मौन और मुस्कान की सफलता

मौन और मुस्कान की सफलता

मैं मौमु सेठ के बारे में बहुत तो नहीं जानता! पर इतना तो जानता ही हूँ कि वह पहले से ही सेठ नहीं था। वह तो एक गरीब आदमी था! झन्नु उसका नाम था।
झन्नु हमेशा झन्नाया रहता। बिना बात का झगड़ा करना तो उसके स्वभाव में ही था। किसी ने पूछ लिया कि झन्नु भाई टाईम क्या हुआ होगा? तो झन्नु झनझना जाता और कहता- यह घड़ी तेरे बाप ने ले कर दी है? यहाँ टाईम पहले ही खराब चल रहा है, तूं और आ गया मेरा टाईम खाने। भाग यहाँ से!

अब ऐसे आदमी के साथ कौन काम करे? न उसके पास कोई ग्राहक टिकता, न नौकर। यही कारण था कि वो जो भी काम करता था, उसमें उसे नुकसान ही होता था।

कहते हैं कि एक संत एक बार झन्नु के पास से गुजरे। वे कभी किसी से कुछ माँगते नहीं थे!
पर न मालूम उनके मन में क्या आया, सीधे झन्नु के सामने आ खड़े हुए। बोले- बेटा! संत को भोजन करा देगा?

अब झन्नु तो झन्नु ही ठहरा। झन्ना कर बोला- मैं खुद भूखे मर रहा हूँ, तूं और आ गया। चल चल अपना काम कर।

संत मुस्कुराए और बोले- मैं तो अपना काम ही कर रहा हूँ और वह भी बिल्कुल सही से कर रहा हूँ। असल में, तुम ही अपना काम सही से नहीं कर रहे हो!

झन्नु झटका खा गया। उसे ऐसे उत्तर की उम्मीद नहीं थी। पूछने लगा- क्या मतलब?

संत उसके पास बैठ गए। बोले- बेटा! मालूम है तुम्हारा नाम झन्नु क्यों है? क्योंकि झन्नाया रहना और नुकसान उठाना, यही तुम करते आए हो।
अगर तुम अपना स्वभाव बदल लो, तो तुम्हारा जीवन बदल सकता है। मेरी बात मानो तो चाहे कुछ भी हो जाए, खुश रहा करो।

झन्नु बोला- महाराज! खुश कैसे रहूँ? मेरा तो नसीब ही खराब है।

संत बोले- खुशनसीब वह नहीं है- जिसका नसीब अच्छा है!
बल्कि खुशनसीब वह है जो अपने नसीब से खुश है।
तुम खुश रहने लगो तो नसीब बदल भी सकता है।

तुम नहीं जानते कि कामयाब आदमी खुश रहे न रहे, पर खुश रहने वाला एक ना एक दिन कामयाब जरूर होता है।

झन्नु बोला- महाराज! दुनिया बड़ी खराब है! और मेरा ढंग ही ऐसा है कि मुझसे झूठ बोला नहीं जाता।

संत बोले- झन्नु! झूठ नहीं बोल सकते पर चुप तो रह सकते हो?

तुम दो सूत्र पकड़ लो और वह है – मौन और मुस्कान।
मुस्कान समस्या का समाधान कर देती है।
मौन समस्या का बंद कर देता है।

चाहे जो भी हो जाए – तुम चुप रहा करो और मुस्कुराया करो। फिर देखो क्या होगा?

झन्नु को संत की बात जंच गई और भगवान की कृपा से उसका स्वभाव और भाग्य दोनों बदल गए।
फल क्या मिला? समय बदल गया, झन्नु मौन और मुस्कान के सहारे चलते चलते मौमु सेठ बन गया।

यह बात सभी को सोचनी चाहिय कि आप टेलिविज़न नहीं हैं जो आपका रिमोट दूसरे के हाथ रहे।
वह चाहे तो आप हंसें! और वह चाहे तो रोएँ।
हमारा चेहरा हमारा है। यह हंसेगा या रोएगा, इसका निर्णय दूसरा क्यों करे?
अपने जीवन में अभी निर्णय करो, कि सचाहे कुछ भी क्यों न हो जाए, हम सदा मुस्कुराएँगे।
तब दुनिया में कोई भी आपके चेहरे की मुस्कान न छीन पाएगा।

