रास्ते पर पडा अनगढ़ पत्थर

*🙏🏻रास्ते पर पडा अनगढ़ पत्थर🙏🏻*

एक मूर्तिकार एक रास्ते से गुजरा और उसने संगमरमर के पत्थर की दुकान के पास एक बड़ा अनगढ़ संगमरमर का पत्थर राह के किनारे पड़ा देखा।
उसने दुकानदार से पूछा – *और सब पत्थर सम्भाल के भीतर रखे गए हैं। ये पत्थर बाहर क्यों डाला है ?*
उसने कहा, *ये पत्थर बेकार है। इसे कोई मूर्तिकार खरीदने को राजी नहीं है। लेकिन आपकी इसमें उत्सुकता है क्या ?*

मूर्तिकार ने कहा, * हाँ, इसमें मेरी उत्सुकता है।*

दूकानदार ने कहा, *आप इसको मुफ्त ले जाएँ। ये निकले यहाँ से तो जगह खाली हो बस इतना ही काफी है। ये आज दस वर्ष से यहाँ पड़ा है। कोई खरीददार नहीं मिलता। आप ले जाओ कुछ पैसे देने की जरूरत नहीं है। अगर आप कहो तो आपके घर तक पहुँचवाने का काम भी मैं कर देता हूँ।*

दो वर्ष बाद मूर्तिकार ने उस पत्थर के दुकानदार को अपने घर आमंत्रित किया कि *मैंने एक मूर्ति बनाई है। तुम्हें दिखाना चाहूँगा। वो तो उस पत्थर की बात भूल ही गया था। मूर्ति देखके तो दंग रह गया ऐसी मूर्ति शायद कभी बनाई नहीं गई थी।*

उस मूर्तिकार ने भगवान श्री कृष्ण का बाल रूप तराशा। मईया यशोदा श्री कृष्ण को गोद में खिला रही हैं। इतनी जीवंत कि उसे भरोसा नहीं आया।*

दुकानदार ने कहा, *ये पत्थर तुम कहाँ से लाए? इतना अद्भुत पत्थर तुम्हें कहाँ मिला?*

मूर्तिकार हँसने लगा उसने कहा *ये वही पत्थर है। जो तुमने व्यर्थ समझकर दुकान के बाहर फेंक रखा था और मुझे मुफ्त में दिया था। इतना ही नहीं। मेरे घर तक पहुँचा दिया था।*

*“क्या यह ही पत्थर है?” उस दुकानदार को तो भरोसा ही नहीं आया। उसने कहा, *तुम मजाक करते हो। उसको तो कोई लेने को भी तैयार नहीं था। दो पैसा देने को भी कोई तैयार नहीं था। तुमने उस पत्थर को इतना महिमा रूप, इतना लावण्य दे दिया! तुम्हें पता कैसे चला कि ये पत्थर इतनी सुन्दर प्रतिमा बन सकता है?*

मूर्तिकार ने कहा, *आँखें चाहिए – पत्थरों के भीतर देखने वाली आँख चाहिए।*

अधिकतर लोगों के जीवन भी अनगढ़ रह जाते हैं। जीवन नीरस लगने लगता है! कारण इतना ही कि *तरशानेवाला न मिलने के कारण हमारा जीवन अनगढ़ पत्थर है!*

*प्रत्येक व्यक्‍ति परमात्मा को अपने भीतर लिए बैठा है। जब सदगुरु मिलते हैं तो वह सत्संग रुपी छेनी से अपने शिष्य को तरासते हैं! वे आत्मज्ञान देते हैं जिससे अन्दर स्थित परमात्मा का दीदार होता है और जीवन के मायने समझ में आने लगता है कि यह कितना कीमती है!*
अन्यथा कहा है कि –
*ज्ञान बिना नर सोवहिं ऐसे, लवण बिना बहु व्यंजन जैसे!!*

हम सभी गुरुभक्तों के लिय खुश खबरी है कि *महाराजी ने हमें वह अंदर जाने की युक्ति प्रदान की है! बस हमें उस ज्ञान का सतत अभ्यास करना है!*
🙏🙏🙏🙏🙏

आज फिर एक सुन्दर प्रश्न आया…. एक युवक प्रश्न कर रहा था… उसने सहज भाव से पूछा…

आज फिर एक सुन्दर प्रश्न आया…. एक युवक प्रश्न कर रहा था… उसने सहज भाव से पूछा…

शास्त्रीजी… क्या सच में संसार के स्वामी चार महीने के लिए सो गये…

मैंने कहा… क्यों ? कोई शक…
युवक ने कहा-नहीं.. लेकिन यह भगवान विष्णु जगत के रचयिता हैं… और सोगये…. और वह भी चार महीने के लिए…. ब्रह्मांड के मामले कैसे चलेंगे…
शास्त्रीजी ने कहा-आपके
देश का प्रधानमंत्री एक हफ्ते के लिए विदेश चला जाता है…तो देश का कारोबार ठप हो जाता है?….अगर किसी एक कंपनी का अध्यक्ष एक महीने के लिए चला जाए तो क्या कंपनी नहीं चलती?

