सच्चा सुख और आनंद

सच्चा सुख और आनंद

पुराने समय में संत गाँव के लोगों को प्रवचन देते थे! भिक्षा मांगकर अपना जीवनयापन करते थे। एक दिन गाँव की महिला ने एक संत के लिए खाना बनाया। जब संत उस महिला के घर खाना खाने गए तो उस महिला ने पूछा कि, महाराज हमें जीवन में सच्चा सुख और आनंद कैसे मिल सकता है?

इस पर संत ने कहा की इसका जवाब हम आपको कल देंगे।

अगले दिन उस महिला ने संत के लिए खीर बनाई क्योकि वह महिला उन संत से सुख और आनंद के बारे में प्रवचन सुनना चाहती थी।

संत आये और उन्होंने भिक्षा के लिए उस महिला को आवाज दी। महिला संत के लिए खीर लेकर बाहर आई। संत ने खीर लेने के लिए अपना कमंडल आगे किया। महिला खीर डालने ही वाली थी कि उसकी नजर कमंडल के अन्दर पड़ी! तो उसने संत से कहा कि, महाराज आपका कमंडल तो गंदा है, इसमें कचरा पड़ा है! इस पर संत ने कहा- हां कमंडल गंदा है, लेकिन आप खीर इसमें ही डाल दो। महिला ने कहा- नहीं महाराज, ऐसे तो खीर ख़राब हो जाएगी।

आप ऐसा कीजिये ये कमंडल मुझे दीजिये! मैं इसे धोकर साफ कर देती हूं। इस पर संत ने पूछा कि, मतलब, जब तक कमंडल साफ नहीं होगा तो आप इसमें खीर नहीं देगी। उसके बाद महिला ने कहा- जी महाराज, मैं इसे साफ़ करने के बाद इसमें खीर दे दूंगी। तब संत ने कहा, ठीक इसी तरह जब तक हमारे मन में लोभ, क्रोध, मोह, और काम जैसे बुरे विचारो की गंदगी है तो हम उसमें अच्छे उपदेश कैसे डाल सकते हैं? अगर ऐसे दूषित मन में उपदेश डालेंगे भी तो वह अपना असर नहीं दिखा पाएंगे।

इसलिए अच्छे उपदेश सुनने के लिए मन को शांत और पवित्र करना चाहिए। तभी हम ज्ञान की बातें सीख सकते हैं। शांत और पवित्र मन वाले ही सच्चे सुख और आनंद की प्राप्ति कर पाते हैं!

शिक्षा
जब हम अपने मन को सदगुरु से प्राप्त ज्ञान द्वारा शान्त और पवित्र बना लेंगे तभी हम जीवन का सच्चा सुख और आनंद की प्राप्त कर पाएंगे!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।
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एक पुरानी तिब्बती कथा है कि – *दो उल्लू एक वृक्ष पर आ कर बैठे।*

एक पुरानी तिब्बती कथा है कि – *दो उल्लू एक वृक्ष पर आ कर बैठे।*

*एक ने सांप अपने मुंह में पकड़ रखा था।* भोजन था उनका, सुबह के नाश्ते की तैयारी थी। *दूसरा एक चूहा पकड़ लाया था।* दोनों जैसे ही बैठे वृक्ष पर – पास पास आ कर *एक के मुंह में सांप और दुसरे के मुंह में चूहा!*

सांप ने चूहे को देखा तो वह यह भूल ही गया कि – *वह चूहा तो उल्लू के मुंह में है और मौत के करीब है।*

चूहे को देख कर उस सांप के मुंह में रसधार बहने लगी। वह अपनी स्थिति को तो भूल ही गया कि *वह खुद भी तो मौत के मुंह में है।* उसको उसकी अपनी ही जीवेषणा ने पकड़ लिया था।

और दूसरी ओर चूहे ने जैसे ही देखा सांप को देखा – *वह भयभीत हो गया, वह कंपने लगा।* खुद ऐसे मौत के मुंह में बैठा है, मगर *सांप को देख कर कंपने लगा।*

