इस चिट्ठी में जो पता है वहाँ आप पहुंच जाना।

हमें तो पढ़ना लिखना आता नही है आप हमें बस ये चिठ्ठी पढ़ कर ये बता दो कि यह पता कहां का है ताकि हम लोग अपने बड़े बेटे के पास पहुँच जाए।

चाय वाले ने जब वो चिट्ठी पढ़ी तो उसे गहरा धक्का लगा!वो वहीं जमीन पर गिर पड़ा।

उस चिठ्ठी में लिखा था कि – ये मेरे माता-पिता है जो इस चिठ्ठी को पढ़े वो इनको पास के किसी वृद्धाश्रम में छोड़ आये।

चाय वाले ने सोचा था कि – मैं बेऔलाद हूँ इस लिए बुढ़ापे में काम कर रहा हूँ अगर औलाद होती तो काम ना करना पड़ता।
इस बुजुर्ग दंपति के दो बेटे है पर कोई भी बेटा इनको रखने को तैयार नही है।

वास्तव में, सुख या दुःख औलाद से नही मिलता। सुख दुःख तो अपने कर्मो के अनुसार मिलता है। ना कोई औलाद सुख देती है ना कोई औलाद दुःख देती है।

अगर आप के कर्म अच्छे हैं तो आप अकेले बैठे भी खुश रह सकते हो और अगर आप के कर्म बुरे है तो आप राजगद्दी पर बैठ कर भी दुःखी रहोगे!

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा!
जो जश करिह सो तस फल चाखा!!
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

नजर और नजरिया:

नजर और नजरिया:

एक बार की बात है। एक नवविवाहित जोड़ा किसी किराए के घर में रहने पहुंचा।
अगली सुबह, जब वे नाश्ता कर रहे थे तभी पत्नी ने खिड़की से देखा कि सामने वाली छत पर कुछ कपड़े फैले हैं तो उसने बोला “लगता है इन लोगों को कपड़े साफ़ करना भी नहीं आता! ज़रा देखो तो कितने मैले लग रहे हैं?’’

पति ने उसकी बात सुनी पर अधिक ध्यान नहीं दिया।

एक-दो दिन बाद फिर उसी जगह कुछ कपड़े फैले थे। पत्नी ने उन्हें देखते ही अपनी बात दोहरा दी “कब सीखेंगे ये लोग कि कपड़े कैसे साफ़ करते हैं!”

पति सुनता रहा पर इस बार भी उसने कुछ नहीं कहा।
लेकिन अब तो ये रोज की बात हो गई! जब भी पत्नी कपड़े फैले देखती भला-बुरा कहना शुरू हो जाती।

लगभग एक महीने बाद वे नाश्ता कर रहे थे। पत्नी ने हमेशा की तरह नजरें उठाईं और सामने वाली छत की तरफ देखा, “अरे वाह! लगता है इन्हें अकल आ ही गयी! आज तो कपड़े बिलकुल साफ़ दिख रहे हैं! ज़रूर किसी ने टोका होगा!”

पति बोला, “नहीं, उन्हें किसी ने नहीं टोका।”

“तुम्हे कैसे पता?” पत्नी ने आश्चर्य से पूछा।

तब पति ने बतलाया कि आज मैं सुबह जल्दी उठ गया था और मैंने इस खिड़की पर लगे कांच को बाहर से साफ़ कर दिया! इसलिए तुम्हें कपड़े साफ़ नज़र आ रहे हैं।”

हम सबकी ज़िन्दगी में भी यही बात लागू होती है। बहुत बार हम दूसरों को कैसे देखते हैं ये इस पर निर्भर करता है कि हम खुद अन्दर से कितने साफ़ हैं।

किसी के बारे में भला-बुरा कहने से पहले अपनी मनोस्थिति देख लेनी चाहिए और खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम सामने वाले में कुछ बेहतर देखने के लिए तैयार हैं या अभी भी हमारी खिड़की साफ करनी बाकी है!

