भाइयों का सम्बंध

एक दिन संध्या के समय सरयू के तट पर तीनों भाइयों संग टहलते श्रीराम से महात्मा भरत ने कहा, “एक बात पूंछूँ भइया?”

“माता कैकई ने आपको वनवास दिलाने के लिए मंथरा के साथ मिल कर जो षड्यंत्र किया था, क्या वह राजद्रोह नहीं था?

उनके षड्यंत्र के कारण एक ओर राज्य के भावी महाराज और महारानी को चौदह वर्ष का वनवास झेलना पड़ा तो दूसरी ओर पिता महाराज की दुखद मृत्यु हुई।

ऐसे षड्यंत्र के लिए सामान्य नियमों के अनुसार तो मृत्युदंड दिया जाता है, फिर आपने माता कैकई को दण्ड क्यों नहीं दिया?”

राम मुस्कुराए। बोले, “जानते हो भरत, किसी कुल में एक चरित्रवान और धर्मपरायण पुत्र जन्म ले ले तो उसका जीवन उसके असँख्य पीढ़ी के पितरों के अपराधों का प्रायश्चित कर देता है। जिस माँ ने तुम जैसे महात्मा को जन्म दिया हो उसे दण्ड कैसे दिया जा सकता है भरत?”

भरत संतुष्ट नहीं हुए। कहा, “यह तो मोह है भइया, और राजा का दण्डविधान मोह से मुक्त होता है। एक राजा की तरह उत्तर दीजिये कि आपने माता को दंड क्यों नहीं दिया, समझिए कि आपसे यह प्रश्न आपका अनुज नहीं, अयोध्या का एक सामान्य नागरिक कर रहा है।”

राम गम्भीर हो गए! कुछ क्षण के मौन के बाद कहा, “अपने सगे-सम्बन्धियों के किसी अपराध पर कोई दण्ड न देना ही इस सृष्टि का कठोरतम दण्ड है भरत ! माता कैकई ने अपनी एक भूल का बड़ा कठोर दण्ड भोगा है। वनवास के चौदह वर्षों में हम चारों भाई अपने अपने स्थान से परिस्थितियों से लड़ते रहे हैं, पर माता कैकई हर क्षण मरती रही हैं। अपनी एक भूल के कारण उन्होंने अपना पति खोया, अपने चार बेटे खोए, अपना समस्त सुख खोया, फिर भी वे उस अपराधबोध से कभी मुक्त न हो सकीं। वनवास समाप्त हो गया तो परिवार के शेष सदस्य प्रसन्न और सुखी हो गए, पर वे कभी प्रसन्न न हो सकीं। कोई राजा किसी स्त्री को इससे कठोर दंड क्या दे सकता है?

मैं तो सदैव यह सोच कर दुखी हो जाता हूँ कि मेरे कारण अनायास ही मेरी माँ को इतना कठोर दण्ड भोगना पड़ा।”

राम के नेत्रों में जल उतर आया था और भरत आदि भाई मौन हो गए थे।

राम ने फिर कहा, “और उनकी भूल को अपराध समझना ही क्यों भरत ! यदि मेरा वनवास न हुआ होता तो संसार भरत और लक्ष्मण जैसे भाइयों के अतुल्य भ्रातृप्रेम को कैसे देख पाता। मैंने तो केवल अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन मात्र किया था, पर तुम दोनों ने तो मेरे स्नेह में चौदह वर्ष का वनवास भोगा। वनवास न होता तो यह संसार सीखता कैसे कि भाइयों का सम्बन्ध होता कैसा है।”

भरत के प्रश्न मौन हो गए थे। वे अनायास ही बड़े भाई से लिपट गए!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।

पुण्य और कर्तव्य

एक बार की बात है। एक बहुत ही पुण्यशाली व्यक्ति अपने परिवार सहित तीर्थ यात्रा के लिए निकला।

कई कोस दूर जाने के बाद पूरे परिवार को प्यास लगने लगी, ज्येष्ठ का महीना था, आस पास कहीं पानी नहीं दिखाई पड़ रहा था।

उसके बच्चे प्यास से व्याकुल होने लगे। समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे… अपने साथ लेकर चलने वाला पानी भी समाप्त हो चुका था!

एक समय ऐसा आया कि उसे भगवान से प्रार्थना करनी पड़ी कि हे प्रभु! अब आप ही कुछ करो!

इतने में उसे कुछ दूर पर एक साधु तप करता हुआ नजर आये। व्यक्ति ने उस साधु से जाकर अपनी समस्या बताई।
साधु बोले कि यहाँ से एक कोस दूर उत्तर की दिशा में एक छोटी दरिया बहती है, जाओ जाकर वहां से पानी की प्यास बुझा लो।

साधु की बात सुनकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने साधु को धन्यवाद बोला।

पत्नी एवं बच्चों की स्थिति नाजुक होने के कारण वहीं रुकने के लिए बोला और खुद पानी लेने चला गया।

जब वो दरिया से पानी लेकर लौट रहा था तो उसे रास्ते में पांच व्यक्ति मिले जो अत्यंत प्यासे थे। पुण्य आत्मा को उन पाँचों व्यक्तियों की प्यास देखी नहीं गयी और अपना सारा पानी उन प्यासों को पिला दिया। जब वो दोबारा पानी लेकर आ रहा था तो पांच अन्य व्यक्ति मिले जो उसी तरह प्यासे थे। पुण्य आत्मा ने फिर अपना सारा पानी उनको पिला दिया।

यही घटना बार-बार हो रही थी और काफी समय बीत जाने के बाद जब वो नहीं आया तो साधु उसकी तरफ चल पड़ा!

