मनुष्य का ध्यान

मनुष्य का ध्यान

समय और स्थान
जनवरी की एक सर्द सुबह थी, और यह घटना थी अमेरिका के वाशिंगटन डीसी का मेट्रो स्टेशन की!

एक आदमी वहां करीब घंटा भर तक वायलिन बजाता रहा… इस दौरान लगभग 2000 लोग वहां से गुज़रे – उनमें से अधिकतर लोग अपने काम से जा रहे थे।

जब उस व्यक्ति ने वायलिन बजाना शुरू किया। उसके तीन मिनट बाद एक अधेड़ आदमी का ध्यान उसकी तरफ गया। उसकी चाल धीमी हुई और वह कुछ पल उसके पास रुका और फिर जल्दी से निकल गया।

4 मिनट बाद वायलिन वादक को पहला सिक्का मिला… एक महिला ने उसकी टोपी में सिक्का फेंका और बिना रुके चलती बनी।

6 मिनट बाद एक युवक दीवार के सहारे टिककर उसे सुनता रहा, फिर उसने अपनी घड़ी पर नजर डाली और चलता बना…

10 मिनट बाद एक 3 वर्षीय बालक वहां रुक गया, पर जल्दी में दिख रही उसकी माँ उसे खींचते हुए वहां से ले गयी। माँ के साथ लगभग घिसटते हुए चल रहा बच्चा मुड़ मुड़कर वायलिन वादक को देख रहा था…

ऐसा ही कई बच्चों ने किया और हर बच्चे के अभिभावक उसे घसीटते हुए ही ले गये…

45 मिनट तक वह लगातार बजा रहा था – अब तक केवल छः लोग ही रुके थे और उन्होंने भी कुछ देर ही उसे सुना।

लगभग 20 लोगों ने सिक्का उछाला पर रुके बगैर अपनी सामान्य चाल में चलते रहे… उस आदमी को कुल मिलकर 32 डॉलर मिले!

1 घंटे बाद उसने अपना वादन बंद किया। फिर से शांति छा गयी।

इस बदलाव पर भी किसी ने ध्यान नहीं दिया। किसी ने वादक की तारीफ नहीं की और ना ही किसी व्यक्ति ने उसे नहीं पहचाना!!

वह था… विश्व के महान वायलिन वादकों में से एक -“जोशुआ बेल।*

उस समय यह विश्वविख्यात वायलन वादक जोशुआ 16 करोड़ रुपए की अपनी वायलिन🎻 से इतिहास की सबसे कठिन धुन🎶 बजा रहे थे! महज कुछ दिन पहले ही उन्होंने बोस्टन शहर में मंचीय प्रस्तुति दी थी!जहाँ प्रवेश टिकटों का औसत मूल्य 100 डॉलर 💵था।

यह बिलकुल सच्ची घटना है।

जोशुआ बेल प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘WASHINGTON POST’ द्वारा ग्रहणबोध और समझ को लेकर किये गए एक सामाजिक प्रयोग का हिस्सा बने थे।

📌इस प्रयोग का उद्देश्य यह पता लगाना था कि किसी सार्वजनिक जगह पर किसी व्यस्त समय में हम खास चीजों और बातों पर कितना ध्यान देते हैं?

  • क्या हम सुन्दरता या अच्छाई की सराहना करते हैं?*
    क्या हम आम अवसरों पर प्रतिभा की पहचान कर पाते हैं?

इसका एक सामान्य अर्थ यह निकलता हैं, जब दुनिया का एक श्रेष्ठ वादक एक बेहतरीन साज़ से इतिहास की सबसे कठिन धुनों में से एक बजा रहा था – तब अगर हमारे पास इतना समय नहीं था कि कुछ पल रुककर उसे सुन सकें, तो सोचिये… हम कितनी सारी अन्य बातों से वंचित हो गये हैं और लगातार वंचित हो रहे हैं?

संभवतः ये वक़्त बेहद गंभीरता से सोचने का है कि जिंदगी की भागदौड़ में हमने कितनी खूबसूरत चीज़ों को नज़रअंदाज़ कर दिया है और कितने अवसरों की हमने उपेक्षा कर दी है।

इसका दूसरा पहलू यह भी है कि बेशक हमारे पास उस वॉयलिन वादक की तरह बेशकीमती वस्तु हो, लोगों के भले के लिए अद्भुत तोहफा ही क्यों ना हो – अगर हमारे समय व स्थान के चयन में कमी हो तो सामान्य लोगों के लिए वह तोहफ़ा आकर्षण का केन्द्र नहीं हो सकता!

हमारी योग्यता और प्रसिद्धि को लोग तभी समझेंगे, तभी स्वीकार करेंगे – जब हमारा प्रजेंटेशन देश काल परिस्थिति के अनुरूप हो और विधिवत् हो!

महाराजी के ज्ञान प्रचार में सहयोग करने वाले प्रेमियों के लिए यह वाकया प्रेरित करेगा कि महाराजी के अनमोल ज्ञान का प्रचार, जन जन तक उनके सन्देश की पहुंच बनाने के लिए हमें भी समय, स्थान और व्यक्तिगत व्यवहार को सलीके से रखना होगा! तभी इस अनमोल ज्ञान की ओर लोगों का रुझान बन पायेगा!