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय!
जो दिल खोजों आपना, मुझसा बुरा ना कोय !!

परमात्मा से सम्बन्ध

💐💐परमात्मा से सम्बन्ध 💐💐

एक बार एक पंडित जी ने एक दुकानदार के पास पांच सौ रुपये रख दिए।
उन्होंने सोचा कि जब मेरी बेटी की शादी होगी तो मैं ये पैसा ले लूंगा।

कुछ सालों के बाद जब बेटी सयानी हो गई,
तो पंडित जी उस दुकानदार के पास गए।

लेकिन दुकानदार ने नकार दिया और बोला- आपने कब मुझे पैसा दिया था?
बताइए! क्या मैंने कुछ लिखकर दिया है?

पंडित जी उस दुकानदार की इस हरकत से बहुत ही परेशान हो गए और बड़ी चिंता में डूब गए।
फिर कुछ दिनों के बाद पंडित जी को याद आया,
कि क्यों न राजा से इस बारे में शिकायत कर दूं।
ताकि वे कुछ फैसला कर देंगे और मेरा पैसा मेरी बेटी के विवाह के लिए मिल जाएगा।

फिर पंडित जी राजा के पास पहुंचे और अपनी फरियाद सुनाई।

राजा ने कहा- कल हमारी सवारी निकलेगी और तुम उस दुकानदार की दुकान के पास में ही खड़े रहना।

दूसरे दिन राजा की सवारी निकली।
सभी लोगों ने फूलमालाएं पहनाईं और किसी ने आरती उतारी।

पंडित जी उसी दुकान के पास खड़े थे।
जैसे ही राजा ने पंडित जी को देखा,
तो उसने उन्हें प्रणाम किया और कहा- गुरु जी! आप यहां कैसे?
आप तो हमारे गुरु हैं।
आइए! इस बग्घी में बैठ जाइए।

वो दुकानदार यह सब देख रहा था।
उसने भी आरती उतारी और राजा की सवारी आगे बढ़ गई।

थोड़ी दूर चलने के बाद राजा ने पंडित जी को बग्घी से नीचे उतार दिया और कहा- पंडित जी! हमने आपका काम कर दिया है।
अब आगे आपका भाग्य।

उधर वो दुकानदार यह सब देखकर हैरान था,
कि पंडित जी की तो राजा से बहुत ही अच्छी सांठ-गांठ है।
कहीं वे मेरा कबाड़ा ही न करा दें।
दुकानदार ने तत्काल अपने मुनीम को पंडित जी को ढूंढ़कर लाने को कहा।

पंडित जी एक पेड़ के नीचे बैठकर कुछ विचार-विमर्श कर रहे थे।
मुनीम जी बड़े ही आदर के साथ उन्हें अपने साथ ले आए।

दुकानदार ने आते ही पंडित जी को प्रणाम किया और बोला- पंडित जी! मैंने काफी मेहनत की और पुराने खातों को‌ देखा,
तो पाया कि खाते में आपका पांच सौ रुपया जमा है।
और पिछले दस सालों में ब्याज के बारह हजार रुपए भी हो गए हैं।
पंडित जी! आपकी बेटी भी तो मेरी बेटी जैसी ही है।
अत: एक हजार रुपये आप मेरी तरफ से ले जाइए,
और उसे बेटी की शादी में लगा दीजिए।

इस प्रकार उस दुकानदार ने पंडित जी को तेरह हजार पांच सौ रुपए देकर बड़े ही प्रेम के साथ विदा किया।

—— तात्पर्य ——
जब मात्र एक राजा के साथ सम्बन्ध होने भर से हमारी विपदा दूर जो जाती है,
तो हम अगर इस दुनिया के राजा यानि कि परमात्मा से अपना सम्बन्ध जोड़ लें,
तो हमें कोई भी समस्या, कठिनाई या फिर हमारे साथ किसी भी तरह के अन्याय का तो कोई प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होगा।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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आखिरी काम

*💐💐आखिरी काम💐💐*

एक बूढ़ा कारपेंटर अपने काम के लिए काफी जाना जाता था!

