औरतों का त्रिया चरित्र???

एक प्यासा आदमी एक कुएं के पास गया,
जहां एक जवान_औरत पानी भर रही थी
उस आदमी ने औरत से थोड़ा पानी पिलाने के लिए कहा खुशी से उस औरत ने उसे पानी पिलाया।
पानी पीने के बाद उस आदमी ने औरत से पूछा कि आप मुझे औरतों की त्रिया चरित्र के बारे में कुछ बता सकती है???

इतना कहने पर वह औरत जोर जोर से चिल्लाने लगी बचाओ… बचाओ…

उसकी आवाज सुनकर गांव के लोग कुए की तरह दौड़ने लगे तो उस आदमी ने कहा कि आप ऐसा क्यों कर रही है, तो उस औरत ने कहा ताकि गांव वाले आए और आपको खूब पीटें और इतना पीटे की आपके होश ठिकाने लग जाए।

यह बात सुनकर उस आदमी ने कहा मुझे माफ करें, मैं तो आपको एक भली और इज्ज़तदार औरत समझ रहा था।

तभी उस औरत ने कुएं के पास रखा मटके का सारा पानी अपने शरीर पर डाल लिया और अपने शरीर को पूरी तरह भींगा डाला। इतने देर में गांव वाले भी कुएं के पास पहुंच गए।
गांव वालों ने उस औरत से पूछा कि क्या हुआ ?

औरत ने कहा मैं कुएं में गिर गई थी इस भले आदमी ने मुझको बचा लिया। यदि यह आदमी यहां नही रहता तो आज मेरी जान चली जाती।
गांव वालों ने उस आदमी की बहुत तारीफ की और उसको कंधों पर उठा लिया। उसका खूब आदर सत्कार किया और उसको इनाम भी दिया।

जब गांव वाले चले गए तो औरत ने उस आदमी से कहा कि अब समझ में आया औरतों का त्रिया चरित्र???

अगर आप औरत को दुःख देंगे और उसे परेशान करेंगे तो वह आपका सब सुख- चैन छीन लेगी और अगर आप उसे खुश रखेंगे तो वह आपको मौत के मुंह से भी निकाल लेगी,,,

चार आदमी और चार स्त्रियां

चार आदमी और चार स्त्रियां

एक बार एक आदमी जंगल से गुज़र रहा था। उसे चार स्त्रियां मिली।
उसने पहली से पूछा – बहन तुम्हारा नाम क्या हैं ?

उसने कहा “बुद्धि “

तुम कहाँ रहती हो?
उत्तर मिला – मनुष्य के दिमाग में।

दूसरी स्त्री से पूछा – बहन तुम्हारा नाम क्या है?

उसने बताया ” लज्जा,।”

फिर पूछा कि तुम कहाँ रहती हो?

उत्तर मिला – आँखों में!

तीसरी से पूछा – तुम्हारा क्या नाम है?

उत्तर मिला “साहस”

कहाँ रहती हो ?
मुनष्य के ह्रदय में ।

चौथी से पूछा – तुम्हारा नाम क्या है?
जवाब आया – “स्वास्थ्य “

कहाँ रहती हो?
मनुष्य के पेट में।

वह आदमी अब थोड़ा आगे बढा तो फिर उसे चार पुरूष भी मिले।
उसने पहले पुरूष से पूछा –

तुम्हारा नाम क्या है?

उसने बताया – ” क्रोध “

कहाँ रहते हो?
मनुष्य के दिमाग में!

दिमाग में तो बुद्धि रहती हैं, तुम कैसे रहते हो?

जब मैं वहाँ रहता हूँ तो बुद्धि वहाँ से विदा हो जाती है!

दूसरे पुरूष से पूछा – तुम्हारा नाम क्या हैं?

उसने कहा- मेरा नाम *”लोभ” है!

कहाँ रहते हो?
लोगों की आँखों में।

आँख में तो लज्जा रहती हैं तुम कैसे रहते हो?
जब मैं आता हूँ तो लज्जा वहाँ से प्रस्थान कर जाती है!

तीसरें से पूछा – तुम्हारा नाम क्या है?
जबाब मिला “भय”।

कहाँ रहते हो?
मनुष्य केहृदय में।

ह्रदय में तो आनन्द रहता है। तुम कैसे रहते हो?

जब मैं आता हूँ तो आनन्द वहाँ से नौ दो ग्यारह हो जाता है!

