जीवन में सच्चे गुरु की सार्थकता

महत्वपूर्ण यह नहीं है कि कहांँ जा रहे हो और किस मार्ग से जा रहे हो।
महत्वपूर्ण यह है कि जो जा रहा है, वह कौन है?
स्वयं को जानने से ही परमानन्द की मन्जिल मिलती है।
जिसने स्वयंँ को नहीं जाना – वह कितने ही शास्त्र, कितने ही सिद्धान्त और कितनी ही ज्ञान कुन्जी लेकर चलता रहे, उसके पैर सत्य के रास्ते पर नहीं पड़ेंगे, गलत रास्ते पर ही पड़ते रहेंगे।
बिना जाने जब वह चलता है तो डगमगाता है इसलिए उसके चलने के साथ ज्ञान कुन्जी भी डगमगाएगी।
पूर्ण गुरु शिष्य को एक ही दिशा की तरफ इशारा करते हैं कि जागो और स्वयंँ को जानो।
इसलिए जागकर स्वयंँ को जानना महत्वपूर्ण है और जानने की पहली शर्त यह है कि मैं कुछ भी नहीं जानता।
पूर्ण गुरु से ज्ञान लेकर लोग इतने अकड़े हुए हैं कि वे स्वयंँ को महाज्ञानी मान बैठे हैं और इसी से उनका चित्त भरा हुआ है।

उनसे पूछो कि क्या तुम स्वांँसों के पूर्ण सत्य को जानते हो?
तो उनका उत्तर होता है – हांँ थोड़ा-थोड़ा जानता हूंँ और यह थोड़ा-थोड़ा जानना ही धोखा है।

स्वांँसों के भीतर की शक्ति को खन्ड में नहीं बांँटा जा सकता। सत्य को या तो पूरा जाना जाता है और या बिल्कुल भी नहीं जाना जा सकता। कोई यह नहीं कह सकता कि मैं थोड़ा-थोड़ा जागा हूंँ या थोड़ा-थोड़ा सोया हूंँ। जो हृदय में उतरता है तो पूरा उतरता है और नहीं उतरता तो बिल्कुल नहीं उतरता, वही स्वांँसों के भीतर की शक्ति का पूर्ण सत्य है।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि सच्चे गुरु से ज्ञान नहीं लेना चाहिए।

इसका अर्थ है कि सच्चे गुरु से ज्ञान लेकर ध्यान के अभ्यास से स्वयंँ को शून्य करना चाहिए।
तभी स्वांँसों के भीतर प्रवेश करने के लिए जगह मिलेगी।
जिज्ञासु उसे कहते हैं – जो थोड़ा जानता है, थोड़ा और जानने को उत्सुक है तथा जानकारी की खोज में है।

जिज्ञासु यानी विद्यार्थी। शिष्य विद्यार्थी नहीं है, वह सत्यार्थी है। शिष्य जानकारी की खोज में नहीं निकला है, शिष्य स्वयं को जानने की खोज में निकला है। शिष्य होने की पहली शर्त यह है कि जिसने समर्पण स्वीकार कर लिया हो। जिसने सच्चे गुरु के चरणों में सिर रख दिया और कहा कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूंँ! जिसने अपने मन के साथ अपनी बुद्धि की जानकारी भी सब गुरु के चरणों में रख दी, वही सीखने व जानने को कुशल होता है।

जिस पल वह अभ्यास से अपने भीतर भरी हुई सारी जानकारी से स्वयं को खाली कर लेता है – उसी पल ही स्वांँसों के भीतर की शक्ति उसे जगाकर हृदय के द्वार पर ले जाती है। तब शिष्य का पहला कदम हृदय द्वार की चौखट पर पड़ता है। तभी जीवन में सच्चे गुरु की सार्थकता का ज्ञान होता है।

  • श्री हंस जी महाराज

न माया मिली न राम

न माया मिली न राम
किसी गाँव में दो दोस्त रहते थे। एक का नाम हीरा था और दूसरे का मोती!
दोनों में गहरी दोस्ती थी और वे बचपन से ही खेलना-कूदना, पढना-लिखना हर काम साथ करते आ रहे थे।

जब वे बड़े हुए तो उनपर काम-धंधा ढूँढने का दबाव आने लगा! लोग ताने मारने लगे कि दोनों निठल्ले हैं और एक पैसा भी नही कमाते।

