कर्मो का हिसाब

कर्मो का हिसाब

एक भिखारी रोज एक दरवाजें पर जाता और भीख के लिए आवाज लगाता, और जब घर मालिक बाहर आता तो उसे गंदीगंदी गालिया और ताने देता, मर जाओ, काम क्यूं नही करतें, जीवन भर भीख मांगतें रहोगे, कभी कभी गुस्सें में उसे धकेल भी देता, पर भिखारी बस इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें।

एक दिन सेठ बड़े गुस्सें में था, शायद व्यापार में घाटा हुआ था, वो भिखारी उसी वक्त भीख मांगने आ गया, सेठ ने आव देखा ना ताव, सीधा उसे पत्थर से दे मारा, भिखारी के सर से खून बहने लगा, फिर भी उसने सेठ से कहा ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें, और वहां से जाने लगा, सेठ का थोड़ा गुस्सा कम हुआ, तो वहां सोचने लगा मैंने उसे पत्थर से भी मारा पर उसने बस दुआ दी, इसके पीछे क्या रहस्य है जानना पड़ेगा, और वहां भिखारी के पीछे चलने लगा।

भिखारी जहाँ भी जाता सेठ उसके पीछे जाता, कही कोई उस भिखारी को कोई भीख दे देता तो कोई उसे मारता, जालील करता गालियाँ देता, पर भिखारी इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें, अब अंधेरा हो चला था, भिखारी अपने घर लौट रहा था, सेठ भी उसके पीछे था, भिखारी जैसे ही अपने घर लौटा, एक टूटी फूटी खाट पे, एक बुढिया सोई थी, जो भिखारी की पत्नी थी, जैसे ही उसने अपने पति को देखा उठ खड़ी हुई और भीख का कटोरा देखने लगी, उस भीख के कटोरे मे मात्र एक आधी बासी रोटी थी, उसे देखते ही बुढिया बोली बस इतना ही और कुछ नही, और ये आपका सिर कहां फूट गया?

भिखारी बोला, हाँ बस इतना ही किसी ने कुछ नही दिया सबने गालियां दी, पत्थर मारें, इसलिए ये सर फूट गया, भिखारी ने फिर कहा सब अपने ही पापों का परिणाम हैं, याद है ना तुम्हें, कुछ वर्षो पहले हम कितने रईस हुआ करते थे, क्या नही था हमारे पास, पर हमने कभी दान नही किया, याद है तुम्हें वो अंधा भिखारी, बुढिया की ऑखों में ऑसू आ गये और उसने कहा हाँ, कैसे हम उस अंधे भिखारी का मजाक उडाते थे, कैसे उसे रोटियों की जगह खाली कागज रख देते थे, कैसे हम उसे जालील करते थे, कैसे हम उसे कभी_कभी मार या धकेल देते थे, अब बुढिया ने कहा हाँ सब याद है मुझे, कैसे मैंने भी उसे राह नही दिखाई और घर के बनें नालें में गिरा दिया था, जब भी वहाँ रोटिया मांगता मैंने बस उसे गालियाँ दी, एक बार तो उसका कटोरा तक फेंक दिया।और वो अंधा भिखारी हमेशा कहता था, तुम्हारे पापों का हिसाब ईश्वर करेंगे, मैं नही, आज उस भिखारी की बद्दुआ और हाय हमें ले डूबी,

फिर भिखारी ने कहा, पर मैं किसी को बद्दुआ नही देता, चाहे मेरे साथ कितनी भी जात्ती क्यू ना हो जाए, मेरे होठो पर हमेशा दुआ रहती हैं, मैं अब नही चाहता, की कोई और इतने बुरे दिन देखे, मेरे साथ अन्याय करने वालों को भी मैं दुआ देता हूं, क्यूंकि उनको मालूम ही नही, वो क्या पाप कर रहें है, जो सीधा ईश्वर देख रहा हैं, जैसी हमने भुगती है, कोई और ना भुगते, इसलिए मेरे दिल से बस अपना हाल देख दुआ ही निकलती हैं,

सेठ चुपके चुपके सब सुन रहा था, उसे अब सारी बात समझ आ गयी थी, बूढे बुढिया ने आधी रोटी को दोनो मिलकर खाया, और प्रभु की महिमा है बोल कर सो गयें,

अगले दिन, वहाँ भिखारी भीख मांगने सेठ के यहाँ गया, सेठ ने पहले से ही रोटिया निकल के रखी थी, उसने भिखारी को दी और हल्की से मुस्कान भरे स्वर में कहा, माफ करना बाबा, गलती हो गयी, भिखारी ने कहा, ईश्वर तुम्हारा भला करे, और वो वहाँ से चला गया,