वे दोनों उल्लू बड़े हैरान हुए। एक उल्लू ने दूसरे उल्लू से पूछा कि *भाई, इसका कुछ राज समझे?* दूसरे ने कहा, *बिलकुल समझ में आया।* जीभ की, रस की, स्वाद की इच्छा इस सांप में इतनी प्रबल है कि *इसे अपनी मौत का भी डर नहीं है, सामने मृत्यु खड़ी हो तो भी दिखाई नहीं पड़ती।

और चूहे की स्थिति से यह भी समझ में आया कि *भय मौत से भी बड़ा है।* मौत सामने खड़ी है – उससे यह चूहा भयभीत नहीं है! लेकिन भय से भयभीत है कि *”कहीं सांप हमला न कर दे।’*

आज के मानव का भी यही हाल है – *मौत से वह भयभीत नहीं हैं, वह भय से ज्यादा भयभीत हैं और स्वाद लोभ का, इंद्रियों का, जीवेषणा का
इतना प्रगाढ़ प्रभाव है कि *मौत चौबीस घंटे खड़ी है, तो भी वह कभी दिखाई नहीं पड़ती। उसके बारे में सोचना भी नहीं चाहते!*

इसी हकीकत से रूबरू करने के लिय *समय के सदगुरु आते है और अपने संदेश से मोह नीद में सोये मानव मन को जगाते हैं!*

जब जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा अर्जुन कर लेते हैं कि – *”सूर्यास्त तक नहीं मारा, तो अग्नि समाधि ले लूंगा!”*

जब जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा अर्जुन कर लेते हैं कि – *”सूर्यास्त तक नहीं मारा, तो अग्नि समाधि ले लूंगा!”*

तो, आचार्य द्रोण कमलव्यूह के अंदर जयद्रथ को छुपा देते हैं, जिसका आकर 32 कोस का था। जयद्रथ की सुरक्षा में बड़े-बड़े वीर तैनात थे।

भगवान कृष्ण बोले, *अर्जुन तुम रास्ता साफ करो। मैं रथ ले चलता हूँ। संध्या हो आई, अब भी 12 कोस रह गया।*

कृष्ण रथ से उतर गये! अर्जुन ने पूछा, *”केशव यह क्या?”*

कृष्ण ने कहा – *अश्व थक गये हैं।*
आगे बोलते हुए भगवान कृष्ण जो बोले वह ध्यान देने योग्य है-
*”अर्जुन कदाचित तुमने मेरे उपदेश पर ध्यान नहीं दिया”, जो मैंने युद्ध के शुरू में दिया था! तुम प्रतिज्ञा करने वाले होते कौन हो? तुम तो निमित्त मात्र हो, यदि तुम प्रतिज्ञा न किये होते तो अब तक जयद्रथ को मार देते।*

*तुम्हारा ध्यान एक तरफ सूर्य पर है, दूसरी तरफ जयद्रथ पर। इसलिये तुम्हारे निशाने चूक रहें हैं।* ऐसा लक्ष्य तय कर दिये कि *असफल होने पर तुम्हें ही विनष्ट कर देगा! यह डर ही तुम्हें हरा देगा।”*

भगवान के वचन बड़े सारगर्भित हैं। मुझे नहीं लगता *आज तक किसी ने इतनी सुंदर यथार्थ बात पर ध्यान दिया हो! वर्तमान में भी यह उतना ही सत्य है जितनी तब थी!*

*स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।*
*धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥*
अपने खुद के धर्म से तुम्हें हिलना नहीं चाहिये क्योंकि न्याय के लिये किये गये युद्ध से बढकर एक क्षत्रिय के लिये कुछ नहीं है।

*सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।*
*ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥*
सुख दुख को, लाभ हानि को, जय और हार को एक सा देखते हुए ही युद्ध करो। ऐसा करते हुए, तुम्हें पाप नहीं मिलेगा।

*अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।*
*ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥*
लेकिन यदि तुम यह न्याय युद्ध नहीं करोगे, को अपने धर्म और यश की हानि करोगे और पाप को प्राप्त करोगे।

हमारे जीवन के महाभारत में भी हमारी एकाग्रता इन्ही आवेग-संवेगों के कारण भंग होती रहती है और हम जीवन लक्ष्य को भूल जाते हैं! तभी सौभाग्य से गुरु महाराजी जी पूछते हैं कि *तुमको तुम्हारी जिन्दगी कैसी लगती है?* इतना ही नहीं वे यह दावा करते हैं कि *मैं तुमको तुमसे मिला सकता हूँ!*
इसलिय *कर्ता भाव* को छोड़कर *निमित्त मात्र बनकर कर्तव्य का पालन* करते रहें! तभी हमारा जीवन बोझिल ना होकर हल्का लगने लगेगा!

ज्ञान का अहंकार

ज्ञान का अहंकार
एक समय की बात है! एक घमंडी व्यक्ति शहर से पढ़ लिख कर अपने पुराने गांव आया! गांव और शहर के बीच में एक नदी पड़ती थी जिसको पार करने के बाद ही वह अपने गांव जा सकता था इसलिए उसने एक नाव वाले को बुलाया और उसके नाव में सवार होकर अपने गांव की ओर चल दिया!

कुछ देर चलने के बाद वह घमंड में भरकर नाविक से पूछना लगा– क्या तुमने कभी व्याकरण पढ़ा है?

नाविक कुछ देर के लिए सोच में पड़ गया और फिर बोला ‘नहीं’ साहब मैंने नहीं पढ़ा है!

घमंड और अहंकार से भरे हुए व्यक्ति ने हंसते हुए कहा फिर तो तुमने अपनी आधी जिंदगी व्यर्थ में गंवा दी!

थोड़ी देर बाद अपनी पढ़ाई का और घमंड दिखाने के लिए उस व्यक्ति ने नाविक से फिर पूछा, तुमने इतिहास और भूगोल पढ़ा है?

नाविक ने ना में सिर हिलाते हुए कहा ‘नहीं’ साहब, मैंने वह भी नहीं पढ़ा है!

अहंकारी व्यक्ति ने फिर जोर से ठहाका लगाकर नाविक का मजाक उड़ाते हुए कहा फिर तो तुमने अपना पूरा जीवन व्यर्थ कर दिया!

नाविक को इस बात पर बहुत क्रोध आया लेकिन वह मन मार कर रह गया और उस व्यक्ति से कुछ नहीं बोला चुपचाप नाव चलाने लगा!

कुछ दूर नाव चलाने के बाद अचानक नदी में उफ़ान आ गया और नाव जोर-जोर से हिचकोले खाने लगी!
यह देख कर नाविक ने चेहरे पर छोटी सी मुस्कान के साथ ऊंचे स्वर में उस व्यक्ति से पूछा – ‘साहब’ आपको तैरना भी आता है या नहीं?

व्यक्ति ने कहा– ‘नहीं’ मुझे तैरना नहीं आता है!

तब नाविक ने कहा कि फिर तो आपको अपने इतिहास भूगोल और व्याकरण को सहायता के लिए बुलाना पड़ेगा वरना आपकी सारी उम्र बर्बाद हो जाएगी क्योंकि यह नाव डूबने वाली है!

यह कहकर नाविक नदी में कूद तैरता हुआ किनारे की ओर चला गया!

इसका अभिप्राय यही है कि कभी भी अपने ज्ञान पर व्यर्थ का अहंकार प्रदर्शित नहीं करना चाहिए और किसी को अपने ज्ञान के बल पर नीचा नहीं दिखाना चाहिए! सभी अपनी जगह पर श्रेष्ठ हैं!

