गुरु की महिमा

*💐💐गुरु की महिमा💐💐*

एक पंडित रोज रानी के पास कथा करता था। कथा के अंत में सबको कहता कि ‘राम कहे तो बंधन टूटे’। तभी पिंजरे में बंद तोता बोलता, ‘यूं मत कहो रे पंडित झूठे’। पंडित को क्रोध आता कि ये सब क्या सोचेंगे, रानी क्या सोचेगी। पंडित अपने गुरु के पास गया, गुरु को सब हाल बताया। गुरु तोते के पास गया और पूछा तुम ऐसा क्यों कहते हो?

तोते ने कहा- ‘मैं पहले खुले आकाश में उड़ता था। एक बार मैं एक आश्रम में जहां सब साधू-संत राम-राम-राम बोल रहे थे, वहां बैठा तो मैंने भी राम-राम बोलना शुरू कर दिया। एक दिन मैं उसी आश्रम में राम-राम बोल रहा था, तभी एक संत ने मुझे पकड़ कर पिंजरे में बंद कर लिया, फिर मुझे एक-दो श्लोक सिखाये। आश्रम में एक सेठ ने मुझे संत को कुछ पैसे देकर खरीद लिया। अब सेठ ने मुझे चांदी के पिंजरे में रखा, मेरा बंधन बढ़ता गया। निकलने की कोई संभावना न रही। एक दिन उस सेठ ने राजा से अपना काम निकलवाने के लिए मुझे राजा को गिफ्ट कर दिया, राजा ने खुशी-खुशी मुझे ले लिया, क्योंकि मैं राम-राम बोलता था। रानी धार्मिक प्रवृत्ति की थी तो राजा ने रानी को दे दिया। अब मैं कैसे कहूं कि ‘राम-राम कहे तो बंधन छूटे’।

*तोते ने गुरु से कहा आप ही कोई युक्ति बताएं, जिससे मेरा बंधन छूट जाए। गुरु बोले- आज तुम चुपचाप सो जाओ, हिलना भी नहीं। रानी समझेगी मर गया और छोड़ देगी। ऐसा ही हुआ। दूसरे दिन कथा के बाद जब तोता नहीं बोला, तब संत ने आराम की सांस ली। रानी ने सोचा तोता तो गुमसुम पढ़ा है, शायद मर गया। रानी ने पिंजरा खोल दिया, तभी तोता पिंजरे से निकलकर आकाश में उड़ते हुए बोलने लगा ‘सतगुरु मिले तो बंधन छूटे’। अतः शास्त्र कितना भी पढ़ लो, कितना भी जाप कर लो, लेकिन सच्चे गुरु के बिना बंधन नहीं छूटता।*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

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असली सहारा

*असली सहारा*

एक विद्वान किसी गाँव से गुजर रहा था। उसे याद आया कि *उसके बचपन का मित्र इस गांव में रहता है।*
उसने सोचा कि *चलो उससे मिला जाये ।*

वह मित्र के घर पहुंचा लेकिन उसने देखा कि *मित्र गरीबी व दरिद्रता में रह रहा है साथ में दो नौजवान भाई भी हैं।*

बात करते करते शाम हो गयी।
विद्वान ने देखा *मित्र के दोनों भाइयों ने घर के पीछे आंगन में फली के पेड़ से कुछ फलियां तोड़ी, और घर के बाहर बेचकर चंद पैसे कमाये और दाल आटा खरीद कर ले आये। मात्रा कम थी। तीन भाई व विद्वान के लिए भोजन कम पड़ता इसलिये एक भाई ने उपवास का बहाना बनाया दूसरे भाई ने पेट खराब होने का। केवल मित्र विद्वान के साथ भोजन ग्रहण करने बैठा।*