युवक ने कहा कि वो तो किसी को सत्ता सौंपके जाते है….

मैंने कहा कि इस दुनिया के मालिक भी सत्ता सौंप के जाते हैं…..

जगत के नाथ के सोते ही गुरु शक्ति जाग्रत हो जाती है….गुरु पूर्णिमा उत्सव आपको विश्वास दिलाता है कि… आपका ध्यान रखने के लिए गुरू परम्परा बैठी है …..जाग्रत है…

और फिर श्रावण मास में भगवान महादेव आपका ध्यान रखने को तैयार हैं….

श्रावण समाप्त होते ही विघ्नहर्ता गणेश की सवारी आ जाती है…. गणेशजी जब कैलाश जाते हैं तो आपके पितरों का उत्सव चालु होता है….तुम्हारे पिता तुम्हारा ध्यान रखते हैं….

पितृ उत्सव पूरा होते ही …. आद्य शक्ति माँ जगदम्बा शेर पर सवार होकर आती हैं…

और दिवाली पर… सरस्वती… लक्ष्मी…. और महाकाली तुम्हारा ख्याल रखती हैं….

और तुम तैयार हो जाते हो… देव- दिवाली का उत्सव धूमधाम से मनाने के लिए… क्योंकि जग का नाथ जाग गया है….

इस चातुर्मास में गुरु परंपरा आपको लगातार जाग्रत रखती है।

आप जाग्रत रहना… भगवान आपकी देखभाल करने के लिए आपके हृदय-कमल में ही बैठे हैं…

हरि ॐ 🙏😊

अभिमान अक्ल को खा जाता है!

*अभिमान अक्ल को खा जाता है!*
🌸🌸🌸🌸🌸🌸

एक घर के मुखिया को यह अभिमान हो गया कि *उसके बिना उसके परिवार का काम नहीं चल सकता।*

उसकी छोटी सी दुकान थी। उससे जो आय होती थी – उसी से उसके परिवार का गुजारा चलता था।

चूंकि कमाने वाला वह अकेला ही था इसलिए उसे लगता था कि *उसके बगैर कुछ नहीं हो सकता। इसलिय वह लोगों के सामने डींग हांका करता था।*

एक दिन वह एक संत के सत्संग में पहुंचा। संत कह रहे थे, *“दुनिया में किसी के बिना किसी का काम नहीं रुकता*
यह अभिमान व्यर्थ है कि *मेरे बिना परिवार या समाज ठहर जाएगा।सभी को अपने भाग्य के अनुसार प्राप्त होता है।”*

सत्संग समाप्त होने के बाद मुखिया ने संत से कहा, *“मैं दिन भर कमाकर जो पैसे लाता हूं उसी से मेरे घर का खर्च चलता है। मेरे बिना तो मेरे परिवार के लोग भूखे मर जाएंगे।”*

संत बोले, *“यह तुम्हारा भ्रम है। हर कोई अपने भाग्य का खाता है।”*

इस पर मुखिया ने कहा, *“आप इसे प्रमाणित करके दिखाइए।”*

संत ने कहा, *“ठीक है। तुम बिना किसी को बताए घर से एक वर्ष के लिए गायब हो जाओ।*

उसने ऐसा ही किया। संत ने यह बात फैला दी कि *उसे बाघ ने अपना भोजन बना लिया है। मुखिया के परिवार वाले कई दिनों तक शोक संतप्त रहे।*

*गांव वाले आखिरकार उनकी मदद के लिए सामने आए। एक सेठ ने उसके बड़े लड़के को अपने यहां नौकरी दे दी। गांव वालों ने मिलकर लड़की की शादी कर दी। एक व्यक्ति छोटे बेटे की पढ़ाई का खर्च देने को तैयार हो गया।*

एक वर्ष बाद मुखिया छिपता-छिपाता रात के वक्त अपने घर आया तो घर वालों ने भूत समझ कर दरवाजा नहीं खोला। जब वह बहुत गिड़गिड़ाया और उसने सारी बातें बताईं तो उसकी पत्नी ने दरवाजे के भीतर से ही उत्तर दिया – *हमें तुम्हारी जरूरत नहीं है। अब हम पहले से ज्यादा सुखी हैं।*

*उस व्यक्ति का सारा अभिमान चूर-चूर हो गया। संसार किसी के लिए भी नही रुकता!!*

सच्चाई यही है कि *यहाँ सभी के बिना काम चल सकता है! संसार सदा से चला आ रहा है और चलता रहेगा। जगत को चलाने की डींग भरने वाले बडे बडे सम्राट, मिट्टी हो गए, जगत उनके बिना भी चला है।*

