तीन पुतले

तीन पुतले

महाराजा चन्द्रगुप्त का दरबार लगा हुआ था। सभी सभासद अपनी अपनी जगह पर विराजमान थे। महामन्त्री चाणक्य दरबार की कार्यवाही कर रहे थे।

महाराजा चन्द्र्गुप्त को खिलौनों का बहुत शौक था। उन्हें हर रोज़ एक नया खिलौना चाहिए था। आज भी महाराजा के पूछने पर कि क्या नया है; पता चला कि एक सौदागर आया है और कुछ नये खिलौने लाया है। सौदागर का ये दावा है कि महाराज या किसी ने भी आज तक ऐसे खिलौने न कभी देखें हैं और न कभी देखेंगे। सुन कर महाराज ने सौदागर को बुलाने की आज्ञा दी। सौदागर आया और प्रणाम करने के बाद अपनी पिटारी में से तीन पुतले निकाल कर महाराज के सामने रख दिए और कहा कि अन्नदाता ये तीनों पुतले अपने आप में बहुत विशेष हैं। देखने में भले एक जैसे लगते हैं मगर वास्तव में बहुत निराले हैं। पहले पुतले का मूल्य एक लाख मोहरें हैं, दूसरे का मूल्य एक हज़ार मोहरे हैं और तीसरे पुतले का मूल्य केवल एक मोहर है।

सम्राट ने तीनों पुतलों को बड़े ध्यान से देखा। देखने में कोई अन्तर नहीं लगा, फिर मूल्य में इतना अन्तर क्यों? इस प्रश्न ने चन्द्रगुप्त को बहुत परेशान कर दिया। हार के उसने सभासदों को पुतले दिये और कहा कि इन में क्या अन्तर है मुझे बताओ। सभासदों ने तीनों पुतलों को घुमा फिराकर सब तरफ से देखा मगर किसी को भी इस गुत्थी को सुलझाने का जवाब नहीं मिला। चन्द्रगुप्त ने जब देखा कि सभी चुप हैं तो उस ने वही प्रश्न अपने गुरू और महामन्त्री चाणक्य से पूछा।

चाणक्य ने पुतलों को बहुत ध्यान से देखा और दरबान को तीन तिनके लाने की आज्ञा दी। तिनके आने पर चाणक्य ने पहले पुतले के कान में तिनका डाला। सब ने देखा कि तिनका सीधा पेट में चला गया, थोड़ी देर बाद पुतले के होंठ हिले और फिर बन्द हो गए। अब चाणक्य ने अगला तिनका दूसरे पुतले के कान में डाला। इस बार सब ने देखा कि तिनका दूसरे कान से बाहर आगया और पुतला ज्यों का त्यों रहा। ये देख कर सभी की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी कि आगे क्या होगा। अब चाणक्य ने तिनका तीसरे पुतले के कान में डाला। सब ने देखा कि तिनका पुतले के मुँह से बाहर आगया है और पुतले का मुँह एक दम खुल गया। पुतला बराबर हिल रहा है जैसे कुछ कहना चाहता हो।
चन्द्रगुप्त के पूछ्ने पर कि ये सब क्या है और इन पुतलों का मूल्य अलग अलग क्यों है, चाणक्य ने उत्तर दिया।

राजन, चरित्रवान सदा सुनी सुनाई बातों को अपने तक ही रखते हैं और उनकी पुष्टी करने के बाद ही अपना मुँह खोलते हैं। यही उनकी महानता है। पहले पुतले से हमें यही ज्ञान मिलता है और यही कारण है कि इस पुतले का मूल्य एक लाख मोहरें है।

कुछ लोग सदा अपने में ही मग्न रहते हैं। हर बात को अनसुना कर देते हैं। उन्हें अपनी वाह-वाह की कोई इच्छा नहीं होती। ऐसे लोग कभी किसी को हानि नहीं पहुँचाते। दूसरे पुतले से हमें यही ज्ञान मिलता है और यही कारण है कि इस पुतले का मूल्य एक हज़ार मोहरें है।

कुछ लोग कान के कच्चे और पेट के हलके होते हैं। कोई भी बात सुनी नहीं कि सारी दुनिया में शोर मचा दिया। इन्हें झूठ सच का कोई ज्ञान नहीं, बस मुँह खोलने से मतलब है। यही कारण है कि इस पुतले का मूल्य केवल एक मोहर है।

आप कौन से पुतले है

💐💐शिक्षा💐💐

दोस्तों, जीवन मे किसी भी बात को पहले जांच परख करने के बाद ही उस पर अपने विचार प्रकट करने चाहिए,सुनी सुनाई बातों पर कभी विश्वास नही करना चाहिए।

कहाँ छुपी हैं शक्तियां

कहाँ छुपी हैं शक्तियां

एक बार देवताओं में चर्चा हो रहो थी। चर्चा का विषय था मनुष्य कि हर मनोकामनाओं को पूरा करने वाली गुप्त चमत्कारी शक्तियों को कहाँ छुपाया जाये?
सभी देवताओं में इस पर बहुत वाद- विवाद हुआ।
एक देवता ने अपना मत रखा और कहा कि इसे हम एक जंगल की गुफा में रख देते हैं।
दूसरे देवता ने उसे टोकते हुए कहा कि, नहीं-नहीं, हम इसे पर्वत की चोटी पर छिपा देंगे।
उस देवता की बात ठीक पूरी भी नहीं हुई थी कि कोई कहने लगा, “न तो हम इसे कहीं गुफा में छिपायेंगे और न ही इसे पर्वत की चोटी पर, हम इसे समुद्र की गहराइयों में छिपा देते हैं। यही स्थान इसके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा।”

सबकी राय खत्म हो जाने के बाद एक बुद्धिमान देवता ने कहा, क्यों न हम मानव की चमत्कारिक शक्तियों को मानव -मन की गहराइयों में छिपा दें?