बार-बार उसके इस पुण्य कार्य को देखकर साधु बोला – “हे पुण्य आत्मा तुम बार-बार अपनी बाल्टी भरकर दरिया से लाते हो और किसी प्यासे के लिए ख़ाली कर देते हो। इससे तुम्हें क्या लाभ मिला?

पुण्य आत्मा ने बोला, मुझे क्या मिला? या क्या नहीं मिला इसके बारे में मैंने कभी नहीं सोचा। पर मैंने अपना स्वार्थ छोड़कर अपना धर्म निभाया।

साधु बोले – “ऐसे धर्म निभाने से क्या फ़ायदा जब तुम्हारे अपने बच्चे और परिवार ही जीवित ना बचे? तुम अपना धर्म ऐसे भी निभा सकते थे जैसे मैंने निभाया।

पुण्य आत्मा ने पूछा – “कैसे महाराज ?

साधु बोले- “मैंने तुम्हें दरिया से पानी लाकर देने के बजाय दरिया का रास्ता ही बता दिया। तुम्हें भी उन सभी प्यासों को दरिया का रास्ता बता देना चाहिए था, ताकि तुम्हारी भी प्यास मिट जाये और अन्य प्यासे लोगों की भी… फिर किसी को अपनी बाल्टी ख़ाली करने की जरुरत ही नहीं होगी।”
इतना कहकर साधु अंतर्ध्यान हो गये!

पुण्य आत्मा को सब कुछ समझ आ गया कि अपना पुण्य ख़ाली कर दूसरों को देने के बजाय, दूसरों को भी पुण्य अर्जित करने का रास्ता या विधि बतायें!

आज संसार में सब कुछ होते हुए भी आदमी आत्म शान्ति के लिए प्यासा है!

एक सच्चे भक्त को अगर उसके भाग्य से सद्गुरु मिले हों और अन्दर की शान्ति पाने का तरीका मिल चुका हो तो उस संदेश से सभी ज्ञान और आनन्द के पिपासु को परिचित कराना चाहिए!

उनको उनके खुद के अंदर बैठे अविनाशी तक पहुंचकर अपनी शान्ति की प्यास बुझाने का तरीका बतलाना चाहिए ताकि उन्हें भी हमेशा के लिए उस परमानंद का लाभ मिल सकें!

रिश्तें बड़े अनमोल होते हैं – थोड़े से ऐश्वर्य धन या सम्पदा के चक्कर मे कहीं किसी अनमोल रिश्तें को न खो देना!

सेठ घनश्याम के दो पुत्रों में जायदाद और ज़मीन का बँटवारा चल रहा था और एक चार बेड रूम के घर को लेकर विवाद गहराता जा रहा था।

एक दिन दोनों भाई मरने मारने पर उतारू हो चले तो पिता जी बहुत जोर से हँसे।

पिताजी को हँसता देखकर दोनो भाई लड़ाई को भूल गये और पिताजी से हँसी का कारण पूछा।

पिताजी ने कहा-इस छोटे से ज़मीन के टुकडे के लिये इतना लड़ रहे हो! छोड़ो इसे; आओ मेरे साथ एक अनमोल खजाना दिखता हूँ मैं तुम्हे!

पिता घनश्याम जी और दोनो पुत्र पवन और मदन उनके साथ रवाना हुये ।

पिताजी ने कहा देखो, यदि तुम आपस मे लड़े तो फिर मैं तुम्हे उस खजाने तक नहीं लेकर जाऊँगा और बीच रास्ते से ही लौटकर आ जाऊँगा!

अब दोनो पुत्रों ने खजाने के चक्कर मे एक समझौता किया कि चाहे कुछ भी हो जाये पर हम लड़ेंगे नहीं प्रेम से यात्रा पर चलेंगे!
गाँव जाने के लिये एक बस मिली पर सीट दो की मिली,और वो तीन थे!
अब पिताजी के साथ थोड़ी देर पवन बैठे तो थोड़ी देर मदन!
ऐसे चलते-चलते लगभग दस घण्टे का सफर तय किया, तब गाँव आया।

घनश्याम जी दोनो पुत्रों को लेकर एक बहुत बड़ी हवेली पर गये हवेली चारों तरफ से सुनसान थी।
घनश्याम जी ने देखा कि हवेली में जगह जगह कबूतरों ने अपना घोसला बना रखा है, तो घनश्याम वहीं बैठकर रोने लगे।

पुत्रों ने पूछा, क्या हुआ पिताजी; आप रो क्यों रहे हैं?