उसके बनाये लकड़ी के घर दूर -दूर तक प्रसिद्द थे। पर अब बूढा हो जाने के कारण उसने सोचा कि *बाकी की ज़िन्दगी आराम से गुजारी जाए* और यही सोचकर वह अगले दिन सुबह-सुबह अपने मालिक के पास पहुंचा और बोला, *”ठेकेदार साहब, मैंने बरसों आपकी सेवा की है पर अब मैं बाकी का समय आराम से पूजा-पाठ में बिताना चाहता हूँ, कृपया मुझे काम छोड़ने की अनुमति दें।*

ठेकेदार कारपेंटर को बहुत मानता था, इसलिए उसे ये सुनकर थोडा दुःख हुआ पर वो कारपेंटर को निराश नहीं करना चाहता था!उसने कहा, *”आप यहाँ के सबसे अनुभवी व्यक्ति हैं! आपकी कमी यहाँ कोई नहीं पूरी कर पायेगा!*

मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि *जाने से पहले एक आखिरी काम करते जाइये।*

*“जी , क्या काम करना है?”* कारपेंटर ने पूछा ।

मैं चाहता हूँ कि *आप जाते -जाते हमारे लिए एक और लकड़ी का घर तैयार कर दीजिये!* ठेकेदार घर बनाने के लिए ज़रूरी पैसे देते हुए बोला ।

कारपेंटर इस काम के लिए तैयार हो गया! उसने अगले दिन से ही घर बनाना शुरू कर दिया!

पर ये जान कर कि *ये उसका आखिरी काम है और इसके बाद उसे और कुछ नहीं करना होगा वो थोड़ा ढीला पड़ गया! *पहले जहाँ वह बड़ी सावधानी से लकड़ियाँ चुनता और काटता था अब बस काम चालाऊ तरीके से ये सब करने लगा!*

कुछ एक हफ्तों में घर तैयार हो गया और वो ठेकेदार के पास पहुंचा, *” ठेकेदार साहब, मैंने घर तैयार कर लिया है, अब तो मैं काम छोड़ कर जा सकता हूँ ?”*

ठेकेदार बोला *”हाँ, आप बिलकुल जा सकते हैं लेकिन अब आपको अपने पुराने छोटे से घर में जाने की ज़रुरत नहीं है! क्योंकि इस बार जो घर आपने बनाया है वो आपकी बरसों की मेहनत का इनाम है; जाइये अपने परिवार के साथ उसमे खुशहाली से रहिये !”*

कारपेंटर यह सुनकर स्तब्ध रह गया! वह मन ही मन सोचने लगा, *“कहाँ मैंने दूसरों के लिए एक से बढ़ कर एक आलीशान घर बनाये और अपने घर को ही इतने घटिया तरीके से बना बैठा …क़ाश मैंने ये घर भी बाकी घरों की तरह ही बनाया होता!*

💐💐 मित्रो, इस दृष्टांत से यही शिक्षा मिलती है कि *कब आपका कौन सा काम किस तरह आपको बदल सकता है ये बताना मुश्किल है!*

ये भी समझने की ज़रुरत है कि *हमारा काम हमारी पहचान बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है,इसलिए हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम हर एक काम अपनी अच्छी परख के साथ करें!*
फिर चाहे वो *हमारा आखिरी काम ही क्यों ना हो!*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।। ओम शांति*

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मन चंगा तो कठौती गंगा

‼️ *मन चंगा तो कठौती गंगा…..*‼️

एक बार भक्तिमती मीराबाई को किसी ने ताना मारा, *”मीरा! तू तो राज रानी है। महलों में रहने वाली, मिष्ठान-पकवान खाने वाली और तेरे गुरु झोपड़ी में रहते हैं। उन्हें तो एक वक्त की रोटी भी ठीक से नहीं मिलती”।*
मीरा से यह कैसे सहन होता! मीरा ने पालकी मंँगवाई और गुरुदर्शन के लिए चल पड़ी। मायके से कन्यादान में मिला एक हीरा उसने गाँठ में बांँध लिया।