चूँकि बचपन से ही मानव मन इधर -उधर दौड़ता रहता है तो मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकेगा कि ऐसी अदभुत और विलक्षण शक्तियांँ उसके भीतर छिपी हो सकती हैं और वह इन्हें बाह्य जगत में खोजता रहेगा!

अतः इन बहुमूल्य शक्तियों को हम उसके मन की निचली तह में छिपा देंगे।

बाकी सभी देवता भी इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए और ऐसा ही किया गया। मनुष्य के भीतर ही चमत्कारी शक्तियों का भण्डार छुपा दिया गया!
इसलिए कहा भी जाता है कि, मानव मन में अद्भुत शक्तियांँ निहित हैं।

यह कहानी यही संदेश देती है कि मानव मन असीम ऊर्जा का कोष है।
इन्सान जो भी चाहे वो हासिल कर सकता है। मनुष्य के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।

लेकिन बड़े दुःख की बात है उसे स्वयं ही विश्वास नहीं होता कि उसके भीतर इतनी शक्तियांँ विद्यमान हैं।
इसलिय लोगों के लिय जरूरी है कि अपने अन्दर की शक्तियों को पहचानिये, उन्हें पर्वत, गुफा या समुद्र में मत ढूंँढिए बल्कि अपने अन्दर खोजिये और अपनी शक्तियों को निखारिए।

वर्तमान में, सुविख्यात शांति के संदेश को पिछले 56 साल से पूरे संसार के अन्दर फ़ैलाने वाले आदरणीय श्री प्रेम रावत जी ह्रदय स्थित उस आनन्द का व्यावहारिक बोध करा रहे हैं! उनका कहना है कि अगर मनुष्य उस दिशा में एक कदम बढ़ाये तो आज के माहोल में भी हर मनुष्य के लिय शांति सम्भव है!
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बुढ़िया का यकीन

बुढ़िया का यकीन

एक बार कैंसर के एक बहुत मशहूर डॉक्टर डॉ. तेजल को नयी दिल्ली एक अवार्ड सेरेमनी में लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड देने के लिए बुलाया जाता है।

इस आवर्ड को लेकर डॉ. तेजल ही नहीं पूरा झुंझुनूं शहर बहुत उत्साहित था क्योंकि डॉ. साहब न सिर्फ एक काबिल डॉक्टर थे बल्कि एक बहुत नेक दिल इंसान भी थे।

अवार्ड सेरेमनी वाले दिन वो सुबह फ्लाइट पकड़ने के लिए एअरपोर्ट पहुँचते हैं,पर कुछ टेक्निकल खराबी आ जाने के कारण वो फ्लाइट कैंसिल हो जाती है.. और दुर्भ्ग्यवाश कोई अगली फ्लाइट भी मौजूद नहीं होती है।

डॉ. तेजल सोचते हैं चलो कोई बात नहीं सेरेमनी तो शाम को है… और झुंझुनूं से दिल्ली 6-7 घंटे का ही रास्ता है तो चलो टैक्सी से निकल लेते हैं।

वे जल्द ही एक टैक्सी हायर करके दिल्ली की तरफ बढ़ने लगते हैं…आधे रास्ते तक तो सब ठीक रहता है लेकिन अचानक ही ड्राईवर कहता — “साहब! सामने देखिये… बहुत बड़ा जाम लगा हुआ है… अगर हम इस रास्ते से जाते हैं तो पहुँचने में रात लगा जायेगी! अगर आप कहें तो कोई दूसरा रास्ता ट्राई करूँ…”

डॉ तेजल पहले तो ड्राईवर को मना कर देते हैं पर जब 10-15 मिनट बाद भी गाड़ियाँ टस से मस नहीं होती हैं तो वे ड्राईवर से दूसरा रास्ता ट्राई करने को कहते हैं।

ड्राईवर अपने अंदाजे पर गाड़ी सर्विस लेन पर ले लेता है और जो पहले कट मिलता है उससे बायीं तरफ मुड़ जाता है। उबड़-खाबड़ रास्तों पर घंटे भर चलने के बाद भी कोई पक्की सड़क या रास्ता नहीं दिखाई देता।

डॉ. तेजल बिलकुल मायूस हो जाते हैं तभी उनको दूर एक झोपड़ी दिखाई देती है।

वो देखिये ड्राईवर साहब उधर एक झोपड़ी है, चलिए वहीं चल कर पता पूछते हैं।

ड्राईवर तुरंत गाड़ी रोकता है और वे दोनों उतर कर उस झोपड़ी के पास पहुँचते है।

“अरे कोई है!”, ड्राईवर जोर से पुकारता है।

झोपड़ी से एक बूढी सी औरत बाहर निकलती है।

“क्या बात है बेटा, क्यों पुकार रहे हो?”
“माता जी हम लोगों को दिल्ली जाना है पर हम रास्ता भटक कर इधर आ गए हैं क्या आप हमारी मदद कर सकती हैं?”, ड्राईवर वृद्धा से निवेदन करता है.

