अहंकार

*🔥अहंकार🔥*

एक दिन रामकृष्ण परमहंस किसी सन्त के साथ बैठे हुए थे। ठण्ड के दिन थे। सांयकाल हो गया था। तब सन्त ने ठण्ड से बचने के लिए कुछ लकड़ियां एकट्ठा कीं और धूनी जला दी। दोनों सन्त धर्म और अध्यात्म पर चर्चा कर रहे थे।

इनसे कुछ दूर एक गरीब व्यक्ति भी बैठा हुआ। उसे भी ठण्ड लगी तो उसने भी कुछ लकड़ियां एकट्ठा कर लीं। अब लकड़ी जलाने के लिए उसे आग की आवश्यकता थी। वह तुरन्त ही दोनों संतों के पास पहुंचा और धूनी से जलती हुई लकड़ी का एक टुकड़ा उठा लिया।

एक व्यक्ति ने सन्त द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया तो सन्त गुस्सा हो गए। वे उसे मारने लगे।

संत ने कहा कि *तू पूजा-पाठ नहीं करता है, भगवान का ध्यान नहीं करता, तेरी हिम्मत कैसे हुई, तूने मेरे द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया?*

रामकृष्ण परमहंस ये सब देखकर मुस्कुराने लगे।

जब संत ने परमहंसजी को प्रसन्न देखा तो उन्हें और गुस्सा आ गया। उन्होंने परमहंसजी से कहा, *‘आप इतना प्रसन्न क्यों हैं? ये व्यक्ति अपवित्र है, इसने गन्दे हाथों से मेरे द्वारा जलाई गई अग्नि को छू लिया है तो क्या मुझे गुस्सा नहीं होना चाहिए?’*

परमहंसजी ने कहा, *‘मुझे नहीं मालूम था कि कोई वस्तु छूने से अपवित्र हो जाती है। अभी आप ही कह रहे थे कि सभी व्यक्तियों में परमात्मा का वास है। और थोड़ी ही देर पश्चात् आप ये बात स्वयं ही भूल गए।’*

उन्होंने आगे कहा, *‘वास्तव में इसमें आपकी गलती नहीं है। आपका शत्रु आपके अन्दर ही है! वह है – आपका अहंकार।*

ध्यान रहे, *घमण्ड के कारण ही हमारा सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है, इसीलिए हमें इससे बचना चाहिए। तभी हम असली मानव कहलाने के अधिकारी बन सकेंगे!*
इसलिए –
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*
🌸🌸🙏🏼🙏🏼🙏🏼🌸🌸

रौशनी की किरण

💐💐रौशनी की किरण💐💐

रोहित आठवीं कक्षा का छात्र था। वह बहुत आज्ञाकारी था, और हमेशा औरों की मदद के लिए तैयार रहता था। वह शहर के एक साधारण मोहल्ले में रहता था , जहाँ बिजली के खम्भे तो लगे थे पर उनपे लगी लाइट सालों से खराब थी और बार-बार कंप्लेंट करने पर भी कोई उन्हें ठीक नहीं करता था।

रोहित अक्सर सड़क पर आने-जाने वाले लोगों को अँधेरे के कारण परेशान होते देखता , उसके दिल में आता कि वो कैसे इस समस्या को दूर करे। इसके लिए वो जब अपने माता-पिता या पड़ोसियों से कहता तो सब इसे सरकार और प्रशाशन की लापरवाही कह कर टाल देते।

ऐसे ही कुछ महीने और बीत गए फिर एक दिन रोहित कहीं से एक लम्बा सा बांस और बिजली का तार लेकर और अपने कुछ दोस्तों की मदद से उसे अपने घर के सामने गाड़कर उसपे एक बल्ब लगाने लगा। आस-पड़ोस के लोगों ने देखा तो पुछा , ” अरे तुम ये क्या कर रहे हो ?”