रात हुई।
विद्वान उलझन में कि *मित्र की दरिद्रता कैसे दूर की जाये..?*

उसे सारी रात नींद नही आई ।
रात में वह चुपके से उठा, *एक कुल्हाड़ी ली और आंगन में जाकर फली का पेड़ काट डाला और रातों रात भाग गया…*

सुबह होते ही भीड़ जमा हो गई।
सभी ने एक स्वर में विद्वान की निंदा की कि *कैसा निर्दयी मित्र था तीनों भाइयों की रोजी रोटी का एकमात्र सहारे को विद्वान मित्र ने एक झटके में खत्म कर डाला.*

तीनों भाइयों की आंखों में आंसू थे ।

2-3 बरस बीत गये।
विद्वान को फिर उसी गांव की तरफ से गुजरना था।
*डरते डरते उसने गांव में कदम रखा पिटने के लिए भी तैयार था।*

वो धीरे से मित्र के घर के सामने पहुंचा लेकिन वहां पर *मित्र की झोपड़ी की जगह आलीशान कोठी नज़र आयी।*

इतने में तीनो भाई भी बाहर आ गये। *अपने विद्वान मित्र को देखते ही रोते हुए वे उसके पैरों पर गिर पड़े।*

बोले *यदि तुमने उस दिन फली का पेड़ न काटा होता तो हम आज हम इतने समृद्ध न हो पाते हमने मेहनत न की होती।*

अब हम लोगों को समझ में आया कि *तुमने उस रात फली का पेड़ क्यों काटा था…*

उसने आगे कहा कि *यह सच हैं कि जब तक हम किसी सहारे के सहारे रहते हैं तब तक हम आत्मनिर्भर होकर प्रगति नहीं कर सकते। जब भी सहारा मिलता है तो हम आलस्य में दरिद्रता अपना लेते हैं।*

दूसरा, *हम तब तक कुछ नहीं करते जब तक कि हमारे सामने नितांत आवश्यकता नही होती जब तक हमारे चारों ओर अंधेरा नही छा जाता ।* तुमने उस दिन फली का पेड़ काटकर हम पर बहुत बड़ा उपकार किया था…

इसलिय *आत्मनिर्भर* होने के लिय अपने खुद की शक्ति और समर्थता को उभारना है क्योंकि दूसरे के सहारे हम आत्म निर्भर नहीं हो सकते!
*हमारे जीवन के हर क्षेत्र में इस तरह के फली के पेड़ लगे होते हैं। यदि हम प्रगति करना चाहते हैं तो इन पेड़ों को एक झटके में काट डाले – हमारी प्रगति का रास्ता अपने आप खुल जायेगा!*

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आनन्द की चाबी

*आनन्द की चाबी**

*जैसे एक ही चाबी ताले को खोलती भी है और बंद भी करती है!*

*उसी प्रकार एक ही मन बंधन का भी हेतु है और यही मुक्ति का हेतु भी हो सकता है।*

जैसे एक दिशा में घुमाने से ताला बंद हुआ है, विपरीत दिशा में घुमाने से खुलता है!
*वैसे ही संसार में लगा मन बंधनकारी है!*
*यदि इसे ईश्वर में लगा दें तो मुक्तिकारी हो जाए।*

चाबी की निंदा से कुछ नहीं होगा!ताला उसने नहीं उसे घुमानेवाले ने लगाया है!
इसी तरह मन की निंदा से भी क्या होगा?

क्योंकि मन स्वयं संसार में नहीं लगा! उसे तो आप ने लगाया है।

ये अलग बात है कि *आज से नहीं लगाया, कभी लगाया था। बस जीवन रूपी गेंद सीढ़ी से लुड़की तो लुड़कती चली गई। पानी में, मिट्टी मिल गई!*

अब पानी साफ कैसे हो? कचरा फैला तो एक पल में दिया लेकिन समेटने में बहुत प्रयास लगता है।

