एक अदृश्य स्टिकर

एक अदृश्य स्टिकर

आगे वाली कार कछुए की तरह चल रही थी और बार-बार हॉर्न देने पर भी रास्ता नहीं दे रही थी…

मैं अपना आपा खो कर चिल्लाने ही वाला था कि मैंने कार के पीछे लगा एक छोटा सा स्टिकर देखा जिस पर लिखा था _”शारीरिक विकलांग ; कृपया धैर्य रखें” !

और यह पढ़ते ही जैसे सब-कुछ बदल गया…

मैं तुरंत ही शांत हो गया और कार को धीमा कर लिया …यहाँ तक की मैं उस कार और उसके ड्राईवर का विशेष खयाल रखते हुए चलने लगा कि कहीं उसे कोई तक़लीफ न हो मैं ऑफिस कुछ मिनट देर से ज़रुर पहुँचा मगर मन में एक संतोष था।

इस घटना ने दिमाग को हिला दिया … क्या मुझे हर बार शांत रहने और धैर्य रखने के लिए किसी स्टिकर की ही ज़रुरत पड़ेगी ?

हमें लोगों के साथ धैर्यपूर्वक व्यवहार करने के लिए हर बार किसी स्टिकर की ज़रुरत क्यों पड़ती है ?

क्या हम लोगों से धैर्यपूर्वक अच्छा व्यवहार सिर्फ तब ही करेंगे जब वे अपने माथे पर कुछ ऐसे स्टिकर्स चिपकाए घूम रहे होंगे कि…….

“मेरी नौकरी छूट गई है”,
“मैं कैंसर से संघर्ष कर रहा हूँ”,
“मेरी शादी टूट गई है”,
“मैं भावनात्मक रुप से टूट गया हूँ”,
“मेरे प्यारे दोस्त की अचानक ही मौत हो गई”,

“लगता है इस दुनिया को मेरी ज़रुरत ही नहीं”,
“मुझे व्यापार में बहुत घाटा हो गया है”……आदि !

दोस्तों , हर इंसान अपनी ज़िंदगी में कोई न कोई ऐसी जंग लड़ रहा है जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते . बस हम यही कर सकते हैं कि लोगों से धैर्य और प्रेम से बात करें .

शिक्षा:- हमे इन सभी अदृश्य स्टिकर्स को भी सम्मान देना चाहिए

जय श्रीराम

शुभरात्री

!! पैरों के निशान !!

!! पैरों के निशान !!

जन्म से ठीक पहले एक बालक भगवान से कहता है, ”प्रभु आप मुझे नया जन्म मत दीजिये! मुझे पता है पृथ्वी पर बहुत बुरे लोग रहते हैं! मैं वहाँ नहीं जाना चाहता!” और ऐसा कह कर वह उदास होकर बैठ जाता है।

भगवान् स्नेह पूर्वक उसके सर पर हाथ फेरते हैं और सृष्टि के नियमानुसार उसे जन्म लेने की महत्ता समझाते हैं! बालक कुछ देर हठ करता है पर भगवान् के बहुत मनाने पर वह नया जन्म लेने को तैयार हो जाता है।

“ठीक है प्रभु, अगर आपकी यही इच्छा है कि मैं मृत लोक में जाऊं तो वही सही , पर जाने से पहले आपको मुझे एक वचन देना होगा।” बालक भगवान् से कहता है।

भगवान् बोले – पुत्र तुम क्या चाहते हो?

बालक ने कहा : आप वचन दीजिये कि जब तक मैं पृथ्वी पर हूँ तब तक हर एक क्षण आप भी मेरे साथ होंगे।
भगवान् ने कहा, अवश्य ऐसा ही होगा।

बालक ने फिर संशय वयक्त किया कि प्रभु, पर पृथ्वी पर तो आप अदृश्य हो जाते हैं! भला मैं कैसे जानूंगा कि आप मेरे साथ हैं कि नहीं?

भगवान् बोले : जब भी तुम आँखें बंद करोगे तो तुम्हें दो जोड़ी पैरों के चिन्ह दिखाइये देंगे, उन्हें देखकर समझ जाना कि मैं तुम्हारे साथ हूँ।

फिर कुछ ही क्षणो में बालक का जन्म हो जाता है।

जन्म के बाद वह संसारिक बातों में पड़कर भगवान् से हुए वार्तालाप को भूल जाता है! जीवन के अन्तकाल में मरते समय उसे इस बात की याद आती है तो वह भगवान के वचन की पुष्टि करना चाहता है।

वह आखें बंद कर अपना जीवन याद करने लगता है। वह देखता है कि उसे जन्म के समय से ही दो जोड़ी पैरों के निशान दिख रहे हैं| परंतु जिस समय वह अपने सबसे बुरे वक़्त से गुजर रहा था उस समय केवल एक जोड़ी पैरों के निशान ही दिखाइये दे रहे थे!

यह देख वह बहुत दुखी हो जाता है कि भगवान ने अपना वचन नही निभाया और उसे तब अकेला छोड़ दिया जब उनकी सबसे अधिक ज़रुरत थी।

मरने के बाद वह भगवान् के समक्ष पहुंचा और रूठते हुए बोला, ”प्रभु ! आपने तो कहा था कि आप हर समय मेरे साथ रहेंगे, पर मुसीबत के समय मुझे दो की जगह एक जोड़ी ही पैर दिखाई दिए – बताइये आपने उस समय मेरा साथ क्यों छोड़ दिया?”