“मैं अपने घर के सामने एक बल्ब जलाने का प्रयास कर रहा हूँ ?” , रोहित बोला।

“अरे इससे क्या होगा , अगर तुम एक बल्ब लगा भी लोगे तो पुरे मोहल्ले में प्रकाश थोड़े ही फ़ैल जाएगा, आने जाने वालों को तब भी तो परेशानी उठानी ही पड़ेगी !” , पड़ोसियों ने सवाल उठाया।

रोहित बोला , ” आपकी बात सही है , पर ऐसा कर के मैं कम से कम अपने घर के सामने से जाने वाले लोगों को परेशानी से तो बचा ही पाउँगा। ” और ऐसा कहते हुए उसने एक बल्ब वहां टांग दिया।

रात को जब बल्ब जला तो बात पूरे मोहल्ले में फ़ैल गयी। किसी ने रोहित के इस कदम की खिल्ली उड़ाई तो किसी ने उसकी प्रशंशा की। एक-दो दिन बीते तो लोगों ने देखा की कुछ और घरों के सामने लोगों ने बल्ब टांग दिए हैं। फिर क्या था महीना बीतते-बीतते पूरा मोहल्ला प्रकाश से जगमग हो उठा। एक छोटे से लड़के के एक कदम ने इतना बड़ा बदलाव ला दिया था कि धीरे-धीरे पूरे शहर में ये बात फ़ैल गयी , अखबारों ने भी इस खबर को प्रमुखता से छापा और अंततः प्रशाशन को भी अपनी गलती का अहसास हुआ और मोहल्ले में स्ट्रीट-लाइट्स को ठीक करा दिया गया।

💐💐शिक्षा💐💐

मित्रों, कई बार हम बस इसलिए किसी अच्छे काम को करने में संकोच कर जाते हैं क्योंकि हमें उससे होने वाला बदलाव बहुत छोटा प्रतीत होता है। पर हकीकत में हमारा एक छोटा सा कदम एक बड़ी क्रांति का रूप लेने की ताकत रखता है। हमें वो काम करने से नहीं चूकना चाहिए जो हम कर सकते हैं। इस कहानी में भी अगर रोहित के उस प्रयास की वजह से पूरे मोहल्ले में रौशनी नहीं भी हो पाती तो भी उसका वो कदम उतना ही महान होता जितना की रौशनी हो जाने पर है। रोहित की तरह हमें भी बदलाव होने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए बल्कि, जैसा की गांधी जी ने कहा है , हमें खुद वो बदलाव बनना चाहिए जो हम दुनिया में देखना चाहते हैं, तभी हम अँधेरे में रौशनी की किरण फैला सकते हैं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

विद्या का घमंड

*💐💐विद्या का घमंड💐💐

आज गंगा पार होने के लिए कई लोग एक नौका में बैठे, धीरे-धीरे नौका सवारियों के साथ सामने वाले किनारे की ओर बढ़ रही थी!मनमोहन भी उसमें सवार थे। मनमोहन जी ने नाविक से पूछा “क्या तुमने भूगोल पढ़ी है ?”

भोला- भाला नाविक बोला “भूगोल क्या है इसका मुझे कुछ पता नहीं।”

मनमोहनजी ने शिक्षा का प्रदर्शन करते कहा, “तुम्हारी पाव भर जिंदगी पानी में गई।”

फिर मनमोहन जी ने दूसरा प्रश्न किया, “क्या इतिहास जानते हो? महारानी लक्ष्मीबाई कब और कहाँ हुई तथा उन्होंने कैसे लडाई की ?”

नाविक ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की तो मनमोहन जी ने विजयीमुद्रा में कहा, “ये भी नहीं जानते तुम्हारी तो आधी जिंदगी पानी में गई।”

फिर विद्या के मद में मनमोहन जी ने तीसरा प्रश्न पूछा “महाभारत का भीष्म-नाविक संवाद या रामायण का केवट और भगवान श्रीराम का संवाद जानते हो ?”

अनपढ़ नाविक क्या कहे! उसने इशारे में ना कहा! तब मनमोहन जी मुस्कुराते हुए बोले “तुम्हारी तो पौनी जिंदगी पानी में गई।”

तभी अचानक गंगा में प्रवाह तीव्र होने लगा। नाविक ने सभी को तूफान की चेतावनी दी और मनमोहनजी से पूछा “नौका तो तूफान में डूब सकती है, क्या आपको तैरना आता है?”

मनमोहन जी घभराहट में बोले “मुझे तो तैरना-वैरना नहीं आता है?”

नाविक ने स्थिति भांपते हुए कहा, “तब तो समझो आपकी पूरी जिंदगी पानी में गयी।”

कुछ ही देर में नौका पलट गई। और मनमोहन जी बह गये!

