एक राजा था। उसका मन्त्री भगवान् का भक्त था।

एक राजा था। उसका मन्त्री भगवान् का भक्त था। कोई भी बात होती तो वह यही कहता कि *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी!*
एक दिन राजा के बेटे की मृत्यु हो गयी। मृत्यु का समाचार सुनते ही मन्त्री बोल उठा – *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी!* यह बात राजा को बुरी तो लगी, पर वह चुप रहा। कुछ दिनों के बाद राजा की पत्नी की भी मृत्यु हो गयी। मन्त्री ने कहा – *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी!* राजा को गुस्सा आया, पर उसने गुस्सा पी लिया, कुछ बोला नहीं।

एक दिन राजा के पास एक नयी तलवार बनकर आयी। राजा अपनी अंगुली से तलवार की धार देखने लगा तो धार बहुत तेज होने के कारण चट उसकी अँगुली कट गयी! मन्त्री पास में ही खड़ा था । वह बोला- *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी!*

अब राजा के भीतर जमा गुस्सा बाहर निकला और उसने तुरन्त मन्त्री को राज्य से बाहर निकल जाने का आदेश दे दिया और कहा कि *मेरे राज्य में अन्न-जल ग्रहण मत करना।*

मन्त्री बोला – *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी! मन्त्री अपने घर पर भी नहीं गया! साथ में कोई वस्तु भी नहीं ली और राज्य के बाहर निकल गया।*

कुछ दिन बीत गये। एक बार राजा अपने साथियों के साथ शिकार खेलने के लिये जंगल गया! जंगल में एक हिरण का पीछा करते-करते राजा बहुत दूर घने जंगल में निकल गया। उसके सभी साथी बहुत पीछे छूट गये!

वहाँ जंगल में डाकुओं का एक दल रहता था। उस दिन डाकुओं ने कालीदेवी को एक मनुष्य की बलि देने का विचार किया हुआ था। संयोग से डाकुओं ने राजा को देख लिया। उन्होंने राजा को पकड़कर बाँध दिया। अब उन्होंने बलि देने की तैयारी शुरू कर दी।

जब पूरी तैयारी हो गयी, तब डाकुओं के पुरोहित ने राजा से पूछा- *तुम्हारा बेटा जीवित है?*
राजा बोला- *नहीं, वह मर गया।*
पुरोहित ने कहा कि *इसका तो हृदय जला हुआ है!*
पुरोहित ने फिर पूछा- *तुम्हारी पत्नी जीवित है?*
राजा बोला – *वह भी मर चुकी है।*
पुरोहित ने कहा कि *यह तो आधे अंग का है । अत: यह बलि के योग्य नहीं है। परन्तु हो सकता है कि यह मरने के भय से झूठ बोल रहा हो!*

पुरोहित ने राजा के शरीर की जाँच की तो देखा कि *उसकी अँगुली कटी हुई है।*

पुरोहित बोला- *अरे! यह तो अंग-भंग है, बलि के योग्य नहीं है ! छोड़ दो इसको! डाकुओं ने राजा को छोड़ दिया।*

राजा अपने घर लौट आया। लौटते ही उसने अपने आदमियों को आज्ञा दी कि *हमारा मन्त्री जहाँ भी हो, उसको तुरन्त ढूँढ़कर हमारे पास लाओ। जब तक मन्त्री वापस नहीं आयेगा, तबतक मैं अन्न ग्रहण नहीं करूँगा।*

राजा के आदमियों ने मन्त्री को ढूँढ़ लिया और उससे तुरन्त राजा के पास वापस चलने की प्रार्थना की। मन्त्री ने कहा – *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी!*

मन्त्री राजा के सामने उपस्थित हो गया। राजा ने बड़े आदरपूर्वक मन्त्री को बैठाया और अपनी भूल पर पश्चात्ताप करते हुए जंगल वाली घटना सुनाकर कहा कि *”पहले मैं तुम्हारी बात को समझा नहीं। अब समझ में आया कि भगवान् की मेरे पर कितनी कृपा थी! भगवान् की कृपा से अगर मेरी अँगुली न कटता तो उस दिन मेरा गला कट जाता! परन्तु जब मैंने तुम्हें राज्य से निकाल दिया!*

जब तुमने कहा कि *भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी तो वह कृपा क्या थी- यह अभी मेरी समझ में नहीं आया!*

मन्त्री बोला – *महाराज, जब आप शिकार करने गये, तब मैं भी आपके साथ जंगल में जाता। आपके साथ मैं भी जंगल में बहुत दूर निकल जाता; क्योंकि मेरा घोड़ा आपके घोड़े से कम तेज नहीं है। डाकूलोग आपके साथ मेरे को भी पकड़ लेते। आप तो अँगुली कटी होने के कारण बच गये, पर मेरा तो उस दिन गला कट ही जाता! इसलिये भगवान की कृपा से मैं आपके साथ नहीं था! राज्य से बाहर था; अत: मरने से बच गया। अब पुन: अपनी जगह वापस आ गया हूँ। यह भगवान् की कृपा ही तो है!*