याद रहे-
“गुजरी हुई जिंदगी को कभी याद ना कर,
तकदीर में जो नहीं तो फ़रियाद ना कर।
जो होना होगा वो होकर ही रहेगा!
कल की फिक्र में, आज हंसी बर्बाद ना कर॥”

इसलिय
सदैव प्रसन्न रहिये और अधिकतर मौन धारण कीजिय!
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।

आपका आज का दिन मंगलमय हो और आपको सपरिवार लोहड़ी, मकरसंक्रांति, पोंगल और बिहु आदि पर्वों की हार्दिक शुभकामनायें।
🙏🙏🙏🌸🌸🙏🙏🙏

तुम बचे गये तो चरण दूर। तुम मिट गये तो चरण पास।

मन बेचें सतगुरु के पास तिस सेवक के सब कारज रास
अहंकार जिस भेंट के साथ जुड़ा है वह अपवित्र हो जाती है। चाहे दुनियाँ का साम्राज्य भी लेकर जाओ। निरंहकार भाव से तुम खाली हाथ लेकर भी गये तो वह भेंट स्वीकार हो जाती है।
महात्मा बुद्ध के जीवन में उल्लेख है। एक सम्राट बुद्ध से मिलने आया। स्वभावतः सम्राट है तो उसने एक बहुमुल्य कोहेनूर जैसा हीरा अपने हाथ में ले लिया। चलते वक्त उसकी पत्नी ने कहा कि पत्थर ले जा रहे हो। माना कि मुल्यवान है लेकिन बुद्ध के लिये इसका क्या मूल्य, जिसने सब साम्राज्य छोड़ दिया उसके लिये पत्थर ले जा रहे हो। यह भेंट कुछ जँचती नहीं। अच्छा तो हो कि अपने महल के सरोवर में पहला कमल खिला है मौसम का, वही ले जाओ। वह कम से कम जीवित तो है। इस पत्थर में क्या है? यह तो जड़ है बिल्कुल बन्द है।

बात उसे जँची सोचा कि एक हाथ खाली भी है पत्थर तो ले ही जाऊँगा। क्योंकि मुझे तो यही कीमती लगता है। वही चढ़ाऊँगा जिसका कुछ मुल्य है लेकिन तू कहती है हो सकता है तेरी बात भी ठीक हो। बुद्ध को मैं जानता नहीं कि किस प्रकार के आदमी है। एक हाथ में कमल एक हाथ में हीरा लेकर सम्राट, बुद्ध के चरणों में गया। जैसे ही बुद्ध के पास पहुँचा और हीरे का हाथ उसने आगे बढ़ाया बुद्ध ने कहा गिरा दो। मन में उसके अहंकार को बड़ी चोट लगी। चढ़ा दो नहीं, गिरा दो कहा। बहुमुल्य चीज़ है गिराने के लिये कहा। अगर अब गिराया नहीं तो भी फज़ीहत होगी हज़ारों भिक्षु देख रहे हैं। उसने बड़े बेमन से गिरा दिया। सोचा शायद पत्नी ने ठीक ही कहा था। दूसरा हाथ आगे बढ़ाया और ज़रा ही आगे बढ़ा था कि बुद्ध ने फिर कहा गिरा दो। सम्राट सोचने लगा कि ये कुछ भी नहीं समझते। न बुद्धि की बात, न ह्मदय की बात समझते हैं। बुद्धि के लिये हीरा था, गणित था धन था। प्रेम, कमल है, ह्मदय का भाव है और इसको भी कहते हैं गिरा दो। मेरी पत्नी तो इनके चरणों में रोज़ आती है। वह इन्हें पहचानती है। उसने जब गिरा दिया तो वह खाली हाथ बुद्ध की तरफ झुकने लगा। बुद्ध ने कहा, गिरा दो। सोचने लगा अब कुछ है ही नहीं गिराने को दोनों हाथ खाली हैं। उसने कहा अब क्या गिरा दूँ? बुद्ध तो चुप रहे बुद्ध के एक भिक्षु सारिपुत्त ने कहा, अपने को गिरा दो। हीरे और कमलों को गिराने से क्या होगा? शुन्यवत हो जाओ तो ही उनके चरणों का स्पर्श हो पाएगा। तुम बचे गये तो चरण दूर। तुम मिट गये तो चरण पास। तब कहते हैं सम्राट को उसी क्षण बोध हुआ। वह गिर गया। जब उठा दूसरा ही आदमी था, महल की तरफ वापिस न गया भिक्षु हो गया। किसी ने समझाया इतनी जल्दी। उसने कहा जब मैं ही न रहा तो वापिस कौन जाये? जो आया था वह अब नहीं है, अब बुद्ध मुझमें समा गये हैं