यह समझना आवश्यक है कि विद्या वाद-विवाद के लिए नहीं है और ना ही दूसरों को नीचा दिखाने के लिए है।

लेकिन कभी-कभी ज्ञान के अभिमान में कुछ लोग इस बात को भूल जाते हैं और दूसरों का अपमान कर बैठते हैं।

याद रखिये शास्त्रों का ज्ञान समस्याओं के समाधान में प्रयोग होना चाहिए शस्त्र बना कर हिंसा करने के लिए नहीं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।

🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏

क्या आप जानते हैं कि आपके अंतिम संस्कार के बाद आम तौर पर क्या होता है?

क्या आप जानते हैं कि आपके अंतिम संस्कार के बाद आम तौर पर क्या होता है?

कुछ ही घंटों में रोने की आवाज पूरी तरह से बंद हो जाएगी।

रिश्तेदारों के लिए होटलों से खाना मंगवाने में जुटेगा परिवार..

पोते दौड़ते और खेलते रहेंगे।

कुछ पुरुष सोने से पहले आपके बारे में कुछ संवेदनात्मक टिप्पणी करेंगे!

कोई रिश्तेदार आपके बच्चों से फोन पर बात करेगा कि आपात स्थिति के कारण वह व्यक्तिगत रूप से नहीं आ पा रहा है।

अगले दिन रात के खाने में, कुछ रिश्तेदार कम हो जाते हैं और कुछ लोग सब्जी में पर्याप्त नमक नहीं होने की शिकायत करते हैं।

भीड़ धीरे धीरे छंटने लगेगी..

आने वाले दिनों में फिर कुछ कॉल आपके फोन पर बिना यह जाने आ सकती हैं कि आप मर चुके हैं।

आपका कार्यालय या दुकान आपकी जगह लेने के लिए किसी को ढूंढने में जल्दबाजी करेगा।

दो सप्ताह में आपका बेटा और बेटी अपनी आपातकालीन छुट्टी खत्म होने के बाद काम पर लौट आएंगे।

महीने के अंत तक आपका जीवनसाथी भी कोई कॉमेडी शो देख कर हंसने लगेगा।

सबका जीवन सामान्य हो जाएगा
जिस तरह एक बड़े पेड़ के सूखे पत्ते में और जिसके लिए आप जीते और मरते हैं, उसमें कोई अंतर नहीं है, यह सब इतनी आसानी से, इतनी तेजी से, बिना किसी हलचल के होता है।

आपको इस दुनिया में आश्चर्यजनक गति से भुला दिया जाएगा।

इस बीच आपकी प्रथम वर्ष पुण्यतिथि भव्य तरीके से मनाई जाएगी।

पलक झपकते ही
साल बीत गए और तुम्हारे बारे में बात करने वाला कोई नहीं है।

एक दिन बस पुरानी तस्वीरों को देखकर आपका कोई करीबी आपको याद कर सकता है!

मुझे अभी बताओ…
जब लोग आपको आसानी से भूलने का इंतजार कर रहे हैं तो फिर आप किसके लिए दौड़ रहे हो? और आप किसके लिए चिंतित हैं?

अपने जीवन के अधिकांश भाग के लिए 80% आप इस बारे में सोचते हैं कि आपके रिश्तेदार और पड़ोसी आपके बारे में क्या सोचते हैं? क्या आप उन्हें संतुष्ट करने के लिए जीवन जी रहे हैं? जो किसी काम का नहीं !
सच्चाई यही है कि –
जब लग जीवै माता रोए,
बहन रोए दश मासा!
तेरह दिन तक तिरिया रोए,
फिर ढूंढें घर वासा!
मन फूला फूला फिरे जगत में कैसा नाता रे!!
इसलिए –
ध्यान दें, जिंदगी एक बार ही मिलती है, बस इसे जी भर के जीने की कोशिश करें! ज्ञान का अभ्यास करें!

