जागने की संभावना

जागने की संभावना
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एक विश्रामालय में दो व्यक्ति आराम-कुर्सियों पर बैठे हुए थे। एक युवा था और एक वृद्ध था।
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जो वृद्ध था वह आंखें बंद किये बैठा था, पर बीच-बीच में मुस्करा उठता था।
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और कभी-कभी हाथ से और चेहरे से ऐसे इशारे करता था, जैसे कुछ दूर हटा रहा हो।
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युवक से बिना पूछे न रहा गया। वृद्ध ने एक बार आंखें खोली, तो उसने पूछ ही लिया…
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‘इस अत्यंत कुरूप विश्रामगृह में ऐसा क्या है, जो आप में मुस्कराहट ला देता है?’
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वृद्ध बोला, ‘मैं अपने से कुछ कहानियां कह रहा हूं, उनमें ही हंसी आ जाती है।’
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उस युवक ने पूछा, ‘और बार-बार हाथ से हटाते क्या हैं?’
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वृद्ध हंसने लगा और बोला, ‘उन कहानियों को जिन्हें बहुत बार सुन चुका हूं।’
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युवक ने कहा, ‘आप भी क्या कहानियों से मन समझा रहे हैं।’
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उत्तर में वृद्ध ने कहा था, ‘बेटे, एक दिन समझोगे कि पूरा ही जीवन कहानियों से अपने को समझा लेने का नाम है।’
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निश्चित ही जीवन जैसा मिलता है, वह कहानी ही है। और कहानियों से अपने को समझा लेने का ही नाम जीवन है।
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जिसे हम जीवन समझते हैं, वह जीवन नहीं, केवल एक सपना है। नींद टूटने पर ज्ञात होता है कि हाथ में कुछ भी नहीं है- जो था, वह था नहीं, बस, केवल दिखता था।
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पर, इस स्वप्न-जीवन से सत्य-जीवन में जागा जा सकता है। निद्रा छोड़ी जा सकती है।
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जो सो रहा है, वह जाग भी सकता है। उसके सो सकने की संभावना ही, उसके जागने की भी संभावना है!
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निष्काम कर्म

निष्काम कर्म

एक गरीब विधवा के पुत्र ने एक बार अपने राजा को देखा। राजा को देख कर उसने अपनी माँ से पूछा- “माँ! क्या कभी मैं राजा से बात कर पाऊँगा?”

माँ हंसी और चुप रह गई।

पर वह लड़का तो मन ही मन निश्चय कर चुका था।
उन्हीं दिनों गाँव में एक संत आए हुए थे।
तो युवक ने उनके चरणों में अपनी इच्छा रखी।

संत ने कहा- “बेटा, अमुक स्थान पर राजा का महल बन रहा है, तुम वहाँ चले जाओ और मजदूरी करो। पर ध्यान रखना, वेतन न लेना अर्थात् बदले में कुछ माँगना मत। निष्काम रहना।”

वह लड़का गया। वह मेहनत दोगुनी करता पर वेतन न लेता।

एक दिन राजा निरीक्षण करने आया। उसने लड़के की लगन देखी। प्रबंधक से पूछा- “यह लड़का कौन है, जो इतनी तन्मयता से काम में लगा है? इसे आज अधिक मजदूरी देना।”

प्रबंधक ने राजा को लडके के बारे में पूरी जानकारी देते हुये बतलाया कि – “महाराज! इसका अजीब हाल है, दो महीने से इसी उत्साह से काम कर रहा है।
पर हैरानी यह है कि यह मजदूरी नहीं लेता। कहता है – मेरे घर का काम है। घर के काम की क्या मजदूरी लेनी?”

राजा ने उसे बुला कर कहा- “बेटा! तू मजदूरी क्यों नहीं लेता? बता तू क्या चाहता है?”