मन तो ऐसा है कि *इस पर हर भाव अंकित हो जाता है! इसी को संस्कार कहते हैं।*

*न मालूम कब संसार के संस्कार का बीज पड़ा!अंकुर फूटा, वृक्ष फला! उन फलों से पुनः अनन्त बीज बनकर इसी मन की भूमि में पड़ते रहे और अब यह घोर घना जंगल कैसे कटे?*

*इसलिए जल्दबाजी न करें, घबराएँ नहीं! समझकर चलें!मुश्किल भले लगे लेकिन मंजिल का मिलना असंभव नहीं है।*

*याद रखें-*
*इससे पहले कि मृत्यु आए!यदि नया संस्कार न पड़े और पिछले मिट जाएँ! तो बात बन जाए।*

इसलिए समय के सदगुरु के पास जाकर *स्व-रूप* का बोध प्राप्त करें और उसके सतत अभ्यास में लगे रहें!

*तभी मन की यह चाबी सही दिशा में धूमेगी जहां आनन्द ही आनन्द होगा!*

*आपका जीवन आनंदमय बना रहे! 🌹🙏*

एक बंदा गुरू साहिब जी के पास आया करता था जब भी वो बंदा गुरुद्वारे मे प्रवेश करता तो ये शुक्राने वाला भजन चलता था और वो बंदा अपनी नौकरी

एक बंदा गुरू साहिब जी के पास आया करता था जब भी वो बंदा गुरुद्वारे मे प्रवेश करता तो ये शुक्राने वाला भजन चलता था और वो बंदा अपनी नौकरी, अपनी पारिवारिक परेशानी, पैसे की तंगी और दूसरी परेशानियाँ का सामना कर रहा था और दरबार मे बैठते ही वो बंदा होठो ही होठो मे कहता था कि किस बात का शुक्राना करू है क्या मेरे पास,

आपके पास आता हूँ आपने दिया क्या है मुझे परेशानियों के अलावा और दुखी मन से माथा टेक कर वापिस चला जाता लेकिन जब भी गुरू जी के पास वो बंदा बैठा होता ये शुक्राने वाला भजन जरूर लगता और बंदे को जख्म पर नमक की तरह महसूस होता और उल्टा सीधा सोचकर आज्ञा लेकर घर वापिस चला जाता जब भी आज्ञा लेने जाता तो गुरू जी को मन्द मन्द मुस्कुराते देखकर और बुरा लगता, खैर कुछ टाईम बाद आना ही छोड दिया, लगभग दो महीने बाद जब परेशानियाँ हद से ज्यादा बढ गयी तो गुरू साहिबजी याद आये और आ गया गुरू चरणो मे और उस दिन भी यही भजन सुनने को मिला बडे ही निराश मन से बैठा रहा शायद गुरू जी आज बुला ले और कल्याण कर दे मेरा, आखिर तक बैठा रहा जब गुरू जी ने नही बुलाया तो आज्ञा लेने गया तो गुरू साहिबजी कहने लगे ” बे जा (बैठ जा) मेरे कौल ते ओ जो दीवार नाल तीन बन्दे बैठे ने पता है कौन ने ?? उस बंदे ने कहा गुरू जी मैनू नही पता, गुरू जी ने केहा “ओ जो पहले दीवार दे नाल टोह लगाके बैठा है ओ अन्हा ( अन्धा ) है ते शुक्राना कर रेहा है “गुरू जी त्वाडा शुक्राना कि मै कम से कम अपने कन्नां (कान) नाल त्वाडी रबाबी ते रूहानी गुरूबाणी ते सुन रेहा हाँ आपदा हर पल शुक्राना मेरे वाहेगुरू जी,”

