बुरी आदत

बुरी आदत

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था. वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता , ” अभी मैं इतना छोटा हूँ..धीरे-धीरे ये आदत छोड़ दूंगा !” पर वह कभी भी आदत छोड़ने का प्रयास नहीं करता।

उन्ही दिनों एक महात्मा गाँव में पधारे हुए थे, जब आदमी को उनकी ख्याति के बारे में पता चला तो वह तुरंत उनके पास पहुँचा और अपनी समस्या बताने लगा. महात्मा जी ने उसकी बात सुनी और कहा , ” ठीक है , आप अपने बेटे को कल सुबह बागीचे में लेकर आइये, वहीँ मैं आपको उपाय बताऊंगा।“

अगले दिन सुबह पिता-पुत्र बगीचे में पहुंचे।

महात्मा जी बेटे से बोले , ” आइये हम दोनों बागीचे की सैर करते हैं.” , और वो धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे ।

चलते-चलते ही महात्मा जी अचानक रुके और बेटे से कहा, ” क्या तुम इस छोटे से पौधे को उखाड़ सकते हो ?”

” जी हाँ, इसमें कौन सी बड़ी बात है .”, और ऐसा कहते हुए बेटे ने आसानी से पौधे को उखाड़ दिया।

फिर वे आगे बढ़ गए और थोड़ी देर बाद महात्मा जी ने थोड़े बड़े पौधे की तरफ इशारा करते हुए कहा, ” क्या तुम इसे भी उखाड़ सकते हो?”

बेटे को तो मानो इन सब में कितना मजा आ रहा हो, वह तुरंत पौधा उखाड़ने में लग गया. इस बार उसे थोड़ी मेहनत लगी पर काफी प्रयत्न के बाद उसने इसे भी उखाड़ दिया ।

वे फिर आगे बढ़ गए और कुछ देर बाद पुनः महात्मा जी ने एक गुडहल के पेड़ की तरफ इशारा करते हुए बेटे से इसे उखाड़ने के लिए कहा।

बेटे ने पेड़ का ताना पकड़ा और उसे जोर-जोर से खींचने लगा. पर पेड़ तो हिलने का भी नाम नहीं ले रहा था. जब बहुत प्रयास करने के बाद भी पेड़ टस से मस नहीं हुआ तो बेटा बोला , ” अरे ! ये तो बहुत मजबूत है इसे उखाड़ना असंभव है ।

महात्मा जी ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा , ” बेटा, ठीक ऐसा ही बुरी आदतों के साथ होता है , जब वे नयी होती हैं तो उन्हें छोड़ना आसान होता है, पर वे जैसे जैसे पुरानी होती जाती हैं इन्हें छोड़ना मुश्किल होता जाता है।”

बेटा उनकी बात समझ गया और उसने मन ही मन आज से ही आदत छोड़ने का निश्चय किया।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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दीनबन्धु और मालती के यहाँ दो पुत्र और एक पुत्रवधु थी। एक दिन बड़ा पुत्र साँप के काटने से मर गया।

दीनबन्धु और मालती के यहाँ दो पुत्र और एक पुत्रवधु थी। एक दिन बड़ा पुत्र साँप के काटने से मर गया।
तभी एक संत आ पहुँचे। उन्होंने प्रबल भूख लगने की बात की! परिजनों ने संत की इच्छा का आदर करते हुए लाश को चादर में लपेटकर, स्नानादि कर, संत के लिय भोजन बना कर उसे परोसा गया।

संत ने कहा- मैं अकेला भोजन नहीं करता! सभी बैठो। वे बैठ तो गए पर उनको पूरी घटना बतानी पड़ी।

संत ने घर के मुखिया दीनबन्धु से कहा- तुम कैसे पिता हो? पुत्र मरा पड़ा है, तुम भोजन को बैठ गए?

दीनबन्धु बोले – महाराज, संसार में कौन पिता है? कौन पुत्र है? इस जगतसराय में सब यात्री ठहरते हैं! सुबह चल पड़ते हैं! तो मैं वृथा क्याें शोक करूं?

यह संसार तो आम का पेड़ है। कुछ फूल ही गिर जाते हैं, तो कुछ छोटे फल ही टूट कर गिर जाते हैं। जो पक जाते हैं वे भी गिर ही जाते हैं। मैं किसके लिए रोऊँ?

घर की मालकिन मालती ने कहा- महाराज, जैसे कुम्हार बर्तन बनाता है। कुछ बनने में नष्ट हो जाते हैं! कुछ बन कर तो कुछ थोड़े समय बाद टूट जाते हैं। पर अंत में सब के सब कभी न कभी टूटते ही हैं। जैसे पक्षी पेड़ पर इकट्ठा होते हैं और सुबह होते ही उड़ जाते हैं।

घर का छोटा पुत्र कहने लगा – महाराज, जगत के सब संबंध झूठे हैं। न जन्म से पहले कोई नाता है, न मृत्यु के बाद। सिवा परमात्मा के अपना है ही कौन?

