रिटायरमेंट के बाद का दर्द/फ्यूज बल्ब

रिटायरमेंट के बाद का दर्द/फ्यूज बल्ब

शहर जयपुर में बसे मालवीय नगर में एक आईएएस अफसर रहने के लिए आए जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे।‌ ये बड़े वाले रिटायर्ड आईएएस अफसर हैरान-परेशान से रोज शाम को पास के पार्क  में टहलते हुए अन्य लोगों को तिरस्कार भरी नज़रों से देखते और किसी से भी बात नहीं करते थे। एक दिन एक बुज़ुर्ग के पास शाम को गुफ़्तगू के लिए बैठे और फिर लगातार उनके पास बैठने लगे लेकिन उनकी वार्ता का विषय एक ही होता था – मैं भोपाल में इतना बड़ा आईएएस अफ़सर था कि पूछो मत, यहां तो मैं मजबूरी में आ गया हूं। मुझे तो दिल्ली में बसना चाहिए था- और वो बुजुर्ग प्रतिदिन शांतिपूर्वक उनकी बातें सुना करते थे। परेशान होकर एक दिन जब बुजुर्ग ने उनको समझाया – आपने कभी फ्यूज बल्ब देखे हैं? बल्ब के फ्यूज हो जाने के बाद क्या कोई देखता है‌ कि‌ बल्ब‌ किस कम्पनी का बना‌ हुआ था या कितने वाट का था या उससे कितनी रोशनी या जगमगाहट होती थी? बल्ब के‌ फ्यूज़ होने के बाद इनमें‌‌ से कोई भी‌ बात बिलकुल ही मायने नहीं रखती है।

लोग ऐसे‌ बल्ब को‌ कबाड़‌ में डाल देते‌ हैं है‌ कि नहीं! फिर जब उन रिटायर्ड‌ आईएएस अधिकारी महोदय ने सहमति‌ में सिर‌ हिलाया तो‌ बुजुर्ग फिर बोले‌ – रिटायरमेंट के बाद हम सब की स्थिति भी फ्यूज बल्ब जैसी हो‌ जाती है‌। हम‌ कहां‌ काम करते थे‌, कितने‌ बड़े‌/छोटे पद पर थे‌, हमारा क्या रुतबा‌ था,‌ यह‌ सब‌ कुछ भी कोई मायने‌ नहीं‌ रखता‌। मैं सोसाइटी में पिछले कई वर्षों से रहता हूं और आज तक किसी को यह नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रह चुका हूं। वो जो सामने वर्मा जी बैठे हैं, रेलवे के महाप्रबंधक थे। वे सामने से आ रहे मीणा साहब सेना में ब्रिगेडियर थे। वो बैरवा.. जी इसरो में चीफ थे। ये बात भी उन्होंने किसी को नहीं बताई है, मुझे भी नहीं पर मैं जानता हूं सारे फ्यूज़ बल्ब करीब – करीब एक जैसे ही हो जाते हैं, चाहे जीरो वाट का हो या 50 या 100 वाट हो। कोई रोशनी नहीं‌ तो कोई उपयोगिता नहीं। उगते सूर्य को जल चढ़ा कर सभी पूजा करते हैं। पर डूबते सूरज की कोई पूजा नहीं‌ करता‌। कुछ लोग अपने पद को लेकर इतने वहम में होते‌ हैं‌ कि‌ रिटायरमेंट के बाद भी‌ उनसे‌ अपने अच्छे‌ दिन भुलाए नहीं भूलते। वे अपने घर के आगे‌ नेम प्लेट लगाते‌ हैं – रिटायर्ड आइएएस‌/रिटायर्ड आईपीएस/रिटायर्ड पीसीएस/ रिटायर्ड जज‌ आदि – आदि। अब ये‌ रिटायर्ड IAS/IPS/PCS/तहसीलदार/ पटवारी/ बाबू/ प्रोफेसर/ प्रिंसिपल/ अध्यापक और न जाने कौन-कौन सी पोस्ट होती है भाई?माना‌ कि‌ आप बहुत बड़े‌ आफिसर थे‌, बहुत काबिल भी थे‌, पूरे महकमे में आपकी तूती बोलती‌ थी‌ पर अब क्या? अब यह बात मायने नहीं रखती है। बल्कि मायने‌ रखती है‌ कि पद पर रहते समय आप इंसान कैसे‌ थे, आपने आम लोगों को कितनी तवज्जो दी, समाज को क्या दिया, मित्र बन्धुओं के कितने काम आएं, समाज के  कितने लोगों की मदद की या सिर्फ घमंड मे ही सूजे हुए रहे? पद पर रहते हुए कभी घमंड आये तो बस याद कर लीजिए कि एक दिन सबको फ्यूज होना है।

शिक्षा

यह पोस्ट उन लोगों के लिए आईना है जो पद और सत्ता होते हुए कभी अपनी कलम से समाज का हित नहीं कर सकते। और रिटायरमेंट होने के बाद समाज के लिए बड़ी चिंता होने लगती है। अभी भी वक्त है इस पोस्ट को पढ़िए, चिंतन करिए तथा समाज का यथासंभव हित कीजिए। अपने पद रूपी बल्ब से समाज व देश को रोशन करिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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परमात्मा को पाने के लिए खुद को समर्पित करो!