ते जो दूसरे नम्बर ते बैठा है ओ बहरा है सुन नही सकदा ते ओ वी बार बार शुक्राना कर रेहा है कि “हे मेरे गुरू जी अगर कान नही ने कोई गल्ल नही कम से कम अक्खां नाल त्वाडे सचखण्ड ते अपने भगवान गुरू जी दे दर्शन कर रेहा हाँ आपदा हर पल शुक्राना मेरे सतगुरू जी, ते तीजे नम्बर ते जो बैठा है ओहदे दोनो पैर नही ने बडी मुश्किल नाल दरबार विच आन्दा है ते शुक्राना करदा है कि “है मेरे सतगुरू जी की होया जे पैर नही हन कम से कम मेरे कौल दो अक्खां ने जिदे नाल मे त्वाडा नूरानी रूप देख सकदा हाँ कान दित्ते ने आपदी बख्शी दात गुरूबाणी सुन रेहा हाँ, महसूस कर सकदा हाँ, आपदा हर पल शुक्राना मेरे गुरू जी, तेनू ते मै सब कुछ दित्ता फैर क्यो नही शुक्राना करेंगा, किस दिन भूखा सूत्ता है तू या तेरा परिवार, कैडी ऐसी जरूरी लोड है जो पूरी नही कीत्ती बस ज्यादा नही दीत्ता क्योकि कुछ कर्म ऐसे होन्दे ने जो भुगतने पैन्दे ने ते मै तां तेरे नाल रहके तेरे कर्म भुगतवा रेहा हाँ अब बात उस बंदे की थी सारे भ्रम दूर हो गये थे आंखो पर छाया काला अन्धेरा मिट गया था और गुरू जी के चरणो मे गिरकर शुक्राना किया हमे गुरू जी से कुछ मांगने की जगह हर पल शुक्राना करना चाहिये समय आने पर उन्होने सब कुछ देना है इतना देना है कि हम संभाल भी नही पायेंगे.
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙇🏼

यह संसार एक धर्मशाला के समान है। जैसे धर्मशाला में लोग आते हैं, 2/4 दिन रहते हैं, और फिर अपनी अगली या वापसी यात्रा पर चल देते हैं।

“यह संसार एक धर्मशाला के समान है। जैसे धर्मशाला में लोग आते हैं, 2/4 दिन रहते हैं, और फिर अपनी अगली या वापसी यात्रा पर चल देते हैं।”
“इसी प्रकार से लोग संसार में आते हैं, 50/60/80 वर्ष तक यहां पर रहते हैं और अपनी अगली या वापसी यात्रा पर चल देते हैं अर्थात संसार रुपी धर्मशाला को छोड़कर कर चले जाते हैं।”

“जैसे लोग धर्मशाला में जाते हैं, 2/4 दिन रहते हैं‌। वहां अपने पड़ोसियों के साथ लड़ाई झगड़ा नहीं करते। बल्कि उनको कुछ न कुछ सहयोग देते ही हैं। कुछ कुछ सहयोग लेते भी हैं। परंतु वे जो भी व्यवहार करते हैं – प्रेमपूर्वक करते हैं।”

धर्मशाला में रहने वाले वे सभी लोग जानते हैं, कि “हम यहां 2/4 दिन के अतिथि हैं, स्थाई रूप से यहां नहीं रहेंगे। इस कारण से वे लोग प्रेमपूर्वक रहते हैं, और आपस में लड़ाई झगड़ा नहीं करते।”

