सच मानिये थोड़ी देर में आप की समस्या का समाधान मिल जायेगा।

एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।

राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया।

राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।

विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई।

कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं?

संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे।

संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी। राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था! क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं; आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं; लेकिन आप तो कल की चिंता करते हैं।

सच्चा भक्त तो वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है।

अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रात भर आनंद से प्रार्थना करेंगे।

ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है।

उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं! राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी।

इससे यही साबित होता है कि सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया।

अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान हर समय हमारे साथ है। उसको (भगवान्) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।

कभी आप बहुत परेशान हो, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो। आप आँखे बंद कर के विश्वास के साथ पुकारें – सच मानिये थोड़ी देर में आप की समस्या का समाधान मिल जायेगा।

भगवान सदैव अपने भक्तों के साथ रहता है

भगवान सदैव अपने भक्तों के साथ रहता है

एक अमीर आदमी था। उसने समुद्र मे अकेले घूमने के लिए एक नाव बनवाई।

छुट्टी के दिन वह नाव लेकर समुद्र की सेर करने निकला। आधे समुद्र तक पहुंचा ही था कि अचानक एक जोरदार तुफान आया। उसकी नाव पुरी तरह से तहस-नहस हो गई लेकिन वह लाईफ जैकेट की मदद से समुद्र मे कूद गया। जब तूफान शांत हुआ तब वह तैरता तैरता एक टापू पर पहुंचा लेकिन वहाँ भी कोई नही था। टापू के चारो और समुद्र के अलावा कुछ भी नजर नही आ रहा था। उस आदमी ने सोचा कि जब मैंने पूरी जिदंगी मे किसी का कभी भी बुरा नही किया तो मेरे साथ ऐसा क्यूँ हुआ..?

उस आदमी को लगा कि भगवान ने मौत से बचाया तो आगे का रास्ता भी भगवान ही बताएगा। धीरे धीरे वह वहाँ पर उगे झाड-पत्ते खाकर दिन बिताने लगा।

अब धीरे-धीरे उसकी श्रध्दा टूटने लगी, भगवान पर से उसका विश्वास उठ गया। उसको लगा कि इस दुनिया मे भगवान है ही नही। फिर उसने सोचा कि अब पूरी जिंदगी यही इस टापू पर ही बितानी है तो क्यूँ ना एक झोपडी बना लूँ ……?

फिर उसने झाड की डालियो और पत्तो से एक छोटी सी झोपडी बनाई। उसने मन ही मन कहा कि आज से झोपडी मे सोने को मिलेगा आज से बाहर नही सोना पडेगा। रात हुई ही थी कि अचानक मौसम बदला बिजलियाँ जोर जोर से कड़कने लगी.! तभी अचानक एक बिजली उस झोपडी पर आ गिरी और झोपडी धधकते हुए जलने लगी।

यह देखकर वह आदमी टूट गया आसमान की तरफ देखकर बोला तू भगवान नही, राक्षस है। तुझमे दया जैसा कुछ है ही नही तू बहुत क्रूर है। वह व्यक्ति हताश होकर सर पर हाथ रखकर रो रहा था। कि अचानक एक नाव टापू के पास आई। नाव से उतरकर दो आदमी बाहर आये और बोले कि हम तुमे बचाने आये हैं। दूर से इस वीरान टापू मे जलता हुआ झोपडा देखा तो लगा कि कोई उस टापू पर मुसीबत मे है।

अगर तुम अपनी झोपडी नही जलाते तो हमे पता नही चलता कि टापू पर कोई है। उस आदमी की आँखो से आँसू गिरने लगे।

उसने ईश्वर से माफी माँगी और बोला कि मुझे क्या पता कि आपने मुझे बचाने के लिए मेरी झोपडी जलाई थी.

शिक्षा:– दिन चाहे सुख के हों या दुख के, भगवान अपने भक्तों के साथ हमेशा रहते है !!

