गुरु आज्ञा में न रहने का परिणाम

*🙇‍♂️गुरु आज्ञा में न रहने का परिणाम🙇‍♂️*

एक सेवक ने अपने गुरू जी से विनती की कि, *मैं सत्संग भी सुनता हूँ, सेवा भी करता हूँ, मग़र फिर भी मुझे कोई फल नहीं मिला।*

गुरु जी ने प्यार से पूछा- *बेटा तुम्हे क्या चाहिए ?*
सेवक बोला, *मैं तो बहुत ही ग़रीब हूँ दाता।*_
गुरु जी ने हँस कर पूछा- *बेटा तुम्हें कितने पैसों की ज़रूरत है?*

सेवक ने विनती की कि *आप बस इतना दे दो, कि सिर पर छत हो, समाज में पत (इज्जत) हो।*

गुरु जी ने पूछा *और ज़्यादा की भूख तो नहीं है न बेटा ?*_

सेवक हाथ जोड़ के बोला, *नहीं जी, बस इतना ही बहुत है।*

गुरु ने उसे चार मोमबत्तियां दीं और कहा *मोमबत्ती जला के पूरब दिशा में जाओ! जहाँ ये बुझ जाये, वहाँ खुदाई करके खूब सारा धन निकाल लेना। अगर कोई इच्छा बाकी हो तो दूसरी मोमबत्ती जला कर पश्चिम में जाना। और चाहिए तो उत्तर दिशा में जाना। लेकिन सावधान, दक्षिण दिशा में कभी मत जाना, वर्ना बहुत भारी मुसीबत में फँस जाओगे!*

सेवक बहुत खुश हो कर पूरब की ओर चल पड़ा। जहाँ मोमबत्ती बुझ गई, वहाँ खोदा *तो सोने का भरा हुआ घड़ा मिला।*
*बहुत खुश हुआ और गुरु जी का शुक्राना करने लगा!*

थोड़ी देर बाद, सोचा, थोड़ा और धन माल मिल जाये, फिर आराम से घर जा कर ऐश करूँगा। *मोमबत्ती जलाई पश्चिम की ओर चल पड़ा हीरे मोती मिल गये।*
खुशी बहुत बढ़ गई, मग़र मन की भूख भी बढ़ गई। तीसरी मोमबत्ती जलाई और *उत्तर दिशा में चला वहाँ से भी बेशुमार धन मिल गया।*

सोचने लगा के कि *चौथी मोमबत्ती और दक्षिण दिशा जाने के लिये गुरू जी ने मना किया था। सोचा, शायद वहाँ से भी क़ोई अनमोल चीज़ मिलेगी!*

मोमबत्ती जलाई और चला दक्षिण दिशा की ओर, *जैसे ही मोमबत्ती बुझी वो जल्दी से ख़ुदाई करने लगा। खुदाई की तो एक दरवाजा दिखाई दिया, दरवाजा खोल के अंदर चला गया।* अंदर एक और दरवाजा दिखाई दिया उसे खोल के अन्दर चला गया। अँधेरे कमरे में उसने देखा, *एक आदमी चक्की चला रहा है।*

सेवक ने पूछा, *भाई तुम कौन हो?*
चक्की चलाने वाला बहुत खुश हो कर बोला, *ओह ! आप आ गये?* यह कह कर उसने वो चक्की गुरू के सेवक के आगे कर दी
सेवक कुछ समझ नहीं पाया और सेवक चक्की चलाने लगा।

सेवक ने पूछा, *भाई, तुम कहाँ जा रहे हो? अपनी चक्की सम्भालो!*

उस आदमी ने कहा – *मैने भी अपने गुरु का आदेश नहीं माना था और लालच के मारे यहाँ फँस गया था! बहुत रोया, गिड़गिड़ाया!
तब मेरे गुरु जी ने मुझे दर्शन दिये और कहा था, *बेटा जब कोई तुमसे भी बड़ा लालची यहाँ आयेगा, तभी तुम्हारी जान छूटेगी! आज तुमने भी अपने गुरु का आदेश नहीं माना! *अब भुगतो।*

सेवक बहुत शर्मसार हुआ और रोते रोते चक्की चलाने लगा। वो आज भी इंतज़ार कर रहा है कि *कोई उससे भी बड़ा लालची, पैसे का भूखा आयेगा! तभी उसकी मुक्ति होगी।*
इसलिय,
*गुरु आज्ञा में रहें! खुश रहें! भजन सुमिरन करते रहें!*
गुरु आज्ञा में निश दिन रहिये ।
जो गुरु चाहे सोयि सोयि करिये॥