जीवन का असली आनन्द हमारे ही अंदर है – इस बात को समझने की कोशिश करें!
इसी में जीवन की सार्थकता है और यही है जिन्दगी।

आपका जीवन मंगलमय हो!
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि –
*हे पार्थ !*
*तराजू पर पैर संभलकर रखना!*
*संतुलन बराबर रखना!*
*लक्ष्य मछली की आंख पर ही केंद्रित हो उसका खास खयाल रखना!*

तो अर्जुन ने कहा,
*”हे प्रभु “, सब कुछ अगर मुझे ही करना है, तो फिर आप क्या करोगे?*

वासुदेव हंसते हुए बोले,
*हे पार्थ ! जो आप से नहीं होगा वह में करुंगा !*

अर्जुन ने कहा,
*प्रभु ऐसा क्या है जो मैं नहीं कर सकता?*

वासुदेव फिर हंसे और बोले, *जिस अस्थिर, विचलित, हिलते हुए पानी में तुम मछली का निशाना साधोगे- उस अस्थिर “पानी” को स्थिर तो “मैं” ही रखूंगा !!*

कहने का तात्पर्य यह है कि*

*आप चाहे*
कितने ही निपुण क्यूँ ना हों!
कितने ही बुद्धिवान क्यूँ ना हों,
कितने ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हों!

*लेकिन आप*
स्वयं हरेक परिस्थिति के ऊपर पूर्ण नियंत्रण नहीँ रख सकते!आप सिर्फ अपना प्रयास कर सकते हो!

क्योंकि
*साधारण पुरुषों की एक सीमा है!*

और
जो उस सीमा से आगे की बागडोर संभालता है
*उन्हीं को महापुरूष कहते हैं!*

‼️ आपके कर्म ही आपकी पहचान है ‼️

*‼️ आपके कर्म ही आपकी पहचान है ‼️*

एक फ़कीर श्मसान में दो चिताओं की राख बड़े ध्यान से देख रहा था। किसी ने पूछा, *बाबा ! ऐसा क्यों देख रहे हो इस राख को।*

फ़कीर ने कहा कि, *यह एक अमीर आदमी की लाश की राख है- जिसने हमेशा काजू-बादाम खाये हैं।*
और
*यह दूसरी एक गरीब आदमी की लाश है जिसे दो वक़्त की रोटी भी बड़ी मुश्किल से मिलती थी।*
लेकिन
*इन दोनों की लाश की राख एक जैसी है फिर भी पता नहीं ज़िन्दगी भर आदमी को घमंड किस बात पर होता है !*

इस कटु सत्य को जब हम समझेंगे तो *तभी नश्वरता के परे उस शाश्वत से जुड़े रहेंगे – जो था, है और रहेगा!*

*आपका जीवन मंगलमय हो!*

राजाभोज और व्यापारी

*💐💐राजाभोज और व्यापारी💐💐*

यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि *जैसा भाव हमारे मन मेे होता है, वैसा ही भाव सामने वाले के मन में आता है।*

इस सबंध में एक ऐतिहासिक घटना सुनी जाती है जो इस प्रकार है-

एक बार राजा भोज की सभा में एक व्यापारी ने प्रवेश किया। राजा ने उसे देखा तो देखते ही उनके मन में आया कि* इस व्यापारी का सबकुछ छीन लिया जाना चाहिए।*

व्यापारी के जाने के बाद राजा ने सोचा – *मै प्रजा को हमेशा न्याय देता हूं। आज मेेरे मन में यह अन्याय पूर्ण भाव क्यों आ गया कि व्यापारी की संपत्ति छीन ली जाये?* उसने अपने मंत्री से सवाल किया!

मंत्री ने कहा, *“इसका सही जवाब कुछ दिन बाद दे पाउंगा!*
राजा ने मंत्री की बात स्वीकार कर ली। मंत्री विलक्षण बुद्धि का था वह इधर-उधर के सोच-विचार में सयम न खोकर सीधा व्यापारी से मिलने पहूंचा। व्यापारी से दोस्ती करके उसने व्यापारी से पूछा, *“तुम इतने चिंतित और दुखी क्यों हो? तुम तो भारी मुनाफे वाला चंदन का व्यापार करते हो।”*

व्यापारी बोला, *“धारा नगरी सहित मैं कई नगरों में चंदन की गाडीयां भरे फिर रहा हूं, पर चंदन इस बार चन्दन की बिक्री ही नहीं हुई! बहुत सारा धन इसमें फंसा पडा है। अब नुकसान से बच पाने का कोई उपाय नहीं है।*

