Adjustment and Compromise

Adjustment and Compromise
are very crucial in Relationships.
Adjust when
Someone wants to be with You.
And
Compromise when
You want to be with Someone.

🙏🏻Selfless love and sacrifice in relation ties unbreakable bond🌹

🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

*तालमेल और समझौता*
*रिश्तों में बहुत महत्वपूर्ण हैं*।
*तालमेल तब रखे जब*
*कोई आपके साथ रहना चाहता है*।
*और*
*समझौता तब करें जब*
*आप किसी के साथ रहना चाहते हैं*।

*🙏🏻रिश्तों में निस्वार्थ प्यार और त्याग एक अटूट बंधन जोड़ता है*🌹

हम अपनी और अपनों की परख कैसे कर सकते है ?

*हम अपनी और अपनों की परख कैसे कर सकते है ?*_

*काँच और हीरा*

एक राजा का दरबार लगा हुआ था। क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये राजा का दरबार खुले में लगा हुआ था।

पूरी आम सभा सुबह की धूप में बैठी थी। महाराज के सिंहासन के सामने एक शाही मेज थी और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थी।

पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि सभी दरबार में बैठे थे और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे। उसी समय एक व्यक्ति आया और उसने प्रवेश की आज्ञा माँगी। प्रवेश मिल गया, उसने राजा का अभिवादन किया और कहा, “मेरे पास दो वस्तुएँ हैं। मैं हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और उन वस्तुओं को रखता हूँ, पर कोई परख नहीं पाता। सब हार जाते हैं और मैं विजेता बनकर घूम रहा हूँ। अब आपके नगर में आया हूँ ।”

राजा ने उत्सुकता से पूछा, “कैसी वस्तुएँ ?”

तो उसने दोनों वस्तुओं को शाही मेज पर रख दिया। वे दोनों बिल्कुल समान आकार, समान रुप रंग, समान प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था।

राजा ने कहा, “ये दोनों वस्तुएँ तो एक समान हैं।”

तो उस व्यक्ति ने कहा, “हाँ, दिखाई तो एक से ही देते हैं लेकिन हैं भिन्न। इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा और दूसरा महज काँच का टुकडा।
लेकिन रूप रंग सब एक हैं, कोई आज तक परख नहीं पाया कि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा..। कोई परख कर बताये कि..ये हीरा है और दूसरा काँच..। अगर परख खरी निकली तो मैं हार जाऊँगा और यह कीमती हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी में जमा करवा दूँगा।

पर शर्त यह है कि यदि कोई नहीं पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है, उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी। इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से जीतता आया हूँ।”

राजा ने कहा, “मैं तो नहीं परख सकूँगा।”

दीवान बोले, “हम भी हिम्मत नहीं कर सकते क्योंकि दोनों वस्तुएँ बिल्कुल समान हैं।”

हारने के डर से कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। हारने पर धन देना पड़ेगा…समस्या यह नही थी क्योंकि राजा के पास बहुत धन था, पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी, इसका सबको भय था। कोई व्यक्ति पहचान नहीं पाया। आखिरकार पीछे थोड़ी हलचल हुई।

एक नेत्रहीन आदमी हाथ में लाठी लेकर उठा। उसने कहा, “मुझे महाराज के पास ले चलो। मैंने सब बातें सुनी हैं और यह भी सुना है कि कोई परख नहीं पा रहा है। एक अवसर मुझे भी दो।”

एक आदमी के सहारे वह राजा के पास पहुँचा। उसने राजा से अनुरोध किया की, “मैं तो जन्म से अंधा हूँ, फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये, जिससे मैं भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ। और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊँ और यदि सफल न भी हुआ तो वैसे भी आप शर्त तो हारे हुए ही हैं।”

राजा के दिल को उसकी बात जँच गई और उनको लगा कि इसे अवसर देने में कोई हर्ज नहीं। राजा ने कहा, “ठीक है।”

तब उस नेत्रहीन आदमी को दोनों चीजें छुआ दी गयी। और पूछा गया कि इसमें से कौन सा असली हीरा है और कौन सा काँच?? यही तुम्हें परखना है।

कथा कहती है कि उस आदमी ने एक क्षण में कह दिया कि यह बेशकीमती हीरा है और दूसरा मात्र काँच!

