सफल जीवन

सफल जीवन

एक बार एक शिष्य ने अपने गुरू से पुछा- गुरुदेव ये सफल जीवन क्या होता है?

गुरु शिष्य को पतंग उड़ाने ले गए! शिष्य गुरु को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था।

थोड़ी देर बाद शिष्य बोला- गुरुदेव ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की ओर नहीं जा पा रही है। क्या हम इसे तोड़ दे? ताकि इसके और ऊपर जाने में आसानी हो।

गुरु ने धागा तोड़ दिया! पतंग थोड़ा सा ऊपर गई और उसके बाद लहराकर नीचे आई और अनजान जगह पर जा कर गिर गई।

तब गुरु ने शिष्य को जीवन का दर्शन समझाया। बेटे जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर है। हमें अकसर लगता है कि कुछ चीजें जिनसे हम बंधे हैं, वह हमें और ऊपर जाने से रोक रही है – जैसे घर, परिवार, अनुशासन, माता-पिता, गुरु और समाज; हम उनसे आजाद होना चाहते हैं।

वास्तव में, यही वो धागा होते हैं- जो हमे उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं। इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा, जो बिन धागे की पतंग का हुआ।

जीवन में यदि तुम ऊंचाई पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना, धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली ऊंचाई को ही सफल जीवन कहते हैैं।

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एक बढ़ाई (Carpenter) शाम को अपनी दुकान बंद कर घर चला गया।

एक बढ़ाई (Carpenter) शाम को अपनी दुकान बंद कर घर चला गया।

जब वह चला गया, तो एक ज़हरीला सांप दुकान के अंदर घुस गया। सांप भूखा था। इस आशा में की कुछ खाने को मिल जाए, वह इधर उधर रेंगने लगा।

इसी बीच वो एक कुल्हाड़ी से टकरा गया और थोड़ा सा चोटिल हो गया।

उसे गुस्सा आ गया और बदला लेने के लिए उसने कुल्हाड़ी को डंक मार दिया। सांप का डंक उस धातु की कुल्हाड़ी का क्या बिगाड़ लेगा? उल्टा सांप के मुंह से ही खून निकलने लग गया।

गुस्से और अहंकार से वो सांप पागल हो गया और उस कुल्हाड़ी को मारने के लिए हर संभव कोशिश करने लगा। उसको बहुत दर्द हो रहा था। फिर भी वो उस कुल्हाड़ी के चारो और लिपट गया। फिर क्या हुआ होगा, आप अच्छी तरह से जानते सकते हैं।

अगले दिन जब कारपेंटर ने दरवाजा खोला, तो देखा की कुल्हाड़ी के लिपटा हुआ सांप मरा पड़ा था।

हकीकत यही थी कि वह सांप किसी और की गलती से नहीं मरा हैं। बल्कि उसकी ये हालत खुद की अकड़ और गुस्से के कारण हुई हैं।

इसी प्रकार हमें भी जब गुस्सा आता हैं तो हम दूसरों को नुकसान पहुंचाने का काम करते हैं। लेकिन कुछ समय बीतने के बाद हमें ये अहसास होता हैं कि हमने अपने को दूसरों से और ज्यादा नुकसान पंहुचा दिया हैं।
यह जरुरी नहीं हैं कि हम हर चीज़ पर प्रतिक्रिया (React) करें!

बल्कि एक कदम पीछे हटकर ये सोचे कि क्या इस मामले में प्रतिक्रिया देनी जरुरी है या नहीं!
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यह भी नहीं रहने वाला

यह भी नहीं रहने वाला

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साधू की खूब सेवा की। दूसरे दिन आनंद ने बहुत सारे उपहार देकर साधू को विदा किया। साधू ने आनंद के लिए प्रार्थना की – “भगवान करे तू दिनों दिन बढ़ता ही रहे।” साधू की बात सुनकर आनंद हँस पड़ा और बोला – “अरे, महात्मा जी! जो है यह भी नहीं रहने वाला ।” साधू आनंद की ओर देखता रह गया और वहाँ से चला गया ।

दो वर्ष बाद साधू फिर आनंद के घर गया और देखा कि सारा वैभव समाप्त हो गया है । पता चला कि आनंद अब बगल के गाँव में एक जमींदार के यहाँ नौकरी करता है । साधू आनंद से मिलने गया। आनंद ने अभाव में भी साधू का स्वागत किया । झोंपड़ी में फटी चटाई पर बिठाया । खाने के लिए सूखी रोटी दी । दूसरे दिन जाते समय साधू की आँखों में आँसू थे । साधू कहने लगा – “हे भगवान् ! ये तूने क्या किया ?”

