जाको राखे साँईयां, मार सके न कोई।
बाल ना बाँका करि सकें,जो जग बैरी होई।।

संसार के सारे रिश्ते झूठे हैं,
केवल आत्मा का रिश्ता सच्चा है!

एक राजा था! उसके कोई पुत्र नहीं था।राजा बहुत दिनों से पुत्र की प्राप्ति के लिए आशा लगाए बैठा था! लेकिन पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई! उसके सलाहकारों ने तान्त्रिकों से सहयोग लेने को कहा।तान्त्रिकों की तरफ से राजा को सुझाव मिला कि यदि किसी बच्चे की बलि दी जाए, तो राजा को पुत्र की प्राप्ति हो सकती है।

राजा ने राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि जो अपना बच्चा बलि चढ़ाने के लिए राजा को देगा, उसे राज्य की तरफ से बहुत सारा धन किया जाएगा।

एक परिवार में कई बच्चे थे! गरीबी भी बहुत थी। एक ऐसा बच्चा भी था – जो गुरु महाराज जी पर आस्था रखता था तथा सन्तों के सतसंग में अधिक समय देता था।

राजा की मुनादी सुनकर परिवार को लगा कि क्यों न इसे राजा को दे दिया जाए? क्योंकि यह निकम्मा है, कुछ काम धाम भी नहीं करता है और हमारे किसी काम का भी नहीं है और इसे देने पर, राजा प्रसन्न होकर, हमें बहुत सारा धन देगा।
ऐसा ही किया गया,बच्चा राजा को दे दिया गया।

राजा ने बच्चे के बदले उसके परिवार को काफी धन दिया। राजा के तान्त्रिकों द्वारा बच्चे की बलि देने की तैयारी हो गई। राजा को भी बुला लिया गया! बच्चे से पूछा गया कि तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है? और यह बात राजा ने बच्चे से पूछी और तान्त्रिकों ने भी पूछी।

बच्चे ने कहा कि- मेरे लिए रेत मंँगा दी जाए!
राजा ने कहा- बच्चे की इच्छा पूरी की जाये।

अतः रेत मंँगाया गया। बच्चे ने रेत से चार ढेर बनवाए! एक-एक करके बच्चे ने तीन रेत की ढेरों को लात मार दी और चौथे ढेर के सामने हाथ जोड़ कर बैठ गया और खूब रोने लगा! गुरु महाराज जी का आशीर्वाद प्राप्त करके राजा से कहा कि अब जो करना है,आप लोग कर लें!

यह सब देखकर तान्त्रिक डर गये और उन्होंने बच्चे से पूछा। पहले तुम यह बताओ कि यह तुमने क्या किया है?
राजा ने भी यही सवाल बच्चे से पूछा।

तो बच्चे ने कहा कि – पहली ढेरी मेरे माता-पिता के नाम की थी। मेरी रक्षा करना इनका कर्तव्य था परन्तु उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन न करके पैसे के लिए मुझे बेच दिया! इसलिए मैंने इस रेत की ढेरी को लात मार दी। मुझे ऐसे माता-पिता से कोई मोह नहीं है।

दूसरी रेत की ढेर मेरे सगे सम्बन्धियों की थी। उन्होंने भी मेरे माता पिता को नहीं समझाया कि ये सतसंग में ही तो जाता है, किसी की चोरी, ठगी नहीं करता!इसे मत बेचो! ऐसा किसी भी गाँव परिवार वालों ने नहीं कहा।अतः मैंने दूसरी ढेरी को भी लात मार दिया। इनसे भी मुझे कोई मोह नहीं है।

और तीसरी रेत की ढेरी हे राजन, ये आपके नाम की है। क्योंकि राज्य की प्रजा की रक्षा करना, राजा का ही धर्म होता है परन्तु जब राजा ही मेरी बलि देना चाह रहा है तो ये रेत की ढेरी को भी मैंने लात मार दी। मुझे ऐसे राजा पर भी कोई मोह नहीं है, कोइ विश्वास भी नहीं है।

और चौथी ढेरी, हे राजन,ये मेरे सच्चे गुरु दरबार में मेरे महाराज जी के नाम की है।अब सिर्फ और सिर्फ अपने श्री सदगुरुदेव महाराज जी पर ही मुझे भरोसा है। इसलिए यह एक रेत की ढेरी मैंने छोड़ दी है।इसको मैंने लात नहीं मारा! इसको मैंने प्रणाम किया। श्री गुरु महाराज जी से मैंने निर्भय होने का आशीर्वाद लिया इसीलिए मैं अब मौत से भी नहीं डर रहा हूंँ।

बच्चे का उत्तर सुनकर राजा अन्दर तक हिल गया। उसने सोचा,कि पता नहीं, बच्चे की बलि देने के पश्चात भी पुत्र की प्राप्ति होगी भी या नहीं होगी। इसलिए क्यों ना इस बच्चे को ही अपना पुत्र मान लिया जाये?