हे दीनानाथ ! मैं भी तो खोटा सिक्का हूँ इसलिए मैंने खोटा सिक्का ले लिया!

एक मालिक का प्यारा भक्त था – जिसका नाम करतार था!
वह छोले बेचने का काम करता था! उसकी पत्नी रोज सुबह-सवेरे उठ छोले बनाने में उसकी मदद करती थी!
एक बार की बात है कि एक फकीर – जिसके पास खोटे सिक्के थे उसको सारे बाजार में कोई वस्तु नहीं देता हैं तो वह करतार के पास छोले लेने आता है! करतार ने खोटा सिक्का देखकर भी *उस मालिक के प्यारे बंदे फ़क़ीर को छोले दे दिए।

ऐसे ही चार-पांच दिन उस फकीर ने करतार को खोटे सिक्के देकर छोले ले लिए और उसके खोटे सिक्के चल गए और जब सारे बाजार में अब यह बात फैल गयी की करतार तो खोटे सिक्के भी चला लेता हैं पर करतार लोगों की बात सुनकर कभी जबाव नहीं देते थे और अपने मालिक की मौज में खुश रहते थे।

एक बार जब करतार अरदास करके उठे तो अपनी पत्नी से बोले – “क्या छोले तैयार हो गए?”
पत्नी बोली – “आज तो घर में हल्दी-मिर्च नहीं थी और मैं बाजार से लेने गयी तो सब दुकानदारों ने कहा कि-यह तो खोटे सिक्के हैं और उन्होंने सामान नहीं दिया।”

पत्नी के शब्द सुनकर करतार मालिक की याद में बैठ गए और मालिक से बोले – “जैसी तेरी इच्छा! तेरे भाणे को कौन जान सका हैं!”

तभी आकाशवाणी हुई – ” क्यों करतार तू जानता नहीं था कि यह खोटे सिक्के हैं?”

करतार बोला – “सच्चे पातशाह ! मैं जानता था!”

मालिक ने कहा – “फिर भी तूने खोटे सिक्के ले लिए? ऐसा क्यूँ भले मानुष?

करतार बोला – “हे दीनानाथ ! मैं भी तो खोटा सिक्का हूँ इसलिए मैंने खोटा सिक्का ले लिया!

मैंने सोचा कि कहीं मैं तेरे दरबार में जाऊँ तो तू मुझे अपने दरबार से नकार ना दे! क्योंकि आप तो खरे सिक्के ही नवाजते हो! वैसे आप स्वयं ज़ानीज़ान हो! खोटे सिक्कों को भी आपके दरबार में जगह मिल सकें – इसलिए; मेरे परवर दिगार मैंने यह हिमाकत की!”

थोड़ी देर में दूसरी आकाशवाणी हुई – “हे भले मानुष! तेरी दरबार में हाज़िरी क़बूल हो गयी है! तू मालिक का खोटा नहीं, खरा सिक्का हैं।
भक्त को हमेशा यही प्रार्थना करनी चाहिय कि –
मैं अपराधी जन्म का, नख शिख भरा विकार!
तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो सम्हार!!