आनंद पुन: हँस पड़ा और बोला – “महाराज आप क्यों दु:खी हो रहे है ? महापुरुषों ने कहा है कि भगवान् इन्सान को जिस हाल में रखे, इन्सान को उसका धन्यवाद करके खुश रहना चाहिए। समय सदा बदलता रहता है और सुनो ! यह भी नहीं रहने वाला।”

साधू मन ही मन सोचने लगा – “मैं तो केवल भेष से साधू हूँ । सच्चा साधू तो तू ही है, आनंद।” कुछ वर्ष बाद साधू फिर यात्रा पर निकला और आनंद से मिला तो देखकर हैरान रह गया कि आनंद तो अब जमींदारों का जमींदार बन गया है । मालूम हुआ कि जिस जमींदार के यहाँ आनंद नौकरी करता था वह सन्तान विहीन था, मरते समय अपनी सारी जायदाद आनंद को दे गया। साधू ने आनंद से कहा – “अच्छा हुआ, वो जमाना गुजर गया । भगवान् करे अब तू ऐसा ही बना रहे।” यह सुनकर आनंद फिर हँस पड़ा और कहने लगा – “महाराज ! अभी भी आपकी नादानी बनी हुई है।”साधू ने पूछा – “क्या यह भी नहीं रहने वाला ?” आनंद उत्तर दिया – “हाँ! या तो यह चला जाएगा या फिर इसको अपना मानने वाला ही चला जाएगा । कुछ भी रहने वाला नहीं है और अगर शाश्वत कुछ है तो वह है परमात्मा और उस परमात्मा की अंश आत्मा।” आनंद की बात को साधू ने गौर से सुना और चला गया। साधू कई साल बाद फिर लौटता है तो देखता है कि आनंद का महल तो है किन्तू कबूतर उसमें गुटरगूं कर रहे हैं, और आनंद का देहांत हो गया है। बेटियाँ अपने-अपने घर चली गयीं, बूढ़ी पत्नी कोने में पड़ी है ।

साधू कहता है – “अरे इन्सान! तू किस बात का अभिमान करता है ? क्यों इतराता है ? यहाँ कुछ भी टिकने वाला नहीं है, दु:ख या सुख कुछ भी सदा नहीं रहता। तू सोचता है पड़ोसी मुसीबत में है और मैं मौज में हूँ । लेकिन सुन, न मौज रहेगी और न ही मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा। सच्चे इन्सान वे हैं, जो हर हाल में खुश रहते हैं। मिल गया माल तो उस माल में खुश रहते हैं, और हो गये बेहाल तो उस हाल में खुश रहते हैं।” साधू कहने लगा – “धन्य है आनंद! तेरा सत्संग, और धन्य हैं तुम्हारे सतगुरु! मैं तो झूठा साधू हूँ, असली फकीरी तो तेरी जिन्दगी है। अब मैं तेरी तस्वीर देखना चाहता हूँ, कुछ फूल चढ़ाकर दुआ तो मांग लूं।” साधू दूसरे कमरे में जाता है तो देखता है कि आनंद ने अपनी तस्वीर पर लिखवा रखा है – “आखिर में यह भी नहीं रहेगा।”

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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बुरी आदत

बुरी आदत

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था. वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता , ” अभी मैं इतना छोटा हूँ..धीरे-धीरे ये आदत छोड़ दूंगा !” पर वह कभी भी आदत छोड़ने का प्रयास नहीं करता।

उन्ही दिनों एक महात्मा गाँव में पधारे हुए थे, जब आदमी को उनकी ख्याति के बारे में पता चला तो वह तुरंत उनके पास पहुँचा और अपनी समस्या बताने लगा. महात्मा जी ने उसकी बात सुनी और कहा , ” ठीक है , आप अपने बेटे को कल सुबह बागीचे में लेकर आइये, वहीँ मैं आपको उपाय बताऊंगा।“

अगले दिन सुबह पिता-पुत्र बगीचे में पहुंचे।

महात्मा जी बेटे से बोले , ” आइये हम दोनों बागीचे की सैर करते हैं.” , और वो धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे ।

चलते-चलते ही महात्मा जी अचानक रुके और बेटे से कहा, ” क्या तुम इस छोटे से पौधे को उखाड़ सकते हो ?”