इतना समझदार और गुरु भक्त बच्चा है,ऐसा अच्छा बच्चा और कहांँ मिलेगा। काफी सोच-विचार के बाद राजा ने उस बच्चे को अपना पुत्र बना लिया और राजकुमार घोषित कर दिया।

राजा ने बच्चे से पूछा कि इतना बैराग्य और समझदारी तुम्हें कहांँ से प्राप्त हुई?
बच्चे ने कहा कि मेरे गुरु महाराज जी ने मुझे आत्मज्ञान दिया है जो मुझे काल से भी निर्भय बना दिया है।

राजा ने कहा मुझे भी ऐसा ज्ञान प्राप्त करना है और अब तुम राजा बनकर राज्य की सेवा करो! मैं श्री गुरु महाराज जी की सेवा करूंँगा! अपने जीवन का कल्याण करूंँगा। उधर बच्चे के माता-पिता परिवार गांँव वाले डर रहे थे कि ये बच्चा हम सबको बन्द करके, हमें सजा देगा।

लेकिन बच्चे ने कहा कि यह सब आप सबकी तथा गुरु महाराज जी की कृपा से आपने अगर मुझे नहीं बेचा नहीं होता? तो मैं राजा नहीं बन पाता।
बच्चे ने अपनी सकारात्मक सोच महाराजी के ज्ञान अभ्यास से जो निडरता मिली – उस विवेक के आधार पर सबको माफ भी कर दिया।
कहावत है –
कबीरदास जी कहते हैं कि-
जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥
यानि जो तुम्हारे लिए काँटा बोये (परेशानी या मुसीबत खड़ी करे), तुम उसके लिए भी फूल ही बोना (उसके आचरण के विरोध में भी अपने अच्छे स्वभाव को बनाये रखो), इससे तुमको तो फूल ही फूल मिलेंगे (तुम्हारा स्वभाव और मन-बुद्धि शीतल रहेगी) और उसको त्रिशूल/कांटे मिलेंगे (उसने जो नफरत रुपी बीज तुम्हारे लिए बोये हैं उसका फल उसको ही मिलेगा)!

हमें तो अपने गुरु महाराजी पर विश्वास होना चाहिय !
जाको राखे साँईयां, मार सके न कोई।
बाल ना बाँका करि सकें,जो जग बैरी होई।।
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प्रेम रावत – जो व्यक्ति शान्ति को अपने जीवन में साक्षात रूप में लाना चाहता है, उनका मैं मार्गदर्शन कर सकता हूँ

इस जीवन की पुस्तक में जो कुछ भी लिखा है-
अगर उसे पढ़ना है तो बड़े ध्यान से पढ़ना चाहिए।

क्योंकि
इसमें जो लिखा है-
वह दुःख के लिए नहीं, बल्कि सुख पाने के लिए लिखा है।

उस परम आनंद,
परम शांति के लिए लिखा है,
जो पहले से तुम्हारे अन्दर मौजूद है!
पर तुम उससे अनभिज्ञ हो।

अगर
इस पुस्तक को पढ़ना है तो –
“हृदय की भाषा” को सीखो।

जिस दिन तुमको
हृदय की भाषा समझ में आने लगेगी,
उस दिन
तुमको यह बात समझ आने लगेगी कि –
सचमुच में यह जीवन अत्यंत अनमोल है।

यदि तुम अपने हृदय की भाषा को नहीं समझ पा रहे हो
तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।
-प्रेम रावत
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चश्मा और एक गाँव वाला

चश्मा और एक गाँव वाला

एक ग्रामीण था। वह अनपढ़ था। वह पढ़ना-लिखना नहीं जानता था। उन्होंने अक्सर लोगों को किताबें या पेपर पढ़ने के लिए चश्मा पहना हुआ देखा था। उसने सोचा, अगर मेरे पास चश्मा हो, तो मैं भी इन लोगों की तरह पढ़ सकता हूँ। मुझे शहर जाना चाहिए और अपने लिए एक जोड़ी चश्मा खरीदना चाहिए।

इसलिए एक दिन वह एक शहर में गया। एक चश्मे की दुकान में पहुंचा। उसने दुकानदार से एक जोड़ी चश्मा दिखाने के लिए कहा। दुकानदार ने उन्हें कई जोड़े चश्मे और एक किताब दी।

