मन का दर्पण

एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा से बहुत प्रभावित हुए। विद्या पूरी होने के बाद जब शिष्य विदा होने लगा तो गुरू ने उसे आशीर्वाद के रूप में एक दर्पण दिया।

वह साधारण दर्पण नहीं था । उस दिव्य दर्पण में किसी भी व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी।

शिष्य, गुरू के इस आशीर्वाद से बड़ा प्रसन्न था। उसने सोचा कि चलने से पहले क्यों न दर्पण की क्षमता की जांच कर ली जाए।

परीक्षा लेने की जल्दबाजी में उसने दर्पण का मुंह सबसे पहले गुरुजी के सामने कर दिया!

शिष्य को तो सदमा लग गया । दर्पण यह दर्शा रहा था कि गुरुजी के हृदय में मोह, अहंकार, क्रोध आदि दुर्गुण स्पष्ट नजर आ रहे है।

मेरे आदर्श, मेरे गुरूजी इतने अवगुणों से भरे है !”

यह सोचकर वह बहुत दुखी हुआ. दुखी मन से वह दर्पण लेकर गुरुकुल से रवाना हो गया तो हो गया लेकिन रास्ते भर मन में एक ही बात चलती रही कि जिन गुरुजी को समस्त दुर्गुणों से रहित एक आदर्श पुरूष समझता था लेकिन दर्पण ने तो कुछ और ही बता दिया।

उसके हाथ में दूसरों को परखने का यंत्र आ गया था। इसलिए उसे जो मिलता उसकी परीक्षा ले लेता !

उसने अपने कई इष्ट मित्रों तथा अन्य परिचितों के सामने दर्पण रखकर उनकी परीक्षा ली। सब के हृदय में कोई न कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया।

जो भी अनुभव रहा सब दुखी करने वाला वह सोचता जा रहा था कि संसार में सब इतने बुरे क्यों हो गए है। सब दोहरी मानसिकता वाले लोग है।

लोग बाहर से जो दिखते हैं दरअसल वे हैं नहीं।

इन्हीं निराशा से भरे विचारों में डूबा दुखी मन से वह किसी तरह घर तक पहुंच गया!

उसे अपने माता-पिता का ध्यान आया। उसके पिता की तो समाज में बड़ी प्रतिष्ठा है। उसकी माता को तो लोग साक्षात देवतुल्य ही कहते है। इनकी परीक्षा की जाए।

उसने उस दर्पण से माता-पिता की भी परीक्षा कर ली। उनके हृदय में भी कोई न कोई दुर्गुण देखा। ये भी दुर्गुणों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। संसार सारा मिथ्या पर चल रहा है।

अब उस शिष्य के मन की बेचैनी सहन के बाहर हो चुकी थी।

उसने दर्पण उठाया और चल दिया गुरुकुल की ओर शीघ्रता से पहुंचा और सीधा जाकर अपने गुरूजी के सामने खड़ा हो गया।

गुरुजी उसके मन की बेचैनी देखकर सारी बात का अंदाजा लगा चुके थे ।

चेले ने गुरुजी से विनम्रतापूर्वक कहा- गुरुदेव, मैंने आपके दिए दर्पण की मदद से देखा कि सबके दिलों में तरह-तरह के दोष है।

कोई भी दोषरहित सज्जन मुझे अभी तक क्यों नहीं दिखा?

क्षमा के साथ कहता हूं कि स्वयं आप में और अपने माता-पिता में मैंने दोषों का भंडार देखा । इससे मेरा मन बड़ा व्याकुल है।

तब गुरुजी हंसे और उन्होंने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया। शिष्य दंग रह गया। उसके मन के प्रत्येक कोने में राग-द्वेष, अहंकार, क्रोध जैसे दुर्गुण भरे पड़े थे। ऐसा कोई कोना ही न था जो निर्मल हो।

गुरुजी बोले- बेटा यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था न कि दूसरों के दुर्गुण खोजने के लिए।

जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने में लगाया उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व बदल चुका।

कहा भी है कि –
बुरा जो देखन में चला,
बुरा ना मिलिया कोई!
जो दिल खोजों आपना,
मुझसे बुरा ना कोई!!

लक्ष्मण जी की आनंद यात्रा……

भगवान श्रीराम ने एक बार पूछा कि लक्ष्मण तुमने अयोध्या से लेकर लंका तक की यात्रा की है परन्तु उस यात्रा में सबसे अधिक आनंद तुम्हें कब आया?

लक्ष्मणजी ने कहा कि भैया, मेरी सबसे बढ़िया यात्रा तो लंका में हुई और वह भी तब हुई जब मेघनाद ने मुझे बाण मार दिया!

प्रभु ने हंसकर कहा कि लक्ष्मण तब तो तुम मूर्छित हो गये थे, उस समय तुम्हारी यात्रा कहां हुई थी?