बिलकुल मदद करुँगी बेटा पहले आप लोग अन्दर आकर पानी तो पी लो।

वह उन दोनों के लिए पानी और कुछ गुड़ लेकर आती है।

डॉ. तेजल उस गरीब की आवभगत से खुश हो जाते हैं और पूछते हैं – “आप यहाँ अकेली रहती हैं क्या?”

नहीं-नहीं, मेरा पोता भी मेरे साथ रहता है. बिचारे के माता-पिता बचपन में ही मर गए थे तबसे मैं ही इसका ख़याल रखती हूँ… देखिये न बेचारा बिस्तर में बीमार पड़ा है…शायद ये भी अब कुछ दिनों बाद मुझे छोड़ कर चला जाएगा…।

और इतना कहते-कहते उनकी आँखों से आंसूं निकलने लगे।

डॉ. तेजल आगे बढ़ते हैं और वृद्धा को ढांढस बंधाते हुए कहते हैं, कुछ नहीं होगा इसे बताइये क्या हुआ है इस नन्हे बालक को।

इस अभागे को कैंसर है साहब…लोग कहते हैं इसका इलाज सिर्फ झुंझुनूं के डॉ. तेजल के पास है… बहुत कोशिश की, कई बार चक्कर लगाए पर डॉ. साहब से मुलाक़ात नहीं हो पायी…अब तो सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दिया है…अगर मैंने सच्चे मन से उसे माना होगा तो एक दिन वो मेरी मदद ज़रूर करेगा।

इतना सुनते ही डॉ. तेजल का गला रुंध गया…आँखों में नमी आ गयी…वे पूरे दिन के घटनाक्रम को सोचने लगे कि कैसे बुढ़िया का यकीन हकीकत बन गया…कैसे उस ऊपर वाले ने अपने बंदे के उन्हें यहाँ भेजा!

गहरी सांस लेते हुए वे बोले, “मैं ही हूँ डॉ. तेजल आपके ईश्वर ने ही मुझे यहाँ भेजा है।चलिए मेरे साथ हम आज से ही इस बालक का इलाज शुरू करेंगे!”

फिर वे ड्राईवर से बोले, “ड्राईवर गाडी वापस ले लो!”

“ल..ल..लेकिन वो आपका लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड!”, ड्राईवर अचरज से बोला.

लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड कभी भी किसी की लाइफ से ज़रूरी नहीं हो सकता है…

जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो” और सभी गाड़ी में बैठ कर झुंझुनूं वापस लौट गए।और बच्चे का इलाज करके उसे एक दम सही कर दिया।

आज लोगों की नज़र में भले डॉ. तेजल ने एक जीवन बचाने के लिए जीवन भर की मेहनत का अवार्ड छोड़ दिया था..पर ऐसा करके उन्हें अन्दर से जो ख़ुशी और संतोष मिला था वो ऐसे हज़ारों अवार्ड से भी बड़ा था।

💐💐शिक्षा💐💐

दोस्तों, कहते हैं ऊपर वाले के घर देर है अंधेर नहीं. यदि आप सच्चे दिल से किसी चीज में यकीन करते हैं और उसके लिए हर संभव प्रयास करते हैं तो एक न एक दिन वो आपको मिल ही जाती है.

इसलिए उस बूढी औरत की तरह दृढ विश्वास के साथ जो कुछ भी आप पाना चाहते हैं उसके लिए कर्म करिए…लेकिन फल कब कैसे कहाँ मिलेगा वो भगवान् पर छोड़ दीजिये।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

हमारे मन बुद्धि से परे

हमारे मन बुद्धि से परे

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त “श्रीकृष्ण” ने अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि, हे पार्थ तराजू पर पैर संभलकर रखना, संतुलन बराबर रखना, लक्ष्य मछली की आंख पर ही केंद्रित हो उसका खास खयाल रखना।

तो अर्जुन ने कहा, “हे प्रभु”, सब कुछ अगर मुझे ही करना है, तो फिर आप क्या करोगे?

वासुदेव हंसते हुए बोले, हे पार्थ जो आप से नहीं होगा वह में करुंगा।

अर्जुन ने कहा, प्रभु ऐसा भी क्या है जो मैं नहीं कर सकता?

वासुदेव फिर हंसे और बोले, जिस अस्थिर, विचलित, हिलते हुए पानी में तुम मछली का निशाना साधोगे, उस विचलित “पानी” को मैं स्थिर रखूंगा!

कहने का तात्पर्य यह है कि –
आप चाहे
कितने ही निपुण क्यूँ ना हो!
कितने ही बुद्धिवान क्यूँ ना हो!
कितने ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हो!