चौथे से पूछा – तुम्हारा नाम क्या है?

उसने कहा – “रोग”।

कहाँ रहते हो?
इन्सान के पेट में।

पेट में तो स्वास्थ्य रहता है
जब मैं आता हूँ तो *स्वास्थ्य वहाँ से रवाना हो जाता है।

सांसारिक जीवन की हर विपरीत परिस्थिति में यदि हम उपरोक्त वर्णित बातों को याद रखें तो कई दुखदायी चीजें टाली जा सकती हैं।

इसलिए,
अन्दर बाहर प्रभु के अस्तित्व को स्वीकार करो! समय के सदगुरु के मार्गदर्शन में रहकर अंदर के आनन्द के क़रीब रहो!

भगवान को पाने के लिए सरल बन जाओ! आपके अन्दर छल, कपट, अहंकार के साथ क्रोध और लोभ नहीं होना चाहिए! ताकि हर पल निर्भयता के साथ इस जीवन का भरपूर मात्रा में आनन्द लिया जा सके!

सुप्रभात

मृत्यु के लिये प्रवेश!

मेरे निकट मित्र का यह संस्मरण, जिसे आपके साथ शेयर किया जा रहा है। आशा है यह लेख आपको भी सोचने को मजबूर करेगा।

वाराणसी के एक गेस्ट हाउस का एकाउंट है, जहाँ लोग मृत्यु के लिए प्रवेश लेते हैं। इसे ‘काशी लाभ मुक्ति भवन’ कहा जाता है।

एक हिंदु मान्यता के अनुसार यदि कोई काशी में अपनी अंतिम सांस लेता है, तो उसे काशी लाभ (काशी का फल) जो वास्तव में मोक्ष या मुक्ति है, प्राप्त होता है।

इस गेस्ट हाउस के बारे में दिलचस्प तथ्य यह है कि इसमें रहने और मरने के लिए केवल दो सप्ताह की अनुमति है। इसलिए इसमें प्रवेश से पहले किसी को अपनी मृत्यु के बारे में वास्तव में निश्चित होना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति दो सप्ताह के बाद भी जीवित रहता है, तो उसे ये गेस्ट हाउस छोड़ना होता है।

उत्सुकतावश, मैंने वाराणसी जाने का फैसला किया, यह समझने के लिए कि उन लोगों ने क्या सीखा, जिन्होंने न केवल मृत्यु को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया बल्कि एक निश्चित समय के साथ अपनी मृत्यु का अनुमान भी लगा लिया हो।

मैंने गेस्टहाउस में दो सप्ताह बिताए और प्रवेश करने वाले लोगों का साक्षात्कार लिया। उनके जीवन के सबक वास्तव में विचारोत्तेजक थे।

उसी माहौल में मेरी मुलाकात श्री भैरव नाथ शुक्ला से हुई, जो पिछले 44 वर्षो से मुक्ति भवन के प्रबंधक थे।

इतने सालों में उन्होंने वहाँ काम करते हुए 12,000 से ज्यादा मौते देखी थीं।

मैंने उनसे पूछा, “शुक्ला जी, आपने जीवन और मृत्यु, दोनों को इतने करीब से देखा है। मैं जानने के लिए उत्सुक हूँ कि आपके अनुभव क्या रहे।”

शुक्ला जी ने इस संबंध में मेरे साथ जीवन के 12 सबक साझा किये। लेकिन इस श्रृंखला में एक सबक, जिससे शुक्ला जी बहुत प्रभावित थे और जो मुझे भी अंदर तक छू गया।

वह जीवन का असली पाठ है- ‘जाने से पहले सभी विवादों को मिटा दें।

उन्होंने मुझे इसके पीछे की एक कहानी सुनाई…

उस समय के एक संस्कृत विद्वान थे। जिनका नाम राम सागर मिश्रा था। मिश्रा जी छह भाइयों में सबसे बड़े थे और एक समय था जब उनके सबसे छोटे भाई के साथ उनके सबसे करीब के संबंध थे।

बरसों पहले एक तर्क ने मिश्रा और उनके सबसे छोटे भाई के बीच एक कटुता को जन्म दिया। इसके चलते उनके बीच एक दीवार बन गई, अंततः उनके घर का विभाजन हो गया।

अपने अंतिम वर्षों में, मिश्रा जी ने इस गेस्टहाउस में प्रवेश किया। उन्होंने मिश्रा जी को कमरा नं. 3 आरक्षित करने के लिए कहा क्योंकि उन्हें यकीन था कि उनके आने के 16वें दिन ही उनकी मृत्यु हो जाएगी।