वैसे भी कहा है कि विद्या ददाति विनयम विद्या से ही विनम्रता का उद्भव होता है! जो ज्ञान अहंकार दे वह कैसा ज्ञान?

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

दो चींटियों का दृष्टान्त है!

दो चींटियों का दृष्टान्त है!
एक नमक के ढेले पर रहने वाली चींटी की एक मिश्री के ढेले पर रहने वाली चींटी से मित्रता हो गयी ।
मित्रता के नाते वह उसे अपने नमक के ढेले पर ले गयी और कहा–‘खाओ !’

वह बोली–‘क्या खायें,यह भी कोई मीठा पदार्थ है क्या?’ नमक के ढेले पर रहने वाली ने उससे पूछा कि ‘मीठा क्या होता है, इससे भी मीठा कोई पदार्थ है क्या ?’ तब मिश्री पर रहनेवाली चींटी ने कहा– ‘यह तो मीठा है ही नहीं । मीठा तो इससे भिन्न ही जाति का होता है ।’ परीक्षा कराने के लिये मिश्री पर रहने वाली चींटी दूसरी चींटी को अपने साथ ले गयी ।
नमक पर रहने वाली चींटी ने यह सोचकर कि ‘मैं कहीं भूखी न रह जाऊँ’ इसलिय छोटी-सी नमक की डली उसने अपने मुँह में पकड़ ली।

मिश्री के पहाड़ पर पहुँचकर मिश्री मुँह में डालने पर भी उसे मीठी नहीं लगी।
मिश्री पर रहनेवाली चींटी ने पूछा– ‘मीठा लग रहा है न ?’
वह बोली– ‘हाँ-में-हाँ तो कैसे मिला दूँ ? बुरा तो नहीं मानोगी ?
मुझे तो कोई अन्तर नहीं प्रतीत होता है, मुझे वैसा ही स्वाद आ रहा है।’

उस मिश्री पर रहने वाली चींटी ने विचार किया– ‘बात क्या है ? इसे वैसा ही–नमक का स्वाद कैसे आ रहा है !’
उसने मिश्री स्वयं चखा उसे मीठा ही लगा! वह सोचने लगी–‘आखिर बात क्या है !’

उसने पूछा–‘आते समय तुमने कुछ मुँह में रख तो नहीं लिया था ?’

इस पर वह बोली–मैं ‘भूखी न रह जाऊँ,इसलिये छोटा-सा नमक का टुकड़ा मुँह में डाल लिया था।’
उसने कहा– ‘निकालो उसे।’
जब उसने नमक की डली मुँह में से निकाल दी, तब दूसरी ने कहा–‘अब चखो इसे।’
अबकी बार उसने चखा तो वह चिपट गयी। पूछा–‘कैसा लगता है?’
तो वह इशारे से बोली– ‘बोलो मत,बस खाने दो।’
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इसी प्रकार प्रेमियों का भी हाल है! *सत्संग की बातें तो सुनते हैं पर धन, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदि को पकड़े-पकड़े सुनते हैं। अभ्यास करना छोड़कर सब कुछ करते हैं!
अभ्यास करने वाला, ज्ञान का रस लेने वाला उनसे पूछता है– ‘क्यों ! कैसा आनन्द है ?’
तब हाँ-में-हाँ तो मिला देते हैं, पर उन्हें अभ्यास के बिना रस कैसे आये ? सांसारिक कामना और तृष्णारुपी नमक की डली जो मुँह में पड़ी है।*
मन में उद्देश्य तो है धन आदि पदार्थों के संग्रह का, भोगों का और मान-पद आदि का ।*
अत: इनका उद्देश्य न रखकर केवल आंतरिक आनन्द की ओर जाने के लिय अभ्यास करना बहुत जरूरी है!

