अपने मालिक पर भरोसा

अपने मालिक पर भरोसा

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है।

वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।

वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।

उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों ही करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए।
दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।

थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई मालिक है?
बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।

गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारी उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?

उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी ही है।

गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?

थोड़ी ही देर में सचमुच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया।

जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उस बाघ के स्वभाव से उन दोनों की जान के लिए वह खतरा था।
यदपि यह काल्पनिक कथानक हो सकता है लेकिन समझने के लिय हम सभी को प्रेरणा मिलती है कि –
गाय हमारे समर्पित ह्रदय का प्रतीक है।
बाघ हमारा अहंकारी मन है।
कीचड़ इस संसार माया में हमारी लिप्तता है।
संघर्ष हमारे अनागत अस्तित्व की लड़ाई है।
और मालिक के रूप में सदगुरु आते हैं और हमको इस मायारूपी कीचड़ से निकालकर अपने आनन्द के संसार में ले जाते हैं!

इसलिय
सभी गुरुभक्तों को अपने जीवन की डोर हमेशा समर्पित भाव से अपने मालिक को दे देना ही श्रेयष्कर है! तभी हमारा जीवन सफल हो पायेगा!

भ्रम और वास्तविकता

*भ्रम और वास्तविकता*

बार एक धनवान व्यक्ति ने अपने घर की सारी दीवारों पर कांच की टुकड़ियां लगवा रखीं थीं !

उससे घर में हजारों दर्पण नजर आ रहे थे!
एक ही आदमी के हजारों आदमी नजर आते थे!

एक बार इस सम्राट के महल में एक कुत्ता घुस गया।

कांच के टुकड़ों में अपनी परछाई देख कर वह कुत्ता तो बड़ी मुश्किल में फंस गया!

उसने यह देखा कि *हजारों कुत्ते उसे घूर रहे हैं! वह डरकर भौंकने लगा।*

ध्यान रहे कि *जो डरते हैं, वही भौंकते हैं वर्ना निडर हमेशा आश्वस्त और शान्त रहता है!*

भौंकने से भौंकने वाले को तसल्ली मिलती है कि *हम डरे नहीं हैं, हम तो डरा रहे हैं।*

सच तो यह है कि *डराने की चेष्टा करना ही डरना होता है। दूसरों को वही डराता है, जो खुद डरा हुआ होता है।*

वह कुत्ता जोर से भौंका तो *दर्पण के सब कुत्ते भी एक साथ उसको भौंकते दिखाई दिए। इससे वह तो और भी घबरा गया!*

उसको महसूस हुआ कि *यह क्या उसे तो एक साथ हजारों दुश्मनों ने उसे घेर लिया!*

उसको अपनी सुरक्षा का एक ही उपाय सूझा – *हमला!*

उसने भागकर दर्पणों पर हमला किया। *दर्पणों के हजारों कुत्तों ने भी तब अपनी जवाबी कार्रवाई कर डाली!*

आखिरकार *वह कुत्ता पागल हो गया व अगले दिन मरा हुआ पाया गया!*

संत महापुरुषों के अनुसार;
*इस अस्तित्व के साथ हम जो कुछ भी भाव बनाते हैं उसकी प्रतिध्वनियां भी गूंजने लगती हैं!*
*हम भी किसी ना किसी डर के कारण किसी ना किसी तरह डर के शिकार बन जाते हैं!*

अपनी अभिलाषा की पूर्ति ना होते देख हम शत्रुता की नजरों से देखना शुरु करते हैं तो हमको आभास होता है कि *हमारे चारों तरफ शत्रु खड़े हो रहे हैं!*

जब हम सभी को प्रेमपूर्वक देखने लग जायेंगे तो *हमको कोई शत्रु नजर नहीं आएगा! सभी मित्र नजर आएंगे!*

असल में, *हम अज्ञानता के कारण खुद ही फैल कर गूंजने लगते हैं। हमारी खुद की ही प्रतिध्वनि (आवाज) अपने को ही सुनाई पड़ने लग जाती है!*

हमें समय के महापुरुष यही संदेश देते हैं कि *अपने इस अस्तित्व के साथ मित्रता करो, अपने आप को जानो! तब परस्पर प्रेम, विश्वास, सहयोग और समर्पण के अर्थ समझ में आने लगेंगे!*

प्रश्न यही है कि *क्या हम अपने से प्रेम करते हैं? यदि हां, तो हम सबसे प्रेम करने लगेंगे!*

*जब हम सभी को दिल से प्रेम करने लगोगे तो हमको लगने लगेगा कि सभी हमसे प्रेम कर रहे हैं!*

प्रेम के मारग में कई लोग अपने कपोलकल्पित तर्कों के माध्यम से विजय पाना चाहते हैं!