भगवान् मुस्कुराये और बोले, पुत्र ! जब तुम घोर विपत्ति से गुजर रहे थे तब मेरा ह्रदय द्रवित हो उठा और मैंने तुम्हे अपनी गोद में उठा लिया, इसलिए उस समय तुम्हे सिर्फ मेरे पैरों के चिन्ह दिखायी पड़ रहे थे।

बार हमारे जीवन में जब बुरा वक़्त आता है तो लगता है कि हमारे साथ बहुत बुरा होने वाला है और जब बाद में हम पीछे मुड़ कर देखते हैं तो पाते हैं कि हमने जितना सोचा था उतना बुरा नहीं हुआ, क्योंकि शायद यही वो समय होता है जब ईश्वर हम पर सबसे ज्यादा कृपा करता है।

अपनी अल्पज्ञता के कारण हम सोचते हैं कि भगवान् भी हमारा हमसे मुंह मोड़कर हमारा साथ नहीं दे रहे हैं लेकिन हकीकत में वो हमें अपनी गोद में उठाये होता है।

जब ज्ञान के द्वारा हमें पता चलता है कि वह परम शक्ति तो हर पल हमारे साथ ही है – बस थोडा सा बाहर की आँखों को बंद करके अन्दर की ओर से झांकने की जरूरत है!
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हर परीक्षा पास करने की कुन्जी- अटूट विश्वास!

हर परीक्षा पास करने की कुन्जी- अटूट विश्वास!

एक बार श्री कृष्ण जी के गुरु अपने शिष्यों के साथ कही जा रहे थे।

रास्ते में किसी जंगल में रूककर उन्होंने आराम किया। उसी के पास ही द्वारका नगरी थी।

गुरुदेव ने अपने शिष्यों को भेजा कि श्री कृष्ण को बुला कर लाओ। तब उनके शिष्य द्वारका गये और द्वारकाधीश को उनके गुरुदेव का सन्देश दिया।

सन्देश सुनते ही श्री कृष्ण जी दौड़े-दौड़े अपने गुरुदेव के पास गए और उन्हें दण्डवत प्रणाम किया साथ ही उनसे द्वारका चलने के लिए विनती की लेकिन गुरुदेव ने चलने के लिए मना कर दिया और फरमाया कि हम फिर कभी आपके पास आयेंगे।

श्री कृष्ण जी ने पुन: गुरुदेव से विनती की! तब गुरुदेव ने फरमाया कि ठीक है कृष्ण हम तुम्हारे साथ चलेंगे!

लेकिन हमारी एक शर्त है कि हम जिस रथ पर जायेंगे, उसे घोड़े नहीं खीचेंगें एक तरफ से तुम और एक तरफ से तुम्हारी पटरानी रुकमणि खीचेंगी।

श्री कृष्ण उसी समय दौड़ते हुए रुकमणि के पास गए और उन्हें बताया कि मुझे तुम्हारी सेवा की जरुरत है।

तब रुकमणि को उन्होंने सारी बात बताई तब वह दोनों अपने गुरुदेव के पास आये और उन्हें रथ पर बैठने के लिए विनती की।

जब उनके गुरुदेव रथ पर बैठे तो उन्होंने अपने शिष्यों को भी रथ पर बैठने के लिए कहा!

लेकिन श्री कृष्ण जी ने परवाह ना की क्योंकि वे जानते थे कि गुरुदेव उनकी परीक्षा ले रहे है।

रुकमणि और श्री कृष्ण जी ने रथ को खींचना आरम्भ किया और उस रथ को खींचते-खींचते द्वारका ले पहुँचे।

जब गुरुदेव द्वारका पहुँचे तो श्री कृष्ण जी ने उन्हें राज सिंघासन पर बिठाया। उनका आदर सत्कार किया फिर श्री कृष्ण जी ने अपने गुरुदेव के लिए 56 तरह के व्यंजन भी बनवाये!

लेकिन जैसे ही वह व्यंजन गुरुदेव के पास पहुँचे उन्होंने सारे व्यंजनों का तिरस्कार कर दिया।

श्री कृष्ण जी ने पुन: अपने गुरुदेव से पूछा कि गुरुदेव आप क्या लेंगे?

तब गुरुदेव ने खीर बनवाने के लिए कहा। श्री कृष्ण जी ने आज्ञा मानकर खीर बनवाई।
खीर बनकर आई वो खीर से भरा पतीला गुरुदेव के पास पहुँचा उन्होंने खीर का भोग लगाया और थोड़ी-सी खीर का भोग लगा कर उन्होंने श्री कृष्ण जी को खाने के लिए कहा‌।

उस पतीले में से श्री कृष्ण जी ने थोड़ी सी खीर को खाया।
तब उनके गुरुदेव ने श्री कृष्ण को बाकी खीर अपने शरीर पर लगाने की आज्ञा दी। श्री कृष्ण जी ने आज्ञा पाकर खीर को अपने शरीर पर लगाना शुरू कर दिया।

उन्होंने पूरे शरीर पर खीर लगा ली। लेकिन जब पैर पर लगाने की बारी आई तो श्री कृष्ण जी ने अपने गुरुदेव को अपने पैरों पर खीर लगाने के लिए मना कर दिया।