जय श्रीराम

शुभरात्री

माता-पिता तो केवल इस शरीर को जन्म देते हैं किंतु आत्मतत्त्व का उपदेश देने वाले आचार्य (सद्गुरु) द्वारा जो जन्म होता है! वह दिव्य है! अजर-अमर है।

एक बहुत ही बड़े उद्योगपति का पुत्र कॉलेज में अंतिम वर्ष की परीक्षा की तैयारी में लगा रहता है – तो जब भी उसके पिता उसकी परीक्षा के विषय में उससे पूछते हैं तो वो जवाब में कहता है कि हो सकता है कॉलेज में अव्वल आऊँ, अगर मै अव्वल आया तो मुझे वो महंगी वाली कार ला दोगे जो मुझे बहुत पसन्द है?

तो पिता खुश होकर कहते हैं क्यों नहीं, अवश्य ला दूंगा! ये तो उनके लिए आसान था! उनके पास पैसो की कोई कमी नहीं थी।

जब पुत्र ने सुना तो वो दो गुने उत्साह से पढाई में लग गया। रोज कॉलेज आते जाते वो शो रुम में रखी कार को निहारता और मन ही मन कल्पना करता की वह अपनी मनपसंद कार चला रहा है।

दिन बीतते गए और परीक्षा खत्म हुई। परिणाम आया वो कॉलेज में अव्वल आया उसने कॉलेज से ही पिता को फोन लगाकर बताया कि वे उसका इनाम कार तैयार रखें, मैं घर आ रहा हूं।

घर आते आते वो ख्यालो में गाडी को घर के आँगन में खड़ा देख रहा था। जैसे ही घर पंहुचा उसे वहाँ कोई कार नही दिखी! वो बुझे मन से पिता के कमरे में दाखिल हुआ! उसे देखते ही पिता ने गले लगाकर बधाई दी और उसके हाथ में कागज में लिपटी एक वस्तु थमाई और कहा, लो यह तुम्हारा गिफ्ट।

पुत्र ने बहुत ही अनमने दिल से गिफ्ट हाथ में लिया और अपने कमरे में चला गया। मन ही मन पिता को कोसते हुए उसने कागज खोल कर देखा उसमे सोने के कवर में रामायण दिखी ये देखकर अपने पिता पर बहुत गुस्सा आया!

लेकिन उसने अपने गुस्से को संयमित कर एक चिठ्ठी अपने पिता के नाम लिखी कि, पिता जी, आपने मेरी कार गिफ्ट न देकर ये रामायण दी शायद इसके पीछे आपका कोई अच्छा राज छिपा होगा लेकिन मै यह घर छोड़ कर जा रहा हूँ और तब तक वापस नहीं आऊंगा; जब तक मै बहुत पैसा ना कमा लूँ और चिठ्ठी रामायण के साथ पिता के कमरे में रख कर घर छोड कर चला गया।

समय बीतता गया! पुत्र होशियार था; होन हार था – जल्दी ही बहुत धनवान भी बन गया! शादी की और शान से अपना जीवन जीने लगा! कभी-कभी उसे अपने पिता की याद आ जाती तो उसकी चाहत पर पिता से गिफ्ट ना पाने की खीज हावी हो जाती! वो सोचता माँ के जाने के बाद मेरे सिवा उनका कौन था – इतना पैसा रहने के बाद भी पिता जी ने मेरी छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं की! यह सोचकर वो पिता से मिलने से कतराता था।

एक दिन उसे अपने पिता की बहुत याद आने लगी और उसको महसूस होने लगा कि क्या मैं छोटी सी बात को लेकर अपने पिता से नाराज हुआ – अच्छा नहीं हुआ!

ये सोचकर उसने पिता को फोन लगाया! बहुत दिनों बाद पिता से बात कर रहा हूँ ये सोच धड़कते दिल से रिसीवर थामे खड़ा रहा! तभी सामने से पिता के नौकर ने फ़ोन उठाया और उसे बताया कि मालिक तो दस दिन पहले स्वर्ग सिधार गए और अंत तक तुम्हें याद करते रहे और रोते हुए चल बसे!

जाते समय कह गए कि अगर मेरे बेटे का फोन आया तो उसे कहना कि आकर अपना व्यवसाय सम्भाल ले! तुम्हारा कोई पता नहीं होनेे से तुम्हे सूचना नहीं दे पाये।

यह जानकर पुत्र को गहरा दुःख हुआ और दुखी मन से अपने पिता के घर रवाना हुआ! घर पहुच कर पिता के कमरे गया और उनकी तस्वीर के सामने रोते हुए रुंधे गले से उसने पिता का दिया हुआ गिफ्ट रामायण को उठाकर माथे पर लगाया और उसे खोलकर देखा!