ये कौशल आपको कार्यस्थल और आपकी नौकरी की भूमिका में सफल होने में मदद करते हैं।

➡️ अपने संचार कौशल में सुधार करें (Communication Skills)

➡️ इमोशनल इंटेलिजेंस पर काम करें (Emotional Intelligence)

➡️अपनी टीमवर्क क्षमताओं को मापें (Teamwork)

➡️ लंबे समय तक काम करने की अपनी इच्छा का प्रदर्शन करें

➡️ अपने कार्यस्थल उत्पादकता में सुधार करें (#productivity)

➡️ अपना आत्मविश्वास बढ़ाएं (Self confidence)

➡️ व्यावसायिक संबंध बनाएं (#Networking)

नियोक्ता अक्सर उत्कृष्ट सॉफ्ट स्किल्स वाले उम्मीदवारों की तलाश करते हैं, इसलिए उन्हें अपने नौकरी आवेदनों में उजागर करना हमेशा एक अच्छा विचार है।

इस कारण से, यह आवश्यक है आप अपनी सॉफ्ट स्किल्स पर काम करें।

ज्ञान की पहचान

ज्ञान की पहचान !!

किसी जंगल में एक संत महात्मा रहते थे! सन्यासियों वाली वेशभूषा थी और बातों में सदाचार का भाव, चेहरे पर इतना तेज था कि कोई भी इंसान उनसे प्रभावित हुए नहीं रह सकता था!

एक बार जंगल में शहर का एक व्यक्ति आया और वो जब महात्मा जी की झोपड़ी से होकर गुजरा तो देखा बहुत से लोग महात्मा जी के दर्शन करने आये हुए थे! वो महात्मा जी के पास गया और बोला कि आप अमीर भी नहीं हैं, आपने महंगे कपडे भी नहीं पहने हैं, आपको देखकर मैं बिल्कुल प्रभावित नहीं हुआ फिर ये इतने सारे लोग आपके दर्शन करने क्यों आते हैं?

महात्मा जी ने उस व्यक्ति को अपनी एक अंगूठी उतार कर दी और कहा कि आप इसे बाजार में बेच कर आएं और इसके बदले एक सोने की माला लेकर आना!

अब वो व्यक्ति बाजार गया और सब की दुकान पर जा कर उस अंगूठी के बदले सोने की माला मांगने लगा! लेकिन सोने की माला तो क्या उस अंगूठी के बदले कोई पीतल का एक टुकड़ा भी देने को तैयार नहीं था! थक हार के व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास पहुंचा और बोला कि इस अंगूठी की तो कोई कीमत ही नहीं है!

महात्मा जी मुस्कुराये और बोले कि अब इस अंगूठी को सुनार गली में जौहरी की दुकान पर ले जाओ! वह व्यक्ति जब सुनार की दुकान पर गया तो सुनार एक माला नहीं बल्कि अंगूठी के बदले पांच माला देने को तयार हो गया!

वह व्यक्ति बड़ा हैरान हुआ कि इस मामूली सी अंगूठी के बदले कोई पीतल की माला देने को तैयार नहीं हुआ लेकिन ये सुनार कैसे 5 सोने की माला दे रहा है! व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास गया और उनको सारी बातें बतायीं.

अब महात्मा जी बोले कि चीजें जैसी ऊपर से दिखती हैं, अंदर से वैसी नहीं होती! ये कोई मामूली अंगूठी नहीं है बल्कि *ये एक हीरे की अंगूठी है जिसकी पहचान केवल सुनार ही कर सकता था! इसलिए वह 5 माला देने को तैयार हो गया!

ठीक वैसे ही मेरी वेशभूषा को देखकर तुम मुझसे प्रभावित नहीं हुए लेकिन ज्ञान का प्रकाश लोगों को मेरी ओर खींच लाता है!
वह व्यक्ति महात्मा जी की बातें सुनकर बड़ा शर्मिंदा हुआ!

यह सच है की बाहरी वेशभूषा से व्यक्ति की पहचान नहीं होती बल्कि आचरण और ज्ञान से व्यक्ति की पहचान होती है!