श्री कृष्ण जी ने कहा ‘हे गुरुदेव यह खीर आपका भोग-प्रसाद है, मैं इस भोग को अपने पैरों पर नहीं लगाऊंगा।’

उनके गुरुदेव श्री कृष्ण जी से बहुत खुश हुए।

उन्होंने फरमाया ‘हे कृष्ण मैं तुमसे बहुत खुश हूँ तुम हर परीक्षा में सफल रहे, मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि पूरे शरीर में तुमने जहाँ-जहाँ खीर लगाईं है वह अंग आपका वज्र के समान हो गया है! और इतिहास साक्षी है कि महाभारत के युद्ध में श्री कृष्ण जी का कोई भी अस्त्र-शास्त्र बाल भी बाँका नहीं कर पाया।

जो शिष्य अपने गुरुदेव की आज्ञा में तत्पर रहता है उन भक्तों को ही गुरुदेव का सच्चा प्यार और आशीर्वाद नसीब होता है!

अपने गुरु महाराज जी की सेवा में किन्तु, परन्तु, अगर, मगर लगाने की आवश्यकता ही नहीं हैं! यह बात हमारे ऋषि मुनियों ने अनेकानेक प्रसंगों के माध्यम से समझायी है! कहा है –
राम कृष्ण ते को बड़ों, तिनहूँ भी गुरु कीन!
तीन लोक के नायका, गुरु आगे आधीन!!
हम अपनी मन बुद्धि लगाकर अपने जीवन के आनंद के पलों को गवां देते हैं! थोड़ी सी परेशानी में हमारा विश्वास दम तोड़ देता है!

भगवान के परम भक्त प्रह्लाद को उसके पिता दुष्ट हिरण्यकश्यप ने बड़ा कष्ट दिया और प्रहलाद को मारने तक का प्रयास किया लेकिन वह प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं कर पाया!

क्योंकि कहते हैं कि –
जाको राखे साइयां मार सके कोय!
बाल बांका कर सके जो जग बैरी होय!!
प्रहलाद को अपने भगवान् पर अटूट विश्वास था कि जिसकी भगवान रक्षा करते हैं, उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।

हमको भी शिष्य के नाते खुद अपने आप से पूछना चाहिय कि क्या हमारा विस्वास भी अपने मालिक के प्रति भक्त प्रह्लाद की तरह अटूट बना रह सकता है?
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गुरु नानक देव जी और गरीब की रोटी

गुरु नानक देव जी और गरीब की रोटी

गुरु नानक देव जी के समय एक प्रतिष्ठित व धनी व्यक्ति रहता था जिसका नाम मलिक भागो था| एक दिन उसने अपने पिता का श्राद्ध किया| दूर-दूर से संत महात्मा बुलाए गए और भोजन खिलाया गया, ताकि उसे धर्म लाभ मिल सके।

उन दिनों गुरु नानक देव जी भी उस स्थान पर आए हुए थे| गुरु नानक देव जी एक बढ़ई (लालो) की विनती करने पर वहां आए थे और उन्हीं के घर का खाना खाते थे।

किसी व्यक्ति ने मलिक भागों से शिकायत की कि यहां एक महात्मा आए हुए हैं परंतु वह एक बढ़ई के घर का खाना खाते हैं।

जब मलिक भागों को इस बात का पता चला कि लालो के घर एक महात्मा ठहरे हुए हैं तो उसमें अपने आदमी भेज कर गुरु नानक और उनके साथियों को भोजन पर आमंत्रित किया| परंतु गुरु साहिब ने उनके निमंत्रण को ठुकरा दिया।

मलिक भागो ने सोचा कि जब तक सभी महात्मा उसके घर का भोजन नहीं खा लेंगे तब तक उसका भोज अधूरा रहेगा| आखिर में गुरु नानक देव जी मलिक भागों के घर आ गए और लालो भी उनके पीछे-पीछे वहां आ गया|

मलिक भागो ने गुरु साहिब से पूछा:-” आप ब्रह्म भोज में क्यों नहीं आए थे महाराज?”

गुरु साहिब ने कहा:-” ला मालिक! अब खिला दे।

जब गुरु साहिब ने पीछे पलट कर देखा कि लालो बढ़ई खड़ा है, तो गुरु साहिब ने उससे कहा:-“लालो! तू भी अपनी रोटी ले आ|”

लालो दौड़कर गया और कुछ रोटी तथा बिना नमक का साग ले आया| उधर मलिक भागों के आदमी पूरी कचोरी और अन्य पकवान ले आए।

गुरु साहिब ने अपने दाहिने हाथ में रोटी और उसके ऊपर साग रखा हुआ था तथा बाएं हाथ में पूरी कचोरी पकड़ी हुई थी| उन्होंने सबके सामने उनको निचोड़ा तो लालो की रोटी से दूध निकला और मलिक भागों की पूरी कचोरी से खून।

गुरु साहिब ने कहा:- ” देखो मलिक! मैंने तेरा भोज क्यों नहीं खाया था| यह ब्रह्मभोज नहीं बल्कि लोगों का खून है| ब्रह्मभोज तो हमेशा लालो के घर का ही होता है।

शिक्षा:-मित्रों” सही रास्ते से कमाए हुए धन से ही बरकत होती है| नेक कमाई के बिना परमार्थ में सफलता नहीं मिलती।

जय श्रीराम

शुभरात्री

आत्मसुधार

आत्मसुधार

एक बार एक व्यक्ति दुर्गम पहाड़ पर चढ़ा! वहाँ पर उसे एक महिला दिखीं! वह व्यक्ति बहुत अचंभित हुआ! उसने जिज्ञासा व्यक्त की कि “वे इस निर्जन स्थान पर क्या कर रही हैं?