व्यापारी की बातें सुन मंत्री ने पूछा, *“क्या अब कोई भी रास्ता नही बचा है?”*

व्यापारी हंस कर कहने लगा – *अगर राजा भोज की मृत्यु हो जाये तो उनके दाह-संस्कार के लिए सारा चंदन बिक सकता है।*

मंत्री को राजा का उत्तर देने की सामग्री मिल चुकी थी। अगले दिन मंत्री ने व्यापारी से कहा कि *तुम प्रतिदिन राजा का भोजन पकाने के लिए एक मन ४० किलो चंदन दे दिया करो और नगद पैसे उसी समय ले लिया करो।*

व्यापारी मंत्री के आदेश को सुनकर बड़ा खुश हुूआ। वह अब मन ही मन राजा की लंबी उम्र होने की कामना करने लगा।

एक दिन राज-सभा चल रही थी। व्यापारी दोबारा राजा को वहां दिखाई दे गया। तो राजा सोचने लगा – *यह कितना आकर्षक व्यक्ति है इसे क्या पुरस्कार दिया जाये?*

राजा ने मंत्री को बुलाया और पूछा, *“मंत्रीवर, यह व्यापारी जब पहली बार आया था तब मैंने तुमसे कुछ पूछा था, उसका उत्तर तुमने अभी तक नहीं दिया।*
खैर, आज जब मैंने इसे देखा तो *मेरे मन का भाव बदल गया! पता नहीं आज मैं इसपर खुश क्यों हो रहा हूँ और इसे इनाम देना चाहता हूँ!*

मंत्री को तो जैसे इसी क्षण की प्रतीक्षा थी। उसने समझाया- *महाराज! दोनों ही प्रश्नों का उत्तर आज दे रहा हूं। जब यह पहले आया था तब अपनी चन्दन की लकड़ियों का ढेर बेचने के लिए आपकी मृत्यु के बारे में सोच रहा था। लेकिन अब यह रोज आपके भोजन के लिए एक मन लकड़ियाँ देता है इसलिए अब ये आपके लम्बे जीवन की कामना करता है।*
यही कारण है कि *पहले आप इसे दण्डित करना चाहते थे और अब इनाम देना चाहते हैं।*

सचमुच, *अपनी जैसी भावना होती है वैसा ही प्रतिबिंब दूसरे के मन पर पड़ने लगता है। जैसे हम होते है वैसे ही परिस्थितियां हमारी ओर आकर्षित होती हैं। हमारी जैसी सोच होगी वैसे ही लोग हमें मिलेंगे।*

यही इस जगत का नियम है – *हम जैसा बोते हैं, वैसा काटते हैं! हम जैसा दूसरों के लिए मन में भाव रखते हैं, वैसा ही भाव दूसरों के मन में हमारे प्रति हो जाता है!*

इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है कि *हमेशा सबके प्रति सकारात्मक भाव रखें।*
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दुःख का कारण- हमारी सोच

💐💐 *दुःख का कारण- हमारी सोच* 💐💐

एक शहर में एक आलीशान और शानदार घर था! वह शहर का सबसे ख़ूबसूरत घर माना जाता था! लोग उसे देखते, तो तारीफ़ किये बिना नहीं रह पाते!

एक बार घर का मालिक किसी काम से कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर चला गया।

कुछ दिनों बाद जब वह वापस लौटा तो देखा कि *उसके मकान से धुआं उठ रहा है! करीब जाने पर उसे घर से आग की लपटें उठती हुई दिखाई पड़ी! उसका ख़ूबसूरत घर जल रहा था! वहाँ तमाशबीनों की भीड़ जमा थी, जो उस घर के जलने का तमाशा देख रही थी!*

अपने ख़ूबसूरत घर को अपनी ही आँखों के सामने जलता हुए देख वह व्यक्ति चिंता में पड़ गया! उसे समझ नहीं आ रहा था कि *अब क्या करे? कैसे अपने घर को जलने से बचाये?*
वह लोगों से मदद की गुहार लगाने लगा कि *वे किसी भी तरह उसके घर को जलने से बचा लें!*

उसी समय उसका बड़ा बेटा वहाँ आया और बोला, *“पिताजी, घबराइए मत! सब ठीक हो जायेगा!”*

उसकी इस बात पर कुछ नाराज़ होता हुआ पिता बोला, *“कैसे न घबराऊँ? मेरा इतना ख़ूबसूरत घर जल रहा है!”*

