Dharmendra’s films that will be remembered

धर्मेंद्र की वो फिल्में जो याद रहेगी

  1. बंदिनी (1963)

बिमल रॉय की यह कृति धर्मेंद्र की शुरुआती महत्त्वपूर्ण फिल्मों में से एक है। इसमें वह जेल के डॉक्टर की भूमिका में थे, जो कल्याणी (नूतन) से हमदर्दी और प्रेम करता है। यह एक सहयोगी भूमिका थी, पर इसने उनकी सभ्य और आकर्षक रोमांटिक हीरो की छवि को मजबूत किया था।

  1. हकीकत (1964)

चेतन आनंद द्वारा निर्देशित इस फिल्म को भारतीय सिनेमा की बेहतरीन सामरिक फिल्मों में गिना जाता है। इस फिल्म में उन्होंने एक बहादुर सेना अधिकारी का सशक्त किरदार निभाया था। यह एक मल्टी स्टारर फिल्म थी। इसकी कहानी 1962 के भारत-चीन युद्ध पर आधारित थी।

  1. अनुपमा (1966)

हृषिकेश मुखर्जी की यह फिल्म अपने सादे व गहरे मानवीय भावों, मधुर संगीत और उत्कृष्ट अभिनय के लिए जानी जाती है। धर्मेंद्र और शर्मिला टैगोर की इस फिल्म में धर्मेंद्र के एक्शन या रोमांटिक अंदाज से ज्यादा उनकी शांत, गंभीर, सौम्य और आकर्षक छवि को पसंद किया गया।

  1. सत्यकाम (1969)

हृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित इस फिल्म में संजीव कुमार भी एक अहम भूमिका में थे, लेकिन यह फिल्म सत्यप्रिय आचार्य के रूप में धर्मेंद्र के भावपूर्ण अभिनय के लिए याद की जाती है। इस फिल्म में धर्मेंद्र अभिनय की जिस ऊंचाई पर पहुंचे थे, उस ऊंचाई पर न तो कभी पहले पहुंचे थे और न कभी बाद में पहुंच सके। इस बात को धर्मेंद्र ने भी अनेक बार स्वीकार किया।

  1. शोले (1975)

भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित और सबसे सफल फिल्मों में से एक। रमेश सिप्पी की इस फिल्म में धर्मेंद्र ने वीरू का यादगार किरदार निभाया था। वीरू का शरारती अंदाज, बसंती (हेमा मालिनी) के साथ उनकी केमिस्ट्री और जय-वीरू की दोस्ती को दर्शकों का खूब प्यार मिला। ‘बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना’ और ‘सुसाइड’ जैसे संवाद लोगों की जुबान पर चढ़ गए। इस फिल्म ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।

  1. Bandini (1963)

This Bimal Roy film is one of Dharmendra’s most important early films. In it, he played the prison doctor who sympathizes with and falls in love with Kalyani (Nutan). It was a supporting role, but it cemented his image as a gentle and charming romantic hero.

  1. Haqeeqat (1964)

Directed by Chetan Anand, this film is considered one of the finest action films in Indian cinema. In this film, he played a powerful role of a brave army officer. It was a multi-starrer, based on the 1962 India-China war.

  1. Anupama (1966)

This Hrishikesh Mukherjee film is known for its simple and deep human emotions, melodious music, and excellent acting. Starring Dharmendra and Sharmila Tagore, Dharmendra’s calm, serious, gentle, and charming image was appreciated more than his action or romantic style.

  1. Satyakam (1969)

Directed by Hrishikesh Mukherjee, this film also featured Sanjeev Kumar in a key role, but it is remembered for Dharmendra’s soulful performance as Satyapriya Acharya. Dharmendra reached acting heights in this film that he had never reached before, nor could he reach again. Dharmendra himself acknowledged this many times.

  1. Sholay (1975)

One of the most iconic and most successful films in Indian cinema. Dharmendra played the memorable character of Veeru in this Ramesh Sippy film. Veeru’s mischievous nature, his chemistry with Basanti (Hema Malini), and the friendship between Jai and Veeru were well-received by audiences. Lines like “Basanti, don’t dance in front of these dogs” and “Suicide” became popular. This film brought him international recognition.