लड़का राजा के पैरों में गिर पड़ा और बोला- “महाराज! आपके दर्शन हो गए! आपकी कृपा दृष्टि मिल गई, मुझे मेरी मजदूरी मिल गई। अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए।”

राजा उसे मंत्री बना कर अपने साथ ले गया और कुछ समय बाद अपनी इकलौती पुत्री का विवाह भी उसके साथ कर दिया। राजा का कोई पुत्र था नहीं, तो कालांतर में उसे ही राज्य भी सौंप दिया।

इस कथानक से हमें भी यह सन्देश मिलता है कि –
भगवान ही राजा हैं।
हम सभी भगवान के मजदूर हैं।
भगवान का भजन करना ही मजदूरी करना है।
संत ही मंत्री है।
भक्ति ही राजपुत्री है।
मोक्ष ही वह राज्य है।*
हम भगवान के भजन के बदले में कुछ भी न माँगें
तो वे भगवान स्वयं दर्शन देकर पहले संत बना देते हैं
और अपनी भक्ति प्रदान कर, कालांतर में मोक्ष ही दे देते हैं।

वह लड़का
अगर सकाम कर्म करता
तो मजदूरी ही पाता!
निष्काम कर्म किया
तो राजा बन बैठा।
यही सकाम और निष्काम कर्म के फल में भेद है।
इसलिय भक्त होने के नाते हमें निष्काम भाव से ही सेवा करनी चाहिय
क्योंकि उनके दरवार में दिमांड और कमांड का भाव रखने वालों को कुछ भी नहीं मिलता!
तुलसी विलम्ब न कीजिए, निश्चित भजिए राम।
जगत मजूरी देत है, क्यों राखे भगवान॥
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वैरागी कौन ??

वैरागी कौन ??

एक साधु को एक नाविक रोज इस पार से उस पार ले जाता था, बदले मैं कुछ नहीं लेता था, वैसे भी साधु के पास पैसा कहां होता था।

नाविक सरल था, पढा लिखा तो नहीं, पर समझ की कमी नहीं थी। साधु रास्ते में ज्ञान की बात कहते, कभी भगवान की सर्वव्यापकता बताते और कभी अर्थसहित श्रीमदभगवद्गीता के श्लोक सुनाते।

नाविक मछुआरा बङे ध्यान से सुनता, और बाबा की बात ह्रदय में बैठा लेता।

एक दिन उस पार उतरने पर साधु नाविक को कुटिया में ले गये और बोले, वत्स, मैं पहले व्यापारी था, धन तो कमाया था पर अपने परिवार को आपदा से नहीं बचा पाया था। अब ये धन मेरे किसी का काम का नहीं। तुम ले लो, तुम्हारा जीवन संवर जायेगा, तेरे परिवार का भी भला हो जाएगा।

नाविक बोला, नहीं बाबाजी, मैं ये धन नही ले सकता, मुफ्त का धन घर में जाते ही आचरण बिगाड़ देगा, कोई मेहनत नहीं करेगा, आलसी जीवन लोभ लालच और पाप बढायेगा।

आप ही ने मुझे ईश्वर के बारे में बताया! मुझे तो आजकल लहरों में भी कई बार वो नजर आता है। जब मै उसकी नजर में ही हूँ तो फिर अविश्वास क्यों करूं? मैं अपना काम करूं और शेष उसी पर छोङ दूं।

प्रसंग तो समाप्त हो गया, पर एक सवाल छोड़ गया, इन दोनों पात्रों में साधु कौन था ?

एक वो था; जिसने दुःख आया, तो भगवा पहना, संन्यास लिया, धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया, याद किया और समझाने लायक स्थिति में भी आ गया लेकिन फिर भी धन की ममता नहीं छोङ पाया और सुपात्र की तलाश करता रहा।

और दूसरी तरफ वो निर्धन नाविक, सुबह खा लिया, तो शाम का पता नहीं, फिर भी पराये धन के प्रति कोई ललक नहीं! संसार में लिप्त रहकर भी निर्लिप्त रहना आ गया! भगवा नहीं पहना, सन्यास नहीं लिया, पर उस का ईश्वरीय सत्ता में विश्वास जम गया!

उसने श्रीमदभगवद्गीता के श्लोक को ना केवल समझा बल्कि उन्हें व्यवहारिक जीवन में कैसे उतारना है ये सीख गया, और पल भर में धन के मोह को ठुकरा गया।

आप भी विचार कीजिए कि वास्तव में वैरागी कौन? और स्वयं के जीवन का अवलोकन कीजिए कि हमारे अन्दर उस अविनाशी के प्रति कितना प्रगाढ़ विश्वास है!