पहले पन्ने पर पिता द्वारा लिखे वाक्य पढ़ा जिसमे लिखा था – “मेरे प्यारे पुत्र, तुम दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की करो और साथ ही साथ मन तुम्हें कुछ अच्छे संस्कार दे पाऊं; ये सोचकर ये रामायण दे रहा हूँ!”

पढ़ते वक्त उस रामायण से एक लिफाफा सरक कर नीचे गिरा – जिसमे उसी गाड़ी की चाबी और नगद भुगतान वाला बिल रखा हुआ था।

ये देखकर उस पुत्र को बहुत पछतावा हुआ और धड़ाम से जमींन पर गिर रोने लगा। लेकिन कहावत है ना कि –
अब पछताए क्या होत है, जब चिडीया चुग गयी खेत!

उस बच्चे कि तरह हम भी हमेशा हमारा मनचाहा उपहार हमारी पैकिंग में ना पाकर उसे अनजाने में खो देते हैं!

जैसे उसके पिता ने उसके सुखी जीवन की परिकल्पना अपने तरीके से की, उसको धनवान के साथ ही संस्कारवान बनाने का मंशा से रामायण भी दी परन्तु उसके अन्दर अपने पिता के प्रति विश्वास की कमी और मनचाहे चीजों को किसी भी तरह हासिल करने की ललक ने उसके जीवन सुनहरे पल खो दिए जब वे दोनों एक साथ उस शानोशौकत का भरपूर आनन्द लेते!

वैसे ही हम भी परमपिता परमात्मा के संदेश को ना समझकर; अपनी सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति करने में इतना लिप्त हो जाते हैं कि हमें भी परमपिता परमात्मा के सानिध्य के पलों से बंचित होना पड़ता है!
अंततः उन परमानन्द से वंचित पलों के खो जाने का मलाल बना रहता है!
इसलिय हर पल सजग होकर अपने माता-पिता और मार्गदर्शक की आज्ञा का अनुसरण कर जीवन का आनन्द लेना चाहिय!

धर्मराज युधिष्ठिर ने भीष्मजी से पूछाः “पितामह ! धर्म का रास्ता बहुत बड़ा है और उसकी अनेक शाखाएँ हैं। उनमें से किस धर्म को आप सबसे प्रधान एवं विशेष रूप से आचरण में लाने योग्य समझते हैं, जिसका अनुष्ठान करके मैं इस लोक व परलोक में भी धर्म का फल पा सकूँगा?“

भीष्मजी ने कहाः-
मातापित्रोर्गुरूणां च पूजा बहुमता मम।
इह युक्तो नरो लोकान् यशश्च महदश्नुते।।

‘राजन ! मुझे तो माता-पिता तथा गुरुओं की पूजा ही अधिक महत्त्व की वस्तु जान पड़ती है। इस लोक में इस पुण्यकर्म में संलग्न होकर मनुष्य महान यश और श्रेष्ठ लोक पाता है।’
(महाभारत, शांति पर्वः 108.3)
दस श्रोत्रिययों (वेदवेत्ताओं) से बढ़कर है – आचार्य (कुलगुरु), दस आचार्यों से बड़ा है- उपाध्याय (विद्यागुरु), दस उपाध्यायों से अधिक महत्त्व रखते हैं – पिता और दस पिताओं से भी अधिक गौरव है माता का। माता का गौरव तो सारी पृथ्वी से भी बढ़कर है मगर आत्मतत्त्व का उपदेश देने वाले गुरु का दर्जा माता-पिता से भी बढ़कर है।

माता-पिता तो केवल इस शरीर को जन्म देते हैं किंतु आत्मतत्त्व का उपदेश देने वाले आचार्य (सद्गुरु) द्वारा जो जन्म होता है! वह दिव्य है! अजर-अमर है।
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विश्वास की डोर

विश्वास की डोर
किसी गाँव में राम नाम का एक नवयुवक रहता था। वह बहुत मेहनती थे, पर हमेशा अपने मन में एक शंका लिए रहता कि वो अपने कार्यक्षेत्र में सफल होगा या नहीं!