रैदास जी की कुटिया जगह-जगह से टूटी हुई थी। वे एक हाथ में सुई और दूसरे में एक फटी पुरानी जूती लेकर बैठे थे।पास ही एक कटौती पड़ी हुई थी।

*हाथ से काम और मुख में नाम चल रहा था।*

ऐसे महापुरुष कभी बाहर से चाहे साधन संम्पदा विहीन दिखें पर *अन्दर की परम सम्पदा के धनी होते हैं और बाहर की धनसम्पदा उनके चरणों की दासी होती है। यह संतों का विलक्षण ऐश्वर्य है।*

मीरा ने गुरु चरणों में वह बहूमूल्य हीरा रखते हुए प्रणाम किया।उनके नेत्रों में श्रद्धा-प्रेम के आंँसू उमड़ रहे थे।

वह हाथ जोड़कर निवेदन कर लगी। “गुरुजी!लोग मुझे ताने मारते हैं कि *मीरा तू तो महल में रहती है और तेरे गुरु को रहने के लिए अच्छी कुटिया भी नहीं है। गुरुदेव मुझसे यह सुना नहीं जाता। अपने चरणों में एक दासी की तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिए। 5इस झोपड़ी और कटौती को छोड़कर तीर्थ यात्रा कीजिए और….”*

और आगे संत रैदास जी ने मीरा को बोलने मौका नहीं दिया।

वे बोले- *”गिरधर नागर की सेविका होकर तुम ऐसा कहती हो! मुझे इसकी जरूरत नहीं है!*

*बेटी! मेरे लिए इस कटौती का पानी ही गंगाजी है,यह झोपड़ी मेरी काशी है”।*

इतना कहकर रैदास जी ने *कठौती में से एक अंजलि जल लेकर उसकी धार की तो अनेकों सच्चे मोती जमीन पर बिखर गये। मीरा चकित-सी देखती रह गई।*

सच्चे महान पुरुष मानव को *बाहरी धन-सम्पदा में ना उलझा कर सही ज्ञान मार्ग बताते हैं।*

*ज्ञान मार्ग ही सच्चा मार्ग है।बाकी सब असार है। सब यही छूट जायेगा।*

इसीलिए *समय के महापुरुष अभ्यास करने के लिए, भजन-सुमिरण करने के लिए कहते हैं!*

*आज तक सच्चे सद्गुरु की कृपा का अगर आनंद लिया तो उसका एक मात्र रास्ता है – उनके द्वारा दिए ज्ञान का सतत अभ्यास करना!*
अन्यथा –
*भक्ति भाव भादो नदी,*
*निश दिन चले इतराए!*
*सरिता सोय सराहिए,*
*जो जेठ मास ठहराए!*

*अभ्यास के द्वारा ही हम धीर गम्भीर और गरिमामय सकून भरे पलों का रसास्वादन कर सकते हैं!*

*आपका जीवन आनंदमय बना रहे!*

चार मोमबत्तियां

चार मोमबत्तियां

रात का समय था! चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था! नज़दीक ही एक कमरे में चार मोमबत्तियां जल रही थीं।
एकांत पाकर आज वे एक दुसरे से दिल की बात कर रही थीं।

पहली मोमबत्ती बोली, *”मैं शांति हूँ, पर मुझे लगता है अब इस दुनिया को मेरी ज़रुरत नहीं है, हर तरफ आपाधापी और लूट-मार मची हुई है! मैं यहाँ अब और नहीं रह सकती।*