उन महिला का उत्तर था – “मुझे अत्यधिक काम हैं! इस पर वह व्यक्ति बोला, “आपको किस प्रकार का काम है क्योंकि मुझे तो यहाँ आपके आस-पास कोई दिखाई नहीं दे रहा!

महिला का उत्तर था – “मुझे दो बाज़ों को और दो चीलों को प्रशिक्षण देना है! दो खरगोशों को आश्वासन देना है! एक गधे को आलस्य-प्रमाद से बाहर निकालना है! एक सर्प को अनुशासित करना है और एक सिंह को वश में करना है।

वह व्यक्ति बोला, “वे सब हैं कहाँ? मुझे तो इनमें से कोई नहीं दिख रहा!

महिला ने कहा, “ये सब मेरे ही भीतर हैं।”

वह दो बाज़ जो हर उस चीज पर गौर करते हैं, जो भी मुझे मिलीं – अच्छी या बुरी। मुझे उन पर काम करना होगा, ताकि वे सिर्फ अच्छा ही देखें और ये दो बाज हैं है – मेरी दोनों आँखें।

दो चील जो अपने पंजों से सिर्फ चोट और क्षति पहुंचाते हैं – उन्हें प्रशिक्षित करना होगा; चोट न पहुंचाने के लिए – वे हैं मेरे हाथ।

खरगोश यहाँ-वहाँ भटकते फिरते हैं पर कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं करना चाहते। मुझे उनको सिखाना होगा पीड़ा सहने पर या ठोकर खाने पर भी शान्त रहना – वे हैं मेरे पैर।

गधा हमेशा थका रहता है, यह जिद्दी है। मैं जब भी चलती हूँ, यह बोझ उठाना नहीं चाहता! इसे आलस्य प्रमाद से बाहर निकालना है – यह है मेरा शरीर।

सबसे कठिन है साँप को अनुशासित करना। जबकि यह 32 सलाखों वाले एक पिंजरे में बन्द है, फिर भी यह निकट आने वालों को हमेशा डसने, काटने, और उनपर अपना ज़हर उडेलने को आतुर रहता है! मुझे इसे भी अनुशासित करना है – यह है मेरी जीभ।

मेरा पास एक शेर भी है, आह! यह तो निरर्थक ही घमंड करता है। वह सोचता है कि वह तो एक राजा है। मुझे उसको वश में करना है- यह है मेरा मैं (अहं)।

इस प्रकार उस महिला ने कहा कि देखा आपने, मुझे कितने अधिक काम हैं?

सोचिये और विचारिये हम सब में काफी समानता है! आपने भी मेरी तरह ही अपने उपर बहुत कार्य करना है! तो छोडिए दूसरों को परखना, निंदा करना, टीका टिप्पणी करना और उस पर आधारित नकारात्मक धारणायें बनाना। चलें, पहले अपने उपर काम करें।

इस प्रसंग वास्तव में विचार करने योग्य है ताकि हमारा अपना सुधार हो सके! अधिकांशतः हम दूसरों के दोष देखने में अपना कीमती समय बिताया करते हैं!
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उस व्यक्ति की शक्ति का कोई मुकाबला नहीं। जिसके पास शक्ति के साथ सहनशक्ति भी हो।

You can’t hug yourself, you can’t cry on your own shoulder, life is all about living for one another, so live with those who Love you most.
🙏 सुप्रभात 🙏

सबसे बड़ी समस्या – हमारी सोच

सबसे बड़ी समस्या – हमारी सोच

बहुत समय पहले की बात है! एक महाज्ञानी पंडित हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहते थे। लोगों के बीच रह कर वह थक चुके थे और अब ईश्वर भक्ति करते हुए एक सादा जीवन व्यतीत करना चाहते थे लेकिन उनकी प्रसिद्धि इतनी थी कि लोग दुर्गम पहाड़ियों, सकरे रास्तों, नदी-झरनो को पार कर के भी उससे मिलना चाहते थे!
उनका मानना था कि यह विद्वान उनकी हर समस्या का समाधान कर सकता है।

इस बार भी कुछ लोग ढूंढते हुए उसकी कुटिया तक आ पहुंचे! पंडित जी ने उन्हें इंतज़ार करने के लिए कहा! इस प्रकार तीन दिन बीत गए और भी कई लोग वहां पहुँच गए! जब लोगों के लिए जगह कम पड़ने लगी तब पंडित जी बोले, ”आज मैं आप सभी के प्रश्नो का उत्तर दूंगा!
लेकिन आप सबको वचन देना होगा कि यहाँ से जाने के बाद आप किसी और से इस स्थान के बारे में नहीं बताएँगे ताकि आज के बाद मैं एकांत में रह कर अपनी साधना कर सकूँ!
अगर आप लोगों को मंजूर हो तो अपनी-अपनी समस्याएं बताइये!

यह सुनते ही एक व्यक्ति ने अपनी परेशानियां बतानी शुरू की! लेकिन वह अभी कुछ शब्द ही बोल पाया था कि बीच में किसी और ने अपनी बात कहनी शुरू कर दी!