तब लक्ष्मणजी ने कहा कि प्रभु उसी समय तो सर्वाधिक सुखद यात्रा हुई!

लक्ष्मणजी का तात्पर्य था कि अन्य जितनी यात्राएं हुईं उन्हें तो मैंने चलकर पूरा किया!

लेकिन इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि मूर्छित होने के बाद भी हनुमानजी ने मुझे गोद में उठा लिया और आपकी गोद में पहुंचा दिया।

प्रभु, सन्त की गोद से लेकर ईश्वर की गोद तक की जो यात्रा थी जिसमें रंचमात्र कोई पुरुषार्थ नहीं था!
उस यात्रा में जितनी धन्यता की अनुभूति हमें हुई वह तो सर्वथा वाणी से परे है!

लक्ष्मणजी ने कहा _प्रभु, शेष के रूप में आपको गोदी में सुलाने का सुख तो मैंने देखा था पर आपकी गोदी में सोने का सुख तो सन्त की प्रेरणा से ही मुझे प्राप्त हुआ!

इसलिए मेरे हिसाब से तो सबसे महान वही यात्रा थी जो हनुमान जी की गोद से आपकी गोदी तक हुई थी!

लक्षमन की बात सुनकर भगवान श्रीराघवेन्द्र ने लक्ष्मण को हृदय से लगा लिया !!_

सचमुच, आन्तरिक यात्रा की अनुभूति का आनंद ही विलक्षण होता है!

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हीरा मोती

एक साधु था! वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था, ”जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।”

बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नही देता था और सब उसे एक पागल आदमी समझते थे।

एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।”

और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया। उसने साधु से पूछा – “महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मैं जो चाहता हूँ?”

साधु उसकी बात को सुनकर बोला – “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहता है मैं उसे जरुर दूंगा, बस तुम्हें मेरी बात माननी होगी।

लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हें आखिर चाहिये क्या?”

युवक बोला- मेरी एक ही ख्वाहिश है कि मैं हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ। “

साधु बोला, ”कोई बात नहीं मैं तुम्हें एक हीरा और एक मोती देता हूँ! उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे!”

और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा, ”पुत्र, मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे ‘समय’ कहते हैं! इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो।

युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी हथेली, पकड़ते हुए बोला, ”पुत्र , इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं! जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखन जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है।

युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करता है और निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा।

और ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू करता है और अपने मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनता है।

वास्तव में, ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।

अतः हम सभी के लिए ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्वाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें।
सुप्रभात

एक बाल्टी दूध…

जो कोई करै सो स्वार्थी, अरस परस गुण देत
बिन किये करै सो सूरमा, परमारथ के हेत!

अर्थ: जो अपने हेतु किये गये के बदले में कुछ करता है वह स्वार्थी है। जो किसी के किये गये उपकार के बिना किसी का उपकार करता है। वह वस्तुत: परमार्थ के लिये कार्य है।

एक बाल्टी दूध…

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एक बार एक राजा के राज्य में महामारी फैल गयी। चारो ओर लोग मरने लगे। राजा ने इसे रोकने के लिये बहुत सारे उपाय करवाये मगर कुछ असर न हुआ और लोग मरते रहे। दुखी राजा ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। तभी अचानक आकाशवाणी हुई। आसमान से आवाज़ आयी कि हे राजा तुम्हारी राजधानी के बीचो बीच जो पुराना सूखा कुंआ है अगर अमावस्या की रात को राज्य के प्रत्येक घर से एक – एक बाल्टी दूध उस कुएं में डाला जाये तो अगली ही सुबह ये महामारी समाप्त हो जायेगी और लोगों का मरना बन्द हो जायेगा। राजा ने तुरन्त ही पूरे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि महामारी से बचने के लिए अमावस्या की रात को हर घर से कुएं में एक-एक बाल्टी दूध डाला जाना अनिवार्य है ।

अमावस्या की रात जब लोगों को कुएं में दूध डालना था उसी रात राज्य में रहने वाली एक चालाक एवं कंजूस बुढ़िया ने सोंचा कि सारे लोग तो कुंए में दूध डालेंगे अगर मै अकेली एक बाल्टी पानी डाल दूं तो किसी को क्या पता चलेगा। इसी विचार से उस कंजूस बुढ़िया ने रात में चुपचाप एक बाल्टी पानी कुंए में डाल दिया। अगले दिन जब सुबह हुई तो लोग वैसे ही मर रहे थे। कुछ भी नहीं बदला था क्योंकि महामारी समाप्त नहीं हुयी थी। राजा ने जब कुंए के पास जाकर इसका कारण जानना चाहा तो उसने देखा कि सारा कुंआ पानी से भरा हुआ है। दूध की एक बूंद भी वहां नहीं थी। राजा समझ गया कि इसी कारण से महामारी दूर नहीं हुई और लोग अभी भी मर रहे हैं।