लेकिन प्रेम का संबंध तो हृदय से है! जब हम अपने आप से प्रेम करने लगते हैं तो *हमारा प्रेम का नाता अजर अमर बन जाता है!*

इसलिए समय के सतगुरु भी हमें *परस्पर प्रेम और भक्ति का पाठ पढ़ाते हैं ; सत्संग, सेवा, सुमिरन व ध्यान सिखाते हैं! अगर हम जीवन का जीते जी असली आनन्द पाना चाहते हैं तो हमको “प्रेम की पाठशाला” में जाकर प्रेम का पाठ सीखना ही पड़ेगा!*

कहा भी है कि –
*प्रबल प्रेम के पाले पड़कर,*
*प्रभु को नियम बदलते देखा!*

*अपना मान भले टल जाए,*
*पर जन का मान ना टलते देखा!*
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*सुप्रभात*
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रात्री की कहानी, विरासत

*रात्री की कहानी*

*विरासत*

महेश के घर आते ही बेटे ने बताया कि वर्मा अंकल आर्टिगा गाड़ी ले आये हैं। *पत्नी ने चाय का कप पकड़ाया और बोली पूरे 13 लाख की गाड़ी खरीदी और वो भी कैश में*। महेश हाँ हूँ करता रहा। आखिर पत्नी का धैर्य जवाब दे गया, हम लोग भी अपनी एक गाड़ी ले लेते हैं, तुम मोटर साईकल से दफ्तर जाते हो क्या अच्छा लगता है कि सभी लोग गाड़ी से आएं और तुम बाइक चलाते हुए वहाँ पहुंचो, कितना खराब लगता है। तुम्हे न लगे पर मुझे तो लगता है।

देखो घर की किश्त और बाल बच्चों के पढ़ाई लिखाई के बाद इतना नही बचता कि गाड़ी लें। फिर आगे भी बहुत खर्चे हैं। महेश धीरे से बोला।

बाकी लोग भी तो कमाते हैं, सभी अपना शौक पूरा करते हैं, *तुमसे कम तनखा पाने वाले लोग भी स्कोर्पियो से चलते हैं, तुम जाने कहाँ पैसे फेंक कर आते हो। पत्नी तमतमाई।*

अरे भई सारा पैसा तो तुम्हारे हाथ मे ही दे देता हूँ, अब तुम जानो कहाँ खर्च होता है। महेश ने कहा।

*मैं कुछ नही जानती, तुम गाँव की जमीन बेंच दो ,यही तो समय है जब घूम घाम लें हम भी ज़िंदगी जी लें। मरने के बाद क्या जमीन लेकर जाओगे। क्या करेंगे उसका। मैं कह रही कल गाँव जाकर सौदा तय करके आओ बस्स। पत्नी ने निर्णय सुना दिया।*

अच्छा ठीक है पर तुम भी साथ चलोगी। महेश बोला । *पत्नी खुशी खुशी मान गयी* और शाम को सारे मुहल्ले में खबर फैल गयी कि सरला जल्द ही गाड़ी लेने वाली है।

सुबह महेश और सरला गाँव पहुँचे। गाँव में भाई का परिवार था। *चाचा को आते देख बच्चे दौड़ पड़े*। बच्चों ने उन्हें खेत पर ही रुकने को बोला, चाचा माँ आ रही है। तब तक महेश की भाभी लोटे में पानी लेकर वहाँ आईं और दोनों के जूड़ उतारने के बाद बोलीं लल्ला अब घर चलो।

*बहुत दिन बाद वे लोग गाँव आये थे, कच्चा घर एक तरफ गिर गया था। एक छप्पर में दो गायें बंधीं थीं। बच्चों ने आस पास फुलवारी बना रखी थी, थोड़ी सब्जी भी लगा रखी थी। सरला को उस जगह की सुगंध ने मोह लिया*। भाभी ने अंदर बुलाया पर वह बोली यहीं बैठेंगे। वहीं रखी खटिया पर बैठ गयी। महेश के भाई कथा कहते थे। एक बालक भाग कर उन्हें बुलाने गया। उस समय वह राम और भरत का संवाद सुना रहे थे। बालक ने कान में कुछ कहा, *उनकी आंख से झर झर आँसू गिरने लगे, कण्ठ अवरुद्ध हो गया। जजमानों से क्षमा मांगते बोले, आज भरत वन से आया है राम की नगरी*। श्रोता गण समझ नही सके कि महाराज आज यह उल्टी बात क्यों कह रहे। नरेश पंडित अपना झोला उठाये नारायण को विश्राम दिया और घर को चल दिये।

