गधे की मजार

*गधे की मजार*

एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्‍न हो गयाऔर उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया। बंजारा बड़ा प्रसन्‍न था गधे के साथ। अब उसे पेदल यात्रा न करनी पड़ती थी। सामान भी अपने कंधे पर न ढोना पड़ता था! अब गधे के कारण आराम हैऔर गधा भी बड़ा स्‍वामीभक्‍त था।

कुछ दिनों बाद गधा अचानक बीमार पडा और मर गया। दुःख में उसने उसकी कब्र बनायी और कब्र के पास बैठकर रो ही रहा था कि उसके पास से ही एक राहगीर गुजरा। उस राहगीर ने सोचा कि *जरूर किसी महान आत्‍मा की मृत्‍यु हो गयी है।*

तो वह व्यक्ति भी झुका कब्र के पास। इसके पहले कि बंजारा कुछ कहे! उसने कुछ रूपये कब्र पर चढ़ाये। बंजारे को हंसी भी आई आयी। लेकिन तब तक भले आदमी की श्रद्धा को तोड़ना भी उसे ठीक नहीं लगा और उसे यह भी समझ में आ रहा था कि *यह बड़ा उपयोगी व्‍यवसाय है।*

अब वह हर रोज उसी कब्र के पास बैठकर रोता और यही उसका धंधा हो गया। लोग आते, गांव-गांव खबर फैल गयी कि *किसी महान आत्‍मा की मृत्‍यु हो गयी और इस प्रकार गधे की कब्र किसी पहूंचे हुए फकीर की समाधि बन गयी।*
ऐसे कई वर्ष बीते – *वह बंजारा बहुत धनी हो गया।*

संयोगवश एक दिन जिस सूफी साधु ने उसे यह गधा भेंट किया था। वह भी यात्रा पर था और उस गांव के करीब से गुजरा। उसे भी लोगों ने कहा, *“एक महान आत्‍मा की कब्र है यहां, दर्शन किये बिना मत चले जाना।”*

वह गया! देखा उसने इस बंजारे को बैठा! तो उसने कहा, *यह किसकी कब्र है यहा और तू यहां बैठा क्‍यों रो रहा है?”*

उस बंजारे ने कहा, *“अब आप से क्‍या छिपाना! जो गधा आप ने दिया था। उसी की कब्र है। जीते जी भी उसने बड़ा साथ दिया और मर कर और ज्‍यादा साथ दे रहा है।”*

सुनते ही फकीर खिल खिलाकर हंसाने लगा।

उस बंजारे ने पूछा – *“आप हंसे क्‍यों ?”*

फकीर ने कहा – *“तुम्‍हें पता है। जिस गांव में मैं रहता हूं वहां भी एक पहूंचे हएं महात्‍मा की कब्र है। उसी से तो मेरा भी काम चलता है।”*

बंजारे ने पूछा – *“वह किस महात्‍मा की कब्र है?”*

फकीर ने जवाब दिया- *“वह इसी गधे की मां की!*

जो लोग यह कहते हैं कि *केवल आस्था से ही ईश्वर की भक्ति संभव हैं उन्हें यह नहीं मालूम की बिना आत्मज्ञान के आस्था अन्धविश्वास कहलाती है और आत्मज्ञान समय के सदगुरु के द्वारा ही मिल सकता है!*

पक्का साधक

*💐💐पक्का साधक💐💐*

एक बार एक गुरूजी अपने शिष्यों को भक्ति का उपदेश देते हुए समझा रहे थे कि *बेटा पक्के साधक बनो, कच्चे साधक ना बने रहो।*
कच्चे पक्के साधक की बात सुनकर एक नये शिष्य के मन में सवाल पैदा हुआ!

उसने पूछ ही लिया *“गुरूजी ये पक्के साधक कैसे बनते हैं?”*

गुरूजी मुस्कुराये और बोले – *बेटा सुन एक कहानी!*

एक गाँव में एक हलवाई रहता था। हलवाई हर रोज़ कई तरह की मिठाइयाँ बनाता था, जो एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट होती थी। आस पास के गाँवो में भी हलवाई की बड़ी धाक जमी हुई थी! अक्सर लोग हलवाई की मिठाईयों और पकवानों का आनंद लेने आते थे!

एक दिन हलवाई की दुकान पर एक पति पत्नी आये और उनके साथ उनका छोटा सा बच्चा भी था – जो बहुत ही चंचल था! उसके पिता ने हलवाई को हलवा बनाने का आदेश दिया!

वह दोनों तो प्रतीक्षा करने लगे लेकिन वह बच्चा बार–बार आकर हलवाई से पूछता कि – *“हलवा बन गया क्या?”*
हलवाई कहता – *“अभी कच्चा है, थोड़ी देर और लगेगी।”

वह थोड़ी देर प्रतीक्षा करता और फिर आकर हलवाई को आकर पूछता – *“खुशबू तो अच्छी आ रही है, हलवा बन गया क्या?”*
हलवाई कहता – *“अभी कच्चा है, थोड़ी देर और लगेगी।”*
*एक बार, दो बार, तीन बार उसके ऐसा बार बार पूछने से हलवाई थोड़ा चिढ़ गया!*
उसने एक प्लेट उठाई और उसमें कच्चा हलवा रखा और बोला – *“ले बच्चे खा ले!”*