परमात्मा को पाने के लिए खुद को समर्पित करो!

एक गाँव में यज्ञ हो रहा था और गाँव का राजा एक बकरे की बलि चढ़ा रहा था।

भगवान बुद्ध गाँव से गुज़र रहे थे तो वो वहाँ पहुँच गए और उन्होंने उस राजा को कहा कि, “ये क्या कर रहे हो? इस बकरे को किसलिए चढ़ा रहे हो?”

तो राजा ने कहा कि, “इसके चढ़ाने से बड़ा पुण्य होता है।”

तब बुद्ध ने कहा, “मुझे चढ़ा दो, तो और भी ज़्यादा पुण्य होगा।”

राजा थोड़ा डरा और विचारशुन्य होकर मन ही मन सोचने लगा कि बकरे को चढ़ाने में कोई हर्ज़ा नहीं है लेकिन बुद्ध को चढ़ाना! उसके भी हाथ-पैर कांपने लगे!

भगवान बुद्ध ने कहा कि, “अगर सच में ही कोई लाभ करना हो तो अपने आप को चढ़ा दो। बकरा चढ़ाने से क्या होगा?”

उस राजा ने कहा, “इस बकरे का कोई नुकसान नहीं है, स्वर्ग चला जाएगा।”

बुद्ध ने कहा, “ये बहुत ही अच्छा है, मैं स्वर्ग की ही तलाश कर रहा हूँ, तुम मुझे चढ़ा दो। तुम मुझे स्वर्ग भेज दो और तुम अपने माता-पिता को क्यों नहीं भेजते स्वर्ग और ख़ुद को क्यों रोके हुए हो?

जब तुमको स्वर्ग जाने की ऐसी सरल और सुगम तरकीब मिल ही गई है तो काट लो गर्दन।
बकरे को बेचारे को क्यों भेज रहे हो? जो शायद जाना भी न चाहता हो स्वर्ग!

बकरे को ख़ुद ही चुनने दो कि कहाँ उसे जाना है।”

राजा को बात समझ में आयी क्योंकि भगवान बुद्ध ने सहजता से कटु सत्य कहा था!

उन्होंने आगे कहा कि तुमने परमात्मा को सब चढ़ाया है- धन चढ़ाया, फूल चढ़ाए। जबकि फूल भी तुम्हारे नहीं… वो भी परमात्मा के हैं! वृक्षों पर पहले से चढ़े ही हुए थे।

उन फूलों का वृक्षों पर सजीव रूप में खिलना, सुगंध देना क्या परमात्मा के चरणों में चढ़ना नहीं था?

वृक्षों के ऊपर से उनकी परमात्मा की यात्रा हो ही रही थी। वहीं तो जा रही थी वह सुगन्ध और कहाँ जाती?

तुमने उनको वृक्षों से तोड़ के उन फूलों को मुर्दाकर लिया और फिर मुर्दा फूलों को जाकर मन्दिर में चढ़ा आए और समझने लगे कि बड़ा काम कर आए हो!

कभी धूप-दीप जलाए तो कभी जानवर चढ़ाए तो कभी आदमी भी चढ़ा दिए!

अपने को कब चढ़ाओगे?

और सत्य यही है कि जो अपने को चढ़ाता है, खुद को पूर्ण रूप से समर्पित करता है – वही उस परमात्मा को पाता है।

इसलिए, अगर जीते जी स्वर्ग का अनुभव करना चाहते हो, भगवान के लिए कुछ करना चाहते हो, उनको प्रसन्न करना चाहते हो तो *खुद को ही भेंट स्वरूप चढ़ाओ – तभी उनसे भेट होगी! खुद को समर्पित किये बिना कुछ भी नहीं हो सकता!
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एक कौवा एक वन में रहा करता था,उसे कोई कष्ट नहीं था और वह अपने जीवन से पूरी तरह सन्तुष्ट था!

एक कौवा एक वन में रहा करता था,उसे कोई कष्ट नहीं था और वह अपने जीवन से पूरी तरह सन्तुष्ट था!

एक दिन उड़ते हुए वह एक सरोवर के किनारे पहुँचा! वहाँ उसने एक उजले सफ़ेद हंस को तैरते हुए देखा।

उसे देखकर वह सोचने लगा – “यह हंस कितना सौभाग्यशाली है, जो इतना सफेद और सुन्दर है। इधर मुझे देखो, मैं कितना काला और बदसूरत हूँ।ये हंस अवश्य इस दुनिया का सबसे खुश पक्षी होगा!”