दरअसल ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि जो विचार उस बुढ़िया के मन में आया था वही विचार पूरे राज्य के लोगों के मन में आ गया और किसी ने भी कुंए में दूध नहीं डाला।

मित्रों , जैसा इस कहानी में हुआ वैसा ही हमारे जीवन में भी होता है। जब भी कोई ऐसा काम आता है जिसे बहुत सारे लोगों को मिल कर करना होता है तो अक्सर हम अपनी जिम्मेदारियों से यह सोच कर पीछे हट जाते हैं कि कोई न कोई तो कर ही देगा और हमारी इसी सोच की वजह से स्थितियां वैसी की वैसी बनी रहती हैं। अगर हम दूसरों की परवाह किये बिना अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने लग जायें तो पूरे देश की जनता ऐसा बदलाव ला सकती हैं जिसकी आज हमें ज़रूरत है ।

एक अकेला थक जायेगा मिल कर बोझ उठाना साथी हाथ बढ़ाना।

अज्ञानता

एक जौहरी के निधन के बाद उसका परिवार संकट में पड़ गया। खाने के भी लाले पड़ गए।
एक दिन उसकी पत्नी ने अपने बेटे को नीलम का एक हार देकर कहा- ‘बेटा, इसे अपने चाचा की दुकान पर ले जाओ। उनसे कहना किइसे बेचकर कुछ रुपये दे दें।

बेटा वह हार लेकर चाचा जी के पास गया। चाचा ने हार को अच्छी तरह से देख परखकर कहा- बेटा, मां से कहना कि अभी बाजार बहुत मंदा है। थोड़ा रुककर बेचना! अच्छे दाम मिलेंगे।

साथ ही उसे थोड़े से रुपये देकर कहा कि तुम कल से हमारी दुकान पर आकर बैठना।

अगले दिन से वह लड़का रोज दुकान पर जाने लगा और वहां हीरों रत्नो की परख का काम सीखने लगा।
दूकान में काम करते करते एक दिन वह बड़ा पारखी बन गया। लोग दूर-दूर से अपने हीरे की परख कराने आने लगे।

एक दिन उसके चाचा ने कहा, बेटा अपनी मां से वह हार लेकर आना! और कहना कि अब बाजार बहुत तेज है, उसके अच्छे दाम मिल जाएंगे।

उसने घर जाकर मां से हार लेकर उसने परखा तो पाया कि वह तो नकली है।

वह उसे घर पर ही छोड़ कर दुकान लौट आया।

चाचा ने पूछा, बेटा, हार नहीं लाए क्या?
उसने कहा, चाचा वह हार तो नकली था।
तब चाचा ने कहा- जब तुम पहली बार हार लेकर आये थे!
तब मैं उसे नकली बता देता तो तुम सोचते कि आज हम पर बुरा वक्त आया तो चाचा हमारी चीज को भी नकली बताने लगे।
आज जब तुम्हें खुद ज्ञान हो गया तो पता चल गया कि हार सचमुच नकली है।

सच यह है कि ज्ञान के बिना इस संसार में हम जो भी सोचते, देखते और जानते हैं, सब गलत है और ऐसे ही अज्ञानता में हम सही-गलत का भेद नहीं कर पाते! साथ ही गलतफहमी का शिकार होकर हमारे रिश्ते बिगडते हैं।

जीवन का आनंद

एक बार एक सम्राट एक साधु से बहुत प्रभावित हो गए। सम्राट रोज रात को अपने घोड़े पर सवार होकर राज्य का चक्कर लगाने निकलते थे, उस समय रोज उस साधु को देखते थे।
वह साधु एक वृक्ष के नीचे अपनी मस्ती में बैठे, कभी बाँसुरी बजाते, कभी नाचते, कभी गीत गुनगुनाते और कभी चुपचाप बैठ कर आकाश के तारों को देखते रहते थे।

सम्राट जब भी घोड़े पर सवार होकर उसके पास से निकलते तो वहाँ रुक जाते।

उसकी मस्ती को देखते और फिर वहाँ से चले जाते। धीरे-धीरे उनको उस साधु को देखने में इतना रस मिलने लगा कि उसे देखते-देखते समय कब बीत जाता, उन्हें पता ही नहीं चलता। वे एक झाड़ी के पीछे दूर चुपचाप खडे रहते और उस साधु की मस्ती देखते रहते। उसकी मस्ती में ऐसे खो जाते कि खुद भी मस्त होकर घर लौटते।
यह रोज का ही सिलसिला बन गया था।

एक दिन सम्राट इतना भाव विभोर होकर उस साधु के चरणों में गिर पड़े और कहा कि, “हे गुरुदेव, मैं आपको यहाँ और नहीं रहने दूँगा। वर्षा ऋतु करीब आ रही है। यह वृक्ष है, इसके नीचे आप बारिश में कैसे रहेंगे। आप मेरे महल में चलकर मुझ पर कृपा करें। मुझे सेवा का अवसर दे।