*अतः अपने बल का, अपने धन का, अपने कार्यों का, अपने ज्ञान का गर्व व्यर्थ है।*

*🙏सेवा भाव ही सर्वोपरी है!*🙏🙏

*जो प्राप्त है- वही पर्याप्त है!*
*जिसका मन मस्त है!*
*उसके पास समस्त है!!*

राजा मोरध्वज

*💐💐राजा मोरध्वज 💐💐*

महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद अर्जुन को वहम हो गया कि वो श्री कृष्ण के सर्व श्रेष्ठ भक्त है,
अर्जुन सोचते हैं कि कन्हैया ने मेरा रथ चलाया, मेरे साथ रहे.. इसलिए मैं भगवान का सर्व श्रेष्ठ भक्त हूँ।
अर्जुन को क्या पता था कि वो केवल भगवान के धर्म की स्थापना का जरिया था। फिर भगवान ने उसका गर्व तोड़ने के लिए उसे एक परीक्षा का गवाह बनाने के लिए.. अपनें साथ ले गए।
श्री कृष्ण और अर्जुन ने जोगियों का वेश बनाया और वन से एक शेर पकड़ा और पहुँच जाते है, भगवान विष्णु के परम-भक्त राजा मोरध्वज के द्वार पर।
राजा मोरध्वज बहुत ही दानी और आवभगत वाले थे, अपने दर पर आये किसी को भी वो खाली हाथ और बिना भोज के जाने नहीं देते थे।
दो साधु एक सिंह के साथ दर पर आये है, ये जान कर राजा नंगे पांव दौड़ के द्वार पर गए और भगवान के तेज से नतमस्तक हो आतिथ्य स्वीकार करने के लिए कहा।
भगवान कृष्ण ने मोरध्वज से कहा कि हम मेजबानी तब ही स्वीकार करेंगे, जब राजा उनकी शर्त मानें.. राजा ने जोश से कहा आप जो भी कहेंगे मैं तैयार हूँ।
भगवान कृष्ण ने कहा: हम तो ब्राह्मण है, कुछ भी खिला देना.. पर ये सिंह नर भक्षी है, तुम अगर अपने इकलौते बेटे को अपने हाथों से मार कर इसे खिला सको तो ही हम तुम्हारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे।
भगवान की शर्त सुन मोरध्वज के होश उड़ गए, फिर भी राजा अपना आतिथ्य-धर्म नहीं छोडना चाहता था।
उसने भगवान से कहा: प्रभु !
मुझे मंजूर है, पर एक बार में अपनी पत्नी से पूछ लूँ ।
भगवान से आज्ञा पाकर राजा महल में गया तो राजा का उतरा हुआ मुख देख कर पतिव्रता (पत्नी) रानी ने राजा से कारण पूछा।
राजा ने जब सारा हाल बताया तो रानी के आँखों से अश्रु बह निकले। फिर भी वो अभिमान से राजा से बोली कि आपकी आन पर मैं अपने सैंकड़ों पुत्र कुर्बान कर सकती हूँ। आप साधुओ को आदर पूर्वक अंदर ले आइये।
अर्जुन ने भगवान से पूछा- माधव ! ये क्या माजरा है..??
आप ने ये क्या मांग लिया..??
कृष्ण बोले – अर्जुन तुम देखते जाओ और चुप रहो।
राजा तीनो को अंदर ले आये और भोजन की तैयारी शुरू की। भगवान को छप्पन भोग परोसा गया, पर अर्जुन के गले से उत्तर नहीं रहा था।
राजा ने स्वयं जाकर पुत्र को तैयार किया।
पुत्र भी तीन साल का था और नाम था रतन कँवर, वो भी मात पिता का भक्त था, उसने भी हँसते-हँसते अपने प्राण दे दिए, परंतु उफ़ ना की ।
राजा रानी ने अपने हाथो में आरी लेकर पुत्र के दो टुकड़े किये और सिंह को परोस दिया।
भगवान ने भोजन ग्रहण किया, पर जब रानी ने पुत्र का आधा शरीर देखा तो वो आंसू रोक न पाई।
भगवान इस बात पर गुस्सा हो गए कि लड़के का एक फाड़ कैसे बच गया..??
भगवान रुष्ट हो कर जाने लगे तो राजा-रानी रुकने की मिन्नतें करने लगे।
अर्जुन को अहसास हो गया था कि भगवान मेरे ही गर्व को तोड़ने के लिए ये सब कर रहे है।
वो स्वयं भगवान के पैरों में गिरकर विनती करने लगा और कहने लगा कि आपने मेरे झूठे मान को तोड़ दिया है।
राजा रानी के बेटे को उनके ही हाथो से मरवा दिया और अब रूठ के जा रहे हो, ये उचित नही है।
प्रभु ! मुझे माफ़ करो और भक्त का कल्याण करो।
तब केशव ने अर्जुन का घमंड टूटा जान रानी से कहा कि वो अपने पुत्र को आवाज दे।
रानी ने सोचा पुत्र तो मर चुका है, अब इसका क्या मतलब ।
पर साधुओं की आज्ञा मानकर उसने पुत्र रतन कंवर को आवाज लगाई।
कुछ ही क्षणों में चमत्कार हो गया ।
मृत रतन कंवर.. जिसका शरीर शेर ने खा लिया था, वो हँसते हुए आकर अपनी माँ से लिपट गया।
भगवान ने मोरध्वज और रानी को अपने विराट स्वरुप का दर्शन कराया। पूरे दरबार में वासुदेव कृष्ण की जय जय कार गूंजने लगी।
भगवान के दर्शन पाकर अपनी भक्ति सार्थक जान मोरध्वज की ऑंखें भर आई और वो बुरी तरह बिलखने लगे।
भगवान ने वरदान मांगने को कहा तो राजा रानी ने कहा: भगवान एक ही वर दो कि अपने भक्त की ऐसी कठोर परीक्षा न ले, जैसी आप ने हमारी ली है।
तथास्तु कहकर भगवान ने उसको आशीर्वाद दिया और पूरे परिवार को मोक्ष दिया।