गुरु चरनन रज मस्तक दीजे ।
निज मन बुद्धि शुद्ध कर लीजे।

आँखिन ज्ञान सुअंजन दीजे ।
परम सत्य का दरशन करिये॥

गुरु आज्ञा में निश दिन रहिये॥

गुरु अँगुरी दृढ़ता से धरिये ।
साधक नाम सुनौका चढिये।

खेवटिया गुरुदेव सरन में ।
भव सागर हँस हँस के तरिये॥

गुरु आज्ञा में निश दिन रहिये॥

गुरु की महिमा अपरम्पार ।
राम धाम में करत विहार।

ज्योति स्वरूप राम दरशन को ।
गुरु के चरन चीन्ह अनुसरिये॥

गुरु आज्ञा में निश दिन रहिये॥
🙏🙏🙏🙏🙏

गृहस्थ बड़ा या सन्यासी

🛑 गृहस्थ बड़ा या सन्यासी🛑

प्राचीन समय की बात है। किसी नगर में एक विचित्र राजा रहता था। उस राजा की एक बड़ी ही अजीब आदत थी। जब भी नगर में कोई साधू या सन्यासी आता था तो वह उसे बुलाकर पूछता था कि – *“गृहस्थ बड़ा या सन्यासी?”*

जो भी बताता कि गृहस्थ बड़ा है। वह राजा उससे कहता था कि – *“तो फिर आप सन्यासी क्यों बने? चलिए गृहस्थ बनिए!”* इस तरह वह उस सन्यासी को भी गृहस्थ बनने का आदेश देता था।

जो बताता कि *सन्यासी बड़ा है।* वह उससे प्रमाण मांगता था। जो यदि वह प्रमाण न दे सके तो *वह उसे भी गृहस्थ बना देता था।* इस तरह कई संत आये और उन्हें सन्यासी से गृहस्थ बनना पड़ा।

इसी बीच एक दिन नगर में एक महात्मा का आगमन हुआ। उसे भी राजा ने बुलाया और अपना वही पुराना प्रश्न पूछा – *“गृहस्थ बड़ा या सन्यासी?”*

महात्मा बोले – *“राजन! न तो गृहस्थ बड़ा है, न ही सन्यासी, जो अपने धर्म का पालन करें। वही बड़ा है।”*

राजा बोला – *“अच्छी बात है। क्या आप अपने कथन को सत्य सिद्ध कर सकते है?”*

महात्मा ने कहा – *“अवश्य! इसके लिए आपको मेरे साथ चलना होगा।”* राजा महात्मा के साथ चलने के लिए तैयार हो गया।

दूसरे ही दिन दोनों घूमते – घूमते दूसरे राज्य निकल गये। उस राज्य में राजकन्या का स्वयंवर हो रहा था। दूर – दूर के राजा – राजकुमार आये हुए थे। बड़े ही विशाल उत्सव का आयोजन किया हुआ था। राजा और महात्मा दोनों उस उत्सव में शामिल हो गये।

स्वयंवर का शुभारम्भ हुआ। राजकन्या राजदरबार में उपस्थित हुई। वह बड़ी ही रूपवती और सुन्दर थी। सभी राजा और राजकुमार स्तब्ध होकर उसे देख रहे थे और मन ही मन उसे पाने की कामना कर रहे थे।

राजकन्या के पिता का कोई वारिस नहीं था। इसलिए महाराज राजकन्या द्वारा स्वयंवरित राजकुमार को ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करने वाला था।

राजकुमारी अपनी सखियों के साथ राजाओं के बीच घुमने लगी। वहाँ उपस्थित सभी राजाओं को देखने के पश्चात भी उसे कोई पसंद नहीं आया। राजा निराश होने लगे। राजकुमारी के पिता भी सोचने लगे कि स्वयंवर व्यर्थ ही जायेगा, क्योंकि राजकुमारी को तो कोई वर पसंद ही नहीं आया।

तभी वहाँ एक तेजस्वी सन्यासी का आगमन हुआ। सूर्य के समान उसका चेहरा कांति से चमक रहा था। *तभी राजकुमारी की दृष्टि उस युवा सन्यासी पर पड़ी। देखते ही राजकुमारी ने अपनी वरमाला उसके गले में पहना दी।*

अचानक हुए इस स्वागत से वह युवा सन्यासी अचंभित हो गया। उसने तुरंत वस्तुस्थिति को समझा और तत्क्षण उस माला को अपने गले से निकालते हुए कहा – *“हे देवी! क्या तुझे दीखता नहीं! मैं एक सन्यासी हूँ। मुझसे विवाह के बारे में सोचना तेरी भूल है।”*

तभी राजा ने सोचा – *“लगता है यह कोई भिखारी है जो विवाह करने से डर रहा है।”* उन्होंने अपनी घोषणा दुबारा दोहराई – *“हे युवक! क्या तुम्हें पता भी है। मेरी पुत्री से विवाह करने के बाद तुम इस सम्पूर्ण राज्य के मालिक हो जाओगे? क्या फिर भी तुम मेरी पुत्री का परित्याग करोगे?”*

सन्यासी बोला – *“राजन! मैं सन्यासी हूँ और विवाह करना मेरा धर्म नहीं है। आप अपनी पुत्री के लिए कोई अन्य वर देखिये।”* इतना कहकर वह वहाँ से चल दिया। किन्तु वह युवक राजकुमारी के मन में बस चूका था। उसने भी प्रतिज्ञा की कि *“मैं विवाह करूंगी तो उसी से अन्यथा अपने प्राण त्याग दूंगी।”* इतना कहकर वह भी उसके पीछे – पीछे चली गई।