ग्रामीण ने एक-एक कर सभी चश्मों को आजमाया। लेकिन वह कुछ पढ़ नहीं सका। उसने दुकानदार से कहा कि – ये सब चश्में तो बेकार हैं।

दुकानदार ने उसे ऊपर से नीचे तक घूरा। फिर उसने किताब की तरफ देखा। वह उल्टी थी! दुकानदार ने कहा, शायद आप नहीं जानते कि कैसे पढ़ना है।

ग्रामीण ने कहा, नहीं, मैं नहीं जानता। मैं चश्मा खरीदना चाहता हूं ताकि मैं दूसरों की तरह पढ़ सकूं। लेकिन ये सभी चश्में तो बकवास हैं।
दुकानदार ने हंसी आ गयी. उसने बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोकी. अब उसको अनपढ़ ग्राहक की असली समस्या समझ आ गई थी।

उसने गाँव वाले को समझाया, “मेरे प्यारे दोस्त, तुम बहुत अनजान हो। चश्मा पढ़ने या लिखने में मदद नहीं करते हैं। वे केवल आपको ठीक से देखने में मदद करते हैं। सबसे पहले, आपको पढ़ना और लिखना सीखना चाहिए।”

सीख: अज्ञानता अंधापन है। अज्ञानता का कोई चश्मा नहीं होता है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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लालच का फल

लालच का फल

किसी गांव में एक गड़रिया रहता था। वह लालची स्वभाव का था, हमेशा यही सोचा करता था कि किस प्रकार वह गांव में सबसे अमीर हो जाये। उसके पास कुछ बकरियां और उनके बच्चे थे। जो उसकी जीविका के साधन थे।

एक बार वह गांव से दूर जंगल के पास पहाड़ी पर अपनी बकरियों को चराने ले गया। अच्छी घास ढूँढने के चक्कर में आज वो एक नए रास्ते पर निकल पड़ा। अभी वह कुछ ही दूर आगे बढ़ा था कि तभी अचानक तेज बारिश होने लगी और तूफानी हवाएं चलने लगीं। तूफान से बचने के लिए गड़रिया कोई सुरक्षित स्थान ढूँढने लगा। उसे कुछ ऊँचाई पर एक गुफा दिखाई दी। गड़रिया बकरियों को वहीँ बाँध उस जगह का जायजा लेने पहुंचा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं। वहां बहुत सारी जंगली भेड़ें मौजूद थीं।

मोटी- तगड़ी भेड़ों को देखकर गड़रिये को लालच आ गया। उसने सोचा कि अगर ये भेड़ें मेरी हो जाएं तो मैं गांव में सबसे अमीर हो जाऊंगा। इतनी अच्छी और इतनी ज्यादा भेड़ें तो आस-पास के कई गाँवों में किसी के पास नहीं हैं।

उसने मन ही मन सोचा कि मौका अच्छा है मैं कुछ ही देर में इन्हें बहला-फुसलाकर अपना बना लूंगा। फिर इन्हें साथ लेकर गांव चला जाऊंगा।

यही सोचते हुए वह वापस नीचे उतरा। बारिश में भीगती अपनी दुबली-पतली कमजोर बकरियों को देखकर उसने सोचा कि अब जब मेरे पास इतनी सारी हट्टी-कट्टी भेडें हैं तो मुझे इन बकरियों की क्या ज़रुरत उसने फ़ौरन बकरियों को खोल दिया और बारिश में भीगने की परवाह किये बगैर कुछ रस्सियों की मदद से घास का एक बड़ा गट्ठर तैयार कर लिया।

गट्ठर लेकर वह एक बार फिर गुफा में पहुंचा और काफी देर तक उन भेड़ों को अपने हाथ से हरी-हरी घास खिलाता रहा। जब तूफान थम गया, तो वह बाहर निकला। उसने देखा कि उसकी सारी बकरियां उस स्थान से कहीं और जा चुकी थीं।

गड़ेरिये को इन बकरियों के जाने का कोई अफ़सोस नहीं था, बल्कि वह खुश था कि आज उसे मुफ्त में एक साथ इतनी अच्छी भेडें मिल गयी हैं। यही सोचते-सोचते वह वापस गुफा की ओर मुड़ा लेकिन ये क्या… बारिश थमते ही भेडें वहां से निकल कर दूसरी तरफ जान लगीं। वह तेजी से दौड़कर उनके पास पहुंचा और उन्हें अपने साथ ले जाने की कोशिश करने लगा। पर भेडें बहुत थीं, वह अकेला उन्हें नियंत्रित नहीं कर सकता था… कुछ ही देर में सारी भेडें उसकी आँखों से ओझल हो गयीं।