सेठ को एक बात समझ आ गयी थी, इंसान तो बस दुआ_बद्दुआ देते है, पर उसे पूर्ण वो ईश्वर वो जादूगर कर्मो के हिसाब से करता है।

शिक्षा:-हो सके तो बस हम अच्छा करें, वो दिखता नही है तो क्या हुआ, सब का हिसाब पक्का रहता है उसके पास।

जय श्रीराम

शुभरात्री

Anjali Arora Leaked MMS

लीक एमएमएस पर Anjali Arora का फूटा गुस्सा, अपशब्दों का इस्तेमाल कर कहा – ‘मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता

सोशल मीडिया सेंसेशन अंजलि अरोड़ा (Anjali Arora) इन दिनों अपने लीक एमएमएस को लेकर लगातार खबरों में छाई हुई हैं। इस लीक वीडियो की वजह से अंजलि को सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल किया जा रहा हैं। हालांकि अंजलि (Anjali Arora) इस लीक एमएमएस पर अपना रिएक्शन दें चुकी हैं।

उन्होंने इस लीक वीडियो को फेक बताया था। वहीं एक बार फिर से अंजलि (Anjali Arora) का एक वीडियो सामने आया हैं। जिसमें वह ट्रोलर्स को कुछ ऐसा कहती नजर आ रही, जिसे सुन कर आप भी हैरान रह जाएंगे।

दरअसल हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया हैं। जिसमें बातचीत के दौरान एक पैपराजी ने अंजलि अरोड़ा (Anjali Arora) से पूछा गया कि, वह अपने वायरल वीडियो पर क्या कहना चाहती हैं? इस सवाल का जवाब देते हुए अंजलि ने कहा कि,

 “जब लोगों से बराबरी नहीं हो पाती है तो वो बदनामी शुरू कर देते हैं। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।”

इसके बाद वह वीडियो के अंत में ऐसे लोगों के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करती हैं और गाड़ी में बैठ वहां से चली जाती हैं।”

बता दें कि अंजलि अरोड़ा (Anjali Arora) ने अपने लीक एमएमएस पर खुलकर बात करते हुए इंटरव्यू में कहा था कि,

“मेरा भी परिवार हैं भाई-बहन हैं। लोगों को ऐसी हरकतें नहीं करनी चाहिए। इसके बारे में सबको पता है कि फालतू की चीज हैं क्या चल रही हैं और क्या नहीं। लेकिन मेरे जो अपने हैं, वो मुझ पर ट्रस्ट कर रहे हैं।”

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अंजलि अरोड़ा (Anjali Arora) सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और आए दिन अपनी तस्वीरें और वीडियो अपने फैंस से साथ शेयर करती रहती हैं। इस समय उनके इंस्टाग्राम पर 1 करोड़ से भी ज्य़ादा फ्लोवर्स हैं। वहीं 15 अगस्त के दिन भी अंजलि अरोड़ा ट्रोल होने लगी थी, जब उन्होंने क्रॉप टॉप में तिरंगा लहराया था। इस वजह से भी लॉक अप फेम अंजलि लोगों के निशाने पर आ गई थी।

गेंहू के दाने

💐💐गेंहू के दाने💐💐

एक समय की बात है जब राजस्थान के एक छोटे से गाँव नयासर में अमरसेन नामक व्यक्ति रहता था। अमरसेन बड़ा होशियार था, उसके चार पुत्र थे जिनके विवाह हो चुके थे और सब अपना जीवन जैसे-तैसे निर्वाह कर रहे थे परन्तु समय के साथ-साथ अब अमरसेन वृद्ध हो चला था! पत्नी के स्वर्गवास के बाद उसने सोचा कि अब तक के संग्रहित धन और बची हुई संपत्ती का उत्तराधिकारी किसे बनाया जाये?