Dharmendra’s songs will always be heard

धर्मेंद्र पर फिल्माए गीत, जो सदा सुने जाएंगे

  1. या दिल की सुनो दुनिया वालों (अनुपमा, 1966)
  2. पल पल दिल के पास (ब्लैकमेल 1973)
  3. ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे (शोले 1975)
  4. कोई हसीना जब रूठ जाती है (शोले 1975)
  5. मैं ज़ट यमला पगला दीवाना (प्रतिज्ञा 1975)
  6. आज मौसम बड़ा बेईमान है (लोफर 1973)
  7. झिलमिल सितारों का आंगन होगा (जीवन मृत्यु 1970)
  8. हुई शाम उनका खयाल आ गया (मेरे हमदम मेरे दोस्त, 1968)
  1. Ya Dil Ki Suno Duniya Walon (Anupama, 1966)
  2. Pal Pal Dil Ke Paas (Blackmail, 1973)
  3. We Will Not Break This Friendship (Sholay, 1975)
  4. When a Beautiful Woman Gets Angry (Sholay, 1975)
  5. Main Zat Yamla Pagal Deewana (Pratigya, 1975)
  6. Today the Weather Is Very Dishonest (Loafer, 1973)
  7. The Courtyard Will Be Full of Twinkling Stars (Jeevan Mrityu, 1970)
  8. As the evening approaches, I think of her (Mere Hamdum Mere Dost, 1968)

Dharmendra’s Importance

धर्मेंद्र का महत्व

अभिनेता धर्मेंद्र की इस संसंसार में एक युग के अधन की तरह है। 1960 के दशक में उभरे एक ऐसे कलाकार नायक थे, जो भारतीय समाज में अपनी अलहदा पहचान की मजा से किंवदंती बन गए थे। हारों की बोलचाल में एक मुहावरे की तरह शुमार हो गए थे, ‘अरे क्या मेंदर बन रहे हो? धर्मेटर बनने कर मतलब बलवान यासीनो यथा। एक दौर का भी था, जब लड़कों में धर्मेंद्र और लड़कियों में हेमा मालिनी का बना दूंदा जाता था। न जाने कितने युवाओं ने उनका अनुकरण किया। हालांकि, स्वर्ग वह दिलीप कुमार का अनुकरण करते हुए फिल्मों में आए थे। हम जिसे बॉलीवुड कहते हैं, उसमें उनका डंका पचास साल पहले भी बजता था। विशेष रूप से राज कपूर के बाद उन्हें सिनेमा की दुनिया में एक ऐसी ताकत के रूप में देखा जाता था, जिन्हें कोई भी चुनौती नहीं देता था। यही कारण है, राजनीति में भी स्टार प्रचारक के रूप में उनकी हमेशा पूछ रही और सांसद के रूप में वह अपना एक इतिहास छोड़ गए। उन्होंने 89 वर्ष लंबा जो भरपूर जीवन जिया, वाह एक मिसाल है। दुनिया देख रही है, खाली हाथ बस एक ख्वाब लिए मुंबई पहुंचा युवक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की आर्थिक विरासत छोड़ गया है।

ध्यान रहे, देश की आजादी के बाद जो सिनेमाई समाज बना, उसने * धर्मेंद्र पंजाबी तरबियत के सबसे प्रभावी प्रतिनिधि थे, जैसे अमिताभ बच्चन उत्तर भारतीय तहजीब के प्रतिनिधि। भारत के दोनों प्रतिनिधि जब साथ आए, तभी शोले जैसी धर्मेंद्र को फिल्मों सात्यकाम, वह हकीकत, धर्मवीर, बंदिनी, शोले को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनको कुछ ऐसी खूबियां हैं, जिनको वजह से उन्हें पहचान मिली और जिनको वजह से उन्हें हमेशा याद किया जाना चाहिए। अव्वल तो वह एक मदांना छवि वाले अभिनेता थे। ऐसी छवि में उनके पिता का बहुत योगदान था। बहुत कामयाब हो गए थे, किंतु वह अपने पिता के अनुशासन से बाहर नहीं निकले। धर्मेंद्र को हमेशा यह एहसास रहा कि उन्हें कोई ऐसा काम नाहीं करना है, जिससे उनके पिता को दुख हो। यही वजह है कि जब उनके पिता ने अपने पुत्र को धर्मवीर फिल्म में एक बलवान योद्धा के रूप में देखा, तो बहुत प्रसन्न हुए।

सहज मानवीय पारिवारिकता हो थी, जो धर्मेंद्र को संवेदनशील फिल्म निर्देशकों का चहेता बनाती थी।

धर्मेंद्र की यह दूसरी बड़ी खूबी रही कि उन्होंने परिवार के महत्व को कभी घटने नहीं दिया। यही वजह है कि दो-दो विवाह के बावजूद उनके विशाल परिवार में कभी दरार नहीं दिखी।

तीसरी खूबी उनकी व्यवहार-कुशलाता है, जिसकी वजह से धर्मेंद्र को सबका प्यार मिला। अपनत्व और मिलनसारिता की इसी भावना की वजह से उनके फिल्मी किरदार भी कुछ अतिरिक्त भाव प्रबलता से भर उठते थे।