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

गुरु की सीख

*गुरु की सीख*

पुराने समय में एक आश्रम में गुरु और शिष्य मूर्तियां बनाने का काम करते थे।

मूर्तियां बेचकर जो धन मिलता था, उससे ही दोनों का जीवन चल रहा था।

गुरु की वजह से शिष्य बहुत अच्छी मूर्तियां बनाने लगा था और उसकी मूर्तियां ज्यादा कीमत में बिकने लगी थी।

कुछ ही दिनों शिष्य को इस बात घमंड होने लगा था कि *वह ज्यादा अच्छी मूर्तियां बनाने लगा है!*

लेकिन गुरु उसे रोज यही कहते थे कि *बेटा और मन लगाकर काम करो। काम में अभी भी पूरी कुशलता नहीं आई है।*

ये बातें सुनकर शिष्य को लगता था कि *गुरुजी की मूर्तियां मुझसे कम दाम में बिकती हैं, शायद इसीलिए ये मुझसे जलते हैं और ऐसी बातें करते हैं।*

जब कुछ दिनों तक लगातार गुरु ने उसे अच्छा काम करने की सलाह दी तो *एक दिन शिष्य को गुस्सा आ गया।*

शिष्य ने गुरु से कहा कि *गुरुजी मैं आपसे अच्छी मूर्तियां बनाता हूं! मेरी मूर्तियां ज्यादा कीमत में बिकती हैं! फिर भी आप मुझे ही सुधार करने के लिए कहते हैं।*

गुरु समझ गए कि *शिष्य में अहंकार आ गया है, तभी ये क्रोधित हो रहा है।*

उन्होंने शांत स्वर में कहा कि *बेटा जब मैं तुम्हारी उम्र का था, तब मेरी मूर्तियां भी मेरे गुरु की मूर्तियों से ज्यादा दाम में बिकती थीं। एक दिन मैंने भी तुम्हारी ही तरह मेरे गुरु से भी यही बातें कही थीं। उस दिन के बाद गुरु ने मुझे सलाह देना बंद कर दिया और मेरी कला का विकास नहीं हो पाया।*

मैं नहीं चाहता कि *तुम्हारे साथ भी वही हो जो मेरे साथ हुआ था।*

ये बातें सुनकर *शिष्य शर्मिंदा हो गया और गुरु से क्षमा मांगी।*

इसके बाद वह गुरु की हर आज्ञा का पालन करता और धीरे-धीरे उसे अपनी कला की वजह से दूर-दूर तक ख्याति मिलने लगी।

इस प्रसंग की सीख यह है कि *हमें भी अपने गुरु महाराजी की आज्ञा का पूरा सम्मान और पालन करना चाहिए और गुरु की दी हुई सलाह पर गंभीरता से अमल करना चाहिए। गुरु के सामने कभी भी अपनी कला पर घमंड नहीं करना चाहिए वरना हमारी योग्यता में निखार नहीं आ पाएगा, हमारा आत्मविकास रुक जायेगा!*
क्योंकि यह सन्तों ने कहा है कि –
*”गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोक्ष!*
*गुरू बिन लखै न सत्य को, गुरू बिन मिटै न दोष!!”*
*🙏🏻सुप्रभात*🙏🏽🙏🏾🙏🏼

गुरूपर्णिमा पर गुरु जी को भेंट

गुरूपर्णिमा पर गुरु जी को भेंट🌹
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दीदार करके आप का, मन मुग्ध हो गया,
भूला हूँ इस जहान को,अपने में खो गया।

दुनियाँ जो प्यारी लगती थी, अब लगने लगा है डर।
सुख में सभी हैं साथी, दुख में न हम सफर।
कांटे पड़े थे राहों में, तुमने हटा दिया।
भूला हूँ इस जहान को अपने में खो गया।

सारे जहाँ में आप का जलवा बिखर गया,
छोटा बड़ा न आप की नजरों में रह गया।
सबको गले लगाया, जो पास आ गया।
भूला हूँ इस जहां को अपने में खो गया।

सर्वज्ञ व सर्वस्व प्रभु आप ही तो हैं,
चर व अचर के स्वामी प्रभु आप ही तो है,
जाना श्रवण ने आप को ,फिर आप का हुआ।
भूला हूँ इस जहाँ को,अपने में खो गया।

विनती प्रभु है आप से, जब छूटे तन मेरा,
कोई न याद आवे ,बस याद हो तेरा।
पल पल करूँ मैं चिन्तन,यही यत्न है किया।
भूला हूँ इस जहाँ को , अपने में खो गया।
हृदय के उद्गार
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

आज गुरु पूर्णिमा है! 