यह सब देख गड़रिये को गुस्सा आ गया। उसने चिल्लाकर बोला

तुम्हारे लिए मैंने अपनी बकरियों को बारिश में बाहर छोड़ दिया। इतनी मेहनत से घास काट कर खिलाई… और तुम सब मुझे छोड़ कर चली गयी… सचमुच कितनी स्वार्थी हो तुम सब।

गड़रिया बदहवास होकर वहीं बैठ गया। गुस्सा शांत होने पर उसे समझ आ गया कि दरअसल स्वार्थी वो भेडें नहीं बल्कि वो खुद है, जिसने भेड़ों की लालच में आकर अपनी बकरियां भी खो दीं।

💐💐शिक्षा💐💐

लोभ का फल नामक यह कहानी हमें सिखाती है कि जो व्यक्ति स्वार्थ और लोभ में फंसकर अपनों का साथ छोड़ता है, उसका कोई अपना नहीं बनता और अंत में उसे पछताना ही पड़ता है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

परीक्षा

परीक्षा

”पापा वैभव बहुत अच्छा है। मैं उससे ही शादी करूंगी,
वरना !! ‘
पापा ने बेटी के ये शब्द सुनकर एक घडी को तो सन्न रह गए।फिर सामान्य होते हुए बोले, ठीक है पर पहले मैं
तुम्हारे साथ मिलकर उसकी परीक्षा लेना चाहता हूँ।तभी होगा तुम्हारा विवाह वैभव से,
कहो मंज़ूर है ? ‘बेटी चहकते हुए बोली, -”हाँ मंज़ूर है मुझे
वैभव से अच्छा जीवन साथी कोई हो ही नहीं सकता।
वो हर परीक्षा में सफल होगा,आप नहीं जानते पापा वैभव को !’

अगले दिन कॉलेज में नेहा जब वैभव से मिली, तो उसका मुंह लटका हुआ था।वैभव मुस्कुराते हुए बोला
क्या बात है स्वीट हार्ट.. इतना उदास क्यों हो।
तुम मुस्कुरा दो वरना मैं अपनी जान दे दूंगा।
नेहा झुंझलाते हुए बोली -‘वैभव मजाक छोडो,पापा ने हमारे विवाह के लिए इंकार कर दिया है।
अब क्या होगा ? वैभव हवा में बात उडाता हुआ बोला होगा।क्या हम घर से भाग जायेंगे, और कोर्ट
मैरिज कर वापस आ जायेंगें।
नेहा उसे बीच में टोकते हुए बोली,
पर इस सबके लिए तो पैसों की जरूरत होगी।
क्या तुम मैनेज कर लोगे ?” ”
ओह बस यही दिक्कत है।मैं तुम्हारे लिए जान दे सकता हूँ, पर इस वक्त मेरे पास पैसे नहीं है।
हो सकता है घर से भागने के बाद हमें कही होटल में छिपकर रहना पड़े।
तुम ऐसा करो तुम्हारे पास और तुम्हारे घर में जो कुछ भी चाँदी -सोना-नकदी तुम्हारे हाथ लगे तुम ले आना।
वैसे मैं भी कोशिश करूंगा।
कल को तुम घर से कहकर आना कि तुम कॉलेज जा रही हो, और यहाँ से हम फुर्ररर हो जायेंगे,सपनों को सच करने के लिए !”
नेहा भोली बनते हुए बोली -”पर इससे तो मेरी व् मेरे परिवार कि बहुत बदनामी होगी ”
वैभव लापरवाही के साथ बोला, -”बदनामी वो तो होती रहती है। तुम इसकी परवाह मत करो..”
वैभव इससे आगे कुछ कहता
उससे पूर्व ही नेहा ने उसके गाल पर जोरदार तमाचा रसीद कर दिया।
नेहा भड़कते हुयी बोली, ‘हर बात पर जान देने को तैयार बदतमीज़ तुझे ये तक परवाह नहीं,जिससे तू प्यार करता है।उसकी और उसके परिवार की समाज में बदनामी हो।
प्रेम का दावा करता है,बदतमीज़ ये जान ले कि मैं वो अंधी प्रेमिका नहीं जो पिता की इज्ज़त की धज्जियाँ उड़ा कर ऐय्याशी करती फिरूं,कौन से सपने सच हो जायेंगे।
जब मेरे भाग जाने पर मेरे पिता जहर खाकर प्राण दे देंगें !
मैं अपने पिता की इज्ज़त नीलाम कर तेरे साथ भाग जाऊँगी, तो समाज में और ससुराल में मेरी बड़ी इज्ज़त होगी।
वे अपने सिर माथे पर बैठायेंगें,
और सपनों की दुनिया इस समाज से कहीं इतर होगी।
हमें रहना तो इसी समाज में हैं। घर से भागकर क्या आसमान में रहेंगे ? है कोई जवाब तेरे पास,पीछे से ताली की आवाज सुनकर वैभव ने मुड़कर देखा तो पहचान न पाया।

नेहा दौड़कर उनके पास चली गयी, और आंसू पोछते हुए बोली,
पापा आप ठीक कह रहे थे। ये प्रेम नहीं केवल जाल है जिसमे फंसकर मुझ जैसी हजारों लडकियां अपना जीवन बर्बाद कर डालती हैं !!’