यह सुनते ही साधु खड़े हो गए और अपनी झोली उठाई और कहा कि, “चलो।”

यह देखकर सम्राट को बहुत सदमा लगा।
सम्राट ने तो सोचा था कि मेरी बात सुन साधु कहेंगे – कैसा महल, कहाँ का महल, हम जहाँ हैं, वहीं मस्त हैं। हम महलों में नहीं जाना चाहते। हमने महलों और सभी सुख सुविधाओं का त्याग कर दिया है। सम्राट के मन में तो साधु से यह सब सुनने की अपेक्षा थी। अगर साधु ने ऐसा कहा होता तो सम्राट उनके पैरों में गिर कर कुछ और विनती कर लेते, लेकिन साधू तुरंत चलने को तैयार हो गये, तो सम्राट थोड़ा सदमे में आ गये।

उन्होंने सोचा कि कहीं मैंने गलती तो नहीं कर दी। इस आदमी ने मेरे साथ कोई चालबाजी तो नहीं की है। यह इसकी महल में घुसने की कोई तरकीब तो नहीं है। यह कहीं मेरे ऊपर ही जाल तो नहीं फेंक रहा था। मैं फालतू ही इसके चक्कर में पड़ा।

सम्राट यह सब सोच ही रहा था कि तब तक वह साधु सम्राट के घोड़े पर चढ़कर बैठ गया और उसने सम्राट को चलने के लिए कहा।

सम्राट को जिंदगी में पहली बार पैदल चलना पड़ा जबकि वह साधु बड़े मजे से घोड़े पर बैठकर जा रहा था।

सम्राट का मन शक के घेरे मे फँस गया, लेकिन सम्राट अब अपनी बात से पलट भी नहीं सकते थे। वे अपने वचन के अधीन थे। सम्राट के मन में साधु के लिए सम्मान खत्म हो चुका था।

साधु महल में ऐसी ही मस्ती में रहने लगा जैसी मस्ती में वह वृक्ष के नीचे रहते थे।

साधु वृक्ष के नीचे भी बाँसुरी बजाते थे और महल में आकर भी वह बाँसुरी ही बजा रहें थे लेकिन अब वह मखमल के गद्दे पर बैठकर बाँसुरी बजा रहे थे। यह सब देख कर सम्राट का दिल जलने लगा।
वह सोचने लगा कि मैं किसे उठा लाया, यह कोई साधु नहीं है। सम्राट से भी ज्यादा शान से वह रहता है। सम्राट को तो चिंता और फिक्र भी थी क्योंकि उन्हें अपना साम्राज्य, अपना महल, अपनी धन दौलत, सभी को संभालना था। लेकिन साधु को तो कोई चिंता ही नहीं थी। वह तो अपनी ही मस्ती में बाँसुरी बजाए, नाचे-गाये और मस्ती में भोजन करें।

6 महीने तक किसी तरह सम्राट ने बर्दास्त किया लेकिन अब बात सम्राट के सहन के बाहर हो गई थी।

एक दिन सम्राट ने साधु से कहा कि, “हे गुरुदेव मेरे मन मे एक जिज्ञासा है। मुझे जानना है कि अब मुझ में और आप में क्या फर्क है?”

साधु ने कहा कि, “फर्क जानना चाहते हो।”

सम्राट ने कहा, “हाँ, महाराज।”

साधु ने कहा कि, “तुम 6 महीने क्यों परेशान रहे। यह बात तुम उसी वक्त पूछ लेते, जब मैं तुम्हारे घोड़े पर बैठा था क्योंकि मैंने तो देख ही लिया था कि यह बात तुम्हारे मन में उसी वक्त उठ गई थी। जब मैं अपना झोला उठाकर तुम्हारे साथ चलने को राजी हुआ था उसी वक्त मैंने तुम्हारा चेहरा पढ़ लिया था। यह प्रश्न तो उस वक्त भी तुम्हारे भीतर था। अरे बुद्धू; तुमने 6 महीने तक अपना दिल क्यों जलाया। वहीं पूछ लिया होता तो, मैं झोला डाल कर फिर वही बैठ जाता। क्यों नहीं पूछा तुमने, क्या संकोच था तुम्हारे मन में? मैं प्रतीक्षा ही कर रहा था कि कब तुम मुझसे पूछोगे। ठीक है, कल सुबह मैं तुम्हें फर्क बता ही देता हूँ। लेकिन हाँ, गाँव के बाहर बताऊँगा।”