अकर्मण्य बनकर नहीं कर्म करके उसके परिणाम को उस अन्दर के साक्षी के समक्ष अपने को समर्पित करने का भाव ही वैराग्य की उच्चतम अवस्था है! जहां आनंद, शान्ति, करुणा, दयाभाव के अलावा कुछ भी नहीं है!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

बहुत ही अच्छी कहानी है कृपया जरूर पढ़ें

एक जौहरी के निधन के बाद उसका
परिवार संकट में पड़ गया।
,
खाने के भी लाले पड़ गए।
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एक दिन उसकी पत्नी ने अपने बेटे
को नीलम का एक हार
देकर कहा- ‘बेटा, इसे अपने चाचा की
दुकान पर ले जाओ।
,
कहना इसे बेचकर कुछ रुपये दे दें।
,
बेटा वह हार लेकर चाचा जी के पास गया।
,
चाचा ने हार को अच्छी तरह से देख
परखकर कहा- बेटा,
मां से कहना कि अभी बाजार
बहुत मंदा है।
,
थोड़ा रुककर बेचना,
अच्छे दाम मिलेंगे।
,
उसे थोड़े से रुपये देकर कहा कि
तुम कल से दुकान पर आकर बैठना।
,
अगले दिन से वह लड़का रोज दुकान
पर जाने लगा और वहां हीरों
रत्नो की परख का काम सीखने लगा।
,
एक दिन वह बड़ा पारखी बन गया।
लोग दूर-दूर से अपने हीरे की परख कराने
आने लगे।
,
एक दिन उसके चाचा ने कहा, बेटा अपनी
मां से वह हार लेकर आना और कहना
कि अब बाजार बहुत तेज है,
,
उसके अच्छे दाम मिल जाएंगे।
,
मां से हार लेकर उसने परखा तो
पाया कि वह तो नकली है।
,
वह उसे घर पर ही छोड़ कर
दुकान लौट आया।
,
चाचा ने पूछा, हार नहीं लाए?
,
उसने कहा, वह तो नकली था।
,
तब चाचा ने कहा- जब तुम पहली बार
हार लेकर आये थे, तब मैं उसे
नकली बता देता तो तुम सोचते कि
आज हम पर बुरा वक्त आया तो चाचा
हमारी चीज को भी नकली
बताने लगे।
,
आज जब तुम्हें खुद ज्ञान हो गया तो
पता चल गया कि हार सचमुच नकली है।
,
सच यह है कि ज्ञान के बिना इस संसार में
हम जो भी सोचते, देखते और जानते हैं,
सब गलत है।
,
और ऐसे ही गलतफहमी का शिकार
होकर रिश्ते बिगडते है।
Think and Live Long Relationship
ज़रा सी रंजिश पर ,ना छोड़
किसी अपने का दामन.
,
ज़िंदगी बीत जाती है
अपनो को अपना बनाने में..! 👍

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

घमंड नही करने का ज्ञान

घमंड नही करने का ज्ञान

बात उस समय की है, जब स्वामी विवेकानंद अपने लोकप्रिय शिकागो धर्म सम्मेलन के भाषण के बाद भारत वापस आ गये थे। अब उनकी चर्चा विश्व के हर देश में हो रही थी। सब लोग उन्हें जानने लगे थे।

स्वामी जी भारत वापस आकर अपने स्वभाव अनुरूप भ्रमण कर रहे थे। इस समय वे हिमालय और इसके आसपास के क्षेत्रों में थे। एक दिन वो घूमते घूमते एक नदी के किनारे आ गये।  वहां उन्होंने देखा कि एक नाव है पर वह किनारा छोड़ चुकी है। तब वे नाव के वापस आने के इंतजार में वहीं किनारे पर बैठ गए।