और ऐसा कहते हुए *कुछ देर में वो मोमबत्ती बुझ गयी।*

दूसरी मोमबत्ती बोली, *”मैं विश्वास हूँ और मुझे लगता है झूठ और फरेब के बीच मेरी भी यहाँ कोई ज़रुरत नहीं है! मैं भी यहाँ से जा रही हूँ!”*
और *दूसरी मोमबत्ती भी बुझ गयी।*

तीसरी मोमबत्ती भी दुखी होते हुए बोली, *” मैं प्रेम हूँ! मेरे पास जलते रहने की ताकत है, पर आज हर कोई इतना व्यस्त है कि मेरे लिए किसी के पास वक्त ही नहीं! दूसरों से तो दूर लोग अपनों से भी प्रेम करना भूलते जा रहे हैं! मैं ये सब और नहीं सह सकती मैं भी इस दुनिया से जा रही हूँ!*
और ऐसा कहते हुए *तीसरी मोमबत्ती भी बुझ गयी।*

वो अभी बुझी ही थी कि *एक मासूम बच्चा उस कमरे में दाखिल हुआ।*

मोमबत्तियों को बुझे देख वह घबरा गया!
उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे और वह रुंआसा होते हुए बोला, *“अरे , तुम मोमबत्तियां जल क्यों नहीं रही? तुम्हे तो अंत तक जलना है ! तुम इस तरह बीच में हमें कैसे छोड़ के जा सकती हो ?”*

तभी चौथी मोमबत्ती बोली, *”प्यारे बच्चे घबराओ नहीं, मैं आशा हूँ और जब तक मैं जल रही हूँ हम बाकी मोमबत्तियों को फिर से जला सकते हैं।“*

यह सुन बच्चे की आँखें चमक उठीं और *उसने आशा के बल पर शांति, विश्वास, और प्रेम को फिर से प्रकाशित कर दिया।*

मित्रों , जब सबकुछ बुरा होते दिखे! चारों तरफ अन्धकार ही अन्धकार नज़र आये। अपने भी पराये लगने लगें तो भी उम्मीद मत छोड़िए! आशा मत छोड़िये, क्योंकि इसमें इतनी शक्ति है कि *ये हर खोई हुई चीज आपको वापस दिल सकती है।*

*अपनी आशा की मोमबत्ती को जलाये रखिये!*
*बस! अगर ये जलती रहेगी तो आप किसी भी और कितनी ही मोमबत्तियों को प्रकाशित कर सकते हैं।*
✴️✴️✴️✴️✴️
*मंगलमय सुप्रभात*
*स्नेह वंदन*

चिंता!

*चिंता!*

एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं।

जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।

राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह *एक गरीब संन्यासी से करवा दिया।*

राजा ने सोचा कि *एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।*

विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई।

कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं।

उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि *रोटियां यहां क्यों रखी हैं?*

संन्यासी ने जवाब दिया कि *ये रोटियां कल के लिए रखी हैं! अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे।*

संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी।

राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था क्योंकि उन्हें ये लगता है कि *आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं! आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं!*

लेकिन यह क्या *आप तो कल की चिंता करने में लगे हैं। क्या आपको भगवान पर भरोसा नहीं है?*

सच्चा भक्त तो वही है *जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है। अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं।*

अगर भगवान चाहेगा तो *हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।*

ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि *उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है।*

उसने राजकुमारी से कहा कि *आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया!*

अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो हमें विश्वास भी होना चाहिए कि *भगवान हर समय हमारे साथ है। उसको (भगवान) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।*

कभी आप बहुत परेशान हों, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो तो आप आँखें बंद करके विश्वास के साथ पुकारें!

सच मानिये, *आपकी समस्या का समाधान मिल जायेगा!*

इसलिए,
🦚 *सदैव प्रसन्न रहिये।*🦚
*जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है।।*
*🦚कर भला तो हो भला,*
*अन्त भले का भला!*🦚🦚
*🙏🏻 🙏🏻

सफल जीवन

सफल जीवन

एक बार एक शिष्य ने अपने गुरू से पुछा- गुरुदेव ये सफल जीवन क्या होता है?