रोते हुये उस वृद्ध पिता ने कहा, जरा ध्यान से देखो इस घर को, जरा याद करो वो बचपन- जो तुमने यहाँ बिताया था!

तुम्हे याद है बच्चों, इसी हवेली के लिये मैंने अपने बड़े भाई से बहुत लड़ाई की थी! ये हवेली तो मुझे मिल गई पर मैंने उस भाई को हमेशा के लिये खो दिया। क्योंकि वो दूर देश में जाकर बस गया और फिर वक्त्त बदला!एक दिन हमें भी ये हवेली छोड़कर जाना पड़ा!

अच्छा तुम ये बताओ बेटा कि जिस सीट पर हम बैठकर आये थे – क्या वो बस की सीट हमें मिल गई? और यदि मिल भी जाती तो क्या वो सीट हमेशा-हमेशा के लिये हमारी हो जाती?

मतलब कि उस सीट पर हमारे सिवा और कोई न बैठ सकता?

दोनो पुत्रों ने एक साथ कहा कि ऐसे कैसे हो सकता है? बस की यात्रा तो चलती रहती है और उस सीट पर सवारियाँ बदलती रहती हैं! पहले हम बैठे थे,आज कोई और बैठा होगा और पता नही, कल कोई और बैठेगा और वैसे भी उस सीट में क्या धरा है जो थोड़ी सी देर के लिये हमारी है!

पिताजी पहले हँसे और फिर आंखों में आंसू भरकर बोले , देखो यही मैं तुम्हें समझा रहा हूँ कि जो थोड़ी देर के लिये जो तुम्हारा है , तुमसे पहले उसका मालिक कोई और था, थोड़ी सी देर के लिये तुम हो और थोड़ी देर बाद कोई और हो जायेगा।

बस बेटा एक बात ध्यान रखना कि इस थोड़ी सी देर के लिये कही तुम अपने अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना! यदि पैसों का प्रलोभन आये तो इस हवेली की इस स्थिति को देख लेना कि अच्छे अच्छे महलों में भी एक दिन कबूतर अपना घोंसला बना लेते हैं!

बेटा मुझे यही कहना था कि बस की उस सीट को याद कर लेना – जिसकी रोज सवारियां बदलती रहती हैं! उस सीट के खातिर अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना। जिस तरह से बस की यात्रा में तालमेल बिठाया था बस वैसे ही जीवन की यात्रा मे भी तालमेल बिठाते रहना!

दोनो पुत्र पिताजी का अभिप्राय समझ गये और पिता के चरणों में गिरकर अपने व्यव्हार पर अफ्सोच करने लगे!

यह प्रसंग हम सभी को यह सीख देता है की चाहे कितना ही ऐश्वर्य, धन-सम्पदा हमारे पास है – वो सबकुछ बस थोड़ी देर के लिये ही है! थोड़ी-थोड़ी देर में यात्री भी बदल जाते हैं और मालिक भी। रिश्तें बड़े अनमोल होते हैं – थोड़े से ऐश्वर्य धन या सम्पदा के चक्कर मे कहीं किसी अनमोल रिश्तें को न खो देना!

ईश्वर जैसा नि:स्वार्थ और दयालु कोई नहीं है। ऐसा नि:स्वार्थ और दयालु न कभी हुआ, न होगा।

एक व्यक्ति रेल की लाइन में टिकट खरीदने के लिए लगा हुआ था। जब उसका नंबर आया तो क्लर्क ने कहा कि “तीन रुपए खुले दो, तो टिकट मिलेगा।”
यात्री के पास तीन रुपए खुले नहीं थे। उसने अपने पास वाले यात्री से पूछा, “क्या आपके पास तीन रुपय खुले हैं. अगर आप मुझे दे दें, तो मुझे टिकट मिल जाएगा. मैं कुछ देर में आपको तीन रुपए वापस लौटा दूंगा।”

पास वाले यात्री ने उसे खुले तीन रूपये दे दिए। उसने टिकट ले ली और बाहर जाकर पैसे खुले करवाए। उसने उस यात्री को तीन रूपये लौटा दिए और उसका बहुत धन्यवाद किया, आभार माना कि आप की सहायता से मुझे ठीक प्रकार से रेल टिकट मिल गया। मैं आपका हृदय से आभारी हूं।”

आप देखिए, यह कितनी छोटी सी घटना है। आज के समय में तीन रुपए का कोई बहुत मूल्य नहीं है। फिर भी उसने तीन रूपये वापस भी लौटाए, बहुत धन्यवाद किया और हृदय से आभार भी माना।

जब लोग सांसारिक कार्यों में इतनी सभ्यता निभाते हैं। छोटे और बड़े सब कार्यों में पूरा ध्यान देते हैं।

तो क्या कभी आपने ऐसा सोचा है कि ईश्वर ने भी आपको बहुत कुछ दिया है। क्या आप ईश्वर का इस प्रकार से धन्यवाद करते हैं? क्या उसका हृदय से आभार मानते हैं? क्या उसका उपकार स्वीकार करते हैं?