कहानी का सार यह है कि *आज कल मनुष्य को सुविधा भोगने की इतनी बुरी आदत हो गयी है की थोड़ी सी भी विपरीत परिस्थिति में विचलित हो जाता है! कई बार तो भगवान के अस्तित्त्व को भी नकारने लगता है!*

उनके लिये यही संदेश है कि *उस परमात्मा ने जब हमें जन्म दिया है तो हमारा योगक्षेम भी वहां करने की जिम्मेदारी उसी की है!* हमें तो बस उसके प्रति निष्ठा बनाये रखनी होगी!
जैसे एक पिता के दो पुत्र हो – *एक कपूत दूसरा सपूत!* फिर भी पिता होने के नाते उसे दोनों की ही फिक्र रहेगी!* परंतु किसी भी कार्य अथवा सहयोग में प्राथमिकता सपूत को ही दी जाएगी।

इसी प्रकार हमें अपने सदगुरु के प्रति निष्ठा बनाये रखनी होगी! सुख दुख जीवन में धूप छांया की तरह बने रहते हैं – कभी स्थायी नही रहते! हमें अपने अंदर धैर्य जगाना होगा और यह विश्वास कायम रखना होगा कि *करने कराने वाले कोई और है हम तो निमित्त मात्र हैं!*

*🙏🏼🙏🏾🙏🏽 *सुप्रभात*🙏🙏🏻🙏🏿

हीरे की पहचान

*💐💐हीरे की पहचान💐💐*

एक राजा का दरबार लगा हुआ था,
क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये
राजा का दरवार खुले मे लगा हुआ था.
पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी ..
महाराज के सिंहासन के सामने…
एक शाही मेज थी…
और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थीं.
पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि
सभी दरबार मे बैठे थे
और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे.. ..

उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश माँगा..
प्रवेश मिल गया तो उसने कहा
“मेरे पास दो वस्तुएं हैं,
मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और
अपनी वस्तुओं को रखता हूँ पर कोई परख नही पाता सब हार जाते है
और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ”..
अब आपके नगर मे आया हूँ

राजा ने बुलाया और कहा “क्या वस्तु है”
तो उसने दोनो वस्तुएं….
उस कीमती मेज पर रख दीं..

वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान
आकार, समान रुप रंग, समान
प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था.. … ..

राजा ने कहा ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं.
तो उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तो
एक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न.

इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा
और एक है काँच का टुकडा।

लेकिन रूप रंग सब एक है.
कोई आज तक परख नही पाया क़ि
कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा..

कोइ परख कर बताये की….
ये हीरा है और ये काँच..
अगर परख खरी निकली…
तो मैं हार जाऊंगा और..
यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा.

पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहीं
पहचान पाया तो इस हीरे की जो
कीमत है उतनी धनराशि आपको
मुझे देनी होगी..

इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से…
जीतता आया हूँ..

राजा ने कहा मै तो नही परख सकूगा..
दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते
क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है..
सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पा रहा था.. ..

हारने पर पैसे देने पडेगे…
इसका कोई सवाल नही था,
क्योंकि राजा के पास बहुत धन था,
पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी,
इसका सबको भय था..

कोई व्यक्ति पहचान नही पाया.. ..
आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई
एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा..
उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो…
मैने सब बाते सुनी है…
और यह भी सुना है कि….
कोई परख नही पा रहा है…
एक अवसर मुझे भी दो.. ..

एक आदमी के सहारे….
वह राजा के पास पहुंचा..
उसने राजा से प्रार्थना की…
मै तो जनम से अंधा हू….
फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये..
जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ..
और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं..

और यदि सफल न भी हुआ…
तो वैसे भी आप तो हारे ही है..

राजा को लगा कि…..
इसे अवसर देने मे क्या हर्ज है…
राजा ने कहा क़ि ठीक है..
तो तब उस अंधे आदमी को…
दोनो चीजे छुआ दी गयी..

और पूछा गया…..
इसमे कौन सा हीरा है….
और कौन सा काँच….?? ..
यही तुम्हें परखना है.. ..

उस आदमी ने एक क्षण मे कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच.. ..

जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था
वह नतमस्तक हो गया..
और बोला….
“सही है आपने पहचान लिया.. धन्य हो आप…
अपने वचन के मुताबिक…..
यह हीरा…..
मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ ” ..

सब बहुत खुश हो गये
और जो आदमी आया था वह भी
बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम
कोई तो मिला परखने वाला..

उस आदमी, राजा और अन्य सभी
लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही
जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे
पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच.. ..

उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है मालिक
धूप मे हम सब बैठे है.. मैने दोनो को छुआ ..
जो ठंडा रहा वह हीरा…..
जो गरम हो गया वह काँच…

जीवन मे आप भी देखना…..
👇👇👇👇
जो बात बात मे गरम हो जाये, उलझ जाये…
वह व्यक्ति “काँच” है।

और

जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे…..
वह व्यक्ति “हीरा” है..!*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

मंदिर का पुजारी

*मंदिर का पुजारी*

एक बार की बात है कि एक समृद्ध व्यापारी , जो सदैव अपने गुरू से परामर्श करके कुछ न कुछ सुकर्म किया करता था, गुरु से बोला-“गुरुदेव, धनार्जन हेतु मैं अपना गाँव पीछे ज़रूर छोड़ आया हूँ, पर हर समय मुझे लगता रहता है कि वहाँ पर एक ऐसा देवालय बनाया जाये जिसमें देवपूजन के साथ-साथ भोजन की भी व्यवस्था हो,अच्छे संस्कारों से लोगों को सुसंस्कृत किया जाये, अशरण को शरण मिले, वस्त्रहीन का तन ढके ,रोगियों को दवा और चिकित्सा मिले ,बच्चे अपने धर्म के वास्तविक स्वरूप से अवगत हो सकें।” सुनते ही गुरु प्रसन्नतापूर्वक बोले-“केवल गाँव में ही क्यों,तुम ऐसा ही एक मंदिर अपने इस नगर में भी बनवाओ।” व्यापारी को सुझाव पसंद आया और उसने ने दो मंदिर, एक अपने गाँव और दूसरा अपने नगर में,जहाँ वह अपने परिवार के साथ रहता था,बनवा दिए |दोनों देवालय शीघ्र ही लोगों की श्रद्धा के केंद्र बन गये।लेकिन कुछ दिन ही बीते थे कि व्यापारी ने देखा कि नगर के लोग गाँव के मन्दिर में आने लगे हैं ,जबकि वहाँ पहुँचने का रास्ता काफी कठिन है।उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है ?

कुछ भारी मन से वह गुरु जी के पास गया और सारा वृत्तांत कह सुनाया |गुरु जी ने कुछ विचार किया और फिर उसे यह परामर्श दिया कि वह गाँव के मंदिर के पुजारी को नगर के मन्दिर में सेवा के लिए बुला ले। उसने ऐसा ही किया नगर के पुजारी को गाँव और गाँव के पुजारी को नगर में सेवा पर नियुक्त कर दिया।कुछ ही दिन बीते थे कि वह यह देखकर स्तब्ध रह गया कि अब गाँव के लोग नगर के मन्दिर की ओर रुख करने लगे हैं। अब तो उसे हैरानी के साथ-साथ परेशानी भी अनुभव होने लगी।बिना एक क्षण की देरी के वह गुरुजी के पास जा कर हाथ जोड़ कर,कहने लगा –“आपकी आज्ञानुसार मैंने दोनों पुजारियों का स्थानांतरण किया लेकिन समस्या तो पहले से भी गम्भीर हो चली है, कि अब तो मेरे गाँव के परिचित और परिजन, कष्ट सहकर और किराया –भाड़ा खर्च करके, नगर के देवालय में आने लगे हैं।मुझसे यह नहीं देखा जाता।”

व्यापारी की बात सुनते ही गुरु जी सारी बात समझ गये और बोले- हैरानी और परेशानी छोड़ो।दरअसल,जो गाँव वाले पुजारी हैं ,उनका अच्छा स्वभाव ही है जो लोग उसी देवालय में जाना चाहते हैं,जहाँ वे होते हैं। उनका लोगों से निःस्वार्थ प्रेम, उनके दुःख से दुखी होना ,उनके सुख में प्रसन्न होना, उनसे मित्रता का व्यवहार करना ही लोगों को उनकी और आकर्षित करता है और लोग स्वतः ही उनकी और खिंचे चले आते हैं।”अब सारी बात व्यापारी की समझ में आ चुकी थी।

*💐💐शिक्षा💐💐*

*मित्रों हमें भी यह बात अच्छे से समझनी चाहिए कि हमारा व्यक्तित्व हमारे बाहरी रंग-रूप से नहीं हमारे व्यवहार से निर्धारित होता है, बिलकुल एक समान ज्ञान और वेश-भूषा वाले दो पुजारियों में लोग कष्ट सह कर भी उसी के पास गए जो अधिक संवेदनशील और व्यवहारी था। इसी तरह हम चाहे जिस कार्य क्षेत्र से जुड़े हों, हमारी सफलता में हमारे व्यवहार का बहुत बड़ा योगदान होता है। हम सभी को इस परम सत्य का बोध होना चाहिए कि इस धरती पर मात्र अपने लिए ही नहीं आये हैं, हमें अपने सुख-दुःख की चिंता के साथ-साथ दूसरों के दुख-सुख को ज़रूर बांटना चाहिए, उनसे मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए ताकि हम जहाँ पर उपस्थित हों, वहाँ पर स्वत: ही एक अच्छा वातावरण बना रहे, और सकारात्मकता की तरंगों से हमारा जीवन-सागर लहलहाता रहे।*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

Adjustment and Compromise

Adjustment and Compromise
are very crucial in Relationships.
Adjust when
Someone wants to be with You.
And
Compromise when
You want to be with Someone.

🙏🏻Selfless love and sacrifice in relation ties unbreakable bond🌹

🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

*तालमेल और समझौता*
*रिश्तों में बहुत महत्वपूर्ण हैं*।
*तालमेल तब रखे जब*
*कोई आपके साथ रहना चाहता है*।
*और*
*समझौता तब करें जब*
*आप किसी के साथ रहना चाहते हैं*।

*🙏🏻रिश्तों में निस्वार्थ प्यार और त्याग एक अटूट बंधन जोड़ता है*🌹

हम अपनी और अपनों की परख कैसे कर सकते है ?