वह राजा और महात्मा जो यह वृतांत देख रहे थे। उनमें से महात्मा ने कहा – *“चलो! हम भी उनके पीछे चलकर देखते है, क्या परिणाम होता है?”* वह दोनों भी राजकुमारी के पीछे – पीछे चलने लगे।

चलते चलते वह एक घने जंगल में पहुँच गये। तभी वह युवा सन्यासी तो कहीं अदृश्य हो गया और राजकुमारी अकेली रह गई। घने जंगल में किसी को न देख राजकुमारी व्याकुल हो उठी। तभी यह राजा और महात्मा उसके पास पहुँच गये और उन्होंने राजकुमारी को समझाया। यह दोनों उसे उसके पिता के पास छोड़ने के लिए ले जाने लगे।

वह जंगल से बाहर निकले ही थे कि अँधेरा हो गया। सर्दी की काली अंधियारी रात थी। भटकते – भटकते यह तीनो एक गाँव में पहुंचे। यह गाँव के चौपाल पर जाकर बैठ गये। बहुत सारे लोग वहाँ से गुजरे लेकिन किसी ने इन ठण्ड से ठिठुरते मुसाफिरों का हाल तक नहीं पूछा।

तभी वहाँ से एक गाड़ीवान गुजरा। वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खेत से घर आ रहा था। उसने देखा कि *वह तीनों ठण्ड से ठिठुर रहे है।* वह उनके पास गया और पूछताछ कि *तो महात्मा ने भटके हुए मुसाफ़िर बता दिया।*

किसान बोला – *“हे अतिथिदेव! अगर आप चाहे तो आज रात मेरे घर ठहर सकते है।”* वह उनको घर ले गया। भोजन की पूछी और भोजन करवाया। उस दिन उनके घर में ज्यादा अनाज नहीं था। अतः किसान और उसकी पत्नी ने अपने हिस्से का भोजन अतिथियों को करवा दिया और स्वयं भूखे ही सो गये।

सुबह हुई। राजकन्या को उसके पिता के पास छोड़कर राजा और सन्यासी दोनों वापस अपने नगर को चल दिए।

महात्मा ने राजा से कहा – *“देखा राजा! राजकन्या और राज्य को छोड़ने वाला वह सन्यासी अपनी जगह बड़ा है और हमारे अतिथि सत्कार के लिए स्वयं भूखा सोने वाला वह गृहस्थ किसान अपनी जगह बड़ा है।*

*एक तरफ सन्यासी ने राज, वैभव और रमणी का तनिक भी मोह न करके अपने धर्म का पालन किया है, इसलिए वह निश्चय ही महान है।* *दूसरी तरह उन दंपति ने अपना व्यक्तिगत स्वार्थ न देखकर अतिथिसेवा को प्रधानता दी, इसलिए वह दोनों भी निश्चय ही महान है।”*
इसलिय –
*“ किसी भी देश, काल और परिस्थिति में अपने धर्म – कर्तव्य का पालन करने वाला मनुष्य ही बड़ा होता है। फिर चाहे वह गृहस्थ हो या सन्यासी, कोई फर्क नहीं पड़ता।”*

इस तरह महात्मा ने अपनी बात को सत्य सिद्ध किया।

🙏🙏 जय सच्चिदानंद🙏🙏

अंतरात्मा और उसकी आवाज!

अंतरात्मा और उसकी आवाज!

हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि “हम खुद को ही नहीं जानते”, शायद हम अपनी प्रकृति या मूल स्वभाव को ही नहीं जानते या फिर शायद जानते हुए भी अनजान हैं!

जिस तरह हमें पता है कि पानी का स्वभाव तरल होता है, उसी तरह क्या हमें पता है कि मनुष्य का मूल स्वभाव क्या है? क्या है हमारा मूल स्वभाव? अपने आप को जानना यानी आत्म बोध!

हर व्यक्ति के अन्दर एक शांत शक्ति मौजूद है जिसे हम अपनी अंतरआत्मा कहते हैं! यह अंतरात्मा हर परिस्थति में सही होती है। यह अंतरात्मा हमेशा हमें सही रास्ता दिखाती है।

जब भी हम कुछ गलत कर रहे होते है, तब हमें बड़ा अजीब सा लगता है! जैसे कोई यह कह रहा कि वह कार्य मत करो। यह हमारे अन्दर मौजूद आतंरिक शक्ति ही होती है जो हमें बुरा कार्य करने से रोकती है।

कहा जाता है कि हर मनुष्य के अन्दर ईश्वर का अंश होता है, यह ईश्वर का अंश हमारी अंतरआत्मा ही होती है। हमारी प्रकृति या स्वभाव – शांत, शक्ति, प्रेम, सुख, आनंद, पवित्रता, ज्ञान, सद्भाव, दूसरों की सहायता और अच्छाई है।

हर मनुष्य के अन्दर यह शांत और अद्भुत शक्ति मौजूद है, चाहे वह एक अपराधी हो या संत या और कोई व्यक्ति। लेकिन फिर क्यों एक संत सही मार्ग पर चलता है और अपराधी गलत मार्ग पर?
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संत को अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनाई देती है लेकिन अपराधी को वह आवाज अब सुनाई नही देती।