यदि नहीं करते, तो यह अच्छी बात नहीं है।

“ईश्वर का तो अनंत उपकार मानना चाहिए। क्योंकि ईश्वर ने हम आप और सब लोगों पर जो उपकार किए हैं, उसका तो कोई मूल्य आप सोच भी नहीं सकते।”

जैसे कि ईश्वर ने आपको मन बुद्धि इंद्रियां शरीर और पंचमहाभूत बना कर दिए। अनेक प्रकार के फल फूल शाक सब्जियां जड़ी बूटियां औषधियां वनस्पतियां आदि आदि, न जाने क्या-क्या सुख सुविधाएं दी हैं।

ईश्वर ने आपको बहुत सा धन दिया है। अच्छे-अच्छे माता-पिता गुरुजन आदि दिए। इसके अतिरिक्त आपके लिए बहुत सा श्रम किया है। ईश्वर अनादि काल से आपके प्रत्येक कर्म का पूरा-पूरा हिसाब रखता है। ठीक न्याय से आप को प्रत्येक कर्म का सही समय पर फल देता है। कभी भी अन्याय नहीं करता।

जो दुष्ट व्यक्ति आपकी हानि करता है, उसको ईश्वर दंड देता है। उस दुष्ट व्यक्ति द्वारा की गई आपकी हानि की पूर्ति भी ईश्वर समय आने पर कर देता है। यदि आप किसी का उपकार करते हैं, तो उसका पुण्य फल भी ईश्वर आपको अनादि काल से देता आ रहा है, और भविष्य में भी अनन्त काल देता रहेगा।

उसके हिसाब में कहीं भी, कोई भी, कभी भी भूल नहीं होती। इस सब श्रम के बदले में ईश्वर आपसे कुछ भी फीस/ शुल्क भी नहीं लेता है। और भविष्य में भी अनंत काल तक ईश्वर ऐसे ही मुफ्त में आप पर उपकार करता रहेगा। इतने बड़े उपकारों के बदले में आपको ईश्वर का कितना अधिक धन्यवाद करना चाहिए, और हृदय से उसका आभार मानना चाहिए! उसके पास बैठकर उसकी स्तुति प्रार्थना उपासना करके उससे वर्तमान में और भी आनंद लाभ प्राप्त करना चाहिए।”

ठीक ही कहा है कि – मेरे दाता की दुकान में सब दुनिया का खाता!

दुनिया में बुराईयां क्यों है ?

एक दिन कॉलेज में प्रोफेसर ने विद्यर्थियों से पूछा कि इस संसार में बुराई का अस्तित्व है या नहीं?

सभी ने कहा, “हां! “

प्रोफेसर ने कहा कि इसका मतलब बुराई थी ही,और है ही और रहेगी भी।

प्रोफेसर ने इतना कहा तो एक विद्यार्थी उठ खड़ा हुआ और उसने कहा कि इतनी जल्दी इस निष्कर्ष पर मत पहुंचिए सर!

प्रोफेसर ने कहा, क्यों? अभी तो सबने कहा है कि बुराई का अस्तित्व है ही।

विद्यार्थी ने कहा कि सर, मैं आपसे छोटे-छोटे दो सवाल पूछूंगा। फिर उसके बाद आपकी बात भी मान लूंगा।

प्रोफेसर ने कहा, “पूछो।”

विद्यार्थी ने पूछा , “सर क्या दुनिया में ठंड का कोई वजूद है?”

प्रोफेसर ने कहा, बिल्कुल है। सौ फीसदी है। हम ठंड को महसूस करते हैं।

विद्यार्थी ने कहा, “नहीं सर, ठंड कुछ है ही नहीं। ये असल में गर्मी की अनुपस्थिति का अहसास भर है। जहां गर्मी नहीं होती, वहां हम ठंड को महसूस करते हैं।”

प्रोफेसर चुप रहे।

विद्यार्थी ने फिर पूछा, “सर क्या अंधेरे का कोई अस्तित्व है?”

प्रोफेसर ने कहा, “बिल्कुल है। रात को अंधेरा होता है।”

विद्यार्थी ने कहा, “नहीं सर। अंधेरा कुछ होता ही नहीं। ये तो जहां रोशनी नहीं होती वहां अंधेरा होता है।

प्रोफेसर ने कहा, “तुम अपनी बात आगे बढ़ाओ।”

विद्यार्थी ने फिर कहा, “सर आप हमें सिर्फ लाइट एंड हीट (प्रकाश और ताप) ही पढ़ाते हैं। आप हमें कभी डार्क एंड कोल्ड (अंधेरा और ठंड) नहीं पढ़ाते। फिजिक्स में ऐसा कोई विषय ही नहीं।
सर, ठीक इसी तरह “अस्तित्व में सिर्फ अच्छी चीज है। अब जहां अच्छा नहीं होता, वहां हमें बुराई नज़र आती है। पर बुराई का कोई अस्तित्व है नहीं। ये सिर्फ अच्छाई की अनुपस्थिति भर है।”

दरअसल दुनिया में कहीं बुराई है ही नहीं। ये सिर्फ प्यार, विश्वास की कमी का नाम है।

वास्तव में ज्ञान का भाव ही अज्ञानता है! इसलिय हमें जो है उस तरफ ही उन्मुख रहना चाहिय!