चौथी खूबी, उनका चेहरा अभिनय के हिसाब से उबर था, जिस पर रोमांस की रेखाएं जितनी खूबसूरती से उभरती थीं उतनी ही मुखरता से कोष का भाव भी उभरता था। हालांकि बाद के दिनों में कोध की अभिव्यक्ति का कुकुरो, मैं तेरा खून पी संकेमुड़ गए। पात्रों खूबी यह कि उनमें मस्ताना भावा हास्य सामान्य रूप से सजता था। उनको हास्य क्षमता का भी अनेक फिल्मों में प्रयोग हुआ। एक्शन होगे जो उनके पहले भी हुए थे. पर एक्शन को जैसी स्वाभाविकता के साथ मुख्यधारा में लाने की शुरुआत धर्मेंद्र ने की, उसे हम भूल न पाएंगे।

धर्मेंद्र भारतीयों की बोलचाल में एक मुहावरे की तरह शुमार हो गए थे, ‘अरे, क्या धर्मेंदर बन रहे हो?’ धर्मेंदर बनने का मतलब बलवान या साहसी होना हो गया था।

Actor Dharmendra’s place in this world is like the dawn of an era. He was an artist-hero who emerged in the 1960s, becoming a legend in Indian society through his unique identity. A common saying became, “Hey, are you becoming a mandarin?” “Dharmendra,” he said, “means you’re becoming a strong man.” There was a time when boys were enamored with Dharmendra, and girls with Hema Malini. Countless young men emulated them. However, he entered the film industry following Dilip Kumar’s example. His stature in what we now call Bollywood was still resonant fifty years ago. Especially after Raj Kapoor, he was seen as a force to be reckoned with in the world of cinema. This is why, in politics, he was always sought after as a star campaigner, and as a Member of Parliament, he left a legacy of his own. He lived a fulfilling life spanning 89 years, a truly exemplary example. The world is watching: a young man who arrived in Mumbai empty-handed, with just a dream, has left behind a financial legacy of over a thousand crore rupees.

Remember, in the cinematic society that emerged after India’s independence, Dharmendra was the most influential representative of Punjabi culture, just as Amitabh Bachchan represented North Indian culture. When these two representatives of India came together, Dharmendra was given films like Sholay, Satyakam, Woh Haqeeqat, Dharamveer, Bandini, and Sholay. These films will never be forgotten. He possessed certain qualities that earned him recognition and for which he should always be remembered. First, he was an actor with a sensual image, a legacy his father contributed greatly to. He became very successful, but he never deviated from his father’s discipline. Dharmendra always felt that he should not do anything that would upset his father. This is why his father was overjoyed when he saw his son as a powerful warrior in the film Dharamveer.

It was his natural, humane family spirit that endeared Dharmendra to sensitive film directors.

Dharmendra’s second major quality was that he never allowed the importance of family to diminish. This is why, despite two marriages, there was never a rift in his large family.

The third quality was his social skills, which earned him everyone’s love. This sense of belonging and friendliness lent his film roles an extra emotional intensity.

The fourth quality was his face, which was well-suited for acting, conveying romantic expressions as beautifully as the emotion of the body. However, in later years, the expression of anger in films like “Kukuro” and “Main Tera Khoon Pee Sankemud” (I Am Drunk), was lost. His speciality was that he possessed a playful, intoxicating sense of humor. His comedic abilities were also utilized in many films, including action films that had been produced before. But we will never forget the natural way Dharmendra introduced action into the mainstream.

Dharmendra became a common saying in Indian parlance: “Hey, are you becoming Dharmendra?” Becoming Dharmendra came to mean being strong or courageous.

Our country’s success depends on children.