बिना ध्यान के जीवन में शांति असंभव

🌿बिना ध्यान के जीवन में शांति असंभव🌿

महत्वपूर्ण सवाल अभ्यास से ध्यान का है। मन को स्वांसों की धुन में लीन करके जोर ध्यान पर है। ध्यान का अर्थ है : स्वार्थ, परम स्वार्थ, आत्यंतिक स्वार्थ क्योंकि इस जगत में ध्यान से ज्यादा निजी कोई बात नहीं है। ध्यान का कोई सामाजिक संदर्भ भी नहीं है। ध्यान का अर्थ है : अपने एकांत में उतर जाना, अकेले हो जाना, मौन, शून्य, निर्विचार, निर्विकल्प। उस निर्विचार में, उस निर्विकल्प में आकाश बादलों से आच्छादित नहीं होता और भीतर का सूरज प्रकट होता है। सब जगमग हो जाता है। सब रोशन हो उठता है। फिर तुम्हारे भीतर प्रेम के फूल खिलते हैं, आनंद के झरने फूटते हैं, शांति के रस की धाराएं बहती हैं। फिर इसे बांटो और बांटना ही पड़ेगा। इसी बांटने को मानवता के प्रति समर्पित होकर परोपकार कहते हैं।

जिसके जीवन में ध्यान नहीं है, वह तो दूसरे को सताएगा और अवश्य सताएगा ही। अपरिहार्यरूपेण सताएगा। क्यों? क्योंकि जो खुद दुखी है, वह दुख ही बांट सकता है। गैर-ध्यानी दुखी होगा ही, नहीं तो कोई ध्यान तलाशे क्यों? अगर बिना ध्यान के जीवन में शांति हो सकती तो शांति कभी की हो गई होती। बिना ध्यान के जीवन में शांति होती ही नहीं है। ध्यान के बिना शांति का बीज टूटता ही नहीं, अंकुरण ही नहीं होता। फूल तो लगेंगे कैसे और फल आएंगे कैसे? ध्यान तो शांति के बीजों को बोना है। ध्यान में जैसे ही मन स्वांसों के साथ एकाकार होता है तो शांति के बीज का अंकुरण हो जाता है और शांति के फूल आ जाते हैं। तभी भीतर से शांति की खुशबू चारों ओर फैल जाती है।

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त “श्री कृष्ण” ने अर्जुन को समजाते हुए कहते हैं कि

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त “श्री कृष्ण” ने अर्जुन को समजाते हुए कहते हैं कि : हे पार्थ, तराजू पर पैर संभलकर रखना, संतुलन बराबर रखना, लक्ष्य मछली की आंख पर ही केंद्रित हो – उसका खास खयाल रखना।
तो अर्जुन ने कहा : “हे प्रभु” सबकुछ अगर मुजे ही करना है, तो फिर आप क्या करोगे ??

वासुदेव हंसते हुए बोले : हे पार्थ, जो आप से नहीं होगा वह में करुंगा।
पार्थ ने कहा : प्रभु ऐसा क्या है जो मैं नहीं कर सकता?

वासुदेव फिर हंसे और बोले : जिस अस्थिर, विचलित, हिलते हुए पानी में तुम मछली का निशाना साधोगे, उस विचलित “पानी” को स्थिर “मैं” ही रखूँगा!

कहने का तात्पर्य यह है कि आप चाहे कितने ही निपुण क्यूँ ना हों, कितने ही बुद्धिमान क्यूँ ना हों, कितने ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हों, लेकिन आप स्वयं हरएक परिस्थिति के उपर पूर्ण नियंत्रण नहीँ रख सकते! आप सिर्फ अपना प्रयास कर सकते हैं, लेकिन उसकी भी एक सीमा है।

और जो उस सीमा से आगे की बागडोर संभालता है – उसी का नाम “भगवान” है!