एक दिन दोनों ने विचार-विमर्श कर के शहर की ओर जाने का फैसला किया!अपने घर से रास्ते का खाना पीना ले कर दोनों भोर होते ही शहर की ओर चल पड़े।

शहर का रास्ता एक घने जंगल से हो कर गुजरता था! दोनों एक साथ अपनी मंजिल की ओर चले जा रहे थे! रास्ता लम्बा था सो उन्होंने एक पेड़ के नीचे विश्राम करने का फैसला किया! दोनों दोस्त विश्राम करने बैठे ही थे कि इतने में एक साधु वहां पर भागता हुआ आया. साधु तेजी से हांफ रहा था और बेहद डरा हुआ था।

मोती ने साधु से उसके डरने का कारण पूछा।
साधु ने बताय कि- आगे के रास्ते में एक डायन है और उसे हरा कर आगे बढ़ना बहुत मुश्किल है, मेरी मानो तुम दोनों यहीं से वापस लौट जाओ।

इतना कह कर साधु अपने रास्ते को लौट गया।

हीरा और मोती साधु की बातों को सुन कर असमंजस में पड़ गए! दोनों आगे जाने से डर रहे थे। दोनों के मन में घर लौटने जाने का विचार आया, लेकिन लोगों के ताने सुनने के डर से उन्होंने आगे बढ़ने का निश्चेय किया।

आगे का रास्ता और भी घना था और वे दोनों बहुत डरे हुए भी थे! कुछ दूर और चलने के बाद उन्हें एक बड़ा सा थैला पड़ा हुआ दिखाई दिया! दोनों दोस्त डरते हुए उस थैले के पास पहुंचे।

उसके अन्दर उन्हें कुछ चमकता हुआ नज़र आया! खोल कर देखा तो उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही न रहा! उस थैले में बहुत सारे सोने के सिक्के थे! सिक्के इतने अधिक थे कि दोनों की ज़िंदगी आसानी से पूरे ऐश-ओ-आराम से कट सकती थी! दोनों ख़ुशी से झूम रहे थे! उन्हें अपने आगे बढ़ने के फैसले पर गर्व हो रहा था।

साथ ही वे उस साधु का मजाक उड़ा रहे थे कि वह कितना मूर्ख था जो आगे जाने से डर गया।

अब दोनों दोस्तों ने आपस में धन बांटने और साथ ही भोजन करने का निश्चेय किया।

दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए! हीरा ने मोती से कहा कि वह आस-पास के किसी कुएं से पानी लेकर आये, ताकि भोजन आराम से किया जा सके।मोती पानी लेने के लिए चल पड़ा।

मोती रास्ते में चलते-चलते सोच रहा था कि अगर वो सारे सिक्के उसके हो जाएं तो वो और उसका परिवार हमेशा राजा की तरह रहेगा. मोती के मन में लालच आ चुका था।

वह अपने दोस्त को जान से मार डालने की योजना बनाने लगा! पानी भरते समय उसे कुंए के पास उसे एक धारदार हथियार मिला।उसने सोचा की वो इस हथियार से अपने दोस्त को मार देगा और गाँव में कहेगा की रास्ते में डाकुओं ने उन पर हमला किया था! मोती मन ही मन अपनी योजना पर खुश हो रहा था।

वह पानी लेकर वापस पहुंचा और मौका देखते ही हीरा पर पीछे से वार कर दिया! देखते-देखते हीरा वहीं ढेर हो गया।

मोती अपना सामान और सोने के सिक्कों से भरा थैला लेकर वहां से वापस भागा।

कुछ एक घंटे चलने के बाद वह एक जगह रुका। दोपहर हो चुकी थी और उसे बड़ी जोर की भूख लग आई थी! उसने अपनी पोटली खोली और बड़े चाव से खाना-खाने लगा।

लेकिन ये क्या? थोड़ा खाना खाते ही मोती के मुँह से खून आने लगा और वो तड़पने लगा।

उसे एहसास हो चुका था कि जब वह पानी लेने गया था तभी हीरा ने उसके खाने में कोई जहरीली जंगली बूटी मिला दी थी. कुछ ही देर में उसकी भी तड़प-तड़प कर मृत्यु हो गयी।