हमारे देश की सफलता बच्चों पर निर्भर

बच्चों के कल्याण के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू कितने प्रतिबद्ध थे, उसी का सम्मान करने के लिए दिन है बाल दिवस। इसी दिन पंडित नेहरू का जन्म हुआ था। यह दिन हमें बच्चों की बेहतरी की याद दिलाता है। यह बताता है कि उनको शिक्षा, पालन-पोषण और सुरक्षित वातावरण के लिए और क्या किया जाना चाहिए। बच्चे राष्ट्र की संपत्ति होते हैं और अपनी संपत्ति को हर कोई संभालकर रखना चाहता है। यहां तक कि उसे और समृद्ध बनाना चाहता है। हम भी आजाद नागरिक के तौर पर अपने भविष्य को, यानी बच्चों को समृद्ध बनाना चाहते हैं। जाहिर है, यह समृद्धि उसे ज्ञान से, पोषण से और सुरक्षित वातावरण से मिल सकती है। यही कारण है कि यह दिन कमियां गिनाने का नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाने के संकल्प का होना चाहिए। वास्तव में, भारत में बच्चों की बेहतरी के लिए कई काम हुए हैं। उनके लिए शिक्षा की अच्छी व्यवस्था की गई है, जिस कारण स्कूल छोड़ने की दर कम हुई है। विशेष तौर पर माध्यमिक स्तर तक शत-प्रतिशत नामांकन की ओर हम बढ़ चुके हैं और यहां से स्कूल छोड़ने की दरें भी काफी कम हो गई हैं। लड़कियों के लिए लैंगिक समानता में स्थिति अच्छी हुई है और लड़‌कियों के नामांकन व भागीदारी में वृद्धि हुई है। इतना ही नहीं, टीकाकरण की दिशा में भी देश ने अच्छा काम किया है। टीकाकरण कवरेज में सुधार हुआ है, हालांकि इसमें अब भी काम करने की जरूरत है, जिस पर हमें ध्यान देना होगा। देश की आर्थिक तरक्की से भी बच्चों का जीवन सुधरा है। देखा जाए, तो आर्थिक विकास ने बच्चों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण आदि की सुविधा उपलब्ध कराई है। इसी का परिणाम है कि बाल श्रम अब काफी कम हो चुका है और हिंसा जैसी समस्याओं से निपटने के लिए कई प्रभावशाली प्रयास किए गए हैं।

पंडित नेहरू का मानना था कि देश की सफलता और समृद्धि बच्चों पर निर्भर है, जो आज भी प्रासंगिक है। बच्चों के विकास के बिना राष्ट्र का विकास नहीं हो सकता। अच्छी बात है कि तमाम सरकारें इस बात से सहमत हैं और बच्चों की बेहतरी के लिए अनवरत काम कर रही हैं। यह प्रवृत्ति आगे भी बनी रहेगी, और ऐसा तभी होगा, जब हम सरकारों के साथ मिलकर काम करेंगे, न कि उनकी आलोचना में रम जाएंगे। अगर हम चाहते हैं कि यह देश बच्चों के लिए और बेहतर वने, तो हमें सभी तबकों के बच्चों को समान रूप से आगे बढ़ाना होगा, खासतौर से वंचित और कमजोर तबके के बच्चों पर ध्यान देना होगा ।

शोभित कुमार, टिप्पणीकार

Children’s Day is a day to honor Pandit Jawaharlal Nehru’s commitment to the welfare of children. Pandit Nehru was born on this day. This day reminds us of the well-being of children. It highlights what more needs to be done to ensure their education, upbringing, and a safe environment. Children are a national asset, and everyone wants to preserve their wealth and even enrich it. As free citizens, we too want to enrich our future, that is, our children. This prosperity can be achieved through knowledge, nutrition, and a safe environment. That is why this day should not be a time for pointing out shortcomings, but rather a time for resolving to improve society. Indeed, many strides have been made for the betterment of children in India. Improved education has been provided for them, leading to a reduction in school dropout rates. We have moved towards 100% enrolment at the secondary level, and dropout rates have also significantly reduced. Gender equality for girls has improved, with an increase in girls’ enrollment and participation. Furthermore, the country has also made good progress in vaccination coverage. Vaccination coverage has improved, although work remains to be done, which we must address. The country’s economic progress has also improved the lives of children. Economic development has provided access to health, education, and nutrition for children. As a result, child labor has significantly decreased, and many effective efforts have been made to address problems like violence.

Pandit Nehru believed that a nation’s success and prosperity depend on its children, a belief that remains relevant today. Without the development of children, a nation cannot develop. It is heartening that many governments agree with this and are working tirelessly for the betterment of children. This trend will continue, and only if we work together with governments, rather than simply criticizing them. If we want this country to become a better place for children, we must promote children from all walks of life equally, with special attention to the disadvantaged and vulnerable.

Shobhit Kumar, Commentator

The richest man in China said:

The richest man in China said: “If you put bananas and money in front of monkeys, the monkeys will choose bananas because they don’t know that money can buy a lot of bananas. In fact, if you offer people work and business, they will choose work because most people don’t know that a business can make more money than a salary. The reason why the poor are poor is because they spend a lot of time in school, and they work for a salary instead of working for themselves, because a salary just gives you an income to live on, but profit can make you a fortune.”