बेटे ने उत्तर दिया, *“पिताजी, माफ़ कीजियेगा! एक बात मैं आपको अब तक बता नहीं पाया था! कुछ दिनों पहले मुझे इस घर के लिए एक बहुत बढ़िया खरीददार मिला था! उसने मेरे सामने मकान की कीमत की ३ गुनी रकम का प्रस्ताव रखा!*
सौदा इतना अच्छा था कि *मैं इंकार नहीं कर पाया और मैंने आपको बिना बताये सौदा तय कर लिया!”*

ये सुनकर पिता की जान में जान आयी! उसने राहत की सांस ली और आराम से यूं खड़ा हो गया- *जैसे सब कुछ ठीक हो गया हो! अब वह भी अन्य लोगों की तरह तमाशबीन बनकर उस घर को जलते हुए देखने लगा!*

तभी उसका दूसरा बेटा आया और बोला, *“पिताजी हमारा घर जल रहा है और आप हैं कि बड़े आराम से यहाँ खड़े होकर इसे जलता हुआ देख रहे हैं! आप कुछ करते क्यों नहीं?”*

बेटा चिंता की बात नहीं है- *तुम्हारे बड़े भाई ने ये घर बहुत अच्छे दाम पर बेच दिया था! अब ये घर हमारा नहीं रहा! इसलिए अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता.”* पिता बोला.।

*“पिताजी भैया ने सौदा तो कर दिया था! लेकिन अब तक सौदा पक्का नहीं हुआ है! अभी हमें पैसे भी नहीं मिले हैं! अब बताइए, इस जलते हुए घर के लिए कौन पैसे देगा?”*

यह सुनकर पिता *फिर से चिंतित हो गया और सोचने लगा कि कैसे आग की लपटों पर काबू पाया जाए! वह फिर से पास खड़े लोगों से मदद की गुहार लगाने लगा!*

तभी उसका तीसरा बेटा आया और बोला, *“पिता जी घबराने की सच में कोई बात नहीं है! मैं अभी उस आदमी से मिलकर आ रहा हूँ, जिससे बड़े भाई ने मकान का सौदा किया था!*

उसने कहा है कि *मैं अपनी जुबान का पक्का हूँ!*
मेरे आदर्श कहते हैं कि *चाहे जो भी हो जाये! अपनी जुबान पर कायम रहना चाहिए! इसलिए अब जो हो जाये – जबान दी है तो घर ज़रूर लूँगा और उसके पैसे भी दूंगा!”*

*पिता फिर से चिंतामुक्त हो गया और घर को जलते हुए देखने लगा!*

यह प्रसंग हम आसानी से समझ सकते हैं कि *एक ही परिस्थिति में व्यक्ति का व्यवहार भिन्न-भिन्न हो सकता है और यह व्यवहार उसकी सोच के कारण होता है!*
उदाहारण के लिए जलते हुए घर के मालिक को ही लीजिये – *घर तो वही था, जो जल रहा था। लेकिन उसके मालिक की सोच में कई बार परिवर्तन आया और उस सोच के साथ उसका व्यवहार भी बदलता गया!*

असल में, जब हम किसी चीज़ से जुड़ जाते हैं तो उसके छिन जाने पर या दूर जाने पर हमें दुःख होता है लेकिन यदि हम किसी चीज़ को ख़ुद से अलग कर देखते हैं तो एक अलग सी आज़ादी महसूस करते हैं और दु:ख हमें छूता तक नहीं है!

इसलिए *दु:खी होना और ना होना पूर्णतः हमारी सोच और मानसिकता (mindset) पर निर्भर करता है! सोच पर नियंत्रण रखकर या उसे सही दिशा देकर हम बहुत से दु:खों और परेशानियों से न सिर्फ बच सकते हैं बल्कि जीवन में नई ऊँचाइयाँ भी प्राप्त कर सकते हैं।*
🙏🙏

*जो प्राप्त है-पर्याप्त है*
*जिसका मन मस्त है*
*उसके पास समस्त है!!*
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भलाई का जज्बा

!! भलाई का जज्बा !!