आज गुरु पूर्णिमा है! आज के दिन शिष्य अपने गुरु के प्रति समर्पित भाव से पूजा करता है! अपनी कृतज्ञता वयक्त करता है!

हमारे शास्त्रों में गुरु को भगवान से भी बड़ा स्थान दिया गया है।
संत कबीर जी ने भी गुरु की तुलना भगवान से करते हुए कहा है-

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए।।

मान्यताओं के अनुसार, गुरु पूर्णिमा के दिन परम ज्ञानी महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। सदियों से महर्षि वेदव्यास के जन्म पर गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु पूजन की परंपरा चली आ रही है। वेद व्यास जी को महाभारत जैसे कई महान ग्रंथों और पुराणों की रचना के लिए सनातन धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। व्यास जी ने ही वेदों को अलग-अलग खंडों में भी बांटने के बाद उनका नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद रखा। वेदों का इस प्रकार विभाजन करने के कारण ही वह वेदव्यास जी के नाम से प्रसिद्ध हुए।

जैसा कि ये कहा जाता है कि किसी भी समाज की दिशा एवं दशा निर्धारित करने में गुरुजनों का विशेष योगदान होता है। गुरुजन ज्ञान के उजाले से जीवन के अंधकार को दूर कर देते हैं, उनके मार्गदर्शन के बिना व्यक्ति के लिए जीवन में आगे बढ़ना कठिन है। गुरु का आशीर्वाद ही प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी, ज्ञानवर्धक और मंगल करने वाला होता है। यहां तक कि संसार की सम्पूर्ण विद्याएं गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती हैं। गुरु पूर्णिमा ऐसे ही सभी महान गुरुजनों को समर्पित है और एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है।

आपको बता दें इस वर्ष पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि 13 जुलाई को सुबह 4 बजे प्रारंभ होगी और 14 जुलाई को मध्य रात्रि में 12 बजकर 6 मिनट पर समाप्त होगी।

गुरु पर्व हम सभी के लिय हमारे गुरु महाराजी के उपकारों को याद दिलाने का दिन है! हम सभी गुरु भक्तों के लिय हर साल दो बार गुरु पर्व मनाने का अवसर मिलता है क्योंकि 31 जुलाई, 1966 को समय सदगुरू, मार्गदर्शक, विश्वविख्यात शांतिदूत श्री प्रेम रावत ने पूरे संसार में शांति का सन्देश फ़ैलाने की जिम्मेदारी ली और उनका यह प्रयास आज भी अनवरत जारी हैं! जिन लोगों ने उनसे अपने आप को जानने कि विधि पायी है वे इस दिन को गुरुपूजा पर्व के रूप में बड़ी श्रृद्धा से मनाकर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता वयक्त करते हैं!

मुझे विश्वास है कि आप सभी आतुर होंगे इस पर्व को मनाने के लिय – इसलिय अग्रिम रूप से मेरी ओर से सभी गुरु भाए-बहनों को गुरु पूजा पर्व की हार्दिक शुभकामनायें !

कर्म का फल

*कर्म का फल*

एक गांव था ! वह ऐसी जगह बसा था – जहाँ आने जाने के लिए एक मात्र साधन नाव थी, क्योंकि बीच में नदी पड़ती थी और कोई रास्ता भी नहीं था।

एक बार उस गाँव में महामारी फैल गई और बहुत सी मौते हो गयी, लगभग सभी लोग वहाँ से जा चुके थे।

अब कुछ ही गिने चुने लोग बचे थे और वो नाविक गाँव में बोलकर आ गया था कि *मैं इसके बाद नहीं आऊँगा जिसको चलना है वो आ जाये।*

सबसे पहले एक भिखारी आ गया और बोला *मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है, मुझे अपने साथ ले चलो, ईश्वर आपका भला करेगा!*

नाविक सज्जन पुरुष था। उसने कहा कि *यही रुको, यदि जगह बचेगी तो तुम्हें मैं ले जाऊँगा।*

धीरे -धीरे करके पूरी नाव भर गई सिर्फ एक ही जगह बची !