सम्राट बहुत उत्सुक थे जानने के लिए कि क्या फर्क है।

सम्राट ने सोचा कि खाना जो मैं खाता हूँ, वह भी वही खाता है। मैं जिस कमरे में रहता हूँ, उससे भी ज्यादा सुंदर कमरे में ये साधू रहते हैं। मेरा दो तीन नौकरों से काम चल जाता है लेकिन वह पूरे दिन पंद्रह- बीस नौकरों से काम करवाता है। इसकी जरूरतों का कोई अंत नहीं। कपड़े शानदार पहनते है। यह खुद ही इस महल का सम्राट मालूम पड़ते है। कम से कम महल के बाकी लोग मुझसे डरते तो हैं। इसकी आँखों में तो डर नाम की कोई चीज ही नहीं है। बस पूरे दिन बिना किसी चिंता के मस्त बाँसुरी बजाते रहते हैं। अब देखते है कि आज क्या फर्क बतलाते है। उस पूरी रात सम्राट सो नहीं पाये सुबह जल्दी से तैयार होकर वह साधु के पास पहुंच गए। वहाँ जाकर देखा कि साधु ने वही पुराने कपड़े पहने हुए थे, जो कपड़े पहन कर वह वृक्ष के नीचे बैठते थे। एक हाथ में उसका झोला और दूसरे हाथ में उसकी बाँसुरी थी। वह तैयार खड़े थे।

सम्राट ने कहा, चलें महाराज।”

फिर दोनों महल के बाहर निकल आए। चलते-चलते गाँव की नदी पार हो गई। कुछ ही देर में वह दोंनो गाँव के बाहर आ गए।

सम्राट ने पूछा, “अभी और कितना चलना है।”

साधु ने कहा, “बस कुछ देर और।”

चलते चलते सुबह से दोपहर हो गई।

सम्राट ने कहा कि, “बस, अब मुझसे और आगे नहीं चला जाएगा। जो भी कहना है, यहीं कह दो।”

साधु ने कहा कि, “मैं तो और आगे जा रहा हूँ। तुम चल रहे हो या नहीं।”

सम्राट ने कहा, “मैं कैसे चल सकता हूँ। मेरा महल, मेरी बीवी, मेरे बच्चे, मेरा धन-दौलत सब कुछ पीछे रह गया है। मैं तुम्हारी तरह फ़कीर तो नहीं हूँ, जिसे किसी चीज की फिक्र नहीं है।”

साधु ने कहा, “बस यही फर्क है तुम्हारे और मेरे बीच में। मैं कहीं भी जा सकता हूँ, तुम नहीं जा सकते हो। मैं हर परिस्थिति में खुश रह सकता हूँ, लेकिन तुम नहीं रह सकते हो। जब मैं उस वृक्ष के नीचे रहता था तब भी मस्ती से रहता था और अपनी जिंदगी के एक-एक पल को जीता था। और मैं महल चला गया, तब भी मैंने अपने जीवन के एक-एक क्षण को पूरी मस्ती और खुशी के साथ जिया। अब मैं अगर कहीं और चला जाऊँ, तब भी मैं ऐसे ही जी लूँगा। हम जिस वक्त जहाँ रहते हैं, पूरी तरीके से वही रहते हैं। हम ना तो अपने बीते हुए कल के बारे में सोच कर पश्चाताप करते हैं और ना ही भविष्य की चिंता करके अपने वर्तमान को खराब करते हैं। हम बस आज में जीते हैं क्योंकि हम समझ चुके हैं कि जीवन तो आज में हैं। जीवन तो इसी पल को जीने में हैं। बस यही छोटा सा फर्क है, तुम में और मुझ में ।

तुम्हें परिस्थितियाँ चलाती है और हम परिस्थितियों को चलाते हैं।

तुम खुश रहोगे या दुखी, यह तुम्हारे आसपास होने वाली घटनाओं पर निर्भर करता है लेकिन हमारे लिए यह घटनाएँ जिंदगी के सफर का एक हिस्सा मात्र है।

अचानक सम्राट को महसूस हुआ कि अरे यह मैंने क्या कर दिया इतने अद्भुत आदमी को नहीं पहचान पाया। 6 महीने इनके साथ सत्संग भी नहीं कर पाया। सत्संग करता भी तो कैसे मेरे मन में तो यही चल रहा था कि यह एक ढोंगी बाबा है।

तुरंत सम्राट ने साधु के पैर पकड़ लिए और बोला, “नहीं महाराज, अब मैं आपको नहीं जाने दूँगा।”

साधु ने कहा “देख मुझे कोई परेशानी नहीं है। मैं फिर से तेरे महल मे चल दूँगा लेकिन फिर तुझे परेशानी होगी।”

ऐसा सुनते ही फिर सम्राट के मन में वही विचार आया कि यह साधु तो फिर आसानी से मान गया।