*महेश ने जैसे ही भैया को देखा दौड़ पड़ा, पंडित जी के हाथ से झोला छूट गया, भाई को अँकवार में भर लिए। दोनो भाइयों को इस तरह लिपट कर रोते देखना सरला के लिए अनोखा था। उसकी भी आंखे नम हो गयीं। भाव के बादल किसी भी सूखी धरती को हरा भरा कर देते हैं। वह उठी और जेठ के पैर छुए, पंडित जी के मांगल्य और वात्सल्य शब्दों को सुनकर वह अन्तस तक भरती गयी।*

दो पैक्ड कमरे में रहने की अभ्यस्त आंखें सामने की हरियाली और निर्दोष हवा से सिर हिलाती नीम, आम और पीपल को देखकर सम्मोहित सी हो रहीं थीं। *लेकिन आर्टिगा का चित्र बार बार उस सम्मोहन को तोड़ रहा था। वह खेतों को देखती तो उसकी कीमत का अनुमान लगाने बैठ जाती।*

दोपहर में खाने के बाद पण्डित जी नित्य मानस पढ़ कर बच्चों को सुनाते थे। आज घर के सदस्यों में दो सदस्य और बढ़ गए थे। *अयोध्याकांड चल रहा था। मन्थरा कैकेयी को समझा रही थी, भरत को राज कैसे मिल सकता है। पाठ के दौरान सरला असहज होती जाती जैसे किसी ने उसकी चोरी पकड़ ली हो*। पाठ खत्म हुआ। पोथी रख कर पण्डित जी गाँव देहात की समसामयिक बातें सुनाने लगे। सरला को इसमें बड़ा रस आता था। *उसने पूछा कि क्या सभी खेतों में फसल उगाई जाती है?* पण्डित जी ने सिर हिलाते हुए कहा कि एक हिस्सा परती पड़ा है। सरला को लगा बात बन गयी, उसने कहा *क्यों न उसे बेंच कर हम कच्चे घर को पक्का कर लें। पण्डित जी अचकचा गए।* बोले बहू, यह दूसरी गाय देख रही, *दूध नही देती पर हम इसकी सेवा कर रहे हैं। इसे कसाई को नही दे सकते*।

*तुम्हे पता है, इस परती खेत में हमारे पुरखों का जांगर लगा है। यह विरासत है, विरासत को कभी खरीदा और बेंचा थोड़े जाता है। विरासत को संभालते हुए हम लोगों की कितनी पीढ़ियाँ खप गयीं। कितने बलिदानों के बाद आज भी हमने अपनी मही माता को बचा कर रखा है*। तमाम लोगों ने खेत बेंच दिए, उनकी पीढ़ियाँ अब मनरेगा में मजूरी कर रही हैं या शहर के महासमुन्दर में कहीं विलीन हो गए। *तुम अपनी जमीन पर बैठी हो, इन खेतों की रानी हो।* इन खेतों की सेवा ठीक से हो तो देखो कैसे माता मिट्टी से सोना देती है। शहर में जो हर लगा है बेटा वो सब कुछ हरने पर तुला है, सम्बन्ध, भाव, प्रेम, खेत, मिट्टी, पानी हवा सब कुछ। आज तुम लोग आए तो लगा मेरा गाँव शहर को पटखनी देकर आ गया। शहर को जीतने नही देना बेटा। शहर की जीत आदमी को मशीन बना देता है। *हम लोग रामायण पढ़ने वाले लोग हैं जहाँ भगवान राम सोने की लंका को जीतने के बाद भी उसे तज कर वापस अजोध्या ही आते है, अपनी माटी को स्वर्ग से भी बढ़कर मानते हैं।*

तब तक अंदर से भाभी आयीं और उसे अंदर ले गईं। कच्चे घर का तापमान ठंडा था। *उसकी मिट्टी की दीवारों से उठती खुशबू सरला को अच्छी लग रही थी*। भाभी ने एक पोटली सरला के सामने रख दी और बोलीं, *मुझे लल्ला ने बता दिया था, इसे ले लो और देखो इससे कार आ जाये तो ठीक नही तो हम इनसे कहेंगे कि खेत बेंच दें।*