लेकिन आप
स्वयं हरेक परिस्थिति के उपर
पूर्ण नियंत्रण नहीँ रख सकते।

आप सिर्फ
अपना प्रयास कर सकते हो।
लेकिन
उसकी भी एक सीमा है।
और जो उस सीमा से आगे की बागडोर संभालता है!
उसी का नाम “भगवान” है!

यही सच है कि शरनागत भाव से भगवान का साक्षात्कार हो सकता है!
इसलिए
अपने मन बुद्धि का बृधा अभिमान नहीं करना चाहिए!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

ईर्ष्या, निंदा, घृणा, धोखा से मुक्त मन

श्री हंस जी महाराज जी की अनमोल सीख!

लोग निन्दा करें तो करने दो बल्कि सब लोगों को अपनी तरफ से छुट्टी दे दो!
वे चाहे निन्दा करें, चाहे प्रशंँसा करें! जिसमें लोग राजी हों – करें।

आप सबको छुट्टी दे दो तो आप स्वतः ही मुक्त हो जाओगे।

प्रशंसा में तो मनुष्य फँस जाता है, पर निन्दा में पाप नष्ट होते हैं।
कोई झूठी निन्दा करे तो चुप रहो सफाई भी मत दो।
कोई पूछे तो सत्य बात कह दें।
बिना पूछे लोगों को कुछ भी कहने की जरुरत नहीं।
बिना पूछे सफाई देने का मतलब है सत्य की सफाई देना जो सत्य का अनादर होता है।

भरत जी कहते हैं😘
जानहुँ रामु कुटिल करी मोही, लोग कहउ गुरु साहिब द्रोही।
सीता राम चरण रति मोरें, अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।

दूसरा आदमी हमें खराब समझे तो इसका कोई मूल्य नहीं है
क्योंकि श्री गुरुमहाराज जी किसी दूसरे की गवाही नहीं लेते हैं!
दूसरा आदमी अच्छा कहे तो आप अच्छे हो जाओगे? ऐसा कभी नहीं होगा।

अगर आप स्वयं बुरे हो तो आपको स्वयं पता है और बुरे ही रहोगे।
अगर आप अच्छे हो तो अच्छे ही रहोगे, भले ही पूरी दुनियां बुरी कहे।
लोग निन्दा करें तो भी आनन्द आना चाहिए।

श्री महाराजी जी आगे बतलाते हैं कि –
मेरी निन्दा से यदि किसी को सन्तोष होता है, तो बिना प्रयत्न के ही मेरी उन पर कृपा हो गयी; क्योंकि कल्याण चाहने वाले पुरुष तो दूसरों के सन्तोष के लिए अपने कष्टपूर्वक कमाए हुए धन का भी परित्याग कर देते हैं – मुझे तो कुछ करना ही नहीं पड़ा।

हम पाप नहीं करते, किसी को दुःख नहीं देते, धोखा नहीं देते, फिर भी हमारी निन्दा होती है तो उसमें दुःख नहीं होना चाहिए बल्कि हमें प्रसन्नता होनी चाहिए।
हृदय में बैठे परम सत्ता ईश्वर की तरफ से जो होता है, सब मंँगलमय ही होता है।
इसलिए मन के विरुद्ध कोई बात हो जायें तो उसमें आनन्द मनाना चाहिए क्योंकि उसमें भी परमात्मा की मर्जी छूपी होती है।

सदैव याद रखें कि हर स्वांस खुशियांँ लाता है। हर कठिन परिस्थिति, दूसरों द्वारा झूठी निन्दा, घृणा, धोखा अनुभव लाते हैं।
एक सफल जीवन और हृदय में शान्ति के अनुभव के लिये यह सब जरूरी होते हैं!
लेकिन तुम किसी की निन्दा मत करना और न ही किसी को धोखा देना। बस”नाम-सुमिरण” द्वारा प्रत्येक पल का आनन्द लेते हुए अभ्यास से स्वयं को जानना और शान्ति के अनुभव से मनुष्य जीवन सफल बनाना है।

  • श्री हंस जी महाराज

समय के सद्गुरु की उस अहेतुकी दया को हमेशा याद रखें!

समय के सद्गुरु की उस अहेतुकी दया को हमेशा याद रखें!

एक दिन एक राजा ने राजपंडित को बुलाया और उसे बहुत सख्ती से आदेश दिया कि , “राजा परीक्षित ने सुखदेव से भगवत गीता सुनकर मोक्ष प्राप्त किया था। उन्हें केवल सात दिन लगे। मैं आपको सभी बंधनों से मुझे मुक्त कराने के लिए एक महीने का समय दे रहा हूँ ताकि मैं मोक्ष प्राप्त कर सकूँ। यदि आप ऐसा नहीं कर पाए तो, मैं आपकी सारी संपत्ति जब्त कर लूँगा, और आप को मृत्यु दण्ड दूँगा।”

इस आदेश ने राजपंडित को अत्यधिक चिंतित कर दिया और वह इस चिंता में अब न तो खा सकता था और न ही सो सकता था। उसका तनाव दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था। एक दिन संयोग से जब वह अपने परिवार के साथ भोजन कर रहा था तो उसका बेटा, जो आमतौर पर अपना भोजन अलग से करता था और जो अपने पिता से यदा-कदा ही मिलता था। एक दिन बेटे ने गौर किया कि उसके पिता बहुत उदास दिख रहे थे। उसने अपने पिता से उदासी का कारण पूछा। राजपंडित उत्तर देने के लिए अनिच्छुक थे क्योंकि उन्होंने अपने बेटे से कुछ उम्मीद नहीं।