एक बार एक राजा ने एक कैदी को मौत की सजा सुनाई। सजा सुनकर कैदी आप खो बैठा। वह बादशाह को गालियां देने लगा। कैदी दरबार के आखिरी कोने में खड़ा था। इसलिए उसकी गालियां बादशाह को सुनाई नहीं पड़ रहीं थीं।

इसलिए बादशाह ने अपने वजीर से पूछा कि वह क्या कह रहा है?
इस पर वजीर ने बताया, “महाराज, कैदी कह रहा है कि वे लोग कितने अच्छे होते हैं जो अपने क्रोध को पी जाते हैं और दूसरों को क्षमा कर देते हैं।”

यह सुनकर बादशाह को दया आ गई और उसने कैदी को माफ कर दिया।

लेकिन दरबारियों में एक व्यक्ति था जो वजीर से जलता था। उसने कहा, “महाराज, वजीर ने आपको गलत बताया है।”

“यह व्यक्ति आपको गंदी गंदी गालियां दे रहा है। आप इसको माफ मत करिए।” उसकी बात सुनकर बादशाह गुस्सा हो गया और दरबारी से बोला-
“मुझे वजीर की बात ही सही लगी। क्योंकि इसने झूठ भी बोला है तो किसी की भलाई के लिए। इसके अंदर भलाई का जज्बा तो है। जबकि तुम दरबार में रहने के योग्य नहीं हो। तुम्हें तुरंत बेदखल किया जाता है।”

हमेशा अपने व्यवहार और वाणी से दूसरों की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए। वो झूठ भी सत्य के बराबर है जहाँ किसी की भलाई हो या जिंदगी बचने का सवाल हो!
🙏🏼🙏🙏🏿 सुप्रभात🙏🏾🙏🏻🙏🏽

लक्ष्य

!! लक्ष्य !!

एक लड़के ने एक बार एक बहुत ही धनवान व्यक्ति को देखकर धनवान बनने का निश्चय किया। वह धन कमाने के लिए कई दिनों तक मेहनत कर धन कमाने के पीछे पड़ा रहा और बहुत सारा पैसा कमा लिया।

इसी बीच उसकी मुलाकात एक विद्वान से हो गई। विद्वान के ऐश्वर्य को देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया और अब उसने विद्वान बनने का निश्चय कर लिया और अगले ही दिन से धन कमाने को छोड़कर पढने-लिखने में लग गया।

वह अभी अक्षर ज्ञान ही सीख पाया था कि इसी बीच उसकी मुलाकात एक संगीतज्ञ से हो गई। उसको संगीत में अधिक आकर्षण दिखाई दिया, इसीलिए उसी दिन से उसने पढाई बंद कर दी और संगीत सीखने में लग गया।

इसी तरह काफी उम्र बीत गई! ना वह धनी हो सका ना विद्वान और ना ही एक अच्छा संगीतज्ञ बन पाया। तब उसे बड़ा दुख हुआ।

एक दिन उसकी मुलाकात एक बहुत बड़े महात्मा से हुई। उसने महात्मन को अपने दुःख का कारण बताया।
महात्मा ने उसकी परेशानी सुनी और मुस्कुराकर बोले, “बेटा, दुनिया बड़ी ही चिकनी है! जहाँ भी जाओगे कोई ना कोई आकर्षण ज़रूर दिखाई देगा। एक निश्चय कर लो और फिर जीते जी उसी पर अमल करते रहो तो तुम्हें सफलता की प्राप्ति अवश्य हो जाएगी! नहीं तो दुनियां के झमेलों में यूँ ही चक्कर खाते रहोगे। बार-बार रूचि बदलते रहने से कोई भी उन्नत्ति नहीं कर पाओगे।”

युवक महात्मा की बात को समझ गया और एक लक्ष्य निश्चित कर उसी का अभ्यास करने लगा।

हमें भी शुरुआत से ही एक लक्ष्य बनाकर उसी के अनुरूप मेहनत करना चाहिए। इधर-उधर भटकने की बजाय एक ही जगह, एक ही लक्ष्य पर डटे रहने से ही सफलता व उन्नति प्राप्त की जा सकती हैं! चाहे वह भोतिक साधनों को प्राप्त करने की इच्छापूर्ति करना हो या अपने अंतरतम के परमानन्द को पाने की ललक! एक लक्ष्य के साथ सतत्त अभ्यास करना बहुत आवश्यक है!

आपका दिन मंगलमय हो!