दरअसल जब हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना कर देते है तो हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो जाता है।

जब हम दूसरी बार कुछ बुरा करने जा रहे होते है तो हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज फिर महसूस होती है लेकिन इस बार वह आवाज इतनी मजबूत नहीं होती क्योंकि हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो चुका होता है।

जैसे जैसे हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना करते जाते है वैसे वैसे हमारा अपनी अंतरात्मा के साथ संपर्क कमजोर होता जाता है और एक दिन ऐसा आता है कि हमें वो आवाज बिल्कुल नहीं सुनाई देती।

जैसे जैसे हमारा अपनी अंतरात्मा के साथ संपर्क कमजोर होता जाता है वैसे वैसे हम उदास रहने लगते है और खुशियाँ भौतिक वस्तुओं में ढूंढने लगते है। हम समस्याओं को हल करने में असक्षम हो जाते है जिससे “तनाव” हमारा हमसफ़र बन जाता है।

इसलिय हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज को कभी अनसुना नहीं करना चाहिय क्योंकि वही सच्ची अन्तः प्रेरणा हमारा मार्गदर्शन करती है और पग-पग पर हमें अशुभ से बचाती है!
सुप्रभात…🙏🌹🎊🎊🌹

भाव” “अभाव” और “प्रभाव

“भाव” “अभाव” और “प्रभाव” 💗

महाभारत का युद्ध रोकने के अंतिम प्रयास हेतु स्वयं श्री कृष्ण शांति प्रस्ताव लेकर हस्तीनापुर पहुंचे! कुटिल शकुनी ने कृष्ण को भोजन पर आमंत्रित करने की योजना बनाई! स्वयं दुर्योधन ने उनको निमंत्रण दिया!
कृष्ण तो फिर कृष्ण हैं! उन्होंने निमंत्रण अस्वीकार कर दिया और जा पहुँचे विदुर के घर! विदुरानी कृष्ण पर अपार स्नेह रखती थी!अचानक कृष्ण को देख भावुक हो गई। कृष्ण ने जब कहा क़ि, भूख लगी है! तो तुरंत केले ले आई और भाव विह्वलता से बेसुध होकर केले फैंक देती और छिलका खिला देती।

माधव भी बिना कुछ कहे प्रेम से छिलकों को खाते रहे! बात फैली! दुर्योधन जो कृष्ण से बैर भाव रखता था ताना मारके बोला, “केशव मैंने तो छप्पन भोग बनवाये थे पर आपको तो छिलके ही पंसद आये!”

माधव मुस्करा के बोले, दुर्योधन, कोई किसी का आमंत्रण तीन वजहों से स्वीकार करता है – *पहला *भाव में, दूसरा अभाव में और तीसरा प्रभाव में!*

भाव तुझमें है नहीं, अभाव मुझे है नहीं और प्रभाव तेरा मै मानता नहीं।अब तू ही बता कि मैं कैसे तुम्हारा निमंत्रण स्वीकार करता?

मैं वहीं गया जहाँ मुझे जाना चाहिये था। मैं भोजन का नहीं भाव का भूखा हूं और हमेशा रहूंगा!

भाव का भूखा हूँ मैं और भाव ही एक सार है!….

आत्म-दर्शी” व “आत्म-अन्वेषक

*”आत्म-दर्शी” व “आत्म-अन्वेषक”*
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आज मनुष्य अपने शरीर निर्वाह के लिए, परिवार पालन के लिए ऊंची से ऊंची लौकिक शिक्षा प्राप्त करता है। परंतु अलौकिक शिक्षा से आत्मा को पुष्ट और पवित्र करने का विचार नहीं करता क्योंकि वह अपने आत्मिक अस्तित्व के बारे में जानता ही नहीं।

*जो शिक्षा मनुष्य को चरित्रवान बनाए! उसे उसके अन्दरस्थित शक्ति से जोड़कर संसार में सुख शांति की स्थापना में सहयोगी बनाए! उसे ही वास्तविक शिक्षा कहा जा सकता है।*

सर्वोत्तम शिक्षा वह है जिससे *आत्मा प्रकाशमान हो! शरीर शक्तिमान हो और कर्म सुखदाई हो!*

*ऐसी शिक्षा ही युग परिवर्तन का आधार है।*

सन 1921 में नोबेल पुरस्कार से नवाजे गए महानतम वैज्ञानिक आइंस्टाइन जब जीवन के अंतिम पड़ाव पर थे! तब एक अमेरिकी पत्रकार ने उनसे पूछा, *”सर आप की अंतिम इच्छा क्या है? अगर पुनर्जन्म लिया तो आप क्या बनना पसंद करेंगे?*

कुछ देर सोच विचार कर आइंस्टाइन बोले, *मैंने बहुत बड़े-बड़े आविष्कार किए! दुनिया मेरा लोहा मानती है। ना जाने कितने सत्यों व तथ्यों की खोज करने में मैंने अपना सारा जीवन लगाया!* लेकिन अब मुझे महसूस हो रहा है कि *मैं तो खाली हाथ जा रहा हूं। *”मैं इस सब खेल को रचाने वाले सर्वश्रेष्ठ आविष्कारक के बारे में सोच भी नहीं सका। आत्म-परमात्म तत्व को नहीं जान पाया क्योंकि मेरा ध्यान उस तरफ कभी गया ही नहीं।”*