अब दोनों दोस्त मृत पड़े थे और वो थैला यानी माया रूपी डायन जस का तस पड़ा हुआ था।

सचमुच में उस साधु ने एकदम ठीक कहा था कि आगे डायन है. वो सिक्कों से भरा थैला उन दोनों दोस्तों के लिए डायन ही साबित हुआ. ना वो डायन रूपी थैला वहां होता; न उनके मन में लालच आता और ना वे एक दूसरे की जाना लेते।

यही हमारे जीवन का सच भी है!
हम माया यानी धन-दौलत-सम्पदा एकत्रित करने में इतना उलझ जाते हैं कि अपने रिश्ते-नातों तक को भुला देते हैं! माया रूपी डायन आज हर घर में बैठी है! इसी माया के चक्कर में इंसान हैवान बन बैठा है!

हमको समझना होगा कि – पैसा बहुत कुछ है पर सबकुछ नहीं है! हमें कभी भी पैसे को ज़रुरत से अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए और अपनी दोस्ती और रिश्तों के बीच में इसको कभी नहीं लाना चाहिए!.
और हमारे पूर्वज भी तो कह गए हैं*-
माया के चक्कर में दोनों गए, न माया मिली न राम
इसलिए हमें हमेशा माया के लोभ व धन के लालच से बचना चाहिए और ज्यादा से जयादा भगवान् की अराधना में अपना ध्यान जरूर लगाना चाहिए!

Revision 5 Syllabus For O Level Course

Syllabus For O Level Course

Paper CodeSyllabusLearning Hours (Theory)Learning Hours
(Practical/ Tutorials/
Project)
First Semester  
M1-R5Information Technology Tools and Network Basics4872
M2-R5Web Designing & Publishing4872
Second Semester  
M3-R5Programming and Problem Solving through Python4872
M4-R5Internet of Things and its Applications4872
PR1-R5Practical based on M1-R5, M2-R5 ,M3-R5 and M4-R5  
PJ1-R5Project4040

भगवान पर विश्वास

एक सन्त कुएं पर स्वयं को लटका कर ध्यान करता था और कहता था जिस दिन यह जंजीर टूटेगी मुझे ईश्वर मिल जाएंगे।

उनसे पूरा गांव प्रभावित था! सभी उनकी भक्ति, उनके तप की तारीफें करते थे। एक व्यक्ति के मन में इच्छा हुई कि मैं भी ईश्वर दर्शन करूँ।

वह कुए पर रस्सी से पैर को बांधकर कुएं में लटक गया और कृष्ण जी का ध्यान करने लगा जब रस्सी टूटी उसे कृष्ण अपनी गोद मे उठा लिए और दर्शन भी दिए।

तब व्यक्ति ने पूछा आप इतनी जल्दी मुझे दर्शन देने क्यों चले आये जबकि वे संत महात्मा तो वर्षों से आपको बुला रहे हैं।

कृष्ण बोले – वो कुएं पर लटकते जरूर हैं किंतु उन्होंने अपने पैर को लोहे की जंजीर से बांधा है।
मतलब कि उसे मुझसे ज्यादा जंजीर पर विश्वास है।

लेकिन तुझे खुद से ज्यादा मुझ पर विश्वास है इसलिए मैं आ गया।
आवश्यक नहीं कि प्रभु दर्शन में वर्षों लगें – *आपकी शरणागति आपको ईश्वर के दर्शन अवश्य कराएगी और शीघ्र ही कराएगी।

प्रश्न केवल इतना है कि आप उन पर कितना विश्वास करते हैं।

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया ॥

हे अर्जुन ! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। शरीररूपी यंत्र पर आरूढ़(चढ़े) हुए सब प्राणियों को, वे अपनी माया से घुमाते रहते हैं।

इसे सदैव याद रखें और बुद्धि में धारण करने के साथ व्यवहार में भी धारण करें। अपने ही अंदर उस अविनाशी के दर्शन अवश्य होंगे।

अहंकार की निशानी

अहंकार की निशानी

दान, पुण्य, उदारता यह धर्म-कर्म के मार्ग में बनाए हुए कुछ ऐसे सिद्धांत हैं, जिनकी आड़ में अनेक लोगों को ठगा भी जाता है। इसका सही अर्थ न जानने के कारण कई लोग अकारण अहंकारी भी हो गए। जबकि लोगों को इसका सही अर्थ समझना चाहिए। इस संदर्भ में एक कहानी है-