बच्चे ने हलवा खाया और बोला – *“ये हलवा तो अच्छा नहीं है!”*

हलवाई फौरन बोला – *“अगर अच्छा हलवा खाना है तो चुपचाप जाकर वहाँ बैठ जाओ और प्रतीक्षा करो।”*
इस बार बच्चा चुपचाप जाकर बैठ गया I

*जब हलवा पककर तैयार हो गया तो हलवाई ने थाली में सजा दिया और उन की टेबल पर परोस दिया!*

इस बार जब उस बच्चे ने हलवा खाया तो *उसे बहुत स्वादिष्ट लगा!* उसने हलवाई से पूछा – *“हलवाई काका! अभी थोड़ी देर पहले जब मैंने इसे खाया था, तब तो यह बहुत ख़राब लगा था. अब इतना स्वादिष्ट कैसे बन गया?”*

तब हलवाई ने उसे प्रेम से समझाते हुए कहा – *“बच्चे जब तू ज़िद कर रहा था, तब यह हलवा कच्चा था और अब यह पक गया है! कच्चा हलवा खाने में अच्छा नहीं लगता यदि फिर भी उसे खाया जाये तो पेट ख़राब हो सकता है. लेकिन पकने के बाद वह स्वादिष्ट और पोष्टिक हो जाता है!”*

अब गुरूजी अपने शिष्य से बोले *“बेटा. इस कहानी को सुनने के बाद *कच्चे और पक्के साधक का फर्क समझ में आया कि नहीं?”*

शिष्य हाथ जोड़ कर बोला – *गुरू जी “हलवे के कच्चे और पक्के होने की बात तो समझ आ गई, लेकिन एक साधक के साथ यह कैसे होता है?”*

गुरूजी बोले – *बेटा साधक भी हलवाई की तरह ही है। जिस तरह हलवाई हलवे को आग की तपिश से धीरे धीरे पकाता है उसी तरह साधक को भी स्वयं को निरन्तर साधना से पकाना पड़ता है। जिस तरह हलवे में सभी आवश्यक चीज़ें डालने के बाद भी जब तक हलवा कच्चा है, तो उसका स्वाद अच्छा नहीं लगता!*

उसी तरह एक सेवक भी चाहे कितना ही ज्ञान जुटा ले, कर्मकाण्ड कर ले- *जब तक सिमरन और भजन की अग्नि में नहीं तपता, तब तक वह कच्चा ही रहता है!*

जिस तरह हलवे को अच्छे से पकाने के लिए लगातार उसका ध्यान रखना पड़ता है, उसी तरह साधक को भी अपने मन की चौकीदारी करते रहना चाहिए। जब पकते – पकते हलवे का रँग बदल जाये उसमें से खुशबु आने लगे और उसे खाने में आनन्द का अनुभव हो, तब उसे पका हुआ कहते है।

उसी तरह *जब साधना, साधक और साध्य तीनों एक हो जाये! साधक के अन्दर से प्रेम की खुशबू आने लगे तब समझना चाहिए कि साधक पक्का हो चुका है।*

जब तक सेवक का भजन अभ्यास पक्का न हो जाये, उसे सावधान और सतर्क रहना चाहिए ! क्योंकि *माया बड़ी ठगनी है कभी भी साधक को अपने रास्ते से विचलित कर सकती है।*

अतः *भक्त को निरंतर सिमरन और भजन से खुद को मजबूत बनाना चाहिए!*

*🙏🏿🙏🏽🙏🏼*जय सच्चिदानंद*🙏🏾🙏🏻🙏

सच्चा पारिवारिक सुख – बड़ों के सम्मान में

*सच्चा पारिवारिक सुख – बड़ों के सम्मान में*

पुत्र की उम्र पैंतालीस छूने लगी। पिता पुत्रको व्यापारमें स्वतन्त्रता नहीं देता था, तिजोरी की चाबी भी नहीं। पुत्र के मन में यह बात खटकती रहती थी। वह सोचता था कि यदि मेरा पिता पन्द्रह-बीस वर्ष तक और रहेगा तो मुझे स्वतन्त्र व्यापार करने का कोई अवसर ही नहीं मिलेगा। स्वतन्त्रता सबको चाहिये। मनमें चिढ़ थी, कुढ़न थी। एक दिन वह फूट पड़ी।

पिता-पुत्र में काफी बकझक हुई। सम्पदा का बँटवारा हुआ। पिता अलग रहने लगा। पुत्र अपने बहू-बच्चोंक साथ अलग रहने लगा।

पिता अकेले थे। उनकी पत्नी का देहान्त हो चुका था। किसी दूसरे को सेवा के लिए नहीं रखा; क्योंकि उनके स्वभाव में किसी के प्रति विश्वास नहीं था, यहाँ तक कि पुत्र के प्रति भी नहीं था। वे स्वयं ही अपने हाथ से रुखा-सूखा भोजन बनाकर खा लेते, कभी भूखे सो जाते।

जब उनकी पुत्रवधू को यह बात मालूम पड़ी तो उसे बहुत दु:ख हुआ। आत्मग्लानि भी हुई। उसे बाल्यकाल से ही धर्म का संस्कार था- बड़ोंके प्रति आदर एवं सेवाका भाव था।

उसने अपने पति को मनाने का प्रयास किया, परंतु वे नहीं माने। पिताके प्रति पुत्र के मन में कोई सद्भाव नहीं था। अब बहू ने एक विचार अपने मनमें दृढ़ कर लिया और कार्यान्वित किया।