जैसे बाजार में अनेक व्यापारी आते हैं। कोई किसी का कुछ नहीं होता। फिर भी हंसते , बतलाते , अपना व्यापार करते हैं। बाजार बंद होने पर सब अपनी ठौर चले जाते हैं। अपना व्यापार कर मेरा भाई भी चला गया। एक दिन मैं भी चला जाऊँगा। जिसका माल अभी बिका नहीं, वह किसी के साथ कैसे चला जाए? उसे तो अभी प्रतीक्षा करनी है।

अंत में पुत्रवधू बोली – महाराज! इस संसार में जीव का पति कौन है? क्या भगवान के सिवा और भी कोई हमारा स्वामी है? भगवान के लिए ही स्त्री लौकिक पति की भगवद् वृत्ति से सेवा करती है। जब तक भगवान ने उनकी सेवा करवानी थी, जब तक उनका मेरा साथ था- तब तक तन-मन से सेवा मेरा धर्म था। अब उन्हें वापिस बुला लिया है, तो मुझे शोक कैसा? संत-महात्मा तो भगवत भजन के लिए सन्यासी होते हैं। वैधव्य भी तो एक सन्यास ही है, जो भगवान ने कृपा करके मुझे दिया है। संसार तो हरि की लीला से है। वे हंसाते भी हैं, रूलाते भी हैं। मिला देते हैं, तो बिछुड़ा भी देते हैं। इसलिय मैं उनकी किसी लीला को देखकर शोक क्यों करूँ? इस संसार में भी हमेशा एक नाटक चलता है और हम सभी उसके पात्र हैं – सभी को उस सूत्रधार के इशारों पर चलते हैं। मुझे तो अपने अभिनय से भगवान को रिझाना है। अब तक मुझे सधवापन का पात्र मिला था, अब विधवापन का मिला गया। मैं शोक क्यों करूं?

इतने में भगवान की लीला से दीनबंधु का वह मरा बेटा अचानक जीवित हो गया।

संत ने उसे यह सब घटना और परिजनों के विचार बतलाये तो वह बेटा बोला- महाराज, धूप की तपन से बचने के लिय कुछ राहगीर एक वृक्ष के नीचे खड़े होते हैं। धूप कम हो जाने पर अपनी राह चल देते हैं। पेड़ वहीं खड़ा रह जाता है। कल फिर कुछ राही आएँगे और फिर चले जाएँगे, तब फिर आने-जाने का शोक कैसा? हजारों मनुष्य अपना लेन-देन चुकाने के लिए एकत्र होते हैं और ॠण उतरते ही अलग हो जाते हैं। तो शोक मिलने और बिछुड़ने का शोक कैसा?

इसीलिय समय के सदगुरु अब में जीने के लिय, अब का आनन्द लेने के लिय कहते हैं! जो शक्ति थी, है और रहेगी – उससे तादात्म्य स्थापित करने के लिय ही बारबार प्रेरित करते हैं! ताकि नश्वर संसार के रिश्ते नातों के होने या ना होने, उनके मिलन और विछोह का कष्ट हमें व्यथित ना करे!

मुझे आशा है आप सभी इस काल्पनिक कहानी के सार्वभोमिक सत्य को आत्मसात करते हुए – महाराजी के द्वारा बताई गयी व्यावहारिक दिशा में चलने प्रयास करेंगे और अधिकाधिक अभ्यास करके हर पल का आनन्द लेंगे!

आपका जीवन मंगलमय बना रहे!

एक छोटा बच्चा था! वह बहुत ही नेक और बुद्धिमान था।

एक छोटा बच्चा था! वह बहुत ही नेक और बुद्धिमान था।
एक दिन वो मंदिर में गया। मंदिर के अन्दर सभी भक्त भगवान के मंत्र बोल रहे थे। कुछ भक्त स्तुति गान भी कर रहे थे। कुछ भक्त संस्कृत के काफी कठिन श्लोक भी बोल रहे थे।

बच्चे ने कुछ देर यह सब देखा और उसके चहेरे पर उदासी छा गयी। क्योंकि उसे यह सब प्रार्थना और मंत्र बोलना आता नहीं था। कुछ देर वहाँ खड़ा रहा। उसने अपनी आँखे बन्द की और अपने दोनों हाथ जोड़े और बार-बार *”क-ख-ग-घ”* बोलने लगा।

मंदिर के पुजारी ने यह देखा उसने लड़के से पूछा कि *”बेटे तुम यह क्या कर रहे हो?*
बच्चे ने कहा, *”मैं भगवान की पूजा कर रहा हूं”।*

पुजारी ने कहा कि *”बेटे भगवान से इस तरह से प्रार्थना नहीं की जा सकती! तुम तो क-ख-ग-घ बोल रहे हो।”*

पंडित पुजारी की कोई गलती भी नहीं थी क्योंकि कभी कभी कुछ पंडितो की पूजा भी रटी रटाई होती है। भाव का तो मिश्रण होता ही नहीं!