अब तो प्रभु से यही प्रार्थना है कि *अगले जन्म में मैं आत्म-दर्शी, आत्म-अन्वेषक संत बनूं ताकि जीवन का तथा उस परम शक्ति के तथ्यों का साक्षात्कार कर सकूं।*
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जीवन की सच्ची सार्थकता

💫 *जीवन की सच्ची सार्थकता*🌷

✍️ किसी ने अपने भगवान से पूछा कि, *”शांति चाहिए, इसके लिए मैं क्या करूं?*

जवाब मिला, *”कुछ मत करो, बल्कि जो कर रहे हो उसे बंद कर दो! शांति का अहसास होने लगेगा! क्वयोंकि ह तुम्हारे ही अन्दर है! उसको कही आना जाना नहीं है!*
बतौर उदाहरण आप झूले पर झूल रहे हो और पैर से टेका लगाना बंद कर दो! झूला अपने आप थम जाएगा। शांतिमय जीवन के लिए जरूरी है कि *व्यक्ति हर हाल में मस्त रहने की कला सीख ले।* जो नहीं मिला उसके लिए मुझ से शिकायत मत करो कि *तूने मुझे औरों से कम दिया है!*
बल्कि इस बात के लिए उसे धन्यवाद दो कि *तुमने मुझे तेरी काबलियत से भी अधिक दिया है।*

अगर तुम इस बात को मान लो तो *पचास फीसदी दुःख आज ही खत्म हो जाएँ!*

हमें इस बात का कभी अफसोस न हो कि *मेरे पास बहुत से दुनियावी सुखों की कमी है! बल्कि हमें इस बात की हमेशा ख़ुशी रहे कि *दुनिया का हर सुख देने वाला सुख सागर भगवान मेरा पिता है और सदा मेरे साथ है!*

महापुरुष हमें समझाते हैं कि, *संसार में तुम्हारा जीवन चार दिनों का खेल है!*
संसार का कोई कोना ऐसा नहीं है जहाँ दुख अथवा मौत का राज्य न हो! संसार का कोई भी इन्सान मौत के वार से बच नहीं सकता।
*जीना झूठ है और मरना सच है- अगर जीते जी अपने आप को नहीं जन पाये!*

समय के सदगुरु बार-बार सम्झाते हैं कि *मैं मौत की बातें बताकर तुम्हें डराता नहीं हूंँ!* केवल सच्ची हकीकत बताता हूंँ कि *इस रास्ते पर अकेले ही जाना है।* इसलिए हे इन्सान, *तू अपने अन्दर के भगवान् से जुड़ने में देर न कर! प्रभु की बन्दगी करके अपने आत्मिक स्वरूप को पहचान! फालतू बातों में अपना समय न गँवा! एक सच्चे कर्मयोगी तरह जीवनयापन कर! इसी में मनुष्य जीवन की सार्थकता है और यही तेरे जीवन का लक्ष्य भी है!*

सदा याद रहे कि *आज है तो अब है! कल का नाम ही काल है!*
🍁🍁🍁💞 *सुप्रभात*💞🍁🍁🍁

सेठ जी की परीक्षा

*💐💐सेठ जी की परीक्षा💐💐*

बनारस में एक बड़े धनवान सेठ रहते थे। वह विष्णु भगवान् के परम भक्त थे और हमेशा सच बोला करते थे!

एक बार जब भगवान् सेठ जी की प्रशंशा कर रहे थे तभी माँ लक्ष्मी ने कहा , *”स्वामी, आप इस सेठ की इतनी प्रसंशा किया करते हैं, क्यों न आज उसकी परीक्षा ली जाए!* और जाना जाए कि *क्या वह सचमुच इसके लायक है या नहीं?”*

भगवान् बोले , *” ठीक है ! अभी सेठ गहरी निद्रा में है आप उसके स्वप्न में जाएं और उसकी परीक्षा ले लें।”*

अगले ही क्षण सेठ जी को एक स्वप्न आया।

स्वप्न मेँ धन की देवी लक्ष्मी उनके सामनेँ आई और बोली, *”हे मनुष्य! मैँ धन की दात्री लक्ष्मी हूँ।”*

सेठ जी को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और वो बोले, *”हे माता आपने साक्षात अपने दर्शन देकर मेरा जीवन धन्य कर दिया है! बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?”*

लक्ष्मी बोली, *”कुछ नहीं ! मैं तो बस इतना बताने आयी हूँ कि मेरा स्वाभाव चंचल है, और वर्षों से तुम्हारे भवन में निवास करते-करते मैं ऊब चुकी हूँ और यहाँ से जा रही हूँ।”*

सेठ जी बोले, *”मेरा आपसे निवेदन है कि आप यहीं रहें, किन्तु अगर आपको यहाँ अच्छा नहीं लग रहा है तो मैं भला आपको कैसे रोक सकता हूँ! आप अपनी इच्छा अनुसार जहाँ चाहें जा सकती हैं।”*