यदि संसार में रहने वाले लोग भी, संसार को धर्मशाला के समान स्वीकार कर लें और ऐसा सोच लें, कि “कुछ समय तक ही तो यहां रहना है, फिर एक दिन तो यहां से वापस जाना ही है। हमारी वापसी का दिन भले ही निश्चित न हो फिर भी वापस जाने का टिकट तो कन्फर्म ही है। बस उसकी तारीख निश्चित नहीं है।” “न जाने किस दिन संसार से जाना पड़ जाए। तब सब कुछ यहीं छोड़कर जाना होगा।” “जो हमें यहां धन संपत्ति आदि सुविधाएं मिली हुई हैं, ये सब भी पूर्व जन्म के कुछ कर्मों का फल है। वे कर्म भी हमने केवल अपनी शक्ति से नहीं किए थे, बल्कि ईश्वर के दिए हुए शरीर मन बुद्धि विद्या आदि साधनों से किए थे। इसलिए इन कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त हुई इन संपत्तियों पर भी हमारा पूरा स्वामित्व (अधिकार = मालिकी) नहीं है। इन संपत्तियों का “प्रयोग करने का थोड़ा सा अधिकार मात्र” हमें ईश्वर ने दिया है, पूरा स्वामित्व नहीं। न ही हम इन्हें अपने साथ अगले जन्म में ले जा पाएंगे। इसलिए न तो हमारा कुछ है, और न ही दूसरों का। सबको, सब कुछ ईश्वर का दिया हुआ है। तो ईश्वर की दी हुई संपत्तियों पर हम आपस में क्यों झगड़ें? बल्कि ईश्वर से मिली इन सुविधाओं का चुपचाप लाभ ले लेना चाहिए, और शांति से जीवन जीना चाहिए।”

“बस, इतना यदि संसार के लोग समझ लें, तो आपस के लड़ाई झगड़े ईर्ष्या द्वेष छीन झपट लोभ क्रोध अभिमान आदि सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी, और संसार में प्रेममय उत्तम वातावरण बनेगा – जैसा कि धर्मशाला में होता है।”

एक शिष्य ने गुरु से पूछा गुरुदेव हमेशा खुश रहने का नुस्खा अगर हो तो दीजिए।

एक शिष्य ने गुरु से पूछा गुरुदेव हमेशा खुश रहने का नुस्खा अगर हो तो दीजिए।

गुरु बोले, बिल्कुल है आज तुमको वह राज बताता हूँ।

गुरु उस शिष्य को अपने साथ सैर पर ले गये ओर उस से अच्छी अच्छी बातें करते रहे! शिष्य बड़ा आनंदित था।

एक स्थान पर ठहर कर गुरु ने उस शिष्य को एक बड़ा पत्थर देकर कहा इसे उठाए उठाये मेरे साथ चलो।

पत्थर को उठाकर वह शिष्य गुरु के साथ-साथ चलने लगा। कुछ समय तक तो आराम से चला लेकिन थोड़ी देर में हाथ में दर्द होने लगा, पर दर्द सहन करता चुपचाप चलता रहा।

गुरु पहले की तरह मधुर उपदेश देते चल रहे थे पर शिष्य का धैर्य जवाब दे गया!

शिष्य ने कहा गुरूजी आपके प्रवचन मुझे प्रिय नहीं लग रहे! अब मेरा हाथ दर्द से फटा जा रहा है।

गुरु से पत्थर नीचे रखने का संकेत मिला तो उस युवक ने पत्थर को फेंका और आनंद में भरकर गहरी साँसे लेने लगा!

गुरु ने कहा *यही है खुश रहने का राज़!

मेरे प्रवचन तुम्हें तभी तक आनंदित करते रहे जब तक तुम बोझ से मुक्त थे परंतु पत्थर के बोझ ने उस आनंद को छीन लिया!

जैसे पत्थर को ज़्यादा देर उठाये रखेंगे तो दर्द बढ़ता जायेगा! उसी तरह हम दुखों या किसी की कही कड़वी बात के बोझ को जितनी देर तक उठाये रखेंगे उतना ही हमें दुःख होगा।*

अगर खुश रहना चाहते हो तो दु:ख रुपी, द्वेष रूपी, चिंता रूपी पत्थर को जल्दी से जल्दी नीचे रखना सीख लो! और हो सके तो उसे उठाओ ही नही- तभी जीवन का वास्तविक आनंद पाओगे।

🙏🙏 जय सच्चिदानंद🙏🙏
श्रद्धा ज्ञान देती है, नम्रता मान देती है, योग्यता स्थान देती है, तीनों मिल जाए तो व्यक्ति को हर जगह सम्मान देती है।

👉 आज से हम सम्माननीय बनें…

🌸🌸🌸🌸

Devotion gives knowledge, Politeness gives respect, and Capability gives space, When these three combine together, it gives a person honor everywhere!