हम सभी को इस दिशा में गहन चिंतन करना है!
मुझे विश्वास है कि आशातीत परिणाम अवश्य निकलेंगे।
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

अजनबी हमसफ़र

अजनबी हमसफ़र

वो ट्रेन के रिजर्वेशन के डब्बे में बाथरूम के तरफ वाली एक्स्ट्रा सीट पर बैठी थी,…☺️😢😢उसके चेहरे से पता चल रहा था कि थोड़ी सी घबराहट है उसके दिल में कि कहीं टीसी ने आकर पकड़ लिया तो।
कुछ देर तक तो पीछे पलट-पलट कर टीसी के आने का इंतज़ार करती रही।

शायद सोच रही थी कि थोड़े बहुत पैसे देकर कुछ निपटारा कर लेगी। देखकर यही लग रहा था कि जनरल डब्बे में चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें
आकर बैठ गयी, शायद ज्यादा लम्बा सफ़र भी नहीं करना होगा।

सामान के नाम पर उसकी गोद में रखा एक छोटा सा बेग दिख रहा था। मैं बहुत देर तक कोशिश करता रहा पीछे से उसे देखने की कि शायद चेहरा
सही से दिख पाए लेकिन हर बार असफल ही रहा।

फिर थोड़ी देर बाद वो भी खिड़की पर हाथ टिकाकर सो गयी। और मैं भी वापस से अपनी किताब पढ़ने में लग गया।
लगभग 1 घंटे के बाद टीसी आया और उसे हिलाकर उठाया।
“कहाँ जाना है बेटा”

“अंकल अहमदनगर तक जाना है”
“टिकेट है ?”
“नहीं अंकल …. जनरल का है ….

लेकिन वहां चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें बैठ गयी”
“अच्छा 300 रुपये का पेनाल्टी बनेगा”

“ओह … अंकल मेरे पास तो लेकिन 100 रुपये ही हैं”
“ये तो गलत बात है बेटा …. पेनाल्टी तो भरनी पड़ेगी”

“सॉरी अंकल …. मैं अलगे स्टेशन पर जनरल में चली जाउंगी …. मेरे पास सच में पैसे नहीं हैं …. कुछ परेशानी आ गयी, इसलिए
जल्दबाजी में घर से निकल आई …

और ज्यदा पैसे रखना भूल गयी…. ” बोलते बोलते वो लड़की रोने लगी टीसी उसे माफ़ किया और 100 रुपये में उसे अहमदनगर तक उस डब्बे
में बैठने की परमिशन देदी।

टीसी के जाते ही उसने अपने आँसू पोंछे और इधर-उधर देखा कि कहीं कोई उसकी ओर देखकर हंस तो नहीं रहा था।

थोड़ी देर बाद उसने किसी को फ़ोन लगाया और कहा कि उसके पास बिलकुल भी पैसे नहीं बचे हैं … अहमदनगर स्टेशन पर कोई
जुगाड़ कराके उसके लिए पैसे भिजा दे, वरना वो समय पर गाँव नहीं पहुँच पायेगी।

मेरे मन में उथल-पुथल हो रही थी, न जाने क्यूँ उसकी मासूमियत देखकर उसकी तरफ खिंचाव सा महसूस कर रहा था,
दिल कर रहा था कि उसे पैसे देदूं और कहूँ कि तुम परेशान मत हो … और रो मत …. लेकिन एक अजनबी के लिए इस तरह की बात
सोचना थोडा अजीब था।

उसकी शक्ल से लग रहा था कि उसने कुछ खाया पिया नहीं है शायद सुबह से … और अब तो उसके पास पैसे भी नहीं थे।

बहुत देर तक उसे इस परेशानी में देखने के बाद मैं कुछ उपाय निकालने लगे जिससे मैं उसकी मदद कर सकूँ और फ़्लर्ट भी ना कहलाऊं। फिर
मैं एक पेपर पर नोट लिखा,

“बहुत देर से तुम्हें परेशान होते हुए देख रहा हूँ, जनता हूँ कि एक अजनबी हम उम्र लड़के का इस तरह तुम्हें नोट भेजना अजीब भी होगा और शायद तुम्हारी नज़र में गलत भी, लेकिन तुम्हे इस तरह परेशान देखकर मुझे बैचेनी हो रही है इसलिए यह 500 रुपये दे रहा हूँ , तुम्हे कोई अहसान न लगे इसलिए मेरा एड्रेस भी लिख रहा हूँ ….. जब तुम्हें सही लगे मेरे एड्रेस पर पैसे वापस भेज सकती हो ….वैसे मैं नहीं चाहूँगा कि तुम वापस करो ….. अजनबी हमसफ़र ”

एक चाय वाले के हाथों उसे वो नोट देने को कहा, और चाय वाले को मना किया कि उसे ना बताये कि वो नोट मैंने उसे भेजा है। नोट मिलते ही उसने दो-तीन बार पीछे पलटकर देखा कि कोई उसकी तरह देखता हुआ नज़र आये तो उसे पता लग जायेगा कि किसने भेजा। लेकिन मैं तो नोट भेजने के बाद ही मुँह पर चादर डालकर लेट गया था। थोड़ी देर बाद चादर का कोना हटाकर देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कराहट महसूस की। लगा जैसे कई सालों से इस एक मुस्कराहट का इंतज़ार था। उसकी आखों की चमक ने मेरा दिल उसके हाथों में जाकर थमा दिया …. फिर चादर का कोना हटा- हटा कर हर थोड़ी देर में उसे देखकर
जैसे सांस ले रहा था मैं। पता ही नहीं चला कब आँख लग गयी। जब आँख खुली तो वो वहां नहीं थी …

ट्रेन अहमदनगर स्टेशन पर ही रुकी थी। और उस सीट पर एक छोटा सा नोट रखा था ….. मैं झटपट मेरी सीट से उतरकर उसे उठा लिया .. और उस पर लिखा था…

Thank You मेरे अजनबी हमसफ़र ….