*हम अपनी और अपनों की परख कैसे कर सकते है ?*_

*काँच और हीरा*

एक राजा का दरबार लगा हुआ था। क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये राजा का दरबार खुले में लगा हुआ था।

पूरी आम सभा सुबह की धूप में बैठी थी। महाराज के सिंहासन के सामने एक शाही मेज थी और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थी।

पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि सभी दरबार में बैठे थे और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे। उसी समय एक व्यक्ति आया और उसने प्रवेश की आज्ञा माँगी। प्रवेश मिल गया, उसने राजा का अभिवादन किया और कहा, “मेरे पास दो वस्तुएँ हैं। मैं हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और उन वस्तुओं को रखता हूँ, पर कोई परख नहीं पाता। सब हार जाते हैं और मैं विजेता बनकर घूम रहा हूँ। अब आपके नगर में आया हूँ ।”

राजा ने उत्सुकता से पूछा, “कैसी वस्तुएँ ?”

तो उसने दोनों वस्तुओं को शाही मेज पर रख दिया। वे दोनों बिल्कुल समान आकार, समान रुप रंग, समान प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था।

राजा ने कहा, “ये दोनों वस्तुएँ तो एक समान हैं।”

तो उस व्यक्ति ने कहा, “हाँ, दिखाई तो एक से ही देते हैं लेकिन हैं भिन्न। इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा और दूसरा महज काँच का टुकडा।
लेकिन रूप रंग सब एक हैं, कोई आज तक परख नहीं पाया कि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा..। कोई परख कर बताये कि..ये हीरा है और दूसरा काँच..। अगर परख खरी निकली तो मैं हार जाऊँगा और यह कीमती हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी में जमा करवा दूँगा।

पर शर्त यह है कि यदि कोई नहीं पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है, उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी। इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से जीतता आया हूँ।”

राजा ने कहा, “मैं तो नहीं परख सकूँगा।”

दीवान बोले, “हम भी हिम्मत नहीं कर सकते क्योंकि दोनों वस्तुएँ बिल्कुल समान हैं।”

हारने के डर से कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। हारने पर धन देना पड़ेगा…समस्या यह नही थी क्योंकि राजा के पास बहुत धन था, पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी, इसका सबको भय था। कोई व्यक्ति पहचान नहीं पाया। आखिरकार पीछे थोड़ी हलचल हुई।

एक नेत्रहीन आदमी हाथ में लाठी लेकर उठा। उसने कहा, “मुझे महाराज के पास ले चलो। मैंने सब बातें सुनी हैं और यह भी सुना है कि कोई परख नहीं पा रहा है। एक अवसर मुझे भी दो।”

एक आदमी के सहारे वह राजा के पास पहुँचा। उसने राजा से अनुरोध किया की, “मैं तो जन्म से अंधा हूँ, फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये, जिससे मैं भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ। और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊँ और यदि सफल न भी हुआ तो वैसे भी आप शर्त तो हारे हुए ही हैं।”

राजा के दिल को उसकी बात जँच गई और उनको लगा कि इसे अवसर देने में कोई हर्ज नहीं। राजा ने कहा, “ठीक है।”

तब उस नेत्रहीन आदमी को दोनों चीजें छुआ दी गयी। और पूछा गया कि इसमें से कौन सा असली हीरा है और कौन सा काँच?? यही तुम्हें परखना है।

कथा कहती है कि उस आदमी ने एक क्षण में कह दिया कि यह बेशकीमती हीरा है और दूसरा मात्र काँच!

जो आदमी इतने राज्यों को जीतकर आया था, वह नतमस्तक हो गया और बोला, “सही है, आपने पहचान लिया.. धन्य हो आप…। अपने वचन के मुताबिक यह हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी में दे रहा हूँ।”

सब बहुत खुश हो गये और जो आदमी आया था ,वह भी बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला हीरे का पारखी।

वह आदमी, राजा और अन्य सभी लोगों ने उस नेत्रहीन व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि, “तुम देख भी नही सकते फिर तुमने कैसे पहचाना कि यह हीरा है और दूसरा काँच?”

उस नेत्रहीन बुजुर्ग ने कहा कि, “सीधी सी बात है। मालिक धूप में हम सब बैठे हैं। और ये दोनों वस्तुएँ भी काफी देर से धूप मे ही रखी है। मैंने दोनों को छुआ। *जो ठंडा रहा वह असली हीरा…जो गरम हो गया वह काँच….।”*

जीवन में भी *जो बात-बात में गरम हो जाये, उलझ जाये…वह व्यक्ति “काँच” है और जो विपरीत परिस्थिति में भी ठंडा (शांत और स्थिर) रहे..वह व्यक्ति “बेशकीमती हीरा” है..!!*

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*”यदि एक बार मन सामंजस्यपूर्ण स्थिति में आ जाए तो फिर न बाहरी परिस्थितियों और वातावरण का उस पर कोई प्रभाव होगा और न ही आंतरिक अशांति होगी।”*