वह पहले रोटी बनाकर अपने पति-पुत्रको खिलाकर दूकान और स्कूल भेज देती। स्वयं श्वसुरके गृह चली जाती। वहाँ भोजन बनाकर श्वसुरको खिला देती और सायंकाल के लिए पराठे बनाकर रख देती।

कुछ दिनोंतक ऐसा ही चलता रहा। जब पतिको मालूम पड़ा तो उन्होंने रोका- *‘ऐसा क्यों करती हो? बीमार पड़ जाओगी। आखिर शरीर ही तो है, कितना परिश्रम सहेगा!’*

बहू बोली- *‘मेरे ईश्वर के समान आदरणीय श्वसुर भूखे रहें; इससे मुझे बड़ी ग्लानि है। मैं उन्हें खिलाये बिना खा नहीं सकती। भोजन के समय उनकी याद आनेपर मुझे आँसू आने लगते हैं। उन्होंने ही तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया है, तब तुम मुझे पति के रुपमें मिले हो। तुम्हारे मनमें कृतज्ञताका भाव नहीं है तो क्या हुआ; मैं उनके प्रति कैसे कृतघ्न हो सकती हूँ?”*

*पत्नीके सद्भाव ने पति की निष्ठुरता पर विजय प्राप्त कर ली। उसने जाकर पिता के चरण छुये, क्षमा माँगी, घर ले आये- पति-पत्नी दोनों पिताकी सेवा करने लगे। पिता ने व्यापार का सारा भार पुत्रपर छोड़ दिया। वे अब पुत्रके किसी कार्यमें हस्तक्षेप नहीं करते थे।*

*परिवारके किसी भी व्यक्ति में यदि सच्चा सद्भाव हो तो वह सबके मन को जोड़ सकता है। मन का मेल ही सच्चा पारिवारिक सुख है।*

*शुभ प्रभात।*
🙏🎊🙏
*आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*

न्याय प्रिय राजा 

💐💐न्याय प्रिय राजा 💐💐

एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य शनि देव की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ व स्तुति करता था।
एक दिन शनि देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा — “राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। बोलो तुम्हारी कोई इच्छा है?”
प्रजा को चाहने वाला राजा बोला — “भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ है आपकी कृपा से राज्य में सब प्रकार से सुख-शान्ति है। फिर भी मेरी एक ही इच्छा है कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी कृपा कर दर्शन दीजिये।”

“यह तो सम्भव नहीं है” — ऐसा कहते हुए शनि देव ने राजा को समझाया। परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा।
आखिरकार भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा और वे बोले — “ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास ले आना और मैं पहाडी के ऊपर से सभी को दर्शन दूँगा ।”
ये सुन कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और भगवान को धन्यवाद दिया। अगले दिन सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुँचे, वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देंगे। दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।
चलते-चलते रास्ते में एक स्थान पर तांबे के सिक्कों का पहाड दिखा। प्रजा में से कुछ एक लोग उस और भागने लगे। तभी ज्ञानी राजा ने सबको सतर्क किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योंकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो ।
परन्तु लोभ-लालच के वशीभूत प्रजा के कुछ एक लोग तो तांबे के सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग ही गये और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि और चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे, पहले ये सिक्कों को समेट लें, भगवान से तो फिर कभी मिल ही लेंगे ।
राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दूर चलने पर चांदी के सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया । इस बार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस और भागने लगे और चांदी के सिक्कों की गठरी बनाकर अपने घर की ओर चलने लगे। उनके मन में विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिलें न मिलें, भगवान तो फिर कभी मिल ही जायेंगे। इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया। अब तो प्रजा जनों में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस और भागने लगे।
वे भी दूसरों की तरह सिक्कों की गठरीयां लाद-लाद कर अपने-अपने घरों की
ओर चल दिये। अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे —
“देखो कितने लोभी हैं ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं। भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज है..?”
सही बात है — रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे कुछ दूर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगी आभा बिखेरता हुआ हीरों का एक पहाड़ है। अब तो रानी से भी रहा नहीं गया, हीरों के आर्कषण में वह भी दौड पड़ी और हीरों कि गठरी बनाने लगी । फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी । वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये, परंतु हीरों की तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ही ग्लानि और विरक्ति हुई । बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये ।
वहाँ सचमुच भगवान खड़े उनका इन्तजार कर रहे थे । राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये और पूछा — “कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन । मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ ।” राजा ने शर्म और आत्मग्लानि से अपना सर झुका दिया।
तब भगवान ने राजा को समझाया —
“राजन, जो लोग अपने जीवन में भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वह मेरे स्नेह तथा कृपा से भी वंचित रह जाते हैं..!!”

सार
जो जीव अपनी मन,बुद्धि और आत्मा से मेरी शरण में आते हैं, और सर्व लौकिक सम्बंधों को छोड कर मुझको ही अपना मानते हैं वो ही मेरे प्रिय बनते है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

*एक जापानी कथा है।* एक युवक विवाहित हुआ। अपनी पत्नी को ले कर

*एक जापानी कथा है।* एक युवक विवाहित हुआ। अपनी पत्नी को ले कर—समुराई था, क्षत्रिय था—अपनी पत्नी को लेकर नाव में बैठा। दूसरी तरफ उसका गांव था। बड़ा तूफान आया, अंधड़ उठा, नाव डावाडोल होने लगी, डूबने—डूबने को होने लगी। पत्नी तो बहुत घबड़ा गई। मगर युवक शांत रहा। उसकी शांति ऐसी थी जैसे बुद्ध की प्रतिमा हो। उसकी पत्नी ने कहा, तुम शांत बैठे हो, नाव डूबने को हो रही, मौत करीब है! उस युवक ने झटके से अपनी तलवार बाहर निकाली, पत्नी के गले पर तलवार लगा दी। पत्नी तो हंसने लगी। उसने कहा : क्या तुम मुझे डरवाना चाहते हो?