नाविक भिखारी को बोलने ही वाला था कि *एक आवाज आयी रुको मैं भी आ रहा हूँ।*

यह आवाज जमीदार की थी, जिसका धन-दौलत से लोभ और मोह देख कर उसका परिवार भी उसे छोड़कर जा चुका था।

अब सवाल यह था कि *किसे लिया जाए!*

जमीदार ने नाविक से कहा – *मेरे पास सोना चांदी है! मैं तुम्हें दे दूँगा और भिखारी ने हाथ जोड़कर कहा कि *भगवान के लिए मुझे ले चलो।*

नाविक समझ नहीं पा रहा था कि *क्या करूँ?* तो उसने फैसला नाव में बैठे सभी लोगों पर छोड़ दिया और वो सब आपस में चर्चा करने लगे।

इधर जमीदार सबको अपने धन का प्रलोभन देता रहा और उसने उस भिखारी को बोला – *ये सबकुछ तू ले ले! मैं तेरे हाथ पैर जोड़ता हूँ! मुझे जाने दे!*

तो भिखारी ने कहा, *मुझे भी अपनी जान बहुत प्यारी है अगर मेरी जिंदगी ही नहीं रहेगी तो मैं इस धन दौलत का क्या करूँगा? जान है तो जहान है!*

तो सभी ने मिलकर ये फैसला किया कि *ये जमीदार ने आज तक हमसे लूटा ही है! ब्याज पर ब्याज लगाकर हमारी जमीन अपने नाम कर ली!*
और माना कि *ये भिखारी हमसे हमेशा माँगता रहा पर उसके बदले में इसने हमें खूब दुआएं दी और इस तरह भिखारी को साथ में ले लिया गया!*

बस यही सही फैसला था!
*ईश्वर भी वही हमारे साथ हमारे कर्मों के हिसाब से ही फल देता है! जब अंत समय आता है, तो वो सारे कर्मों का लेखा-जोखा हमारे सामने रख देता हैं और फैसले उसी हिसाब से होते हैं फिर रोना गिड़गिगिड़ाना काम नहीं आता ! केवल शुभ कर्म ही साथ होते है।*

महापुरुष यही समझाते हैं कि *समय रहते चेत जाना चाहिय! जब तक स्वांस आ रही है और जा रही है तो यह जीवन है! इसलिय जीते जी अभ्यास करना चाहिय! अपने नेक कर्मों में इजाफ़ा करना है और सदा याद रखना है कि –
*मेरे दाता की दुकान में सब दुनिया का खाता!*
*जो जैसा कर्म करेगा वह वैसा ही फल पाता!!*

कर्ताभाव का अहंकार छोड़ – महापुरुषों के इशारे को समझें!

🌺*कर्ताभाव का अहंकार छोड़ – महापुरुषों के इशारे को समझें!* 🌺

एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे! रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि *प्रभु, एक जिज्ञासा है मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ?*

श्री कृष्ण ने कहा: *अर्जुन, तुम मुझसे बिना किसी हिचक, कुछ भी पूछ सकते हो।*

तब अर्जुन ने कहा कि, *मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ, परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं?*

यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले कि, *आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शांत करूंगा।*

*श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को सोने का बना दिया।*

इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि *हे अर्जुन, इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो।*

अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिये। उन्होंने सभी गाँव वालों को बुलाया।

उन्होंने लोगों को कहा कि *सब लोग पंक्ति बना लें अब मैं आपको सोना बाटूंगा और सोना बांटना शुरू कर दिया।*

गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी। अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए।

लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे। उनमे अब तक अहंकार आ चुका था।

गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे। इतने समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे। लेकिन *जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे! उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी।*

उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि *अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए।*

प्रभु ने कहा कि *ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण बुला लिया।*

उन्होंने कर्ण से कहा कि *इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो।*

*कर्ण तुरंत सोना बांटने चल दिये।*

उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा: *यह सोना आप लोगों का है, जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये।* ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए।

यह देख कर अर्जुन सोच में पड़ गये और श्री कृष्ण से बोले कि *ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया होगा?*

श्री कृष्ण ने अर्जुन को शिक्षाप्रद भाव से जवाब दिया कि *तुम्हे सोने से मोह हो गया था। तुम खुद यह निर्णय कर रहे थे कि किस गाँव वाले की कितनी जरूरत है।*
उतना ही सोना तुम पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे और तुम में दाता होने का भाव भी आ गया था!*

दूसरी तरफ *कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए।*

वह नहीं चाहते थे कि *उनके सामने कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे। उनके पीठ पीछे भी लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता।*

यह उस आदमी की निशानी है *जिसे आत्मज्ञान हांसिल हो चुका है।*

इस तरह श्री कृष्ण ने खूबसूरत तरीके से अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया! अर्जुन को भी अब अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था कि *दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना भी उपहार नहीं सौदा कहलाता है।*

यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं तो हमे यह बिना किसी उम्मीद या आशा के करना चाहिए ताकि यह हमारा सत्कर्म हो, न कि हमारा अहंकार।
हम सभी आत्मज्ञानियों को जिस दिन ज्ञानदाता की सर्वज्ञता का अहसास होगा, उनके अपार शक्ति तरह से समझ में आने लगेगी कि –
*गुरु कर्ता गुरु करने योग!*
*गुरु परमेश्वर है भी होग!!*