सच्चा सद्भाव

*सच्चा सद्भाव*
🌸🌸🌸🌸

पुत्र की उम्र पैंतालीस छूने लगी। पिता पुत्रको व्यापारमें स्वतन्त्रता नहीं देता था, तिजोरी की चाबी भी नहीं। पुत्र के मन में यह बात खटकती रहती थी। वह सोचता था कि यदि मेरा पिता पन्द्रह-बीस वर्ष तक और रहेगा तो मुझे स्वतन्त्र व्यापार करने का कोई अवसर ही नहीं मिलेगा। स्वतन्त्रता सबको चाहिये। मनमें चिढ़ थी, कुढ़न थी। एक दिन वह फूट पड़ी।

पिता-पुत्र में काफी बकझक हुई। सम्पदा का बँटवारा हुआ। पिता अलग रहने लगा। पुत्र अपने बहू-बच्चों के साथ अलग रहने लगा।

पिता अकेले थे। उनकी पत्नी का देहान्त हो चुका था। किसी दूसरे को सेवा के लिए नहीं रखा; क्योंकि उनके स्वभाव में किसी के प्रति विश्वास नहीं था, यहाँ तक कि पुत्र के प्रति भी नहीं था। वे स्वयं ही अपने हाथ से रुखा-सूखा भोजन बनाकर खा लेते, कभी भूखे सो जाते।

जब उनकी पुत्रवधू को यह बात मालूम पड़ी तो उसे बहुत दु:ख हुआ। आत्मग्लानि भी हुई। उसे बाल्यकाल से ही धर्म का संस्कार था- बड़ों के प्रति आदर एवं सेवाका भाव था।

उसने अपने पति को मनाने का प्रयास किया, परंतु वे नहीं माने। पिताके प्रति पुत्र के मन में कोई सद्भाव नहीं था। अब बहू ने एक विचार अपने मनमें दृढ़ कर लिया और कार्यान्वित किया।

वह पहले रोटी बनाकर अपने पति-पुत्रको खिलाकर दूकान और स्कूल भेज देती। स्वयं श्वसुरके गृह चली जाती। वहाँ भोजन बनाकर श्वसुरको खिला देती और सायंकाल के लिए पराठे बनाकर रख देती।

कुछ दिनोंतक ऐसा ही चलता रहा। जब पतिको मालूम पड़ा तो उन्होंने रोका- *‘ऐसा क्यों करती हो? बीमार पड़ जाओगी। आखिर शरीर ही तो है, कितना परिश्रम सहेगा!’*

बहू बोली- *‘मेरे ईश्वर के समान आदरणीय श्वसुर भूखे रहें; इससे मुझे बड़ी ग्लानि है। मैं उन्हें खिलाये बिना खा नहीं सकती। भोजन के समय उनकी याद आनेपर मुझे आँसू आने लगते हैं। उन्होंने ही तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया है, तब तुम मुझे पति के रुपमें मिले हो। तुम्हारे मनमें कृतज्ञताका भाव नहीं है तो क्या हुआ; मैं उनके प्रति कैसे कृतघ्न हो सकती हूँ?”*

*पत्नीके सद्भाव ने पति की निष्ठुरता पर विजय प्राप्त कर ली। उसने जाकर पिता के चरण छुये, क्षमा माँगी, घर ले आये- पति-पत्नी दोनों पिताकी सेवा करने लगे। पिता ने व्यापार का सारा भार पुत्रपर छोड़ दिया। वे अब पुत्रके किसी कार्यमें हस्तक्षेप नहीं करते थे।*

*परिवारके किसी भी व्यक्ति में यदि सच्चा सद्भाव हो तो वह सबके मनको जोड़ सकता है। मन का मेल ही सच्चा पारिवारिक सुख है।*

*शुभ प्रभात। 🙏🎊🙏आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*

एक जिज्ञासु किसी सुखी पुरुष की तलाश में निकला।

एक जिज्ञासु किसी सुखी पुरुष की तलाश में निकला।सबसे पहले वह एक निर्धन किसान के पास पहुंँचा और उसने किसान से पूछा- “किसान भाई! आप तो सुखी होंगे?

किसान ने कहा- “भाई साहब, मैं तो निर्धन हूंँ, भला मैं कैसे सुखी हो सकता हूंँ। गांँव का धन सम्पन्न व्यक्ति सुखी है आप उसके पास जाइये।
तब जिज्ञासु धनाढ्य व्यक्ति के पास पहुंँचा। उसने धनाढ्य व्यक्ति से पूछा- महानुभव आप तो सुखी होंगे?

उसने कहा- “प्यारे भाई,भला मैं कैसे सुखी हो सकता हूंँ क्योंकि मेरे पास तो धन वैभव है, किन्तु उसकी सुरक्षा का कोई समुचित प्रबन्ध नहीं है। दिन-रात चिन्ता और दुख है कि कहीं मेरे धन- वैभव को लुटेरा ले ना जायें।

तब जिज्ञासु ने पूछा- “फिर सुखी कौन होगा?

उसने कहा- आप राजा के पास जाइये,वह सुखी होगा।
तब जिज्ञासु राजा के पास पहुंँचा तथा नमस्कार कर पूछा- “राजन!आप तो अवश्य सुखी होंगे?