14वें दिन मिश्रा जी ने, 40 साल के अपने बिछड़े भाई को देखने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा, “यह कड़वाहट मेरे दिल को भारी कर रही है। मैं जाने से पहले हर मनमुटाव को सुलझाना चाहता हूँ।”

14वें दिन एक पत्र उनके भाई को भेजा गया। जल्द ही, उनके सबसे छोटे भाई आ गए।

मिश्रा जी ने उनका हाथ पकड़ कर घर को बांटने वाली दीवार गिराने को कहा। उन्होंने अपने भाई से माफी मांगी।

दोनों भाई रो पड़े और बीच में ही अचानक मिश्रा जी ने बोलना बंद कर दिया। उनका चेहरा शांत हो गया और उसी क्षण वह चल बसे।

शुक्ला जी ने मुझे बताया कि उन्होंने वहाँ आने वाले कई लोगों के साथ इसी एक कहानी को बार-बार दोहराते हुए देखा है। उन्होंने कहा, “मैंने देखा है कि सारे लोग जीवन भर इस तरह का अनावश्यक मानसिक बोझा ढोते हैं, वे केवल अपनी यात्रा के समय इसे छोड़ना चाहते हैं।”

हालाँकि, उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता है कि आपका कभी किसी से मनमुटाव ना हो बल्कि अच्छा यह है कि मनमुटाव होते ही उसे हल कर लिया जाए। किसी से मनमुटाव, किसी पर गुस्सा या शक-शुबा होने पर उसे ज्यादा लंबे समय तक नहीं रखना चाहिए और उन्हें हमेशा जल्द से जल्द हल करने का प्रयास करना चाहिए!

क्योंकि अच्छी खबर यह है कि हम जिंदा हैं, लेकिन बुरी खबर यह है कि हम कब तक जिंदा है, यह कोई नहीं जानता।

तो, चाहे कुछ भी हो, अपने मनमुटावों को आज ही सुलझा लें, क्योंकि कल का वादा इस दुनिया में किसी से नहीं किया जा सकता है।

जरा सोचें…क्या कुछ ऐसा है या कोई है जिसके साथ हम समय रहते शांति स्थापित करना चाहते हैं?

“जब हमें किसी के साथ कड़वे अनुभव होते हैं, तब हमें क्षमा भाव अपनाकर भावनात्मक बोझ दूर कर लेना चाहिए।

घट में है सूजे नहीं, लानत ऐसी जिंद।तुलसिया संसार को भयो मोतिया बिंद।

घट में है सूजे नहीं, लानत ऐसी जिंद।
तुलसिया संसार को भयो मोतिया बिंद।

जब तुम कहते हो, भगवान! “अगर तू है तो अपने को दिखा दे!’’
तो वह अंदर से ही दरवाज़ा खटखटाता है- मैं यहाँ हूँ। तू मुझे बाहर ढूँढ़ता है और मैं तेरे अंदर बैठा हूँ।

लोग कहते हैं कि ‘‘भगवान को सबकुछ मालूम है!’’

जिसको सब कुछ मालूम है उसको यह भी तो मालूम होगा कि तुमको उसकी ज़रूरत पड़ेगी।

सबके घट में वह परमानंद विराजमान है, परंतु सब बाहर दौड़ लगा रहे हैं। उसी दौड़ को अंदर की तरफ लगाना है।

जैसे ही हम अंदर की तरफ दौड़ लगाना शुरू करेंगे, वह परमानंद हमें स्वयं अपने पास बुलाएगा। क्योंकि वहाँ है हृदय, और हृदय के अंदर उसकी प्यास लगी हुई है।

उस प्यास को बुझाने की क्या विधि है?

वह विधि मैं जगह-जगह जाकर लोगों को बताता हूँ और कहता हूँ कि परमानंद तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है। उसको अपना बॉस बनाओ, उसकी चाकरी करो तो तुम्हारे जीवन के अंदर भी सुख और आनंद की बारिश हो जायेगी। जो व्यक्ति शान्ति को अपने जीवन में साक्षात रूप में लाना चाहता है, उनका मैं मार्गदर्शन कर सकता हूँ।

  • Prem Rawat

भक्ति दान मोहि दीजिये…..