सदगुरु और शिष्य

सदगुरु और शिष्य

किसी संत के पास एक बहरा आदमी सत्संग सुनने आता था! उसके कान तो थे पर वे नाड़ियों से जुड़े नहीं थे। एकदम बहरा! एक शब्द भी सुन नहीं सकता था । किसी ने संतश्री से कहा कि *”बाबा जी ! वे जो वृद्ध बैठे हैं, वे कथा सुनते-सुनते हँसते तो हैं पर वे बहरे हैं!*

वह बहरा व्यक्ति मुख्यतः दो बार हँसते हैं – *एक तो कथा सुनते-सुनते जब सभी हँसते हैं तब और दूसरा अनुमान करके बात समझते हैं तब अकेले हँसते हैं।*

बाबा जी ने कहा *”जब वह बहरा है तो कथा सुनने क्यों आता है?*

*वह व्यक्ति नियमित रूप से रोज एकदम समय पर पहुँच जाता है। चालू कथा से उठकर चला जाय ऐसा भी नहीं है, घंटों बैठा रहता है।“*

बाबाजी सोचने लगे कि *”यदि वह बहरा होगा तो कथा सुनता नहीं होगा और कथा नहीं सुनता होगा तो रस नहीं आता होगा। रस नहीं आता होगा तो उसे यहाँ बैठना भी नहीं चाहिए! उठकर चले जाना चाहिए लेकिन यह तो जाता भी नहीं है !”*

बाबाजी ने उस वृद्ध को बुलाया और उसके कान के पास ऊँची आवाज में कहा कि *क्या आपको कथा सुनाई पड़ती है?“*

उसने कहा *”क्या बोले महाराज?“*

बाबाजी ने आवाज और ऊँची करके पूछा कि *”मैं जो कथा कहता हूँ, क्या वह आपको सुनाई पड़ता है?“*

उसने फिर कहा :- *”क्या बोले महाराज?“*

बाबाजी समझ गये कि *यह नितांत बहरा आदमी है! बाबाजी ने सेवक से कागज कलम मँगाया और लिखकर पूछा!

तब वृद्ध ने बतलाया कि *”मेरे कान पूरी तरह से खराब हैं। मैं एक भी शब्द नहीं सुन सकता हूँ।“*

फिर उनके बीच लिखित में प्रश्नोत्तर शुरू हो गया।

बाबाजी ने कहा कि *जब तुम सुन ही नहीं सकते तो फिर सत्संग में क्यों आते हो?*

उसने उत्तर दिया कि बाबाजी ! मैं सुन तो नहीं सकता हूँ लेकिन यह तो समझता हूँ कि *जब संसारी आदमी बोलता है तो उसकी वाणी मन व बुद्धि को छूकर आती है लेकिन ब्रह्मज्ञानी संत जब बोलते हैं तो उनकी वाणी आत्मा को छूकर आती हैं यानी *मन बुद्धि से छूकर आने वाली बात कभी दिल तक नहीं पहुचती लेकिन इन बाहरी इन्द्रियों के ना होने पर भी सन्त ह्रदय की बात समझ में आने लगती हैं!*
इसलिय मैं बताना चाहता हूँ कि – *मैं आपकी अमृतवाणी तो नहीं सुन पाता हूँ पर उस पवित्र वातावरण का स्पन्दन मेरे हृदय को स्पर्श करता है।*
दूसरी बात *आपकी अमृतवाणी सुनने के लिए जो पुण्यात्मा लोग आते हैं उनके बीच बैठने का पुण्य भी मुझे प्राप्त होता है!“*

बाबा जी ने लगा कि *ये तो ऊँचे विचारों के ज्ञानी व्यक्ति हैं।
उन्होंने कहा कि *”तब तो आपको आगे से दो बार हँसने का अधिकार है! लेकिन मैं एक बात और जानना चाहता हूँ कि *आप रोज सत्संग में समय पर पहुँच जाते हैं और आगे बैठते हैं! ऐसा क्यों?“*

उस व्यक्ति ने सहज भाव से कहा कि *”मैं परिवार में सबसे बड़ा सदस्य हूँ। बड़े जैसा करते हैं उनकी देखा देखी वैसा ही छोटे भी करते हैं।*

जब मैं सत्संग में आने लगा तो मेरा बड़ा लड़का भी इधर आने लगा। शुरुआत में कभी-कभी मैं बहाना बना के उसे ले आता था। मैं उसे ले आया तो वह अपनी पत्नी को यहाँ ले आया! पत्नी बच्चों को ले आयी – सारा कुटुम्ब सत्संग में आने लगा! * इस प्रकार मेरे सारे कुटुंब को अच्छे संस्कार मिल गये!“*
🪷🪷🪷🪷
शास्त्रों में कहा गया है कि जब अनेक जन्मों का पुण्य उदय होता है तब *सत्संग* मिलता है और जब मनुष्य की पाप की गठरी खुलने लगती है तब *कुसंग* मिलता है।
🪷🪷🪷🪷
हम सब गुरुभक्तों के लिय ख़ुशी की बात है कि *हमको समय के सदगुरु का सानिध्य और सत्संग मिलता है!* हम सब जानते हैं कि *करोना जैसी आपदा में भी महाराजी ने अपने सीमित साधनों के माध्यम से हमारे लिय सत्संग की सरिता बहा दी!*