और माँ लक्ष्मी उसके घर से चली गई।

थोड़ी देर बाद वे रूप बदल कर पुनः सेठ के स्वप्न मेँ यश के रूप में आयीं और बोलीं, *”सेठ मुझे पहचान रहे हो?”*

सेठ – *“नहीं महोदय, आपको नहीँ पहचाना।*

यश – *”मैं यश हूँ , मैं ही तेरी कीर्ति और प्रसिध्दि का कारण हूँ । लेकिन अब मैँ तुम्हारे साथ नहीँ रहना चाहता क्योँकि माँ लक्ष्मी यहाँ से चली गयी हैं अतः मेरा भी यहाँ कोई काम नहीं।”*

सेठ – *”ठीक है, यदि आप भी जाना चाहते हैं तो वही सही।”*

सेठ जी अभी भी स्वप्न में ही थे और उन्होंने देखा कि *वह दरिद्र हो गए हैं और धीरे-धीरे उनके सारे रिश्तेदार व मित्र भी उनसे दूर हो गए हैं। यहाँ तक की जो लोग उनका गुणगान किया करते थे वो भी अब बुराई करने लगे हैं।*

कुछ और समय बीतने पर माँ लक्ष्मी *धर्म* का रूप धारण कर पुनः सेठ के स्वप्न में आयीं और बोलीं, *”मैँ धर्म हूँ। माँ लक्ष्मी और यश के जाने के बाद मैं भी इस दरिद्रता में तुम्हारा साथ नहीं दे सकता, मैं जा रहा हूँ।”*

*”जैसी आपकी इच्छा।,* सेठ ने उत्तर दिया। और धर्म भी वहाँ से चला गया।

कुछ और समय बीत जाने पर माँ लक्ष्मी *सत्य* के रूप में स्वप्न में प्रकट हुईं और बोलीं, *”मैँ सत्य हूँ। लक्ष्मी , यश, और धर्म के जाने के बाद अब मैं भी यहाँ से जाना चाहता हूँ!“*

ऐसा सुन सेठ जी ने तुरंत सत्य के पाँव पकड़ लिए और बोले, *हे महाराज, मैँ आपको नहीँ जानेँ दूँगा। भले ही सब मेरा साथ छोड़ दें, मुझे त्याग दें पर कृपया आप ऐसा मत करिये, सत्य के बिना मैँ एक क्षण नहीँ रह सकता, यदि आप चले जायेंगे तो मैं तत्काल ही अपने प्राण त्याग दूंगा।“*

*”लेकिन तुमने बाकी तीनो को बड़ी आसानी से जाने दिया, उन्हें क्यों नहीं रोका?”* सत्य ने प्रश्न किया।

सेठ जी बोले, *”मेरे लिए वे तीनो भी बहुत महत्त्व रखते हैं लेकिन उन तीनो के बिना भी मैं भगवान् के नाम का जाप करते-करते उद्देश्यपूर्ण जीवन जी सकता हूँ, परन्तु यदि आप चले गए तो मेरे जीवन में झूठ प्रवेश कर जाएगा और मेरी वाणी अशुद्ध हो जायेगी, भला ऐसी वाणी से मैं अपने भगवान् की वंदना कैसे कर सकूंगा, मैं तो किसी भी कीमत पर आपके बिना नहीं रह सकता!*

सेठ जी का उत्तर सुन सत्य प्रसन्न हो गया और उसने कहा, *“तुम्हारी अटूट भक्ति नेँ मुझे यहाँ रूकने पर विवश कर दिया और अब मैँ यहाँ से कभी नहीं जाऊँगा।”* और ऐसा कहते हुए सत्य अंतर्ध्यान हो गया।

सेठ जी अभी भी निद्रा में थे। थोड़ी देर बाद स्वप्न में *धर्म* वापस आया और बोला, *“मैं अब तुम्हारे पास ही रहूँगा क्योंकि यहाँ सत्य का निवास है!”* सेठ जी ने प्रसन्नतापूर्वक धर्म का स्वागत किया।

उसके तुरंत बाद *यश* भी लौट आया और बोला, “जहाँ सत्य और धर्म हैं वहाँ यश स्वतः ही आ जाता है, इसलिए अब मैं भी तुम्हारे साथ ही रहूँगा।* सेठ जी ने यश की भी आवाभगत की।

और अंत में *माँ लक्ष्मी* आयीं। उन्हें देखते ही सेठ जी नतमस्तक होकर बोले, *“हे देवी! क्या आप भी पुनः मुझ पर कृपा करेंगी?”*

*“अवश्य, जहां सत्य, धर्म और यश हों वहाँ मेरा वास निश्चित है।,”* माँ लक्ष्मी ने उत्तर दिया।

यह सुनते ही सेठ जी की नींद खुल गयी। उन्हें यह सब स्वप्न लगा पर वास्तविकता में वह एक कड़ी परीक्षा से उत्तीर्ण हो कर निकले थे।