सरला मुस्कुराई, *विरासत कभी बेंचा नही जाता भाभी। मैं बड़ों की संगति से दूर रही न इसलिए मैं विरासत को कभी समझ नही पाई। अब यहीं इसी खेत से सोना उपजाएँगे और फिर गाड़ी खरीदकर आप दोनों को तीरथ पर ले जायेंगे, कहते हुए सरला रो पड़ी, क्षमा करना भाभी। दोनो बहने रोने लगीं। बरसों बरस की कालिख धुल गयी।*

अगले दिन जब महेश और सरला जाने को हुए तो उसने अपने पति से कहा, *सुनो मैंने कुछ पैसे गाड़ी के डाउन पेमेंट के लिए जमा किये थे उससे परती पड़े खेत पर अच्छे से खेती करवाइए। अगली बार उसी फसल से हम एक छोटी सी कार लेंगे और भैया भाभी के साथ हरिद्वार चलेंगे।*

*शहर हार गया, जाने कितने बरस बाद गाँव अपनी विरासत को मिले इस मान पर गर्वित हो उठा था।*

*जय श्रीराम*

*शुभरात्री*

सन्तान सुख

सन्तान सुख

एक बुजुर्ग आदमी स्टेशन पर गाड़ी में चाय बेचता है। गाड़ी में चाय बेच कर वो अपनी झोपड़ी में चला गया। झोपड़ी में जा कर अपनी बुजुर्ग पत्नी से कहा कि दूसरी ट्रेन आने से पहले एक और केतली चाय की बना दो।

दोनों बहुत बुजुर्ग है। आदमी बोला कि काश !! हमारी कोई औलाद होती, तो वो हमें इस बुढ़ापे में कमा कर खिलाती।

औलाद ना होने के कारण हमें इस बुढ़ापे में भी काम करना पड़ रहा है। ये बात सुनकर उसकी पत्नी की आँखों में आँसू आ गए।

उसने चाय की केतली भर कर अपने पति को दे दी।

बुजुर्ग आदमी चाय की केतली ले कर वापिस स्टेशन पर गया।

उसने वहाँ प्लेटफॉर्म पर एक बुजुर्ग दंपती को सुबह से लेकर शाम तक बेंच पर बैठे देखा। वो दोनों किसी भी गाड़ी में नही चढ़ रहे थे।

तब वो चाय वाला बुजुर्ग उन दोनों के पास गया और उनसे पूछने लगा कि आपको कौन सी गाड़ी से जाना है? मैं आप को बता दूंगा की आप की गाड़ी कब और कहां आयेगी?

तब वो बुजुर्ग दंपति बोले कि हमें कहीं नही जाना है। हमें हमारे छोटे बेटे ने यहां एक चिट्ठी दे कर भेजा है और कहा है कि हमारा बड़ा बेटा हमें लेने स्टेशन आएगा और अगर बड़ा बेटा ना पहुंचे तो इस चिट्ठी में जो पता है वहाँ आप पहुंच जाना।

हमें तो पढ़ना लिखना आता नही है आप हमें बस ये चिठ्ठी पढ़ कर ये बता दो कि यह पता कहां का है ताकि हम लोग अपने बड़े बेटे के पास पहुँच जाए।

चाय वाले ने जब वो चिट्ठी पढ़ी तो उसे गहरा धक्का लगा!वो वहीं जमीन पर गिर पड़ा।

उस चिठ्ठी में लिखा था कि – ये मेरे माता-पिता है जो इस चिठ्ठी को पढ़े वो इनको पास के किसी वृद्धाश्रम में छोड़ आये।

चाय वाले ने सोचा था कि – मैं बेऔलाद हूँ इस लिए बुढ़ापे में काम कर रहा हूँ अगर औलाद होती तो काम ना करना पड़ता।
इस बुजुर्ग दंपति के दो बेटे है पर कोई भी बेटा इनको रखने को तैयार नही है।

वास्तव में, सुख या दुःख औलाद से नही मिलता। सुख दुःख तो अपने कर्मो के अनुसार मिलता है। ना कोई औलाद सुख देती है ना कोई औलाद दुःख देती है।

अगर आप के कर्म अच्छे हैं तो आप अकेले बैठे भी खुश रह सकते हो और अगर आप के कर्म बुरे है तो आप राजगद्दी पर बैठ कर भी दुःखी रहोगे!