” जी हाँ, इसमें कौन सी बड़ी बात है .”, और ऐसा कहते हुए बेटे ने आसानी से पौधे को उखाड़ दिया।

फिर वे आगे बढ़ गए और थोड़ी देर बाद महात्मा जी ने थोड़े बड़े पौधे की तरफ इशारा करते हुए कहा, ” क्या तुम इसे भी उखाड़ सकते हो?”

बेटे को तो मानो इन सब में कितना मजा आ रहा हो, वह तुरंत पौधा उखाड़ने में लग गया. इस बार उसे थोड़ी मेहनत लगी पर काफी प्रयत्न के बाद उसने इसे भी उखाड़ दिया ।

वे फिर आगे बढ़ गए और कुछ देर बाद पुनः महात्मा जी ने एक गुडहल के पेड़ की तरफ इशारा करते हुए बेटे से इसे उखाड़ने के लिए कहा।

बेटे ने पेड़ का ताना पकड़ा और उसे जोर-जोर से खींचने लगा. पर पेड़ तो हिलने का भी नाम नहीं ले रहा था. जब बहुत प्रयास करने के बाद भी पेड़ टस से मस नहीं हुआ तो बेटा बोला , ” अरे ! ये तो बहुत मजबूत है इसे उखाड़ना असंभव है ।

महात्मा जी ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा , ” बेटा, ठीक ऐसा ही बुरी आदतों के साथ होता है , जब वे नयी होती हैं तो उन्हें छोड़ना आसान होता है, पर वे जैसे जैसे पुरानी होती जाती हैं इन्हें छोड़ना मुश्किल होता जाता है।”

बेटा उनकी बात समझ गया और उसने मन ही मन आज से ही आदत छोड़ने का निश्चय किया।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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दीनबन्धु और मालती के यहाँ दो पुत्र और एक पुत्रवधु थी। एक दिन बड़ा पुत्र साँप के काटने से मर गया।

दीनबन्धु और मालती के यहाँ दो पुत्र और एक पुत्रवधु थी। एक दिन बड़ा पुत्र साँप के काटने से मर गया।
तभी एक संत आ पहुँचे। उन्होंने प्रबल भूख लगने की बात की! परिजनों ने संत की इच्छा का आदर करते हुए लाश को चादर में लपेटकर, स्नानादि कर, संत के लिय भोजन बना कर उसे परोसा गया।

संत ने कहा- मैं अकेला भोजन नहीं करता! सभी बैठो। वे बैठ तो गए पर उनको पूरी घटना बतानी पड़ी।

संत ने घर के मुखिया दीनबन्धु से कहा- तुम कैसे पिता हो? पुत्र मरा पड़ा है, तुम भोजन को बैठ गए?

दीनबन्धु बोले – महाराज, संसार में कौन पिता है? कौन पुत्र है? इस जगतसराय में सब यात्री ठहरते हैं! सुबह चल पड़ते हैं! तो मैं वृथा क्याें शोक करूं?

यह संसार तो आम का पेड़ है। कुछ फूल ही गिर जाते हैं, तो कुछ छोटे फल ही टूट कर गिर जाते हैं। जो पक जाते हैं वे भी गिर ही जाते हैं। मैं किसके लिए रोऊँ?

घर की मालकिन मालती ने कहा- महाराज, जैसे कुम्हार बर्तन बनाता है। कुछ बनने में नष्ट हो जाते हैं! कुछ बन कर तो कुछ थोड़े समय बाद टूट जाते हैं। पर अंत में सब के सब कभी न कभी टूटते ही हैं। जैसे पक्षी पेड़ पर इकट्ठा होते हैं और सुबह होते ही उड़ जाते हैं।

घर का छोटा पुत्र कहने लगा – महाराज, जगत के सब संबंध झूठे हैं। न जन्म से पहले कोई नाता है, न मृत्यु के बाद। सिवा परमात्मा के अपना है ही कौन?