जो आदमी इतने राज्यों को जीतकर आया था, वह नतमस्तक हो गया और बोला, “सही है, आपने पहचान लिया.. धन्य हो आप…। अपने वचन के मुताबिक यह हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी में दे रहा हूँ।”

सब बहुत खुश हो गये और जो आदमी आया था ,वह भी बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला हीरे का पारखी।

वह आदमी, राजा और अन्य सभी लोगों ने उस नेत्रहीन व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि, “तुम देख भी नही सकते फिर तुमने कैसे पहचाना कि यह हीरा है और दूसरा काँच?”

उस नेत्रहीन बुजुर्ग ने कहा कि, “सीधी सी बात है। मालिक धूप में हम सब बैठे हैं। और ये दोनों वस्तुएँ भी काफी देर से धूप मे ही रखी है। मैंने दोनों को छुआ। *जो ठंडा रहा वह असली हीरा…जो गरम हो गया वह काँच….।”*

जीवन में भी *जो बात-बात में गरम हो जाये, उलझ जाये…वह व्यक्ति “काँच” है और जो विपरीत परिस्थिति में भी ठंडा (शांत और स्थिर) रहे..वह व्यक्ति “बेशकीमती हीरा” है..!!*

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*”यदि एक बार मन सामंजस्यपूर्ण स्थिति में आ जाए तो फिर न बाहरी परिस्थितियों और वातावरण का उस पर कोई प्रभाव होगा और न ही आंतरिक अशांति होगी।”*

सच्चा सद्भाव

*सच्चा सद्भाव*
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पुत्र की उम्र पैंतालीस छूने लगी। पिता पुत्रको व्यापारमें स्वतन्त्रता नहीं देता था, तिजोरी की चाबी भी नहीं। पुत्र के मन में यह बात खटकती रहती थी। वह सोचता था कि यदि मेरा पिता पन्द्रह-बीस वर्ष तक और रहेगा तो मुझे स्वतन्त्र व्यापार करने का कोई अवसर ही नहीं मिलेगा। स्वतन्त्रता सबको चाहिये। मनमें चिढ़ थी, कुढ़न थी। एक दिन वह फूट पड़ी।

पिता-पुत्र में काफी बकझक हुई। सम्पदा का बँटवारा हुआ। पिता अलग रहने लगा। पुत्र अपने बहू-बच्चों के साथ अलग रहने लगा।

पिता अकेले थे। उनकी पत्नी का देहान्त हो चुका था। किसी दूसरे को सेवा के लिए नहीं रखा; क्योंकि उनके स्वभाव में किसी के प्रति विश्वास नहीं था, यहाँ तक कि पुत्र के प्रति भी नहीं था। वे स्वयं ही अपने हाथ से रुखा-सूखा भोजन बनाकर खा लेते, कभी भूखे सो जाते।

जब उनकी पुत्रवधू को यह बात मालूम पड़ी तो उसे बहुत दु:ख हुआ। आत्मग्लानि भी हुई। उसे बाल्यकाल से ही धर्म का संस्कार था- बड़ों के प्रति आदर एवं सेवाका भाव था।

उसने अपने पति को मनाने का प्रयास किया, परंतु वे नहीं माने। पिताके प्रति पुत्र के मन में कोई सद्भाव नहीं था। अब बहू ने एक विचार अपने मनमें दृढ़ कर लिया और कार्यान्वित किया।

वह पहले रोटी बनाकर अपने पति-पुत्रको खिलाकर दूकान और स्कूल भेज देती। स्वयं श्वसुरके गृह चली जाती। वहाँ भोजन बनाकर श्वसुरको खिला देती और सायंकाल के लिए पराठे बनाकर रख देती।

कुछ दिनोंतक ऐसा ही चलता रहा। जब पतिको मालूम पड़ा तो उन्होंने रोका- *‘ऐसा क्यों करती हो? बीमार पड़ जाओगी। आखिर शरीर ही तो है, कितना परिश्रम सहेगा!’*

बहू बोली- *‘मेरे ईश्वर के समान आदरणीय श्वसुर भूखे रहें; इससे मुझे बड़ी ग्लानि है। मैं उन्हें खिलाये बिना खा नहीं सकती। भोजन के समय उनकी याद आनेपर मुझे आँसू आने लगते हैं। उन्होंने ही तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया है, तब तुम मुझे पति के रुपमें मिले हो। तुम्हारे मनमें कृतज्ञताका भाव नहीं है तो क्या हुआ; मैं उनके प्रति कैसे कृतघ्न हो सकती हूँ?”*