💐💐शिक्षा💐💐

दोस्तों,जिस प्रकार नेहा के पापा ने उसे समझाया उसी प्रकार हर बेटी को भी नेहा की तरह समझदार होना होगा जिससे वैभव जैसे लड़कों से बचा जा सके।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

जितनी अधिक इच्छा, उतनी ही अधिक मन में अशान्ति….

जितनी अधिक इच्छा, उतनी ही अधिक मन में अशान्ति….

हमेशा याद रहे,
चाहे कितना भी धन इकट्ठा कमा करके रख लो, दरिद्रता नहीं मिटती और चाहे कितने ही बड़े पदों पर पहुंँच जाओ, हीन भाव नष्ट नहीं होता।
इसलिए कि दरिद्रता भीतर है और धन बाहर है। हीन भाव भीतर है और पद बाहर है। दोनों का कोई सम्बन्ध नहीं है।
इसलिए तो यह होता है कि एक पद मिले तो उससे बड़े पद की आकांँक्षा पैदा हो जाती है। वह पद मिल जायें तो और बड़े पद की आकांँक्षा पैदा हो जाती है।
यह ऊपर पहुंँच जाने की कोशिश इस बात का सबूत है कि मनुष्य को यह बोध है कि वह बहुत हीन है, उसे सिद्ध करना है कि वह शक्तिशाली है।

इतिहास गवाह है कि दुनिया में जिन लोगों में हीनता की भावना सर्वाधिक होती है, वे लोग मानवता को भी कुचलने में गुरेज नहीं करते। हिटलर, स्टालिन, मुसोलिनी जैसे लोग बहुत हीनता के भाव से पीड़ित थे। सिकन्दर या चंँगेज खांँ, तैमूरलंँग जैसे लोग बहुत हीनता के भाव से पीड़ित लोग थे। इन्हें तब तक चैन न था जब तक उन्होंने यह न दिखा दिया कि लाखों लोग हमारे कब्जे में हैं, उनकी गर्दन पर हमारे हाथ हैं। हम जब चाहें उनकी गर्दन मरोड़ दें।
जब तक उन्हें विश्वास न आ गया कि हम शक्तिशाली हैं तब तक वे भागते गये!
और यह विश्वास कभी नहीं आता आखिरी स्वांँस तक नहीं आता। चाहे सारी दुनिया पर कब्जा हो जाये लेकिन फिर भी ऐसे अभिमानी हीन-बुद्धि व्यक्ति के भीतर डर बना रहता है।
ऐसा व्यक्ति अभिमान से जितना शक्तिशाली होता है, उतनी ही निर्बलता उसको पकड़ने लगती है, उतनी ही उसे अपनी सुरक्षा की व्यवस्था करनी होती है।
लेकिन इतनी भारी भरकम सुरक्षा व्यवस्था होने के बावजूद भी ऐसा व्यक्ति मौत को नहीं जीत सकता क्योंकि ऐसा व्यक्ति प्राणों के भीतर की शक्ति के पूर्ण सत्य से दूर रहता है।
जीवन में समय के महापुरुष के द्वारा मिले ज्ञान के ध्यान -सुमिरण के अभ्यास के प्रति प्रतिबद्धता ही प्राणों के भीतर की शक्ति की पहचान करवाते हुए मृत्यु के पार ले जाती है और अहंँकार जड़ से नष्ट हो जाता है।
तभी व्यक्ति मानवता के प्रति सम्पूर्ण समर्पण करता है। अगर प्रत्येक व्यक्ति”नाम-सुमिरण”के अभ्यास से स्वयं को जानकर हृदय में शान्ति का अनुभव कर ले तो सम्पूर्ण विश्व में शान्ति सम्भव है।

  • श्री हंस जी महाराज
    🙏🙏🌸🌸🙏🙏

धैर्य

धैर्य

एक बार एक व्यक्ति अकेला उदास बैठा कुछ सोच रहा था कि उसके पास भगवान आये और भगवान को अपने समक्ष देख उस व्यक्ति ने पूछा, मुझे ज़िन्दगी में बहुत असफलताएं मिली! अब मैं निराश हो चूका हूँ! हे भगवन, मुझे बताओ कि मेरे इस जीवन की क्या कीमत है?