जैसे बाजार में अनेक व्यापारी आते हैं। कोई किसी का कुछ नहीं होता। फिर भी हंसते , बतलाते , अपना व्यापार करते हैं। बाजार बंद होने पर सब अपनी ठौर चले जाते हैं। अपना व्यापार कर मेरा भाई भी चला गया। एक दिन मैं भी चला जाऊँगा। जिसका माल अभी बिका नहीं, वह किसी के साथ कैसे चला जाए? उसे तो अभी प्रतीक्षा करनी है।

अंत में पुत्रवधू बोली – महाराज! इस संसार में जीव का पति कौन है? क्या भगवान के सिवा और भी कोई हमारा स्वामी है? भगवान के लिए ही स्त्री लौकिक पति की भगवद् वृत्ति से सेवा करती है। जब तक भगवान ने उनकी सेवा करवानी थी, जब तक उनका मेरा साथ था- तब तक तन-मन से सेवा मेरा धर्म था। अब उन्हें वापिस बुला लिया है, तो मुझे शोक कैसा? संत-महात्मा तो भगवत भजन के लिए सन्यासी होते हैं। वैधव्य भी तो एक सन्यास ही है, जो भगवान ने कृपा करके मुझे दिया है। संसार तो हरि की लीला से है। वे हंसाते भी हैं, रूलाते भी हैं। मिला देते हैं, तो बिछुड़ा भी देते हैं। इसलिय मैं उनकी किसी लीला को देखकर शोक क्यों करूँ? इस संसार में भी हमेशा एक नाटक चलता है और हम सभी उसके पात्र हैं – सभी को उस सूत्रधार के इशारों पर चलते हैं। मुझे तो अपने अभिनय से भगवान को रिझाना है। अब तक मुझे सधवापन का पात्र मिला था, अब विधवापन का मिला गया। मैं शोक क्यों करूं?

इतने में भगवान की लीला से दीनबंधु का वह मरा बेटा अचानक जीवित हो गया।

संत ने उसे यह सब घटना और परिजनों के विचार बतलाये तो वह बेटा बोला- महाराज, धूप की तपन से बचने के लिय कुछ राहगीर एक वृक्ष के नीचे खड़े होते हैं। धूप कम हो जाने पर अपनी राह चल देते हैं। पेड़ वहीं खड़ा रह जाता है। कल फिर कुछ राही आएँगे और फिर चले जाएँगे, तब फिर आने-जाने का शोक कैसा? हजारों मनुष्य अपना लेन-देन चुकाने के लिए एकत्र होते हैं और ॠण उतरते ही अलग हो जाते हैं। तो शोक मिलने और बिछुड़ने का शोक कैसा?

इसीलिय समय के सदगुरु अब में जीने के लिय, अब का आनन्द लेने के लिय कहते हैं! जो शक्ति थी, है और रहेगी – उससे तादात्म्य स्थापित करने के लिय ही बारबार प्रेरित करते हैं! ताकि नश्वर संसार के रिश्ते नातों के होने या ना होने, उनके मिलन और विछोह का कष्ट हमें व्यथित ना करे!

मुझे आशा है आप सभी इस काल्पनिक कहानी के सार्वभोमिक सत्य को आत्मसात करते हुए – महाराजी के द्वारा बताई गयी व्यावहारिक दिशा में चलने प्रयास करेंगे और अधिकाधिक अभ्यास करके हर पल का आनन्द लेंगे!

आपका जीवन मंगलमय बना रहे!

एक छोटा बच्चा था! वह बहुत ही नेक और बुद्धिमान था।

एक छोटा बच्चा था! वह बहुत ही नेक और बुद्धिमान था।
एक दिन वो मंदिर में गया। मंदिर के अन्दर सभी भक्त भगवान के मंत्र बोल रहे थे। कुछ भक्त स्तुति गान भी कर रहे थे। कुछ भक्त संस्कृत के काफी कठिन श्लोक भी बोल रहे थे।

बच्चे ने कुछ देर यह सब देखा और उसके चहेरे पर उदासी छा गयी। क्योंकि उसे यह सब प्रार्थना और मंत्र बोलना आता नहीं था। कुछ देर वहाँ खड़ा रहा। उसने अपनी आँखे बन्द की और अपने दोनों हाथ जोड़े और बार-बार *”क-ख-ग-घ”* बोलने लगा।

मंदिर के पुजारी ने यह देखा उसने लड़के से पूछा कि *”बेटे तुम यह क्या कर रहे हो?*
बच्चे ने कहा, *”मैं भगवान की पूजा कर रहा हूं”।*

पुजारी ने कहा कि *”बेटे भगवान से इस तरह से प्रार्थना नहीं की जा सकती! तुम तो क-ख-ग-घ बोल रहे हो।”*

पंडित पुजारी की कोई गलती भी नहीं थी क्योंकि कभी कभी कुछ पंडितो की पूजा भी रटी रटाई होती है। भाव का तो मिश्रण होता ही नहीं!