कभी-कभी वो इसी चिंता के कारण आवेश में आ जाता और दूसरों पर क्रोधित भी हो उठता।

एक दिन उसके गांव में एक प्रसिद्ध महात्मा जी का आगमन हुआ।

खबर मिलते ही राम, महात्मा जी से मिलने पहुंचा और बोला, “महात्मा जी, मैं कड़ी मेहनत करता हूँ! सफलता पाने के लिए हर-एक प्रयत्न करता हूँ; पर फिर भी मुझे सफलता नहीं मिलती कृपया आप ही कुछ उपाय बताएँ।”

महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा- बेटा, तुम्हारी समस्या का समाधान इस चमत्कारी ताबीज में है! मैंने इसके अन्दर कुछ मन्त्र लिखकर डालें हैं जो तुम्हारी हर बाधा दूर कर देंगे। लेकिन इसे सिद्ध करने के लिए तुम्हें एक रात शमशान में अकेले गुजारनी होगी।”

शमशान का नाम सुनते ही राम का चेहरा पीला पड़ गया और घबराकर बोला, मैं रात भर अकेले कैसे रहूंगा?

“घबराओ मत यह कोई मामूली ताबीज नहीं है, यह हर संकट से तुम्हे बचाएगा।” महात्मा जी ने समझाया।

राम ने हिम्मत बांधकर पूरी रात शमशान में बिताई और सुबह होती ही महात्मा जी के पास जा पहुंचा, “हे महात्मन! आप महान हैं! सचमुच ये ताबीज दिव्य है, वर्ना मेरे जैसा डरपोक व्यक्ति रात बिताना तो दूर, शमशान के करीब भी नहीं जा सकता था। निश्चय ही अब मैं सफलता प्राप्त कर सकता हूँ।”

इस घटना के बाद राम बिलकुल बदल गया, अब वह जो भी करता उसे विश्वास होता कि ताबीज की शक्ति के कारण वह उसमें सफल होगा और धीरे-धीरे यही हुआ भी! वह गाँव के सबसे सफल लोगों में गिना जाने लगा।

इस वाकये के करीब १ साल बाद फिर वही महात्मा गाँव में पधारे।

राम तुरंत उनके दर्शन को गया और उनके दिए चमत्कारी ताबीज का गुणगान करने लगा।

तब महात्मा जी बोले- बेटे! जरा अपनी ताबीज निकालकर देना। उन्होंने ताबीज हाथ में लिया, और उसे खोला।

उसे खोलते ही राम के होश उड़ गए जब उसने देखा कि ताबीज के अंदर कोई मन्त्र-वंत्र नहीं लिखा हुआ था!वह तो धातु का एक टुकड़ा मात्र था!

राम बोला, “ये क्या महात्मा जी, ये तो एक मामूली ताबीज है, फिर इसने मुझे सफलता कैसे दिलाई?”

महात्मा जी ने समझाते हुए कहा- सही कहा तुमने, तुम्हें सफलता इस ताबीज ने नहीं बल्कि तुम्हारे विश्वास की शक्ति ने दिलाई है।

पुत्र, हम इंसानों को भगवान ने एक विशेष शक्ति देकर यहाँ भेजा है। वो है, विश्वास की शक्ति।

तुम अपने कार्यक्षेत्र में इसलिए सफल नहीं हो पा रहे थे क्योंकि तुम्हें खुद पर यकीन नहीं था! खुद पर विश्वास नहीं था।

लेकिन जब इस ताबीज की वजह से तुम्हारे अन्दर वो विश्वास पैदा हो गया तो तुम सफल होते चले गए !

इसलिए जाओ किसी ताबीज पर यकीन करने की बजाय अपने कर्म पर, अपनी सोच पर और अपने लिए निर्णय पर विश्वास करना सीखो!

इस बात को समझो कि जो हो रहा है वो अच्छे के लिए हो रहा है और निश्चय ही तुम सफलता के शीर्ष पर पहुँच जाओगे।

राम महात्मा जी के बात को गंभीरता से सुन रहा था और उसे आज एक बहुत बड़ी सीख मिली थी कि यदि उसे किसी भी क्षेत्र में सफल होना है तो उसे अपने प्रयत्नों पर विश्वास करना होगा!