भगवान ने उस व्यक्ति को एक लाल रंग का चमकदार पत्थर दिया और कहा “जाओ इस पत्थर की कीमत का पता लगा लो! तुम्हे अपनी ज़िन्दगी की कीमत का भी पता चल जाएगा! लेकिन ध्यान रहे कि इस पत्थर को बेचना नहीं है!”

वो व्यक्ति उस लाल चमकदार पत्थर को लेकर सबसे पहले एक फल वाले के पास गया और कहा “भाई..ये पत्थर कितने का खरीदोगे?”

फल वाले ने पत्थर को ध्यान से देखा और कहा “मुझसे 10 संतरे ले जाओ और ये पत्थर मुझे दे दो!”

उस व्यक्ति ने कहा कि, नहीं, मैं ये पत्थर बेच नहीं सकता! फिर वो आदमी एक सब्ज़ी वाले के पास गया और उसे कहा, “भाई …ये लाल पत्थर कितने का खरीदोगे?”

सब्ज़ी वाले ने कहा कि मुझसे एक बोरी आलू की ले जाओ और ये पत्थर मुझे बेच दो! लेकिन भगवान् के कहे अनुसार उस व्यक्ति ने कहा कि नहीं, मैं ये बेच नहीं सकता!

फिर वो व्यक्ति उस पत्थर को लेकर एक सुनार की दूकान में गया जहाँ कई तरह-तरह के आभूषण पड़े हुए थे! उस व्यक्ति ने सुनार को वो पत्थर दिखाया और उस सुनार ने बड़े गौर से उस पत्थर को देखा और फिर कहा, “मैं तुम्हे 1 करोड़ रुपये दूंगा, ये पत्थर मुझे बेच दो!” फिर उस व्यक्ति ने सुनार से माफ़ी मांगी और कहा कि ये पत्थर मैं बेच नहीं सकता। सुनार ने फिर कहा “अच्छा चलो ठीक है! मैं तुम्हे 2 करोड़ दूंगा! ये पत्थर मुझे बेच दो!”

सुनार की बात सुनकर वो व्यक्ति चौंक गया लेकिन सुनार को मना कर वो आगे बढ़ गया और एक हीरे बेचने वाले की दूकान में गया!

हीरे के व्यापारी ने उस लाल चमकदार पत्थर को पूरे 10 मिनट तक देखा और फिर एक मलमल का कपडा लिया और उस पत्थर को उस पे रख दिया। फिर उस व्यापारी ने अपना सर उस पत्थर पर लगा कर माथा टेका और कहा “तुम्हे ये कहा मिला! ये इस दुनिया में सबसे अनमोल रत्न है! अगर इस दुनिया की पूरी दौलत भी लगा दी जाए तो इस पत्थर को नहीं खरीद सकता!”

ये सुन वो व्यक्ति बहुत हैरान हुआ और सीधा भगवान के पास गया और उन्हें आप बीती बताई और फिर उसने भगवान से पूछा, “हे भगवन अब मुझे बताईये कि मेरे इस जीवन की क्या कीमत है?”

भगवान ने कहा “फल वाले ने, सब्ज़ी वाले ने, सुनार ने और हीरे के व्यापारी ने तुम्हें जीवन की कीमत बता दी थी! हे मनुष्य, किसी के लिए तुम एक पत्थर के टुकड़े सामान हो और किसी के लिए बहुमूल्य रत्न समान।

हर किसी ने अपनी जानकारी के अनुसार तुम्हें उस पत्थर की कीमत बताई लेकिन उस हीरे के व्यापारी ने इस पत्थर को पहचान लिया। ठीक उसी तरह कुछ लोग तुम्हारी कीमत नहीं पहचानते! इसलिए ज़िन्दगी में कभी निराश मत हो!

इस दुनिया में हर मनुष्य के पास कोई ना कोई ऐसा हुनर होता है जो सही वक़्त पर निखार कर आता है लेकिन उसके लिए परिश्रम और धैर्य की ज़रूरत है!
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कर्मों का खेल

कंस को मारने के बाद भगवान श्रीकृष्ण कारागृह में गए और वहां से माता देवकी तथा पिता वसुदेव को छुड़ाया।

तब माता देवकी ने श्रीकृष्ण से पूछा, “बेटा, तुम तो भगवान हो, तुम्हारे पास असीम शक्ति है, फिर तुमने चौदह साल तक कंस को मारने और हमें यहां से छुड़ाने की प्रतीक्षा क्यों की?”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “क्षमा करें आदरणीय माता जी, क्या आपने मुझे पिछले जन्म में चौदह साल के लिए वनवास में नहीं भेजा था।”