सभी जानते थे कि आज के बाद उन्हें कभी पंडित जी से बात करने का मौका नहीं मिलेगा; इसलिए वे सब जल्दी से जल्दी अपनी बात रखना चाहते थे!
कुछ ही देर में वहां का दृश्य मछली-बाज़ार जैसा हो गया और अंततः पंडित जी को चीख कर बोलना पड़ा, ”कृपया शांत हो जाइये और आप लोग अपनी -अपनी समस्या एक पर्चे पर लिखकर मुझे दीजिये!“

सभी ने अपनी-अपनी समस्याएं लिखकर आगे बढ़ा दी! पंडित जी ने सारे पर्चे लिए और उन्हें एक टोकरी में डाल कर मिला दिया और बोले, ”इस टोकरी को एक-दूसरे को पास कीजिये और इसमें से हर व्यक्ति एक पर्ची उठाएगा और उसे पढ़ेगा! उसके बाद उसे निर्णय लेना होगा कि *क्या वो अपनी समस्या को इस समस्या से बदलना चाहता है?”

हर व्यक्ति एक पर्चा उठाता, उसे पढता और सहम सा जाता! एक -एक कर के सभी ने पर्चियां देख ली पर कोई भी अपनी समस्या के बदले किसी और की समस्या लेने को तैयार नहीं हुआ!

सबका यही सोचना था कि उनकी अपनी समस्या चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो बाकी लोगों की समस्या जितनी गंभीर नहीं है!

दो घंटे बाद सभी अपनी-अपनी पर्ची हाथ में लिए लौटने लगे! वे खुश थे कि उनकी समस्या उतनी बड़ी भी नहीं है जितना कि वे सोचते थे!

यह हकीकत है कि ऐसा कौन होगा जिसकी जिंदगी में एक भी समस्या न हो?
हम सभी के जीवन में समस्याएं हैं लेकिन हमें भी लगता है कि सबसे बड़ी समस्या हमारी ही है पर यकीन जानिए इस दुनिया में लोगों के पास इतनी बड़ी-बड़ी समस्यायें हैं कि हमारी तो उनके सामने कुछ भी नहीं!

इसलिए, समय के सदगुरु भी यही समझाते हैं कि अगर सुख के समय में दुःख की तयारी कर लोगे तो दुःख का कोई असर नहीं होगा और जो भी अवसर मिला है – उसके लिए आभारी रहना चाहिय और हरहाल में खुशहाल जीवन जीने का प्रयास करना चाहिय! क्योंकि सुख और दुख से परे है असली आनंद – जिसे जीते-जी प्राप्त किया जा सकता है!

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कष्ट और धैर्य

कष्ट और धैर्य

एक बार की बात है! एक गुरू अपने कुछ शिष्यों के साथ पैदल ही यात्रा पर थे। वे चलते-चलते किसी गांव में पहुंच गए। ये गांव काफी बड़ा था, वहां घूमते हुए उन्हें काफी देर हो गयी थी। गुरू जी थक चुके थे और उन्हें बहुत प्यास लगी, तो उन्होनें अपने एक शिष्य से कहा कि हम इसी गांव में कुछ देर रूकते हैं! तुम मेरे लिए पानी ले आओ। जब शिष्य गांव के अंदर थोड़ा घुमा तो उसने देखा कि वहां एक नदी थी, जिसमें कई लोग कपड़े धो रहे थे, तो कई लोग नहा रहे थे और इसी वजह से नदी का पानी बहुत ही गंदा सा दिख रहा था।

शिष्य को लगा कि ऐसा गंदा पानी गुरू जी के स्वास्थ्य को खराब कर सकता है, उन्हें ये पानी नहीं पिलाया जा सकता। इसलिए शिष्य बिना पानी लिए ही वापस लौट आया और नदी के गंदे पानी की सारी बात गुरू जी को बता दी।

इसके बाद गुरू जी ने किसी दूसरे शिष्य को पानी लाने के लिए भेजा। तो वह कुछ देर बाद वह शिष्य पानी साथ लेकर लौटा।

गुरू जी ने इस दूसरे शिष्य से पूछा कि नदी का पानी तो गंदा था फिर तुम ये पानी कहाँ से लाए?

शिष्य बोला कि गुरू जी, नदी का पानी वास्तव में बहुत ही गंदा था। लेकिन लोगों के नदी से चले जाने के बाद मैंने कुछ देर इंतजार किया और कुछ देर बाद नदी में मिट्टी नीचे बैठ गई और साफ पानी ऊपर आ गया। उसके बाद मैं उसी नदी से आपके लिए पानी भरकर ले आया।

गुरू जी उस शिष्य बात सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और बाकी शिष्यों को भी सीख दी कि हमारा जीवन भी इसी नदी के पानी की तरह है। जीवन में कई बार दुख और समस्याएं आती है तो जीवन रूपी पानी गंदा लगने लगता है लेकिन थोड़े इंतजार और सब्र के बाद ये सतही दुख और समस्याएं नीचे दब जाती है और अच्छा समय ऊपर आ जाता है।

यह हकीकत है कि कुछ लोग पहले वाले शिष्य की तरह दुख और समस्याओं को देख कर घबरा जाते हैं और मुसीबत देखकर वापस लौट आते हैं। ऐसे लोग जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते!
वहीं दूसरी ओर कुछ लोग जो धैर्यशील होते हैं, इंतजार करते है कि कुछ समय बाद गंदगी रूपी समस्याएं और दुख खत्म हो जाएंगे! वे ही सफल होते हैं!