शिक्षक का अदभुत ज्ञान, शाकाहारी – मांसाहारी

शिक्षक का अदभुत ज्ञान
शाकाहारी – मांसाहारी

एक बार एक चिंतनशील शिक्षक ने अपने 7th – 8th स्टेंडर्ड के बच्चों से पूछा कि
आप लोग कहीं जा रहे हैं और
सामने से कोई कीड़ा मकोड़ा या कोई साँप, छिपकली या कोई गाय-भैंस या अन्य कोई ऐसा विचित्र जीव दिख गया, जो आपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा हो, तो प्रश्न यह है कि
आप कैसे पहचानेंगे कि
वह जीव अंडे देता है या बच्चे ?
क्या पहचान है उसकी ?

अधिकांश बच्चे मौन रहे
जबकि कुछ बच्चों में बस आंतरिक खुसर-फुसर चलती रही…।

मिनट दो मिनट बाद
फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने स्वयं ही बताया कि
बहुत आसान है,,
जिनके भी कान बाहर दिखाई देते हैं वे सब बच्चे देते हैं
और जिन जीवों के कान बाहर नहीं दिखाई देते हैं
वे अंडे देते हैं…. ।।
फिर दूसरा प्रश्न पूछा कि–
ये बताइए आप लोगों के सामने एकदम कोई प्राणी आ गया… तो आप कैसे पहचानेंगे की यह शाकाहारी है या मांसाहारी ?
क्योंकि आपने तो उसे पहले भोजन करते देखा ही नहीं,
बच्चों में फिर वही कौतूहल और खुसर फ़ुसर की आवाजें…..

शिक्षक ने कहा–
देखो भाई बहुत आसान है,,
जिन जीवों की आँखों की बाहर की यानी ऊपरी संरचना गोल होती है, वे सब के सब माँसाहारी होते हैं,
जैसे-कुत्ता, बिल्ली, बाज, चिड़िया, शेर, भेड़िया, चील या अन्य कोई भी आपके आस-पास का जीव-जंतु जिसकी आँखे गोल हैं वह माँसाहारी ही होगा और है भी,
ठीक उसी तरह जिसकी आँखों की बाहरी संरचना लंबाई लिए हुए होती है, वे सब के सब जीव शाकाहारी होते हैं,
जैसे- हिरन, गाय, हाथी, बैल, भैंस, बकरी,, इत्यादि।
इनकी आँखे बाहर की बनावट में लंबाई लिए होती है ….

फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने बच्चों से पूछा कि-
बच्चों अब ये बताओ कि मनुष्य की आँखें गोल हैं या लंबाई वाली ?

इस बार सब बच्चों ने कहा कि मनुष्य की आंखें लंबाई वाली होती है…
इस बात पर
शिक्षक ने फिर बच्चों से पूछा कि
यह बताओ इस हिसाब से मनुष्य शाकाहारी जीव हुआ या माँसाहारी ??
सब के सब बच्चों का उत्तर था शाकाहारी ।

फिर शिक्षक से पूछा कि
बच्चों यह बताओ कि
फिर मनुष्य में बहुत सारे लोग मांसाहार क्यों करते हैं ?
तो इस बार बच्चों ने बहुत ही गम्भीर उत्तर दिया
और वह उत्तर था कि अज्ञानतावश या मूर्खता के कारण।

फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने बच्चों को दूसरी बात यह बताई कि
जिन भी जीवों के नाखून तीखे नुकीले होते हैं, वे सब के सब माँसाहारी होते हैं,
जैसे- शेर, बिल्ली, कुत्ता, बाज, गिद्ध या अन्य कोई तीखे नुकीले नाखूनों वाला जीव….
और
जिन जीवों के नाखून चौड़े चपटे होते हैं वे सब के सब शाकाहारी होते हैं,
जैसे-मनुष्य, गाय, घोड़ा, गधा, बैल, हाथी, ऊँट, हिरण, बकरी इत्यादि।

इस हिसाब से भी अब ये बताओ बच्चों कि मनुष्य के नाखून तीखे नुकीले होते हैं या चौड़े चपटे ??