पति ने कहा : तुझे डर नहीं लगता? तलवार तेरी गर्दन पर रखी, जरा—सा इशारा कि गर्दन इस तरफ हो जाएगी।

*उसने कहा : जब तलवार तुम्हारे हाथ में है तो मुझे भय कैसा?*

उसने तलवार वापिस रख ली। उसने कहा : यह मेरा उत्तर है। जब तूफान—आधी उसके हाथ में है तो मैं क्यों परेशान होऊं? डुबाना होगा तो डूबेंगे, बचाना होगा तो बचेंगे। *जब तलवार मेंरे हाथ में है तो तू नहीं घबराती। मुझसे तेरा प्रेम है, इसलिए न! कल विवाह न हुआ था, उसके पहले अगर मैंने तलवार तेरे गले पर रखी होती तो? तो तू चीख मारती। आज तू नहीं घबडाती, क्योंकि प्रेम का एक सेतु बन गया। ऐसा सेतु मेरे और परमात्मा के बीच है, इसलिए मैं नहीं घबड़ाता। तूफान आए, चलो ठीक, तूफान का मजा लेंगे। डूबेंगे, तो डूबने का मजा लेंगे। क्योंकि सब उसके हाथ में है, हम उसके हाथ के बाहर नहीं हैं। फिर चिंता कैसी?*

*चितया दुःखं जायते……।*

*और कोई ढंग से चिंता पैदा नहीं होती, बस चिंता एक ही है कि तुम कर्ता हो। कर्ता हो तो चिंता है, चिंता है तो दुख।*

*इति निश्चयी सुखी शांत: सर्वत्र गलितस्पृह।*

ऐसा जिसने निश्चयपूर्वक जाना, अनुभव से निचोड़ा—वह व्यक्ति सुखी हो जाता है, शांत हो जाता है, उसकी सारी स्पृहा समाप्त हो जाती है।

शिष्य की भूल

*शिष्य की भूल”*

एक महात्मा बहुत ज्ञानी थे! साधना में लीन रहते थे। एक बार एक लड़का उनके पास आया। उसने उनसे अपना चेला बना लेने की पुरजोर प्रार्थना की। महात्मा जी ने सोचा, बुढ़ापा आ रहा है। एक चेला पास में होगा, तो सहारा बनेगा। यह सोचकर उन्होंने उसे चेला बना लिया।

चेला बहुत चंचल प्रकृति का था। ज्ञान-ध्यान में उसका मन नहीं लगता था। दिन-भर आने-जाने वालों से बातें करने और मस्ती करने में उसका समय व्यतीत होता। गुरु ने कई बार उसे समझाने की चेष्टा की पर सफलता नहीं मिली।

एक दिन चेला महात्माजी से बोला – *गुरुदेव ! मुझे कोई चमत्कार सिखा दें।*
गुरु ने कहा, *वत्स ! चमत्कार कोई काम की वस्तु नहीं है। उससे एक बार भले ही व्यक्ति प्रसिद्धि पा ले, लेकिन अंततोगत्वा उसका परिणाम अच्छा नहीं होता।* पर चेला अपनी बात पर अड़ा रहा।

बालहठ के सामने गुरुजी को झुकना पड़ा। उन्होंने अपने झोले में से एक पारदर्शी डंडा निकाला और चेले के हाथ में उसे थमाते हुए कहा, *यह लो चमत्कार। इस डंडे को तुम जिस किसी की छाती के सामने करोगे, उसके दोष इसमें प्रकट हो जाएंगे।* चेला डंडे को पाकर बहुत प्रसन्न हुआ।

गुरु ने चेले के हाथ में डंडा क्या थमाया, मानो बंदर के हाथ में तलवार थमा दी। कोई भी व्यक्ति आश्रम में आता, चेला हर आगंतुक के सीने के सामने उस डंडे को घुमा देता। फलत: उसकी कमजोरियाँ उसमें प्रकट हो जातीं और चेला उनका दुष्प्रचार शुरू कर देता।

गुरुजी सारी बात समझ गए। एक दिन उन्होंने चेले से कहा, *एक बार डंडा अपनी ओर भी घुमाकर देख लो, इससे स्वयं का परीक्षण हो जाएगा कि आश्रम में आ कर अपनी साधना से तुमने कितनी प्रगति की है।*

चेले को बात जंची, उसने फौरन डंडा अपनी ओर किया। लेकिन देखा कि *उसके भीतर तो दोषों का अंबार लगा है। शर्म से उसका चेहरा लटक गया।* वह तत्काल गुरु के चरणों में गिर पड़ा और अपनी भूल की क्षमा मांगते हुए बोला, *आज से मैं दूसरों के दोष देखने की भूल नहीं करूँगा..!!*
*बुरा जो देखन मैं चला. बुरा न मिलिया कोय!*
*जो दिल खोजो आपना, मुझसे बुरा ना कोय!!*
🙏🙏🏾🙏🏼*सुप्रभात*🙏🏿🙏🙏🏻