समय समय पर संत यही समझाते हैं कि –
जीवन में उतार-चड़ाव आना जीवन का ही एक हिस्सा (Part of Life) है!
लेकिन
धेर्य और समझदारी के साथ उसका मुकाबला करना, उससे उबर पाना ही (Art of Life) हमारी कुशलता है!

आपका जीवन मंगलमय बना रहे!
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क्या हम भी गुलामों के गुलाम हैं?

क्या हम भी गुलामों के गुलाम हैं?😐

सिकंदर महान ने अपने रण कौशल से ग्रीस, इजिप्ट समेत उत्तर भारत तक अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। सालों से युद्ध करती सिकंदर की सेना बहुत थक चुकी थी और अब वो अपने परिवारों के पास वापस लौटना चाहती थी। सिकंदर को भी अपने सैनिकों की इच्छा का सम्मान करना पड़ा और उसने भी भारत से लौटने का मन बना लिया।

पर जाने से पहले वह किसी ज्ञानी व्यक्ति को अपने साथ ले जाना चाहता था। स्थानीय लोगों से पूछने पर उसे एक पहुंचे हुए बाबा के बारे में पता चला जो कुछ दूरी पर स्थित एक नगर में रहते थे।

सिकंदर दल-बल के साथ वहां पहुंचा। बाबा निःवस्त्र एक पेड़ के नीचे ध्यान लगा कर बैठे थे। सिकंदर उनके ध्यान से बाहर आने का इंतज़ार करने लगा। कुछ देर बाद बाबा ध्यान से बाहर निकले और उनके आँखें खोलते ही सैनिक ”सिकंदर महान – सिकंदर महान” के नारे लगाने लगे।

बाबा अपने स्थान पर बैठे उन्हें ऐसा करते देख मुस्कुरा रहे थे।

सिकंदर उनके सामने आया और बोला, ” मैं आपको अपने देश ले जाना चाहता हूँ। चलिए हमारे साथ चलने के लिए तैयार हो जाइये।“

बाबा बोले, ”मैं तो यहीं ठीक हूँ! मैं यहाँ से कहीं नहीं जाना चाहता! मैं जो चाहता हूँ सब यहीं उपलब्ध है! तुम्हे जहाँ जाना है जाओ।“

एक मामूली से संत का यह जवाब सुनकर सिकंदर के सैनिक भड़क उठे। भला इतने बड़े राजा को कोई मना कैसे कर सकता था।

सिकंदर ने सैनिकों को शांत करते हुए बाबा से कहा, ”मैं ‘ना’ सुनने का आदि नहीं हूँ, आपको मेरे साथ चलना ही होगा।“

बाबा बिना घबराये बोले, ”यह मेरा जीवन है और मैं ही इसका फैसला कर सकता हूँ कि मुझे कहाँ जाना है और कहाँ नहीं!”

यह सुन सिकंदर गुस्से से लाल हो गया उसने फ़ौरन अपनी तलवार निकाली और बाबा के गले से सटा दी, ”अब क्या बोलते हो , मेरे साथ चलोगे या मौत को गले लगाना चाहोगे?”

बाबा अब भी शांत थे और बोले कि ” मैं तो कहीं नहीं जा रहा! अगर तुम मुझे मारना चाहते हो तो मार दो, पर आज के बाद से कभी अपने नाम के साथ “महान” शब्द का प्रयोग मत करना , क्योंकि तुम्हारे अंदर महान होने जैसी कोई बात नहीं है … तुम तो मेरे गुलाम के भी गुलाम हो!”

सिकंदर अब और भी क्रोधित हो उठा, भला दुनिया जीतने वाले इतने बड़े योद्धा को एक निर्बल –निःवस्त्र , व्यक्ति अपने गुलाम का भी गुलाम कैसे कह सकता था?

”तुम्हारा मतलब क्या है?”, सिकंदर क्रोधित होते हुए बोला।

बाबा बोले, ”क्रोध मेरा गुलाम है! मैं जब तक नहीं चाहता मुझे क्रोध नहीं आता, लेकिन तुम अपने क्रोध के गुलाम हो, तुमने बहुत से योद्धाओं को पराजित किया पर अपने क्रोध से नहीं जीत पाये! वो जब चाहता है तुम्हारे ऊपर सवार हो जाता है! तो बताओ हुए ना तुम *मेरे गुलाम के गुलाम?“

सिकंदर बाबा की बातें सुनकर स्तब्ध रह गया। वह उनके सामने नतमस्तक हो गया और अपने सैनिकों के साथ वापस लौट गया।
डाक्टरों के कहना है कि हम जितनी बार गुस्सा होते हैं – उतनी बार हमारे शरीर में एसिड बनता है। और हम यह जानते ही हैं कि एसिड जिस बर्तन में होता है उसे नष्ट कर देता है।

हकीकत में, गुस्से का सबसे बड़ा शिकार खुद गुस्सा करने वाला ही होता है।

इस प्रेरणादायक प्रसंग से सीख लेते हुए हम भी अपने गुस्से को काबू में करने का प्रयास करें क्योंकि जाने अनजाने हम भी अपने को गुस्से का गुलाम बनाकर खुद का बहुत बड़ा नुकसान कर बैठते हैं!