गुरु शिष्य को पतंग उड़ाने ले गए! शिष्य गुरु को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था।

थोड़ी देर बाद शिष्य बोला- गुरुदेव ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की ओर नहीं जा पा रही है। क्या हम इसे तोड़ दे? ताकि इसके और ऊपर जाने में आसानी हो।

गुरु ने धागा तोड़ दिया! पतंग थोड़ा सा ऊपर गई और उसके बाद लहराकर नीचे आई और अनजान जगह पर जा कर गिर गई।

तब गुरु ने शिष्य को जीवन का दर्शन समझाया। बेटे जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर है। हमें अकसर लगता है कि कुछ चीजें जिनसे हम बंधे हैं, वह हमें और ऊपर जाने से रोक रही है – जैसे घर, परिवार, अनुशासन, माता-पिता, गुरु और समाज; हम उनसे आजाद होना चाहते हैं।

वास्तव में, यही वो धागा होते हैं- जो हमे उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं। इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा, जो बिन धागे की पतंग का हुआ।

जीवन में यदि तुम ऊंचाई पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना, धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली ऊंचाई को ही सफल जीवन कहते हैैं।

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एक बढ़ाई (Carpenter) शाम को अपनी दुकान बंद कर घर चला गया।

एक बढ़ाई (Carpenter) शाम को अपनी दुकान बंद कर घर चला गया।

जब वह चला गया, तो एक ज़हरीला सांप दुकान के अंदर घुस गया। सांप भूखा था। इस आशा में की कुछ खाने को मिल जाए, वह इधर उधर रेंगने लगा।

इसी बीच वो एक कुल्हाड़ी से टकरा गया और थोड़ा सा चोटिल हो गया।

उसे गुस्सा आ गया और बदला लेने के लिए उसने कुल्हाड़ी को डंक मार दिया। सांप का डंक उस धातु की कुल्हाड़ी का क्या बिगाड़ लेगा? उल्टा सांप के मुंह से ही खून निकलने लग गया।

गुस्से और अहंकार से वो सांप पागल हो गया और उस कुल्हाड़ी को मारने के लिए हर संभव कोशिश करने लगा। उसको बहुत दर्द हो रहा था। फिर भी वो उस कुल्हाड़ी के चारो और लिपट गया। फिर क्या हुआ होगा, आप अच्छी तरह से जानते सकते हैं।

अगले दिन जब कारपेंटर ने दरवाजा खोला, तो देखा की कुल्हाड़ी के लिपटा हुआ सांप मरा पड़ा था।

हकीकत यही थी कि वह सांप किसी और की गलती से नहीं मरा हैं। बल्कि उसकी ये हालत खुद की अकड़ और गुस्से के कारण हुई हैं।

इसी प्रकार हमें भी जब गुस्सा आता हैं तो हम दूसरों को नुकसान पहुंचाने का काम करते हैं। लेकिन कुछ समय बीतने के बाद हमें ये अहसास होता हैं कि हमने अपने को दूसरों से और ज्यादा नुकसान पंहुचा दिया हैं।
यह जरुरी नहीं हैं कि हम हर चीज़ पर प्रतिक्रिया (React) करें!

बल्कि एक कदम पीछे हटकर ये सोचे कि क्या इस मामले में प्रतिक्रिया देनी जरुरी है या नहीं!
😊🙏🏻

यह भी नहीं रहने वाला

यह भी नहीं रहने वाला

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साधू की खूब सेवा की। दूसरे दिन आनंद ने बहुत सारे उपहार देकर साधू को विदा किया। साधू ने आनंद के लिए प्रार्थना की – “भगवान करे तू दिनों दिन बढ़ता ही रहे।” साधू की बात सुनकर आनंद हँस पड़ा और बोला – “अरे, महात्मा जी! जो है यह भी नहीं रहने वाला ।” साधू आनंद की ओर देखता रह गया और वहाँ से चला गया ।