*पत्नीके सद्भाव ने पति की निष्ठुरता पर विजय प्राप्त कर ली। उसने जाकर पिता के चरण छुये, क्षमा माँगी, घर ले आये- पति-पत्नी दोनों पिताकी सेवा करने लगे। पिता ने व्यापार का सारा भार पुत्रपर छोड़ दिया। वे अब पुत्रके किसी कार्यमें हस्तक्षेप नहीं करते थे।*

*परिवारके किसी भी व्यक्ति में यदि सच्चा सद्भाव हो तो वह सबके मनको जोड़ सकता है। मन का मेल ही सच्चा पारिवारिक सुख है।*

*शुभ प्रभात। 🙏🎊🙏आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*

एक जिज्ञासु किसी सुखी पुरुष की तलाश में निकला।

एक जिज्ञासु किसी सुखी पुरुष की तलाश में निकला।सबसे पहले वह एक निर्धन किसान के पास पहुंँचा और उसने किसान से पूछा- “किसान भाई! आप तो सुखी होंगे?

किसान ने कहा- “भाई साहब, मैं तो निर्धन हूंँ, भला मैं कैसे सुखी हो सकता हूंँ। गांँव का धन सम्पन्न व्यक्ति सुखी है आप उसके पास जाइये।
तब जिज्ञासु धनाढ्य व्यक्ति के पास पहुंँचा। उसने धनाढ्य व्यक्ति से पूछा- महानुभव आप तो सुखी होंगे?

उसने कहा- “प्यारे भाई,भला मैं कैसे सुखी हो सकता हूंँ क्योंकि मेरे पास तो धन वैभव है, किन्तु उसकी सुरक्षा का कोई समुचित प्रबन्ध नहीं है। दिन-रात चिन्ता और दुख है कि कहीं मेरे धन- वैभव को लुटेरा ले ना जायें।

तब जिज्ञासु ने पूछा- “फिर सुखी कौन होगा?

उसने कहा- आप राजा के पास जाइये,वह सुखी होगा।
तब जिज्ञासु राजा के पास पहुंँचा तथा नमस्कार कर पूछा- “राजन!आप तो अवश्य सुखी होंगे?

राजा ने कहा- ये भाग्य की कैसी विडम्बना है कि प्रभु ने बहुतों को तो भोग-पदार्थ दिए ही नहीं, तो वह उनके अभाव में दुखी है, किन्तु मेरे पास सब कुछ रहते हुए भी मैं उसका उपभोग नहीं कर सकता, क्योंकि डाक्टरों ने बताया है कि आपको बहुत सारा रोग है। जिसके लिए आपको इन सारे भोग पदार्थ को त्यागना होगा, नहीं तो बीमारी और भी बढ़ जाएगी। इसलिए मैं भी बहुत दुखी हूंँ।

राजा ने फिर कहा- इस धरातल में कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं होगा अगर आप सुखी आत्मा की खोज में है तो आप देवराज इन्द्र के पास जाइये।
जिज्ञासु इन्द्र के पास भी पहुंँचा तथा उसने अपने पुराना प्रश्न उसके पास भी दोहराया।

देवराज इन्द्र ने कहा- “भाई मेरे,मैं भी चिन्तित और दुखी हूंँ।
जिज्ञासु ने विस्मिता होकर पूछा- “आप और दुखी!क्यों कैसे?
इन्द्र ने कहा- “मुझे एक ही चिंन्ता दिन-रात सताती रहती है कि कहीं कोई भजन-अभ्यासी साधु भक्त महात्मा भजन-सुमिरण कर मेरे इन्द्रासन को न छीन ले।अतः मैं भी दुखी हूंँ।

जिज्ञासु ने पूछा- जब इतनी भोग सामग्री पाकर आप भी दुखी हैं तो इस संसार में सुखी कौन होगा?
इन्द्र ने कहा- “आप ब्रह्मा जी के पास जाइये, शायद वह सुखी हों।
जिज्ञासु ब्रह्मा जी के पास पहुंँचा तथा उन्हें प्रणाम कर पूछा- पितामह!आप तो सुखी और निश्चिंत होंगे?

ब्रह्मा जी ने कहा- “भाई! मैंने सारे सृष्टि की रचना की है और यह विधान बनाया गया है कि प्रत्येक पुत्र का यह कर्तव्य है कि वह अपने पिता का आज्ञा की पालन करें, किन्तु मेरी कोई सन्तान मेरी कोई आज्ञा नहीं मानती।अतः मैं भी दुखी हूंँ।आप भगवान शंँकर के पास जाइये,वह सुखी होंगे।

जिज्ञासु भगवान शंँकर के चरणों में उपस्थित हुआ तथा प्रणाम कर पूछा – भगवन! “आप तो सुखी होंगे”।
शंँकर जी ने कहा- “वत्स! मेरे घर में भी बड़ी समस्या है मेरा पुत्र गणेश जब मेरे पास चूहे की सवारी पर आता है तो मेरी गले का नाग (सर्प) उसके चूहे को खाने भागता है और उसका चूहा बिल में घुस जाता है l हमारे परिवार के वाहनों की प्रकृति और हमारे रहन-सहन का तरीका भी अलग-अलग है!