सभी बच्चों ने कहा कि
चौड़े चपटे,,

फिर शिक्षक ने पूछा कि
अब ये बताओ इस हिसाब से मनुष्य कौन से जीवों की श्रेणी में हुआ ??
सब के सब बच्चों ने एक सुर में कहा कि शाकाहारी ।

फिर शिक्षक ने बच्चों से तीसरी बात यह बताई कि,
जिन भी जीवों अथवा पशु-प्राणियों को पसीना आता है, वे सब के सब शाकाहारी होते हैं,
जैसे- घोड़ा, बैल, गाय, भैंस, खच्चर, आदि अनेकानेक प्राणी… ।
जबकि
माँसाहारी जीवों को पसीना नहीं आता है, इसलिए कुदरती तौर पर वे जीव अपनी जीभ निकाल कर लार टपकाते हुए हाँफते रहते हैं
इस प्रकार वे अपनी शरीर की गर्मी को नियंत्रित करते हैं…. ।

तो प्रश्न यह उठता है कि
मनुष्य को पसीना आता है या मनुष्य जीभ से अपने तापमान को एडजस्ट करता है ??

सभी बच्चों ने कहा कि मनुष्य को पसीना आता है, इसलिए मनुष्य भी शाकाहारी हुआ।
फिर शिक्षक ने एक पहचान और बताई कि जो मांसाहारी होते हैं वह जीभ से चाट कर पानी पीते हैं जबकि शाकाहारी सुरूक कर या खींच कर पीते हैं। बच्चों ने इस पर ताली बजाई।
शिक्षक ने कहा कि अच्छा यह बताओ कि
इस बात से भी मनुष्य कौन सा जीव सिद्ध हुआ, सब के सब बच्चों ने एक साथ कहा –
शाकाहारी ।
सभी लोग विशेषकर अहिंसा में, सनातन धर्म, संस्कृति और परम्पराओं में विश्वास करने वाले लोग भी चाहे तो बच्चों को नैतिक-बौद्धिक ज्ञान देने अथवा सीखने-पढ़ाने के लिए इस तरह बातचीत की शैली विकसित कर सकते हैं,
इससे जो वे समझेंगे सीखेंगे वह उन्हें जीवनभर काम आएगा…
याद रहेगा, पढ़ते वक्त बोर भी नहीं होंगे….।

बच्चे अगर बड़े हो जाएं तो उनको यह भी बताएं कि कैसे शाकाहारी मनुष्य जानकारी के अभाव में मांसाहार का उपयोग करता है और कहता है कि जब अन्न नहीं उपजाया जाता था तब मनुष्य मांसाहार का सेवन करते थे, जो सरासर गलत है ; तब मनुष्य कंद-मुल एवं फलों पर जीवित रहते थे, जो सही है एवं मनुष्य के संरचना और स्वभाव से मेल भी खाता है।

मनोबल

एक राजा के पास एक हाथी था। उस हाथी पर चढ़कर राजा ने कई युद्ध जीते थे। छोटे पन से ही वह हाथी राजा के पास था और हाथी युद्ध कला में प्रवीण हो चुका था। यह पर्वत सा हाथी जब गुस्से से सिंघाड़ा हुआ कोमा दुश्मन सेना में घूमता था तो दुश्मनों के छक्के छूट जाते थे पुलिस डॉग धीरे-धीरे हाथी बूढ़ा होने लगा। उसका जोश और पराक्रम जाता रहा। अब उसका ध्यान भी पहले से कम रखा जाता था। कई बार उसे समय पर खाना भी नहीं मिलता था।

एक बार हाथी हाथीशाला से निकल गए एक पुराने तालाब के किनारे चला गया। वहां उसने खूब छत पर पानी पिया और नहाने के लिए गहरे पानी में उतर गया। पर तालाब में ज्यादा कीचड़ होने के कारण वह वृद्ध हाथी उसमें फंस गया। वह जितना कीचड़ से निकलने का प्रयास करता कोमा उतना वह अंदर दस्त आ जाता। आसपास के लोगों से संदेश राजा तक पहुंचाया। राधा ने भी हर तरह के प्रयास करवाएं, पर कोई नतीजा नहीं निकला।

तभी एक मंत्री ने राजा को 1 उपाय सुझाया। सारे आदमियों को युद्ध सैनिकों की वेशभूषा पहनाई गई और वह सभी वाद्य यंत्र मंगवाए गए कोमा जो युद्ध के मौके पर काम लिए जाते थे। हाथी के सामने युद्ध के नगाड़े बजने लगे और सैनिक इस तरह से उस हाथी की ओर बढ़ने लगे, जैसे वह दुश्मन पक्ष के हो। यह दृश्य देखकर उस हाथी में गजब का जोश से आ गया। उसने जोर से सिंघाड़ा और दुश्मन पर हमला करने के लिए अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल करते हुए कीचड़ को रोते हुए तालाब के किनारे पहुंच गया।

कुल मिलाकर मनुष्य की सफलताएं उसके मनोबल पर निर्भर करती है। मनोबल के दम पर हम असंभव को संभव बना देते हैं।

लक्ष्य प्राप्ति की राह

लक्ष्य प्राप्ति की राह

एक किसान के घर एक दिन उसका कोई परिचित मिलने आया। उस समय वह घर पर नहीं था।

उसकी पत्नी ने कहा: वह खेत पर गए हैं। मैं बच्चे को बुलाने के लिए भेजती हूं। तब तक आप इंतजार करें।

कुछ ही देर में किसान खेत से अपने घर आ पहुंचा। उसके साथ-साथ उसका पालतू कुत्ता भी आया।

कुत्ता जोरों से हांफ रहा था। उसकी यह हालत देख, मिलने आए व्यक्ति ने किसान से पूछा क्या तुम्हारा खेत बहुत दूर है ?