सेवा भाव

*सेवा भाव*
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*एक बार भगवान अपने एक निर्धन भक्त से प्रसन्न होकर उसकी सहायता करने उसके घर साधु के वेश में पधारे। उनका यह भक्त जाति से चर्मकार था और निर्धन होने के बाद भी बहुत दयालु और दानी प्रवृत्ति का था। वह जब भी किसी साधु-संत को नंगे पाँव देखता तो अपने द्वारा गाँठी गई जूतियाँ या चप्पलें बिना दाम लिए उन्हें पहना देता। जब कभी भी वह किसी असहाय या भिखारी को देखता तो घर में जो कुछ मिलता, उसे दान कर देता। उसके इस आचरण की वजह से घर में अकसर फाका पड़ता था। उसकी इन्हीं आदतों से परेशान होकर उसके माँ-बाप ने उसकी शादी करके उसे अलग कर दिया, ताकि वह गृहस्थी की ज़िम्मेदारियों को समझे और अपनी आदतें सुधारे। लेकिन इसका उस पर कोई असर नहीं हुआ और वह पहले की ही तरह लोगों की सेवा करता रहा। भक्त की पत्नी भी उसे पूरा सहयोग देती थी।*

*ऐसे भक्त से प्रसन्न होकर ही भगवान उसके घर आए थे, ताकि वे उसे कुछ देकर उसकी निर्धनता दूर कर दें तथा भक्त और अधिक ज़रूरतमंदों की सेवा कर सके। भक्त ने द्वार पर साधु को आया देख अपने सामथ्र्य के अनुसार उनका स्वागत सत्कार किया। वापस जाते समय साधू भक्त को पारस पत्थर देते हुए बोले- इसकी सहायता से तुम्हें अथाह धन संपत्ति मिल जायेगी और तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जाएँगे। तुम इसे सँभालकर रखना। इस पर भक्त बोला- फिर तो आप यह पत्थर मुझे न दें। यह मेरे किसी काम का नहीं। वैसे भी मुझे कोई कष्ट नहीं है। जूतियाँ गाँठकर मिलने वाले धन से मेरा काम चल जाता है। मेरे पास राम नाम की संपत्ति भी है, जिसके खोने का भी डर नहीं। यह सुनकर साधु वेशधारी भगवान लौट गए।*

*इसके बाद भक्त की सहायता करने की कोई कोशिशों में असफल रहने पर भगवान एक दिन उसके सपने में आए और बोले-प्रिय भक्त! हमें पता है कि तुम लोभी नहीं हो। तुम कर्म में विश्वास करते हो। जब तुम अपना कर्म कर रहे हो तो हमें भी अपना कर्म करने दो। इसलिए जो कुछ हम दें, उसे सहर्ष स्वीकार करो। भक्त ने ईश्वर की बात मान ली और उनके द्वारा की गई सहायता और उनकी आज्ञा से एक मंदिर बनवाया और वहाँ भगवान की मूर्ति स्थापित कर उसकी पूजा करने लगा।*

*एक चर्मकार द्वारा भगवान की पूजा किया जाना पंडितों को सहन नहीं हुआ। उन्होने राजा से इसकी शिकायत कर दी। राजा ने भक्त को बुलाकर जब उससे पूछा तो वह बोला-मुझे तो स्वयं भगवान ने ऐसा करने को कहा था। वैसे भी भगवान को भक्ति प्यारी होती है, जाति नहीं। उनकी नज़र में कोई छोटा-बड़ा नहीं, सब बराबर हैं।*

*राजा बोला-क्या तुम यह साबित करके दिखा सकते हो? भक्त बोला-क्यों नहीं। मेरे मंदिर में विराजित भगवान की मूर्ति उठकर जिस किसी के भी समीप आ जाए, वही सच्चे अर्थों में उनकी पूजा का अधिकारी है। राजा तैयार हो गया। पहले पंडितों ने प्रयास किए लेकिन मूर्ति उनमें से किसी के पास नहीं आई। जब भक्त की बारी आई तो उसने एक पद पढ़ा-“देवाधिदेव आयो तुम शरना, कृपा कीजिए जान अपना जना।” इस पद के पूरा होते ही मूर्ति भक्त की गोद में आ गई। यह देख सभी को आश्चर्य हुआ। राजा और रानी ने उसे तुरंत अपना गुरु बना लिया।*

*इस भक्त का नाम था रविदास। जी हाँ, वही जिन्हें हम संत रविदास जी या संत रैदास जी के नाम से भी जानते हैं। जिनकी महिमा सुनकर संत पीपा जी, श्री गुरुनानकदेव जी, श्री कबीर साहिब जी, और मीरांबाई जी भी उनसे मिलने गए थे। यहाँ तक कि दिल्ली का शासक सिकंदर लोदी भी उनसे मिलने आया था। उनके द्वारा रचित पदों में से 39 को “श्री गुरुग्रन्थ साहिब” में भी शामिल किया गया है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इन सबके बाद भी संत रविदास जीवन भर चमड़ा कमाने और जूते गाँठने का काम करते रहे, क्योंकि वे किसी भी काम को छोटा नहीं मानते थे। जिस काम से किसी के परिवार का भरण-पोषण होता हो, वह छोटा कैसे हो सकता है।*

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गुरु आज्ञा में न रहने का परिणाम

*🙇‍♂️गुरु आज्ञा में न रहने का परिणाम🙇‍♂️*

एक सेवक ने अपने गुरू जी से विनती की कि, *मैं सत्संग भी सुनता हूँ, सेवा भी करता हूँ, मग़र फिर भी मुझे कोई फल नहीं मिला।*