हालांकि उसकी माँ ने उसे परेशानी का पूरा कारण बता दिया। पुत्र बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ और उसने शांति से अपने पिता से कहा, “पिताजी, आप चिंता न करें और राजा से कहें के मुझे अपना गुरु स्वीकार करके मेरे निर्देशों का अक्षरशः पालन करने के लिये कहें।”

पिता ने सोचा कि बेटा शायद उन्हें बचाने के लिए कोई तरकीब सोच रहा होगा, इसलिए वह उसे राजा के पास लेे गया और राजा को अपने बेटे के प्रस्ताव के बारे में बताया। राजा मान गया और अगले दिन राजपंडित अपने पुत्र के साथ दरबार में आया।

सभी बंधनों से मुक्त होने के लिए, राजा ने राजपंडित के पुत्र को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया और निर्देशों की प्रतीक्षा में उसके चरणों में बैठ गया।

दरबार में भीड़ थी और सभी की निगाहें राजा और उनके गुरु पर टिकी थीं। सभी को आश्चर्य हुआ जब राजपंडित के पुत्र ने राजा से एक बहुत मजबूत रस्सी लाने को कहा।

राजपंडित यह सोचकर बहुत परेशान हो गया कि उसका बेटा भला यह क्या मूर्खता कर रहा है। वह डर गया, और सोचा कि क्या उसका बेटा किसी को रस्सी से बांधेगा, या कहीं वो स्वयं राजा को ही तो नहीं बांध देगा?

तभी पुत्र ने आज्ञा दी, “राजा को उस खम्भे से बान्ध दिया जाए।” राजा वचन से बंधा था इसलिए वह खंभे से बंधने के लिए सहमत हो गया।

इसके बाद पुत्र ने अपने पिता को दूसरे खम्भे से बाँधने का आदेश दिया। तो अब स्वयं राजपंडित भी बंधा हुआ था।

अब तो राजपंडित बहुत उत्तेजित हो गया। वह अपने बेटे को मन ही मन कोस रहा था और उसे दंडित करने की सोच रहा था। तभी उसके बेटे ने उसे निर्देश दिया, “पिताजी, अब आप राजा को खोल दीजिए।”

राजपंडित क्रोधित हो गया और क्रोध में चिल्लाया, “अरे मूर्ख! क्या तुम देख नहीं सकते कि मैं स्वयं बंधा हुआ हूं? क्या एक आदमी जो खुद बंधा हुआ है, दूसरे आदमी के बंधन को खोल सकता है? क्या तुम नहीं समझते कि यह एक असंभव कार्य है? “

राजा ने अपने युवा गुरु को संबोधित करते हुए एक शांत और सम्मानजनक स्वर में कहा, “मैं समझ गया मेरे गुरु। जो स्वयं सांसारिक मामलों में बंधा हुआ है, ‘माया’ से बंधा हुआ है, वह संभवतः दूसरे व्यक्ति को मुक्त नहीं कर सकता है।

जो संसार की मोह माया त्याग कर, संसार से परे चले गए हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है, वे ही दूसरे मनुष्य को मुक्त कर सकते हैं। वे ही दूसरों के बंधनों को तोड़ सकते हैं।”

अतःएव आप सभी अगर अपनी समस्याओं से मुक्ति चाहते हैं तो ऐसे गुरु की तलाश करें, जो खुद को मुश्किलो से खुद को आज़ाद कर चुका हो।

भाग्यशाली हैं हम सब जिनको समय के सद्गुरु मिले हैं और अनावश्यक भटकाव से हमको बचाकर, हमें उस अविनाशी से जोड़ दिया!

सच ही कहा है ना कि –
दौड़ रहा दिन रात सदा,
जग के सब काज विहारन में!
सपने सम विश्व दिखाय मुझे,
मेरे चंचल चित्त को मोड़ दिया!

इसलिए
🌸 समय के सद्गुरु की उस अहेतुकी दया को हमेशा याद रखें! 🌸
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

दौड़ रहा दिन रात सदा,जग के सब काज विहारन में!

एक दिन एक राजा ने राजपंडित को बुलाया और उसे बहुत सख्ती से आदेश दिया, “राजा परीक्षित ने सुखदेव से भगवत गीता सुनकर मोक्ष प्राप्त किया था। उन्हें केवल सात दिन लगे। मैं आपको सभी बंधनों से मुझे मुक्त कराने के लिए एक महीने का समय दे रहा हूँ ताकि मैं मोक्ष प्राप्त कर सकूँ। यदि आप ऐसा नहीं कर पाए तो मैं आपकी सारी संपत्ति जब्त कर लूँगा और आप को मृत्यु दण्ड दूँगा।”

इस आदेश ने राजपंडित को अत्यधिक चिंतित कर दिया और वह इस चिंता में अब न तो खा सकता था और न ही सो सकता था। उसका तनाव दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था।