सफलता का सीधा सम्बन्ध हमारे अंदर के विश्वास से होता है। यदि हम खुद पर यकीन रखते हैं तो हम निश्चित रूप से सफल हो सकते हैं! इसलिए विश्वास की डोर को हमेशा पकड़े रखना है!

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मन की शांति

मन की शांति

एक बार एक व्यक्ति की घड़ी कहीं खो गयी! तमाम कोशिशों के बाद भी घड़ी नहीं मिली! उसने निश्चित किया कि वह इस काम में बच्चों की मदद लेगा!

उसने सब बच्चों से कहा कि तुममें से जो कोई भी मेरी खोई घड़ी खोज देगा उसे मैं सौ रूपये दूंगा।

घंटों बीत जाने पर भी घड़ी नहीं मिली! तभी एक बच्चा उसके पास आया और बोला, ‘काका, मुझे एक मौका और दीजिये पर इस बार मैं यह काम अकेले ही करना चाहूंगा!’

बच्चा एक-एक करके घर के कमरों में जाने लगा! जब वह उस व्यक्ति के शयनकक्ष से निकला तो घड़ी उसके हाथ में थी।

व्यक्ति घड़ी देखकर प्रसन्न हो गया और अचरज से पूछा, बेटा,कहां थी वह घड़ी?

बच्चा बोला, मैंने कुछ नहीं किया! बस मैं कमरे में गया और चुपचाप बैठ गया और घड़ी की आवाज़ पर ध्यान केंद्रित करने लगा! कमरे में शांति होने के कारण मुझे घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे गयी और घड़ी खोज निकाली।

जिस तरह कमरे की शांति घड़ी ढ़ूढ़ने में मददगार साबित हुई, उसी प्रकार मन की शांति भी हमको एकाग्रचित्त होकर मिल सकती है बशर्ते बाहरी शोरगुल से हम खुद को अलग करें *तभी स्वास रूपी घडी की टिक-टिक हमको सुनाई देगी!

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प्रेम और मोह में क्या अंतर है?

प्रेम और मोह में क्या अंतर है?

प्रेम निस्वार्थ होता है। मोह स्वार्थी होता है। बिना कोई अपेक्षा प्रेम दिया जाता है। प्रेम मांगा नही जाता।प्रेम मन को बेहद में रखता है। मोह में मेरापन होता है। मोह में चाहना रहती है कि मेरे से सामने वाला भी लगाव रखे मेरे उपर अटेंशन दे। मोह हद का होता है। मोह शरीर से और शरीर के सम्बंध से होता है। इसलिए शरीर को कुछ हो जाये तो मोह की वजह से मन दुख महसूस करता है।

आप किसी पर प्रेम करते हो तो आप डिटैचमेंट में हैं और आप उनके आपके साथ होने न होने से प्रभावित नही होते ना ही आप दुःख महसूस करते हो।आप बस दिल से उन्हें दुवाये देते रहते हैं – *जो जहाँ भी है खुश रहे।

मोह अटैचमेंट है, बन्धन है। बंधन चिंता कराता है। स्ट्रेस में लाता है क्योकि आपके मन की तार किसी से बंधा है। अगर वो सुखी तो आप सुखी अगर वो दुखी तो आप दुःखी।

किसी से नफरत करना भी मोह है क्योंकि आपकी मन की तार नफरत की रस्सी से जुड़ी हुई है।

प्रेम किसी को बन्धन में नहीं डालता। प्रेम खुले साफ आकाश में उड़ते मुक्त खुश पंछी का प्रतीक है।
तो मोह सोने के पिंजरे बन्द लाचार पक्षी को दर्शाता है। अर्थात आपको पक्षी से लगाव है इसलिए आपने उसे बंद करके रखा है मगर पंछी जो न उड़ पाने का गम सह रहा है वो आपको महसूस नही होता। इसलिए मोह को भावनिक अंधत्व भी कह सकते है।

प्रेम प्रकाश है जो औरो को रोशनी देता है। अगरबत्ती की तरह – जो खुद जलकर औरो को खुशबू देता है।
मोह मन का अज्ञान अंधेरा है जो इस शरीर को, धन को, मान-शान को ही सबकुछ समझता रहता है। मोहयुक्त व्यक्ति औरो को भी दर्द देता है। औरो को भी चिंता में डालता है।

तत्वदर्शी सदगुरु अपने हर भक्त से प्रेम करते हैं मगर मोह किसी मे नहीं रखते। इसलिए उनको निर्लेप कहा गया है!
वह समझाते हैं कि प्रेम से हृदय हमेशा हर्षित रहता है, प्रफुल्लित होता है और मोह से हमारा मन दुखी और बोझिल महसूस करता है।

अब हमको खुद ही सोचना है कि हमें अपने देह से और देह के सम्बन्धियो से प्रेम रखना है या मोह?