गुरु जी ने प्यार से पूछा- *बेटा तुम्हे क्या चाहिए ?*
सेवक बोला, *मैं तो बहुत ही ग़रीब हूँ दाता।*_
गुरु जी ने हँस कर पूछा- *बेटा तुम्हें कितने पैसों की ज़रूरत है?*

सेवक ने विनती की कि *आप बस इतना दे दो, कि सिर पर छत हो, समाज में पत (इज्जत) हो।*

गुरु जी ने पूछा *और ज़्यादा की भूख तो नहीं है न बेटा ?*_

सेवक हाथ जोड़ के बोला, *नहीं जी, बस इतना ही बहुत है।*

गुरु ने उसे चार मोमबत्तियां दीं और कहा *मोमबत्ती जला के पूरब दिशा में जाओ! जहाँ ये बुझ जाये, वहाँ खुदाई करके खूब सारा धन निकाल लेना। अगर कोई इच्छा बाकी हो तो दूसरी मोमबत्ती जला कर पश्चिम में जाना। और चाहिए तो उत्तर दिशा में जाना। लेकिन सावधान, दक्षिण दिशा में कभी मत जाना, वर्ना बहुत भारी मुसीबत में फँस जाओगे!*

सेवक बहुत खुश हो कर पूरब की ओर चल पड़ा। जहाँ मोमबत्ती बुझ गई, वहाँ खोदा *तो सोने का भरा हुआ घड़ा मिला।*
*बहुत खुश हुआ और गुरु जी का शुक्राना करने लगा!*

थोड़ी देर बाद, सोचा, थोड़ा और धन माल मिल जाये, फिर आराम से घर जा कर ऐश करूँगा। *मोमबत्ती जलाई पश्चिम की ओर चल पड़ा हीरे मोती मिल गये।*
खुशी बहुत बढ़ गई, मग़र मन की भूख भी बढ़ गई। तीसरी मोमबत्ती जलाई और *उत्तर दिशा में चला वहाँ से भी बेशुमार धन मिल गया।*

सोचने लगा के कि *चौथी मोमबत्ती और दक्षिण दिशा जाने के लिये गुरू जी ने मना किया था। सोचा, शायद वहाँ से भी क़ोई अनमोल चीज़ मिलेगी!*

मोमबत्ती जलाई और चला दक्षिण दिशा की ओर, *जैसे ही मोमबत्ती बुझी वो जल्दी से ख़ुदाई करने लगा। खुदाई की तो एक दरवाजा दिखाई दिया, दरवाजा खोल के अंदर चला गया।* अंदर एक और दरवाजा दिखाई दिया उसे खोल के अन्दर चला गया। अँधेरे कमरे में उसने देखा, *एक आदमी चक्की चला रहा है।*

सेवक ने पूछा, *भाई तुम कौन हो?*
चक्की चलाने वाला बहुत खुश हो कर बोला, *ओह ! आप आ गये?* यह कह कर उसने वो चक्की गुरू के सेवक के आगे कर दी
सेवक कुछ समझ नहीं पाया और सेवक चक्की चलाने लगा।

सेवक ने पूछा, *भाई, तुम कहाँ जा रहे हो? अपनी चक्की सम्भालो!*

उस आदमी ने कहा – *मैने भी अपने गुरु का आदेश नहीं माना था और लालच के मारे यहाँ फँस गया था! बहुत रोया, गिड़गिड़ाया!
तब मेरे गुरु जी ने मुझे दर्शन दिये और कहा था, *बेटा जब कोई तुमसे भी बड़ा लालची यहाँ आयेगा, तभी तुम्हारी जान छूटेगी! आज तुमने भी अपने गुरु का आदेश नहीं माना! *अब भुगतो।*

सेवक बहुत शर्मसार हुआ और रोते रोते चक्की चलाने लगा। वो आज भी इंतज़ार कर रहा है कि *कोई उससे भी बड़ा लालची, पैसे का भूखा आयेगा! तभी उसकी मुक्ति होगी।*
इसलिय,
*गुरु आज्ञा में रहें! खुश रहें! भजन सुमिरन करते रहें!*
गुरु आज्ञा में निश दिन रहिये ।
जो गुरु चाहे सोयि सोयि करिये॥

गुरु चरनन रज मस्तक दीजे ।
निज मन बुद्धि शुद्ध कर लीजे।

आँखिन ज्ञान सुअंजन दीजे ।
परम सत्य का दरशन करिये॥

गुरु आज्ञा में निश दिन रहिये॥

गुरु अँगुरी दृढ़ता से धरिये ।
साधक नाम सुनौका चढिये।

खेवटिया गुरुदेव सरन में ।
भव सागर हँस हँस के तरिये॥

गुरु आज्ञा में निश दिन रहिये॥

गुरु की महिमा अपरम्पार ।
राम धाम में करत विहार।

ज्योति स्वरूप राम दरशन को ।
गुरु के चरन चीन्ह अनुसरिये॥

गुरु आज्ञा में निश दिन रहिये॥
🙏🙏🙏🙏🙏

गृहस्थ बड़ा या सन्यासी

🛑 गृहस्थ बड़ा या सन्यासी🛑

प्राचीन समय की बात है। किसी नगर में एक विचित्र राजा रहता था। उस राजा की एक बड़ी ही अजीब आदत थी। जब भी नगर में कोई साधू या सन्यासी आता था तो वह उसे बुलाकर पूछता था कि – *“गृहस्थ बड़ा या सन्यासी?”*