एक दिन संयोग से जब वह अपने परिवार के साथ भोजन कर रहा था तो उसका बेटा, जो आमतौर पर अपना भोजन अलग से करता था और जो अपने पिता से यदा-कदा ही मिलता था। एक दिन बेटे ने गौर किया कि उसके पिता बहुत उदास दिख रहे थे। उसने अपने पिता से उदासी का कारण पूछा।

राजपंडित उत्तर देने के लिए अनिच्छुक थे क्योंकि उन्होंने अपने बेटे से कुछ उम्मीद नहीं थी।

हालांकि उसकी माँ ने उसे परेशानी का पूरा कारण बता दिया।
पुत्र बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ और उसने शांति से अपने पिता से कहा, “पिताजी, आप चिंता न करें। और राजा से कहें के मुझे अपना गुरु स्वीकार करके मेरे निर्देशों का अक्षरशः पालन करने के लिये कहें।”

पिता ने सोचा कि बेटा शायद उन्हें बचाने के लिए कोई तरकीब सोच रहा होगा, इसलिए वह उसे राजा के पास लेे गया और राजा को अपने बेटे के प्रस्ताव के बारे में बताया।

राजा मान गया और अगले दिन राजपंडित अपने पुत्र के साथ दरबार में आया।

सभी बंधनों से मुक्त होने के लिए, राजा ने राजपंडित के पुत्र को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया और निर्देशों की प्रतीक्षा में उसके चरणों में बैठ गया।

दरबार में भीड़ थी और सभी की निगाहें राजा और उनके गुरु पर टिकी थीं।

सभी को आश्चर्य हुआ जब राजपंडित के पुत्र ने राजा से एक बहुत मजबूत रस्सी लाने को कहा।

राजपंडित यह सोचकर बहुत परेशान हो गया कि उसका बेटा भला यह क्या मूर्खता कर रहा है।

वह डर गया, और सोचा कि क्या उसका बेटा किसी को रस्सी से बांधेगा, या कहीं वो स्वयं राजा को ही तो नहीं बांध देगा?

तभी पुत्र ने आज्ञा दी, “राजा को उस खम्भे से बान्ध दिया जाए।”

राजा वचन से बंधा था इसलिए वह खंभे से बंधने के लिए सहमत हो गया।

इसके बाद पुत्र ने अपने पिता को दूसरे खम्भे से बाँधने का आदेश दिया। तो अब स्वयं राजपंडित भी बंधा हुआ था।

अब तो राजपंडित बहुत उत्तेजित हो गया। वह अपने बेटे को मन ही मन कोस रहा था और उसे दंडित करने की सोच रहा था।

तभी उसके बेटे ने उसे निर्देश दिया, “अब, पिताजी आप राजा को खोल दीजिए।”

राजपंडित क्रोधित हो गया और क्रोध में चिल्लाया, “अरे मूर्ख! क्या तुम देख नहीं सकते कि मैं स्वयं बंधा हुआ हूं? क्या एक आदमी जो खुद बंधा हुआ है, दूसरे आदमी के बंधन को खोल सकता है? क्या तुम नहीं समझते कि यह एक असंभव कार्य है?”

राजा ने अपने युवा गुरु को संबोधित करते हुए एक शांत और सम्मानजनक स्वर में कहा, “मैं समझ गया मेरे गुरु। जो स्वयं सांसारिक मामलों में बंधा हुआ है, ‘माया’ से बंधा हुआ है, वह संभवतः दूसरे व्यक्ति को मुक्त नहीं कर सकता है ।

जो संसार का त्याग कर, माया के संसार से परे चले गए हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है – वे ही दूसरे मनुष्य को मुक्त कर सकते हैं। वे ही दूसरों के बंधनों को तोड़ सकते हैं।”

अतःएव आप सभी अगर अपनी समस्याओं से मुक्ति चाहते है तो ऐसे गुरु की तलाश करें जो खुद को संसार के बंधनों से आज़ाद कर चुका हो।

भाग्यशाली हैं हम सब जिनको समय के सद्गुरु मिले हैं जिन्होंने हमको अनावश्यक भटकाव से रोककर उस अविनाशी से जोड़ दिया!
कहा है ना कि –
दौड़ रहा दिन रात सदा,
जग के सब काज विहारन में!
सपने सम विश्व दिखाय मुझे,
मेरे चंचल चित्त को मोड़ दिया!
इसलिए
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गलत व अभोज्य वस्तुओं के खान-पान से मनुष्य विकार ग्रस्त हो जाता है।

बोल तो अमोल है जो कोई बोले जान।
हिये तराजू तौल के तव मुख बाहर आन॥
एक दिन गुरुकुल के शिष्यों में इस बात पर बहस छिड़ गयी कि आखिर इस संसार की सबसे शक्तिशाली वस्तु क्या है?
कोई कुछ कहता तो कोई कुछ! जब पारस्परिक विवाद का कोई निर्णय ना निकला तो फिर सभी शिष्य गुरुजी के पास पहुँचे!