ये निर्णय लेने के लिए उसने चारो बेटों को उनकी पत्नियों के साथ बुलाया और एक-एक करके गेहूं के पाँच दाने दिए और कहा कि मै तीरथ पर जा रहा हूँ और चार साल बाद लौटूंगा और जो भी इन दानों की सही हिफाजत करके मुझे लौटाएगा तिजोरी की चाबियाँ और मेरी सारी संपत्ती उसे ही मिलेगी
इतना कहकर अमरसेन वहां से चला गया।

पहले बहु-बेटे ने सोचा, बुड्ढा सठिया गया है! चार साल तक कौन याद रखता है! हम तो बड़े हैं तो धन पर पहला हक़ हमारा ही है। ऐसा सोचकर उन्होंने गेहूं के दाने फेक दिये।

दूसरे ने सोचा कि संभालना तो मुश्किल है! यदि हम इन्हे खा लें तो शायद उनको अच्छा लगे और लौटने के बाद हमें आशीर्वाद दे दें और कहे की तुम्हारा मंगल इसी में छुपा था और सारी संपत्ती हमारी हो जाएगी यह सोचकर उन्होंने वो पाँच दानें खा लिये।

तीसरे ने सोचा कि हम रोज पूजा पाठ तो करते ही हैं और अपने मंदिर में जैसे ठाकुरजी को सँभालते हैं! वैसे ही ये गेहूं भी संभाल लेंगे और उनके आने के बाद लौटा देंगे।

चौथे बहु-बेटे ने समझदारी से सोचा और पाचों दानो को एक एक कर जमीन में बो दिया और देखते-देखते वे पौधे बड़े हो गये और कुछ गेहूं ऊग आये फिर उन्होंने उन्हें भी बो दिया इस तरह हर वर्ष गेहूं की बढ़ोतरी होती गई पाँच दानें पाँच बोरी, पच्चीस बोरी,और पचासों बोरियों में बदल गए।

चार साल बाद जब अमरसेन वापस आया तो सबकी कहानी सुनी और जब वो चौथे बहु-बेटों के पास गया तो बेटा बोला, ”पिताजी, आपने जो पांच दाने दिए थे अब वे गेंहूँ की पचास बोरियों में बदल चुके हैं! हमने उन्हें संभल कर गोदाम में रख दिया है, उनपर आप ही का हक़ है।”
यह देख अमरसेन ने फ़ौरन तिजोरी की चाबियाँ सबसे छोटे बहु-बेटे को सौंप दी और कहा, तुम ही लोग मेरी संपत्ति के असल हक़दार हो।

इस प्रसंग से हमें शिक्षा मिलती है कि मिली हुई जिम्मेदारी को अच्छी तरह से निभाना चाहिए और मौजूद संसाधनो, चाहे वो कितने कम ही क्यों न हों, उनका सही उपयोग करना चाहिए।

गेंहूँ के पांच दाने तो एक प्रतीक हैं, जो समझाते हैं कि कैसे छोटी से छोटी शुरुआत करके उसे एक बड़ा रूप दिया जा सकता है।

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मानसिक तनाव से मुक्त होकर जीने का अचूक मंत्र :
हमारी यात्रा बहुत छोटी है!

मानसिक तनाव से मुक्त होकर जीने का अचूक मंत्र :
हमारी यात्रा बहुत छोटी है!
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एक महिला एक बस में चढ़ी और एक आदमी के बगल में बैठने के क्रम में उसे अपने बैग से और अपनी कोहनी से कई बार मार दिया।

पुरुष चुप रहा, तो महिला ने उससे पूछा कि जब उसने उसे अपने बैग से मारा तो उसने शिकायत क्यों नहीं की?

उस आदमी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया:
“इतनी महत्वहीन बात से परेशान होने की जरूरत नहीं थी क्योंकि हमारी एक साथ की यात्रा बहुत छोटी है! मैं अगले पड़ाव पर उतर रहा हूँ।”

इस जवाब ने महिला को इतना परेशान किया कि उसने उस आदमी से उसे क्षमा करने के लिए प्रार्थना की और सोचा कि इन शब्दों को तो सोने के अक्षरों में लिखा जाना चाहिए ।
हम में से प्रत्येक को यह समझना चाहिए कि इस दुनिया में हमारा समय इतना कम है कि इसे बेकार तर्कों, ईर्ष्या, दूसरों को क्षमा न करने, असंतोष और बुरे व्यवहार के साथ व्यर्थ करना समय और ऊर्जा की एक हास्यास्पद बर्बादी है।

अब प्रश्न उठता है –
क्या किसी ने आपका दिल तोड़ा? तो शांत रहो।
क्योंकि यात्रा बहुत छोटी है।

क्या किसी ने आपको धोखा दिया, धमकाया या अपमानित किया?
तो आराम करें, तनावग्रस्त न हों!
क्योंकि यात्रा बहुत छोटी है।

क्या किसी ने बिना वजह आपका अपमान किया?
तो भी शांत रहो, इसे नजरअंदाज करो!
क्योंकि यात्रा बहुत छोटी है।