साधु ने सम्राट के चेहरे की तरफ बड़ी ध्यान से देखा और फिर बोले, “लेकिन नहीं, अब मैं नहीं आऊँगा क्योंकि तू फिर नहीं सुधरेगा। फिर तुझे परेशानी होगी और तू फिर से चिंता में पड़ जाएगा। हमारा क्या हम तो सन्यासी हैं। हमारे लिए महल और जंगल सब एक जैसे हैं। हमें कोई भी समस्या नहीं है क्योंकि जिसे समस्या है, वह सन्यासी ही नहीं है। मेरी बाँसुरी जैसे महल में बजाती थी, वैसी ही जंगल में भी बजेगी और बजती ही रहेगी।”

यह कहकर वह साधू वहाँ से चले गए और सम्राट वही खडे-खडे उस साधु को जाते हुए देख रहे थे।

इस प्रसंग में एक गहरा संदेश हम सभी के लिए छुपा है।
हम ऐसा सोचते हैं कि हम भी आजादी का जीवन जी रहे हैं, पर वास्तव में हम अवचेतन मन के द्वारा चलाए जा रहे हैं। हम अवचेतन मन के गुलाम है। वह साधु वास्तव में अपने मन को चला रहा था और हमें वास्तव में हमारा मन चला रहा है।

“यदि एक बार मन सामंजस्यपूर्ण स्थिति में आ जाए तो फिर न बाहरी परिस्थितियों और वातावरण का उस पर कोई प्रभाव होगा और न ही आंतरिक अशांति होगी।

मृत्यु एक सत्य हैं

एक राधेश्याम नामक युवक था! स्वभाव का बड़ा ही शांत एवम सुविचारों वाला व्यक्ति था! उसका छोटा सा परिवार था जिसमे उसके माता- पिता, पत्नी एवम दो बच्चे थे! सभी से वो बेहद प्यार करता था!

इसके अलावा वो कृष्ण भक्त था और सभी पर दया भाव रखता था! जरूरतमंद की सेवा करता था! किसी को दुःख नहीं देता था! उसके इन्ही गुणों के कारण श्री कृष्ण उससे बहुत प्रसन्न थे और सदैव उसके साथ रहते थे! और राधेश्याम अपने कृष्ण को देख भी सकता था और बाते भी करता था! इसके बावजूद उसने कभी ईश्वर से कुछ नहीं माँगा! वह बहुत खुश रहता था क्यूंकि ईश्वर हमेशा उसके साथ रहते थे! उसे मार्गदर्शन देते थे! राधेश्याम भी कृष्ण को अपने मित्र की तरह ही पुकारता था और उनसे अपने विचारों को बाँटता था!

एक दिन राधेश्याम के पिता की तबियत अचानक ख़राब हो गई! उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया! उसने सभी डॉक्टर्स के हाथ जोड़े! अपने पिता को बचाने की मिन्नते की! लेकिन सभी ने उससे कहा कि वो ज्यादा उम्मीद नहीं दे सकते! और सभी ने उसे भगवान् पर भरोसा रखने को कहा!

तभी राधेश्याम को कृष्ण का ख्याल आया और उसने अपने कृष्ण को पुकारा! कृष्ण दौड़े चले आये! राधेश्याम ने कहा – मित्र ! तुम तो भगवान हो मेरे पिता को बचा लो!

कृष्ण ने कहा – मित्र ! ये मेरे हाथों में नहीं हैं! अगर मृत्यु का समय होगा तो होना तय हैं!
इस पर राधेश्याम नाराज हो गया और कृष्ण से लड़ने लगा, गुस्से में उन्हें कौसने लगा!
भगवान् ने भी उसे बहुत समझाया पर उसने एक ना सुनी!

तब भगवान् कृष्ण ने उससे कहा – मित्र ! मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ लेकिन इसके लिए तुम्हे एक कार्य करना होगा!

राधेश्याम ने तुरंत पूछा कैसा कार्य?
कृष्ण ने कहा – तुम्हे, किसी एक घर से मुट्ठी भर ज्वार लानी होगी और ध्यान रखना होगा कि उस परिवार में कभी किसी की मृत्यु न हुई हो!
राधेश्याम झट से हाँ बोलकर तलाश में निकल गया!
उसने कई दरवाजे खटखटायें! हर घर में ज्वार तो होती लेकिन ऐसा कोई नहीं होता जिनके परिवार में किसी की मृत्यु ना हुई हो! किसी का पिता, किसी का दादा, किसी का भाई, माँ, काकी या बहन! दो दिन तक भटकने के बाद भी राधेश्याम को ऐसा एक भी घर नहीं मिला!

तब उसे इस बात का अहसास हुआ कि मृत्यु एक अटल सत्य हैं! इसका सामना सभी को करना होता हैं! इससे कोई नहीं भाग सकता! और वो अपने व्यवहार के लिए कृष्ण से क्षमा मांगता हैं और निर्णय लेता हैं जब तक उसके पिता जीवित हैं उनकी सेवा करेगा!