अपनी सवारी की बिना गणेश दुखी हो जाता है और जब पुत्र दुखी हो जाता है तब पिता का दुखी होना स्वभाविक ही है। और जब मेरा पुत्र कार्तिकेय मुझसे मिलने आता है तो अपनी सवारी मोर पर बैठकर आता है। उसका मोर मेरे गले के नाग (सर्प) को खाने बढ़ता है और मेरे गले का नाग (सर्प) भाग कर विल में घुस जाता है।तब अपने गले की माला नाग (सर्प) के बिना मैं दुखी हो जाता हूंँ।

और जब पिता दुखी हो जाता है तो स्वभावतः पुत्र भी दुखी हो जाता है। मेरी कुटिया एक है, झोपड़ी भी छोटी है, मेरा वाहन बैल है और मेरी अर्धांगिनी पार्वती का वाहन शेर है।अब उस छोटी सी कुटिया में बैल और शेर को कैसे रखा जाये, क्योंकि शेर का आहार बैल है।पार्वती का शेर दहाड़ता है और मेरा बैल खूटा उखाड़ कर भाग जाता है।अतः हमारे घर में भी बड़ी समस्या है l

हांँ इन समस्याओं से परेशान होकर मैं जब भगवान का ध्यान करता हूंँ तो हमें बड़ी शान्ति मिलती है और मैं सुखी हो जाता हूंँ। तुम भगवान विष्णु के पास जाओ, “मात्र वही सुखी स्वरुप है”।

जिज्ञासु-भगवान विष्णु के पास पहुंँचा और श्री चरणों में दन्डवत प्रणाम कर उनसे निवेदन किया- प्रभु! मैं बहुत भटकता हुआ आपके पास यह जानने के लिए आया हूंँ कि आप तो सुखी होंगें।

जिज्ञासु को समझाते हुए भगवान कहने लगे- “भाई! मैं भी तो भक्तों के दुख से सदा दुखी रहता हूंँ। न जाने कब कौन दुष्ट मेरे किसी भक्त को दुखी कर दे!
यदि तुम सुखी पुरुष की तलाश में हो तो सुनो, इस संसार में केवल मेरा भक्त सुखी है जिसने मेरे नाम को अपने जीवन का आधार बना लिया है।” बाकी सारा संसार ही दुखी है”।
इसलिए किसी संतों ने कहा है:–

निर्धन कहे धनवान सुखी,
धनवान कहे सुखी राजा हमारा।

राजा कहे महाराजा सुखी,
महाराजा कहे सुखी इन्द्र हमारा।।

इन्द्र कहे ब्रह्मा जी सुखी,
ब्रह्मा जी कहे शिव शंँकर प्यारा।

शंँकर कहे विष्णु जी सुखी,
विष्णु जी कहे सुखी भक्त हमारा।।

“भक्त सुखी जो नाम भजे,
और बाकी दुखिया सब संसार।

नानक दुखिया सब संसारा, सुखिया सोई जिन नाम आधारा।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।

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गुरु के प्रति समर्पण ही शिष्य की पात्रता है, समर्पण के माध्यम से गुरुशक्ति शिष्य में प्रवाहित होने लगती है।

*🌿🌹गुरु के प्रति समर्पण ही शिष्य की पात्रता है, समर्पण के माध्यम से गुरुशक्ति शिष्य में प्रवाहित होने लगती है।* शिष्य वही है जो गुरु के पास स्वयं को पूर्णतः झुका दे, गुरु उसी शिष्य के अन्तर्मन मे प्रवेश कर उसे निर्मल बनाते हैं। दीक्षा लेकर भी यदि शिष्य सरल चित न होकर अंहकारी बना रहे तो आध्यात्मिक तल पर कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता❗

*🌿🌹 शिष्य का अर्थ है-* अपनी खुदी को मिटा देना। *शिष्य का अर्थ है-* गुरु के हर प्रयोग में स्वयं को ढाल देना, गुरुभक्ति में हर त्याग को तत्पर रहना, क्योंकि गुरुभक्ति के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले आत्मबोध के सामने किसी भी चीज का कोई मूल्य नहीं है❗