एक साधु वहां से गुजर रहा था। साधु ने स्वामी जी को वहां अकेला बैठा देखा तो वह स्वामी जी के पास गया और उनसे पूछा, तुम यहां क्यों बैठे हुए हो?
स्वामी जी ने जवाब दिया, मैं यहां नाव का इंतजार कर रहा हूं।
साधु ने फिर पूछा, तुम्हारा नाम क्या है?
स्वामी जी ने कहा, मैं विवेकानंद हूं।

साधु ने स्वामी जी का मजाक उड़ाते हुए उनसे कहा, अच्छा! तो तुम वो विख्यात विवेकानंद हो जिसको लगता है कि विदेश में जा कर भाषण दे देने से तुम बहुत बड़े महात्मा साधु बन सकते हो।
स्वामी जी ने साधु को कोई जवाब नहीं दिया।
फिर साधु ने बहुत ही घमंड के साथ, नदी के पानी के ऊपर चल कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया।
कुछ दूर तक चलने के बाद साधु ने स्वामी जी कहा, क्या तुम मेरी तरह पानी पर पैदल चल कर इस नदी को पार कर सकते हो?
स्वामी जी ने बहुत ही आदर और विनम्रता के साथ साधु से कहा, इस बात में कोई शक नहीं कि आपके पास बहुत ही अद्भुत शक्ति है। लेकिन क्या आप मुझे यह बता सकते हो, कि आपको यह असाधारण शक्ति प्राप्त करने में कितना समय लगा। बहुत ही अभिमान के साथ साधु ने जवाब दिया, यह बहुत ही कठिन कार्य था। मैंने बीस सालों की कठिन तपस्या  और साधना के बाद यह महान शक्ति प्राप्त की है।
साधु का यह बताने का अंदाज बहुत ही अहंकार भरा था।
यह देख कर स्वामी जी बहुत ही शांत स्वर में बोले, आपने अपनी जिन्दगी के बीस साल ऐसी विद्या को सीखने में बर्बाद कर दिए, जो काम एक नाव पांच मिनिट में कर सकती है। आप ये बीस साल निर्धन बेसहारा गरीबों की सेवा में लगा सकते थे। या अपने ज्ञान और शक्ति का प्रयोग देश और देशवासियों की प्रगति में लगा सकते थे। परंतु आपने अपने बीस साल सिर्फ पांच मिनट बचाने के लिए व्यर्थ कर दिए, ये कोई बुद्धिमानी नहीं है।
साधु सिर झुकाए खड़े रह गये और स्वामी जी नाव में बैठ कर नदी के दूसरी किनारे चले गए।

💐💐शिक्षा💐💐

इस कहानी ने हमें बताया कि ज्ञान और शक्ति का सही प्रयोग आवश्यक है। किसी शक्ति को प्राप्त कर के यदि हम उस पर घमंड करते है तो यह मूर्खता है। शक्ति का सही जगह पर सही इस्तेमाल करना ही वास्तविकता में बुद्धिमानी है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

आत्मसुधार

आत्मसुधार
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
एक बार एक व्यक्ति दुर्गम पहाड़ पर चढ़ा, वहाँ पर उसे एक महिला दिखीं, वह व्यक्ति बहुत अचंभित हुआ, उसने जिज्ञासा व्यक्त की कि वे इस निर्जन स्थान पर क्या कर रही हैं।

उन महिला का उत्तर था मुझे अत्यधिक काम हैं!

इस पर वह व्यक्ति बोला आपको किस प्रकार का काम है, क्योंकि मुझे तो यहाँ आपके आस-पास कोई दिखाई नहीं दे रहा।

महिला का उत्तर था मुझे दो बाज़ों को और दो चीलों को प्रशिक्षण देना है, दो खरगोशों को आश्वासन देना है, एक गधे को आलस्य-प्रमाद से बाहर निकालना है, एक सर्प को अनुशासित करना है और एक सिंह को वश में करना है।

व्यक्ति बोला पर वे सब हैं कहाँ, मुझे तो इनमें से कोई नहीं दिख रहा!