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा!
जो जश करिह सो तस फल चाखा!!
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

नजर और नजरिया:

नजर और नजरिया:

एक बार की बात है। एक नवविवाहित जोड़ा किसी किराए के घर में रहने पहुंचा।
अगली सुबह, जब वे नाश्ता कर रहे थे तभी पत्नी ने खिड़की से देखा कि सामने वाली छत पर कुछ कपड़े फैले हैं तो उसने बोला “लगता है इन लोगों को कपड़े साफ़ करना भी नहीं आता! ज़रा देखो तो कितने मैले लग रहे हैं?’’

पति ने उसकी बात सुनी पर अधिक ध्यान नहीं दिया।

एक-दो दिन बाद फिर उसी जगह कुछ कपड़े फैले थे। पत्नी ने उन्हें देखते ही अपनी बात दोहरा दी “कब सीखेंगे ये लोग कि कपड़े कैसे साफ़ करते हैं!”

पति सुनता रहा पर इस बार भी उसने कुछ नहीं कहा।
लेकिन अब तो ये रोज की बात हो गई! जब भी पत्नी कपड़े फैले देखती भला-बुरा कहना शुरू हो जाती।

लगभग एक महीने बाद वे नाश्ता कर रहे थे। पत्नी ने हमेशा की तरह नजरें उठाईं और सामने वाली छत की तरफ देखा, “अरे वाह! लगता है इन्हें अकल आ ही गयी! आज तो कपड़े बिलकुल साफ़ दिख रहे हैं! ज़रूर किसी ने टोका होगा!”

पति बोला, “नहीं, उन्हें किसी ने नहीं टोका।”

“तुम्हे कैसे पता?” पत्नी ने आश्चर्य से पूछा।

तब पति ने बतलाया कि आज मैं सुबह जल्दी उठ गया था और मैंने इस खिड़की पर लगे कांच को बाहर से साफ़ कर दिया! इसलिए तुम्हें कपड़े साफ़ नज़र आ रहे हैं।”

हम सबकी ज़िन्दगी में भी यही बात लागू होती है। बहुत बार हम दूसरों को कैसे देखते हैं ये इस पर निर्भर करता है कि हम खुद अन्दर से कितने साफ़ हैं।

किसी के बारे में भला-बुरा कहने से पहले अपनी मनोस्थिति देख लेनी चाहिए और खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम सामने वाले में कुछ बेहतर देखने के लिए तैयार हैं या अभी भी हमारी खिड़की साफ करनी बाकी है!

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय!
जो दिल खोजों आपना, मुझसा बुरा ना कोय !!

परमात्मा से सम्बन्ध

💐💐परमात्मा से सम्बन्ध 💐💐

एक बार एक पंडित जी ने एक दुकानदार के पास पांच सौ रुपये रख दिए।
उन्होंने सोचा कि जब मेरी बेटी की शादी होगी तो मैं ये पैसा ले लूंगा।

कुछ सालों के बाद जब बेटी सयानी हो गई,
तो पंडित जी उस दुकानदार के पास गए।

लेकिन दुकानदार ने नकार दिया और बोला- आपने कब मुझे पैसा दिया था?
बताइए! क्या मैंने कुछ लिखकर दिया है?

पंडित जी उस दुकानदार की इस हरकत से बहुत ही परेशान हो गए और बड़ी चिंता में डूब गए।
फिर कुछ दिनों के बाद पंडित जी को याद आया,
कि क्यों न राजा से इस बारे में शिकायत कर दूं।
ताकि वे कुछ फैसला कर देंगे और मेरा पैसा मेरी बेटी के विवाह के लिए मिल जाएगा।

फिर पंडित जी राजा के पास पहुंचे और अपनी फरियाद सुनाई।

राजा ने कहा- कल हमारी सवारी निकलेगी और तुम उस दुकानदार की दुकान के पास में ही खड़े रहना।

दूसरे दिन राजा की सवारी निकली।
सभी लोगों ने फूलमालाएं पहनाईं और किसी ने आरती उतारी।

पंडित जी उसी दुकान के पास खड़े थे।
जैसे ही राजा ने पंडित जी को देखा,
तो उसने उन्हें प्रणाम किया और कहा- गुरु जी! आप यहां कैसे?
आप तो हमारे गुरु हैं।
आइए! इस बग्घी में बैठ जाइए।

वो दुकानदार यह सब देख रहा था।
उसने भी आरती उतारी और राजा की सवारी आगे बढ़ गई।

थोड़ी दूर चलने के बाद राजा ने पंडित जी को बग्घी से नीचे उतार दिया और कहा- पंडित जी! हमने आपका काम कर दिया है।
अब आगे आपका भाग्य।