सबसे पहले गुरूजी ने उन सभी शिष्यों की बातों को सुना और कुछ सोचने के बाद बोले- तुम सब की बुद्धि ख़राब हो गयी है! क्या ये अनाप-शनाप निरर्थक प्रश्न कर रहे हो? इतना कहकर वे वहां से चले गए।

हमेशा शांत स्वभाव रहने वाले गुरु जी से किसी ने इस प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं की थी। सभी शिष्य क्रोधित हो उठे और आपस में गुरु जी के इस व्यवहार की आलोचना करने लगे।

अभी वे आलोचना कर ही रहे थे कि तभी गुरु जी उनके समक्ष पहुंचे और बोले- *मुझे तुम सब पर गर्व है! तुम लोग अपना एक भी क्षण भी व्यर्थ नहीं करते और अवकाश के समय भी ज्ञान चर्चा किया करते हो।

गुरु जी से प्रसंशा के बोल सुनकर शिष्य गदगद हो गए! उनका स्वाभिमान जागृत हो गया और सभी के चेहरे खिल उठे।

गुरूजी ने फिर अपने उन सभी शिष्यों को समझाते हुए कहा – “मेरे प्यारे शिष्यो! आज ज़रूर आप लोगों को मेरा व्यवहार कुछ विचित्र सा लगा होगा! दरअसल, मैंने ऐसा जानबूझ आपके प्रश्न का उत्तर देने के लिए किया था।

देखिये,
जब मैंने आपके प्रश्न के बदले में आपको भला-बुरा कहा तो आप सभी क्रोधित हो उठे और मेरी आलोचना करने लगे!
लेकिन जब मैंने आपकी प्रसंशा की तो आप सब प्रसन्न हो उठे!

पुत्रो, इस संसार में वाणी से बढकर दूसरी कोई शक्तिशाली वस्तु नहीं है।
वाणी से ही मित्र को शत्रु और शत्रु को भी मित्र बनाया जा सकता है।
ऐसी शक्तिशाली वस्तु का प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति को सोच समझ कर करना चाहिए।
वाणी का माधुर्य लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।
गुरूजी की बातें सुनकर शिष्यगण संतुष्ट होकर गुरुदेव को प्रणाम कर लौट आए और उस दिन से मीठा बोलने का अभ्यास करने लगे।

सचमुच में, हमारी बोली या हमारी वाणी बेहद शक्तिशाली होती है! आवश्यकता है – इसका सही प्रयोग करने की।
यदि हम अपनी बोली अच्छी रखते हैं और अपनी बात बिना औरों को ठेस पहुंचाए हुए कहते हैं तो ये हमारे व्यक्तित्व को संवारता है और हमें लोगों के बीच लोकप्रिय बनाता है।
वहीं, अगर हम साधारण बात भी अपमानजनक या क्रोध के साथ कहते हैं तो ना हम ठीक से अपने विचारों को समझा पाते हैं और ना ही दूसरों के हृदय में अपने लिए कोई जगह बना पाते हैं। अतः हमें हमेशा सही शब्दों और सही लहजे का चुनाव करना चाहिए!
कहा भी है कि –
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आप खोय!
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ।
भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि इंसान को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को बहुत अच्छी लगे। ऐसी भाषा दूसरे लोगों को तो सुख पहुँचाती ही है, इसके साथ खुद को भी बड़े आनंद का अनुभव होता है।

सचमुच में, वाणी की शक्ति मनुष्य के लिए वरदान व अभिशाप दोनों है। आवश्यकता है सदुपयोग एवं दुरुपयोग की। निंदा, प्रशंसा, आलोचना के शब्दों को सुन-सुनकर मनुष्य का हृदय इधर-उधर डोलता है। वाणियां ही मनुष्य के मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह के विकार उत्पन्न करते हैं। वाणी सुनकर ही राजा धन, ऐश्वर्य व राजपाट छोड़कर वैरागी बन जाता है। उपदेश सुनकर ही मनुष्य विवेक द्वारा इस संसार की नि:सारता को समझता है।

गलत व अभोज्य वस्तुओं के खान-पान से मनुष्य विकार ग्रस्त हो जाता है। उसी प्रकर गलत वाणियां बोलकर मनुष्य स्वयं व दूसरों को अशांत करता है। कई लोग बातें ज्यादा काम कम करते हैं तो कई लोग बातें कम तथा काम ज्यादा करते हैं!
कबीर साहेब कहते हैं – मधुर वचन है औषधि कटुक वचन है तीर।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 सुप्रभात 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

जब हृदय में शांति का अनुभव मनुष्य ने कर लिया तो यह मनुष्य के लिए सबसे बड़ी चीज है।

एक बक्सा है। उस बक्से के अंदर अनमोल चीज रखी है और बक्से में ताला लगा है।

पहले आप यह बात समझ लें कि यह बक्सा कौन सा बक्सा है ? मैं किस बक्से की बात कर रहा हूँ ? यह साधारण बक्सा नहीं है। जिस बक्से की मैं बात कर रहा हूँ, वह है – यह मनुष्य शरीर और इस मनुष्य शरीर में कुछ रखा हुआ है।

बाहर से एक बक्सा ऐसा है, जो साधारण है। एक बक्सा है, जो चांदी से जड़ा हुआ है। एक बक्सा है, जो सोने से जड़ा हुआ है। एक बक्सा है, जिसमें कारीगरों ने तरह-तरह का काम किया है। एक बक्सा है, जिसमें किसी ने काम नहीं किया है, कच्ची लकड़ी का बना हुआ है। कोई बात नहीं। बक्से के बाहर जो कुछ है, मैं उसकी बात नहीं कर रहा हूँ। मैं उस चीज की बात कर रहा हूँ, जो इस बक्से के अंदर है।