लेकिन बच्चा मासूम था। उसके पास शब्द तो थे नहीं *सो भाव से क ख ग घ ही बोलने लगा।*

लड़के ने उत्तर दिया कि *”मुझे प्रार्थना, मंत्र, भजन नहीं आते!मुझे सिर्फ क-ख-ग-घ ही आती है।*

मुझे मेरे पिताजी ने घर में पढ़ाते वक्त यह बताया था कि *सारे शब्द इसी क-ख-ग-घ से बनते हैं!* इसलिये मेरे को इतना पता है कि *प्रार्थना, मंत्र, भजन यह सब क-ख-ग-घ से ही बनते हैं।*
मैं दस बार क-ख-ग-घ बोल गया हूँ और भगवान से प्रार्थना करी कि *हे भगवान मैं अभी छोटे से स्कूल में पड़ता हूँ मुझे अभी यही सिखाया है! यह सब शब्द में से अपने लिए खुद प्रार्थना, मंत्र, भजन बना लेना!*

बच्चे की बात सुनकर पुजारी जी चुप हो गए। उनको अपनी भूल का एहसास हो गया कि *भगवान की पूजा में शब्दों से ज्यादा भाव का महत्व होता है!*
प्रार्थना हदय को साफ और निर्मल करती है।
इसलिए *शब्दों से ज्यादा भाव का महत्व है। शब्द तो हवा में तैरते रह जाते हैं मगर भाव ह्रदयनाथ तक पहुंच जाता है।*

दुनिया में सैकड़ों भाषाएं हैं लेकिन *ह्रदय की भाषा का बोध समय से सद्गुरु से ही प्राप्त होता है!*

*🙏🏻🙏🏿🙏🏾 सुप्रभात*🙏🏽🙏🏼🙏

राजा का जन्मदिन

*राजा का जन्मदिन*

एक बार एक राजा सुबह घूमने निकला तो उसने तय किया कि *वह आज अपने जन्म दिन पर रास्ते में मिलने वाले पहले व्यक्ति को पूरी तरह खुश व संतुष्ट करेगा।*
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उसे एक भिखारी मिला।

भिखारी ने राजा से भीख मांगी *तो राजा ने भिखारी की तरफ एक तांबे का सिक्का उछाल दिया।*

वह सिक्का भिखारी के हाथ से छूट कर *नाली में जा गिरा।*

भिखारी नाली में हाथ डाल तांबे का सिक्का ढूंढ़ने लगा।
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राजा ने उसे बुला कर दूसरा *तांबे का सिक्का दिया।*

भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और *वापस जाकर नाली में गिरा सिक्का ढूंढ़ने लगा!*
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राजा को लगा की भिखारी बहुत गरीब है। उसने भिखारी को फिर *चांदी का एक सिक्का दिया।*
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भिखारी राजा की जय जयकार करता फिर *नाली में सिक्का ढूंढ़ने लगा।*
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राजा ने अब भिखारी को एक *सोने का सिक्का दिया।*
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भिखारी खुशी से झूम उठा और *वापस भाग कर अपना हाथ नाली की तरफ बढ़ाने लगा।*
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राजा को बहुत खराब लगा। लेकिन उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि *सबसे पहले मिलने वाले व्यक्ति को आज खुश एवं संतुष्ट करना है।*
उसने भिखारी को बुलाया और कहा कि *मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूं, अब तो खुश व संतुष्ट हो?*
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भिखारी बोला, *महाराज, मैं खुश और संतुष्ट तभी हो सकूंगा जब नाली में गिरा तांबे का सिक्का मुझे मिल जायेगा!*
कमोवेश हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है।

*हमें जब समय के सतगुरू ने अपनी अहेतुकी कृपा से अपनाया, ज्ञान दिया और अभ्यास करके अंदर के खजाने का आनन्द लेने के लिए बतलाया पर हम बेकार की बातों में अपनी अनमोल स्वासों को गवा रहे हैं!*

उस आंतरिक आनन्द को भूलकर उस भिखारी की तरह संसार रूपी नाली में तांबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गंवाते जा रहे हैं!