आपका जीवन मंगलमय हो!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌸🌸

समय और भाग्य

समय और भाग्य

चमनलाल सारा दिन धूप में इधर-उधर घूम-फिर कर टूटा-फूटा सामान और कबाड़ जमा करता, फिर शाम को उसे बड़े कबाड़ी की दुकान पर बेचकर पेट भरने लायक कमा लेता था।

एक दिन वह एक घर से पुराना सामान खरीद रहा था। घर के मालिक ने उसे एक पुराना पानदान भी दिया, जो उसने मोल-भाव करके एक रुपये में खरीद लिया।

कुछ आगे बढ़ने पर एक और घर ने उसे कुछ कबाड़ बेचा, लेकिन घर के मालिक को वह पानदान पसंद आ गया और उसने पांच रुपये में उसे खरीद लिया। लेकिन जब काफी कोशिश के बाद भी वह पानदान उससे नहीं खुला तो अगले दिन उसने उसे चमनलाल को वापस करके अपने पांच रुपये ले लिए।

शाम को बड़े कबाड़ी ने भी वह पानदान न खुलने के कारण उससे नहीं खरीदा। अगले दिन रविवार था। रविवार को बाजार के चौक पर चमनलाल पुराना सामान बेचता था।

वहां उससे कोई ग्राहक पांच रुपये देकर वह पानदान ले गया। लेकिन अगले रविवार को वह ग्राहक वह पानदान उसे वापिस कर गया क्योंकि वह उससे भी नहीं खुला।

बार-बार पानदान उसी के पास पहुंच जाने के कारण चमनलाल को बहुत गुस्सा आया और उसने उसे जोर से जमीन पर पटककर मारा। अबकी पानदान खुल गया। पानदान के खुलते ही चमनलाल की आंखें खुली-की-खुली रह गईं! उसमें से कई छोटे-छोटे बहुमूल्य हीरे छिटककर जमीन पर बिखर गए थे। अगले दिन प्रातः वह उसी घर में गया जहां से उसने पानदान खरीदा था। पता चला कि वे लोग मकान बेचकर किसी दूसरे शहर में चले गये हैं।

चमनलाल ने उनका पता लगाने की कोशिश भी की लेकिन नाकामयाब रहा। बाद में चमनलाल उन हीरों को बेचकर संपन्न व्यापारी बन गया और सेठ चमनलाल कहलाने लगा।

समय से पहले भाग्य से ज्यादा किसी को नहीं मिलता। यही चमनलाल के साथ हुआ। वह तो किसी तरह उस पानदान से छुटकारा पाना चाह रहा था, जो बार-बार लौटकर उसी के पास आ जाता था।

शिक्षा:-किस्मत बार-बार उसके दरवाजे पर दस्तक दे रही थी, तभी तो वह पानदान उसे कबाड़ी से सेठ बना गया…. कई बार किस्मत हमें कुछ नहीं अपॉर्चुनिटी दिखाना और दिखाना चाहती है हमें उसे पॉजिटिव तरीके से देखना चाहिए

राधा अष्टमी की बधाई एवं शुभकामनाएं

जय श्री राम

शुभ रात्री

कर्मो का खेल – कर्म का लेन देन

कर्मो का खेल – कर्म का लेन देन

एक फौजी था। उसके मां नहीं, बाप नहीं, शादी नहीं, बच्चे नहीं, भाई नहीं, बहन नहीं। अकेला ही कमा कमा के फौज में जमा करता जा रहा था, तो थोड़े दिन में एक सेठ जी जो फौज में माल सप्लाई करते थे तो उनसे उनका परिचय हो गया और दोस्ती हो गई।

सेठ जी ने कहा, ”जो तुम्हारे पास पैसा है वो उतने के उतने ही पड़ा हैं उसे तुम मुझे दे दो मैं कारोबार में लगा दूं तो पैसे से पैसा बढ़ जायेगा।”

फौजी ने सेठ जी को पैसा दे दिया। सेठ जी ने कारोबार में लगा दिया। कारोबार उनका चमक गया, खूब कमाई होने लगी, कारोबार बढ़ गया।

थोड़े ही दिन में लड़ाई लग गई। लड़ाई में फौजी घोड़ी पर चढ़कर लड़ने गया। घोड़ी इतनी बदतमीज थी कि जितनी ज़ोर ज़ोर से लगाम खींचे उतनी ही तेज़ भागे। खींचते खींचते उसके गल्फर तक कट गये लेकिन वो दौड़कर दुश्मनों के गोल में जाकर खड़ी हो गई। दुश्मनों ने वार किया, फौजी भी मर गया और घोड़ी भी मर गई।

अब सेठ जी को मालूम हुआ कि फौजी मर गया तो सेठ जी बहुत खुश हुए कि उसका कोई वारिस तो है नहीं, अब ये पैसा किसको देना। अब मेरे पास पैसा भी हो गया, कारोबार भी चमक गया, लेने वाला भी नहीं रहा। यह सोचकर सेठजी बहुत खुश हुए।

कुछ ही दिन के बाद सेठजी के घर में लड़का पैदा हो गया! अब सेठजी और खुश कि भगवान की बड़ी दया है। खूब पैसा भी हो गया, कारोबार भी हो गया, लड़का भी हो गया,लेने वाला भी मर गया सेठ जी बहुत खुश।