थोड़े दिनों बाद राधेश्याम के पिता स्वर्ग सिधार जाते हैं! उसे दुःख तो होता हैं लेकिन ईश्वर की दी उस सीख के कारण उसका मन शांत रहता है!

इसी प्रकार हम सभी को इस सच को स्वीकार करना चाहिये कि मृत्यु एक अटल सत्य हैं उसे नकारना मूर्खता हैं!
दुःख होता हैं लेकिन उसमे फँस जाना गलत हैं क्यूंकि केवल आप ही उस दुःख से पीड़ित नहीं हैं अपितु सम्पूर्ण मानव जाति उस दुःख से रूबरू होती ही हैं! ऐसे सच को स्वीकार कर आगे बढ़ना ही जीवन है!

कई बार हम अपने किसी खास के चले जाने से इतने बेबस हो जाते हैं कि सामने खड़ा जीवन और उससे जुड़े लोग हमें दिखाई ही नहीं पड़ते! ऐसे अंधकार से निकलना मुश्किल हो जाता हैं! जो मनुष्य मृत्यु के सत्य को स्वीकार कर लेता हैं उसका जीवन भार विहीन हो जाता हैं और उसे कभी कोई कष्ट तोड़ नहीं सकता! वो जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ता जाता है!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है!
किसी भी रिश्ते की कदर जीते-जी करिए और जी-जान से करिए!
संसार से जाने वाला कभी वापिस नहीं आता, चाहे वह कितना ही करीबी क्यों न हो!

सबसे-बड़ा-मूर्ख

एक बहुत धनी व्यापारी था। उसने बहुत धन सम्पत्ति इकट्ठा कर रखी थी। उसका एक नौकर था सम्भु। जो अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा गरीबों की मदद में खर्च कर देता था। व्यापारी रोज उसे धन बचाने की शिक्षा देता। लेकिन सम्भु पर कोई असर नहीं होता था।

इससे तंग आकर एक दिन व्यापारी ने सम्भु को एक डन्डा दिया और कहा कि जब तुझे अपने से भी बड़ा कोई मूर्ख मिले तो इसे उसको दे देना।

इसके बाद व्यापारी अक्सर उससे पूछता कि कोई तुझसे बड़ा मूर्ख मिला?

सम्भु विनम्रता से इनकार कर देता।

एक दिन व्यापारी बीमार हो गया। रोग इतना बढ़ा कि वह मरणासन्न हो गया।

अन्तिम समय उसने सम्भु को अपने पास बुलाया और कहा कि अब मैं इस संसार को छोड़कर जाने वाला हूँ।

सम्भु ने कहा, “मालिक मुझे भी अपने साथ ले चलिए।”

व्यापारी ने प्यार से डांँटते हुए कहा, “वहांँ कोई किसी के साथ नहीं जाता।”

सम्भु ने फिर कहा, ”फिर तो आप धन-दौलत, सुख- सुविधा के सामान जरूर ले जाइये और आराम से वहांँ रहियेगा।”

व्यापारी ने कहा, ”पगले! वहांँ कुछ भी लेकर नहीं जाया जा सकता। सबको अकेले और खाली हाथ ही जाना पड़ता है।”

इस पर सम्भु बोला, “मालिक! तब तो यह डन्डा आप ही रखिये। जब कुछ लेकर जाया नहीं जा सकता। तो आपने बेकार ही पूरा जीवन धन दौलत और सुख सुविधाओं को एकत्र करने में नष्ट कर दिया। न तो दान पुण्य किया, न ही भगवान का भजन-सुमिरण। इस डंडे के असली हकदार तो आप ही हो।”

इसलिए अधिक धन का लोभ नहीं करना चाहिए। क्योंकि अन्त समय में मनुष्य के साथ कुछ नहीं जाता केवल सेवा, सतसंग, नाम-सुमिरण की कमाई ही साथ जायेगी।

राम से बड़ा राम का ‘नाम’

रामदरबार में हनुमानजी महाराज श्री रामजी की सेवा में इतने तन्मय हो गए कि गुरू वशिष्ठ k आने का उनको ध्यान ही नहीं रहा. .. सबने उठ कर उनका अभिवादन किया लेकिन हनुमानजी नहीं कर पाए. ..

वशिष्ठ जी ने श्री रामजी से कहा कि राम गुरु का भरे दरबार में अभिवादन नहीं कर अपमान करने पर क्या सजा होनी चाहिए।

श्री रामजी ने कहा गुरुवर आप ही बताएं
वशिष्ठ जी ने कहा:- “मृत्यु दण्ड”
श्रीराम जी ने कहा:- स्वीकार है

तब श्रीराम जी ने कहा:- गुरुदेव आप बताएं कि यह अपराध किसने किया है..

बता दूंगा पर “राम” वो तुम्हारा इतना प्रिय है कि, तुम अपने आप को सजा दे दोगे पर उसको नहीं दे पाओगे

श्रीराम जी ने कहा:- गुरुदेव,राम के लिए सब समान हैं, मैंने सीता जैसी पत्नी का सहर्ष त्याग धर्म के लिए कर दिया….फिर भी आप संशय कर रहे हैं..