एक एक स्वास हाथ से निकल रहे हैं! मौत सामने खड़ी है तो फिर गफलत क्यों?
*खुद के लिए खुद सोचें! कम से कम अपने इस जीवन के साथ न्याय करें!*

जीने की राह……..!

*💫जीने की राह……..!🌷*

*✍️….ऐसा कोई व्यक्ति संसार में आज तक उत्पन्न नहीं हुआ, जिसने संसार में जन्म तो लिया हो और दुख न भोगा हो। अर्थात जो भी व्यक्ति संसार में जन्म लेता है, शरीर धारण करता है, उसे अनेक प्रकार के दुख भोगने ही पड़ते हैं। दुखों से पूरी तरह छूटने का तो केवल एक ही उपाय है कि संसार में अगला जन्म लेना बंद करें । तभी सारे दुखों से पीछा छूटेगा। अस्तु यह तो संभव नहीं है!*

*अब जिन जिन आत्माओं ने संसार में शरीर धारण कर रखा है, जन्म ले रखा है, उनको जन्म से लेकर मृत्यु तक सारे जीवन में दुख, अशांति, परेशानियां, और समस्याएं तो आती ही रहती हैं।*

*कुछ लोग सारा दिन अपनी समस्याओं को ही लेकर सदा रोते रहते हैं । ऐसे लोग कर्मों की गुह्य गति का ज्ञान ना होने के कारण स्वयं तो दुखी रहते ही हैं और दूसरों को भी दुखी करते रहते हैं। परंतु कुछ लोग इन समस्याओं से अपने अंदर मन ही मन जूझते रहते हैं, कदाचित उसका वर्णन भी नहीं करते। परमात्मा एवं शुभचिंतकों के सहयोग से, वे इस युद्ध में जीत भी जाते हैं। उनके चेहरे पर सदा मुस्कान व प्रसन्नता ही दिखाई देती है, क्योंकि वे समस्या में भी मुस्कुराने का कोई अवसर ढूंढ लेते हैं!*

*तो आप ऐसा ना समझें, कि उन्हें जीवन में कोई दुख समस्या या कोई कष्ट परेशानी का आभास नहीं होता। अपितु इन सब समस्याओं के होते हुए भी सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान सदगुरु की प्रेरणा व शक्ति उनके साथ होती है। क्योंकि वे सदगुरु की आज्ञा का पालन करते हैं, इसलिए सर्वशक्तिमान सदगुरु उनके अंदर भरपूर शक्ति ज्ञान बल आनंद आदि गुणों की वर्षा करते ही रहते हैं। जिसके कारण वे हंसते-हंसते सब समस्याओं को पार कर जाते हैं। वास्तव में सदगुरु में उनका अटूट निश्चय ही उनके मनोबल को बढ़ाता है और वे सदा प्रसन्न रहते हैं और दूसरों के भी प्रेरक बन जाते हैं।*

हम भी हमेशा ऐसा प्रयत्न करने की कोशिश करें कि *अपने सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान आनन्दस्वरूप सदगुरु का ईमानदारी के साथ अनुसरण करें* ताकि *उसकी आज्ञा का पालन करके एक बहुत प्रसन्न एवं आनंदित जीवन जी सकें!*

सदा याद रहे कि *आप खुद एक शांत स्वरूप और प्रेम स्वरूप आत्मा है!*
*🍁🍁🍁💞 *सुप्रभात* *💞🍁🍁🍁

ईश्वर सबके कर्मों को देखता है!

*ईश्वर सबके कर्मों को देखता है!*

दातादीन अपने लड़के गोपाल को नित्य शाम को सोने से पहले कहानियाँ सुनाया करता था।
एक दिन उसने गोपाल से कहा— *‘बेटा! एक बात कभी मत भूलना कि भगवान् सब कहीं हैं।’*

गोपाल ने इधर-उधर देखकर पूछा— *‘पिताजी! भगवान् सब कहीं हैं? वह मुझे तो कहीं दीखते नहीं।’*

दातादीन ने कहा— *‘हम भगवान् को देख नहीं सकते; किंतु वे हैं सब कहीं और हमारे सब कामों को देखते रहते हैं।’*

गोपाल ने पिता की बात याद कर ली। कुछ दिन बाद अकाल पड़ा। दातादीन के खेतों में कुछ हुआ नहीं।

एक दिन गोपाल को लेकर रात के अँधेरे में वह गाँव से बाहर गया। वह दूसरे किसान के खेत में से चोरी से एक गट्ठा अन्न काटकर घर लाना चाहता था।