आपका ये अहसान मैं ज़िन्दगी भर नहीं भूलूँगी …. मेरी माँ आज मुझे छोड़कर चली गयी हैं …. घर में मेरे अलावा और कोई नहीं है इसलिए
आनन – फानन में घर जा रही हूँ।

आज आपके इन पैसों से मैं अपनी माँ को शमशान जाने से पहले एक बार देख पाऊँगी ….

उनकी बीमारी की वजह से उनकी मौत के बाद उन्हें ज्यादा देर घर में नहीं रखा जा सकता। आजसे मैं आपकी कर्ज़दार हूँ …

जल्द ही आपके पैसे लौटा दूँगी। उस दिन से उसकी वो आँखें और वो मुस्कराहट जैसे मेरे जीने की वजह थे …. हर रोज़ पोस्टमैन से पूछता था शायद किसी दिन उसका कोई ख़त आ जाये …. आज 1 साल बाद एक ख़त मिला … आपका क़र्ज़ अदा करना चाहती हूँ …. लेकिन ख़त के ज़रिये नहीं आपसे मिलकर … नीचे मिलने की जगह का पता लिखा था …. और आखिर में लिखा था ..
अजनबी हमसफ़र ……

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

क्या है जीवन का लक्ष्य ?

क्या है जीवन का लक्ष्य ?

कितना विचित्र है यह संसार!
यहाँ राजा सोचता है कि फकीर मजे में है और फकीर सोचता है राजा मजे में है।

दोनों की मनोस्थिति ऐसी है कि सच देख नहीं पा रहे हैं!

क्या ऐसा संभव है कि आप जहाँ है – वहीं आनंदमय हो जाएँ।
न फकीरी में पड़ें, न ही बादशाहत में। जो मिला है, उसे प्रसाद समझकर स्वीकार करें।

सुख आए तो, दुःख आए तो भी चुपचाप मुस्कुराकर साक्षी भाव से देखते रहें और जो परमात्मा दे उसे खुशी से स्वीकार कर लें!

सच यही है कि आपकी पात्रता को देखकर ही उसने आपको सब कुछ दिया है !

प्रायः यह देखने में आता है कि जिनके पास बहुत होता है वे भी अशांत या दुःखी दिखाई देते हैं और बहुत से लोग सीमित साधनों में भी गुजारा कर काफी खुश या सुखी दिखाई देते हैं।

यह बात सिद्ध करती है कि खुशी का आधार हमारी भौतिक वस्तुएं न होकर उनसे भी ज्यादा हमारे जीवन जीने का तरीका, सोचने या विचार करने का तरीका होता है।

इसलिए हमेशा अच्छा ही सोचें क्योंकि यही सोच ही हमारे कर्म का आधार है, बीज है।

इस संसार में न कोई सदा रहा है और न ही रह सकता है!

यह कटु सत्य है कि हम से पहले अनेक लोग यहाँ से जा चुके हैं और हमे भी एक दिन यह संसार छोड़कर चले जाना है!

जीवन-काल अल्‍प है जो हमे कुछ समय के लिये ही खास उद्देश्य की पूति॔ के लिये ही मिला है और सचमुच में हमारे पास समय बहुत कम है!

हम एक बार जन्म लेने के बाद कभी भी मृत्यु से भाग नहीं सकते और हम तो अपने जीवनकाल का अधिक भाग पहले से बिना किसी प्राप्ति के समाप्त भी कर चुके हैं और शेष जीवन तेजी से मौत की और बढ़ता जा रहा है!

यह हमारा अनमोल मनुष्य-जन्म व्‍यथ॔ ही संसार के कामों में बिता जा रहा है! आज हम अपना कीमती समय संसार के कामों में गँवाकर अपने खुद के साथ बहुत बड़ा अन्‍याय कर रहे हैं!

सोचने वाली बात है कि बिना लक्ष्य को प्राप्त किए यदि हमें जाना पड़े तो कैसा अनुभव होगा?.

इसलिए समय के सदगुरु समझाते हैं कि तुम्हारे लिए जीते जी स्वर्ग की अनुभूति संभव है! तुम खाली हाथ आए ज़रूर पर तुमको खाली हाथ संसार से जाने की जरुरत नहीं है!

जिन भाग्यशाली लोगों को सदगुरु का वह सानिध्य प्राप्त है वे अपने हर पल का आनन्द लेते रहें!

आपका जीवन आनंदमय बना रहे!
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

दिल के करीब आ जाओ !

दिल के करीब आ जाओ !

एक सन्यासी अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंछे! वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे!

संयासी यह देख तुरंत पलटेऔर अपने शिष्यों से पूछा ; ”क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं?’

शिष्य कुछ देर सोचते रहे! एक ने उत्तर दिया, ”क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए!”

”पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है? जो कहना है वो आप धीमी आवाज़ में भी तो कह सकते हैं!” सन्यासी ने पुनः प्रश्न किया!

कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देने का प्रयास किया पर बाकी लोग संतुष्ट नहीं हुए!

अंततः सन्यासी ने समझाया कि, “जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते! वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके दिलों के बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा!

क्या होता है जब दो लोग प्रेम में होते हैं? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं क्योंकि “उनके दिल करीब होते हैं ! उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है!”

सन्यासी ने बोलना जारी रखा , ”और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है?

तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं!
और यह स्थिति भक्त और भगवान् के बीच के प्रेम में परिलक्षित होती है! वह अविनाशी ब्रह्म जो हमारे अन्दर बैठा है – जब सद्गुरु की कृपा से उसका दीदार होता हैं तो वहाँ बाहरी इन्द्रियों के द्वारा प्रतिक्रिया गौण हो जाती है! उस सर्वव्यापी ब्रह्म के लिय कहा है कि –
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥

आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥
अर्थात्, वह (ब्रह्म) बिना ही पैर के चलता है! बिना ही कान के सुनता है! बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है! बिना मुँह (जिह्वा) के ही सारे (छहों) रसों का आनंद लेता है और बिना वाणी के बहुत योग्य वक्ता है।

आज हम बहिर्मुखी हो चुके हैं तभी मनचाहा न होने के कारण अपनों पर ही चिल्लाना शुरू कर देते हैं! जबकि आनन्द और प्रेम का श्रोत हमारे अन्दर है – जिसके लिय हमें अंतर्मुखी होना होगा!

अतः किसी से बात करें तो इस बात का ध्यान रहे कि, हमारे हृदय आपस में दूर न होने पाएं!
हम ऐसे शब्द कभी भी ना बोलें कि जिससे हमारे दिलों के बीच की दूरी बढे!

अन्यथा तो एक समय ऐसा आएगा कि ये दूरी इतनी अधिक बढ़ जाएगी कि *हमें लौटने का रास्ता भी नहीं मिलेगा और केवल पश्चाताप की अग्नि में झुलसना पड़ेगा!

इसलिय हमको संकल्यपित होना होगा कि हमको यथासंभव अंतर्मुखी बने रहना है और हर स्वांस में जीवन का आनन्द लेते रहना है!

🌹🙏🏻आपका जीवन ज्ञान के आनन्द में महकता रहे!🙏🏻🌹

मोह – सकल वय्धीन कर मूला!

मोह – सकल वय्धीन कर मूला!

श्रीमद्भगवत गीता में भगवान अर्जुन से कहते हैं, काम महाशत्रु है। क्रोध के लिए भी कहा गया है क्रोध करने वाला क्रोधाग्नि में दूसरे से पहले स्वयं को जलाता है। इन दो बड़े विकारों के साथ-साथ मोह भी कम नहीं है। मोह प्रत्यक्ष में तो बहुत मीठा लगता है किंतु इसका प्रभाव बहुत ही हानिकारक होता है। मोह से ग्रसित व्यक्ति अपने साथ-साथ अपने वंश के विनाश का भी निमित्त बनता है।
यादगार ग्रंथ महाभारत का पात्र धृतराष्ट्र इसका ज्वलंत उदाहरण है। मोह कैसे मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है!

प्रस्तुत है एक कहानी –

एक अधेड़ उम्र के सेठ जी अपनी दुकान में बैठे चक्की पर दाना दल रहे थे। दलते जाते, कहते जाते- “इस जीवन से तो मौत अच्छी है।” तभी एक साधू ने वहां से गुजरते हुए, सेठ जी के शब्द सुने, सोचा कितना दुखी है यह व्यक्ति! इसकी सहायता करनी चाहिये।

सेठ के पास जाकर बोले – “सेठ, बहुत दुखी लगता है तू ! मेरे पास एक विद्या है ! यदि तू चाहे तो तुझे स्वर्ग ले जा सकता हूँ।” चल, तुझे दुखों से छुटकारा मिल जायगा।

सेठ साधु की ओर देखकर बोला – “अभी कैसे चल सकता हूं? मेरे कोई संतान नहीं है, संतान हो जाय तो चलूँगा।” सुनकर साधु चला गया।

कुछ वर्षों बाद सेठ के दो बेटे हुए। एक दिन फिर वही साधु आया और बोला – “चलो सेठ ! अब तो तुम्हारी सन्तान भी हो गई।”

सेठ ने कहा – “हाँ हो तो गई, परन्तु लड़के तनिक बड़े होकर किसी लायक हो जाएँ, तब तुम आना, मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।

लड़के बड़े हो गये। साधु फिर आया, सेठ नहीं दिखाई दिया। पूछने पर पता लगा की सेठ मर गया। साधु ने योगबल से देखा कि मर कर वह सेठ दुकान के बाहर बैल बनकर बंधा हुआ है।

उसके पास जाकर साधु ने कहा – “अब चलेगा स्वर्ग को?”
बैल रूपी सेठ ने सर हिला कर कहा- “कैसे जाऊँ? बच्चे अभी नासमझ हैं, मैं चला गया तो बच्चे दूसरा बैल ले आयेंगे। जितनी सेवा मैं करता हूं, दूसरा बैल बोझ नहीं करेगा और मेरे बच्चों को हानि हो जायेगी। ना भाई! अभी तो मैं नहीं जा सकता। कुछ समय बाद आना।”

पांच वर्ष बाद साधु फिर आया। देखा- दुकान के सामने अब बैल नहीं है। पता करने पर ज्ञात हुआ, बोझ ढोते ढोते मर गया।

साधु ने फिर अपने योग बल से पता लगाया – वह सेठ अपने ही घर के द्वार पर कुत्ता बन कर बैठा है।

साधु ने उसके पास जाकर कहा – “अब तो बोझ ढोने की बात भी नहीं रही। अब चल, तुझे स्वर्ग ले चलूँ।”