एक धनी व्यक्ति थे। वे अपने यहां आने वाले किसी भी व्यक्ति को निराश नहीं लौटाते थे। उन्हें अपनी इस उदारता पर गर्व भी था। वे समझते थे कि उनके समान दूसरा कोई उदार नहीं है।

एक बार वे घूमते हुए खजूर के बाग में पहुंचे। उस समय बाग का चौकीदार भोजन करने की तैयारी में था। तभी वहां कहीं से एक कुत्ता आ गया। चौकीदार ने एक रोटी कुत्ते को दे दी। कुत्ते ने रोटी खा ली और चौकीदार के आगे फिर पूंछ हिलाने लगा। चौकीदार ने उसे दूसरी रोटी भी दे दी। धनवान सज्जन यह सब देख रहे थे। वे चौकीदार के पास आकर बोले, “तुम्हारे लिए कितनी रोटियां आती हैं।” चौकीदार ने कहा, “दो रोटी।”

“तो फिर तुमने दोनों रोटियां कुत्ते को क्यों दे दी ?”

चौकीदार ने जवाब दिया, “कुत्ता पहले कभी नहीं आया था। यह ठीक उस समय आया, जब मेरे लिए रोटियां आईं। मुझे ऐसा लगा कि ये रोटियां आज मेरे लिए नहीं, बल्कि इसके लिए आई है। इसलिए जिसकी वस्तु मैंने उसे दे दी।” उसकी बात सुनकर धनी व्यक्ति का सिर झुक गया। उसका अभिमान तत्काल नष्ट हो गया।

दरअसल कभी-कभी हम स्वयं को ही केंद्र मानने लग जाते हैं और यहाँ से अहंकार का जन्म होता है।
जब तक हम अपने केंद्र से बाहर झांककर नहीं देखें, तब तक हमें अहसास नहीं होता है कि हम कहां पर हैं!

अज्ञानता और लोभ का परिणाम

एक कुम्हार को मिट्टी खोदते हुए अचानक एक हीरा मिल गया। उसने उसे अपने गधे के गले में बांध दिया। एक दिन एक बनिए की नजर गधे के गले में बंधे उस हीरे पर पड़ गई। उसने कुम्हार से उसका मूल्य पूछा। कुम्हार ने कहा, सवा सेर गुड़। बनिए ने कुम्हार को सवा सेर गुड़ देकर वह हीरा खरीद लिया। बनिए ने भी उस हीरे को एक चमकीला पत्थर समझा था लेकिन अपनी तराजू की शोभा बढ़ाने के लिए उसकी डंडी से बाँध दिया।

एक दिन एक जौहरी की नजर बनिए के उस तराजू पर पड़ गई। उसने बनिए से उसका दाम पूछा। बनिए ने कहा, पांच रुपए। जौहरी कंजूस व लालची था। हीरे का मूल्य केवल पांच रुपए सुनकर समझ गया कि बनिया इस कीमती हीरे को एक साधारण पत्थर का टुकड़ा समझ रहा है। वह उससे भाव-ताव करने लगा-पांच नहीं, चार रुपए ले लो। बनिये ने मना कर दिया क्योंकि उसने चार रुपए का सवा सेर गुड़ देकर खरीदा था। जौहरी ने सोचा कि इतनी जल्दी भी क्या है ? कल आकर फिर कहूँगा, यदि नहीं मानेगा तो पांच रुपए देकर खरीद लूँगा।

संयोग से दो घंटे बाद एक दूसरा जौहरी कुछ जरूरी सामान खरीदने उसी बनिए की दुकान पर आया। तराजू पर बंधे हीरे को देखकर वह चौंक गया। उसने सामान खरीदने के बजाए उस चमकीले पत्थर का दाम पूछ लिया। बनिए के मुख से पांच रुपए सुनते ही उसने झट जेब से निकालकर उसे पांच रुपये थमाए और हीरा लेकर खुशी-खुशी चल पड़ा। दूसरे दिन वह पहले वाला जौहरी बनिए के पास आया। पांच रुपए थमाते हुए बोला- लाओ भाई दो वह पत्थर।