हमें भी हमेशा याद रखना चाहिए कि *जहाँ सत्य का निवास होता है वहाँ यश, धर्म और लक्ष्मी का निवास स्वतः ही हो जाता है। सत्य है तो सिध्दि, प्रसिध्दि और समृद्धि है।*

समय के सदगुरु भी यही बतलाते हैं कि – *अगर सत्य साथ है और सत्य का साथ है तो फिर निर्भय होकर इस जीवन को जियो!!*
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*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

जीवनदाता और मृत्यु

जीवनदाता और मृत्यु

जंगल में एक पेड़ पर दो बाज प्रेमपूर्वक रहते थे। दोनों शिकार की तलाश में निकलते और जो भी हाथ लगता शाम को उसे मिल बांटकर खाते। लंबे काल-खंड से यही क्रम चल रहा था।

एक दिन दोनों शिकार कर के लौटे तो *एक की चोंच में चूहा और दुसरे की चोंच में सांप था।*
दोनों ही शिकार तब तक जीवित थे। पेड़ पर बैठकर बाजों ने जब उनकी पकड़ ढीली की *सांप ने चूहे को देखा* और *चूहे ने सांप को।* सांप चूहे का स्वादिष्ट भोजन पाने के लिए जीभ लपलपाने लगा और चूहा सांप के प्रयत्नों को देख कर अपने शिकारी बाज के पंखों में अपने बचने का उपक्रम करने लगा।

उन दोनों के क्रियाकलाप को देखकर एक बाज गम्भीर हो गया और विचारों में खो गया। दूसरे बाज ने पहले वाले बाज से पूछा- *दोस्त, दार्शनिकों की तरह किस चिंतन में खो गए?* पहले बाज ने अपने पकड़े हुए सांप की और संकेत करते हुए कहा, *देखते नहीं यह कैसा मूर्ख प्राणी है? जीभ की लिप्सा के आगे इसे अपनी मौत भी एक प्रकार से विस्मरण हो रही है।*

दूसरे बाज ने अपनी चोंच में फंसे चूहे की आलोचना करते हुए कहा- *और इस नासमझ को भी देखो – भय इसे प्रत्यक्ष मौत से भी डरावना
लग रहा है।*

पेड़ की नीचे एक सन्त सुस्ता रहे थे। उन्होंने दोनों बाजों की बातें सुनी और एक लंबी सांस छोड़ते हुए बोले – *हम मानव भी तो सांप और चूहे की तरह स्वाद व भय को बड़ा समझते हैं! मृत्यु को तो हम लोगों ने भी विस्मृत कर रखा है, जबकि मृत्यु तो अटल सत्य है।*

अतः मानव को अपने स्वयं के भले के लिए दो चीजों को कभी विस्मृत नहीं करना है।
पहले भगवान, *जीवन दाता* – जिन्होंने कृपा करके मानव तन उपहार स्वरूप दिया और दूसरा *स्वयं की मौत।*

इस प्रकार जीवन-मृत्यु के बीच के अन्तराल में *अपने आप को जानना* है और *स्वयं का आनन्द लेना है!*
इसी में *जीवन की सार्थकता है!*

*आपका आज का दिन आनन्दमय हो!*

*ओम शांति*
💐💐सु प्र भा त💐💐

जीवन का आनंद

*💐💐जीवन का आनंद💐💐*

बहुत समय पहले की बात है जब सिकंदर अपने शक्ति के बल पर दुनिया भर में राज करने लगा था! वह अपनी शक्ति पर इतना गुमान करने लगा था कि *अब वह अमर होना चाहता था!*
उसने पता लगाया कि *कहीं ऐसा जल है जिसे पीने से व्यक्ति अमर हो सकता है!*

देश-दुनिया में भटकने के बाद आखिरकार सिकंदर ने उस जगह को खोज लिया जहां पर उसे अमृत प्राप्त हो सकता था! वह एक पुरानी गुफा थी जहां पर कोई आता जाता नहीं था।

देखने में वह बहुत डरावनी लग रही थी लेकिन सिकंदर ने एक जोर से सांस ली और गुफा में प्रवेश कर गया वहां पर उसने देखा कि *गुफा के अंदर एक अमृत का झरना बह रहा है!*

उसने जल पीने के लिए हाथ ही बढ़ाया था कि *एक कौवे की आवाज आई! वह कौवा गुफा के अंदर ही बैठा था! कौवा जोर से बोला, *ठहर, रुक जा यह भूल मत करन!*

सिकंदर ने कौवे की तरफ देखा। *वह कौवा बड़ी ही दयनीय अवस्था में था! पंख झड़ गए थे, पंजे गिर गए थे! वह अंधा भी हो गया था! बस कंकाल मात्र ही शेष रह गया था!*

सिकंदर ने कहा, *तू कौन होता है मुझे रोकने वाला? मैं पूरी दुनिया को जीत सकता हूं तो यह अमृत पीने से मुझे तो कैसे रोकता है?*

तब कौवे ने आंखों से आंसू टपकाते हुए बोला कि *मैं भी एक बार अमृत की तलाश में ही इस गुफा में आया था!और मैंने जल्दबाजी में अमृत पी लिया और अब मैं कभी मर नहीं सकता! पर अब मैं मरना चाहता हूं लेकिन मर नहीं सकता।देख लो मेरी हालत।*