नहीं, “राम”! मुझे तुम्हारे उपर पर संशय नहीं है पर, मुझे दण्ड के परिपूर्ण होने पर संशय है…. अत:यदि तुम यह विश्वास दिलाते हो कि,तुम स्वयं उसे मृत्यु दण्ड अपने अमोघ बाण से दोगे तो ही मैं अपराधी का नाम और अपराध बताऊंगा

श्रीराम जी ने पुन: अपना संकल्प व्यक्त कर दिया. .

तब वशिष्ठ जी ने बताया कि यह अपराध हनुमान जी ने किया है।

हनुमानजी ने भी स्वीकार कर लिया. ..
तब दरबार में रामजी ने घोषणा की कि कल सांयकाल सरयु के तट पर,हनुमानजी को में स्वयं अपने अमोघ बाण से मृत्यु दण्ड दूंगा।

हनुमानजी के घर जाने पर उदासी की अवस्था में माता अंजनी ने देखा तो चकित रह गई कि मेरा लाल महावीर, अतुलित बल का स्वामी, ज्ञान का भण्डार, आज इस अवस्था में..

माता ने बार बार पुछा, पर जब हनुमान चुप रहें तो माता ने अपने दूध का वास्ता देकर पूछा. ..
तब हनुमानजी ने बताया कि, यह प्रकरण हुआ है अनजाने में..

माता! आप जानती हैं कि हनुमान को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में कोई नहीं मार सकता, पर भगवान श्रीराम के अमोघ बाण से भी कोई बच भी नहीं सकता…

तब “माता” ने कहा:-
हनुमान,मैंने भगवान शंकर से, “राम” मंत्र (नाम) प्राप्त किया था ,और तुम्हें भी जन्म के साथ ही यह नाम घुटी में पिलाया…

जिसके प्रताप से तुमने बचपन में ही सूर्य को फल समझ मुख में ले लिया था,उस राम नाम के होते हुए हनुमान कोई भी तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकता,चाहे वो राम स्वयं ही क्यों ना हों…

राम नाम की शक्ति के सामने राम की शक्ति और राम के अमोघ शक्तिबाण की शक्तियां महत्वहीन हो जाएंगी।

जाओ मेरे लाल,अभी से सरयु के तट पर जाकर राम नाम का उच्चारण करना आरंभ करदो।
माता के चरण छूकर हनुमानजी,सरयु किनारे राम राम राम राम रटने लगे…

सांयकाल,राम अपने सम्पूर्ण दरबार सहित सरयु तट आए….

सबको कोतूहल था कि क्या राम हनुमान को सजा देंगे..

लेकिन जब श्रीराम ने बार बार रामबाण,अपने महान शक्तिधारी,अमोघशक्ति बाण चलाए पर हनुमानजी के ऊपर उनका कोई असर नहीं हुआ तो गुरु वशिष्ठ जी ने शंका जताई:-
राम क्या तुम अपनी पुर्ण निष्ठा से बाणों का प्रयोग कर रहे हो..

तब श्रीराम ने कहा:- हां गुरूदेव, मैं गुरु के प्रति अपराध की सजा देने को अपने बाण चला रहा हूं,उसमें किसी भी प्रकार की चतुराई करके मैं कैसे वही अपराध कर सकता हूं..

तो तुम्हारे बाण अपना कार्य क्यों नहीं कर रहे हॆ
तब श्रीराम ने कहा:- गुरुदेव हनुमान राम राम राम की अंखण्ड रट लगाये हुए है,मेरी शक्तिंयों का अस्तित्व राम नाम के प्रताप के समक्ष महत्वहीन हो रहा है…

इससे मेरा कोई भी प्रयास सफल नहीं हो रहा है,आप ही बताएं गुरु देव ! मैँ क्या करुं..

गुरु देव ने कहा:- हे राम! आज से मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे दरबार को त्याग कर,अपने आश्रम जा रहा हूं जहां राम नाम का निरंतर जप करुंगा…

जाते -जाते, गुरुदेव वशिष्ठ जी ने घोषणा की….हे राम ! मैं जानकर,मानकर,यह घोषणा कर रहा हूं कि स्वयं राम से राम का नाम बडा़ है,राम नाम महाअमोघशक्ति का सागर है..

जो कोई जपेगा,लिखेगा,मनन करेगा,उसकी लोक कामनापूर्ति होते हुए भी,वो मोक्ष का भागी होगा।

मैंने सारे मंत्रों की शक्तियों को राम नाम के समक्ष न्युनतर माना है. .

तभी से राम से बडा राम का नाम माना जाता है,वो पत्थर भी तैर जातें है जिन पर राम का नाम लिखा रहता है।