एक गरीब आदमी था।वो हर रोज अपने गुरु जी के आश्रम जाकर वहांँ पर साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था।
अक्सर वो अपने गुरु जी से कहता कि आप मुझे आशीर्वाद दीजिए तो मेरे पास ढेर सारा धन-दौलत आ जाये।

एक दिन गुरु जी ने पूछ ही लिया कि क्या तुम आश्रम में इसीलिए सेवा करने आते हो?
उसने पूरी ईमानदारी से कहा कि हांँ, मेरा उद्देश्य तो यही है कि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाये, इसीलिए तो आपके दर्शन करने आता हूंँ। पटरी पर सामान लगाकर बेचता हूंँ। पता नहीं, मेरे सुख के दिन कब आयेंगे।
गुरु जी ने कहा कि – तुम चिन्ता मत करो। जब तुम्हारे सामने अवसर आयेगा तब तुम्हें कोई आवाज थोड़ी लगाएगा। बस, चुपचाप तुम्हारे सामने अवसर खोलता जाएगा।

युवक चला गया।
समय ने पलटा खाया, काम-धन्धा खूब चलने लगा वो अधिक धन कमाने लगा। इतना व्यस्त हो गया कि आश्रम में जाना ही छूट गया। कई वर्षों बाद वह एक दिन सुबह ही आश्रम पहुंँचा और साफ-सफाई करने लगा।

गुरु जी ने बड़े ही आश्चर्य से पूछा- क्या बात है, इतने बरसों बाद आये हो? सुना है बहुत बड़े सेठ बन गये हो।

वो व्यक्ति बोला- बहुत धन कमाया। अच्छे घरों में बच्चों की शादियांँ की! पैसे की कोई कमी नहीं है पर दिल में शान्ति नहीं है। ऐसा लगता था रोज सेवा करने आता रहूंँ! पर आ ना सका! गुरु जी आपने मुझे सब कुछ दिया पर जिन्दगी में शान्ति नहीं दी?

गुरु जी ने कहा कि तुमने मेरे पास शान्ति (चैन) मांँगा ही कब था? जो तुमने मांँगा वो तो तुम्हें मिल गया ना। फिर आज यहांँ क्या करने आए हो।

उसकी आंँखों में आंँसू भर आए! गुरु जी के श्रीचरणों में गिर पड़ा और बोला – अब कुछ मांँगने के लिए सेवा नहीं करूंँगा। दिल को शान्ति मिल जाये, बस।

गुरू जी ने कहा- पहले तय कर लो कि अब कुछ माँगने के लिए आश्रम की सेवा नहीं करोगे! बस मन की शान्ति के लिए ही आओगे।

उन्होंने ने समझाया कि चाहे मांँगने से कुछ भी मिल जाये पर दिल का (चैन) शान्ति कभी नहीं मिलती इसलिए सेवा के बदले कुछ मांँगना नहीं है।
वो व्यक्ति अपने गुरुदेव को सुनता रहा और बोला- गुरू जी मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप बस, मुझे सेवा करने दीजिए।

यह सत्य है कि – सच्चे गुरू की शरणागत होने पर उनके दरवार में डिमाण्ड और कमांड वाली सोच को त्यागना होगा! तभी अलोकिक आनन्द मिल पायेगा जो सदा भक्त की कल्पना से परे की स्थिति होती है!

एक ही बार परखिये,परखिये ना बारम्बार।

एक ही बार परखिये,
परखिये ना बारम्बार।

बालू तो हूं किरकिरी,
जो छाने सौ बार।

★अर्थ: किसी व्यक्ति को परखना है तो बस एक बार में ही परख लेना चाहिए!
जिस प्रकार रेत को अगर सौ बार भी छाना जाए तो उसकी किरकिरी दूर नहीं होती!

उसी प्रकार दुर्जन को भी बार बार भी परखो; तब भी वह अपनी दुष्टता से भरा हुआ वैसा ही मिलेगा! जबकि सज्जन की परख एक बार में ही हो जाती है।

कहानी सलाह यह या वह
🌸🌸🌸🌸🌸

एक धनी व्यक्ति का बटुआ बाजार में गिर गया। उसे घर पहुंच कर इस बात का पता चला। बटुए में जरूरी कागजों के अलावा कई हजार रुपये भी थे। फौरन ही वो मंदिर गया और प्रार्थना करने लगा कि बटुआ मिलने पर प्रसाद चढ़ाउंगा, गरीबों को भोजन कराउंगा आदि।