चीन के सबसे अमीर आदमी ने कहा: “अगर आप बंदरों के सामने केले और पैसे रख दें, तो बंदर केले ही चुनेंगे क्योंकि उन्हें नहीं पता कि पैसे से ढेर सारे केले खरीदे जा सकते हैं। दरअसल, अगर आप लोगों को काम और व्यापार का प्रस्ताव दें, तो वे काम ही चुनेंगे क्योंकि ज़्यादातर लोग नहीं जानते कि व्यापार से तनख्वाह से ज़्यादा पैसा कमाया जा सकता है। गरीब इसलिए गरीब हैं क्योंकि वे स्कूल में बहुत समय बिताते हैं, और खुद के लिए काम करने के बजाय तनख्वाह के लिए काम करते हैं, क्योंकि तनख्वाह से तो बस गुज़ारा होता है, लेकिन मुनाफ़ा आपको दौलतमंद बना सकता है।”

Some special things related to Rajpal Yadav’s wife Radha:

राजपाल यादव की पत्नी राधा से जुड़ी कुछ खास बातें:

  • राजपाल यादव ने साल 2003 में राधा से शादी की थी.
  • राजपाल और राधा के बीच उम्र का अंतर नौ साल है.
  • राधा कनाडा की रहने वाली हैं.
  • राजपाल ने बताया था कि राधा ने उनकी पहली पत्नी की बेटी ज्योति को भी अपनी बेटी की तरह पाला है.
  • राजपाल ने बताया था कि उनकी पत्नी ने उन्हें ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा सपोर्ट किया है.
  • राजपाल और राधा की दो बेटियां हैं, जिनका नाम हर्षिता और रेहांशी है.

राजपाल यादव की पहली पत्नी करुणा से जुड़ी कुछ खास बातें:

  • राजपाल की पहली पत्नी करुणा का निधन ज्योति के जन्म के समय हो गया था.
  • राजपाल ने बताया था कि वह अगले दिन अपनी पत्नी से मिलने वाले थे, लेकिन जब वह पहुंचे तब तक बहुत देर हो गई थी.
  • राजपाल ने बताया था कि उनकी मां, भाभी समेत परिवार ने उनकी बेटी ज्योति का इतना ख्याल रखा कि उसे कभी भी मां की कमी नहीं खली. राजपाल यादव की पत्नी राधा से जुड़ी कुछ खास बातें:
  • राजपाल यादव ने साल 2003 में राधा से शादी की थी.
  • राजपाल और राधा के बीच उम्र का अंतर नौ साल है.
  • राधा कनाडा की रहने वाली हैं.
  • राजपाल ने बताया था कि राधा ने उनकी पहली पत्नी की बेटी ज्योति को भी अपनी बेटी की तरह पाला है.
  • राजपाल ने बताया था कि उनकी पत्नी ने उन्हें ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा सपोर्ट किया है.
  • राजपाल और राधा की दो बेटियां हैं, जिनका नाम हर्षिता और रेहांशी है.

राजपाल यादव की पहली पत्नी करुणा से जुड़ी कुछ खास बातें:

  • राजपाल की पहली पत्नी करुणा का निधन ज्योति के जन्म के समय हो गया था

Breath: Wake Up to Life

Bring peace into your present moment through the power of breath with Global Peace Ambassador Prem Rawat

Breath – it marks the beginning and end of life, it is the one thing shared by all human beings, and yet it is one of the most overlooked aspects of the human experience. What we take for granted actually forms the basis of our shared reality. Each breath we take signals triumph over death, our defiant presence in the world, our dedication to persisting.

Global Peace Ambassador and New York Times bestselling author Prem Rawat asks us to pause and take a moment to revel in our breath, to wake up to this miracle of shared human experience. Only when we do so can we open ourselves to the possibility of peace—both inner and outer.

Filled with intricate line drawings and flowing prose, Breath is a beautiful guide to finding harmony in each moment. Immerse yourself in the simple but profound power of breath to bring peace to your life.

Prem Rawat

Born in India in 1957, Prem Rawat, brings over 50 years of experience from his extraordinary journey through life. From boy prodigy, 70’s teenage icon, to global peace ambassador, Prem has brought exceptional clarity, inspiration and deep life learning to millions.

Now based in the United States, and founder of The Prem Rawat Foundation, Prem works with people from all walks of life, showing them how to experience the source of peace within themselves. His global effort spans over 100 countries, bringing a practical message of hope, happiness, and peace to all, one person at a time.

He is the internationally bestselling author of Peace Is Possible and is also a pilot, with over 14,500 hours experience, a photographer, classic car restorer, and father to four children and grandfather of four.