राजा ने कहा- ये भाग्य की कैसी विडम्बना है कि प्रभु ने बहुतों को तो भोग-पदार्थ दिए ही नहीं, तो वह उनके अभाव में दुखी है, किन्तु मेरे पास सब कुछ रहते हुए भी मैं उसका उपभोग नहीं कर सकता, क्योंकि डाक्टरों ने बताया है कि आपको बहुत सारा रोग है। जिसके लिए आपको इन सारे भोग पदार्थ को त्यागना होगा, नहीं तो बीमारी और भी बढ़ जाएगी। इसलिए मैं भी बहुत दुखी हूंँ।

राजा ने फिर कहा- इस धरातल में कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं होगा अगर आप सुखी आत्मा की खोज में है तो आप देवराज इन्द्र के पास जाइये।
जिज्ञासु इन्द्र के पास भी पहुंँचा तथा उसने अपने पुराना प्रश्न उसके पास भी दोहराया।

देवराज इन्द्र ने कहा- “भाई मेरे,मैं भी चिन्तित और दुखी हूंँ।
जिज्ञासु ने विस्मिता होकर पूछा- “आप और दुखी!क्यों कैसे?
इन्द्र ने कहा- “मुझे एक ही चिंन्ता दिन-रात सताती रहती है कि कहीं कोई भजन-अभ्यासी साधु भक्त महात्मा भजन-सुमिरण कर मेरे इन्द्रासन को न छीन ले।अतः मैं भी दुखी हूंँ।

जिज्ञासु ने पूछा- जब इतनी भोग सामग्री पाकर आप भी दुखी हैं तो इस संसार में सुखी कौन होगा?
इन्द्र ने कहा- “आप ब्रह्मा जी के पास जाइये, शायद वह सुखी हों।
जिज्ञासु ब्रह्मा जी के पास पहुंँचा तथा उन्हें प्रणाम कर पूछा- पितामह!आप तो सुखी और निश्चिंत होंगे?

ब्रह्मा जी ने कहा- “भाई! मैंने सारे सृष्टि की रचना की है और यह विधान बनाया गया है कि प्रत्येक पुत्र का यह कर्तव्य है कि वह अपने पिता का आज्ञा की पालन करें, किन्तु मेरी कोई सन्तान मेरी कोई आज्ञा नहीं मानती।अतः मैं भी दुखी हूंँ।आप भगवान शंँकर के पास जाइये,वह सुखी होंगे।

जिज्ञासु भगवान शंँकर के चरणों में उपस्थित हुआ तथा प्रणाम कर पूछा – भगवन! “आप तो सुखी होंगे”।
शंँकर जी ने कहा- “वत्स! मेरे घर में भी बड़ी समस्या है मेरा पुत्र गणेश जब मेरे पास चूहे की सवारी पर आता है तो मेरी गले का नाग (सर्प) उसके चूहे को खाने भागता है और उसका चूहा बिल में घुस जाता है l हमारे परिवार के वाहनों की प्रकृति और हमारे रहन-सहन का तरीका भी अलग-अलग है!

अपनी सवारी की बिना गणेश दुखी हो जाता है और जब पुत्र दुखी हो जाता है तब पिता का दुखी होना स्वभाविक ही है। और जब मेरा पुत्र कार्तिकेय मुझसे मिलने आता है तो अपनी सवारी मोर पर बैठकर आता है। उसका मोर मेरे गले के नाग (सर्प) को खाने बढ़ता है और मेरे गले का नाग (सर्प) भाग कर विल में घुस जाता है।तब अपने गले की माला नाग (सर्प) के बिना मैं दुखी हो जाता हूंँ।

और जब पिता दुखी हो जाता है तो स्वभावतः पुत्र भी दुखी हो जाता है। मेरी कुटिया एक है, झोपड़ी भी छोटी है, मेरा वाहन बैल है और मेरी अर्धांगिनी पार्वती का वाहन शेर है।अब उस छोटी सी कुटिया में बैल और शेर को कैसे रखा जाये, क्योंकि शेर का आहार बैल है।पार्वती का शेर दहाड़ता है और मेरा बैल खूटा उखाड़ कर भाग जाता है।अतः हमारे घर में भी बड़ी समस्या है l

हांँ इन समस्याओं से परेशान होकर मैं जब भगवान का ध्यान करता हूंँ तो हमें बड़ी शान्ति मिलती है और मैं सुखी हो जाता हूंँ। तुम भगवान विष्णु के पास जाओ, “मात्र वही सुखी स्वरुप है”।

जिज्ञासु-भगवान विष्णु के पास पहुंँचा और श्री चरणों में दन्डवत प्रणाम कर उनसे निवेदन किया- प्रभु! मैं बहुत भटकता हुआ आपके पास यह जानने के लिए आया हूंँ कि आप तो सुखी होंगें।

जिज्ञासु को समझाते हुए भगवान कहने लगे- “भाई! मैं भी तो भक्तों के दुख से सदा दुखी रहता हूंँ। न जाने कब कौन दुष्ट मेरे किसी भक्त को दुखी कर दे!
यदि तुम सुखी पुरुष की तलाश में हो तो सुनो, इस संसार में केवल मेरा भक्त सुखी है जिसने मेरे नाम को अपने जीवन का आधार बना लिया है।” बाकी सारा संसार ही दुखी है”।
इसलिए किसी संतों ने कहा है:–