*🌿🌹 शिष्यत्व बहुत मुश्किल डगर है।* गुरु के उपदेशों को हृदयंगम कर अपने जीवन में उतारना ही सच्चे अर्थों में शिष्यता है, क्योंकि गुरु उपदेश सुनने से ही अंतर्मुखता बढ़ती है और बाहरी विषयों की ओर दौड़ बंद होती है।
*जो गुरु से प्राप्त ज्ञान का अनवरत अभ्यास करता हुआ अपने जीवन में श्रेष्ठता, ज्ञान, प्रेम, भक्ति और सात्विकता को बढ़ाता है, वही सदशिष्य है!*

*🥀🌸🌼🙏 *आपका दिन मंगलमय हो!*🙏🌼🌸🥀*

भगवान का साथ

*भगवान का साथ*

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*एक बुजुर्ग दरिया के किनारे पर जा रहे थे। एक जगह देखा कि दरिया की सतह से एक कछुआ निकला और पानी के किनारे पर आ गया।*

*उसी किनारे से एक बड़े ही जहरीले बिच्छु ने दरिया के अन्दर छलांग लगाई और कछुए की पीठ पर सवार हो गया। कछुए ने तैरना शुरू कर दिया। वह बुजुर्ग बड़े हैरान हुए।*

*उन्होंने उस कछुए का पीछा करने की ठान ली। इसलिए दरिया में तैर कर उस कछुए का पीछा किया।*

*वह कछुआ दरिया के दूसरे किनारे पर जाकर रूक गया। और बिच्छू उसकी पीठ से छलांग लगाकर दूसरे किनारे पर चढ़ गया और आगे चलना शुरू कर दिया।*

*वह बुजुर्ग भी उसके पीछे चलते रहे। आगे जाकर देखा कि जिस तरफ बिच्छू जा रहा था उसके रास्ते में एक भगवान् का भक्त ध्यान साधना में आँखे बन्द कर भगवान् की भक्ति कर रहा था।*

*उस बुजुर्ग ने सोचा कि अगर यह बिच्छू उस भक्त को काटना चाहेगा तो मैं करीब पहुँचने से पहले ही उसे अपनी लाठी से मार डालूँगा।*

*लेकिन वह कुछ कदम आगे बढे ही थे कि उन्होंने देखा दूसरी तरफ से एक काला जहरीला साँप तेजी से उस भक्त को डसने के लिए आगे बढ़ रहा था। इतने में बिच्छू भी वहाँ पहुँच गया।*

*उस बिच्छू ने उसी समय सांप के डंक के ऊपर डंक मार दिया, जिसकी वजह से बिच्छू का जहर सांप के जिस्म में दाखिल हो गया और वह सांप वहीं अचेत हो कर गिर पड़ा था। इसके बाद वह बिच्छू अपने रास्ते पर वापस चला गया।*

*थोड़ी देर बाद जब वह भक्त उठा, तब उस बुजुर्ग ने उसे बताया कि भगवान् ने उसकी रक्षा के लिए कैसे उस कछुवे को दरिया के किनारे लाया, फिर कैसे उस बिच्छु को कछुए की पीठ पर बैठा कर साँप से तेरी रक्षा के लिए भेजा।*

*वह भक्त उस अचेत पड़े सांप को देखकर हैरान रह गया। उसकी आँखों से आँसू निकल आए, और वह आँखें बन्द कर प्रभु को याद कर उनका धन्यवाद करने लगा,*

*तभी “”प्रभु”” ने अपने उस भक्त से कहा, जब वो बुजुर्ग जो तुम्हे जानता तक नही, वो तुम्हारी जान बचाने के लिए लाठी उठा सकता है। और फिर तू तो मेरी भक्ति में लगा हुआ था तो फिर तुझे बचाने के लिये मेरी लाठी तो हमेशा से ही तैयार रहती है…!*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

जैसा अन्न वैसा मन

*🍁जैसा अन्न वैसा मन 🍁*

एक बार एक ऋषि ने सोचा कि लोग गंगा में पाप धोने जाते है, तो इसका मतलब हुआ कि सारे पाप गंगा में समा गए और गंगा भी पापी हो गयी !

अब यह जानने के लिए तपस्या की, कि पाप कहाँ जाता है ?

तपस्या करने के फलस्वरूप देवता प्रकट हुए , ऋषि ने पूछा कि भगवन जो पाप गंगा में धोया जाता है वह पाप कहाँ जाता है ?