गोपाल को मेड़ पर खड़ा करके उसने कहा— *‘तुम चारों ओर देखते रहो, कोई इधर आवे या देखे तो मुझे बता देना।’*

जैसे ही दातादीन खेत में अन्न काटने बैठा गोपाल ने कहा— *‘पिताजी! रुकिये।’*

दातादीन ने पूछा— *‘क्यों, कोई देखता है क्या?’*

गोपाल— *‘हाँ, देखता है।’*

दातादीन खेत से निकल कर मेड़ पर आया। उसने चारों ओर देखा। जब कोई कहीं न दीखा तो उसने पुत्र से पूछा— *‘कहाँ? कौन देखता है?’*

गोपाल— *‘आपने ही तो कहा था कि ईश्वर सब कहीं है और सबके सब काम देखता है। तब वह आपको खेत काटते क्या नहीं देखेगा?’*

दातादीन पुत्र की बात सुनकर लज्जित हो गया। चोरी का विचार छोड़कर वह घर लौट आया..!!

*🙏🏼 सुप्रभात*🙏

योग्यता की परख

*योग्यता की परख*
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युवक अंकमाल भगवान बुद्ध के सामने उपस्थित हुआ और बोला- “भगवन्! मेरी इच्छा है कि मैं संसार की कुछ सेवा करूं, आप मुझे जहाँ भी भेजना चाहें भेज दें ताकि मैं लोगों को धर्म का रास्ता दिखाऊँ?”

बुद्ध हँसे और बोले- “तात! संसार को कुछ देने के पहले अपने पास कुछ होना आवश्यक है, जाओ पहले अपनी योग्यता बढ़ाओ फिर संसार की भी सेवा करना।“

अंकमाल वहाँ से चल पड़ा और कलाओं के अभ्यास में जुट गया। बाण बनाने से लेकर चित्रकला तक मल्लविद्या से लेकर मल्लाहकारी तक उसने जितनी भी कलायें हो सकती हैं उन सबका उसने 10 वर्ष तक कठोर अभ्यास किया।

अंकमाल की कला-विशारद के रूप में सारे देश में ख्याति फैल गई।

अपनी प्रशंसा से आप प्रसन्न होकर अंकमाल अभिमान पूर्वक लौटा और तथागत की सेवा में जा उपस्थित हुआ। अपनी योग्यता का बखान करते हुये उसने कहा- “भगवन्! अब मैं संसार के प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखा सकता हूँ। अब मैं 24 कलाओं का पंडित हूँ।“

भगवान बुद्ध मुस्कराये और बोले- “अभी तो तुम कलायें सीख कर आये हो परीक्षा दे लो तब उन पर अभिमान करना।“

अगले दिन भगवान बुद्ध एक साधारण नागरिक का वेश बदलकर अंकमाल के पास गये और उसे अकारण खरी-खोटी सुनाने लगे। अंकमाल क्रुद्ध होकर मारने दौड़ा तो बुद्ध वहाँ से मुस्कराते हुये वापस लौट पड़े।

उसी दिन मध्याह्न दो बौद्ध श्रमण वेश बदलकर अंकमाल के समीप जाकर बोले- “आचार्य आपको सम्राट हर्ष ने मन्त्रिपद देने की इच्छा की है क्या आप उसे स्वीकार करेंगे?“

अंकमाल को लोभ आ गया उसने कहा- “हाँ-हाँ अभी चलो।“

दोनों श्रमण भी मुस्करा दिये और चुपचाप लौट आये।

अंकमाल हैरान था- ‘बात क्या है?’

थोड़ी देर पीछे भगवान बुद्ध पुनः उपस्थित हुये। उनके साथ आम्रपाली थीं। अंकमाल जितनी देर तथागत वहाँ रहे आम्रपाली की ही ओर बार-बार देखता रहा। बात समाप्त कर तथागत आश्रम लौटे।

सायंकाल अंकमाल को बुद्ध देव ने पुनः बुलाया और पूछा- “वत्स। क्या तुमने क्रोध, काम और लोभ पर विजय की विद्या भी सीखी है?”

अंकमाल को दिनभर की सब घटनायें याद हो आई। उसने लज्जा से अपना सिर झुका लिया और उस दिन से आत्म-विजय की साधना में संलग्न हो गया।

🙏🙏🏻🙏🏿 सुप्रभात🙏🏼🙏🏾🙏🏽