कुत्ते के शरीर में बैठे सेठ ने कहा- “अरे कैसे चलूं! देखो मेरी बहू ने कितने आभूषण पहन रखे हैं? मेरे लड़के घर में नहीं हैं। यदि कोई चोर आया तो बहु को बचायेगा कौन?” तुम फिर आना।

एक वर्ष बाद उसने वापस आकर देखा कि कुत्ता भी मर चुका है।

साधु ने अपने योग बल द्वारा पुनः उस सेठ को खोजा तो ज्ञात हुआ कि वह अपने घर के पास बहने वाली गन्दी नाली में कीड़ा बन के बैठा है।

साधु ने उसके पास जाकर कहा- “देखो सेठ! क्या अब इससे बड़ी दुर्गति भी होगी?” कहाँ से कहाँ पहुँच गये तुम ! अब भी मेरी बात मानो। “चलो, तुम्हें स्वर्ग ले चलूँ।”

कीड़े के शरीर में बैठे सेठ ने चिल्ला कर कहा – “चला जा यहाँ से! क्या मैं ही रह गया हूँ स्वर्ग जाने के लिए?” यहाँ पोते पोतियों को आते जाते देख कर प्रसन्न होता हूं। “स्वर्ग में क्या मैं तेरा मुख देखा करूँगा?”

यह है – मोह के चक्र में फंसे रहने का परिणाम।

मोह का चक्र आत्मा को नीचे ही नीचे ढकेलता चला जाता है। हे मानव! अब तो इस मोह जाल से निकल और अपने उद्धार की सोच!

संतों ने कहा भी है कि –
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला!
काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा!!
अर्थात्, सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है!

इसलिय, इन रोगों से बचने का उपाय जीते जी कर लेना चाहिय!

जिसके लिय संतों ने समय के सदगुरु रूपी वैद्य के पास जाने के लिय कहा गया है!
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा!
सदगुरू वैद्य बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय करि आसा!!
अर्थात्, यदि श्रीराम जी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाए तो ये सब रोग नष्ट हो जाएँ यानी सद्गुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

विजय कैसे प्राप्त करें

विजय कैसे प्राप्त करें

एक समय बात है एक तालाब में बहुत सारे मेंढक रहते थे। सरोवर के बीचों बीच एक बहुत पुराना का खम्भा भी लगा हुआ था। खम्भा बहुत ऊँचा था और उसकी सतह भी चिकनी थी। एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया की क्यों ना एक प्रतियोगिता करवाई जाये। इसमें भाग लेने वाले को खम्भे पर चढ़ना होगा और जो सबसे पहले ऊपर पहुंच जायेगा, उसे विजेता घोषित कर दिया जायेगा। तो उन्होंने प्रतियोगता का दिन फिक्स कर दिया। प्रतियोगिता का दिन आ गया, खम्भे के चारो और बहुत भीड इक्कठी हो गयी। आसपास के इलाकों से भी कई मेंढक इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने पहुंचे।

माहौल में सरगर्मी थी। हर तरफ शोर ही शोर था। प्रतियोगिता शुरू हुई… लेकिन खम्भे को देखकर भीड में से किसी भी मेंढक को यकीन नहीं हुआ, की कोई भी मेंढक इस खम्भे के ऊपर पहुंच पायेगा। चारो ओर यही शोर हो रहा था – “अरे ये बहुत कठिन हैं ” “वो कभी भी इसे नहीं जीत पाएंगे। “ऊपर पहुंचने का तो कोई सवाल ही नहीं हैं, इतने चिकने खम्भे पर नहीं चढ़ा जा सकता” और यह हो भी रहा था की जो भी मेंढक कोशिश करते, वो थोडा ऊपर जाकर फिसलने के कारण नीचे गिर जाते।

कई मेंढक तो बार बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में में लगे हुए थे। पर भीड तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी, “ ये नहीं हो सकता, ये असंभव हैं ” तो अब जो भी मेंढक उत्साहित थे, कोशिश कर रहे थे , वो भी ये सुन सुनकर हताश हो गए और उन्होंने अपना प्रयास करना छोड़ दिया। लेकिन उन्ही मेंढकों के बीच एक छोटा सा मेंढक था। जो बार बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर चढ़ने में लगा हुआ था…. वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा और आखिरकार वह खम्भे के ऊपर पहुच गया।

और इस प्रतियोगिता का विजेतां बना। उसकी जीत पर सभी को बडा आश्यर्य हुआ, सभी मेंढक उसे घेर कर खडे हो गए और पूछने लगे ,” तुमने ये असंभव काम कैसे कर दिखाया, कैसे तुमने सबको पीछे छोड़ कर जीत प्राप्त करी?” तभी पीछे से किसी ने बोला … “अरे उससे क्या पूछते हो , ये तो बहरा है ” आपको समझ आया वो कैसे जीता ? जी हां उसके आसपास जितने भी टांग खींचने वाले थे, उनकी आवाज उसको नहीं सुनाई दी, जिससे वो नकारात्मक नहीं सोच पाया, और वो अपने लक्ष्य पर ज्यादा फोकस कर पाया और जीत गया।

शिक्षा:-दोस्तों, हमारे अंदर भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की काबिलियत होती हैं, और हम शुरुआत भी करते हैं। लेकिन अपने आसपास के ज्ञान चंदो के कारण और अपने नकारात्मक माहौल के कारण, हम अपना काम या तो शुरू नहीं करते हैं या फिर बीच में ही छोड़ देते हैं। तो दोस्तों आपको जो भी पीछे रखने वाली आवाजे हैं वो कोई भी, कुछ भी हो सकती हैं। चाहे वो दोस्त हो, रिश्तेदार हो, या फिर आप खुद हो। इन सबको ignore करना ही होगा। अपने आपको एक मजबूत इंसान बनाते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हरसंभव प्रयास करने चाहिए। यदि आपने नकारात्मकता से दूरी बना ली,तो आपको सफलता के शिखर पर पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता..!!