Ten unknown facts about BMW

BMW के बारे में दस अज्ञात तथ्य

  1. स्थापना और इतिहास: बीएमडब्लू, बेयरिचे मोटोरें वेर्क एजी, की स्थापना 1916 में म्यूनिख, जर्मनी में की गई थी, शुरू में विमान इंजन का उत्पादन किया कंपनी 1920 के दशक में मोटरसाइकिल उत्पादन के लिए परिवर्तित हुई और अंततः 1930 के दशक में ऑटोमोबाइल के लिए।
  2. प्रतिष्ठित लोगो: बीएमडब्ल्यू लोगो, जिसे अक्सर “राउंडेल” के रूप में जाना जाता है, इसमें नीले और सफेद के चार चतुर्थांश के साथ एक काली अंगूठी होती है। यह विमानन में कंपनी की उत्पत्ति का प्रतिनिधित्व करता है, नीले और सफेद एक स्पष्ट नीले आकाश के खिलाफ एक कताई प्रोपेलर का प्रतीक है।
  3. प्रौद्योगिकी में नवाचार: बीएमडब्ल्यू ऑटोमोटिव प्रौद्योगिकी में अपने नवाचारों के लिए प्रसिद्ध है। इसने 2013 में दुनिया की पहली इलेक्ट्रिक कार, बीएमडब्ल्यू i3 पेश की, और उन्नत ड्राइविंग सहायता प्रणाली (एडीएएस) और हाइब्रिड पावरट्रेन विकसित करने में अग्रणी रही है।
  4. प्रदर्शन और मोटरस्पोर्ट हेरिटेज: मोटरस्पोर्ट में बीएमडब्ल्यू की एक मजबूत विरासत है, विशेष रूप से टूरिंग कार और फार्मूला 1 रेसिंग में। ब्रांड का एम डिवीजन अपने नियमित मॉडल के उच्च-प्रदर्शन वाले संस्करण का उत्पादन करता है, जो अपने सटीक इंजीनियरिंग और उत्साहवर्धक ड्राइविंग गतिशीलता के लिए जाना जाता है।
  5. वैश्विक उपस्थिति: बीएमडब्ल्यू एक वैश्विक ऑटोमोटिव कंपनी है
  6. लक्जरी और डिजाइन: बीएमडब्ल्यू लक्जरी और विशिष्ट डिजाइन का पर्याय है, क्राफ्टिंग वाहनों जो अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और आराम के साथ लालित्य का मिश्रण करते हैं।
  7. सतत अभ्यास: बीएमडब्ल्यू ने स्थिरता के लिए प्रतिबद्ध किया है, अपने वाहनों में पर्यावरण के अनुकूल सामग्री और विनिर्माण प्रक्रिया को शामिल किया है, साथ ही साथ बीएमडब्ल्यू i4 और iX जैसे मॉडल के साथ इलेक्ट्रिक वाहन प्रौद्योगिकी को आगे बढ़ाया है।
  8. वैश्विक विनिर्माण: बीएमडब्ल्यू जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और अन्य देशों सहित दुनिया भर में कई उत्पादन सुविधाएं संचालित करता है, वैश्विक पहुंच और स्थानीय उत्पादन सुनिश्चित करता है।
  9. ब्रांड पोर्टफोलियो: अपने प्रसिद्ध बीएमडब्ल्यू ब्रांड के अलावा, कंपनी मिनी और रोल्स-रॉयस का भी मालिक है, जो विभिन्न प्रकार के ऑटोमोटिव स्वाद और लक्जरी सेगमेंट के लिए खानपान है।
  10. सांस्कृतिक प्रभाव: बीएमडब्ल्यू की गाड़ियां अक्सर सांस्कृतिक प्रतीक बन जाती हैं।

Who is santosh anand?

संतोष आनंद कौन है?

संतोष आनंद का जन्म 5 मार्च 1939 को बुलंदशहर के सिकंदराबाद में हुआ था जो उत्तर प्रदेश में स्थित है। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लाइब्रेरी साइंस की पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी करने के बाद संतोष दिल्ली में बतौर लाइब्रेरियन काम करने लगे। किताबें पढ़ते पढ़ाते धीरे-धीरे उन्हें कविताओं का शौक हो गया और वे दिल्ली में होने वाले कवि सम्मेलनों में हिस्सा भी लेने लगे। वे कविताओं के साथ-साथ गीत और ग़ज़ल भी लिखा करते। उनके गीतों पर जब जाने माने अभिनेता निर्माता व निर्देशक मनोज कुमार जी की नज़र पड़ी तो उन्होंने संतोष जी को अपनी फिल्म के लिये गीत गीत लिखने को कहा। संतोष आनंद को पहली बार फिल्म के लिए गाने लिखने का ऑफर मिला फिल्म पूरब और पश्चिम के लिए जो वर्ष 1970 में प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म का गीत ‘पुरवा सुहानी आई रे’ बेहद पॉपुलर हुआ। इस गाने से मनोज कुमार इतने प्रभावित हुए कि अपनी आगामी सभी फिल्मों में संतोष जी से ही गीत लिखवाने का मन बना लिया।वर्ष 1972 में प्रदर्शित फिल्म शोर के लिए संतोष जी का लिखा और मुकेश व लता मंगेशकर का गाया गीत ‘एक प्यार का नगमा है’ गीत बहुत पॉप्युलर हुआ था जो आज भी हर किसी का पसंदीदा गीत है । इस गीत की कामयाबी के बाद संतोष जी के आगे फिल्मों की लाइन लग गयी।