क्या किसी ने ऐसी टिप्पणी की जो आपको पसंद नहीं आई?
तो शांत रहें, नज़र अंदाज़ करें, क्षमा करें, उन्हें अपनी प्रार्थनाओं में रखें और बिना किसी कारण के उन्हें अभी भी प्यार करें!
क्योंकि यात्रा बहुत छोटी है।

कुछ लोग जो भी समस्याएँ हमारे सामने लाते हैं! वह समस्या तभी होती है जब हम उस पर विचार करते हैं!
याद रखें कि हमारी एक साथ यात्रा बहुत छोटी है।

हमारी यात्रा कितनी लंबी है यह कोई नहीं जानता। कल किसी ने नहीं देखा। कोई नहीं जानता कि हम अपने पड़ाव पर अचानक कब पहुंच जाएं।
हमारी एक साथ यात्रा बहुत छोटी है।

इसलिए हम हमेशा अपनों की, दोस्तों और परिवार की सराहना करें। उन्हें अच्छे, खुशनुमा वातावरण में रखें। उनका सम्मान करें। हम उनको आदरणीय भाव दें, हम स्वयं दयालु , प्रेममय और क्षमाशील बनें।

तब हम भी वास्तव में कृतज्ञता और आनंद से भर जाएंगे!
आखिरकार हमारी एक साथ यात्रा बहुत छोटी है।

हर किसी के साथ अपनी मुस्कान साझा करें! अपना रास्ता चुनें कि आप जितना सुंदर बनना चाहते हैं, उतना ही सुंदर बनें।
क्योंकि इस मंत्र को कभी ना भूलें कि –
हमारी यात्रा बहुत छोटी है!

अतः अपने जीवन में जो भी करें – खुशी से करें!

आपका जीवन आनंदमय बना रहे!
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बुद्धिमान साधू

!! बुद्धिमान साधू !!

किसी राजा के राजमहल के द्वार पर एक साधु आया और द्वारपाल से बोला कि भीतर जाकर राजा से कहे कि उनका भाई आया है।

द्वारपाल ने समझा कि शायद ये कोई दूर के रिश्ते में राजा का भाई हो जो संन्यास लेकर साधुओं की तरह रह रहा हो!

सूचना मिलने पर राजा मुस्कुराया और साधु को भीतर बुलाकर अपने पास बैठा लिया।

साधु ने पूछा – कहो अनुज, क्या हाल-चाल हैं तुम्हारे?

“मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं भैया?”, राजा बोला।

साधु ने कहा- जिस महल में मैं रहता था, वह पुराना और जर्जर हो गया है। कभी भी टूटकर गिर सकता है। मेरे 32 नौकर थे वे भी एक-एक करके चले गए। पाँचों रानियाँ भी वृद्ध हो गयीं और अब उनसे कोई काम नहीं होता…

यह सुनकर राजा ने साधु को 10 सोने के सिक्के देने का आदेश दिया। साधु ने 10 सोने के सिक्के कम बताए।

तब राजा ने कहा, इस बार राज्य में सूखा पड़ा है, आप इतने से ही संतोष कर लें।

साधु बोला- मेरे साथ सात समंदर पार चलो वहां सोने की खदाने हैं। मेरे पैर पड़ते ही समुद्र सूख जाएगा… मेरे पैरों की शक्ति तो आप देख ही चुके हैं।

अब राजा ने साधु को 100 सोने के सिक्के देने का आदेश दिया।

साधु के जाने के बाद मंत्रियों ने आश्चर्य से पूछा, “क्षमा करियेगा राजन, लकिन जहाँ तक हम जानते हैं आपका कोई बड़ा भाई नहीं है, फिर आपने इस ठग को इतना इनाम क्यों दिया?”

राजन ने समझाया, “देखो,  भाग्य के दो पहलु होते हैं। राजा और रंक। इस नाते उसने मुझे भाई कहा।

जर्जर महल से उसका आशय उसके बूढ़े शरीर से था!!
32 नौकर उसके दांत थे
और 5 वृद्ध रानियाँ, उसकी 5 इन्द्रियां हैं।

समुद्र के बहाने उसने मुझे उलाहना दिया कि राजमहल में उसके पैर रखते ही मेरा राजकोष सूख गया… क्योंकि मैं उसे मात्र दस सिक्के दे रहा था जबकि मेरी हैसियत उसे सोने से तौल देने की है। इसीलिए उसकी बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर मैंने उसे सौ सिक्के दिए और कल से मैं उसे अपना सलाहकार नियुक्त करूँगा।

इस प्रसंग से हमें ये सीख मिलती है कि किसी भी व्यक्ति के बाहरी रंग रूप से उसकी बुद्धिमत्ता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता इसलिए हमें सिर्फ किसी ने खराब कपडे पहने हैं या वो देखने में अच्छा नहीं है; उसके बारे में गलत विचार नहीं बनाने चाहियें बल्कि उसकी आंतरिक प्रज्ञा का आदर करना चाहिय!
कहा भी है कि –
भेष देख मत भूलिय, पूछ लीजिये ज्ञान!
मोल करो तलवार की, पड़े रहन दो म्यान!!