संयोग से वो बटुआ एक बेरोजगार युवक को मिला।

बटुए पर उसके मालिक का नाम लिखा था। इसलिए उस युवक ने सेठ के घर पहुंच कर बटुआ उन्हें दे दिया। सेठ ने तुरंत बटुआ खोल कर देखा। उसमें सभी कागजात और रुपये यथावत थे।

सेठ ने प्रसन्न हो कर युवक की ईमानदारी की प्रशंसा की और उसे बतौर इनाम कुछ रुपये देने चाहे, जिन्हें लेने से युवक ने मना कर दिया।

इस पर सेठ ने कहा, अच्छा कल फिर आना।

युवक दूसरे दिन आया तो सेठ ने उसकी खूब खातिर की। युवक चला गया।

युवक के जाने के बाद सेठ अपनी इस चतुराई पर बहुत प्रसन्न था कि वह तो उस युवक को सौ रुपये देना चाहता था। पर युवक बिना कुछ लिए सिर्फ खा -पी कर ही चला गया।

उधर युवक के मन में इन सब का कोई प्रभाव नहीं था,

क्योंकि उसके मन में न कोई लालसा थी और न ही बटुआ लौटाने के अलावा और कोई विकल्प ही था।

सेठ बटुआ पाकर यह भूल गया कि उसने मंदिर में कुछ वचन भी दिए थे।

सेठ ने अपनी इस चतुराई का अपने मुनीम और सेठानी से जिक्र करते हुए कहा कि देखो वह युवक कितना मूर्ख निकला। हजारों का माल बिना कुछ लिए ही दे गया।

सेठानी ने कहा, तुम उल्टा सोच रहे हो। वह युवक ईमानदार था। उसके पास तुम्हारा बटुआ लौटा देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। उसने बिना खोले ही बटुआ लौटा दिया। वह चाहता तो सब कुछ अपने पास ही रख लेता। तुम क्या करते? ईश्वर ने दोनों की परीक्षा ली। वो पास हो गया, तुम फेल। अवसर स्वयं तुम्हारे पास चल कर आया था, तुमने लालच के वश उसे लौटा दिया। अब अपनी गलती को सुधारो और जाओ उसे खोजो। उसके पास ईमानदारी की पूंजी है, जो तुम्हारे पास नहीं है। उसे काम पर रख लो।

सेठ तुरत ही अपने कर्मचारियों के साथ उस युवक की तलाश में निकल पड़ा।

कुछ दिनों बाद वह युवक किसी और सेठ के यहां काम करता मिला।

सेठ ने युवक की बहुत प्रशंसा की और बटुए वाली घटना सुनाई, तो उस सेठ ने बताया,

उस दिन इसने मेरे सामने ही बटुआ उठाया था। मैं तभी अपने गार्ड को लेकर इसके पीछे गया।

देखा कि यह तुम्हारे घर जा रहा है। तुम्हारे दरवाजे पर खड़े हो कर मैंने सब कुछ देखा व सुना। और फिर इसकी ईमानदारी से प्रभावित होकर इसे अपने यहां मुनीम रख लिया। इसकी ईमानदारी से मैं पूरी तरह निश्चिंत हूं।

बटुए वाला सेठ खाली हाथ लौट आया। पहले उसके पास कई विकल्प थे! उसने निर्णय लेने में देरी की। उस ने एक विश्वासी पात्र खो दिया।

युवक के पास अपने सिद्धांत पर अटल रहने का नैतिक बल था। उसने बटुआ खोलने के विकल्प का प्रयोग ही नहीं किया।

युवक को ईमानदारी का पुरस्कार मिल गया। दूसरे सेठ के पास निर्णय लेने की क्षमता थी।

उसे एक उत्साही , सुयोग्य और ईमानदार मुनीम मिल गया।

एक बहुत बड़े विचारक सोरेन कीर्कगार्ड ने अपनी पुस्तक आइदर -और अर्थात यह या वह में लिखा है कि जिन वस्तुओं के विकल्प होते हैं उन्हीं में देरी होती है। विकल्पों पर विचार करना गलत नहीं है। लेकिन विकल्पों पर ही विचार करते रहना गलत है। हम यह या वह के चक्कर में फंसे रह जाते हैं।

किसी संत ने एक जगह लिखा है , विकल्पों में उलझ कर निर्णय पर पहुंचने में बहुत देर लगाने से लक्ष्य की प्राप्ति कठिन हो जाती है।
सुप्रभात
🙏🙏🙏🙏🙏