भगवन ने जहा कि चलो गंगा से ही पूछते है, दोनों लोग गंगा के पास गए और कहा कि “हे गंगे ! जो लोग तुम्हारे यहाँ पाप धोते है तो इसका मतलब आप भी पापी हुई !”

गंगा ने कहा “मैं क्यों पापी हुई, मैं तो सारे पापों को ले जाकर समुद्र को अर्पित कर देती हूँ !”

अब वे लोग समुद्र के पास गए, “हे सागर ! गंगा जो पाप आपको अर्पित कर देती है तो इसका मतलब आप भी पापी हुए !”
समुद्र ने कहा “मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को लेकर भाप बना कर बादल बना देता हूँ !”

अब वे लोग बादल के पास गए और कहा “हे बादलो ! समुद्र जो पापों को भाप बनाकर बादल बना देते है, तो इसका मतलब आप

बादलों ने कहा “मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को वापस पानी बरसा कर धरती पर भेज देता हूँ , जिससे अन्न उपजता है, जिसको मानव खाता है, उस अन्न में *जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है, जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है , उसी अनुसार मानव की मानसिकता बनती है !”*

*अन्न को जिस वृत्ति ( कमाई ) से प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, वैसे ही विचार मानव के बन जाते है ! इसीलिये सदैव भोजन सिमरन और शांत अवस्था मे करना चाहिए और कम से कम अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन ईमानदारी एवं श्रम का होना चाहिए !*
जैसे-
भीष्म पितामह शरशय्या पर पड़े प्राण त्यागने के लिए शुक्लपक्ष के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे. भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर युधिष्ठिर उनसे प्रतिदिन नीति ज्ञान लेते थे। द्रौपदी कभी नहीं जाती थीं।

इससे भीष्म के मन में पीड़ा थी। श्रीकृष्ण ने भांप लिया था। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा- अंतकाल की प्रतीक्षा में साधनारत पूर्वज से सपरिवार मिलना चाहिए. परिवार पत्नी के बिना पूर्ण नहीं है।

इशारा समझकर युधिष्ठिर जिद करके द्रौपदी को भी साथ ले गए। पितामह उन्हें नीति ज्ञान देने लगे। द्रौपदी कुंठित होकर चुपचाप सुन रही थी. अचानक द्रोपदी को हंसी आ गई।

भीष्म ने कहा- पुत्री तुम्हारे हंसने का कारण मैं जानता हूं। द्रोपदी सकुचाई को भीष्म ने कहा- पुत्री तुम अपने मन की दुविधा पूछ ही लो. मुझे शांति मिलेगी।

द्रोपदी ने कहा- स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भीष्म के समान नीति का ज्ञाता दूसरा कोई नहीं किंतु आपका ज्ञान कहां लुप्त हो गया था जब पुत्रवधू आपके सामने निवस्त्र की जा रही थी?

भीष्म ने कहा- इसी प्रश्न की प्रतीक्षा थी। जैसा अन्न वैसा मन। मैं दुर्योधन जैसे अधर्मी का अन्न खा रहा था। उस अन्न ने मेरी बुद्धि जड़ कर दी थी। सही निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो गई थी।

*अन्न ही रक्त का कारक है। अर्जुन के बाणों ने मेरे शरीर से वह रक्त धीरे-धीरे करके निकाल दिया है। अब इस शरीर में सिर्फ गंगापुत्र भीष्म शेष है। सिर्फ माता का अंश है जो सबको निर्मल करती हैं इसलिए मैं नीति की बातें कर पा रहा हूं।*

*भीष्म की बात को अटल सत्य समझिए। दुराचार से या किसी को सताकर कमाए गए धन से यदि आप परिवार का पालन करते हैं तो वह परिवार की बुद्धि भ्रष्ट करता है। उससे जो सुख है वह क्षणिक है किंतु लंबे समय में वह दुख का कारण बनता है। यदि आपके सामने गलत तरीके से पैसा कमाकर भी कोई फल-फूल रहा है तो यह समझिए कि वे उसके पूर्वजन्म के संचित पुण्य हैं जिसे निगल रहा है। जैसे ही वे पुण्य कर्म समाप्त होंगे, उसके दुर्दिन आरंभ होंगे।*

*आपका दिन मंगलमय हो*

कड़वा वचन

*कड़वा वचन*

सुंदर नगर में एक सेठ रहते थे। उनमें हर गुण था- नहीं था तो बस खुद को संयत में रख पाने का गुण। जरा-सी बात पर वे बिगड़ जाते थे। आसपास तक के लोग उनसे परेशान थे। खुद उनके घर वाले तक उनसे परेशान होकर बोलना छोड़ देते।