सत्संग का फल

सत्संग का फल

एक था मजदूर। मजदूर तो था, साथ-ही-साथ किसी संत महात्मा का प्यारा भी था। सत्संग का प्रेमी था।
उसने शपथ खाई थी! मैं उसी का बोझ उठाऊँगा, उसी की मजदूरी करूँगा, जो सत्संग सुने अथवा मुझे सुनाये.
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प्रारम्भ में ही यह शर्त रख देता था। जो सहमत होता, उसका काम करता।
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एक बार कोई सेठ आया तो इस मजदूर ने उसका सामान उठाया और सेठ के साथ वह चलने लगा।
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जल्दी-जल्दी में शर्त की बात करना भूल गया। आधा रास्ता कट गया तो बात याद आ गई।
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उसने सामान रख दिया और सेठ से बोला:- “सेठ जी ! मेरा नियम है कि मैं उन्हीं का सामान उठाऊँगा, जो कथा सुनावें या सुनें। अतः आप मुझे सुनाओ या सुनो।
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सेठ को जरा जल्दी थी। वह बोला- “तुम ही सुनाओ।” मजदूर के वेश में छुपे हुए संत की वाणी से कथा निकली।

मार्ग तय होता गया। सेठ के घर पहुंचे तो सेठ ने मजदूरी के पैसे दे दिये। मजदूर ने पूछा:- “क्यों सेठजी ! सत्संग याद रहा ?”
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“हमने तो कुछ सुना नहीं। हमको तो जल्दी थी और आधे रास्ते में दूसरा कहाँ ढूँढने जाऊँ ? इसलिए शर्त मान ली और ऐसे ही ‘हाँ… हूँ…..’ करता आया। हमको तो काम से मतलब था, कथा से नहीं।”
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भक्त मजदूर ने सोचा कि कैसा अभागा है ! मुफ्त में सत्संग मिल रहा था और सुना नहीं !
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यह पापी मनुष्य की पहचान है। उसके मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे.
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अचानक उसने सेठ की ओर देखा और गहरी साँस लेकर कहा:- “सेठ! कल शाम को सात बजे आप सदा के लिए इस दुनिया से विदा हो जाओगे।
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अगर साढ़े सात बजे तक जीवित रहें तो मेरा सिर कटवा देना।”
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जिस ओज से उसने यह बात कही, सुनकर सेठ काँपने लगा।
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भक्त के पैर पकड़ लिए। भक्त ने कहा:- “सेठ! जब आप यमपुरी में जाएँगे तब आपके पाप और पुण्य का लेखा जोखा होगा, हिसाब देखा जाएगा।
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आपके जीवन में पाप ज्यादा हैं, पुण्य कम हैं। अभी रास्ते में जो सत्संग सुना, थोड़ा बहुत उसका पुण्य भी होगा।
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आपसे पूछा जायेगा कि कौन सा फल पहले भोगना है ? पाप का या पुण्य का ?
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तो यमराज के आगे स्वीकार कर लेना कि पाप का फल भोगने को तैयार हूँ पर पुण्य का फल भोगना नहीं है, देखना है।
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पुण्य का फल भोगने की इच्छा मत रखना।
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मरकर सेठ पहुँचे यमपुरी में। चित्रगुप्तजी ने हिसाब पेश किया।
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यमराज के पूछने पर सेठ ने कहा:- “मैं पुण्य का फल भोगना नहीं चाहता और पाप का फल भोगने से इन्कार नहीं करता।
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कृपा करके बताइये कि सत्संग के पुण्य का फल क्या होता है ? मैं वह देखना चाहता हूँ।”
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पुण्य का फल देखने की तो कोई व्यवस्था यमपुरी में नहीं थी। पाप- पुण्य के फल भुगताए जाते हैं, दिखाये नहीं जाते।
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यमराज को कुछ समझ में नहीं आया। ऐसा मामला तो यमपुरी में पहली बार आया था।
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यमराज उसे ले गये धर्मराज के पास। धर्मराज भी उलझन में पड़ गये।
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चित्रगुप्त, यमराज और धर्मराज तीनों सेठ को ले गये। सृष्टि के आदि परमेश्वर के पास ।
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धर्मराज ने पूरा वर्णन किया। परमपिता मंद-मंद मुस्कुराने लगे। और तीनों से बोले:- “ठीक है. जाओ, अपना-अपना काम सँभालो।”
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सेठ को सामने खड़ा रहने दिया। सेठ बोला:- “प्रभु ! मुझे सत्संग के पुण्य का फल भोगना नहीं है, अपितु देखना है।”
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प्रभु बोले:- “चित्रगुप्त, यमराज और धर्मराज जैसे देव आदरसहित तुझे यहाँ ले आये और तू मुझे साक्षात देख रहा है,
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इससे अधिक और क्या देखना है ?”
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एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी सत्संग साध की, हरे कोटि अपराध।।
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जो चार कदम चलकर के सत्संग में जाता है, तो यमराज की भी ताकत नहीं उसे हाथ लगाने की।
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सत्संग-श्रवण की महिमा इतनी महान है. सत्संग सुनने से पाप-ताप कम हो जाते हैं। पाप करने की रूचि भी कम हो जाती है। बल बढ़ता है दुर्बलताएँ दूर होने लगती हैं।