👉 TODAY ONWARDS LET”S become honorable…

सबसे ऊँची प्रार्थना

सबसे ऊँची प्रार्थना

एक व्यक्ति जो मृत्यु के करीब था! मृत्यु से पहले वह अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और बताता है कि “जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएँ तो मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ! उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लग जाएँगे।

उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना कही और वह भर गया। अब बेटा चाँदी के सिक्कों से भरा थैला पाकर आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया। वह थैला इतना बड़ा था कि उसे खर्च करने में कई साल बीत गए! इस बीच वह प्रार्थना भूल गया।

जब थैला खत्म होने को आया तब उसे याद आया कि “अरे! वह चार शब्दों की प्रार्थना क्या थी।”

उसने बहुत याद किया और उसे याद ही नहीं आया। अब वह लोगों से पूँछने लगा। पहले पड़ोसी से पूछता है कि “ऐसी कोई प्रार्थना तुम जानते हो क्या? जिसमें चार शब्द हैं।

पड़ोसी ने कहा, “हाँ, एक चार शब्दों की प्रार्थना मुझे मालूम है, “ईश्वर मेरी मदद करो।”
उसने सुना और उसे लगा कि ये वे शब्द नहीं थे, कुछ अलग थे। कुछ सुना होता है तो हमें जाना-पहचाना सा लगता है। फिर भी उसने वह शब्द बहुत बार दोहराए लेकिन चाँदी के सिक्के नहीं बढ़े तो वह बहुत दुःखी हुआ।

फिर वह एक फादर से मिला! उन्होंने बताया कि, “ईश्वर तुम महान हो”
ये चार शब्दों की प्रार्थना हो सकती है मगर इसके दोहराने से भी थैला नहीं भरा।

वह एक नेता से मिला! उसने कहा, “ईश्वर को वोट दो!” यह प्रार्थना भी कारगर साबित नहीं हुई।

वह बहुत उदास हुआ! उसने सभी से मिलकर देखा मगर उसे वह प्रार्थना नहीं मिली जो पिताजी ने बताई थी।

वह उदास होकर घर में बैठा हुआ था तब एक भिखारी उसके दरवाजे पर आया।
उसने कहा, “सुबह से कुछ नहीं खाया, खाने के लिए कुछ हो तो दो।”

उस लड़के ने बचा हुआ खाना भिखारी को दे दिया। उस भिखारी ने खाना खाकर बर्तन वापस लौटाया और ईश्वर से प्रार्थना कि, “हे ईश्वर! तुम्हारा धन्यवाद।”

अचानक वह चौंक पड़ा और चिल्लाया कि “अरे! यही तो वह चार शब्द थे।”

उसने वे शब्द दोहराने शुरू किया कि, “हे ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद” और उसके सिक्के बढ़ते गए! बढ़ते गए! इस तरह उसका पूरा थैला भर गया। इससे समझें कि जब उसने किसी की मदद की तब उसे वह मंत्र फिर से मिल गया। “हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।”

यही उच्च प्रार्थना है क्योंकि जिस चीज के प्रति हम धन्यवाद देते हैं, वह चीज बढ़ती है। अगर पैसे के लिए धन्यवाद देते हैं तो पैसा बढ़ता है! प्रेम के लिए धन्यवाद देते हैं तो प्रेम बढ़ता है।

ईश्वर या गुरूजी के प्रति धन्यवाद के भाव निकलते हैं कि ऐसा ज्ञान का मौका हमें प्राप्त हुआ है। बिना किसी प्रयास से यह ज्ञान हमारे जीवन में बदलाव ला रहा है!