वो लड़का होशियार था और पढ़ने में समझदार था। सेठजी ने उसे पढ़ाया लिखाया! जब वह पढ़ लिखकर बड़ा हो गया तो सोचा कि अब ये कारोबार सम्हाल लेगा, चलो अब इसकी शादी कर दें।

शादी करते ही घर में बहुरानी आ गई। अब उसने सोचा कि चलो, बच्चे की शादी हो गई अब कारोबार सम्हालेगा।

लेकिन कुछ दिन में बच्चे की तबियत खराब हो गई। अब सेठ जी डाक्टर के पास, हकीम के पास, वैद्य के पास दौड़ रहे हैं। वैद्य जी जो दे रहे हैं, दवा खिला रहे हैं, और दवा असर नहीं कर रही, बीमारी बढ़ती ही जा रही। पैसा बरबाद हो रहा है,और बीमारी बढ़ती ही जा रही है, रोग कट नहीं रहा, पैसा खूब लग रहा है। अब अन्त में डाक्टर ने कह दिया कि ला-इलाज मर्ज़ हो गया, इसको अब असाध्य रोग हो गया है! ये बच्चा दो दिन में मर जायेगा।

डाक्टरों के जवाब देने पर सेठ जी निराश होकर बच्चे को लेकर रोते हुए आ रहे थे तो रास्ते में एक आदमी मिला। उसने पूछा कि सेठजी क्या हुआ बहुत दुखी लग रहे हो?

सेठ जी ने कहा, “ये बच्चा जवान था, हमने सोचा बुढ़ापे में मदद करेगा। शादी होते ही अब ये बीमार हो गया।

हमने इसके लिये खूब पैसा लगा दिया! जिस डाक्टर ने जितना मांगा उतना दिया लेकिन आज डाक्टरों ने जवाब दे दिया और कहा, ”अब ये बचेगा नहीं। असाध्य रोग हो गया, लाइलाज मर्ज़ है। अब घर ले जाओ दो दिन भी काटना मुश्किल लगता है।“

आदमी ने कहा, ”अरे सेठ जी! तुम क्यों दिल छोड़ रहे हो। मेरे पड़ोस में वैद्य जी दवा देते हैं। दो आने की पुड़िया खाकर मुर्दा भी उठकर खड़ा हो जाता है। जल्दी से तुम वैद्य जी की दवा ले आओ।”

सेठ जी दौड़कर गये! दो आने की पुड़िया ले आये और पैसा दे दिया। पुड़िया ले आये बच्चे को खिलाई! बच्चा पुड़िया खाते ही मर गया।

अब सेठजी रो रहे हैं! सेठानी भी रो रही और घर में बहुरानी और पूरा गांव भी रो रहा है। गांव में शोर मच गया कि बहुरानी सेठ की कमर जवानी में टूट गई! सब लोग रो रहे हैं। तब वहां एक महात्मा जी आ गये।

उन्होनें कहा कि सेठ जी क्यों रो रहे हैं?
लोग बोले, इस सेठ का एक ही जवान लड़का था वो मर गया इसलिए सब लोग रो रहे हैं। सब दुखी हो रहे हैं।

महात्मा फिर सेठ से बोले, ”सेठजी ! क्यों रो रहे हैं?”
सेठ बोले, ”महाराज ! जिसका जवान बेटा मर जाये वो रोयेगा नहीं तो क्या करेगा?”

महात्मा जी गंभीर होकर बोले कि *आपको याद है जब एक फोजी मरा था और उस दिन बहुत खुश थे कि चलो मर गया – पैसा भी वापस नहीं देना पड़ेगा! माल बहुत हो गया! कारोबार खूब चमक गया!

महात्मा जी ने आगे बतलाया कि – सेठजी! वहीं फौजी पैसा लेने के लिये बेटा बन कर आ गया। पढ़ने में, लिखने में, खाने में, पहनने में और शौक में, श्रृंगार में जितना लगाना था लगाया। शादी ब्याह में सब लग गया। और ब्याज दर ब्याज लगाकर डाक्टरों को दिलवा दिया। अब जब दो आने पैसे बच गये, वो भी वैद्य जी को दिलवा दिये और पुड़िया खाकर चल दिया। यही सोचकर कि अब कर्मो का लेना देना पूरा हुआ।

सेठजी ने कहा, ‘हमारे साथ तो कर्मो का लेन देन था। चलो हमारे साथ तो जो हुआ सो हुआ। लेकिन वो जवान बहुरानी घर में रो रही है, जवानी में उसको धोखा देकर, विधवा बनाकर चला गया! उसका क्या जुर्म था कि उसके साथ ऐसा गुनाह किया।’

महात्मा बोले, ’यह वही घोड़ी है। जिसने जवानी में उसको धोखा दिया तो इसने भी जवानी में उसको धोखा दे दिया।’

इसलिय हमें याद रखना चाहिय कि –
बेटा बन कर, बेटी बनकर, दामाद बनकर और बहू बनकर वही आते हैं – जिनका हमारे साथ कर्मों का लेना देना होता है। लेना देना नहीं होगा तो नहीं आयेगा। जिसके सन्तान लायक होगी तो समझो कि उसने अच्छे कर्म किये होंगे! कर्म हमेशा अपने कर्ता को खोजते हैं!
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