जय श्रीराम

शुभरात्री

समस्या का समाधान❔

समस्या का समाधान❔

एक व्यक्ति अपने परिवार, रिश्तेदार, मित्र, मोहल्ला के निवासी, अपनी फैक्ट्री के कार्यकर्ताओं से अति दुःखी होकर समाधान हेतु अपने गुरु के पास पहुंचा और अपनी पीड़ा गुरुदेव को बताते हुए बोला- “मेरे कर्मचारी, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और मेर आसपास के सभी लोग बेहद स्वार्थी हैं। कोई भी सही नहीं है, क्या करूं गुरुदेव?”

उस व्यक्ति की वेदना को समझ गुरुजी उसकी समस्या को भली-भांति समझ गए।

मुस्कान के साथ उन्होंने कहा- “पुत्र, नि:संदेह तुम्हारी समस्या अति गंभीर है। समय रहते इसका समाधान आवश्यक है। तुम आज रात आश्रम में ही रहो। मैं रात्रि में मंथन करूंगा और सुबह समाधान बताऊंगा।”

उस व्यक्ति को अपने गुरु पर अटूट विश्वास था।
उसने आश्रम में रात्रिविश्राम की बात स्वीकार ली और आश्रम के निवासियों के पास जा पहुंचा।भोर की पूजा-अर्चना के पश्चात अपने अन्य शिष्यों की समस्याओं को निबटा कर गुरुजी ने अंत में उस व्यक्ति को अपने पास बुलाया।

एक रात आश्रम में बिताने के अनुभव को भी वह व्यक्ति अपने गुरु को बताने से स्वय को रोक न सका और बोला- “गुरुदेव, आपके आश्रम में भी स्वार्थियों ने अपना डेरा जमा रखा है। हर कोई आपसे कुछ न कुछ चाहकर ही यहां रुका है।”

गुरुदेव ने उसकी हर बात को गंभीरता से सुना और अंत में कहा- “मैं एक कहानी सुना रहा हूं, उसे गंभीरता से सुनना। इस कहानी में ही तुम्हारी समस्या का समाधान छिपा है।

एक गाँव में एक विशेष कमरा था जिसमे 1 हजार आईने लगे थे । एक छोटी लड़की उस कमरे में गई और खेलने लगी। उसने देखा 1 हजार बच्चे उसके साथ खेल रहे हैं और वो उन बच्चों के प्रतिबिंब के रहकर खुश रहने लगी।
जैसे ही वो अपने हाथ से ताली बजाती सभी बच्चे उसके साथ ताली बजाते।

उसने सोचा यह दुनियां की सबसे अच्छी जगह है और यहां वह बार बार आना चाहेगी।

बच्ची के प्रस्थान के पश्चात थोड़ी देर बाद इसी जगह पर एक उदास आदमी कहीं से आया।

उसने अपने चारों तरफ हजारों दु:ख से भरे चेहरे देखे। वह बहुत दु:खी हुआ।
उसने हाथ उठा कर सभी को धक्का लगाकर हटाना चाहा तो उसने देखा हजारों हाथ उसे धक्का मार रहे हैं।

उसने कहा, यह दुनियां की सबसे खराब जगह है वह यहां दोबारा कभी नहीं आएगा और उसने वो जगह छोड़ दी।

इस प्रसंग से यही समझा जा सकता है कि ठीक इसी तरह यह दुनिया एक कमरा है जिसमें हजारों शीशे लगे हैं। जो कुछ भी हमारे अंदर भरा होता है वो ही प्रकृति हमें लौटा देती है। संसार हमें अपने मन के अनुरूप ही दिखता है!

इसलिए
अपने मन और दिल को साफ़ रखें, यक़ीनन तब यह दुनिया आपके लिए स्वर्ग की तरह अनुभव होगी।

संसार को सुधारने की आकांक्षा रखने वालों के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है कि हम स्वयं में सुधार करें! संसार अपने आप सुधर जाएगा। हम अपने अंदर की शान्ति का साम्राज्य लाएं – जब हर एक का प्रयास और सोच इसी तरह की होगी तो संसार में ख़ुद ब ख़ुद शान्ति हो जायेगी!

सुप्रभात

अष्टावक्र का ज्ञान

अष्टावक्र का ज्ञान

ऋषि को अपने शिष्य कहोड़ की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी पुत्री सुजाता का विवाह कहोड़ से कर दिया। सुजाता के गर्भ ठहरने के बाद ऋषि कहोड़ सुजाता को वेदपाठ सुनाते थे। तभी सुजाता के गर्भ से बालक बोला- ‘पिताजी! आप गलत पाठ कर रहे हैं। इस पर कहोड़ को क्रोध आ गया और शाप दिया तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) होकर पैदा होगा। कुछ दिन बाद कहोड़, राजा जनक के दरबार में एक महान विद्वान बंदी से शास्त्रार्थ में हार गए और नियम अनुसार, कहोड़ को जल समाधि लेनी पड़ी। कुछ दिनों बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ।

एक दिन मां से पिता की सचाई पता चली, तो अष्टावक्र दुखी हुआ और बारह साल का अष्टावक्र बंदी से शास्त्रार्थ करने के लिए राजा जनक के दरबार में पहुंचा। सभा में आते ही बंदी को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी, लेकिन अष्टावक्र को देखकर सभी पंडित और सभासद हंसने लगे, क्योंकि वो आठ जगह से टेढ़े थे, उनकी चाल से ही लोग हंसने लगते थे। सभी अष्टावक्र पर हंस रहे थे और अष्टावक्र सब लोगों पर। जनक ने पूछा- ‘हे बालक! सभी लोगों की हंसी समझ आती है, लेकिन तुम क्यों हंस रहे हो?