संतों ने कहा भी है कि –
भेष देख मत भूलिए, पूछ लिजिय ज्ञान!
मोल करो तलवार की, पड़ी रहन दो म्यान!!
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जीवन की मूल संपदा-परिष्कृत व्यक्तित्व

जीवन की मूल संपदा – परिष्कृत व्यक्तित्व

👉 “व्यक्तित्व” ही मनुष्य की मूल संपदा है । इसकी श्रेष्ठता और निकृष्टता के आधार पर ही किसी व्यक्ति का श्रेष्ठ या निकृष्ट होना निर्भर है।
प्रश्न उठता है कि यह “व्यक्तित्व” क्या है ?
मनुष्य जो दिखाई देता है, आचरण, रहन-सहन व बोल-चाल व्यवहार का जैसा जो कुछ प्रभाव छोड़ता है क्या वही व्यक्तित्व है?
इसका उत्तर निश्चित ही “नहीं” में है।
“व्यक्तित्व” में ये सब बातें समाहित तो है, पर वह इन सबके जोड़ से भी ऊपर बहुत कुछ भिन्न है।

आँख से देखने पर तो व्यक्तित्व शरीर की बनावट, आकर्षक साज-सज्जा, आकर्षक चाल-ढाल और शिष्टाचार पर अवलंबित दीखता है,
पर परख की दृष्टि जब गहराई में प्रवेश करती है, तो गुण, कर्म, स्वभाव का दृष्टिकोण एवं चरित्र का समुच्चय ही “व्यक्तित्व” की कसौटी बन जाता है।

👉 सम्मानित और तिरस्कृत, समुन्नत और पतित, प्रखर और पिछड़े लोगों के बीच पाया जाने वाला अंतर तो परिस्थितिजन्य दीखता है-
पर वस्तुतः यह विभेद अंत:स्थिति का होता है।

यह अंत:स्थिति जो मान्यता-अभिरुचि और आदत के रूप में समूचे अंतराल पर कब्जा जमाए बैठी है। अंत:क्षेत्र से उठने वाली सुगंध अथवा दुर्गंध ही समीपवर्ती वातावरण को उल्लसित एवं कलुषित बनाती है।अंतराल ही बाह्य जगत में प्रतिबिंबित होता है और स्वर्गीय एवं नारकीय प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है ।
अपना ही स्वभाव समीपवर्ती लोगों के साथ सहयोग एवं विग्रह के अवसर रचता और इन्हें चित्र-विचित्र घटनाक्रर्मों के रुप में सामने ला खड़ा करता है!

👉 जीवन का सबसे बड़ा उपार्जन एवं वैभव परिष्कृत “व्यक्तित्व” ही है।
पग-पग पर मानवीय अनुदानों और दैवी वरदानों के उपहार बरसाने वाला सौभाग्य और कुछ नहीं मनुष्य का स्व उपार्जित व्यक्तित्व ही है।

कोई किसी को यदि वस्तुतः कोई ठोस अनुदान दे सकता है तो वह एक ही अनुग्रह है कि व्यक्तित्व को परिष्कृत करने में सहायता की जाए।
अन्य संपदाएँ ऐसी हैं, जिन्हें कोई किसी को कितने ही बडे़ परिमाण में देकर भी वास्तविक साधन नहीं कर सकता।

उपकार वही सार्थक है, जो “व्यक्तित्व” को विकसित करने की सहायता के रूप में लिया या दिया जा सके। अनुग्रह वही धन्य है जो प्रखरता और प्रतिभा निखारने में सहयोग प्रदान करें।
सौभाग्यशाली वे हैं – जिनको “सुसंस्कृत” लोगों का सान्निध्य मिल पाया और उन्होंने अपने व्यव्हार, व्यक्तित्व को गरिमामय बनाने का सतत अभ्यास जारी रख्खा है!

भगवान की कृपा

भगवान की कृपा

एक बार की बात है बहुत तेज बारिश हो रही थी। दो मटके(घड़े) बाहर रखे हुए थे। बारिश में दोनों भीग रहे थे। थोड़ी देर के बाद जब बारिश बंद हुई तो एक मटका भर गया और दूसरा खाली रह गया।

जो मटका खाली रह गया गया वो वर्षा से कहता है अरी वर्षा, तू पक्षपात (भेदभाव) करती है। तूने इसे भर दिया है लेकिन मुझे नहीं भरा।

तब बारिश कहती है – अरे मटके, तू ऐसा क्यों बोल रहा है? मैंने तुम दोनों मटको पर बराबर बारिश की है; लेकिन तू अपना मुंह तो देख। तेरा मुंह नीचे की ओर है।

क्योंकि वह मटका उल्टा पड़ा हुआ था। गलती खुद की है लेकिन दोष दूसरों पर!