महिला ने कहा ये सब मेरे ही भीतर हैं।
दो बाज़ जो हर उस चीज पर गौर करते हैं, जो भी मुझे मिलीं अच्छी या बुरी। मुझे उन पर काम करना होगा, ताकि वे सिर्फ अच्छा ही देखें, ये हैं मेरी आँखें।

दो चील जो अपने पंजों से सिर्फ चोट और क्षति पहुंचाते हैं, उन्हें प्रशिक्षित करना होगा, चोट न पहुंचाने के लिए, वे हैं मेरे हाँथ।

खरगोश यहाँ वहाँ भटकते फिरते हैं, पर कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं करना चाहते। मुझे उनको सिखाना होगा पीड़ा सहने पर या ठोकर खाने पर भी शान्त रहना,वे हैं मेरे पैर।

गधा हमेशा थका रहता है, यह जिद्दी है। मै जब भी चलती हूँ, यह बोझ उठाना नहीं चाहता, इसे आलस्य प्रमाद से बाहर निकालना है, यह है मेरा शरीर।

सबसे कठिन है साँप को अनुशासित करना। जबकि यह 32 सलाखों वाले एक पिंजरे में बन्द है, फिर भी यह निकट आने वालों को हमेशा डसने, काटने, और उनपर अपना ज़हर उडेलने को आतुर रहता है, मुझे इसे भी अनुशासित करना है – यह है मेरी जीभ!

मेरा पास एक शेर भी है, आह! यह तो निरर्थक ही घमंड करता है। वह सोचता है कि वह तो एक राजा है। मुझे उसको वश में करना है, यह है मेरा मैं।

तो देखा आपने मुझे कितना अधिक काम है!

सोंचिये और विचरिये हम सब में काफी समानता है! अपने उपर बहुत कार्य करना है, तो छोडिए दूसरों को परखना, निंदा करना, टीका टिप्पणी करना और उस पर आधारित नकारत्मक धारणायें बनाना। चलें पहले अपने उपर काम करें..!!
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
🙏🏽🙏🏾🙏 सुप्रभात🙏🏼🙏🏻🙏🏿

अपनी कीमत जानिए

अपनी कीमत जानिए …

एक बूढ़े बाप ने अपने बेटे को बुलाकर एक पुरानी घड़ी थमाई और कहा कि बेटा यह घड़ी तुम्हारे परदादा की है..

इस घड़ी की उमर दो सौ साल होगी! ये घड़ी अब तुम्हें सौंपना चाहता हूं लेकिन इस से पहले तुम्हें मेरा एक काम करना होगा…

इसे लेकर घड़ी वाले की दुकान पर जाओ और उससे पूछो कि इसे कितनी क़ीमत में खरीदेगा?

वह लड़का जब वापस लौटा तो उसने बताया कि *घड़ी की ह़ालत देखते हुए दुकानदार इसकी क़ीमत 500/-Rs से ज़्यादा देने को तैयार नहीं है!

बाप ने कहा – अब इसे ले जाकर वहां क़ीमत लगवाओ जहां एंटिक चीज़ें ख़रीदी जाती हैं!

लड़का फिर वापस आया और बोला कि एंटिक वाले इस घड़ी की क़ीमत 5000/- Rs लगा रहे हैं!

अब तीसरी बार बाप ने फिर कहा कि – इस घड़ी को म्यूजियम वालों के पास ले जाओ और उनसे क़ीमत लगवाओ!

बेटे ने वहां से वापस आकर कहा कि म्यूजियम वाले तो इसकी क़ीमत 50000/- Rs तक देने को राज़ी हैं!

यह सुनकर बूढ़े बाप ने बेटे से कहा कि बेटा, घड़ी की क़ीमत लगाकर मैं तुम्हें समझाना चाहता था! अपने आपको उस जगह बिल्कुल बर्बाद मत करो जहां तुम्हारी कोई इज़्ज़त और सम्मान ना हो!

तुम्हारी अहमियत का अंदाज़ा वहीं लगाया जायेगा जिन्हें परखने की तमीज़ होगी!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है!

बस इसी सोच के साथ अपना व अपने परिवार के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुये सदा हंसते – मुस्कुराते रहें और सदा चलते रहें जोश, जुनून और जज्बे के साथ!