माता देवकी आश्चर्यचकित हो गईं और फिर पूछा, “बेटा कृष्ण, यह कैसे संभव है? तुम ऐसा क्यों कह रहे हो ?”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “माता, आपको अपने पूर्व जन्म के बारे में कुछ भी स्मरण नहीं है। परंतु तब आप कैकेई थीं और आपके पति राजा दशरथ थे।”

माता देवकी ने और ज्यादा आश्चर्यचकित होकर पूछा, “फिर महारानी कौशल्या कौन हैं ?”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “वही तो इस जन्म में माता यशोदा हैं। चौदह साल तक जिनको पिछले जीवन में मां के जिस प्यार से वंचित रहना पड़ा था, वह उन्हें इस जन्म में मिला है।”अर्थात्, प्रत्येक प्राणी को इस भू मृत्युलोक में अपने कर्मों का भोग भोगना ही पड़ता है । यहां तक कि देवी-देवता भी इससे अछूते नहीं हैं।

इसलिय शास्त्रों में कहा है कि –
शुभाशुभफलं प्रेत्य लभते भूतसाक्षिकम्।
अतिरिच्येत यो यत्र तत्कर्ता लभते फलम्।।
मनुष्य के अच्छे और बुरे कर्म के साक्षी पंचमहाभूत होते हैं इन कर्मों का फल मृत्यु के बाद मिलता है अच्छे और बुरे कर्मों में जैसे कर्म अधिक होते हैं उनका फल पहले मिलता है।
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एक कौवा और गरुड़

एक कौवा और गरुड़

एक बार एक कौआ मांस के एक टुकड़े को पकड़कर कहीं एकांत में बैठने और उसे खाने के लिए उड़ रहा था। ईगल्स का एक झुंड उसका पीछा कर रहा था। कौवा चिन्तित था और ऊँची और ऊँची उड़ान भर रहा था, फिर भी चील गरीब कौवे के पीछे थी।

तभी “गरुड़” ने कौवे की आंखों में दुर्दशा और पीड़ा देखी। कौवे के करीब आकर उसने पूछा: “क्या दिक्कत है? आप बहुत परेशान और तनाव में हैं?”

कौवा रोया – “इन बाजों को देखो! वे मुझे मारने के लिए मेरे पीछे हैं!”

गरुड़ ज्ञान का पक्षी होने के कारण बोला “अरे मेरे मित्र, वे तुम्हें मारने के लिए तुम्हारे पीछे नहीं हैं! वे मांस के उस टुकड़े के पीछे हैं – जिसे आप अपनी चोंच में पकड़े हुए हैं!
बस इसे गिराएं और देखें कि क्या होगा।

कौवे ने गरुड़ के निर्देशों का पालन किया और मांस का टुकड़ा गिरा दिया! और तुम जहाँ जाना चाहते हो – वहाँ जाओ! सभी चील उसका पीछा छोड़ – गिरते हुए मांस की ओर उड़ गए।

गरुड़ ने मुस्कुराते हुए कहा *”दर्द केवल तब तक है- जब तक आप इसे पकड़ते हैं!
उपाय एक ही है कि उसे छोड़ दीजिये!”

कौवा झुककर बोला, “मैंने मांस का यह टुकड़ा गिरा दिया तो अब, मैं और भी ऊंची उड़ान भर सकता हूँ!

इस कहानी से हमारे लिए भी एक संदेश भी है:

  1. लोग “अहंकार” नामक विशाल बोझ को ढोते हैं, जो हमारे बारे में एक झूठी पहचान बनाता है! हम अपने लिए यह कहते हुए पैदा करते हैं कि “मुझे प्यार की ज़रूरत है, मुझे आमंत्रित करने की आवश्यकता है, मैं ऐसा हूं और इसलिए ..” आदि-आदि!
    इस अहंकार से बचने का उपाय – बस गिरा दो!
  2. लोग “अन्य कार्यों” से तेजी से चिढ़ जाते हैं, यह मेरा दोस्त, मेरे माता-पिता, मेरे बच्चे, मेरा सहयोगी, मेरा जीवन साथी हो सकता है … और मुझे “क्रोध”आता है – उस क्रोध से बचने का उपाय – बस गिरा दो!
  3. लोग खुद की तुलना दूसरों से करते हैं .. सुंदरता, धन, जीवन शैली, अंक, प्रतिभा और मूल्यांकन में और परेशान महसूस करते हैं … हमें जो कुछ भी है उसके प्रति आभारी होना चाहिए! तुलना, नकारात्मक भावनाएं घर कर जाती हैं – उनसे बचने का उपाय – बस गिरा दो!