जिस किसी रिश्ते से दुःख मिल रहा हो तो – वह मोह है! और हर परिस्थिति में प्रसन्नता का अनुभव होता हो तो – वह प्रेम है।

रामायण में भी मोह के द्वारा पीड़ित को किन व्याधियों का शिकार होना पड़ता है उसका स्पष्ट उल्लेख किया गया है! जो इस प्रकार है –

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥
भावार्थ:-सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है॥

प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥
बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥
भावार्थ:-यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जाएँ), तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनता से प्राप्त (पूर्ण) होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं, उनके नाम कौन जानता है (अर्थात्‌ वे अपार हैं)

ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई॥
पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई॥
भावार्थ:-ममता दाद है, ईर्षा (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है (गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराए सुख को देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है।

अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ॥
तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी!!
भावार्थ:-अहंकार अत्यंत दुःख देने वाला डमरू (गाँठ का) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसों का) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदर वृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं।

जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका ॥
भावार्थ:-मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँ तक कहूँ।

एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।
पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि ॥
भावार्थ:-एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत से असाध्य रोग हैं। ये जीव को निरंतर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशा में वह समाधि (शांति) को कैसे प्राप्त करें?

उसके लिय एक मात्र उपाय बताया गया है –
रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥
एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥4॥
भावार्थ : श्री रघुनाथजी की भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवा के साथ लिया जाने वाला मधु आदि) है। इस प्रकार का संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जाएँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नों से भी नहीं जाते!

राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा॥
सदगुरू वैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा॥
भावार्थ ; यदि श्रीराम जी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाए तो ये सब रोग नष्ट हो जाएँ। सद्गुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो!
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सुलझे हुए संस्कारो वाली

सुलझे हुए संस्कारो वाली

“बिटिया कुछ है क्या खाने को”

दोपहर तीन बजे के आसपास रामेश्वर बाबू ने बहु के कमरे में आवाज लगाते हुए कहा

“ये भी कोई वक्त है खाने का और अभी ग्यारह बजे दिया था ना दूध वाला दलिया फिर अब तीन बजे है जो रोटी सब्जी बनाई थी खत्म हो गई है। और आपको कोई काम तो है नहीं सिवाय खाना खाने के।

रसोई है या कोई फैक्ट्री जो आपके लिए चौबीस घंटे चलती रहेगी। जाइए शाम को देखेंगे अभी मेरा फेवरेट सीरियल आ रहा है। ये कहते हुए बहु ने नजरें फिर से टीवी पर टिका दी।

रामेश्वर बाबू चुपचाप वहां से अपने कमरे की और बढ़ गये। ये सब कुछ वहां झाड़ू पोंछा बर्तन का काम करने वाली सुधा देख रही थी। वह मन ही मन सोचने लगी कि कहने को इतना बड़ा बंगला है। बड़ी बड़ी गाडियां हैं। पैसा है, मगर इतने बड़े बंगले पैसे होने के बावजूद दिल बहुत छोटा है इनका। जो अपने घर के पिता तुल्य ससुरजी की सेवा नहीं कर सकते, कम से कम उन्हें भूखे पेट तो मत रखो। काश… अगर मेरे ससुर जी होते, तो मैं पिता की भांति उनकी सेवा करती।

काम करते करते, अचानक उसे स्मरण हुआ, ना जाने कितने फल और बादाम काजू डायनिंग टेबल पर पड़े-पड़े सड़ते रहते है। अधिकतर बासी होने पर फेंक दिए जाते है। घर के बच्चे उन्हें देखते तक नहीं है क्योंकि उन्हें फ्रेश चीजें खाने का शौक है। उसपर आजकल वो क्या कहते हैं, हां जंक फ्रूड। वह तो उन चीजों के शौकीन है। ये फल मेवे वह देखकर अनदेखा कर देते हैं।