वह हंस के पास गया और अपने मन की बात उसे बता दी। सुनकर हंस बोला, “नहीं मित्र! वास्तव में ऐसा नहीं है।

पहले मैं भी सोचा करता था कि मैं इस दुनिया का सबसे सुन्दर पक्षी हूँ. इसलिए बहुत सुखी और खुश था लेकिन एक दिन मैंने तोते को देखा; जिसके पास दो रंगों की अनोखी छटा है!

उसके बाद से मुझे यकीन हुआ कि वही दुनिया का सबसे सुन्दर और खुश पक्षी है”

हंस की बात सुनने के बाद कौवा तोते के पास गया और उससे पूछा कि क्या वह दुनिया का सबसे खुश पक्षी है?

तोते ने उत्तर दिया, “मैं बहुत ही खुशगवार जीवन व्यतीत कर रहा था! लेकिन जब मैंने मोर को देखा था तो अब मुझे लगता है कि मोर से सुन्दर तो कोई हो ही नहीं सकता। इसलिये मेरी समझ से वही दुनिया का सबसे सुखी और खुश पक्षी है।

इसके बाद कौवा मोर की खोज में निकला उड़ते-उड़ते वह एक चिड़ियाघर पहुँचा! वहाँ उसने देखा कि *मोर एक पिन्जरे में बन्द है और उसे देखने के लिए बहुत सारे लोग जमा हैं और सभी मोर की बहुत सराहना कर रहे थे!

सबके जाने के बाद कौवा मोर के पास गया और उससे बोला, “तुम कितने सौभाग्यशाली हो, जो तुम्हारी सुन्दरता के कारण हर रोज़ हजारों लोग तुम्हें देखने आते हैं! मुझे तो लोग अपने आस-पास भी फटकने नहीं देते और देखते ही भगा देते हैं! तुम इस दुनिया के सबसे खुश पक्षी हो ना?”

कौवे की बात सुनकर मोर उदास हो गया।

वह बोला, “मित्र! मुझे भी अपनी सुन्दरता पर बड़ा गुमान था।

मैं सोचा करता था कि मैं इस दुनिया का क्या, बल्कि इस पूरे ब्रम्हाण्ड का सबसे सुन्दर पक्षी हूंँ। इसलिए खुश भी बहुत था। लेकिन मेरी यही सुन्दरता मेरी शत्रु बन गई है और मैं इस चिड़ियाघर में बन्द हूंँ।

यहांँ आने के बाद इस पूरे चिड़ियाघर का अच्छी तरह मुआयना करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंँचा हूंँ कि कौवा ही एक ऐसा पक्षी है जो यहांँ कैद नहीं है।

इसलिए पिछले कुछ दिनों से मैं सोचने लगा हूंँ कि काश मैं कौवा होता तो कम से कम आजादी से बाहर घूम सकता और तब मैं इस दुनिया का सबसे सुखी और खुश पक्षी होता।

हम भी अपने जीवन में हमेशा दूसरों को देखकर स्वयंँ की तुलना व्यर्थ ही उनसे करने लगते हैं और दुखी हो जाते हैं! भगवान ने सब को अलग बनाया है और अलग गुण दिए हैं! हम उसका महत्व नहीं समझते और अपनी ही तुलनात्मक दृष्टि के कारण दुख के चक्र में फंँस जाते हैं। इसलिए दूसरों के पास जो है उसे देखकर ईर्ष्या करने की बजाय यह सोचने के कि हमें हमारे पास जो भी है उसके साथ खुश रहना सीखना चाहिए; खुशी बाहर ढूंढने से नहीं मिलती, वह तो हमारी अन्दर ही छिपी हुई है।

इस ईर्ष्या का त्याग केवल मात्र भजन सुमिरणसे ही हो सम्भव है इसलिए हमें श्री गुरु महाराज जी की आज्ञा में रहकर भजन सुमिरण करना चाहिए। अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।

सुमति

सुमति

एक बार किसी ने तुलसी दास जी से पूछा — महाराज ! सम्पूर्ण रामायण का सार क्या है ?
क्या कोई चौपाई ऐसी है जिसे हम सम्पूर्ण रामायण का सार कह सकते हैं ? तुलसी दास जी ने कहा -हाँ है, और वह है।

जहां सुमति तह सम्पत्ति नाना
जहां कुमति तहँ विपत्ति आना

जहां सुमति होती है, वहां हर प्रकार की सम्पत्ति, सुख-सुविधाएं होती है!
और जहां कुमति होती है, वहां विपत्ति, दुःख और कष्ट पीछा नहीं छोड़ते।