जो भी बताता कि गृहस्थ बड़ा है। वह राजा उससे कहता था कि – *“तो फिर आप सन्यासी क्यों बने? चलिए गृहस्थ बनिए!”* इस तरह वह उस सन्यासी को भी गृहस्थ बनने का आदेश देता था।

जो बताता कि *सन्यासी बड़ा है।* वह उससे प्रमाण मांगता था। जो यदि वह प्रमाण न दे सके तो *वह उसे भी गृहस्थ बना देता था।* इस तरह कई संत आये और उन्हें सन्यासी से गृहस्थ बनना पड़ा।

इसी बीच एक दिन नगर में एक महात्मा का आगमन हुआ। उसे भी राजा ने बुलाया और अपना वही पुराना प्रश्न पूछा – *“गृहस्थ बड़ा या सन्यासी?”*

महात्मा बोले – *“राजन! न तो गृहस्थ बड़ा है, न ही सन्यासी, जो अपने धर्म का पालन करें। वही बड़ा है।”*

राजा बोला – *“अच्छी बात है। क्या आप अपने कथन को सत्य सिद्ध कर सकते है?”*

महात्मा ने कहा – *“अवश्य! इसके लिए आपको मेरे साथ चलना होगा।”* राजा महात्मा के साथ चलने के लिए तैयार हो गया।

दूसरे ही दिन दोनों घूमते – घूमते दूसरे राज्य निकल गये। उस राज्य में राजकन्या का स्वयंवर हो रहा था। दूर – दूर के राजा – राजकुमार आये हुए थे। बड़े ही विशाल उत्सव का आयोजन किया हुआ था। राजा और महात्मा दोनों उस उत्सव में शामिल हो गये।

स्वयंवर का शुभारम्भ हुआ। राजकन्या राजदरबार में उपस्थित हुई। वह बड़ी ही रूपवती और सुन्दर थी। सभी राजा और राजकुमार स्तब्ध होकर उसे देख रहे थे और मन ही मन उसे पाने की कामना कर रहे थे।

राजकन्या के पिता का कोई वारिस नहीं था। इसलिए महाराज राजकन्या द्वारा स्वयंवरित राजकुमार को ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करने वाला था।

राजकुमारी अपनी सखियों के साथ राजाओं के बीच घुमने लगी। वहाँ उपस्थित सभी राजाओं को देखने के पश्चात भी उसे कोई पसंद नहीं आया। राजा निराश होने लगे। राजकुमारी के पिता भी सोचने लगे कि स्वयंवर व्यर्थ ही जायेगा, क्योंकि राजकुमारी को तो कोई वर पसंद ही नहीं आया।

तभी वहाँ एक तेजस्वी सन्यासी का आगमन हुआ। सूर्य के समान उसका चेहरा कांति से चमक रहा था। *तभी राजकुमारी की दृष्टि उस युवा सन्यासी पर पड़ी। देखते ही राजकुमारी ने अपनी वरमाला उसके गले में पहना दी।*

अचानक हुए इस स्वागत से वह युवा सन्यासी अचंभित हो गया। उसने तुरंत वस्तुस्थिति को समझा और तत्क्षण उस माला को अपने गले से निकालते हुए कहा – *“हे देवी! क्या तुझे दीखता नहीं! मैं एक सन्यासी हूँ। मुझसे विवाह के बारे में सोचना तेरी भूल है।”*

तभी राजा ने सोचा – *“लगता है यह कोई भिखारी है जो विवाह करने से डर रहा है।”* उन्होंने अपनी घोषणा दुबारा दोहराई – *“हे युवक! क्या तुम्हें पता भी है। मेरी पुत्री से विवाह करने के बाद तुम इस सम्पूर्ण राज्य के मालिक हो जाओगे? क्या फिर भी तुम मेरी पुत्री का परित्याग करोगे?”*

सन्यासी बोला – *“राजन! मैं सन्यासी हूँ और विवाह करना मेरा धर्म नहीं है। आप अपनी पुत्री के लिए कोई अन्य वर देखिये।”* इतना कहकर वह वहाँ से चल दिया। किन्तु वह युवक राजकुमारी के मन में बस चूका था। उसने भी प्रतिज्ञा की कि *“मैं विवाह करूंगी तो उसी से अन्यथा अपने प्राण त्याग दूंगी।”* इतना कहकर वह भी उसके पीछे – पीछे चली गई।

वह राजा और महात्मा जो यह वृतांत देख रहे थे। उनमें से महात्मा ने कहा – *“चलो! हम भी उनके पीछे चलकर देखते है, क्या परिणाम होता है?”* वह दोनों भी राजकुमारी के पीछे – पीछे चलने लगे।

चलते चलते वह एक घने जंगल में पहुँच गये। तभी वह युवा सन्यासी तो कहीं अदृश्य हो गया और राजकुमारी अकेली रह गई। घने जंगल में किसी को न देख राजकुमारी व्याकुल हो उठी। तभी यह राजा और महात्मा उसके पास पहुँच गये और उन्होंने राजकुमारी को समझाया। यह दोनों उसे उसके पिता के पास छोड़ने के लिए ले जाने लगे।

वह जंगल से बाहर निकले ही थे कि अँधेरा हो गया। सर्दी की काली अंधियारी रात थी। भटकते – भटकते यह तीनो एक गाँव में पहुंचे। यह गाँव के चौपाल पर जाकर बैठ गये। बहुत सारे लोग वहाँ से गुजरे लेकिन किसी ने इन ठण्ड से ठिठुरते मुसाफिरों का हाल तक नहीं पूछा।