साहब मालकिन को जहां अपने काम और किटी पार्टी से फुर्सत नहीं है तो वह क्या खाएंगे और क्या देखेंगे। बचे बेचारे बुजुर्ग दादाजी तो उनका मुंह तो बिना दांतों की बस्ती है उनकी दाल तो खिचड़ी-दलिया से ही गल सकती है तो वह क्या खाएंगे फल मेवे।

तभी कुछ सोचते हुए सुधा का चेहरा खिल उठा। उसने एक मुट्ठी मेवा सिलबट्टे पर पीसे और जरा से दूध में एक पके केले के साथ मसलकर बुजुर्ग रामेश्वर बाबू को पकड़ा दिए।

बोली बाबूजी-“चुपचाप खा लीजिए आपको भूख लगी है ना”

अब प्यासे को थोड़ा सा पानी मिल जाएं तो वो अमृत समान होता है। बुजुर्ग रामेश्वर बाबू भीगी हुई पलकों को साफ करते हुए तेजी से खाने लगे। उन्हें संतुष्टि से खाते हुए देखकर सुधा को भी संतुष्टि मिल रही थी।

ऐसे में अब ये रोज का नियम हो गया। सुधा रोज ऐसे व्यंजन, दोपहर में टीवी से चिपकी बहू की नज़र बचाकर, बुजुर्ग रामेश्वर बाबू को दे देती। कभी आते जाते बच्चे देख लेते, तो सोचते दादाजी की आंखें कितनी कमजोर हो गई है, जो मम्मी की जगह कामवाली से ना जाने क्या-क्या माँगकर खाते रहते है।

वहीं दूसरी ओर घर की बहु ये सोचकर खुश होती की मेरी डांट डपट से बूढ़े पिताजी काबू में रहते हैं। घर का बेटा पिताजी की सुधरती सेहत देखकर सोचता, कि उसकी पत्नी अपने ससुरजी का भरपूर ख्याल रखती है।

घर की कामवाली सुधा सोचती है, उसकी तो नौकरी भी यही है और जिन्दगी भी यही है। झाड़ू-बरतन करते-करते, जाने कब सांसें साथ छोड़ जाएं। अपने ससुरजी की सेवा करने का सौभाग्य तो उसे मिला नहीं। तो क्यों ना यहां घर के बुजुर्ग की सेवा करके कुछ पुण्य कमा ले।

वहीं बुजुर्ग रामेश्वर बाबू सोचते की, अब सोचना-समझना क्या है, दिन ही तो काटने है। भूखे रहकर मरने से अच्छा, आखिरी वक्त में जो सेवा और सम्मान दे रहा है ले लो। वह अक्सर सुधा को आशिर्वाद देते हुए सोचते, अगले जन्म में भगवान मुझे अमीर बनाना चाहें मत बनाना। बस बेटी देना या बहु देना तो ऐसे सुलझे हुए संस्कारों वाली सुधा जैसी देना !

जय श्री राम

शुभरात्री

क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता

क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता

एक देवरानी और जेठानी में किसी बात पर जोरदार बहस हुई और दोनो में बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक दूसरे का मुँह तक न देखने की कसम खा ली और अपने-अपने कमरे में जाकर खुद को दरवाजा बंद कर लिया।

परंतु थोड़ी देर बाद जेठानी के कमरे के दरवाजे पर खट-खट हुई। जेठानी तनिक ऊँची आवाज में बोली,कौन है?
बाहर से आवाज आयी, दीदी मैं ! जेठानी ने जोर से दरवाजा खोला और बोली अभी तो बड़ी कसमें खा कर गई थी। अब यहाँ क्यों आयी हो ?