ठीक इसी तरह भगवान भी हम पर कृपा करते हैं लेकिन गलती हमारी ही होती है कि हम उनकी ओर उन्मुख नहीं रहते! अपनी झोली को फैलाकर नहीं रखते!

यदि हमारी ही झोली छोटी पड़ जाये तो भगवान को दोषी क्यों ठहराए?

जिस तरह से सूर्य देव सब पर बराबर प्रकाश डालते हैं- अब हम खुद ही मुख मोड़ के बैठ जाये तो हमारी गलती है ना कि सूर्यदेव की। भगवान की कृपा का अनुभव संत महापुरुषों के सानिध्य से मिलता है! वे अपने ज्ञान के द्वारा उस अविनाशी – जो हमारे ही अन्दर है उसका का अनुभव कराते हैं! समय चाहे कुछ अच्छा हो या बुरा- हर परिस्थति का मुकाबला करने योग बनाते हैं!

  • श्री हंस जी महाराज
    🌷🌷🙏🙏🙏🌷🌷

गुरु आज्ञाकारी भक्त का स्वभाव

गुरु आज्ञाकारी भक्त का स्वभाव

गीता में भगवान श्रीकृष्ण जी अर्जुन को समझाते हैं कि आत्मज्ञानी व्यक्ति का सबसे पहला गुण है कि उसमें संसार के सारे ही जीवित प्राणियों के प्रति सच्चा प्रेम और सेवाभाव होना चाहिए।
स्वयं के भीतर सच्चे प्रेम के बीज का रोपण ही दुनिया की सारी समस्याओं और शान्ति का समाधान है। कोई आत्मज्ञान लेकर स्वयं को ज्ञानी मानता है लेकिन, वह कह कुछ रहा है और कर कुछ रहा है, ऐसा करके चाहे जितनी चालाकियांँ कर ले लेकिन, हृदय में विराजमान अविनाशी शक्ति के आगे उसकी एक नहीं चलेगी क्योंकि वो पूर्ण सत्य का निर्देशक है। उसे कभी-कभी कुछ नाट़्य भी करना पड़ता है!

लेकिन, चूंकि वह सिर्फ नाट़्य होता है तो कोई कटुता नहीं उपजती। समस्या तब पैदा होती है जब कुछ लोग आत्म ज्ञान के सिद्धान्तों को बढ़ा चढ़ा कर बखान करने लगते हैं और वही लोग उसका फायदा उठाने लगते हैं।

गीता की शुरुआत ही संन्यास की परिभाषा से होती है। ऐसी क्रिया जो स्वार्थ रहित हो। वही बात दूसरे रूप में कही गई है।
भगवान श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि जब तक मन की लालसायें शान्त नहीं होती तब तक हमें हमारा कर्म करना ही होगा।

अर्जुन वही प्रश्न पूछता है जो हमारे दिमाग में हैं। वह श्रीकृष्ण से कहता है कि मन की चंँचलता सच्चा प्रेम करने में मुख्य बाधा है। इसमें इतनी उथल-पुथल और न झुकने की प्रवृत्ति है कि इसे काबू करने की बजाय हवा को काबू करना आसान है।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन को नियमित ध्यान के अभ्यास से,”नाम-सुमिरण के अभ्यास करके मन को काबू किया जा सकता है। यदि नाकाम रहे तो भी आपका बैंक बैलेंस बना रहेगा।

यह भौतिक बैंक बैलेंस नहीं है कि आप चले गए तो किसी और ने उस पर कब्जा कर लिया।

आत्मज्ञानी विद्वान से श्रेष्ठ होता है। विद्वान को बहुत मौखिक ज्ञान हो सकता है पर सम्भव है उसे अपने स्वांँसों के भीतर की शक्ति की पहचान न हो।

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम योगी बनो और ध्यान के अभ्यास से मन को प्राणों में रमण करने वाली शक्ति के साथ एकाकार करके स्वयंँ को जानो। तभी हृदय में विराजमान ईश्वर के सानिध्य में शान्ति के अनुभव से मनुष्य जीवन सफल होता है।

  • श्री हंस जी महाराज

मोह का ताना – बाना

मोह का ताना – बाना

मैं एक सूफी कहानी पढ़ता था।

एक युवक ने आकर अपने गुरु को कहा,
अब बहुत हो गया, मैं जीवन छोड़ देना चाहता हूं।
लेकिन पत्नी है, बच्चा है, घर—द्वार है।
गुरु ने कहा, तेरे बिना वे न हो सकेंगे?