सुमति थी अयोध्या में – भाई-भाई में प्रेम था, पिता और पुत्र में प्रेम था, राजा-प्रजा में प्रेम था, सास-बहू में प्रेम था और मालिक-सेवक में प्रेम था, तो उजड़ी हुई अयोध्या फिर से बस गई।

कुमति थी लंका में तो – एक भाई ने दूसरे भाई को लात मारकर निकाल दिया। कुमति और अनीति के कारण सोने की लंका राख का ढेर हो गई।

गुरु वाणी में आता है।
इक लख पूत सवा लख नाती
ता रावण घर दीया ना बाती

पाँच पाण्डवों में सुमति थी तो उन पर कितनी विपदाएं आई, लेकिन अंत में विजय उनकी ही हुई और हस्तिनापुर में उनका राज्य हुआ।
कौरवों में कुमति थी अनीति थी, अनाचार था, अधर्म था, तो उनकी पराजय हुई और सारे भाई मारे गए।

यदि जीवन को सुखी बनाना चाहते हैं तो जीवन में सुमति अपनाओ।

कैकयी को दण्ड

कैकयी को दण्ड

एक दिन संध्या के समय सरयू के तट पर तीनों भाइयों के संग टहलते श्रीराम से महात्मा भरत ने कहा -एक बात पूछूँ, भइया? माता कैकई ने आपको वनवास दिलाने के लिए मंथरा के साथ मिल कर जो षड्यंत्र किया था – क्या वह राजद्रोह नहीं था?
उनके षड्यंत्र के कारण एक ओर राज्य के भावी महाराज और महारानी को चौदह वर्ष का वनवास झेलना पड़ा और दूसरी ओर पिता महाराज की दुखद मृत्यु हुई! ऐसे षड्यंत्र के लिए सामान्य नियमों के अनुसार तो मृत्युदंड दिया जाता है, फिर आपने माता कैकई को दण्ड क्यों नहीं दिया?

राम मुस्कुराए! बोले ~ जानते हो भरत, किसी कुल में एक चरित्रवान और धर्मपरायण पुत्र जन्म ले ले, तो उसका जीवन उसके असंख्य पीढ़ी के पितरों के अपराधों का प्रायश्चित कर देता है! जिस माँ ने तुम जैसे महात्मा को जन्म दिया हो, उसे भला दण्ड कैसे दिया जा सकता है भरत?

भरत संतुष्ट नहीं हुए और कहा ~ यह तो मोह है भइया और राजा का दण्डविधान मोह से मुक्त होता है! एक राजा की तरह उत्तर दीजिये कि आपने माता को दंड क्यों नहीं दिया?

यही समझिए कि आपसे यह प्रश्न आपका अनुज नहीं बल्कि अयोध्या का एक सामान्य नागरिक कर रहा है!

राम गम्भीर हो गए! कुछ क्षण के मौन के बाद कहा ~ अपने सगे-सम्बन्धियों को किसी अपराध पर कोई दण्ड न देना ही इस सृष्टि का कठोरतम दण्ड है भरत!

माता कैकई ने अपनी एक भूल का बड़ा कठोर दण्ड भोगा है! वनवास के चौदह वर्षों में – हम चारों भाई अपने-अपने स्थान से परिस्थितियों से लड़ते रहे हैं पर माता कैकई? हर क्षण मरती रही हैं! अपनी एक भूल के कारण! उन्होंने अपना पति खोया, अपने चार बेटे खोए, अपना समस्त सुख खोया फिर भी वे उस अपराधबोध से कभी मुक्त न हो सकीं! वनवास समाप्त हो गया तो परिवार के शेष सदस्य प्रसन्न और सुखी हो गए पर वे कभी प्रसन्न न हो सकीं! कोई राजा किसी स्त्री को इससे कठोर दंड क्या दे सकता है?

उन्होंने आगे समझाया कि मैं तो सदैव यह सोच कर दुखी हो जाता हूँ कि मेरे कारण अनायास ही मेरी माँ को इतना कठोर दण्ड भोगना पड़ा!

राम के अश्रुपूरित नेत्रों को देख भरत आदि भाई मौन हो गए थे!

राम ने फिर कहा ~ भरत भाई, उनकी भूल को अपराध समझना ही क्यों? यदि मेरा वनवास न हुआ होता तो संसार भरत और लक्ष्मण जैसे भाइयों के अतुल्य भ्रातृप्रेम को कैसे देख पाता? मैंने तो केवल अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन मात्र किया था पर तुम दोनों ने तो मेरे स्नेह में चौदह वर्ष का वनवास भोगा! वनवास न होता तो यह संसार सीखता कैसे कि भाइयों का सम्बन्ध होता कैसा है?