काँच और हीरा

💎काँच और हीरा💎

एक राजा का दरबार लगा हुआ था। क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये राजा का दरवार खुले मे लगा हुआ था!

पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी।
महाराज के सिंहासन के सामने एक शाही मेज थी और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थीं!
राज्य के पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि सभी दरबार मे बैठे थे और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे!

💎उसी समय एक व्यक्ति आया और उसने भी सभा में प्रवेश की अनुमति मांगी और उसे इजाजत प्रवेश गई!

उसने व्यक्ति ने कहा, ” मेरे पास दो वस्तुएं हैं! मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और अपनी वस्तुओं को दिखाता हूँ पर इन्हें कोई परख ही नहीं पाता – सब हार जाते हैं और मैं विजेता बनकर घूमते-घामते अब आपके नगर मे आया हूँ!”

राजा ने उत्सुकता से पूछा, “ऐसी कौन सी वस्तु है तुम्हारे पास?”

💎तो उसने झट से दोनों वस्तुए राजा के मेज पर रख दीं! वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान आकार, समान रुप रंग, समान प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था!

राजा ने कहा “ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं!”
तो उस व्यक्ति ने कहा, “हाँ दिखाई तो एक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न!
इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा और एक है काँच का टुकडा! “

“💎लेकिन रूप रंग सब एक है!”
इसलिए कोई आज तक परख नहीं पाया क़ि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा!”

💎 आप में से भी कोइ परख कर बताये कि ये हीरा है और ये काँच! अगर आपकी परख खरी निकली तो मैं हार जाऊंगा और यह कीमती हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा!”

पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहीं पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी!इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से जीतता आया हूँ!”

राजा ने कहा “मैं तो नही परख सकूंगा!
दीवान भी बोले कि हम भी हिम्मत नहीं कर सकते क्योंकि दोनों बिल्कुल समान है!

💎 कोई भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था! हारने पर पैसे देने होंगे – इसका कोई सवाल नहीं था क्योंकि राजा के पास बहुत धन था!

राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी, इसका सबको भय था।
आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई!
एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा!
उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो!
मैंने सब शर्त सुनी है और यह भी सुना है कि कोई उस वस्तु परख नहीं पा रहा है!एक अवसर मुझे भी दो!

वह एक आदमी के सहारे राजा के पास पहुंचा।
उसने राजा को बतलाया कि मैं तो जनम से अंधा हूं फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये!
जिससे मैं भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं!

और यदि सफल न भी हुआ तो वैसे भी आप तो हारे ही है!

राजा को लगा कि इसे अवसर देने में हर्ज ही क्या है?

राजा ने कहा क़ि ठीक है!

तो तब उस अंधे आदमी को दोनों चीजें छुआ दी गयी और पूछा गया कि इनमें कौन सा हीरा है और कौन सा काँच? यही तुम्हें परख कर बतलाना है!
उस आदमी ने एक क्षण में कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच!

जो आदमी इतने राज्यों में जीतकर आया था वह नतमस्तक हो गया और बोला “सही है, आपने ठीक पहचान लिया!धन्य हो आप!

उसने अपने वचन के मुताबिक घोषणा की कि यह हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी में दे रहा हूँ !”

सब बहुत खुश हो गये और जो आदमी आया था वह भी बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला परखने वाला!

सभी लोगों ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच!

उस अंधे ने कहा कि यह तो बहुत ही सरल बात है मालिक! हम सब धूप में बैठे हैं! मैंने दोनों चीज़ों को छुआ – 💎जो ठंडा रहा वह हीरा और जो गरम हो गया वह काँच!

यह प्रसंग हमको भी प्रेरणा देता है कि *जीवन में पारखी बनने के लिए हमें शान्त सीतल रहना होगा!