किंतु, यह सब कब तक चलता। वे पुन: उनसे बोलने लगते। इस प्रकार काफी समय बीत गया, लेकिन सेठ की आदत नहीं बदली। उनके स्वभाव में तनिक भी फर्क नहीं आया।

अंततः एक दिन उसके घरवाले एक साधु के पास गये और अपनी समस्या बताकर बोले- “महाराज ! हम उनसे अत्यधिक परेशान हो गये हैं, कृपया कोई उपाय बताइये।” तब, साधु ने कुछ सोचकर कहा- “सेठ जी ! को मेरे पास भेज देना।”

“ठीक है, महाराज” कहकर सेठ जी के घरवाले वापस लौट गये। घर जाकर उन्होंने सेठ जी को अलग-अलग उपायों के साथ उन्हें साधु महाराज के पास ले जाना चाहा। किंतु, सेठ जी साधु-महात्माओं पर विश्वास नहीं करते थे। अतः वे साधु के पास नहीं आये। तब एक दिन साधु महाराज स्वयं ही उनके घर पहुंच गये। वे अपने साथ एक गिलास में कोई द्रव्य लेकर गये थे।

साधु को देखकर सेठ जी की प्योरिया चढ़ गयी। परंतु घरवालों के कारण वे चुप रहे।

साधु महाराज सेठ जी से बोले- “सेठ जी ! मैं हिमालय पर्वत से आपके लिए यह पदार्थ लाया हूं, जरा पीकर देखिये।” पहले तो सेठ जी ने आनाकानी की, परंतु फिर घरवालों के आग्रह पर भी मान गये। उन्होंने द्रव्य का गिलास लेकर मुंह से लगाया और उसमें मौजूद द्रव्य को जीभ से चाटा।

ऐसा करते ही उन्होंने सड़ा-सा मुंह बनाकर गिलास होठों से दूर कर लिया और साधु से बोले- “यह तो अत्यधिक कड़वा है, क्या है यह ?”

“अरे आपकी जबान जानती है कि कड़वा क्या होता है” साधु महाराज ने कहा। “यह तो हर कोई जानता है” कहते समय सेठ ने रहस्यमई दृष्टि से साधु की ओर देखा।

“नहीं ऐसा नहीं है, अगर हर कोई जानता होता तो इस कड़वे पदार्थ से कहीं अधिक कड़वे शब्द अपने मुंह से नहीं निकालता। सेठ जी वह एक पल को रुके फिर बोले। सेठ जी याद रखिये जो आदमी कटु वचन बोलता है वह दूसरों को दुख पहुंचाने से पहले, अपनी जबान को गंदा करता है।”

सेठ समझ गये थे कि साधु ने जो कुछ कहा है उन्हें ही लक्षित करके कहा है। वह फौरन साधु के पैरों में गिर पड़े- “बोले साधु महाराज ! आपने मेरी आंखें खोल दी, अब मैं आगे से कभी कटु वचनों का प्रयोग नहीं करूंगा।”

सेठ के मुंह से ऐसे वाक्य सुनकर उनके घरवाले प्रसन्नता से भर उठे। तभी सेठ जी ने साधु से पूछा- “किंतु, महाराज ! यह पदार्थ जो आप हिमालय से लाये हो वास्तव में यह क्या है ?”

साधु मुस्कुराकर बोले- “ नीम के पत्तों का अर्क।” “क्या” सेठ जी के मुंह से निकला और फिर वे धीरे-से मुस्कुरा दिये।

*शिक्षा:-*

*मित्रों! कड़वा वचन बोलने से बढ़कर इस संसार में और कड़वा कुछ नहीं। किसी द्रव्य के कड़वे होने से जीभ का स्वाद कुछ ही देर के लिए कड़वा होता है। परंतु कड़वे वचन से तो मन और आत्मा को चोट लगती है..!*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

*🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏*

अनुशासन 

*” अनुशासन “*

जीवन का एक सीधा सा नियम है और वो ये कि *अगर अनुशासन नहीं तो प्रगति भी नहीं।।*

अनुशासन में बहकर ही एक नदी सागर तक पहुँचकर सागर ही बन जाती है।
अनुशासन में बँधकर ही एक बेल जमीन से उठकर वृक्ष जैसी ऊँचाई को प्राप्त कर पाती है
और अनुशासन में रहकर ही वायु फूलों की खुशबु को अपने में समेटकर स्वयं भी सुगंधित हो जाती है और चारों दिशाओं को सुगंध से भर देती है।