भरत के प्रश्न मौन हो गए थे! वे अनायास ही बड़े भाई राम के चरणों में नतमस्तक हो गये!
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बुरे वक्त मे ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता काट खाता है

बुरे वक्त मे ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता काट खाता है

   वैसे तो साथियों जीवन का नाम ही समस्या है अर्थात जिस जीवन में समस्या नहीं है वह जीवन किसी काम का नहीं होता समस्याएं जीवन का एक अभिन्न अंग है जीवन में आती रहती है जाती रहती लेकिन यदि आपके जीवन इस तरह की आकस्मिक घटना या समस्या आ जाये जो सोची भी ना जा सकती हो और ना जिसका कोई हल हो तो उसे क्या कहोगे . आपने एक कहावत सुनी  होगी जब आदमी का वक्त खराब होता है तो ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता काट लेता है .  शायद कहावत के शब्दो को आप जान गये परन्तु कहावत के असली मर्म को नही जाने कि आखिर कुत्ता इतने उँचे ऊँट पर बैठे आदमी को कैसे काट सकता है .
आईये मै बताता हू . कुत्ता कैसे काटता है . दोनो सच्ची घटना है . एक भारत की है और एक अमेरिका की .
1978 की बात हे दिल्ली की सड़को  एक भाई साहब जून की भरी दोपहरी मे स्कूटर पर कही जा रहे थे . गर्मी के कारण हेलमेट से  सिर पर पसीना था . सामने रेड लाईट थी . रुक गये . सडक के किनारे पेड था जिसकी छाव सडक पर आ रही थी . भाई साहब ने हेलमेट उतारा ताकी छाँव और हवा से पसीने मे कुछ राहत मिले . उसी समय आसमान मे एक चील अपनी चोच मे जहरीले सांप को लिये जा रही थी . अचानक सांप की हिलने डुलने की कोशिश से चील की चोच ढीली हो गई .सांप छूट कर नीचे गिरा . 

कहाँ गिरा ? आदमी की खोपडी पर जिसने अभी अभी गर्मी से बचने के लिये हेलमेट उतारा था . सांप खोपडी पर गिरा और गिरते ही आत्मरक्षा के भाव से भाई को डस लिया . पब्लिक जब तक कुछ समझती तब तक भाई साहब रेड लाईट पर ही रेड हो गये . चलते चलते हमेशा के लिये ग्रीन लाईट रेड हो गई .
नही नही विश्वास करो ये काल्पनिक नही सच्ची घटना है .
दूसरी घटना इससे भी दिलचस्प है . अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया के एक जंगल मे आग लगी . फौरन फायर बिग्रेड चेतन हुई . आग पर काबू पाने के लिये पानी से भरे अपने हैलीकाप्टर भेजे . पानी बरसाकर आग तो शान्त हो गई . पर पुलिस जंगल मे देखने गई कि कही नुक्सान ज्यादा तो नही हो गया . वहाँ जंगल मे उन्होने देखा एक व्यक्ति आग से भूना पडा है . उसने स्विमिंग सूट पहन रखा है . पुलिस बडे असमंजस मे कि ये आदमी स्विमिंग सूट मे यहाॅ क्या कर रहा था . जंगल मे कोई तालाब या स्विमिंग पूल भी नही था कि नहाने आया हो . फिर ये कैसे सम्भव है ? पुलिस हैरान कि ये व्यक्ति स्विमिंग सूट पहनकर जंगल मे करने क्या आया था ?
भारत होता तो कोई परवाह नही करता ना कोई सोचता . मर गया तो मर गया आग तो बुझ गई . परन्तु अमेरिकी पुलिस ने जांच बैठा दी और पता लगाने की कोशिश की ये व्यक्ति था कौन और स्विमिंग सूट मे सूनसान जंगल मे करने क्या आया था ? जो एक असम्भव बात थी .
जाच की रिसर्च से पता चला जब हैलीकाप्टर उपर उडकर पानी बरसा रहे थे तो कुछ हैलीकोप्टर जिनका पानी खत्म हो गया था पानी लेने के लिये जंगल से थोड़ी दूर एक स्विमिंग पूल मे पानी भरने गये . वहाँ उन्हे ये व्यक्ति दिखाई ही नही दिया . पानी भरने की जल्दबाजी मे पायलट ध्यान ही नही पाया या हो सकता है भाई साहब ने शैखी बघारने के लिये डुबकी लगाई हो कि देखो मै कितनी बडी डुबकी लगाता हू . तभी हैलीकोप्टर ने पानी खिचना शुरू किया . हैलीकोप्टर का पम्प बहुत मजबूत था . शक्तिशाली था . जब पानी खीचा तो भाई साहब ने डुबकी लगाई और पम्प ने भाई साहब को पानी के साथ खींच लिया . भाई साहब सोच रहे थे कि अरे ये क्या हुआ डुबकी पानी मे लगाई और मै आसमान मे उड रहा हू . ये कैसे हो गया ? जब तक समझ पाते हैलीकोप्टर ने सारा पानी जंगल मे बिखरा गया . भाई साहब भी पानी के साथ जंगल की आग मे फेंक दिये गये और आग मे भून गये .
कोई काल्पनिक कहानी नही सच्ची घटना है . ये कहानी डिस्कवरी पर मैंने खुद देखी है .
बिलकुल सच्ची घटना है दोनो .
अब आप बताईये दोनो भाई साहब अपने आप को सुरक्षित समझ रहे थे मगर हुआ क्या ? उन्होंने इसकी कल्पना भी नही की होगी .
इसे ही कहते है बुरा वक्त जब आता है ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता खाट खाता है .
वैसे ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ते ने कैसे काटा ये अलग कहानी है जो कहावत बन गई . वैसे बता दू कुत्ते ने सममुच ही ऊँट पर बैठे आदमी को काटा था . पर कैसे ? ये अलग तरह की अजब कहानी है . फिर कभी बताऊंगा .
तब तक आप इसी तरह की अन्प कहानी ध्यान मे लाते रहो . मुझे बताना भी .
🙂
🙏🏻 जय भारत 🇮🇳