लेकिन बच्चा मासूम था। उसके पास शब्द तो थे नहीं *सो भाव से क ख ग घ ही बोलने लगा।*

लड़के ने उत्तर दिया कि *”मुझे प्रार्थना, मंत्र, भजन नहीं आते!मुझे सिर्फ क-ख-ग-घ ही आती है।*

मुझे मेरे पिताजी ने घर में पढ़ाते वक्त यह बताया था कि *सारे शब्द इसी क-ख-ग-घ से बनते हैं!* इसलिये मेरे को इतना पता है कि *प्रार्थना, मंत्र, भजन यह सब क-ख-ग-घ से ही बनते हैं।*
मैं दस बार क-ख-ग-घ बोल गया हूँ और भगवान से प्रार्थना करी कि *हे भगवान मैं अभी छोटे से स्कूल में पड़ता हूँ मुझे अभी यही सिखाया है! यह सब शब्द में से अपने लिए खुद प्रार्थना, मंत्र, भजन बना लेना!*

बच्चे की बात सुनकर पुजारी जी चुप हो गए। उनको अपनी भूल का एहसास हो गया कि *भगवान की पूजा में शब्दों से ज्यादा भाव का महत्व होता है!*
प्रार्थना हदय को साफ और निर्मल करती है।
इसलिए *शब्दों से ज्यादा भाव का महत्व है। शब्द तो हवा में तैरते रह जाते हैं मगर भाव ह्रदयनाथ तक पहुंच जाता है।*

दुनिया में सैकड़ों भाषाएं हैं लेकिन *ह्रदय की भाषा का बोध समय से सद्गुरु से ही प्राप्त होता है!*

*🙏🏻🙏🏿🙏🏾 सुप्रभात*🙏🏽🙏🏼🙏

राजा का जन्मदिन

*राजा का जन्मदिन*

एक बार एक राजा सुबह घूमने निकला तो उसने तय किया कि *वह आज अपने जन्म दिन पर रास्ते में मिलने वाले पहले व्यक्ति को पूरी तरह खुश व संतुष्ट करेगा।*
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उसे एक भिखारी मिला।

भिखारी ने राजा से भीख मांगी *तो राजा ने भिखारी की तरफ एक तांबे का सिक्का उछाल दिया।*

वह सिक्का भिखारी के हाथ से छूट कर *नाली में जा गिरा।*

भिखारी नाली में हाथ डाल तांबे का सिक्का ढूंढ़ने लगा।
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राजा ने उसे बुला कर दूसरा *तांबे का सिक्का दिया।*

भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और *वापस जाकर नाली में गिरा सिक्का ढूंढ़ने लगा!*
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राजा को लगा की भिखारी बहुत गरीब है। उसने भिखारी को फिर *चांदी का एक सिक्का दिया।*
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भिखारी राजा की जय जयकार करता फिर *नाली में सिक्का ढूंढ़ने लगा।*
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राजा ने अब भिखारी को एक *सोने का सिक्का दिया।*
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भिखारी खुशी से झूम उठा और *वापस भाग कर अपना हाथ नाली की तरफ बढ़ाने लगा।*
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राजा को बहुत खराब लगा। लेकिन उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि *सबसे पहले मिलने वाले व्यक्ति को आज खुश एवं संतुष्ट करना है।*
उसने भिखारी को बुलाया और कहा कि *मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूं, अब तो खुश व संतुष्ट हो?*
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भिखारी बोला, *महाराज, मैं खुश और संतुष्ट तभी हो सकूंगा जब नाली में गिरा तांबे का सिक्का मुझे मिल जायेगा!*
कमोवेश हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है।

*हमें जब समय के सतगुरू ने अपनी अहेतुकी कृपा से अपनाया, ज्ञान दिया और अभ्यास करके अंदर के खजाने का आनन्द लेने के लिए बतलाया पर हम बेकार की बातों में अपनी अनमोल स्वासों को गवा रहे हैं!*

उस आंतरिक आनन्द को भूलकर उस भिखारी की तरह संसार रूपी नाली में तांबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गंवाते जा रहे हैं!

एक एक स्वास हाथ से निकल रहे हैं! मौत सामने खड़ी है तो फिर गफलत क्यों?
*खुद के लिए खुद सोचें! कम से कम अपने इस जीवन के साथ न्याय करें!*

जीने की राह……..!