बनिया बोला- वह तो कल ही एक दूसरा आदमी पांच रुपए में ले गया। यह सुनकर जौहरी ठगा सा महसूस करने लगा। अपना गम कम करने के लिए बनिए से बोला- “अरे मूर्ख ! वह साधारण पत्थर नहीं, एक लाख रुपए कीमत का हीरा था।”

बनिया बोला, “मुझसे बड़े मूर्ख तो तुम हो। मेरी दृष्टि में तो वह साधारण पत्थर का टुकड़ा था, जिसकी कीमत मैंने चार रुपए मूल्य के सवा सेर गुड़ देकर चुकाई थी। पर तुम जानते हुए भी एक लाख की कीमत का वह पत्थर, पांच रुपए में भी नहीं खरीद सके।”

💐💐शिक्षा:-💐💐

मित्रों, हमारे साथ भी अक्सर ऐसा होता है हमें हीरे रूपी सच्चे शुभ् चिन्तक मिलते हैं लेकिन अज्ञानतावश पहचान नहीं कर पाते और उसकी उपेक्षा कर बैठते हैं, जैसे इस प्रसंग में कुम्हार और बनिए ने की। और कभी पहचान भी लेते हैं अपने अहंकार के चलते तुरन्त स्वीकार नहीं कर पाते और परिणाम पहले जौहरी की तरह हो जाता है और पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हासिल नहीं हो पाता…!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

नैतिकता का पाठ

जब कर्ण के रथ का पहिया जमीन में फंस गया तो वह रथ से उतरकर उसे ठीक करने लगे! वह उस समय बिना हथियार के थे!

भगवान कृष्ण ने तुरंत अर्जुन को बाण से कर्ण को मारने का आदेश दिया।
अर्जुन ने भगवान के आदेश को मान कर कर्ण को निशाना बनाया और एक के बाद एक बाण चलाए, जो कर्ण को बुरी तरह चुभता हुआ निकल गया और कर्ण जमीन पर गिर पड़े।

कर्ण, जो अपनी मृत्यु से पहले जमीन पर गिर गए थे तो उन्होंने भगवान कृष्ण से पूछा, “क्या यह तुम हो, भगवान? क्या आप दयालु हैं? क्या यह आपका न्यायसंगत निर्णय है!
एक बिना हथियार के व्यक्ति को मारने का आदेश?

भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और उत्तर दिया, कर्ण जरा याद करो- जब अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु भी चक्रव्यूह में निहत्था हो गया था। तब आप सभी ने मिलकर उसे बेरहमी से मार डाला था। उस समय आप भी उसमें थे तो तब कर्ण तुम्हारा ज्ञान कहाँ था?

“”यह तो कर्मों का प्रतिफल है, यही मेरा न्याय है।”

सचमुच, कर्म अपने कर्ता का पीछा अवश्य करता है!
कहा भी है कि –
कर्म प्रधान विश्व रची राखा!
जो जस करही, सो तस फल चाखा!!
इसलिए, हमको सोच समझकर काम करना चाहिए!
अगर आज हम किसी को चोट पहुँचाते हैं, किसी का का तिरस्कार करते हैं, किसी की कमजोरी का फायदा उठाते हैं या किसी पर उपकार करते हैं, किसी के दुखों के निवारण का कारण बनते हैं तो भविष्य में वही अच्छा और बुरा कर्म हमारी प्रतीक्षा कर रहा होगा और शायद वह स्वयं हमको प्रतिफल देगा!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

घास-बांस की प्रेरणास्पद कहानी जो देती है सबसे बड़ी सीख

घास-बांस की प्रेरणास्पद कहानी जो देती है सबसे बड़ी सीख…

ये कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जो एक बिजनेसमैन था लेकिन उसका बिजनेस डूब गया और वो पूरी तरह हताश हो गया। वह अपने जीवन से बुरी तरह थक चुका था।

एक दिन परेशान होकर वो जंगल में गया और काफी देर वहां अकेला बैठा रहा। कुछ सोचकर भगवान से बोला – मैं हार चुका हूं, मुझे कोई एक वजह बताइये कि मैं क्यों ना हताश होऊं, मेरा सब कुछ खत्म हो चुका है।

भगवान ने जवाब दिया, ‘तुम जंगल में इस घास और बांस के पेड़ को देखो- जब मैंने घास और इस बांस के बीज को लगाया, मैंने दोनों की देखभाल की। बराबर पानी दिया, बराबर प्रकाश दिया।’