निर्धन कहे धनवान सुखी,
धनवान कहे सुखी राजा हमारा।

राजा कहे महाराजा सुखी,
महाराजा कहे सुखी इन्द्र हमारा।।

इन्द्र कहे ब्रह्मा जी सुखी,
ब्रह्मा जी कहे शिव शंँकर प्यारा।

शंँकर कहे विष्णु जी सुखी,
विष्णु जी कहे सुखी भक्त हमारा।।

“भक्त सुखी जो नाम भजे,
और बाकी दुखिया सब संसार।

नानक दुखिया सब संसारा, सुखिया सोई जिन नाम आधारा।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।

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गुरु के प्रति समर्पण ही शिष्य की पात्रता है, समर्पण के माध्यम से गुरुशक्ति शिष्य में प्रवाहित होने लगती है।

*🌿🌹गुरु के प्रति समर्पण ही शिष्य की पात्रता है, समर्पण के माध्यम से गुरुशक्ति शिष्य में प्रवाहित होने लगती है।* शिष्य वही है जो गुरु के पास स्वयं को पूर्णतः झुका दे, गुरु उसी शिष्य के अन्तर्मन मे प्रवेश कर उसे निर्मल बनाते हैं। दीक्षा लेकर भी यदि शिष्य सरल चित न होकर अंहकारी बना रहे तो आध्यात्मिक तल पर कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता❗

*🌿🌹 शिष्य का अर्थ है-* अपनी खुदी को मिटा देना। *शिष्य का अर्थ है-* गुरु के हर प्रयोग में स्वयं को ढाल देना, गुरुभक्ति में हर त्याग को तत्पर रहना, क्योंकि गुरुभक्ति के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले आत्मबोध के सामने किसी भी चीज का कोई मूल्य नहीं है❗

*🌿🌹 शिष्यत्व बहुत मुश्किल डगर है।* गुरु के उपदेशों को हृदयंगम कर अपने जीवन में उतारना ही सच्चे अर्थों में शिष्यता है, क्योंकि गुरु उपदेश सुनने से ही अंतर्मुखता बढ़ती है और बाहरी विषयों की ओर दौड़ बंद होती है।
*जो गुरु से प्राप्त ज्ञान का अनवरत अभ्यास करता हुआ अपने जीवन में श्रेष्ठता, ज्ञान, प्रेम, भक्ति और सात्विकता को बढ़ाता है, वही सदशिष्य है!*

*🥀🌸🌼🙏 *आपका दिन मंगलमय हो!*🙏🌼🌸🥀*

भगवान का साथ

*भगवान का साथ*

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*एक बुजुर्ग दरिया के किनारे पर जा रहे थे। एक जगह देखा कि दरिया की सतह से एक कछुआ निकला और पानी के किनारे पर आ गया।*

*उसी किनारे से एक बड़े ही जहरीले बिच्छु ने दरिया के अन्दर छलांग लगाई और कछुए की पीठ पर सवार हो गया। कछुए ने तैरना शुरू कर दिया। वह बुजुर्ग बड़े हैरान हुए।*

*उन्होंने उस कछुए का पीछा करने की ठान ली। इसलिए दरिया में तैर कर उस कछुए का पीछा किया।*

*वह कछुआ दरिया के दूसरे किनारे पर जाकर रूक गया। और बिच्छू उसकी पीठ से छलांग लगाकर दूसरे किनारे पर चढ़ गया और आगे चलना शुरू कर दिया।*

*वह बुजुर्ग भी उसके पीछे चलते रहे। आगे जाकर देखा कि जिस तरफ बिच्छू जा रहा था उसके रास्ते में एक भगवान् का भक्त ध्यान साधना में आँखे बन्द कर भगवान् की भक्ति कर रहा था।*

*उस बुजुर्ग ने सोचा कि अगर यह बिच्छू उस भक्त को काटना चाहेगा तो मैं करीब पहुँचने से पहले ही उसे अपनी लाठी से मार डालूँगा।*

*लेकिन वह कुछ कदम आगे बढे ही थे कि उन्होंने देखा दूसरी तरफ से एक काला जहरीला साँप तेजी से उस भक्त को डसने के लिए आगे बढ़ रहा था। इतने में बिच्छू भी वहाँ पहुँच गया।*

*उस बिच्छू ने उसी समय सांप के डंक के ऊपर डंक मार दिया, जिसकी वजह से बिच्छू का जहर सांप के जिस्म में दाखिल हो गया और वह सांप वहीं अचेत हो कर गिर पड़ा था। इसके बाद वह बिच्छू अपने रास्ते पर वापस चला गया।*

*थोड़ी देर बाद जब वह भक्त उठा, तब उस बुजुर्ग ने उसे बताया कि भगवान् ने उसकी रक्षा के लिए कैसे उस कछुवे को दरिया के किनारे लाया, फिर कैसे उस बिच्छु को कछुए की पीठ पर बैठा कर साँप से तेरी रक्षा के लिए भेजा।*

*वह भक्त उस अचेत पड़े सांप को देखकर हैरान रह गया। उसकी आँखों से आँसू निकल आए, और वह आँखें बन्द कर प्रभु को याद कर उनका धन्यवाद करने लगा,*

*तभी “”प्रभु”” ने अपने उस भक्त से कहा, जब वो बुजुर्ग जो तुम्हे जानता तक नही, वो तुम्हारी जान बचाने के लिए लाठी उठा सकता है। और फिर तू तो मेरी भक्ति में लगा हुआ था तो फिर तुझे बचाने के लिये मेरी लाठी तो हमेशा से ही तैयार रहती है…!*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

जैसा अन्न वैसा मन

*🍁जैसा अन्न वैसा मन 🍁*

एक बार एक ऋषि ने सोचा कि लोग गंगा में पाप धोने जाते है, तो इसका मतलब हुआ कि सारे पाप गंगा में समा गए और गंगा भी पापी हो गयी !