तुम कभी न भर पाओगे

*☘ तुम कभी न भर पाओगे l ☘*

एक साधु ने एक सम्राट के द्वार पर दस्तक दी । सुबह का वक़्त था और सम्राट बगीचे में घूमने निकला था । संयोग की बात सामने ही सम्राट मिल गया । *साधु ने अपना पात्र उसके सामने कर दिया सम्राट ने कहा क्या चाहते हो ??*
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साधु ने कहा कुछ भी दे दो *“शर्त एक हैं”* मेरा पात्र पूरा भर जाएं । में थक गया हूँ, यह पात्र भरता ही नहीं । *सम्राट हंसने लगा और कहा* तुम पागल मालुम होते हो । पागल न होते तो, साधु ही क्यों होते, *यह छोटा सा पात्र भरता नहीं ?*… फिर सम्राट ने अपने मंत्री से कहा लाओ स्वर्ण-अशर्फियों से भर दो, इस साधु का मुंह सदा के लिए बंद कर दो । *साधु ने कहा में फिर याद दिला दू की भरने की कोशिश अगर आप करते हैं तो यह शर्त है की जब तक भरेगा नहीं पात्र में हटूंगा नहीं ।*
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*सम्राट ने कहा तू घबरा मत पागल भर देंगे ।* सोने से भर देंगे, हीरे जवाहरात से भर देंगे । *लेकिन जल्द ही सम्राट को अपनी भूल समझ में आ गई अशर्फियां डाली गई और खो गई । हीरे डालें गयें और खो गयें ।* लेकिन सम्राट भी जिद्दी था और फिर साधु से हार माने यह भी तो जंचता न था । सारी राजधानी में खबर पहुंच गई हजारों लोग इकट्ठे हो गए ।

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सम्राट अपना खजाना उलीचता गया । उसने कहा आज दांव पर लग जाना हैं सब डूबा दूंगा मगर उसका पात्र भरूंगा । शाम हो गई । सूरज ढलने लगा । सम्राट के कभी खाली न होने वाले खजाने खाली हो गए लेकिन पात्र नहीं भरा सो नहीं भरा । *वह गिर पड़ा साधु के चरणों में और कहा मुझे माफ़ कर दो । मेरी अकड़ मिटा दी अच्छा किया ।* में तो सोचता था यह अक्षत खजाना है, लेकिन यह तेरे छोटे से पात्र को भी न भर पाया । *बस अब एक ही प्रार्थना है में तो हार गया मुझे क्षमा कर दो ।* मेने व्यर्थ ही तुझे आश्वासन दिया था भरने का।
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*मग़र जाने से पहले एक छोटी सी बात मुझे बताते जाओ ।* दिन भर यही प्रश्न मेरे मन में उठेगा । *यह पात्र क्या है, किस जादू से बनाया है ।*
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साधु हंसने लगा उसने कहा किसी जादू से नहीं *‘इसे आदमी के ह्रदय से बनाया गया है । न आदमी का ह्रदय भरता है न यह पात्र भरता है ।’*
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*इस जिंदगी में कोई और चीज तुम्हे छका न सकेगी। तुम्हारा पात्रा खाली का खाली रहेगा। कितना ही धन डालो इसमें खो जाएगा । कितना ही पद डालो इसमें खो जायेगा, पात्र खाली का खाली ही रहेगा। तुम भरोगे नहीं। भरता तो आदमी तो केवल परमात्मा से हैं। क्योंकि अनंत है हमारी प्यास, अनन्त है हमारा परमात्मा तो अनंत को अनंत ही भर सकेगा।*