किसान ने कहा: नहीं, पास ही है। लेकिन आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?

उस व्यक्ति ने कहा: मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि तुम और तुम्हारा कुत्ता दोनों साथ-साथ आए!

लेकिन तुम्हारे चेहरे पर रंच मात्र थकान नहीं जबकि कुत्ता बुरी तरह से हांफ रहा है।

किसान ने कहा: मैं और कुत्ता एक ही रास्ते से घर आए हैं। मेरा खेत भी कोई खास दूर नहीं है। मैं थका नहीं हूं। मेरा कुत्ता थक गया है।

इसका कारण यह है कि मैं सीधे रास्ते से चलकर घर आया हूं, मगर कुत्ता अपनी आदत से मजबूर है।

वह आसपास दूसरे कुत्ते देखकर उनको भगाने के लिए उसके पीछे दौड़ता था और भौंकता हुआ वापस मेरे पास आ जाता था। फिर जैसे ही उसे और कोई कुत्ता नजर आता, वह उसके पीछे दौड़ने लगता। अपनी आदत के अनुसार उसका यह क्रम रास्ते भर जारी रहा। इसलिए वह थक गया है।

देखा जाए तो यही स्थिति आज के इंसान की भी है।

जीवन के लक्ष्य तक पहुंचना यूं तो कठिन नहीं है, लेकिन राह में मिलने वाले कुत्ते, व्यक्ति को उसके जीवन की सीधी और सरल राह से भटका रहे हैं।

इंसान अपने लक्ष्य से भटक रहा है और यह भटकाव ही इंसान को थका रहा है।

यह लक्ष्य प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है। आपकी ऊर्जा को रास्ते में मिलने वाले कुत्ते बर्बाद करते है।

भौंकने दो इन कुत्तो को और लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में सीधे बढ़ते रहो.. फिर एक ना एक दिन मंजिल मिल ही जाएगी।

लेकिन इनके चक्कर में पड़ोगे तो थक ही जाओगे। अब ये आपको सोचना है कि किसान की तरह सीधी राह चलना है या उसके कुत्ते की तरह।

सफलता के लिए सही समय कि नहीं, सही निर्णय की जरूरत होती है।

प्रेम दुर्लभ है –
उसे पकड़ कर रखें!
क्रोध बहुत खराब है-
उसे दबाकर रखें।
भय बहुत भयानक है-
उसका सामना करें!
स्मृतियाँ बहुत सुखद हैं-
उन्हें संजोकर रखें।

Quiz conversation between Yudhishthira and Yaksha

युधिष्ठिर और यक्ष की प्रश्नोतरी वार्तालाप

दुर्योधन को गंधर्व चित्रसेन के बंधन से मुक्त करा कर जब पांडव द्वैत वन वापस आए, उसी समय एक ब्राह्मण युधिष्ठिर के पास आकर बोला महाराज मैंने अरणीय के साथ अपना सामान एक वृक्ष पर टांग रखा था। एक मेरी उसे लेकर भाग गया है। आप उसे वापस दिलाने की कृपया करें। युधिष्ठिर ने ब्राह्मण को आश्वस्त करते हुए पहले जल पीने के लिए कहा और नकुल से जल लाने के लिए कहा।

समीप ही एक जलकुंड था। नकुल ने कुंड में जैसे ही पात्र डाला कोमा उसमें से आवाज आई ठहरो पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो कोमा तभी तुम जल ले सकते हो। नकुल ने उस आवाज की अनसुनी करते हुए पानी लेना चाहा। आवाज लगाने वाले यक्ष ने तुरंत उसे अचेत कर दिया। इसी प्रकार सहदेव कोमा अर्जुन और भीम भीम क्रम से पानी भरने आए और यक्ष के प्रश्नों की और ध्यान ना देने के कारण अचेत हो गए। अंत में युधिष्ठिर आएं। उनसे भी यक्ष ने वही बात कही। युधिष्ठिर ने धैर्य पूर्वक यक्ष से प्रश्न पूछने के लिए कहा।

यक्ष ने प्रश्न किया धर्म का एकमात्र साधन क्या है? यश प्राप्ति व स्वर्ग प्राप्ति का एकमात्र साधन क्या है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया दक्षता धर्म का एकमात्र साधन है। दान यश का एकमात्र उपाय है। सत्य ही स्वर्ग प्राप्ति का एकमात्र साधन है।

यक्ष ने प्रश्न किया मनुष्य की आत्मा कौन है? भाग्य द्वारा प्राप्त मित्र कौन है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया पुत्र मनुष्य की आत्मा है। पत्नी भाग्य द्वारा प्राप्त मित्र है।