*💫जीने की राह……..!🌷*

*✍️….ऐसा कोई व्यक्ति संसार में आज तक उत्पन्न नहीं हुआ, जिसने संसार में जन्म तो लिया हो और दुख न भोगा हो। अर्थात जो भी व्यक्ति संसार में जन्म लेता है, शरीर धारण करता है, उसे अनेक प्रकार के दुख भोगने ही पड़ते हैं। दुखों से पूरी तरह छूटने का तो केवल एक ही उपाय है कि संसार में अगला जन्म लेना बंद करें । तभी सारे दुखों से पीछा छूटेगा। अस्तु यह तो संभव नहीं है!*

*अब जिन जिन आत्माओं ने संसार में शरीर धारण कर रखा है, जन्म ले रखा है, उनको जन्म से लेकर मृत्यु तक सारे जीवन में दुख, अशांति, परेशानियां, और समस्याएं तो आती ही रहती हैं।*

*कुछ लोग सारा दिन अपनी समस्याओं को ही लेकर सदा रोते रहते हैं । ऐसे लोग कर्मों की गुह्य गति का ज्ञान ना होने के कारण स्वयं तो दुखी रहते ही हैं और दूसरों को भी दुखी करते रहते हैं। परंतु कुछ लोग इन समस्याओं से अपने अंदर मन ही मन जूझते रहते हैं, कदाचित उसका वर्णन भी नहीं करते। परमात्मा एवं शुभचिंतकों के सहयोग से, वे इस युद्ध में जीत भी जाते हैं। उनके चेहरे पर सदा मुस्कान व प्रसन्नता ही दिखाई देती है, क्योंकि वे समस्या में भी मुस्कुराने का कोई अवसर ढूंढ लेते हैं!*

*तो आप ऐसा ना समझें, कि उन्हें जीवन में कोई दुख समस्या या कोई कष्ट परेशानी का आभास नहीं होता। अपितु इन सब समस्याओं के होते हुए भी सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान सदगुरु की प्रेरणा व शक्ति उनके साथ होती है। क्योंकि वे सदगुरु की आज्ञा का पालन करते हैं, इसलिए सर्वशक्तिमान सदगुरु उनके अंदर भरपूर शक्ति ज्ञान बल आनंद आदि गुणों की वर्षा करते ही रहते हैं। जिसके कारण वे हंसते-हंसते सब समस्याओं को पार कर जाते हैं। वास्तव में सदगुरु में उनका अटूट निश्चय ही उनके मनोबल को बढ़ाता है और वे सदा प्रसन्न रहते हैं और दूसरों के भी प्रेरक बन जाते हैं।*

हम भी हमेशा ऐसा प्रयत्न करने की कोशिश करें कि *अपने सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान आनन्दस्वरूप सदगुरु का ईमानदारी के साथ अनुसरण करें* ताकि *उसकी आज्ञा का पालन करके एक बहुत प्रसन्न एवं आनंदित जीवन जी सकें!*

सदा याद रहे कि *आप खुद एक शांत स्वरूप और प्रेम स्वरूप आत्मा है!*
*🍁🍁🍁💞 *सुप्रभात* *💞🍁🍁🍁

ईश्वर सबके कर्मों को देखता है!

*ईश्वर सबके कर्मों को देखता है!*

दातादीन अपने लड़के गोपाल को नित्य शाम को सोने से पहले कहानियाँ सुनाया करता था।
एक दिन उसने गोपाल से कहा— *‘बेटा! एक बात कभी मत भूलना कि भगवान् सब कहीं हैं।’*

गोपाल ने इधर-उधर देखकर पूछा— *‘पिताजी! भगवान् सब कहीं हैं? वह मुझे तो कहीं दीखते नहीं।’*

दातादीन ने कहा— *‘हम भगवान् को देख नहीं सकते; किंतु वे हैं सब कहीं और हमारे सब कामों को देखते रहते हैं।’*

गोपाल ने पिता की बात याद कर ली। कुछ दिन बाद अकाल पड़ा। दातादीन के खेतों में कुछ हुआ नहीं।

एक दिन गोपाल को लेकर रात के अँधेरे में वह गाँव से बाहर गया। वह दूसरे किसान के खेत में से चोरी से एक गट्ठा अन्न काटकर घर लाना चाहता था।

गोपाल को मेड़ पर खड़ा करके उसने कहा— *‘तुम चारों ओर देखते रहो, कोई इधर आवे या देखे तो मुझे बता देना।’*

जैसे ही दातादीन खेत में अन्न काटने बैठा गोपाल ने कहा— *‘पिताजी! रुकिये।’*

दातादीन ने पूछा— *‘क्यों, कोई देखता है क्या?’*

गोपाल— *‘हाँ, देखता है।’*

दातादीन खेत से निकल कर मेड़ पर आया। उसने चारों ओर देखा। जब कोई कहीं न दीखा तो उसने पुत्र से पूछा— *‘कहाँ? कौन देखता है?’*

गोपाल— *‘आपने ही तो कहा था कि ईश्वर सब कहीं है और सबके सब काम देखता है। तब वह आपको खेत काटते क्या नहीं देखेगा?’*

दातादीन पुत्र की बात सुनकर लज्जित हो गया। चोरी का विचार छोड़कर वह घर लौट आया..!!