*उस अनंत को, असीम को जीते जी जानना – जो हमारे ही अन्दर है – बहुत ही आवशयक है!*
*यह तभी सम्भव है जब हम समय के सद्गुरु से वह आत्मबोध प्राप्त करें – जिससे हमारे ही ह्रदय स्थित असीम से हमारा सम्पर्क बन सके!*

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साहस की जरूरत

🏵️ *”साहस की जरूरत”*🏵️

सरल मनुष्य परमात्मा से ज्यादा दिन दूर नहीं रह सकता | उसे अपने परमपिता परमात्मा की निकटता अवश्य मिलती है | बस एक बार उसे स्पष्ट रूप से अपने व्यक्तित्व का बोध हो जाना चाहिए |
उसे पता चल जाना चाहिए कि *मेरे भीतर क्या है और क्या नहीं है ?*

संत महापुरुषों के वचन हैं कि *अपने व्यक्तित्व का अनुभव आपको स्वयं ही प्राप्त करना होता है | यह कोई दूसरा तुम्हें नहीं बता सकता | यह स्वयं ही निरीक्षण करोगे तो स्थिति दिखाई पड़ेगी अपनी| निरीक्षण तभी सफल होगा, जब तुम अपने को धोखा देने की कोशिश ना करो| अगर निरंतर स्वयं को धोखा देते रहोगे, तो बड़ी कठिनाई होगी आपको!*

यह याद रखना कि *जीवन में सरलता आते ही सब कठिनाइयां खुद ही भाग जाती हैं!*
हमारे संतो ने कहा है कि *इतनी सरलता होनी चाहिए, इतनी मानवता होनी चाहिए, इतनी विनम्रता होनी चाहिए, इतना मुक्त मन होना चाहिए कि हम अपनी बुराइयों को स्वयं ही देख सकें! अपने सही व्यक्तित्व को जान कर उसे झूठा व्यक्तित्व ना होने देने का साहस कर सकें|*

नहीं तो कई लोग अभिनेता हो जाते हैं | दिखावेबाजी करने वाले प्रदर्शनकारी बन जाते हैं| जो परमात्मा ने उनके भीतर नहीं डाला होता, वह अपने ऊपर ओढ़ लेते हैं|
ऐसा करके तो कुछ साधु लोग भी अपने चित्त को जटिल व कठिन बना लेते हैं | उनके भीतर कुछ होता है, बाहर कुछ और दिखाते हैं!
*अपनी इस स्थिति को उघाड़ कर देखने का साहस करना होगा हमें!*
तब देखते ही पीड़ा का अनुभव होगा और स्वयं को बदलने का विचार आएगा| जिंदगी में परिवर्तन लाकर सदशिष्य बनने के विचार उठेंगे |

फलस्वरूप *जीवन में सरलता, शांति, प्रेम, ध्यान, मैत्री और सहयोग के भाव आने शुरू होने लगेंगे! फिर हमें ओढ़ा हुआ झूठ छुपाने की जरूरत नहीं पड़ेगी|*

सद्गुरु की कृपा से इतनी धन्यता आएगी जीवन में कि *स्वयं को परम सत्य के निकट पाएंगे हम| जीवन में सरलता आते ही सद्गुरु भी हमारे अंग संग हो जाते हैं!*
🙏🙏🙏