इससे बड़ी बात हमारे जीवन में क्या ही हो सकती हैं कि *हम सबको महाराजी का मार्गदर्शन मिल रहा है और महाराजी देश, काल, परिस्थितियों के हिसाब से हर बाहरी चीज में परिवर्तन करते हुए हमें हर हाल में आनन्दित कर रहे हैं!*

जैसा कि उस बहरे व्यक्ति ने उक्त कहानी में कहा है कि *मन बुद्धि से छूकर आने वाली बात कभी दिल तक नहीं पहुचती लेकिन इन बाहरी इन्द्रियों के ना होने पर भी सन्त ह्रदय की बात समझ में आने लगती हैं!*

*इस बात का जिक्र महाराजी भी अपने सत्संग में भी करते हैं!*

लेकिन कभी कभी हम लोग मन बुद्धि के प्रभाव में इतने आने लगते हैं कि *महाराजी ने विगत 10 साल पहले ये कहा था, पांच साल पहले वो बोला था – उसको आज की परिस्थिति में फिट करने की कोशीश करते हैं और यह भूल जाते हैं कि *महाराजी इस बार क्या करने के लिय कह गये हैं!*

जब हमारा अपना मन हमसे छल करता है तो *वह हमारे हर उस स्वास की कमाई को बर्बाद करता है जिसके बारे में महाराजी बार-बार समझाते हैं कि वही स्वांस सबसे सा है!*

हम खुद विचार करें कि *हम दूसरे को गलत और अपने को सही ठहराने के चक्कर में अपना नुकसान क्यों कर रहे हैं?*

हमें यह समझना होगा कि *समय के सदगुरु लकीर के फकीर नहीं होते!* उनमें क्षमता होती है कि *वह कुछ भी कर सकते हैं! इसीलिय उनको सर्व समर्थ कहा गया है!*

*जो सदगुरु बहरे को अपना सन्देश सुनाने की क्षमता रखते हों, अंधे को को अपना दिग्दर्शन करते हों अगर उनके वक्तव्यों का विश्लेषण मेरा जैसा अदना व्यक्ति करने लगे तो इसे मेरी विमति ही माना जायेगा!*

जब हम अपनी आरती में रोज प्रार्थना करते हैं कि –
*गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।*
*गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥*
गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु हीं शिव हैं! *गुरु हीं साक्षात् परब्रह्म है!* उन सद्गुरु को प्रणाम है!

और उस *परम ब्रहम* की योग्यता का बखान रामायण में साफ साफ वर्णित है कि –

*बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।*
*कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥*

*आनन रहित सकल रस भोगी।*
*बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥*

*तन बिनु परस नयन बिनु देखा।*
*ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥*

*असि सब भाँति अलौकिक करनी।*
*महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥*
अर्थात –
वह (ब्रह्म) बिना ही पैर के चलता है! बिना ही कान के सुनता है! बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है! बिना मुँह (जिह्वा) के ही सारे (छहों) रसों का आनंद लेता है और बिना वाणी के बहुत योग्य वक्ता है।

वह बिना शरीर (त्वचा) के ही स्पर्श करता है! आँखों के बिना ही देखता है और बिना नाक के सब गंधों को ग्रहण करता है (सूँघता है)। उस ब्रह्म की करनी सभी प्रकार से ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती।

सदगुरु की इतनी अलोकिक और अपार शक्ति का *क्या कभी हमें अहसास होता है कि हम किस शक्ति के शिष्य हैं?*
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यह सब लिखने के लिय मुझे इसलिय विवश होना पड़ा कि *अभी भी कुछ प्रेमी कन्फूज हैं और अपने मन के भ्रम को सोशियल मिडिया में प्रसारित करके अन्य मासूम प्रेमियों को भी कन्फूज कर रहे हैं! जो कि सर्वथा गलत है!

जबकि महाराजी ने *प्रेरणा* कार्यक्रमों के माध्यम से स्पस्ट मार्गदर्शन दिया था कि *सब प्रेमी एकजुट होकर, एक मति से उनके सन्देश की पहुच सभी मानव ह्रदयों तक पहुँचाने की सेवा में लगें!*

इसलिय मेरी व्यक्तिगत विनती है कि *सभी प्रेमियों को महाराजी की इस भावना की कदर करनी चाहिय, सेवा, सत्संग और भजन अभ्यास पर अपना समय लगाना चाहिय साथ ही महाराजी के संदेशों की अपने तरीके से व्याख्या करने तथा उसे सोशियल ग्रुपों में अनावश्यक पोस्ट करने से बचना चाहिय! अगर कोई बात समझ में ना आये तो बार बार महाराजी के संदेशों को दिल लगाकर सुनें! महाराजी के अलावा कोई हमें भ्रमजाल से नहीं बचा सकता!*

*सादर जय सचिच्दानंद!*