☝🏻 अक्सर हमारे जीवन में भी देखने को मिलता है कि जो बात बात में गरम होकर उलझ जाये – वह व्यक्ति काँच है!
और….
*🌷जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे *💎वह व्यक्ति हीरा है!💎*

हर व्यक्ति के जीवन में शीतलता हो सकती है, अगर इन्सान के अन्दर चाहत हो तो आज भी ऐसे पारखी हैं जो कहते हैं कि शान्ति सम्भव है!
बस हमने शान्ति दिशा में एक कदम बढ़ाना है!
कहा भी है कि –
बहता था बहे जात था,
लोक वेद के साथ!
पैंढे में सद्गुरु मिले,
दीपक दीना हाथ!
दीपक दीना हाथ कर
वस्तु दई लखाय!
कोटि जनम का पंथ था,
पल में पहुंचा जाए!!
🌸🌸🙏🏼🙏🏼🌸🌸

बुरी स्मृतियाँ भुला दी जाएँ

बुरी स्मृतियाँ भुला दी जाएँ

दो भाई थे। परस्पर बडे़ ही स्नेह तथा सद्भावपूर्वक रहते थे। बड़ा भाई कोई वस्तु लाता तो छोटे भाई तथा उसके परिवार के लिए भी अवश्य ही लाता, छोटा भाई भी सदा उनको आदर तथा सम्मान की दृष्टि से देखता।

पर एक दिन किसी बात पर दोनों में कहा सुनी हो गई। बात बढ़ गई और छोटे भाई ने बडे़ भाई के प्रति अपशब्द कह दिए। बस फिर क्या था! दोनों के बीच दरार पड़ ही तो गई। उस दिन से ही दोनों अलग-अलग रहने लगे और कोई किसी से नहीं बोला। कई वर्ष बीत गये। मार्ग में आमने सामने भी पड़ जाते तो कतराकर दृष्टि बचा जाते, छोटे भाई की कन्या का विवाह आया तो उसने सोचा बडे़ अंत में बडे़ ही हैं, जाकर मना लाना चाहिए।

वह बडे़ भाई के पास गया और पैरों में पड़कर पिछली बातों के लिए क्षमा माँगने लगा। बोला अब चलिए और विवाह कार्य संभालिए।

पर बड़ा भाई न पसीजा, चलने से साफ मना कर दिया। छोटे भाई को दुःख हुआ। अब वह इसी चिंता में रहने लगा कि कैसे भाई को मनाकर लाया जाए!
इधर विवाह के भी बहुत ही थोडे दिन रह गये थे। संबंधी आने लगे थे।

किसी ने कहा- उसका बडा भाई एक संत के पास नित्य जाता है और उनका कहना भी मानता है।
छोटा भाई उन संत के पास पहुँचा और पिछली सारी बात बताते हुए अपनी त्रुटि के लिए क्षमा याचना की तथा गहरा पश्चात्ताप व्यक्त किया और प्रार्थना की कि “”आप किसी भी प्रकार मेरे भाई को मेरे यहां आने के लिए तैयार कर दे।””

दूसरे दिन जब बडा़ भाई सत्संग में गया तो संत ने पूछा – तुम्हारे छोटे भाई के यहाँ कन्या का विवाह है। तुम क्या-क्या काम संभाल रहे हो?

बड़ा भाई बोला- “मैं विवाह में सम्मिलित नही हो रहा। कुछ वर्ष पूर्व मेरे छोटे भाई ने मुझे ऐसे कड़वे वचन कहे थे, जो आज भी मेरे हृदय में काँटे की तरह खटक रहे हैं।””

संत जी ने कहा जब सत्संग समाप्त हो जाए तो जरा मुझसे मिलते जाना।””
सत्संग समाप्त होने पर वह संत के पास पहुँचा तो उन्होंने पूछा- मैंने गत रविवार को जो प्रवचन दिया था उसमें क्या बतलाया गया था?

बडा भाई मौन! कहा कुछ याद नहीं पडता कौन सा विषय था?

संत ने कहा- अच्छी तरह याद करके बताओ।

लेकिन प्रयत्न करने पर भी उसे वह विषय याद नहीं आया।

संत बोले “देखो, मेरी बताई हुई अच्छी बात तो तुम्हें आठ दिन भी याद न रही और छोटे भाई के कडवे बोल जो एक वर्ष पहले कहे गये थे, वे तुम्हें अभी तक हृदय में चुभ रहे हैं? जब तुम अच्छी बातों को याद ही नहीं रख सकते तो तब उन्हें जीवन में कैसे उतारोगे? और जब जीवन नहीं सुधारा तब सत्संग में आने का क्या लाभ? अतः कल से यहाँ मत आया करो।””

अब बडे़ भाई की आँखें खुली। अब उसने आत्म-चिंतन किया और देखा कि मैं वास्तव में ही गलत मार्ग पर हूँ। छोटों की बुराई भूल ही जाना चाहिए। इसी में बडप्पन है।