अष्टावक्र बोले- महाराज आपकी सभा चमारों की सभा है, जो मेरी चमड़ी की विकृति पर हंस रहे हैं, इनमें कोई विद्वान नहीं! ये चमड़े के पारखी हैं। मंदिर के टेढ़े होने से आकाश टेढ़ा नहीं होता है और घड़े के फूटे होने से आकाश नहीं फूटता है। इसके बाद शास्त्रार्थ में बंदी की हार हुई। अष्टावक्र ने बंदी को जल में डुबोने का आग्रह किया। बंदी बोला मैं वरुण-पुत्र हूं और सब हारे ब्राह्मणों को पिता से पास भेज देता हूं। मैं उनको वापस बुला लेता हूं। सभी हारे हुए ब्राह्मण वापस आ गए, उनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे। इसके बाद राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरु बना लिया और उनके आत्मज्ञान प्राप्त किया। राजा जनक और अष्टावक्र के इस संवाद को अष्टावक्र गीता के नाम से जाना जाता है।

💐💐शिक्षा:-💐💐

जैसे आभूषण के पुराने या कम सुंदर होने से सोने की कीमत कम नहीं हो जाती, वैसे शरीर की कुरूपता से आत्म तत्व कम नहीं होता। कभी किसी व्यक्ति के शरीर की सुंदरता को देखकर प्रभावित या किसी की कुरूपता को देखता घृणा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि शरीर तो हाड़-मांस से बना है। देखना है तो उसका ज्ञान, प्रेम और दिव्यता देखो, क्योंकि आत्मा सबका समान है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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अपनी क्षमता पहचानो

अपनी क्षमता पहचानो

एक गाँव में एक आलसी आदमी रहता था! वह कुछ काम-धाम नहीं करता था। बस दिन भर निठल्ला बैठकर सोचता रहता था कि किसी तरह कुछ खाने को मिल जाये।

एक दिन वह यूं ही घूमते-घूमते आम के एक बाग़ में पहुँच गया। वहाँ रसीले आमों से लदे कई पेड़ थे। रसीले आम देख उसके मुँह में पानी आ गया और आम तोड़ने वह एक पेड़ पर चढ़ गया लेकिन जैसे ही वह पेड़ पर चढ़ा, बाग़ का मालिक वहाँ आ पहुँचा।

बाग़ के मालिक को देख आलसी आदमी डर गया और जैसे-तैसे पेड़ से उतरकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ। भागते-भागते वह गाँव में बाहर स्थित जंगल में जा पहुँचा! वह बुरी तरह से थक गया था। इसलिए एक पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने लगा।

तभी उसकी नज़र एक लोमड़ी (Fox) पर पड़ी! उस लोमड़ी की एक टांग टूटी हुई थी और वह लंगड़ाकर चल रही थी।

लोमड़ी को देख आलसी आदमी सोचने लगा कि ऐसी हालत में भी इस जंगली जानवरों से भरे जंगल में ये लोमड़ी बच कैसे गई? इसका अब तक शिकार कैसे नहीं हुआ होगा?

जिज्ञासा में वह  एक पेड़ पर चढ़ गया और वहाँ बैठकर देखने लगा कि अब इस लोमड़ी के साथ आगे क्या होगा?

कुछ ही पल बीते थे कि पूरा जंगल शेर (Lion) की भयंकर दहाड़ से गूंज उठा! जिसे सुनकर सारे जानवर डरकर भागने लगे लेकिन लोमड़ी अपनी टूटी टांग के साथ भाग नहीं सकती थी – वह वहीं खड़ी रही।

शेर लोमड़ी के पास आने लगा! आलसी आदमी ने सोचा कि अब शेर लोमड़ी को मारकर खा जायेगा लेकिन आगे जो हुआ, वह कुछ अजीब था।

शेर लोमड़ी के पास पहुँचकर खड़ा हो गया!
उसके मुँह में मांस का एक टुकड़ा था – जिसे उसने लोमड़ी के सामने गिरा दिया। लोमड़ी इत्मिनान से मांस के उस टुकड़े को खाने लगी! थोड़ी देर बाद शेर वहाँ से चला गया।

यह घटना देख आलसी आदमी सोचने लगा कि भगवान सच में सर्वेसर्वा है – उसने धरती के समस्त प्राणियों के लिए चाहे वह जानवर हो या इंसान – खाने-पीने का  प्रबंध कर रखा है!