इसके बाद संतोष आनंद ने रोटी कपडा और मकान, क्रांति, प्यासा सावन, प्रेम रोग, लव 86, बड़े घर की बेटी, संतोष और सूर्या जैसी ढेरों बड़ी फिल्मों में एक से बढ़कर एक सुपरहिट गीत लिखे। 70 और 80 के दशकों में ढेरों कामयाब गीत लिखने के बाद उनका यह सफर 90 के दशक में भी ज़ारी रहा। दो मतवाले, नागमणि, रणभूमि, जूनून, संगीत, तहलका, तिरंगा, संगम हो के रहेगा और प्रेम अगन जैसी ढेरों फिल्मों के गीतों में अपनी कलम का जादू संतोष दिखाते रहे। संतोष आनंद ने कुल 26 फिल्मों में 109 गाने लिखे हैं. जिन्हें मुकेश, लता मंगेशकर, महेंद्र कपूर जैसे लेजेंडरी सिंगर्स से लेकर मोहम्मद अजीज, कुमार शानू और कविता कृष्णमूर्ति जैसे ढेरों शानदार गायक गायिकाओं ने आवाज दी हैं।

फिल्म रोटी कपड़ा और मकान के लिए ‘और नहीं बस और नहीं’ और ‘मैं ना भूलूंगा’ जैसे सफल गीतों को लिख उन्होंने वर्ष 1974 में अपना पहला बेस्ट लिरिसिस्ट का फिल्मफेयर अवॉर्ड हासिल किया।

वर्ष 1981 में एक तरफ संतोष जी ने उस वर्ष की सबसे सफल फिल्म क्रांति के गीत लिखे तो साथ ही उसी वर्ष उन्होंने फिल्म प्यासा सावन के लिए भी अमर गीत “तेरा साथ हैं तो मुझे क्या कमी है” और “मेघा रे मेघा मत परदेस जा रे” भी लिखा। इसके बाद वर्ष 1983 में प्रदर्शित फिल्म प्रेम रोग के गीत ‘मुहब्बत है क्या चीज’ के लिए एक फिर फिर उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया। वर्ष 2016 में संतोष आनंद जी को यश भारती के सम्मान से भी नवाज़ा गया।

लेजेंडरी गीतकार संतोष आनंद जी को आज की पीढ़ी उनके नाम से भले ही न पहचानती हो लेकिन उनके लिखे गीत हर कोई सुनता है और गुनगुनाता है। संतोष आनंद ने अपने दौर में एक से बढ़कर एक नायाब और अमर गीत लिखे हैं। इक प्यार का नगमा है, जिंदगी की ना टूटे लड़ी और मोहब्बत है क्या चीज, जैसे एक से बढ़कर एक गीतों को लिखने वाले संतोष आनंद अब बुजुर्ग हो चुके हैं और फिल्मों में गीत लिखने के लिये उनके पास अब कोई काम नहीं है। शारीरिक रूप से लाचार संतोष आनंद आजकल बहुत ही मुश्किलों का सामना कर रहे हैं बावज़ूद इसके वे आज भी संघर्षरत हैं और कवि सम्मेलनों और मुशायरों में दूर दूर तक जाकर अपनी लेखनी का जादू दिखाते रहते हैं। आख़िर ऐसा क्या हुआ उनके साथ जो वे अचानक फिल्मी दुनियाँ से दूर हो गये? वो कौन सा हादसा था जिसने उन्हें तोड़कर रख दिया? इन सभी बातों पर चर्चा करने से पहले आइये एक नज़र डाल लेते हैं उनके गीतकार बनने के सफर पर।

अब बात करते हैं संतोष आनंद जी से जुड़ी उस घटना के बारे में जिसने उन्हें पूरी तरह से तोड़कर रख दिया।