दो वर्ष बाद साधू फिर आनंद के घर गया और देखा कि सारा वैभव समाप्त हो गया है । पता चला कि आनंद अब बगल के गाँव में एक जमींदार के यहाँ नौकरी करता है । साधू आनंद से मिलने गया। आनंद ने अभाव में भी साधू का स्वागत किया । झोंपड़ी में फटी चटाई पर बिठाया । खाने के लिए सूखी रोटी दी । दूसरे दिन जाते समय साधू की आँखों में आँसू थे । साधू कहने लगा – “हे भगवान् ! ये तूने क्या किया ?”

आनंद पुन: हँस पड़ा और बोला – “महाराज आप क्यों दु:खी हो रहे है ? महापुरुषों ने कहा है कि भगवान् इन्सान को जिस हाल में रखे, इन्सान को उसका धन्यवाद करके खुश रहना चाहिए। समय सदा बदलता रहता है और सुनो ! यह भी नहीं रहने वाला।”

साधू मन ही मन सोचने लगा – “मैं तो केवल भेष से साधू हूँ । सच्चा साधू तो तू ही है, आनंद।” कुछ वर्ष बाद साधू फिर यात्रा पर निकला और आनंद से मिला तो देखकर हैरान रह गया कि आनंद तो अब जमींदारों का जमींदार बन गया है । मालूम हुआ कि जिस जमींदार के यहाँ आनंद नौकरी करता था वह सन्तान विहीन था, मरते समय अपनी सारी जायदाद आनंद को दे गया। साधू ने आनंद से कहा – “अच्छा हुआ, वो जमाना गुजर गया । भगवान् करे अब तू ऐसा ही बना रहे।” यह सुनकर आनंद फिर हँस पड़ा और कहने लगा – “महाराज ! अभी भी आपकी नादानी बनी हुई है।”साधू ने पूछा – “क्या यह भी नहीं रहने वाला ?” आनंद उत्तर दिया – “हाँ! या तो यह चला जाएगा या फिर इसको अपना मानने वाला ही चला जाएगा । कुछ भी रहने वाला नहीं है और अगर शाश्वत कुछ है तो वह है परमात्मा और उस परमात्मा की अंश आत्मा।” आनंद की बात को साधू ने गौर से सुना और चला गया। साधू कई साल बाद फिर लौटता है तो देखता है कि आनंद का महल तो है किन्तू कबूतर उसमें गुटरगूं कर रहे हैं, और आनंद का देहांत हो गया है। बेटियाँ अपने-अपने घर चली गयीं, बूढ़ी पत्नी कोने में पड़ी है ।

साधू कहता है – “अरे इन्सान! तू किस बात का अभिमान करता है ? क्यों इतराता है ? यहाँ कुछ भी टिकने वाला नहीं है, दु:ख या सुख कुछ भी सदा नहीं रहता। तू सोचता है पड़ोसी मुसीबत में है और मैं मौज में हूँ । लेकिन सुन, न मौज रहेगी और न ही मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा। सच्चे इन्सान वे हैं, जो हर हाल में खुश रहते हैं। मिल गया माल तो उस माल में खुश रहते हैं, और हो गये बेहाल तो उस हाल में खुश रहते हैं।” साधू कहने लगा – “धन्य है आनंद! तेरा सत्संग, और धन्य हैं तुम्हारे सतगुरु! मैं तो झूठा साधू हूँ, असली फकीरी तो तेरी जिन्दगी है। अब मैं तेरी तस्वीर देखना चाहता हूँ, कुछ फूल चढ़ाकर दुआ तो मांग लूं।” साधू दूसरे कमरे में जाता है तो देखता है कि आनंद ने अपनी तस्वीर पर लिखवा रखा है – “आखिर में यह भी नहीं रहेगा।”

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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