मनुष्य के बार-बार जन्म-मरण का क्या कारण है?

मनुष्य के बार-बार जन्म-मरण का क्या कारण है?

एक बार द्वारकानाथ श्रीकृष्ण अपने महल में दातुन कर रहे थे। रुक्मिणी जी स्वयं अपने हाथों में जल लिए उनकी सेवा में खड़ी थीं। अचानक द्वारकानाथ हंसने लगे। रुक्मिणी जी ने सोचा कि शायद मेरी सेवा में कोई गलती हो गई है; इसलिए द्वारकानाथ हंस रहे हैं।

रुक्मिणी जी ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, ‘प्रभु! आप दातुन करते हुए अचानक इस तरह हंस क्यों पड़े, क्या मुझसे कोई गलती हो गई? कृपया, आप मुझे अपने हंसने का कारण बताएं।’

श्रीकृष्ण बोले, ‘नहीं, प्रिये! आपसे सेवा में त्रुटि होना कैसे संभव है? आप ऐसा न सोचें, बात कुछ और है।’

रुक्मिणी जी ने कहा, ‘आप अपने हंसने का रहस्य मुझे बता दें तो मेरे मन को शान्ति मिल जाएगी; अन्यथा मेरे मन में बेचैनी बनी रहेगी।’

तब श्रीकृष्ण ने मुसकराते हुए रुक्मिणी जी से कहा, ‘देखो, वह सामने एक चींटा चींटी के पीछे कितनी तेजी से दौड़ा चला जा रहा है। वह अपनी पूरी ताकत लगा कर चींटी का पींछा कर उसे पा लेना चाहता है। उसे देख कर मुझे अपनी मायाशक्ति की प्रबलता का विचार करके हंसी आ रही है।’”

रुक्मिणी जी ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, ‘वह कैसे प्रभु? इस चींटी के पीछे चींटे के दौड़ने पर आपको अपनी मायाशक्ति की प्रबलता कैसे दीख गई?’

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, ‘मैं इस चींटे को चौदह बार इंद्र बना चुका हूँ। चौदह बार देवराज के पद का भोग करने पर भी इसकी भोगलिप्सा समाप्त नहीं हुई है। यह देख कर मुझे हंसी आ गई।’

इंद्र की पदवी भी भोग योनि है। मनुष्य अपने उत्कृष्ट कर्मों से इंद्रत्व को प्राप्त कर सकता है। सौ अश्वमेध यज्ञ करने वाला व्यक्ति इंद्र-पद प्राप्त कर लेता है। लेकिन जब उनके भोग पूरे हो जाते हैं तो उसे पुन: पृथ्वी पर आकर जन्म ग्रहण करना पड़ता है।

प्रत्येक जीव इंद्रियों का स्वामी है; परंतु जब जीव इंद्रियों का दास बन जाता है तो जीवन कलुषित हो जाता है और बार-बार जन्म-मरण के बंधन में पड़ता है। वासना ही पुनर्जन्म का कारण है। जिस मनुष्य की जहां वासना होती है, उसी के अनुरूप ही अंतसमय में चिंतन होता है और उस चिंतन के अनुसार ही मनुष्य की गति, ऊंच-नीच योनियों में जन्म होता है। अत: वासना को ही नष्ट करना चाहिए। वासना पर विजय पाना ही सुखी होने का उपाय है।

बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ,
विषय भोग बहु घी ते ।

अग्नि में घी डालते जाइये, वह और भी धधकेगी, यही दशा काम की है। उसे बुझाना हो तो संयम रूपी शीतल जल डालना होगा।

संसार का मोह छोड़ना बहुत कठिन है। वासनाएं बढ़ती हैं तो भोग बढ़ते हैं, इससे संसार कटु हो जाता है। वासनाएं जब तक क्षीण न हों तब तक मुक्ति नहीं मिलती है। पूर्वजन्म का शरीर तो चला गया परन्तु पूर्वजन्म का मन नहीं गया।

नास्ति तृष्णासमं दु:खं नास्ति त्यागसमं सुखम्।
सर्वांन् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ।।

तृष्णा के समान कोई दु:ख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है। समस्त कामनाओं मान, बड़ाई, स्वाद, शौकीनी, सुख-भोग, आलस्य आदि का परित्याग करके केवल भगवान की शरण लेने से ही मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है। अपने अन्दर के अविनाशी से उसका सम्बन्ध जुड़ जाता है!

इसलिय भक्त ह्रदय से हमेशा उनके दर्शनों की आस बनी रहनी चाहिय –
नहीं है भोग की वांछा, न दिल में लालसा धन की ।
प्यास दरसन की भारी है, सफल कर आस को मेरी ।।
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