‘घास बहुत जल्दी बड़ी होने लगी और इसने धरती को हरा भरा कर दिया, लेकिन बांस का बीज बड़ा नहीं हुआ। लेकिन मैंने बांस के लिए अपनी हिम्मत नहीं हारी।’

भगवान ने बोलना जारी रखा, ‘दूसरे साल, घास और घनी हो गई। उस पर झाड़ियां आने लगीं, लेकिन बांस के बीज में कोई ग्रोथ नहीं हुई। लेकिन मैंने फिर भी बांस के बीज के लिए हिम्मत नहीं हारी। तीसरे साल भी बांस के बीज में कोई वृद्धि नहीं हुई, लेकिन मित्र मैंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी। चौथे साल भी कोई ग्रोथ नहीं हुई लेकिन मैं लगा रहा।’

भगवान ने आगे कहा, ‘पांच साल बाद, उस बांस के बीज से एक छोटा-सा पौधा अंकुरित हुआ। घास की तुलना में यह बहुत छोटा और कमजोर था लेकिन केवल 6 महीने बाद यह छोटा-सा पौधा 100 फीट लंबा हो गया। मैंने बांस की जड़ को इतना बड़ा करने के लिए पांच साल का समय लगाया। इन पांच सालों में इसकी जड़ इतनी मजबूत हो गई कि 100 फिट से ऊंचे बांस को संभाल सके।’

इसलिय जब भी तुम्हें जीवन में संघर्ष करना पड़े तो समझिए कि आपकी जड़ मजबूत हो रही है।
संघर्ष आपको मजबूत बना रहा है जिससे कि आप आने वाले कल को सबसे बेहतरीन बना सको। किसी दूसरे से अपनी तुलना मत करो।
बस, अपनी जड़ को मजबूत करो!
🙏🙏

जो प्राप्त है-पर्याप्त है
जिसका मन मस्त है
उसके पास समस्त है!!

असली आराधना

असली आराधना
एक बार श्री गुरु नानक देव जी के पास एक नवाब और काजी आये ! उन्होंने आकर गुरु जी से कहा – आप कहते है ना कि ना कोई हिन्दू और ना मुसलमान ; सब कुदरत के बन्दे हैं!
अगर आप यही मानते है कि ईश्वर एक ही है तो आज आप हमारे साथ चल कर नमाज़ पढि़ये!

गुरु जी ने कहा – ठीक है मैं आपके साथ चलता हूँ !

नमाज़ का समय हुआ तो सभी लोग नमाज़ पढ़ने लगे! नमाज़ खत्म होने पर काज़ी और नवाब गुरुजी के पास आये और कहने लगे – हम आपसे बहुत नाराज हैं क्योंकि हम जानते है कि आपने हमारे साथ नमाज नहीं पढ़ी!

गुरु जी उनकी बात को धीरज से सुनते रहे और फिर उन्होंने कहा – काजी साहब, मैं नमाज़ किसके साथ पढ़ता ; आप तो यहाँ थे ही नही?

काजी गुस्से में बोला – क्या बात करते हैं ; मैं यही पर आपके सामने नमाज़ पढ़ रहा था!

गुरु जी ने उत्तर दिया – यहाँ तो सिर्फ आपका शरीर था पर आपका मन तो अपने घर में था फिर भला मैं आपके साथ नमाज़ कैसे पढ़ता?

काजी ने कहा चलिये ठीक है मैं मानता हूँ कि मेरा ध्यान यहाँ नहीं बल्कि अपने घर में था पर नवाब साहब तो यहाँ थे आप इनके साथ नमाज़ पढ़ लेते?

गुरु जी ने कहा – *नवाब साहब भी यहाँ कहाँ थे ; वो तो हिन्दुस्तान के भी बाहर जाकर काबुल में घोड़े खरीद रहे थे!
मेरा मतलब है कि नमाज़ के समय उनका ध्यान काबुल के घोड़ो में था!

काजी और नवाब अपनी बात पर शर्मिंदा हुए – तब गुरु जी ने उनको समझाया कि केवल शरीर से पूजा या नमाज़ पढ़ने से सही रूप से आराधना नहीं होती !