युवावस्था में ही एक दुर्घटना में एक टांग से विकलांग हो चुके संतोष आनंद जी की शादी के 10 वर्षों के बाद बड़ी मन्नतों से पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम उन्होंने संकल्प आनंद रखा। वे बताते हैंं कि ठीक उसी दिन उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड के लिये भी चुना गया।
संकल्प आनंद दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश नारायण नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस में समाजशास्त्र के लेक्चरर थे। करोड़ों के फंड की गड़बड़ी में शामिल होने के लिये उनके अधिकारियों को तरफ से उन पर बहुत दबाव डाला गया नतीज़ा वे मानसिक रूप से परेशान रहने लगे। और एक दिन हालात और बदनामी से तंग आकर संकल्प ने पत्नी नंदिनी और बेटी रिद्धिमा आनंद के साथ अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला कर लिया। ये सारी बातें संकल्प ने बाकायदा अपने स्टेटमेंट में लिखा था। 15 अक्टूबर 2014 को वे सपरिवार दिल्ली से मथुरा पहुंचे और कोसीकलां कस्बे के पास रेलवे ट्रैक पर पहुंच कर पत्नी और बेेटी सहित ट्रेन के सामने कूदकर जान दे दी। हाालांकि इस हादसे में उनकी बेटी की किसी तरह बचा लिया गया।

दोस्तों संतोष आनंद इंडियन आइडल के एक एपीसोड में संगीतकार को अचानक कैमरे के सामने देख उनके चाहने वाले भावुक हो उठे। इस कार्यक्रम में उन्होंने अपने संघर्ष को सबके साथ साझा किया, जिसे सुनकर सिंगर नेहा कक्कड़ ने 5 लाख रुपये की मदद की बात की जिसे उन्होंने पहले तो मना कर दिया लेकिन नेहा के बार बार यह कहने पे कि यह एक पोती की तरफ से उसके दादाजी को एक तोहफा है, उन्हें स्वीकार करना ही पड़ा। इसके अलावा विशाल ददलानी ने भी संतोष आनंद से उनके लिखे वो गीत मांगे जो उन्होंने पहले से लिख रखे हैं।

संतोष आनंद जी की एक बेटी है जिनका नाम है शैलजा आनंद। नारद टी वी संतोष आनंद जी के उत्तम स्वास्थ्य और सुखद जीवन की कामना करता है। साथ ही यह भी उम्मीद करता है कि फिर से अच्छे और मधुर गीतों का दौर आये जिससे संतोष आनंद जी जैसे तमाम गुणी गीतकारों की लेखनी को काम सम्मान मिल सके।

Ravi Shastri’s funny style tickled

रवि शास्त्री के मजाकिया अंदाज ने गुदगुदाया

दिग्गज क्रिकेटर रवि शाखी अपनी बल्लेबाजी के साथ-साथ शानदार कमेंट्री के लिए भी जाने जाते हैं। उनकी कमेंट्री का अंदाज कई बार लोगों को गुदगुदा भी जाता है। इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट मैच के पहले दिन ऐसा ही एक मजेदार वाकया हुआ जो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो गया। दरअसल मैच के दौरान कैमरामैन ने कैमरे का फोकस एक बॉल ब्वॉय की ओर कर दिया। उस दौरान वह सीमा रेखा पर लेटे हुए जम्हाई ले रहा था। उस दौरान रवि शास्त्री कमेंट्री कर रहे थे। यह देखते ही शाखी तपाक से बोल उठे, ओह बड़ी जम्हाई, उठो, उठो एक गिलास पानी पी लो, क्रिकेट दिलचस्प होता जा रहा है। ओह ब्वॉय हाँ, हाँ।

उनके इस मजाकिया अंदाज को सोशल मीडिया पर यूजर्स द्वारा खूब पसंद किया जा रहा है। यही कारण है कि शास्त्री दूसरे कमेंटेटरों से कुछ अलग हैं। इसके साथ ही उस बॉल ब्वॉय को लेकर भी तरह-तरह के कमेंट की झड़ी लग गई। हालांकि संभवत: दर्शकों के शोर के कारण उसकी झपकी टूट गई। कैमरे के अगले फ्रेम में वह जगा हुआ दिखाई दिया और उसने फिर एक बड़ी जम्हाई भी ली। फिर अंगड़ाई लेते हुए अपने शरीर को छोड़ा सहज किया।

Veteran cricketer Ravi Shakhi is known for his batting as well as excellent commentary. His style of commentary sometimes tickles people. One such funny incident happened on the first day of the Test match against England which went viral on social media. Actually, during the match, the cameraman turned the focus of the camera towards a ball boy. During that time he was yawning while lying on the border line. During that time Ravi Shastri was doing commentary. Seeing this, Shakhi said loudly, Oh big yawn, get up, get up, drink a glass of water, cricket is getting interesting. Oh boy yes, yes.

His funny style is being liked a lot by the users on social media. This is why Shastri is different from other commentators. Along with this, there was a flurry of different types of comments regarding that ball boy. Although perhaps his nap was broken due to the noise of the audience. In the next frame of the camera, he appeared to be awake and also gave a big yawn. Then he relaxed and released his body.