🌸 सुप्रभात 🌸

प्रेम के बोल

प्रेम के बोल

सरकारी कार्यालय में लंबी लाइन लगी हुई थी । खिड़की पर जो क्लर्क बैठा हुआ था, वह तल्ख़ मिजाज़ का था और सभी से तेज स्वर में बात कर रहा था ।

उस समय एक महिला को डांटते हुए वह कह रहा था, “आपको पता नहीं चलता, यह फॉर्म भर कर लायीं हैं, कुछ भी सही नहीं । सरकार ने फॉर्म फ्री कर रखा है तो कुछ भी भर दो, जेब का पैसा लगता तो दस लोगों से पूछ कर भरतीं आप ।”

एक व्यक्ति पंक्ति में पीछे खड़ा काफी देर से यह देख रहा था, वह पंक्ति से बाहर निकल कर, पीछे के रास्ते से उस क्लर्क के पास जाकर खड़ा हो गया और वहीँ रखे मटके से पानी का एक गिलास भरकर उस क्लर्क की तरफ बढ़ा दिया ।

क्लर्क ने उस व्यक्ति की तरफ आँखें तरेर कर देखा और गर्दन उचका कर कहा ‘क्या है?’

उस व्यक्ति ने कहा, “सर, काफी देर से आप बोल रहे हैं, गला सूख गया होगा, कृपया पानी पी लीजिये ।”

क्लर्क ने पानी का गिलास हाथ में ले लिया और उसकी तरफ ऐसे देखा जैसे किसी दूसरे ग्रह के प्राणी को देख लिया हो!

क्लर्क ने कहा, “जानते हो, मैं कडुवा सच बोलता हूँ, इसलिए सब नाराज़ रहते हैं और चपरासी तक मुझे पानी नहीं पिलाता!”

वह व्यक्ति मुस्कुरा दिया और फिर पंक्ति में अपने स्थान पर जाकर खड़ा हो गया ।

अब उस क्लर्क का मिजाज थोड़ा नर्म हो चुका था, काफी शांत मन से उसने सभी से बात की और सबको अच्छे से सेवाए देनी शुरू की ।

शाम को उस व्यक्ति के पास एक फ़ोन आया, दूसरी तरफ वही क्लर्क था, उसने कहा, “भाईसाहब, आपका नंबर आपके फॉर्म से लिया था, शुक्रिया अदा करने के लिये फ़ोन किया है ।

मेरी माँ और पत्नी में बिल्कुल नहीं बनती, आज भी जब मैं घर पहुंचा तो दोनों बहस कर रहीं थी, लेकिन आपका गुरुमन्त्र काम आ गया ।”

वह व्यक्ति चौंका, और कहा, “जी? गुरुमंत्र?”

“जी हाँ, मैंने एक गिलास पानी अपनी माँ को दिया और दूसरा अपनी पत्नी को और यह कहा कि गला सूख रहा होगा पानी पी लो । बस तब से हम तीनों प्यार से बातें कर रहे हैं । अब भाईसाहब, आज खाने पर आप हमारे घर आ जाइये ।”

“जी! लेकिन , खाने पर क्यों?”

क्लर्क ने पुरे हक़ से कहा,”गुरू माना है तो इतनी दक्षिणा तो बनेगी ना आपकी , और ये भी जानना चाहता हूँ, कि एक गिलास पानी में इतना जादू है तो खाने में कितना होगा?”
फोन पर बात करते हुए दोनों हंस पड़े।

सार :-

दूसरो के क्रोध को प्यार से ही दूर किया जा सकता है । कभी कभी हमारे एक छोटे से प्यार भरे बर्ताव से दूसरे इंसान में बहुत बड़ा परिवर्तन हो जाता है और प्यार भरे रिश्तो की एकाएक शुरूआत होने लगती है जिससे घर और कार्यस्थल पर मन को सुकुन मिलता है..!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

मानो ही नहीं जानो भी

मानो ही नहीं जानो भी

सुदामा ने एक बार श्रीकृष्ण से पूछा, “कान्हा, मैं आपकी माया के दर्शन करना चाहता हूँ, कैसी होती है?”
श्रीकृष्ण ने टालना चाहा, लेकिन सुदामा की जिद पर श्रीकृष्ण ने कहा, “अच्छा, कभी वक्त आएगा तो बताऊंगा।”