उधर वो दुकानदार यह सब देखकर हैरान था,
कि पंडित जी की तो राजा से बहुत ही अच्छी सांठ-गांठ है।
कहीं वे मेरा कबाड़ा ही न करा दें।
दुकानदार ने तत्काल अपने मुनीम को पंडित जी को ढूंढ़कर लाने को कहा।

पंडित जी एक पेड़ के नीचे बैठकर कुछ विचार-विमर्श कर रहे थे।
मुनीम जी बड़े ही आदर के साथ उन्हें अपने साथ ले आए।

दुकानदार ने आते ही पंडित जी को प्रणाम किया और बोला- पंडित जी! मैंने काफी मेहनत की और पुराने खातों को‌ देखा,
तो पाया कि खाते में आपका पांच सौ रुपया जमा है।
और पिछले दस सालों में ब्याज के बारह हजार रुपए भी हो गए हैं।
पंडित जी! आपकी बेटी भी तो मेरी बेटी जैसी ही है।
अत: एक हजार रुपये आप मेरी तरफ से ले जाइए,
और उसे बेटी की शादी में लगा दीजिए।

इस प्रकार उस दुकानदार ने पंडित जी को तेरह हजार पांच सौ रुपए देकर बड़े ही प्रेम के साथ विदा किया।

—— तात्पर्य ——
जब मात्र एक राजा के साथ सम्बन्ध होने भर से हमारी विपदा दूर जो जाती है,
तो हम अगर इस दुनिया के राजा यानि कि परमात्मा से अपना सम्बन्ध जोड़ लें,
तो हमें कोई भी समस्या, कठिनाई या फिर हमारे साथ किसी भी तरह के अन्याय का तो कोई प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होगा।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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आखिरी काम

*💐💐आखिरी काम💐💐*

एक बूढ़ा कारपेंटर अपने काम के लिए काफी जाना जाता था!

उसके बनाये लकड़ी के घर दूर -दूर तक प्रसिद्द थे। पर अब बूढा हो जाने के कारण उसने सोचा कि *बाकी की ज़िन्दगी आराम से गुजारी जाए* और यही सोचकर वह अगले दिन सुबह-सुबह अपने मालिक के पास पहुंचा और बोला, *”ठेकेदार साहब, मैंने बरसों आपकी सेवा की है पर अब मैं बाकी का समय आराम से पूजा-पाठ में बिताना चाहता हूँ, कृपया मुझे काम छोड़ने की अनुमति दें।*

ठेकेदार कारपेंटर को बहुत मानता था, इसलिए उसे ये सुनकर थोडा दुःख हुआ पर वो कारपेंटर को निराश नहीं करना चाहता था!उसने कहा, *”आप यहाँ के सबसे अनुभवी व्यक्ति हैं! आपकी कमी यहाँ कोई नहीं पूरी कर पायेगा!*

मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि *जाने से पहले एक आखिरी काम करते जाइये।*

*“जी , क्या काम करना है?”* कारपेंटर ने पूछा ।

मैं चाहता हूँ कि *आप जाते -जाते हमारे लिए एक और लकड़ी का घर तैयार कर दीजिये!* ठेकेदार घर बनाने के लिए ज़रूरी पैसे देते हुए बोला ।

कारपेंटर इस काम के लिए तैयार हो गया! उसने अगले दिन से ही घर बनाना शुरू कर दिया!

पर ये जान कर कि *ये उसका आखिरी काम है और इसके बाद उसे और कुछ नहीं करना होगा वो थोड़ा ढीला पड़ गया! *पहले जहाँ वह बड़ी सावधानी से लकड़ियाँ चुनता और काटता था अब बस काम चालाऊ तरीके से ये सब करने लगा!*

कुछ एक हफ्तों में घर तैयार हो गया और वो ठेकेदार के पास पहुंचा, *” ठेकेदार साहब, मैंने घर तैयार कर लिया है, अब तो मैं काम छोड़ कर जा सकता हूँ ?”*

ठेकेदार बोला *”हाँ, आप बिलकुल जा सकते हैं लेकिन अब आपको अपने पुराने छोटे से घर में जाने की ज़रुरत नहीं है! क्योंकि इस बार जो घर आपने बनाया है वो आपकी बरसों की मेहनत का इनाम है; जाइये अपने परिवार के साथ उसमे खुशहाली से रहिये !”*