पिता-पुत्र

पिता-पुत्र

एक पुत्र अपने वृद्ध पिता को रात्रिभोज के लिये एक अच्छे रेस्टोरेंट में लेकर गया। खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया। रेस्टोरेंट में बैठे दूसरे खाना खा रहे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे लेकिन उसका पुत्र शांत था।

खाने के बाद पुत्र बिना किसी शर्म के वृद्ध को वॉशरूम ले गया। उनके कपड़े साफ़ किये, चेहरा साफ़ किया, बालों में कंघी की, चश्मा पहनाया, और फिर बाहर लाया। सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे।

फ़िर उसने बिल का भुगतान किया और वृद्ध के साथ बाहर जाने लगा। तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने उसे आवाज दी, और पूछा – क्या तुम्हें नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो?

उसने जवाब दिया – नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा।

वृद्ध ने कहा – बेटे, तुम यहाँ प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा, सबक और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद छोड़कर जा रहे हो।

आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नहीं करते,
और कहते हैं – क्या करोगे, आपसे चला तो जाता नहीं, ठीक से खाया भी नहीं जाता, आप तो घर पर ही रहो, वही अच्छा होगा।

लेकिन क्या आप भूल गये कि जब आप छोटे थे, और आपके माता पिता आपको अपनी गोद में उठाकर ले जाया करते थे। आप जब ठीक से खा नहीं पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी, और खाना गिर जाने पर डाँट नही प्यार जताती थी।

फिर वही माँ बाप बुढ़ापे में बोझ क्यों लगने लगते हैं?

माँ-बाप भगवान का रूप होते हैं। उनकी सेवा कीजिये, और प्यार दीजिये क्योंकि एक दिन आप भी बूढ़े होंगे।

शिक्षा:-अपने माता पिता का सर्वदा सम्मान करें..!!

जय श्रीराम

शुभरात्री

सच्ची लगन

सच्ची लगन

एक शख्स सुबह सवेरे उठा साफ़ कपड़े पहने और सत्संग घर की तरफ चल दिया ताकि सतसंग का आनंद प्राप्त कर सके।

चलते चलते रास्ते में ठोकर खाकर गिर पड़ा, कपड़े कीचड़ से सन गए वापस घर आया।

कपड़े बदलकर वापस सत्संग की तरफ रवाना हुआ फिर ठीक उसी जगह ठोकर खा कर गिर पड़ा और वापस घर आकर कपड़े बदले, फिर सत्संग की तरफ रवाना हो गया।

जब तीसरी बार उस जगह पर पहुंचा तो क्या देखता है की एक शख्स चिराग हाथ में लिए खड़ा है और उसे अपने पीछे पीछे चलने को कह रहा है।

इस तरह वो शख्स उसे सत्संग घर के दरवाज़े तक ले आया।

पहले वाले शख्स ने उससे कहा आप भी अंदर आकर सतसंग सुन लें।

लेकिन वो शख्स चिराग हाथ में थामे खड़ा रहा और सत्संग घर में दाखिल नही हुआ।

दो तीन बार इनकार करने पर उसने पूछा आप अंदर क्यों नही आ रहे है …

दूसरे वाले शख्स ने जवाब दिया “इसलिए क्योंकि

मैं काल हूँ,

ये सुनकर पहले वाले शख्स की हैरत का ठिकाना न रहा।

काल ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा मैं ही था जिसने आपको ज़मीन पर गिराया था।

जब आपने घर जाकर कपड़े बदले और दुबारा सत्संग घर की तरफ रवाना हुए तो आपके गुरु ने आपके सारे पाप क्षमा कर दिए।