उसने संत के चरणों में सिर नवाते हुए कहा, मैं समझ गया गुरुदेव! अभी छोटे भाई के पास जाता हूँ, आज मैंने अपना गंतव्य पा लिया।””

रहीमदास जी ने भी कहा है कि –
छमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात।।
यानी कि बड़ों को क्षमा शोभा देती है और छोटों को उत्पात (बदमाशी)। अगर छोटे बदमाशी करें कोई बड़ी बात नहीं और बड़ों को इस बात पर क्षमा कर देना चाहिए। छोटे अगर उत्पात मचाएं तो उनका उत्पात भी छोटा ही होता है। जैसे यदि कोई कीड़ा (भृगु) अगर लात मारे भी तो उससे कोई हानि नहीं होती।
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श्री कृष्ण की वंशी अद्भुत

*श्री कृष्ण की वंशी अद्भुत*

भारत के महान संत स्वामी विवेकानन्द जब शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने गए तो वहां किसी ने उनसे प्रश्न किया कि *”स्वामी जी, कहते हैं कि श्री कृष्ण की वंशी सुनकर गाएं दौड़ी चली आती थी। क्या यह संभव है?*”
स्वामी जी बोले, *”इसका जवाब फिर किसी दिन दूंगा।”*

एक दिन स्वामी जी सभा हाल में भाषण दे रहे थे। *जनता मंत्रमुग्ध हो सुन रही थी। स्वामी जी अचानक चुप हो गए व चुपचाप वहां से चले पड़े।*

सभी बिना कुछ बोले *उनके पीछे-पीछे सारे श्रोतागण भी चल पड़े ताकि भाषण का बाकी अंश सुन सकें।*

स्वामी जी एक ऊंची जगह खड़े हो गए और बोले, *आप में से किसी ने एक दिन पूछा था कि क्या श्री कृष्ण की वंशी सुनकर गाएं दौड़ी चली आती थीं?*

इसका जवाब आज दे रहा हूं।

*जब मुझ जैसे साधारण से मानव का अधूरा भाषण सुनने के लिए आप सब यहां तक आ गये!*
तो फिर *श्री कृष्ण जी तो सोलह कला संपूर्ण थे। उनकी वंशी सुनकर गायों का दौड़े चले आना तो स्वाभाविक ही था!इस में हो सकता है क्या?”*

इस प्रकार *उन सब श्रोताओं का संदेह दूर हो गया और श्रद्धा से सब का सिर झुक गया।*

यह वास्तविकता है कि महापुरुषों के प्रेम और विश्वास में वो ताकत है कि वो असंभव को भी सम्भव कर सकते हैं!

कहा भी है –
*मूकं करोति वाचालं, पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।*
*यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥*
यानी जिनकी कृपा से गूंगे बोलने लगते हैं! लंगड़े पहाड़ों को पार कर लेते हैं! उन परम आनंद स्वरुप श्रीमाधव की मैं वंदना करता हूँ!

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छुपी हुई शक्तियां

💐💐छुपी हुई शक्तियां💐💐

एक बार देवताओं में चर्चा हो रहो थी!
चर्चा का विषय था मनुष्य की हर मनोकामनाओं को पूरा करने वाली गुप्त चमत्कारी शक्तियों को कहाँ छुपाया जाये।
सभी देवताओं में इस पर बहुत वाद- विवाद हुआ। एक देवता ने अपना मत रखा और कहा कि इसे हम एक जंगल की गुफा में रख देते हैं।

दूसरे देवता ने उसे टोकते हुए कहा, नहीं- नहीं, हम इसे पर्वत की चोटी पर छिपा देंगे।

उनकी बात ठीक पूरी भी नहीं हुई थी कि कोई कहने लगा , “न तो हम इसे कहीं गुफा में छिपाएंगे और न ही इसे पर्वत की चोटी पर हम इसे समुद्र की गहराइयों में छिपा देते हैं यही स्थान इसके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा।”

सबकी राय खत्म हो जाने के बाद एक अन्य देवता ने कहा, क्यों न हम मानव की चमत्कारिक शक्तियों को मानव-मन की गहराइयों में छिपा दें।

चूँकि बचपन से ही उसका मन इधर-उधर दौड़ता रहता है! मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकेगा कि ऐसी अदभुत और विलक्षण शक्तियां उसके भीतर छिपी हो सकती हैं और वह इन्हें बाह्य जगत में खोजता रहेगा!