एक दिन कृष्ण ने कहा– सुदामा ! आओ, गोमती में स्नान करने चलें। दोनों गोमती के तट पर गए। वस्त्र उतारे। दोनों नदी में उतरे। श्रीकृष्ण स्नान करके तट पर लौट आए। पीतांबर पहनने लगे।

सुदामा ने देखा कि कृष्ण तो तट पर चले गये है, मैं एक डुबकी और लगा लेता हूँ और जैसे ही सुदामा ने डुबकी लगाई सुदामा को लगा, गोमती में बाढ़ आ गई है, वह बहे जा रहे हैं। सुदामा जैसे-तैसे तक घाट के किनारे रुके। घाट पर चढ़े। घूमने लगे। घूमते-घूमते गांव के पास आए और वहाँ एक हथिनी ने उनके गले में फूल माला पहना दी। सुदामा हैरान…!

लोग इकट्ठे हो गए। लोगों ने कहा, “हमारे देश के राजा की मृत्यु हो गई है। हमारा नियम है, राजा की मृत्यु के बाद हथिनी, जिस भी व्यक्ति के गले में माला पहना दे, वही हमारा राजा होता है। हथिनी ने आपके गले में माला पहनाई है, इसलिए अब आप हमारे राजा हैं।”

सुदामा हैरान हुए कि क्या मैं राजा बन गया?
उनका एक राजकन्या के साथ उनका विवाह भी हो गया। दो पुत्र भी पैदा हो गए।

एक दिन सुदामा की पत्नी बीमार पड़ गई और आखिर में मर भी गई। सुदामा दुख से रोने लगे! उसकी पत्नी जो मर गई थी, जिन्हें वह बहुत चाहते थे! वह सुंदर थी, सुशील थी।

लोग इकट्ठे हो गए!उन्होंने सुदामा को कहा, आप रोएं नहीं, आप हमारे राजा हैं। लेकिन रानी जहाँ गई है, वहीं आपको भी जाना है, यह मायापुरी का नियम है। आपकी पत्नी को चिता में अग्नि दी जाएगी। आपको भी अपनी पत्नी की चिता में प्रवेश करना होगा। आपको भी अपनी पत्नी के साथ जाना होगा।

यह सुनकर तो सुदामा की सांस रुक गई; हाथ-पांव फूल गए और बडबडाने लगे कि अब मुझे भी मरना होगा! मेरी पत्नी की मौत हुई है, मेरी तो नहीं! भला मैं क्यों मरूँ? यह कैसा नियम है ?’

सुदामा अपनी पत्नी की मृत्यु के दुःख को भूल गये। उसका रोना भी बंद हो गया। अब वह स्वयं की चिंता में डूब गये और लोगों से कहने लगे कि ‘भई, मैं तो मायापुरी का वासी नहीं हूँ। मुझ पर आपकी नगरी का कानून लागू नहीं होता, मुझे क्यों जलना होगा ?

लोग नहीं माने और बोले कि ‘अपनी पत्नी के साथ आपको भी चिता में जलना होगा, मरना होगा, यह यहाँ का नियम है।’

आखिरकार सुदामा ने कहा, ‘अच्छा भई, चिता में जलने से पहले मुझे स्नान तो कर लेने दो!’

पहले तो लोग माने नहीं। फिर बात मान उन्होंने हथियारबंद लोगों की ड्यूटी लगा दी कि सुदामा को स्नान करने दो, देखना कहीं भाग न जाए।

रह-रह कर सुदामा रो उठते। सुदामा इतना डर गये कि उनके हाथ-पैर कांपने लगे, वह नदी में उतरे, डुबकी लगाई!
और फिर जैसे ही बाहर निकले उन्होंने देखा कि मायानगरी कहीं भी नहीं- किनारे पर तो कृष्ण अभी अपना पीतांबर ही पहन रहे थे और वह एक दुनिया घूम आये हैं। मौत के मुँह से बचकर निकले हैं।

सुदामा नदी से बाहर आये और सुदामा रोए जा रहे थे। श्रीकृष्ण हैरान हुए, सबकुछ जानते थे फिर भी अनजान बनते हुए पूछा, “सुदामा तुम रो क्यों रो रहे हो?”