अब यह जानने के लिए तपस्या की, कि पाप कहाँ जाता है ?

तपस्या करने के फलस्वरूप देवता प्रकट हुए , ऋषि ने पूछा कि भगवन जो पाप गंगा में धोया जाता है वह पाप कहाँ जाता है ?

भगवन ने जहा कि चलो गंगा से ही पूछते है, दोनों लोग गंगा के पास गए और कहा कि “हे गंगे ! जो लोग तुम्हारे यहाँ पाप धोते है तो इसका मतलब आप भी पापी हुई !”

गंगा ने कहा “मैं क्यों पापी हुई, मैं तो सारे पापों को ले जाकर समुद्र को अर्पित कर देती हूँ !”

अब वे लोग समुद्र के पास गए, “हे सागर ! गंगा जो पाप आपको अर्पित कर देती है तो इसका मतलब आप भी पापी हुए !”
समुद्र ने कहा “मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को लेकर भाप बना कर बादल बना देता हूँ !”

अब वे लोग बादल के पास गए और कहा “हे बादलो ! समुद्र जो पापों को भाप बनाकर बादल बना देते है, तो इसका मतलब आप

बादलों ने कहा “मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को वापस पानी बरसा कर धरती पर भेज देता हूँ , जिससे अन्न उपजता है, जिसको मानव खाता है, उस अन्न में *जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है, जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है , उसी अनुसार मानव की मानसिकता बनती है !”*

*अन्न को जिस वृत्ति ( कमाई ) से प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, वैसे ही विचार मानव के बन जाते है ! इसीलिये सदैव भोजन सिमरन और शांत अवस्था मे करना चाहिए और कम से कम अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन ईमानदारी एवं श्रम का होना चाहिए !*
जैसे-
भीष्म पितामह शरशय्या पर पड़े प्राण त्यागने के लिए शुक्लपक्ष के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे. भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर युधिष्ठिर उनसे प्रतिदिन नीति ज्ञान लेते थे। द्रौपदी कभी नहीं जाती थीं।

इससे भीष्म के मन में पीड़ा थी। श्रीकृष्ण ने भांप लिया था। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा- अंतकाल की प्रतीक्षा में साधनारत पूर्वज से सपरिवार मिलना चाहिए. परिवार पत्नी के बिना पूर्ण नहीं है।

इशारा समझकर युधिष्ठिर जिद करके द्रौपदी को भी साथ ले गए। पितामह उन्हें नीति ज्ञान देने लगे। द्रौपदी कुंठित होकर चुपचाप सुन रही थी. अचानक द्रोपदी को हंसी आ गई।

भीष्म ने कहा- पुत्री तुम्हारे हंसने का कारण मैं जानता हूं। द्रोपदी सकुचाई को भीष्म ने कहा- पुत्री तुम अपने मन की दुविधा पूछ ही लो. मुझे शांति मिलेगी।

द्रोपदी ने कहा- स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भीष्म के समान नीति का ज्ञाता दूसरा कोई नहीं किंतु आपका ज्ञान कहां लुप्त हो गया था जब पुत्रवधू आपके सामने निवस्त्र की जा रही थी?

भीष्म ने कहा- इसी प्रश्न की प्रतीक्षा थी। जैसा अन्न वैसा मन। मैं दुर्योधन जैसे अधर्मी का अन्न खा रहा था। उस अन्न ने मेरी बुद्धि जड़ कर दी थी। सही निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो गई थी।

*अन्न ही रक्त का कारक है। अर्जुन के बाणों ने मेरे शरीर से वह रक्त धीरे-धीरे करके निकाल दिया है। अब इस शरीर में सिर्फ गंगापुत्र भीष्म शेष है। सिर्फ माता का अंश है जो सबको निर्मल करती हैं इसलिए मैं नीति की बातें कर पा रहा हूं।*

*भीष्म की बात को अटल सत्य समझिए। दुराचार से या किसी को सताकर कमाए गए धन से यदि आप परिवार का पालन करते हैं तो वह परिवार की बुद्धि भ्रष्ट करता है। उससे जो सुख है वह क्षणिक है किंतु लंबे समय में वह दुख का कारण बनता है। यदि आपके सामने गलत तरीके से पैसा कमाकर भी कोई फल-फूल रहा है तो यह समझिए कि वे उसके पूर्वजन्म के संचित पुण्य हैं जिसे निगल रहा है। जैसे ही वे पुण्य कर्म समाप्त होंगे, उसके दुर्दिन आरंभ होंगे।*

*आपका दिन मंगलमय हो*