पानी अनुशासन हीन होता है तो बाढ़ का रूप धारण कर लेता है!
हवा अनुशासन हीन होती है तो आँधी बन जाती है!
अग्नि अगर अनुशासन हीन हो जाती है तो महा विनाश का कारण बन जाती है।
*ऐसे ही अनुशासनहीनता स्वयं के जीवन को तो विनाश की तरफ ले ही जाती है साथ ही साथ दूसरों के लिए भी विनाश का कारण बन जाती है।।*

गाड़ी अनुशासन में चले तो सफर का आनंद और बढ़ जाता है। *इसी प्रकार जीवन भी अनुशासन में चले तो जीवन यात्रा का आनंद और बढ़ जाता है। जीवन का घोड़ा निरंकुशता अथवा उच्छृंखलता का त्याग करके निरंतर प्रगति पथ पर अथवा तो अपने लक्ष्य की ओर दौड़ता रहे उसके लिए अपने हाथों में अनुशासन रुपी लगाम का होना भी परमावश्यक हो जाता है..!!*
*अनुशासन में रहकर कर्म करने से जीवन में बहुत कुछ पा सकते हैं!*

*सोई सेवक प्रियतम मम सोई!
*मम अनुशासन माने जोई!!*
🌸🌸🌸🌸
*🙏🏿🙏🙏🏾 *सुप्रभात*🙏🏻🙏🏼🙏🏽

सच्ची सद्गति कैसे….?

💫सच्ची सद्गति कैसे….?🌷

✍️ …..एक व्यापारी अपने ग्राहक को शहद दे रहा था। अचानक व्यापारी के हाथ से छूटकर शहद का बर्तन गिर पड़ा। बहुत-सा शहद भूमि पर ढुलक गया। जितना शहद व्यापारी उठा सकता था, उतना उसने ऊपर-ऊपर से उठा लिया; लेकिन कुछ शहद भूमि में गिरा रह गया।

बहुत-सी मखियाँ शहद की मिठास के लोभ से आकर उस शहद पर बैठ गयीं। मीठा-मीठा शहद उन्हें बहुत अच्छा लगा। जल्दी-जल्दी वे उसे चाटने लगीं। जब तक उनका पेट भर नही गया, वे शहद चाटने में लगी रहीं।

जब मक्खियों का पेट भर गया, उन्होंने उड़ना चाहा। लेकिन उनके पंख शहद से चिपक गये थे। उड़ने के लिये वे जितना छटपटाती थीं, उतने ही उनके पंख चिपकते जाते थे। उनके सारे शरीर में शहद लगता जाता था।

बहुत-सी मक्खियाँ शहद में लोट-पोट होकर मर गयीं। बहुत-सी पंख चिपकने से छटपटा रहीं थीं। लेकिन दूसरी नयी-नयी मक्खियाँ शहद के लोभ से वहाँ आती-जाती थीं| मरी और छतपटाती मक्खियों कू देखकर भी वे शहद खाने का लोभ छोड़ नहीं पाती थीं।

मक्खियों की दुर्गति और मुर्खता देखकर मन में एक चिंतन उठता है कि- ‘जो लोग लोभ में पड़ जाते हैं, वे इन मक्खियों के समान ही मूर्ख होते हैं। मुख के स्वाद का थोड़ी देर का सुख उठाने के लोभ से वे अपना स्वास्थ्य नष्ट कर देते हैं, रोगी बनकर छटपटाते हैं और शीघ्र मृत्यु के ग्रास बनते हैं।’

वास्तव में मक्खी में तो बुद्धि अथवा विवेक नहीं परंतु मनुष्य एक अत्यंत विवेकशील प्राणी होते हुए भी अपनी इंद्रियों का गुलाम बना बैठा है। सत्य ज्ञान की अनुपस्थिति होने के कारण वह पांचों विकारों की जंजीरों से बंधा हुआ हर पल तड़पता है, छटपटाता है, और अंत में एक निरर्थक जीवन जीते हुए प्राण त्याग देता है। जबकि सच्ची सद्गति अथवा लिबरेशन तो विकारों को त्यागने में ही है !!

सदा याद रहे कि आप एक शांत और प्रेम स्वरूप परमआत्मा के ही अंशी हैं!

🍁🍁🍁💞 आपका जीवन आनन्दमय हो!💞🍁🍁🍁