ज्ञान के बिना ऐसे अनेक लोग हैं – जो झूठी मान्यताओं में जीते हैं और उन्हीं मान्यताओं में ही मरते हैं। मरते वक्त भी उन्हें सत्य का पता नहीं चलता। उसी अंधेरे में जीते हैं, मरते हैं ।

ऊपर दी गई कहानी से समझें कि, “हे ईश्वर! तुम्हारा धन्यवाद!” ये चार शब्द, शब्द नहीं प्रार्थना की शक्ति हैं।

हम सब मिलकर एक साथ धन्यवाद दें उस ईश्वर को! जिसने हमें मनुष्य जन्म दिया और उसमें दी दो बातें – पहली “साँस का चलना” दूसरी “सत्य की प्यास।”

यही प्यास हमें खोजी से भक्त बनाएगी। भक्ति और प्रार्थना से होगा – आनंद, परम आनंद!

🙏🏽🙏🏼🙏सुप्रभात🙏🏾🙏🏻🙏🏿

सतत अभ्यास करो!!

सतत अभ्यास करो!!

एक साहब ने तोता पाल रखा था और उस से बहुत प्रेम करते थे!

एक दिन एक बिल्ली उस तोते पर झपटी और तोता उठा कर ले गई!

वो साहब रोने लगे तो लोगो ने कहा: भाई आप क्यों रोते हो? हम आपको दूसरा तोता ला देते हैं!

वो साहब बोले: मैं तोते की जुदाई पर नही रो रहा हूं।

फिर उनसे पूछा गया: फिर क्यों रो रहे हो?

कहने लगे: दरअसल बात ये है कि मैंने उस तोते को मंत्र सिखा रखा था जिसे वो सारा दिन मंत्र रटता रहता था! आज जब बिल्ली उस पर झपटी तो वो मंत्र पढ़ना भूल गया और टाएं टाएं करने लगा।

अब मुझे ये फिक्र खाए जा रही है कि मंत्र तो मैं भी पढ़ता हूँ लेकिन जब काल के दूत मुझ पर झपटेगें! न मालूम मेरी जबान से मंत्र निकलेगा या तोते की तरह टाएं-टाएं निकलेगी!

इसीलिए महापुरुष कहते हैं कि महाराजी से प्राप्त ज्ञान का अभ्यास इतना पक्का कर लो कि यह आपकी आदत बन जाय! इसके बिना हर पल फीका लगने लगे!

अगर थोड़ी भी लापरवाही हुई, अभ्यास करना छोड़ दिया तो अन्तिम समय ऐसा न हो हम भी तोते की तरह भगवान के नाम की जगह हाय-हाय करने लगें।
इसलिए निरंतर भजन अभ्यास बहुत ज़रूरी है!

आपका दिन मंगलमय हो!

गुरु ही ईश्वर है!

गुरु ही ईश्वर है!

स्वामी विवेकानंद एक बार एक रेलवे स्टेशन पर बैठे थे उनका अयाचक (ऐसा व्रत जिसमें किसी से मांग कर भोजन नहीं किया जाता) व्रत था। वह व्रत में किसी से कुछ मांग भी नहीं सकते थे। एक व्यक्ति उन्हें चिढ़ाने के लहजे से उनके सामने खाना खा रहा था।

स्वामी जी दो दिन से भूखे थे और वह व्यक्ति कई तरह के पकवान खा रहा था और बोलता जा रहा था कि बहुत बढ़िया मिठाई है। विवेकानंद ध्यान की स्थिति में थें और अपने गुरुदेव को याद कर रहे थे।

वह मन ही मन में बोल रहे थे कि गुरुदेव आपने जो सीख दी है उससे अभी भी मेरे मन में कोई दुख नहीं है। ऐसा कहते विवेकानंद शांत बैठे थे। दोपहर का समय था। उसी नगर में एक सेठ को भगवान श्रीराम ने दर्शन दिए और कहा कि रेलवे स्टेशन पर मेरा भक्त एक संत आया है उसे भोजन करा कर आओ उसका अयाचक व्रत है जिसमें किसी से कुछ मांग कर खाना नहीं खाया जाता है तो आप जाओ और भोजन करा कर आओ ।