*🙏🏼 सुप्रभात*🙏

योग्यता की परख

*योग्यता की परख*
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युवक अंकमाल भगवान बुद्ध के सामने उपस्थित हुआ और बोला- “भगवन्! मेरी इच्छा है कि मैं संसार की कुछ सेवा करूं, आप मुझे जहाँ भी भेजना चाहें भेज दें ताकि मैं लोगों को धर्म का रास्ता दिखाऊँ?”

बुद्ध हँसे और बोले- “तात! संसार को कुछ देने के पहले अपने पास कुछ होना आवश्यक है, जाओ पहले अपनी योग्यता बढ़ाओ फिर संसार की भी सेवा करना।“

अंकमाल वहाँ से चल पड़ा और कलाओं के अभ्यास में जुट गया। बाण बनाने से लेकर चित्रकला तक मल्लविद्या से लेकर मल्लाहकारी तक उसने जितनी भी कलायें हो सकती हैं उन सबका उसने 10 वर्ष तक कठोर अभ्यास किया।

अंकमाल की कला-विशारद के रूप में सारे देश में ख्याति फैल गई।

अपनी प्रशंसा से आप प्रसन्न होकर अंकमाल अभिमान पूर्वक लौटा और तथागत की सेवा में जा उपस्थित हुआ। अपनी योग्यता का बखान करते हुये उसने कहा- “भगवन्! अब मैं संसार के प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखा सकता हूँ। अब मैं 24 कलाओं का पंडित हूँ।“

भगवान बुद्ध मुस्कराये और बोले- “अभी तो तुम कलायें सीख कर आये हो परीक्षा दे लो तब उन पर अभिमान करना।“

अगले दिन भगवान बुद्ध एक साधारण नागरिक का वेश बदलकर अंकमाल के पास गये और उसे अकारण खरी-खोटी सुनाने लगे। अंकमाल क्रुद्ध होकर मारने दौड़ा तो बुद्ध वहाँ से मुस्कराते हुये वापस लौट पड़े।

उसी दिन मध्याह्न दो बौद्ध श्रमण वेश बदलकर अंकमाल के समीप जाकर बोले- “आचार्य आपको सम्राट हर्ष ने मन्त्रिपद देने की इच्छा की है क्या आप उसे स्वीकार करेंगे?“

अंकमाल को लोभ आ गया उसने कहा- “हाँ-हाँ अभी चलो।“

दोनों श्रमण भी मुस्करा दिये और चुपचाप लौट आये।

अंकमाल हैरान था- ‘बात क्या है?’

थोड़ी देर पीछे भगवान बुद्ध पुनः उपस्थित हुये। उनके साथ आम्रपाली थीं। अंकमाल जितनी देर तथागत वहाँ रहे आम्रपाली की ही ओर बार-बार देखता रहा। बात समाप्त कर तथागत आश्रम लौटे।

सायंकाल अंकमाल को बुद्ध देव ने पुनः बुलाया और पूछा- “वत्स। क्या तुमने क्रोध, काम और लोभ पर विजय की विद्या भी सीखी है?”

अंकमाल को दिनभर की सब घटनायें याद हो आई। उसने लज्जा से अपना सिर झुका लिया और उस दिन से आत्म-विजय की साधना में संलग्न हो गया।

🙏🙏🏻🙏🏿 सुप्रभात🙏🏼🙏🏾🙏🏽

एक राजा था। उसका मन्त्री भगवान् का भक्त था।

एक राजा था। उसका मन्त्री भगवान् का भक्त था। कोई भी बात होती तो वह यही कहता कि *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी!*
एक दिन राजा के बेटे की मृत्यु हो गयी। मृत्यु का समाचार सुनते ही मन्त्री बोल उठा – *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी!* यह बात राजा को बुरी तो लगी, पर वह चुप रहा। कुछ दिनों के बाद राजा की पत्नी की भी मृत्यु हो गयी। मन्त्री ने कहा – *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी!* राजा को गुस्सा आया, पर उसने गुस्सा पी लिया, कुछ बोला नहीं।