टोकरी में पानी

संत सदानंद का शिक्षा देने का अलग ही ढंग था। वह सिर्फ सैद्धांतिक ज्ञान का सहारा नहीं लेते थे। शिष्य अच्छी तरह से उनकी बात समझ सकें, इसके लिए व्यावहारिक उपायों से विषयों को समझाते थे। एक दिन उन्होंने अपने सभी शिष्यों को बुलाया और सबके हाथ में बांस की एक-एक टोकरी थमा दी। संत ने शिष्यों से कहा, ‘आज तुम सभी को इन टोकरियों में जल भरकर लाना है। उसी जल से आश्रम की सफाई करनी है। याद रखना जल केवल वही होना चाहिए जो इस टोकरी में भरकर लाया गया हो।’
गुरु की आज्ञा मानकर सभी शिष्य नदी की ओर चल पड़े। एक शिष्य बोला, ‘बांस की टोकरी में पानी कैसे भर पाएंगे?’ पानी तो बांस की टोकरी से बाहर निकल जाएगा। दूसरे शिष्य ने कहा, ‘पता नहीं इसके माध्यम से गुरुजी हमें कौन सा व्यावहारिक ज्ञान सिखाना चाहते हैं!’ सभी शिष्य टोकरी में जल भरने लगे। लेकिन जैसे वे जल भरते, वैसे ही पानी टोकरियों के छिद्र से बाहर निकल जाता। शिष्यों ने तीन-चार बार कोशिश की। फिर वे अपनी टोकरियां वहीं फेंक कर वापस चले गए। उनमें एक शिष्य था
सदाव्रत। उसने हिम्मत नहीं हारी।कुछ घंटों बाद वह शिष्य यह देखकर हैरान रह गया कि अब टोकरी से पानी का रिसना बंद हो गया है। हुआ यह कि थोड़े समय पानी में रहने के बाद बांस की कमचियां फूल गईं और बीच की खाली जगह भर गई। वह जो पानी उठाता, टोकरी में ठहर जाती। शिष्य सदाव्रत ने टोकरी में पानी लाकर उससे आश्रम की सफाई कर दी। संत सदानंद ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘आज मैं तुम सबके धैर्य की परीक्षा लेना चाहता था। लेकिन केवल शिष्य सदाव्रत ही उसमें उत्तीर्ण हो सका। जीवन में किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जरूरी होता है कि लगातार प्रयत्न किए जाएं, तुरंत हार न मानी जाए।’

जीवन का आनंद!

एक सम्राट राजा अपने शक्ति के बल पर दुनिया भर में राज करने लगा था।

वह अपनी शक्ति पर इतना गुमान करने लगा था कि अब वह अमर होना चाहता था।
उसने पता लगाया कि कहीं ऐसा जल है जिसे पीने से व्यक्ति अमर हो सकता है।

देश – दुनिया में भटकने के बाद आखिरकार राजा ने उस जगह को खोज लिया जहां पर उसे अमृत प्राप्त हो सकता था।

वह एक पुरानी गुफा थी, जहां पर कोई आता जाता नहीं था।

देखने में वह बहुत डरावनी लग रही थी, लेकिन राजा ने एक जोर से सांस ली और गुफा में प्रवेश कर गया।

वहां पर उसने देखा कि गुफा के अंदर एक अमृत का झरना बह रहा है।

उसने जल पीने के लिए हाथ ही बढ़ाया था कि एक कौवे की आवाज आई।

कौवा गुफा के अंदर ही बैठा था। कौवा जोर से बोला, ठहरो, रुक जाओ, यह भूल मत करो।

सिकंदर ने कौवे की तरफ देखा। वह बड़ी ही दयनीय अवस्था में था, पंख झड़ गए थे। पंजे गिर गए थे। वह अपंग भी हो गया था। बस कंकाल मात्र ही शेष रह गया था।

राजा ने कहा, तू कौन होता है मुझे रोकने वाला? यह अमृत पीने से मुझे तू कैसे रो सकता है?