कौवे की बात सुनकर सिकंदर देर तक सोचता रहा! *सोचने के बाद फिर बिना अमृत पीए ही चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया।*

सिकंदर समझ चुका था कि *जीवन का आनंद उस समय तक ही रहता है जब तक हम उस आनंद को भोगने की स्थिति में होते हैं!*

*मित्रों, जीवन में हमें हमेशा खुश रहना चाहिए हमें कभी भी खुश रहने के लिए बड़ी सफलता या समय का इंतजार नहीं करना चाहिए! क्योंकि समय के साथ हम बूढ़े होते जाते हैं और फिर अपने जीवन का असली आनंद नहीं उठा पाते है।*

इसलिय महापुरुषों का कहना है कि – *आज* में ही *अब* है और *अब* में ही *सब* है! इस *अब* में रहकर ही हम *अपने आप को जान* सकते हैं!
इसलिय, *आज* में, *अब* में जीने की कोशश कीजिय अन्यथा उस *अमरता का वरदान* पाया कौवा भी *मरने को लालायित है!*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है।*

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सृष्टि का कठोरतम दण्ड!

सृष्टि का कठोरतम दण्ड!

एक दिन संध्या के समय सरयू के तट पर तीनों भाइयों संग टहलते श्रीराम से महात्मा भरत ने कहा, “एक बात पूछूं भईया? माता कैकई ने आपको वनवास दिलाने के लिए मंथरा के साथ मिल कर जो षड्यंत्र किया था, क्या वह राजद्रोह नहीं था?

उनके षड्यंत्र के कारण एक ओर राज्य के भावी महाराज और महारानी को चौदह वर्ष का वनवास झेलना पड़ा तो दूसरी ओर पिता महाराज की दुखद मृत्यु हुई।

ऐसे षड्यंत्र के लिए सामान्य नियमों के अनुसार तो मृत्युदंड दिया जाता है, फिर आपने माता कैकई को दण्ड क्यों नहीं दिया?

राम मुस्कुराए… और बोले –

“जानते हो भरत, किसी कुल में एक चरित्रवान और धर्मपरायण पुत्र जन्म ले ले तो उसका जीवन उसके असँख्य पीढ़ी के पितरों के अपराधों का प्रायश्चित कर देता है। जिस माँ ने तुम जैसे महात्मा को जन्म दिया हो उसे दण्ड कैसे दिया जा सकता है भरत?”

भरत संतुष्ट नहीं हुए। कहने लगे “यह तो मोह है भइया, और राजा का दण्डविधान मोह से मुक्त होता है।

एक राजा की तरह उत्तर दीजिये कि आपने माता को दंड क्यों नहीं दिया, समझिए कि आपसे यह प्रश्न आपका अनुज नहीं, अयोध्या का एक सामान्य नागरिक कर रहा है।

राम गम्भीर हो गए। कुछ क्षण के मौन के बाद कहा, अपने सगे-सम्बन्धियों के किसी अपराध पर कोई दण्ड न देना ही इस सृष्टि का कठोरतम दण्ड है भरत!

माता कैकई ने अपनी एक भूल का बड़ा कठोर दण्ड भोगा है। वनवास के चौदह वर्षों में हम चारों भाई अपने अपने स्थान से परिस्थितियों से लड़ते रहे हैं, पर माता कैकई हर क्षण मरती रही हैं।

अपनी एक भूल के कारण उन्होंने अपना पति खोया, अपने चार बेटे खोए, अपना समस्त सुख खोया, फिर भी वे उस अपराधबोध से कभी मुक्त न हो सकीं। वनवास समाप्त हो गया तो परिवार के शेष सदस्य प्रसन्न और सुखी हो गए, पर वे कभी प्रसन्न न हो सकीं। कोई राजा किसी स्त्री को इससे कठोर दंड क्या दे सकता है?

मैं तो सदैव यह सोच कर दुखी हो जाता हूँ कि मेरे कारण अनायास ही मेरी माँ को इतना कठोर दण्ड भोगना पड़ा।

राम के नेत्रों में अश्रु जल उतर आया था और भरत आदि भाई मौन हो गए थे।

राम ने फिर कहा, “और उनकी भूल को अपराध समझना ही क्यों भरत! यदि मेरा वनवास न हुआ होता तो संसार भरत और लक्ष्मण जैसे भाइयों के अतुल्य भ्रातृप्रेम को कैसे देख पाता। मैंने तो केवल अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन मात्र किया था, पर तुम दोनों ने तो मेरे स्नेह में चौदह वर्ष का वनवास भोगा। वनवास न होता तो यह संसार सीखता कैसे कि भाइयों का सम्बन्ध होता कैसा है।”

भरत के प्रश्न मौन हो गए थे। वे अनायास ही बड़े भाई से लिपट गए!

मर्यादा पुरुषोत्तम का यह सदेश आज भी मानव जीवन के लिय, पारिवारिक कलह से मुक्त होने के लिय रामबाण ही है! बशर्ते भारत की भावना के अनुसार इसके महत्व को महसूस जाय!
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