कारपेंटर यह सुनकर स्तब्ध रह गया! वह मन ही मन सोचने लगा, *“कहाँ मैंने दूसरों के लिए एक से बढ़ कर एक आलीशान घर बनाये और अपने घर को ही इतने घटिया तरीके से बना बैठा …क़ाश मैंने ये घर भी बाकी घरों की तरह ही बनाया होता!*

💐💐 मित्रो, इस दृष्टांत से यही शिक्षा मिलती है कि *कब आपका कौन सा काम किस तरह आपको बदल सकता है ये बताना मुश्किल है!*

ये भी समझने की ज़रुरत है कि *हमारा काम हमारी पहचान बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है,इसलिए हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम हर एक काम अपनी अच्छी परख के साथ करें!*
फिर चाहे वो *हमारा आखिरी काम ही क्यों ना हो!*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।। ओम शांति*

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏🙏

मन चंगा तो कठौती गंगा

‼️ *मन चंगा तो कठौती गंगा…..*‼️

एक बार भक्तिमती मीराबाई को किसी ने ताना मारा, *”मीरा! तू तो राज रानी है। महलों में रहने वाली, मिष्ठान-पकवान खाने वाली और तेरे गुरु झोपड़ी में रहते हैं। उन्हें तो एक वक्त की रोटी भी ठीक से नहीं मिलती”।*
मीरा से यह कैसे सहन होता! मीरा ने पालकी मंँगवाई और गुरुदर्शन के लिए चल पड़ी। मायके से कन्यादान में मिला एक हीरा उसने गाँठ में बांँध लिया।

रैदास जी की कुटिया जगह-जगह से टूटी हुई थी। वे एक हाथ में सुई और दूसरे में एक फटी पुरानी जूती लेकर बैठे थे।पास ही एक कटौती पड़ी हुई थी।

*हाथ से काम और मुख में नाम चल रहा था।*

ऐसे महापुरुष कभी बाहर से चाहे साधन संम्पदा विहीन दिखें पर *अन्दर की परम सम्पदा के धनी होते हैं और बाहर की धनसम्पदा उनके चरणों की दासी होती है। यह संतों का विलक्षण ऐश्वर्य है।*

मीरा ने गुरु चरणों में वह बहूमूल्य हीरा रखते हुए प्रणाम किया।उनके नेत्रों में श्रद्धा-प्रेम के आंँसू उमड़ रहे थे।

वह हाथ जोड़कर निवेदन कर लगी। “गुरुजी!लोग मुझे ताने मारते हैं कि *मीरा तू तो महल में रहती है और तेरे गुरु को रहने के लिए अच्छी कुटिया भी नहीं है। गुरुदेव मुझसे यह सुना नहीं जाता। अपने चरणों में एक दासी की तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिए। 5इस झोपड़ी और कटौती को छोड़कर तीर्थ यात्रा कीजिए और….”*

और आगे संत रैदास जी ने मीरा को बोलने मौका नहीं दिया।

वे बोले- *”गिरधर नागर की सेविका होकर तुम ऐसा कहती हो! मुझे इसकी जरूरत नहीं है!*

*बेटी! मेरे लिए इस कटौती का पानी ही गंगाजी है,यह झोपड़ी मेरी काशी है”।*

इतना कहकर रैदास जी ने *कठौती में से एक अंजलि जल लेकर उसकी धार की तो अनेकों सच्चे मोती जमीन पर बिखर गये। मीरा चकित-सी देखती रह गई।*

सच्चे महान पुरुष मानव को *बाहरी धन-सम्पदा में ना उलझा कर सही ज्ञान मार्ग बताते हैं।*

*ज्ञान मार्ग ही सच्चा मार्ग है।बाकी सब असार है। सब यही छूट जायेगा।*

इसीलिए *समय के महापुरुष अभ्यास करने के लिए, भजन-सुमिरण करने के लिए कहते हैं!*

*आज तक सच्चे सद्गुरु की कृपा का अगर आनंद लिया तो उसका एक मात्र रास्ता है – उनके द्वारा दिए ज्ञान का सतत अभ्यास करना!*
अन्यथा –
*भक्ति भाव भादो नदी,*
*निश दिन चले इतराए!*
*सरिता सोय सराहिए,*
*जो जेठ मास ठहराए!*

*अभ्यास के द्वारा ही हम धीर गम्भीर और गरिमामय सकून भरे पलों का रसास्वादन कर सकते हैं!*