देवरानी ने कहा, दीदी सोच कर तो वही गई थी परंतु माँ की कही एक बात याद आ गई कि जब कभी किसी से कुछ कहा सुनी हो जाए तो उसकी अच्छाइयों को याद करो! और मैंने भी वही किया और मुझे आपका दिया हुआ प्यार ही प्यार याद आया और मैं आपके लिए चाय ले कर आ गई।

बस फिर क्या था दोनों रोते रोते, एक दूसरे के गले लग गईं और साथ बैठ कर चाय पीने लगीं।
जीवन मे  क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता, बोध से जीता जा सकता है। अग्नि अग्नि से नहीं बुझती जल से बुझती है।

समझदार व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिगड़ती स्थितियों को विनम्र होकर, दो शब्द प्रेम के बोलकर संभाल लेते हैं।

हर स्थिति में संयम और बड़ा दिल रखना ही श्रेष्ठ है।

नानक जी समझाते हैं कि –
“नानक नन्हे बने रहो,
जैसे नन्ही दूब ।
“बड़े-बड़े बही जात हैं,
दूब खूब की खूब ।।
भावार्थः श्री गुरुनानक देव जी कहते हैं कि *”झुक कर चलने वालो का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता! जैसे सैलाब आने पर दूब (घास) लेट जाती है और सैलाब ऊपर से निकल जाता है। जिससे दूब तो और बढ़ जाती है लेकिन न झुकने वाले बड़े-बड़े पेड़ सैलाब में टूट कर बह जाते हैं!
इसलिय,
तू झुक के चल बंदया, झुकयां नूं प्रभ मिलदा !!
😊
           सुप्रभात
       🙏🥰🙏

भगवान आप अपना ध्यान रखना

भगवान आप अपना ध्यान रखना

एक बच्चा रोज अपने दादा जी को सायंकालीन पूजा करते देखता था। बच्चा भी उनकी इस पूजा को देखकर अंदर से स्वयं इस अनुष्ठान को पूर्ण करने की इच्छा रखता था, किन्तु दादा जी की उपस्थिति उसे अवसर नही देती थी।

एक दिन दादा जी को शाम को आने में विलंब हुआ, इस अवसर का लाभ लेते हुए बच्चे ने समय पर पूजा प्रारम्भ कर दी।

जब दादा जी आये, तो दीवार के पीछे से बच्चे की पूजा देख रहे थे।

बच्चा बहुत सारी अगरबत्ती एवं अन्य सभी सामग्री का अनुष्ठान में यथाविधि प्रयोग करता है और फिर अपनी प्रार्थना में कहता है,

भगवान जी प्रणाम। आप मेरे दादा जी को स्वस्थ रखना और दादी के घुटनो के दर्द को ठीक कर देना क्योकि दादा-दादी को कुछ हो गया, तो मुझे चॉकलेट कौन देगा। फिर आगे कहता है, भगवान जी मेरे सभी दोस्तों को अच्छा रखना, वरना मेरे साथ कौन खेलेगा।

फिर मेरे पापा और मम्मी को ठीक रखना, घर के कुत्ते को भी ठीक रखना, क्योकि उसे कुछ हो गया, तो घर को चोरों से कौन बचाएगा।

लेकिन भगवान यदि आप बुरा न मानो तो एक बात कहूँ, सबका ध्यान रखना, लेकिन उससे पहले आप अपना ध्यान रखना, क्योंकि आपको कुछ हो गया, तो हम सबका क्या होगा

इस सहज प्रार्थना को सुनकर दादा की आंखों में भी आंसू आ गए, क्योंकि ऐसी प्रार्थना उन्होंने न कभी की थी और न सुनी थी।

जय श्री राम

शुभरात्री

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।
जोग न मख जप तप उपवासा।।

सरल सुभाऊ न मन कुटिलाई।
जथा लाभ संतोष सदाई।।
~(उत्तरकांड ४५/१)

राज्याभिषेक उपरांत एक बार रामजी ने सभी नगरवासियों को बुलाया है। सभी को इसलोक व परलोक दोनों जगह सुखी होने का उपाय अपनी भक्ति बताया है। वे आगे कहते हैं कि भक्ति में कौन का परिश्रम लगता है। इसमें योग, यज्ञ, जप, तप, उपवास की कोई आवश्यकता नहीं है। बस सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो तथा जो कुछ मिले उसी में संतोष रखें।

सुखी होने का यह सरलतम मार्ग रामजी हमें आपको बताया है। हम आप योग, यज्ञ, उपवास आदि तो खूब कर लेते हैं, पर सरलता है कि आती नहीं और कुटिलता है कि जाती नहीं है। वस्तुतः ये दोनों तो सतत आत्मचिंतन करने पर ही आती व छूटती हैं!
इसलिय सहज और सरल बनकर ही हमको संतुष्टि का बोध हो सकता है!
🙏🙏🌸🌸🌸🙏🙏