जब मैंने आपको दूसरी बार गिराया और आपने घर जाकर फिर कपड़े बदले और फिर दुबारा जाने लगे तो आपके गुरु ने आपके पूरे परिवार के गुनाह क्षमा कर दिए।

मैं डर गया की अगर अबकी बार मैंने आपको गिराया और आप फिर कपड़े बदलकर चले गए तो कहीं ऐसा न हो वह आपके सारे गांव के लोगो के पाप क्षमा कर दे। इसलिए मैं यहाँ तक आपको खुद पहुंचाने आया हूँ।

अब हम देखे कि उस शख्स ने दो बार गिरने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और तीसरी बार फिर पहुँच गया और एक हम हैं यदि हमारे घर पर कोई मेहमान आ जाए या हमें कोई काम आ जाए तो उसके लिए हम सत्संग छोड़ देते हैं, भजन जाप छोड़ देते हैं।

क्यों…

क्योंकि हम जीव अपने गुरु से ज्यादा दुनिया की चीजों और रिश्तेदारों से ज्यादा प्यार करते हैं।

उनसे ज्यादा मोह हैं। इसके विपरीत वह शख्स दो बार कीचड़ में गिरने के बाद भी तीसरी बार फिर घर जाकर कपड़े बदलकर सत्संग घर चला गया।

क्यों…

क्योंकि उसे अपने दिल में गुरु के लिए बहुत प्यार था। वह किसी कीमत पर भी अपनी बंदगीं का नियम टूटने नहीं देना चाहता था।

इसीलिए काल ने स्वयं उस शख्स को मंजिल तक पहुँचाया, जिसने कि उसे दो बार कीचड़ में गिराया और मालिक की बंदगी में रूकावट डाल रहा था, बाधा पहुँचा रहा था !

इसी तरह हम जीव भी जब हम भजन-सिमरन पर बैठे तब हमारा मन चाहे कितनी ही चालाकी करे या कितना ही बाधित करे, हमें हार नहीं माननी चाहिए और मन का डट कर मुकाबला करना चाहिए

बस हमें भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और न ही किसी काम के लिए भजन सिमरन में ढील देनी हैं। वह मालिक आप ही हमारे काम सिद्ध और सफल करेगा।
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“मैं न होता, तो क्या होता?” – सुंदरकांड का एक प्रेरक प्रसंग है जब

“मैं न होता, तो क्या होता?”

सुंदरकांड का एक प्रेरक प्रसंग है जब “अशोक वाटिका” में जिस समय रावण क्रोध में भरकर, तलवार लेकर, सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा
तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर, इसका सिर काट लेना चाहिये!

किन्तु, अगले ही क्षण, उन्होंने देखा कि, “मंदोदरी” ने रावण का हाथ पकड़ लिया !

यह देखकर वे गदगद हो गये! वे सोचने लगे, यदि मैं आगे बढ़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मैं न होता, तो सीता जी को कौन बचाता?

बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मैं न होता तो क्या होता ?

परन्तु ये क्या हुआ? सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया! तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं!

आगे चलकर जब “त्रिजटा” ने कहा कि “लंका में बंदर आया हुआ है, और वह लंका जलायेगा!”

तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है!
और त्रिजटा कह रही है कि उन्होंने स्वप्न में देखा है -एक वानर ने लंका जलाई है! अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा!

जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े, तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की

और जब “विभीषण” ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है!
आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नहीं जायेगा, पर पूंछ में कपड़ा लपेट कर, घी डालकर, आग लगाई जाये!

तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी! वरना लंका को जलाने के लिए मैं कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता, और कहां आग ढूंढता? पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया!

जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं, तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

इसलिये सदैव याद रखें, कि संसार में जो हो रहा है, वह सब ईश्वरीय विधान है!

हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं! इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि मैं न होता, तो क्या होता ?

आज विश्व शान्ति दिवस मानाने की गूंज सब जगह सुनायी पड रही है लेकिन शांति संभव है! का व्यावहारिक बीड़ा आज हमारे गुरु महाराजी ने उठाया है! उन्होंने इसी मिशन के लिय अपना पूरा जीवन समर्पित किया है!

उनके प्रयास विश्व पटल पर किसी से छुपे नहीं हैं! वे शांति के प्रति के दवा मात्र नहीं करते बल्कि हर मनुष्य के अन्दर उसका अनुभव करने की विधि भी प्रदान करते हैं! आज का मानव जिस सुख शान्ति की खोज बाहर की दुनिया में कर रहा है – उनका कहना है कि शान्ति विश्व को नहीं चाहिय बल्कि हर एक मनुष्य के हृदय में होनी चाहिय; जिसे बनाने वाले ने पहले से ही वह शांति हर एक के अन्दर रखी हुई है और उसको जीते जी महसूस भी किया जा सकता है!