एक दिन राजा के पास एक नयी तलवार बनकर आयी। राजा अपनी अंगुली से तलवार की धार देखने लगा तो धार बहुत तेज होने के कारण चट उसकी अँगुली कट गयी! मन्त्री पास में ही खड़ा था । वह बोला- *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी!*

अब राजा के भीतर जमा गुस्सा बाहर निकला और उसने तुरन्त मन्त्री को राज्य से बाहर निकल जाने का आदेश दे दिया और कहा कि *मेरे राज्य में अन्न-जल ग्रहण मत करना।*

मन्त्री बोला – *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी! मन्त्री अपने घर पर भी नहीं गया! साथ में कोई वस्तु भी नहीं ली और राज्य के बाहर निकल गया।*

कुछ दिन बीत गये। एक बार राजा अपने साथियों के साथ शिकार खेलने के लिये जंगल गया! जंगल में एक हिरण का पीछा करते-करते राजा बहुत दूर घने जंगल में निकल गया। उसके सभी साथी बहुत पीछे छूट गये!

वहाँ जंगल में डाकुओं का एक दल रहता था। उस दिन डाकुओं ने कालीदेवी को एक मनुष्य की बलि देने का विचार किया हुआ था। संयोग से डाकुओं ने राजा को देख लिया। उन्होंने राजा को पकड़कर बाँध दिया। अब उन्होंने बलि देने की तैयारी शुरू कर दी।

जब पूरी तैयारी हो गयी, तब डाकुओं के पुरोहित ने राजा से पूछा- *तुम्हारा बेटा जीवित है?*
राजा बोला- *नहीं, वह मर गया।*
पुरोहित ने कहा कि *इसका तो हृदय जला हुआ है!*
पुरोहित ने फिर पूछा- *तुम्हारी पत्नी जीवित है?*
राजा बोला – *वह भी मर चुकी है।*
पुरोहित ने कहा कि *यह तो आधे अंग का है । अत: यह बलि के योग्य नहीं है। परन्तु हो सकता है कि यह मरने के भय से झूठ बोल रहा हो!*

पुरोहित ने राजा के शरीर की जाँच की तो देखा कि *उसकी अँगुली कटी हुई है।*

पुरोहित बोला- *अरे! यह तो अंग-भंग है, बलि के योग्य नहीं है ! छोड़ दो इसको! डाकुओं ने राजा को छोड़ दिया।*

राजा अपने घर लौट आया। लौटते ही उसने अपने आदमियों को आज्ञा दी कि *हमारा मन्त्री जहाँ भी हो, उसको तुरन्त ढूँढ़कर हमारे पास लाओ। जब तक मन्त्री वापस नहीं आयेगा, तबतक मैं अन्न ग्रहण नहीं करूँगा।*

राजा के आदमियों ने मन्त्री को ढूँढ़ लिया और उससे तुरन्त राजा के पास वापस चलने की प्रार्थना की। मन्त्री ने कहा – *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी!*

मन्त्री राजा के सामने उपस्थित हो गया। राजा ने बड़े आदरपूर्वक मन्त्री को बैठाया और अपनी भूल पर पश्चात्ताप करते हुए जंगल वाली घटना सुनाकर कहा कि *”पहले मैं तुम्हारी बात को समझा नहीं। अब समझ में आया कि भगवान् की मेरे पर कितनी कृपा थी! भगवान् की कृपा से अगर मेरी अँगुली न कटता तो उस दिन मेरा गला कट जाता! परन्तु जब मैंने तुम्हें राज्य से निकाल दिया!*

जब तुमने कहा कि *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी तो वह कृपा क्या थी- यह अभी मेरी समझ में नहीं आया!*

मन्त्री बोला – *महाराज, जब आप शिकार करने गये, तब मैं भी आपके साथ जंगल में जाता। आपके साथ मैं भी जंगल में बहुत दूर निकल जाता; क्योंकि मेरा घोड़ा आपके घोड़े से कम तेज नहीं है। डाकूलोग आपके साथ मेरे को भी पकड़ लेते। आप तो अँगुली कटी होने के कारण बच गये, पर मेरा तो उस दिन गला कट ही जाता! इसलिये भगवान की कृपा से मैं आपके साथ नहीं था! राज्य से बाहर था; अत: मरने से बच गया। अब पुन: अपनी जगह वापस आ गया हूँ। यह भगवान् की कृपा ही तो है!*

कहानी का सार यह है कि *आज कल मनुष्य को सुविधा भोगने की इतनी बुरी आदत हो गयी है की थोड़ी सी भी विपरीत परिस्थिति में विचलित हो जाता है! कई बार तो भगवान के अस्तित्त्व को भी नकारने लगता है!*