यक्ष ने प्रश्न किया सर्वोत्तम लाभ व सुख क्या है।
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया निरोग इता सर्वोत्तम लाभ है। संतोष सर्वोत्तम सुख है।

यक्ष ने प्रश्न किया धर्म से बढ़कर क्या है? कौन सा धर्म सर्वोत्तम है? वह क्या है, जिसको नियंत्रण करके प्रसन्नता होती है? किन के साथ मित्रता करके दुख नहीं होता?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया उदारता धर्म से बढ़कर है। सेवा सर्वोत्तम धर्म है। मन का नियंत्रण करके प्रसन्नता होती है। सज्जनों की मित्रता से कभी दुख नहीं होता।

यक्ष ने प्रश्न किया किसके त्याग कर मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है? किस वस्तु के त्याग से शोक नहीं होता?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया अहंकार का त्याग करने से मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है। क्रोध के त्याग से शोक नहीं होता।

यक्ष ने प्रश्न किया तब का लक्षण क्या है? सबसे बड़ी क्षमा क्या है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया स्वधर्म का पालन करना ही तपस्या है। सुख दुख को सहन करना सबसे बड़ी क्षमा है।

यक्ष ने प्रश्न किया दुर्जय शत्रु कौन है? अंत ना होने वाली बीमारी क्या है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया क्रोध दुर्जय शत्रु है। लोग कभी समाप्त ना होने वाली बीमारी है।

यक्ष ने प्रश्न किया सबसे बड़ा स्नान व दान क्या है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया मनोविकार ओं का त्याग सबसे बड़ा स्नान है। प्राणी की रक्षा ही सबसे बड़ा दान है।

यक्ष ने प्रश्न किया उत्तम मार्ग क्या है? सबसे अधिक प्रश्न व्यक्ति कौन है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया सज्जनों द्वारा सेवन किया मार्ग उत्तम मार्ग है। जो परिवार के साथ प्रसन्न रहता है कोमा वही सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति है।

युधिष्ठिर ने यक्ष के सभी प्रश्नों के सही उत्तर दिए। इससे प्रसन्न होकर यक्ष ने उनके सभी भाइयों को पुनः जीवित कर दिया।

भगवान पर विश्वास

एक आदमी की नई नई शादी हुई और वो अपनी पत्नि के साथ वापिस आ रहा था। रास्ते में उन दोनों को एक बडी झील को नाव के द्वारा पार करना था, तभी अचानक भयंकर तूफ़ान आ गया!

पति तो निड़र था लेकिन पत्नी बहुत डरी हुई थी क्योंकि हालात बिल्कुल खराब हो चुके थे। नाव बहुत छोटी थी और तूफ़ान बहुत भयंकर था दोनों किसी भी समय डूब सकते थे। लेकिन पति चुपचाप, निश्चल और शान्त बैठा था जैसे कि कुछ नहीं होने वाला!

वही दूसरी तरफ पत्नि डर के मारे कांप रही थी और पति से बोली – क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा कि ये हमारे जीवन का आखरी क्षण भी हो सकता है? ऐसा नहीं लगता कि हम दूसरे किनारे पर कभी पहुंच भी पायेंगे। अब तो कोई चमत्कार ही हमें बचा सकता है वर्ना हमारी मौत निश्चित ही है!

पत्नि बड़बड़ाए जा रही थी – क्या तुम्हें बिल्कुल भी डर नहीं लग रहा ? कहीं तुम पागल-वागल या पत्थर- वत्थर तो नहीं हो ?

पति खूब हँसा और एकाएक उसने “म्यान से तलवार” निकाल ली!

पत्नि अब और परेशान हो गई कि पति क्या कर रहा है फिर पति उस नंगी तलवार को पत्नि की गर्दन के पास ले आया, इतना पास कि उसकी गर्दन और तलवार के बीच बिल्कुल कम फासला बचा था बल्कि ये कहें कि तलवार लगभग उसकी गर्दन को छू रही थी!

फिर पति अपनी पत्नि से बोला – क्या तुम्हें डर लग रहा है?

पत्नि खूब हँसी और बोली – जब तलवार आपके हाथ में है तो डर कैसा क्योंकि मैं जानती हूँ कि आप मुझे बहुत प्यार करते हो इसलिए कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते!

पति ने तलवार वापिस म्यान में डाल दी, और बोला कि यही मेरा जवाब है मैं भी जानता हूँ कि भगवान मुझे बहुत प्यार करते है और ये तूफ़ान उनके हाथ में है, इसलिए जो भी होगा अच्छा ही होगा!

अगर हम बच गये तो भी अच्छा और अगर नहीं बचे तो भी अच्छा क्योंकि सब कुछ उस परमात्मा के हाथ में है और वो कभी भी कुछ भी गलत नहीं कर सकते, वो जो भी करेंगे, हमारे भले के लिए ही करेंगे!

इस कहानी से हमें यह सीखने को मिलता है कि व्यक्ति को हमेशा उस परमपिता-परमात्मा पर विश्वास रखना चाहिये, जो एक क्षण में हमारे पूरे जीवन को बदल सकते है!