तब कौवे ने आंखों से आंसू टपकाते हुए बोला कि मैं भी अमृत की तलाश में ही इस गुफा में आया था और मैंने जल्दबाजी में बिना सोच विचार के अमृत पी लिया। अब मैं कभी मर नहीं सकता, लेकिन अब मैं मरना चाहता हूं पर मर नहीं सकता। देखो मेरी हालत!
कौवे की बात सुनकर राजा देर तक सोचता रहा। सोचने के बाद फिर बिना अमृत पीये ही चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया।

राजा समझ चुका था कि जीवन का आनंद उस समय तक ही रहता है; जब तक हम उस आनंद को भोगने की स्थिति में होते हैं।

इसलिए, जीवन में हमें हमेशा खुश रहना चाहिए। हमें कभी भी खुश रहने के लिए बड़ी सफलता या समय का इंतजार नहीं करना चाहिए!

क्योंकि समय के साथ हम बूढ़े होते जाते हैं और फिर अपने जीवन का असली आनंद नहीं उठा पाते हैं।

जिसका मन मस्त है – उसके पास समस्त है।।

इसलिए जीवन को बिंदास रहकर जियो। दुनिया भर का टेंशन मत लो। मृत्यु के कुछ समय बाद तुम्हे सब भूल जाएंगे!
साथ रहेंगे तो केवल अविनाशी और अविनाशी तक पहुंचने का रास्ता बताने वाले सद्गुरु !

सद्गुरु यही कहते हैं कि –
जिन्दगी जबरदस्त है-
इसे जबरदस्ती ना जिएं;
बल्कि
जबरदस्त तरीके से जिएं!
तभी –
इस जीवन में जीवन के असली आनन्द का अनुभव हो पायेगा!
🙏🙏🙏🙏🙏

श्रद्धा भाव के पुष्प

एक बार किसी गांव में महात्मा बुद्घ का सत्संग हुआ। सब इस होड़ में लग गए कि क्या भेंट करें?

सुदास नाम का एक मोची था। उसने देखा कि मेरे घर के बाहर के तालाब में एक कमल🪷 खिला है। उसकी इच्छा हुई कि आज नगर में महात्मा बुद्घ आए हैं। सब लोग तो उधर ही गए हैं, तो आज यह फूल बेचकर गुजारा कर लेंगे। वह तालाब के अंदर कीचड़ में घुस गया।  कमल के फूल को लेकर आया, केले के पत्ते का दोना बनाया और उसके अंदर कमल का फूल रख दिया। पानी की कुछ बूंदे कमल पर पड़ी हुई थी इसलिए वह बहुत ही सुन्दर दिखाई दे रहा था।

एक सेठ आया और बोला – इस फूल के हम आपको दो चांदी के रुपये दे सकते हैं। अब उसने सोचा एक दो आने का फूल। इसके दो रुपये दिये जा रहे हैं। वह आश्चर्य में पड़ गया।

इतनी देर में नगर सेठ आया। उसने कहा – भाई! फूल बहुत अच्छा है, यह फूल हमें दे दो। हम इसके दस चांदी के सिक्के दे सकते हैं।

मोची ने सोचा इतना कीमती है यह फूल!

नगर सेठ ने कहा- मेरी इच्छा है कि मैं महात्मा बुद्घ के चरणों में यह फूल रखूं। इसलिए इसकी इतनी कीमत दे रहा हूं।

इतनी देर में उस राज्य का मंत्री अपने वाहन पर बैठा हुआ आ गया और कहने लगा- क्या बात है? कैसी भीड़ लगी हुई है।
अब लोग कुछ बताते उससे पहले उसका ध्यान उस फूल की तरफ गया।  उसने पूछा- यह फूल बेचोगे? हम इसके सौ सिक्के दे सकते हैं। क्योंकि महात्मा बुद्घ आए हुए हैं। जब हम यह फूल लेकर जाएंगे तो सारे गांव में तो चर्चा होगी कि महात्मा बुद्घ ने केवल मंत्री का ही फूल स्वीकार किया। इसलिए हमारी इच्छा है कि यह फूल हम भेंट करें।

थोड़ी देर के बाद राजा ने भीड़ को देखा, देखने के बाद मंत्री से पूछा कि क्या बात है? उसने बताया कि फूल का सौदा चल रहा है।

राजा ने देखते ही कहा इसको हमारी तरफ से एक हजार चांदी के सिक्के भेंट करना। ‘यह फूल हम लेना चाहते हैं।

सुदास ने कहा – क्षमा करें महाराज, यह फूल मैं बेचना ही नहीं चाहता।
जब महात्मा बुद्घ के चरणों में सब लोग कुछ भेंट करने के लिए पहुंच रहें हैं तो ये फूल इस गरीब की तरफ से आज उनके चरणों में भेंट होगा।