इस मनुष्य रूपी बक्से के बारे में भी समझ लीजिये कि इस बक्से के कुछ नियम हैं। यह बक्सा भी प्रकृति के नियमों में बंधा हुआ है। एक दिन यह बक्सा बना और एक दिन यह बक्सा नहीं रहेगा। जबतक यह बक्सा है, तबतक इसके अंदर रखी हुई चीज उपलब्ध है। जिस दिन यह बक्सा नहीं रहेगा, उस दिन वह अंदर रखी हुई चीज भी नहीं मिलेगी। पर जबतक यह बक्सा है, इसके अंदर एक ऐसी चीज रखी हुई है, जो अनमोल है। चाहे किसी ने इस पर कुर्ता पहन रखा हो या किसी ने सूट पहन रखा हो, किसी ने टाई पहन रखी हो, किसी भी तरीके से इसको सजाया हुआ हो। इस बक्से के अंदर जो चीज रखी हुई है, मेरा मतलब उससे है।

आजतक तो लोग बक्से के बाहर क्या है, इस बारे में सोचते आये हैं। बक्सा कैसा होना चाहिए, लोगों ने इसके लिए रीति-रिवाज बनाये हैं। किस तरीके से इस बक्से को रखना चाहिए ? इन्हीं नियमों को बनाते-बनाते बड़े-बड़े देश बन गए; बड़े-बड़े धर्म बन गए; बड़े-बड़े कानून बन गए – इस बक्से के कारण। अगर यह बक्सा नहीं होता तो कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं होती, देशों की कोई जरूरत नहीं होती, इसको सजाने की कोई जरूरत नहीं होती, कोई अमीर नहीं होता और कोई गरीब नहीं होता।

बक्सा हैं आप और अनमोल चीज है आपके अंदर। अज्ञानता का ताला लगा हुआ है। ज्ञान की चाबी मेरे पास है। अगर किसी को चाहिए तो मैं उसे दे सकता हूँ। मैं बात कर रहा हूँ ‘शांति’ की, मैं बात कर रहा हूँ ‘सच्ची खुशी’ की। अगर मनुष्य को कुछ भी करना नहीं आता हो, तब भी वह अपने हृदय में उस सच्ची खुशी का अनुभव कर सके तो इतना ही पर्याप्त है! इसके बाद जब संतोष हो गया, जब हृदय में शांति का अनुभव मनुष्य ने कर लिया तो यह मनुष्य के लिए सबसे बड़ी चीज है।

सचमुच संचयात्मक सोच ही संशय और लोभ की जननी है!

एक बहुत धनी व्यापारी था। उसने बहुत धन संपत्ति इकट्ठा कर रखी थी। उसका एक नौकर था संभु। जो अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा गरीबों की मदद में खर्च कर देता था। व्यापारी रोज उसे धन बचाने की शिक्षा देता। लेकिन संभु पर कोई असर नहीं होता था।

इससे तंग आकर एक दिन व्यापारी ने संभु को एक डंडा दिया और कहा कि जब तुझे अपने से भी बड़ा कोई मूर्ख मिले तो इसे उसको दे देना।

इसके बाद व्यापारी अक्सर उससे पूछता कि कोई तुझसे बड़ा मूर्ख मिला?

संभु विनम्रता से इनकार कर देता। एक दिन व्यापारी बीमार हो गया। रोग इतना बढ़ा कि वह मरणासन्न हो गया।

अंतिम समय उसने संभु को अपने पास बुलाया और कहा कि अब मैं इस संसार को छोड़कर जाने वाला हूँ।
संभु ने कहा, “मालिक मुझे भी अपने साथ ले चलिए।”
व्यापारी ने प्यार से डांटते हुए कहा, “वहां कोई किसी के साथ नहीं जाता।”

संभु ने फिर कहा, ”फिर तो आप धन-दौलत, सुख- सुविधा के सामान जरूर ले जाइए और आराम से वहां रहिएगा।”

व्यापारी ने कहा, ”पगले! वहां कुछ भी लेकर नहीं जाया जा सकता। सबको अकेले और खाली हाथ ही जाना पड़ता है।”

इस पर संभु बोला, “मालिक! तब तो यह डंडा आप ही रखिये। जब कुछ लेकर जाया नहीं जा सकता। तो आपने बेकार ही पूरा जीवन धन दौलत और सुख सुविधाओं को एकत्र करने में नष्ट कर दिया। न तो दान पुण्य किया, न ही भगवान का भजन। इस डंडे के असली हकदार तो आप ही हो।”

सचमुच संचयात्मक सोच ही संशय और लोभ की जननी है! इसलिय अधिक धन और साथ ना ले जा सकने वाली चीजों के संचय का लोभ नहीं करना चाहिए क्योंकि अंत समय में मनुष्य के साथ कुछ नहीं जाता!
🙏🏾🙏🏼🙏 सुप्रभात🙏🏻🙏🏿🙏🏽