सेठ ने सोचा यह महज कल्पना है । दोपहर का समय था सेठ फिर से करवट बदल कर सो गया । भगवान ने दोबारा दर्शन दिए और सेठ से कहा कि तुम मेरा व्रत रखते हो और तुम मेरा इतना सा भी काम नहीं करोगे । जाओ और संत को भोजन करा कर आओ ।

तब सेठ सीधा विवेकानंद के पास पहुंच गया और वह उनसे बोला कि मैं आपके लिए भोजन लाया हूं। सेठ बोला में आपको प्रणाम करना चाहता हूं कि ईश्वर ने मुझे सपने में कभी दर्शन नहीं दिए आपके कारण मुझे-श्रीरामजी के दर्शन सपने में हो गए इसलिए में आपको प्रणाम कर रहा हूं ।

विवेकानंद की आंखों में आंसू आ गए । वो सोचने लगे कि मैनें याद तो मैरे गुरुदेव को किया था। गुरुदेव और ईश्वर की कैसी महिमा है। स्वामी विवेकानंद की आंखों के आंसू रुक नहीं रहे थे, तब उन्हें लगा कि गुरु ही ईश्वर हैं |
………….. शुभ रात्रि……….

हृदय में आनंद हो तो वसंत कभी भी आ सकता है।

हृदय में आनंद हो तो वसंत कभी भी आ सकता है।

*जीवन परिवर्तनशील है! इसलिए वह हमेशा चक्र की भांति घूमता रहता है। इस घूमते हुए चक्र से ही ऋतुएं बनती हैं।

जैसे इन्सान के अलग-अलग मनोभाव होते हैं – कभी दृढ़, कभी प्रफुल्लित तो कभी शांत, कभी गर्म तो कभी अशान्त!
वैसे ही प्रकृति के भी मूड्स होते हैं और उसे ही ऋतु चक्र कहते हैं।

मनुष्य का मन और प्रकृति एक दूसरे के बहुत निकट हैं। इसलिए बदलते हुए मौसम मन को प्रभावित करते हैं। एक प्रकृति मनुष्य के बाहर है और एक प्रकृति भीतर है। जब बाहर प्रकृति बदलती है तो कहीं न कहीं अंतर्मन की प्रकृति को भी प्रभावित करती है।

जैसे मौसम बदलने से मन की भावनाएं, विचार, इच्छाएं, सब कुछ बदलता है। जब आसमान में घने बादल छा जाते हैं, तब मन के आसमान में भी उदासी छा जाती है और जब बाहर चिड़िया चहकती है और फूल खिलते हैं, तब मन भी वसंत हो जाता है।

इससे विपरीत , जब आदमी का मन बदलता है तो उसका असर प्रकृति पर दिखाई देता है। पर्यावरण की खराब हालत आदमी के हिंसक मन का ही असर है। दुखी आदमी पर्यावरण का विनाश करता है।

जिनके मन शांत और सुंदर होते हैं, वे अपने आसपास सौंदर्य की बगिया लगाते हैं, प्रकृति को खुशहाल रखते हैं, उसका आदर करते हैं।

भीतर अगर वासंतिक मनोभाव न हो! हृदय में बसंती रंग न छाया हो तो पीले कपड़े पहनकर भी वसंत बुझा-बुझा सा रहेगा, सुलग न पाएगा।*

हम सबके भीतर हमारा अपना वसंत छिपा हुआ है।
आइये, अपने अन्तरमन में भी झांकें, वहाँ के सोंदर्य का आनन्द लें!

🙏🙏 जय सच्चिदानंद🙏🙏