उनके लिये यही संदेश है कि *उस परमात्मा ने जब हमें जन्म दिया है तो हमारा योगक्षेम भी वहां करने की जिम्मेदारी उसी की है!* हमें तो बस उसके प्रति निष्ठा बनाये रखनी होगी!
जैसे एक पिता के दो पुत्र हो – *एक कपूत दूसरा सपूत!* फिर भी पिता होने के नाते उसे दोनों की ही फिक्र रहेगी!* परंतु किसी भी कार्य अथवा सहयोग में प्राथमिकता सपूत को ही दी जाएगी।

इसी प्रकार हमें अपने सदगुरु के प्रति निष्ठा बनाये रखनी होगी! सुख दुख जीवन में धूप छांया की तरह बने रहते हैं – कभी स्थायी नही रहते! हमें अपने अंदर धैर्य जगाना होगा और यह विश्वास कायम रखना होगा कि *करने कराने वाले कोई और है हम तो निमित्त मात्र हैं!*

*🙏🏼🙏🏾🙏🏽 *सुप्रभात*🙏🙏🏻🙏🏿

हीरे की पहचान

*💐💐हीरे की पहचान💐💐*

एक राजा का दरबार लगा हुआ था,
क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये
राजा का दरवार खुले मे लगा हुआ था.
पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी ..
महाराज के सिंहासन के सामने…
एक शाही मेज थी…
और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थीं.
पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि
सभी दरबार मे बैठे थे
और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे.. ..

उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश माँगा..
प्रवेश मिल गया तो उसने कहा
“मेरे पास दो वस्तुएं हैं,
मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और
अपनी वस्तुओं को रखता हूँ पर कोई परख नही पाता सब हार जाते है
और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ”..
अब आपके नगर मे आया हूँ

राजा ने बुलाया और कहा “क्या वस्तु है”
तो उसने दोनो वस्तुएं….
उस कीमती मेज पर रख दीं..

वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान
आकार, समान रुप रंग, समान
प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था.. … ..

राजा ने कहा ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं.
तो उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तो
एक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न.

इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा
और एक है काँच का टुकडा।

लेकिन रूप रंग सब एक है.
कोई आज तक परख नही पाया क़ि
कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा..

कोइ परख कर बताये की….
ये हीरा है और ये काँच..
अगर परख खरी निकली…
तो मैं हार जाऊंगा और..
यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा.

पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहीं
पहचान पाया तो इस हीरे की जो
कीमत है उतनी धनराशि आपको
मुझे देनी होगी..

इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से…
जीतता आया हूँ..

राजा ने कहा मै तो नही परख सकूगा..
दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते
क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है..
सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पा रहा था.. ..

हारने पर पैसे देने पडेगे…
इसका कोई सवाल नही था,
क्योंकि राजा के पास बहुत धन था,
पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी,
इसका सबको भय था..

कोई व्यक्ति पहचान नही पाया.. ..
आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई
एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा..
उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो…
मैने सब बाते सुनी है…
और यह भी सुना है कि….
कोई परख नही पा रहा है…
एक अवसर मुझे भी दो.. ..

एक आदमी के सहारे….
वह राजा के पास पहुंचा..
उसने राजा से प्रार्थना की…
मै तो जनम से अंधा हू….
फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये..
जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ..
और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं..

और यदि सफल न भी हुआ…
तो वैसे भी आप तो हारे ही है..

राजा को लगा कि…..
इसे अवसर देने मे क्या हर्ज है…
राजा ने कहा क़ि ठीक है..
तो तब उस अंधे आदमी को…
दोनो चीजे छुआ दी गयी..

और पूछा गया…..
इसमे कौन सा हीरा है….
और कौन सा काँच….?? ..
यही तुम्हें परखना है.. ..

उस आदमी ने एक क्षण मे कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच.. ..

जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था
वह नतमस्तक हो गया..
और बोला….
“सही है आपने पहचान लिया.. धन्य हो आप…
अपने वचन के मुताबिक…..
यह हीरा…..
मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ ” ..

सब बहुत खुश हो गये
और जो आदमी आया था वह भी
बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम
कोई तो मिला परखने वाला..

उस आदमी, राजा और अन्य सभी
लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही
जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे
पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच.. ..

उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है मालिक
धूप मे हम सब बैठे है.. मैने दोनो को छुआ ..
जो ठंडा रहा वह हीरा…..
जो गरम हो गया वह काँच…

जीवन मे आप भी देखना…..
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जो बात बात मे गरम हो जाये, उलझ जाये…
वह व्यक्ति “काँच” है।

और

जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे…..
वह व्यक्ति “हीरा” है..!*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

मंदिर का पुजारी

*मंदिर का पुजारी*

एक बार की बात है कि एक समृद्ध व्यापारी , जो सदैव अपने गुरू से परामर्श करके कुछ न कुछ सुकर्म किया करता था, गुरु से बोला-“गुरुदेव, धनार्जन हेतु मैं अपना गाँव पीछे ज़रूर छोड़ आया हूँ, पर हर समय मुझे लगता रहता है कि वहाँ पर एक ऐसा देवालय बनाया जाये जिसमें देवपूजन के साथ-साथ भोजन की भी व्यवस्था हो,अच्छे संस्कारों से लोगों को सुसंस्कृत किया जाये, अशरण को शरण मिले, वस्त्रहीन का तन ढके ,रोगियों को दवा और चिकित्सा मिले ,बच्चे अपने धर्म के वास्तविक स्वरूप से अवगत हो सकें।” सुनते ही गुरु प्रसन्नतापूर्वक बोले-“केवल गाँव में ही क्यों,तुम ऐसा ही एक मंदिर अपने इस नगर में भी बनवाओ।” व्यापारी को सुझाव पसंद आया और उसने ने दो मंदिर, एक अपने गाँव और दूसरा अपने नगर में,जहाँ वह अपने परिवार के साथ रहता था,बनवा दिए |दोनों देवालय शीघ्र ही लोगों की श्रद्धा के केंद्र बन गये।लेकिन कुछ दिन ही बीते थे कि व्यापारी ने देखा कि नगर के लोग गाँव के मन्दिर में आने लगे हैं ,जबकि वहाँ पहुँचने का रास्ता काफी कठिन है।उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है ?

कुछ भारी मन से वह गुरु जी के पास गया और सारा वृत्तांत कह सुनाया |गुरु जी ने कुछ विचार किया और फिर उसे यह परामर्श दिया कि वह गाँव के मंदिर के पुजारी को नगर के मन्दिर में सेवा के लिए बुला ले। उसने ऐसा ही किया नगर के पुजारी को गाँव और गाँव के पुजारी को नगर में सेवा पर नियुक्त कर दिया।कुछ ही दिन बीते थे कि वह यह देखकर स्तब्ध रह गया कि अब गाँव के लोग नगर के मन्दिर की ओर रुख करने लगे हैं। अब तो उसे हैरानी के साथ-साथ परेशानी भी अनुभव होने लगी।बिना एक क्षण की देरी के वह गुरुजी के पास जा कर हाथ जोड़ कर,कहने लगा –“आपकी आज्ञानुसार मैंने दोनों पुजारियों का स्थानांतरण किया लेकिन समस्या तो पहले से भी गम्भीर हो चली है, कि अब तो मेरे गाँव के परिचित और परिजन, कष्ट सहकर और किराया –भाड़ा खर्च करके, नगर के देवालय में आने लगे हैं।मुझसे यह नहीं देखा जाता।”

व्यापारी की बात सुनते ही गुरु जी सारी बात समझ गये और बोले- हैरानी और परेशानी छोड़ो।दरअसल,जो गाँव वाले पुजारी हैं ,उनका अच्छा स्वभाव ही है जो लोग उसी देवालय में जाना चाहते हैं,जहाँ वे होते हैं। उनका लोगों से निःस्वार्थ प्रेम, उनके दुःख से दुखी होना ,उनके सुख में प्रसन्न होना, उनसे मित्रता का व्यवहार करना ही लोगों को उनकी और आकर्षित करता है और लोग स्वतः ही उनकी और खिंचे चले आते हैं।”अब सारी बात व्यापारी की समझ में आ चुकी थी।

*💐💐शिक्षा💐💐*

*मित्रों हमें भी यह बात अच्छे से समझनी चाहिए कि हमारा व्यक्तित्व हमारे बाहरी रंग-रूप से नहीं हमारे व्यवहार से निर्धारित होता है, बिलकुल एक समान ज्ञान और वेश-भूषा वाले दो पुजारियों में लोग कष्ट सह कर भी उसी के पास गए जो अधिक संवेदनशील और व्यवहारी था। इसी तरह हम चाहे जिस कार्य क्षेत्र से जुड़े हों, हमारी सफलता में हमारे व्यवहार का बहुत बड़ा योगदान होता है। हम सभी को इस परम सत्य का बोध होना चाहिए कि इस धरती पर मात्र अपने लिए ही नहीं आये हैं, हमें अपने सुख-दुःख की चिंता के साथ-साथ दूसरों के दुख-सुख को ज़रूर बांटना चाहिए, उनसे मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए ताकि हम जहाँ पर उपस्थित हों, वहाँ पर स्वत: ही एक अच्छा वातावरण बना रहे, और सकारात्मकता की तरंगों से हमारा जीवन-सागर लहलहाता रहे।*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*