सुदामा ने पूछा, “कृष्ण मैंने जो देखा है, वह सच था या यह जो मैं देख रहा हूँ?”

श्रीकृष्ण मुस्कराए और कहा, “जो देखा, भोगा वह सच नहीं था- भ्रम था, स्वप्न था, माया थी मेरी!
और जो तुम अब मुझे देख रहे हो यही सच है। मैं ही सच हूँ।

मेरे से भिन्न, जो भी है- वह मेरी माया ही है!
और जो मुझे ही सर्वत्र देखता है, महसूस करता है, उसे मेरी माया स्पर्श नहीं करती।
माया स्वयं का विस्मरण है; माया अज्ञान है, माया परमात्मा से भिन्न, माया नर्तकी है – वह नाचती है और नचाती भी है।”

जो प्रभु से जुड़ा है- वह नाचता नहीं, भ्रमित नहीं होता। माया से निर्लेप रहता है। वह जान जाता है!

जैसे सुदामा भी जान गये थे कि वह श्रीकृष्ण से अलग कैसे रह सकता है।

वैसे ही एक सच्चे गुरु भक्त को भी मानना ही नहीं, जानना भी है – अपने सदगुरु के साकार और निराकार स्वरूप को!
माया नगरी में ना फंसकर अविनाशी के साथ अपना सम्बन्ध बनाना है जो – जिन्दगी के साथ भी है और जिन्दगी के बाद भी रहेगा!
🙏🙏🌸🌸🙏🙏

मैले कपड़े

मैले कपड़े

एक दिन की बात है। एक मास्टर जी अपने एक अनुयायी के साथ प्रातः काल सैर कर रहे थे कि अचानक ही एक व्यक्ति उनके पास आया और उन्हें भला-बुरा कहने लगा। उसने पहले मास्टर के लिए बहुत से अपशब्द कहे, पर बावजूद इसके मास्टर मुस्कुराते हुए चलते रहे। मास्टर को ऐसा करता देख वह व्यक्ति और भी क्रोधित हो गया और उनके पूर्वजों तक को अपमानित करने लगा। पर इसके बावजूद मास्टर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ते रहे। मास्टर पर अपनी बातों का कोई असर ना होते हुए देख अंततः वह व्यक्ति निराश हो गया और उनके रास्ते से हट गया।

उस व्यक्ति के जाते ही अनुयायी ने आश्चर्य से पुछा, “मास्टर जी आपने भला उस दुष्ट की बातों का जवाब क्यों नहीं दिया और तो और आप मुस्कुराते रहे, क्या आपको उसकी बातों से कोई कष्ट नहीं पहुंचा ?”

मास्टर जी कुछ नहीं बोले और उसे अपने पीछे आने का इशारा किया।

कुछ देर चलने के बाद वे मास्टर जी के कक्ष तक पहुँच गए। मास्टर जी बोले, “तुम यहीं रुको मैं अंदर से अभी आया।”

मास्टर जी कुछ देर बाद एक मैले कपड़े को लेकर बाहर आये और उसे अनुयायी को थमाते हुए बोले, “लो अपने कपड़े उतारकर इन्हें धारण कर लो ?”

कपड़ों से अजीब सी दुर्गन्ध आ रही थी और अनुयायी ने उन्हें हाथ में लेते ही दूर फेंक दिया।

मास्टर जी बोले, “क्या हुआ तुम इन मैले कपड़ों को नहीं ग्रहण कर सकते ना ? ठीक इसी तरह मैं भी उस व्यक्ति द्वारा फेंके हुए अपशब्दों को नहीं ग्रहण कर सकता।

💐💐शिक्षा:-💐💐

इतना याद रखो कि यदि तुम किसी के बिना मतलब भला-बुरा कहने पर स्वयं भी क्रोधित हो जाते हो तो इसका अर्थ है कि तुम अपने साफ़-सुथरे वस्त्रों की जगह उसके फेंके फटे-पुराने मैले कपड़ों को धारण कर रहे हो।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।