वह अपने घर लौट आया। घर आकर वह २-३ दिन तक बिस्तर पर लेटकर प्रतीक्षा करने लगा कि जैसे भगवान ने शेर के द्वारा लोमड़ी के लिए भोजन भिजवाया था, वैसे ही उसके लिए भी कोई न कोई खाने-पीने का सामान ले आएगा।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ! भूख से उसकी हालात ख़राब होने लगी। आख़िरकार उसे घर से बाहर निकलना ही पड़ा। घर के बाहर उसे एक पेड़ के नीचे बैठे हुए बाबा दिखाए पड़े। वह उनके पास गया और जंगल का सारा वृतांत सुनाते हुए वह बोला, “बाबा जी! भगवान मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? उनके पास जानवरों के लिए भोजन का प्रबंध है, लेकिन इंसानों के लिए नहीं।

बाबा जी ने उत्तर दिया, “बेटा! ऐसी बात नहीं है, भगवान के पास सारे प्रबंध है। दूसरों की तरह तुम्हारे लिए भी, लेकिन बात यह है कि वे तुम्हें लोमड़ी नहीं शेर बनाना चाहते हैं।

सचमुच में, हम सबके भीतर क्षमताओं का असीम भंडार है! अपनी अज्ञानतावश हम उन्हें पहचान नहीं पाते और स्वयं को कमतर समझकर दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
इसलिय –
स्वयं की क्षमता पहचानिए। दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा मत करिए। इतने सक्षम बनिए ताकि आप भी दूसरों की सहायता कर सकें।
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आपका जीवन मंगलमय बना रहे!

गुरु आज्ञा

गुरु आज्ञा

बहुत समय पहले की बात है एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे! उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे।

वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी!

“आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं।”

आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा ही किया।

ऋषिवर बोले , “प्रिय शिष्यों , आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है! मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें! यह एक बाधा दौड़ होगी और इसमें आपको कहीं कूदना तो कहीं पानी में दौड़ना होगा और इसके आखिरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से भी गुजरना पड़ेगा!” तो क्या आप सब तैयार हैं?”

”हाँ, हम तैयार हैं!”, शिष्य एक स्वर में बोले!

दौड़ शुरू हुई!

सभी तेजी से भागने लगे! वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुंचे! वहाँ बहुत अँधेरा था और उसमे जगह–जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे – जिनके चुभने पर असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था!

सभी असमंजस में पड़ गए! जहाँ अभी तक दौड़ में सभी एक सामान बर्ताव कर रहे थे! वहीं अब सभी अलग -अलग व्यवहार करने लगे!
खैर, सभी ने ऐसे-तैसे दौड़ ख़त्म की और ऋषिवर के समक्ष एकत्रित हुए।

“पुत्रों ! मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ बहुत जल्दी पूरी कर ली और कुछ ने बहुत अधिक समय लिया , भला ऐसा क्यों?” ऋषिवर ने प्रश्न किया।

यह सुनकर एक शिष्य बोला , “गुरु जी, हम सभी लगभग साथ–साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुचते ही स्थिति बदल गयी! कोई दुसरे को धक्का देकर आगे निकलने में लगा हुआ था तो कोई संभल -संभल कर आगे बढ़ रहा था और कुछ तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा-उठाकर अपनी जेब में रख ले रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगों को पीड़ा ना सहनी पड़े! इसलिए सब ने अलग-अलग समय में दौड़ पूरी की!”

“ठीक है ! जिन लोगों ने पत्थर उठाये हैं वे आगे आएं और मुझे वो पत्थर दिखाएँ”, ऋषिवर ने आदेश दिया.

आदेश सुनते ही कुछ शिष्य सामने आये और पत्थर निकालने लगे पर ये क्या जिन्हे वे पत्थर समझ रहे थे दरअसल वे बहुमूल्य हीरे थे! सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे।

“मैं जानता हूँ आप लोग इन हीरों के देखकर आश्चर्य में पड़ गए हैं!” ऋषिवर बोले।

“दरअसल इन्हें मैंने ही उस सुरंग में डाला था और यह अपने गुरुभाइयों के विषय में सोचने वालों शिष्यों को मेरा इनाम है।”

उन्होंने अपने शिष्यों को समझाया कि, पुत्रो, यह दौड़ जीवन की भागमभाग को दर्शाती है! जहाँ हर कोई कुछ न कुछ पाने के लिए भाग रहा है! पर अंत में वही सबसे समृद्ध होता है जो इस भागमभाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चूकता है।

उन्होंने आगे कहा कि, यहाँ से जाते-जाते इस बात को गाँठ बाँध लीजिये कि एक सदशिष्य को हमेशा अपने सहयोगी गुरु भाई-बहनों के प्रति प्रेम और करुणा का भाव होना चाहिए! तभी गुरुकृपा के पात्र बने रहेंगे और स्वांस रूपी हीरों को को समेटने में सहजता होगी!

यह प्रसंग से हम सभी गुरु भक्तों को भी यही प्रेरणा देता है कि हम भी आपस में मिलकर, एकजुट होकर, ईमानदारी के साथ अपने गुरु महाराजी की आज्ञा का पालन करते हुए – सेवा, सत्संग का आनन्द लें! तभी हम भी आनंद रुपी हीरे समेट पाएंगे!

अन्यथा गुरु आज्ञा ना मानने वालों के लिय कहा गया है कि –
गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल।
लोक वेद दोनों गए, आए सिर पर काल॥
कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं कि जो मनुष्य अपने गुरु की बात नहीं मानता और उसकी अवहेलना करता है वो गलत राह को चुनता है। धीरे-धीरे ऐसा मनुष्य दुनिया, समाज और धर्म से भी पतित हो जाता है और एक दिन ऐसा आता है जब वो सदा दुख व कष्टों से घिरा रहता हैं।

🙏🏾🙏🏿🙏🏻आपका हर पल आनन्दमय बना रहे!🙏🏼🙏🙏🏽