इससे सरल और सहज बात क्या ही हो सकती है!

शान्तिदूत के रूप में सुविख्यात श्री प्रेम रावत जी (जिनको लोग प्रेम से महाराजी के नाम से भी जानते हैं) इस मुहिम की अलख बाल्यावस्था से ही पूरे संसार में जगा रहे हैं और उनके साथ पूरे संसार में असंख्य स्वयंसेवक हैं जिनको उन्होंने इसका व्यावहारिक बोध कराया है वे भी उनके इस मानवता और शांति के संदेश को जन जन तक पहुचाने में उनकी मदद कर रहे हैं!

आज के दिन पुनः हम सभी गुरु भक्तों के लिय गर्व का विषय हैं कि हमें शान्ति के अग्रदूत श्री प्रेम रावत जी से वह अनुपम उपहार ही नहीं मिला बल्कि उन्होंने हर गुरुभक्त के लिय इस शांति के संदेश में सहभागी बनने के दरवाजे भी खोल दिए हैं!

इसलिय, हम सभी गुरुभक्तो को भक्त हनुमान की तरह अपने सदगुरु का सिपाही बनकर सेवा का लाभ लेना है! ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि सेवा और विनम्रता की ताकत से हुनमान जी की आज भी पूजा की जाती है और उनको अजर अमर माना जाता है!

उपरोक्त प्रसंग हम सभी गुरु भक्तों के लिय अनुकरणीय और प्रेरणादायक बन जाता है जब हम भी शान्ति के सन्देशवाहक बनकर महाराजी के कार्य में सहभागी बनने की इच्छा रखते हैं! आत्मज्ञान की अनुभूति के साथ ही हम सभी गुरु भक्तों को आत्म मंथन करना होगा कि -ऐसे पुनीत कार्य का हिस्सा बनने के लिय क्या हम भक्त हुनमान की तरह पूर्ण समर्पित भाव रखते हैं या नहीं!

आप सभी को विश्व शान्ति दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं!
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जब मन सच्चा हो और इरादे नेक हो तो भगवन को भी आना पड़ता है, अपने भगत के लिये…!

एक बार सतगुरु जी सत्संग करके आ रहे थे रास्ते में गुरुजी का मन चाय पीने को हुआ उन्होंने अपने ड्राइवर को कहा हमे चाय पीनी है।

”ड्राइवर गाड़ी ५ स्टार होटल के आगे खड़ी कर दी।

गुरु जी ने कहा- “नहीं आगे चलो यहाँ नहीं।”

फिर ड्राइवर ने गाड़ी किसी होटल के आगे खड़ी कर दी।
गुरु जी ने वह भी मना कर दिया काफी आगे जाकर एक छोटी सी ढाबे जैसी एक दुकान आई।

गुरु जी ने कहा- “यहाँ रोक दो यहाँ पर पीते हैं चाय।”

ड्राइवर सोचने लगा कि अच्छे से अच्छे होटल को छोड़ कर गुरु जी ऐसी जगह चाय पीएंगे खैर वो कुछ नहीं बोला। ड्राइवर चाय वाले के पास गया और बोला-“अच्छी सी चाय बना दो।

”जब दुकानदार ने पैसों वाला गल्ला खोला तो उसमे गुरु जी का स्वरुप फोटो लगा हुआ था।

गुरु जी का स्वरुप देख कर ड्राइवर ने दुकानदार से पूछा-“तुम इन्हें जानते हो, कभी देखा है इन्हें?”

तो दुकानदार ने कहा- “मैंने इनको देखने जाने के लिए पैसे इकठे किये थे। जो कि चोरी हो गए, और मैं नहीं जा पाया। पर मुझे यकीन है कि गुरु जी मुझे यही आ कर मिलेंगे।”

ड्राइवर ने कहा-“जाओ और चाय उस कार मैं दे कर आओ।”

तो दुकानदार ने बोला- “अगर मैं चाय देने के लिए चला गया तो कहीं फिर से मेरे पैसे चोरी न हो जायें।”

तो ड्राइवर ने कहा- “चिंता मत करो अगर ऐसा हुआ तो मैं तुम्हारे पैसे अपनी जेब से दूंगा।”

दुकानदार चाय कार मैं देने के लिए चला गया जब वहां उसने गुरु जी को देखा तो हैरान हो गया।

आँखों में आंसू देखे तो गुरू जी ने कहा- “तूने कहा था कि मैं तुम्हे यहीं मिलने आऊं और अब मैं तुमको मिलने आया हूँ तो तुम रो रहे हो।”

इतना प्यार था उस आदमी के अन्दर आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

जब मन सच्चा हो और इरादे नेक हो तो भगवन को भी आना पड़ता है, अपने भगत के लिये…!