असली आराधना तो तब होती है जब आप पूरे मन से एकाग्र होकर ईश्वर की आराधना करें चाहे किसी के भी आगे करें पर पहले अपने मन को प्रभु के चरणों में जोड़ना चाहिये!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

देशभक्ति

देशभक्ति

प्रताप चित्तौड़ के राणा उदय सिंह का बेटा था।
प्रताप राणा के बेटे थे उन्हें गाने बजाने का बहुत शौक था। यूँ तो वो सदैव देश भक्ति गीत की लय में रहते थे, लेकिन फिर भी लोग उन्हें कहते थे। तुम एक राजपूत घराने के भविष्य के राणा हो।यह क्या शौक लिए हुए हो।गाना बजाना तो चारणों का काम हैं। तुम्हे तबले या ढोल की नहीं तलवार और बरची की ताल सिखाना चाहिये ।

इस पर प्रताप एक ही बात बोलते थे।देशभक्ति केवल तलवार से ही जाहिर नहीं होती, और मेरा यह कथन में सिद्ध करके बताऊंगा।
उन दिनों चित्तौड़ सबसे शक्तिशाली राष्ट्र था। जिसका लोहा सभी मानते थे।और मुग़ल भी एक मात्र चित्तौड़ को चुनौति मानते थे।और हमेशा उस पर फ़तेह के लिए हमला करते थे।

एक बार मुगलों ने चित्तौड़ पर हमला किया। किला इतना मजबूत था। कि राजपूत सैनिको ने जम कर मुकाबला किया और मुगलों को पीछे हटना पड़ा।उस वक्त प्रताप बस्ती में रहते थे। और अपने देश भक्ति गीतों में झूम रहे थे।

एक मुग़ल सैनिक प्रताप को पकड़कर अपने तम्बू में ले गया लेकिन मुग़ल प्रताप को एक गाँव वासी समझ रहे थे।प्रताप की आवाज बहुत सुरीली थी इसलिए उसे गाने के लिए कहा गया और सभी जम कर बैठ गये। जिसमे सभी सेना के विशेष लोग थे | प्रताप को उनकी भाषा में गाने का आदेश दिया गया | लेकिन इसके पीछे मुगलों का एक मकसद था। मुगलों ने यह योजना बनाई थी कि जब ये गाँव का चारण गायेगा तो किले के भीतर आवाज जाएगी और उन्हें लगेगा कि कोई राजपूत मदद के लिए पुकार रहे हैं। और वे दुर्ग का दरवाजा खोल देंगे। लेकिन प्रताप ने अपनी भाषा में ऐसे गीत गाये कि किले के सैनिक सावधान हो गये और सभी ने मुगुलो पर तीरों की वर्षा कर दी,उस वक्त सभी बड़े मुग़ल वहाँ मौजूद थे। वे सभी मारे गये।
अंत में प्रताप फिर अपनी देश भक्ति में लीन अपनी कुटिया को जा रहे थे। तब उन्होंने सभी को कहा देश भक्ति केवल तीरों या तलवारों में नहीं होती।या केवल राजपूतो की मोहताज नहीं होती।  एक साधारण चारण द्वारा भी बड़ी से बड़ी जंग जीती जा सकती हैं ।

💐💐शिक्षा💐💐

आज के समय से इसे जोड़े तो यही संदेश हैं कि देशभक्ति केवल सीमा पर जा कर ही नहीं होती।हर व्यक्ति देश के प्रति प्रेम रखता हैं,इसके लिए कोई फ़ोर्स ज्वाइन करना जरुरी नहीं,हम सभी अपने कार्यों के जरिये देश के लिए काम कर सकते हैं।जैसे क्राइम को कम करने के लिए जागरूक हो जाये,एक दुसरे का साथ दे क्यूंकि देश की धरोहर वहाँ के लोग हैं। अतः जब तक प्रजा सुखी ना होगी किसी देश की साख न बढ़ेगी।

आज के वक्त में अन्याय के  खिलाफ आवाज उठाना ही देश भक्ति हैं।और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना ही देश के प्रति हमारा लक्ष्य हैं।वक्त के हिसाब से देश भक्ति के मायने बदल गये हैं।अब किसी से भूमि के लिए नहीं अपितु देश के भीतर अपनों से भ्रष्ट आचरण के लिए लड़ना देश भक्ति हैं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।