उसने कहा कि ऐसा तो कुछ नहीं है,
सब सुविधा है, मेरे बिना हो सकेंगे।
लेकिन मुझे लगता है ऐसा कि
मैं मर जाऊंगा तो मेरी पत्नी जी न सकेगी,

मेरे बच्चे मर जाएंगे। इतना उनका प्रेम है मेरे प्रति।

उस फकीर ने कहा,
फिर ऐसा कर, कुछ दिन यह श्वास की विधि है,
इसका अभ्यास कर, फिर आगे देखेंगे।

श्वास की विधि का उसने अभ्यास किया ।
विधि ऐसी थी कि अगर तुम थोड़ी देर के लिए श्वास साधकर पड़ जाओ, तो मरे हुए मालूम पड़ो।

फिर उस फकीर ने उसे भेजा घर कि आज सुबह तू जाकर लेट जा और मर जा; फिर आगे सोचेंगे। मैं आता हूं पीछे से!
वह आदमी गया। लेट गया सांस साधकर,
मर गया। मर गया मालूम हुआ।

छाती पिटाई मच गयी, रोना— धोना हुआ,
बच्चे चिल्लाने लगे, पत्नी चिल्लाने
लगी कि मैं मर जाऊंगी।
तभी वह फकीर आया।

द्वार पर आकर उसने अपनी घंटी बजायी।
भीतर आया, उसने कहा, अरे! यह युवक मर गया?
यह बच सकता है अभी,
लेकिन कोई इसके बदले में मरने को राजी हो तो।
सन्नाटा हो गया।

न बेटा मरने को राजी, न बेटी मरने को राजी,
न मा मरने को राजी, न बाप मरने को राजी।
पत्नी, जो अभी तक चिल्ला रही थी मर जाऊंगी,
वह भी चुप हो गयी। अब वह भी नहीं चिल्लाती कि मर जाऊंगी।

फकीर ने पूछा, कोई भी तुममें से राजी हो इसकी जगह मरने को तो यह बच सकता है। अभी यह गया नहीं है, लौटाया जा सकता है।अभी बहुत दूर नहीं निकला है, बुलाया जा सकता है। मगर किसी को तो जाना ही पड़ेगा।

पत्नी ने कहा, *अब यह तो मर ही गया,अब हमको और क्यों मारते हो? अब जो हो गया सो हो गया।

गुरु ने उस युवक से कहा, अब तू अपनी स्वांस को साधना छोड़ और उठ। उसने स्वांस को साधना छोड़ी, उठा।
अब तेरा क्या खयाल है? फकीर ने ने कहा!
वह बोला – जब ये लोग कहते हैं कि हम मर ही गए और इनमें से कोई मेरे बदले मरने को राजी नहीं तो मैं मर ही गया। मैं आपके पीछे आता हूं।

अब किसी के लिय भी उसको रोक पाना आसान नहीं था!
पत्नी या और किसी के पास कहने को कोई कारण भी न बचा।

फ़क़ीर ने लोगों को समझाया कि तुम जिसे जीवन कह रहे हो, तुम जिसे जीवन का लगाव कहते हो, तुमने जीवन में जो आसक्ति के बहुत से घर बनाए हैं, मोह के बहुत ताने—बाने बुने हैं, तंबू लगाए हैं, उनको जरा गौर से तो देखोगे तो या सब पानी के बुलबुले जैसे हैं, क्षणभंगुर हैं। कोई यहां किसी का साथी नहीं, कोई यहां किसी का संगी नहीं। जब तुम अपनी ही देह पर भरोसा नहीं कर सकते तो और किसका भरोसा होगा किया जा सकता है!

इसलिय उस अविनाशी से जुडो, हर स्वांस में उसका सुमिरन करो!
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