तभी वहाँ से एक गाड़ीवान गुजरा। वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खेत से घर आ रहा था। उसने देखा कि *वह तीनों ठण्ड से ठिठुर रहे है।* वह उनके पास गया और पूछताछ कि *तो महात्मा ने भटके हुए मुसाफ़िर बता दिया।*

किसान बोला – *“हे अतिथिदेव! अगर आप चाहे तो आज रात मेरे घर ठहर सकते है।”* वह उनको घर ले गया। भोजन की पूछी और भोजन करवाया। उस दिन उनके घर में ज्यादा अनाज नहीं था। अतः किसान और उसकी पत्नी ने अपने हिस्से का भोजन अतिथियों को करवा दिया और स्वयं भूखे ही सो गये।

सुबह हुई। राजकन्या को उसके पिता के पास छोड़कर राजा और सन्यासी दोनों वापस अपने नगर को चल दिए।

महात्मा ने राजा से कहा – *“देखा राजा! राजकन्या और राज्य को छोड़ने वाला वह सन्यासी अपनी जगह बड़ा है और हमारे अतिथि सत्कार के लिए स्वयं भूखा सोने वाला वह गृहस्थ किसान अपनी जगह बड़ा है।*

*एक तरफ सन्यासी ने राज, वैभव और रमणी का तनिक भी मोह न करके अपने धर्म का पालन किया है, इसलिए वह निश्चय ही महान है।* *दूसरी तरह उन दंपति ने अपना व्यक्तिगत स्वार्थ न देखकर अतिथिसेवा को प्रधानता दी, इसलिए वह दोनों भी निश्चय ही महान है।”*
इसलिय –
*“ किसी भी देश, काल और परिस्थिति में अपने धर्म – कर्तव्य का पालन करने वाला मनुष्य ही बड़ा होता है। फिर चाहे वह गृहस्थ हो या सन्यासी, कोई फर्क नहीं पड़ता।”*

इस तरह महात्मा ने अपनी बात को सत्य सिद्ध किया।

🙏🙏 जय सच्चिदानंद🙏🙏

अंतरात्मा और उसकी आवाज!

अंतरात्मा और उसकी आवाज!

हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि “हम खुद को ही नहीं जानते”, शायद हम अपनी प्रकृति या मूल स्वभाव को ही नहीं जानते या फिर शायद जानते हुए भी अनजान हैं!

जिस तरह हमें पता है कि पानी का स्वभाव तरल होता है, उसी तरह क्या हमें पता है कि मनुष्य का मूल स्वभाव क्या है? क्या है हमारा मूल स्वभाव? अपने आप को जानना यानी आत्म बोध!

हर व्यक्ति के अन्दर एक शांत शक्ति मौजूद है जिसे हम अपनी अंतरआत्मा कहते हैं! यह अंतरात्मा हर परिस्थति में सही होती है। यह अंतरात्मा हमेशा हमें सही रास्ता दिखाती है।

जब भी हम कुछ गलत कर रहे होते है, तब हमें बड़ा अजीब सा लगता है! जैसे कोई यह कह रहा कि वह कार्य मत करो। यह हमारे अन्दर मौजूद आतंरिक शक्ति ही होती है जो हमें बुरा कार्य करने से रोकती है।

कहा जाता है कि हर मनुष्य के अन्दर ईश्वर का अंश होता है, यह ईश्वर का अंश हमारी अंतरआत्मा ही होती है। हमारी प्रकृति या स्वभाव – शांत, शक्ति, प्रेम, सुख, आनंद, पवित्रता, ज्ञान, सद्भाव, दूसरों की सहायता और अच्छाई है।

हर मनुष्य के अन्दर यह शांत और अद्भुत शक्ति मौजूद है, चाहे वह एक अपराधी हो या संत या और कोई व्यक्ति। लेकिन फिर क्यों एक संत सही मार्ग पर चलता है और अपराधी गलत मार्ग पर?
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संत को अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनाई देती है लेकिन अपराधी को वह आवाज अब सुनाई नही देती।

दरअसल जब हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना कर देते है तो हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो जाता है।

जब हम दूसरी बार कुछ बुरा करने जा रहे होते है तो हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज फिर महसूस होती है लेकिन इस बार वह आवाज इतनी मजबूत नहीं होती क्योंकि हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो चुका होता है।

जैसे जैसे हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना करते जाते है वैसे वैसे हमारा अपनी अंतरात्मा के साथ संपर्क कमजोर होता जाता है और एक दिन ऐसा आता है कि हमें वो आवाज बिल्कुल नहीं सुनाई देती।

जैसे जैसे हमारा अपनी अंतरात्मा के साथ संपर्क कमजोर होता जाता है वैसे वैसे हम उदास रहने लगते है और खुशियाँ भौतिक वस्तुओं में ढूंढने लगते है। हम समस्याओं को हल करने में असक्षम हो जाते है जिससे “तनाव” हमारा हमसफ़र बन जाता है।

इसलिय हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज को कभी अनसुना नहीं करना चाहिय क्योंकि वही सच्ची अन्तः प्रेरणा हमारा मार्गदर्शन करती है और पग-पग पर हमें अशुभ से बचाती है!
सुप्रभात…🙏🌹🎊🎊🌹