*आपका जीवन आनंदमय बना रहे!*

चार मोमबत्तियां

चार मोमबत्तियां

रात का समय था! चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था! नज़दीक ही एक कमरे में चार मोमबत्तियां जल रही थीं।
एकांत पाकर आज वे एक दुसरे से दिल की बात कर रही थीं।

पहली मोमबत्ती बोली, *”मैं शांति हूँ, पर मुझे लगता है अब इस दुनिया को मेरी ज़रुरत नहीं है, हर तरफ आपाधापी और लूट-मार मची हुई है! मैं यहाँ अब और नहीं रह सकती।*

और ऐसा कहते हुए *कुछ देर में वो मोमबत्ती बुझ गयी।*

दूसरी मोमबत्ती बोली, *”मैं विश्वास हूँ और मुझे लगता है झूठ और फरेब के बीच मेरी भी यहाँ कोई ज़रुरत नहीं है! मैं भी यहाँ से जा रही हूँ!”*
और *दूसरी मोमबत्ती भी बुझ गयी।*

तीसरी मोमबत्ती भी दुखी होते हुए बोली, *” मैं प्रेम हूँ! मेरे पास जलते रहने की ताकत है, पर आज हर कोई इतना व्यस्त है कि मेरे लिए किसी के पास वक्त ही नहीं! दूसरों से तो दूर लोग अपनों से भी प्रेम करना भूलते जा रहे हैं! मैं ये सब और नहीं सह सकती मैं भी इस दुनिया से जा रही हूँ!*
और ऐसा कहते हुए *तीसरी मोमबत्ती भी बुझ गयी।*

वो अभी बुझी ही थी कि *एक मासूम बच्चा उस कमरे में दाखिल हुआ।*

मोमबत्तियों को बुझे देख वह घबरा गया!
उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे और वह रुंआसा होते हुए बोला, *“अरे , तुम मोमबत्तियां जल क्यों नहीं रही? तुम्हे तो अंत तक जलना है ! तुम इस तरह बीच में हमें कैसे छोड़ के जा सकती हो ?”*

तभी चौथी मोमबत्ती बोली, *”प्यारे बच्चे घबराओ नहीं, मैं आशा हूँ और जब तक मैं जल रही हूँ हम बाकी मोमबत्तियों को फिर से जला सकते हैं।“*

यह सुन बच्चे की आँखें चमक उठीं और *उसने आशा के बल पर शांति, विश्वास, और प्रेम को फिर से प्रकाशित कर दिया।*

मित्रों , जब सबकुछ बुरा होते दिखे! चारों तरफ अन्धकार ही अन्धकार नज़र आये। अपने भी पराये लगने लगें तो भी उम्मीद मत छोड़िए! आशा मत छोड़िये, क्योंकि इसमें इतनी शक्ति है कि *ये हर खोई हुई चीज आपको वापस दिल सकती है।*

*अपनी आशा की मोमबत्ती को जलाये रखिये!*
*बस! अगर ये जलती रहेगी तो आप किसी भी और कितनी ही मोमबत्तियों को प्रकाशित कर सकते हैं।*
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*मंगलमय सुप्रभात*
*स्नेह वंदन*

चिंता!

*चिंता!*

एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं।

जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।

राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह *एक गरीब संन्यासी से करवा दिया।*

राजा ने सोचा कि *एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।*

विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई।

कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं।

उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि *रोटियां यहां क्यों रखी हैं?*

संन्यासी ने जवाब दिया कि *ये रोटियां कल के लिए रखी हैं! अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे।*

संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी।

राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था क्योंकि उन्हें ये लगता है कि *आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं! आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं!*

लेकिन यह क्या *आप तो कल की चिंता करने में लगे हैं। क्या आपको भगवान पर भरोसा नहीं है?*

सच्चा भक्त तो वही है *जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है। अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं।*

अगर भगवान चाहेगा तो *हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।*

ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि *उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है।*

उसने राजकुमारी से कहा कि *आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया!*

अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो हमें विश्वास भी होना चाहिए कि *भगवान हर समय हमारे साथ है। उसको (भगवान) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।*

कभी आप बहुत परेशान हों, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो तो आप आँखें बंद करके विश्वास के साथ पुकारें!

सच मानिये, *आपकी समस्या का समाधान मिल जायेगा!*

इसलिए,
🦚 *सदैव प्रसन्न रहिये।*🦚
*जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है।।*
*🦚कर भला तो हो भला,*
*अन्त भले का भला!*🦚🦚
*🙏🏻 🙏🏻