राजा बोला – देख लो! एक हजार चांदी के सिक्कों से तुम्हारी पीढि़यां तर सकती हैं।

सुदास ने कहा, मैंने तो आज तक राजाओं की संपत्ति से किसी को तरते नहीं देखा, लेकिन महान पुरुषों के आशीर्वाद से लोगों को जरुर तरते हुए देखा है।

राजा मुस्कुराया और बोला, तेरी मर्जी तू ही भेंट कर ले।

बहुत जल्दी चर्चा महात्मा बुद्घ के कानों तक भी पहुंच गई कि आज कोई व्यक्ति फूल लेकर आ रहा है जिसकी कीमत बहुत लगी है।

सुदास फूल लेकर जैसे ही पहुंचा तो उसकी आंखों में आंसू बरसने लगे। कुछ बूंदे उसके आंसुओं के रूप में उस कमल पर ठिठक गईं। सुदास घुटनों के बल बैठ गया।

रोते हुए उसने कहा – सबने बहुत-कीमती चीजें आपके चरणों में भेंट की होंगी। लेकिन इस गरीब के पास यह कमल का फूल और जन्म-जन्मान्तरों के पाप जो मैंने किए हैं, उनके आंसू आंखों मे भरे पड़े हैं; आज आपके चरणों में चढ़ाने आया हूं। कृपया कर मुझे मुक्ति का मार्ग बताएं।

महात्मा बुद्घ ने अपने शिष्य आनन्द को बुलाया और कहा- देख रहे हो आनन्द! हजारों साल में भी कोई राजा इतना नहीं कमा पाया, जितना इस गरीब सुदास ने आज एक पल में ही कमा लिया। इसका पुण्य श्रेष्ठ हो गया। आज राजाओं के मुकुट हार गए और एक गरीब का फूल जीत गया। इसे केवल एक फूल न समझना, इसमें श्रद्घा का खजाना छिपा पड़ा है।

महात्मा बुद्ध ने उसे ज्ञान दिया और उसके बाद वह भिक्षु बन गया।

सचमुच, यह संदेश कितना साफ है कि –
भाव का भूखा हूँ मैं और भाव ही इक सार है!
भाव से मुझको भजे तो भाव से बेडा पार है!

भाव बिन सर्वस्व भी दे तो मैं कभी लेता नहीं!
भाव से एक फूल भी दे, तो भव से बेडा पार है!

भाव जिस जन में नहीं, उसकी मुझे चिन्ता नहीं !
भाव वाले भक्त का भरपूर मुझ पर भार है!

टेर भक्तिभाव की करती मुझे लाचार है!
इसी लिय इस भूमि पर होता मेरा अवतार है!

सच ही कहा कहते हैं कि गुरु बिना गति नहीं।

सर यही है कि समय के सद्गुरु की ऊँगली पकड़ लो, तो यह जीवन निश्चित रूप से सफल हो जायेगा।
🙏🙏🙏🙏🌸🌸🌸🙏🙏🙏

कम्युनिटीज बढ़ाने पर काम कर रहा है

व्हाट्सएप मेटा के स्वामित्व वाला मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप कथित तौर पर IOS के लिए अपने व्हाट्सएप बिजनेस एप्लीकेशन में कम्युनिटीज को लाने के लिए काम कर रहा है। बेबी टाइम फॉर की रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल पेश बिजनेस टूल्स टैब को हटाने के बजाय प्लेटफॉर्म ऐप सेटिंग के भीतर नए फीचर के लिए नया प्रवेश बिंदु जोड़ने की संभावना है। नए फीचर के साथ व्यवसाय अपने उप समूहों और सामुदायिक घोषणा समूह सहित उन समुदायों की पूरी सूची तक पहुंचने में सक्षम होंगे जिनमें वे पहले शामिल हुए थे इसके अनुसार यूजर इस फीचर के अंदर एक नई कम्युनिटी बनाने में सक्षम होंगे नया फीचर व्यवस्थाओं के लिए मददगार होगा क्योंकि वह समर्पित कम्युनिटी और सब ग्रुप से बना कर आसानी से अपने ग्राहकों से प्रतिक्रिया ले सकेंगे। व्हाट्सएप बिजनेस पर कम्युनिटीज को बढ़ाने और प्रबंधित करने की क्षमता वर्तमान में विकास के अधीन है और भविष्य में ऐप के अपडेट में जारी होने की उम्मीद है।