अतः इन बहुमूल्य शक्तियों को हम उसके मन की निचली तह में छिपा देंगे। बाकी सभी देवता भी इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए और ऐसा ही किया गया!
मनुष्य के भीतर ही चमत्कारी शक्तियों का भण्डार छुपा दिया गया!
इसलिए कहा जाता है कि मानव मन में अद्भुत शक्तियां निहित हैं।

इस कथानक का सार यह है कि मानव मन असीम ऊर्जा का कोष है। इंसान जो भी चाहे वो हासिल कर सकता है। मनुष्य के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।
लेकिन बड़े दुःख की बात है उसे स्वयं ही विश्वास नहीं होता कि उसके भीतर ही इतनी शक्तियां विद्यमान हैं।
इसलिय अपने अंदर की शक्तियों को पहचानिये! उन्हें पर्वत, गुफा या समुद्र में मत ढूंढिए बल्कि अपने अंदर खोजिए और अपनी शक्तियों को निखारिए।
हथेलियों से अपनी आँखों को ढंककर अंधकार होने का शिकायत मत कीजिये।
मीरा ने भी यही कहा कि-
बाहर धुंध फिरि में इसको, वह वस्तु घट भीतर पायो!
भाग बड़े मैं सद्गुरु पायो!!
जिन बडभागियों को सदगुरु के द्वारा अपने अन्दर जाने की विधी मिली है वे इसका अनवरत अभ्यास करें और अपने अन्दर का आनन्द लें !
यह कभी न भूलें कि – शांति संभव है!
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प्रभु ही हमारे राजा

*💐💐प्रभु ही हमारे राजा💐💐*

एक गरीब विधवा के पुत्र ने एक बार अपने राजा को देखा।राजा को देख कर उसने अपनी माँ से पूछा- माँ!क्या कभी मैं राजा साहब से बात कर पाऊँगा?
माँ हंसी और चुप रह गई।पर वह लड़का तो निश्चय कर चुका था।उन्हीं दिनों गाँव में एक संत आए हुए थे।तो युवक ने उनके चरणों में अपनी इच्छा रखी।
संत ने कहा-अमुक स्थान पर राजा का महल बन रहा है,तुम वहाँ चले जाओ,और मजदूरी करो।पर ध्यान रखना,वेतन न लेना।अर्थात् बदले में कुछ मांगना मत,निष्काम रहना।वह लड़का गया।वह दोगुनी मेहनत करता पर वेतन न लेता।
एक दिन राजा निरीक्षण करने आया। उसने लड़के की लगन देखी।प्रबंधक से पूछा-यह लड़का कौन है,जो इतनी तन्मयता से काम में लगा है?इसे आज अधिक मजदूरी देना।
प्रबंधक ने विनय की- महराज!इसका अजीब हाल है,दो महीने से इसी उत्साह से काम कर रहा है।पर हैरानी यह है कि यह मजदूरी नहीं लेता।कहता है मेरे घर का काम है।घर के काम की क्या मजदूरी लेनी?राजा ने उसे बुला कर कहा-बेटा!तूं मजदूरी क्यों नहीं लेता? बता तूं क्या चाहता है?

लड़का राजा के पैरों में गिर पड़ा और बोला-महाराज!आपके दर्शन हो गए,आपकी कृपा दृष्टि मिल गई,मुझे मेरी मजदूरी मिल गई।अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए।
राजा उसे मंत्री बना कर अपने साथ ले गया। और कुछ समय बाद अपनी इकलौती पुत्री का विवाह भी उसके साथ कर दिया। राजा का कोई पुत्र था नहीं, तो कालांतर में उसे ही राज्य भी सौंप दिया।

*💐💐शिक्षा💐💐*

*संत महापुरुष कहते है कि भगवान ही राजा हैं। हम सभी भगवान के मजदूर हैं।भगवान का भजन करना ही मजदूरी करना है।संत ही मंत्री है।भक्ति ही राजपुत्री है।मोक्ष ही वह राज्य है।*

*हम भगवान के भजन के बदले में कुछ भी न माँगें तो वे भगवान स्वयं दर्शन देकर, पहले संत बना देते हैं और अपनी भक्ति प्रदान कर, कालांतर में मोक्ष ही दे देते हैं।वह लड़का सकाम कर्म करता,तो मजदूरी ही पाता, निष्काम कर्म किया तो राजा बन बैठा।यही सकाम और निष्काम कर्म के फल में भेद है।*

*तुलसी विलम्ब न कीजिए,निश्चित भजिए राम,जगत मजूरी देत है, क्यों राखे भगवान।*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

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