काह भरोसा देह का, बिनस जात छान माही।

*काह भरोसा देह का, बिनस जात छान माही।*
*सांस सांस सुमरिन करो, और यतन कुछ नाही।।*

एक डॉक्टर बहुत ही होशियार थे ।

उनके बारे में यह कहा जाता था कि *वह मौत के मुंह में से भी बीमार को वापस ले आते थे।*

डॉक्टर के पास जो भी मरीज आता वह उससे एक फॉर्म भरवाते थे।

मरीज से यह पूछते कि आप इस फोरम में लिखें कि *यदि आप बच गए तो किस तरह से बाकी जिंदगी जियेगें और आपके जीवन में क्या करना शेष रह गया है – जो आप करना चाहेंगें।*

*सभी मरीज अपने मन की बात लिखने लगे।*

अगर मैं बच गया तो *अपने परिवार के साथ अपना समय बिताउंगा।*

*मैं अपने पुत्र और पुत्री की संतानों के साथ जी भर कर खेलूंगा।*

*किसी ने जी भर कर पर्यटन, घूमने का शौक पूरा करने का लिखा।*

किसी ने तो यह भी लिखा कि *मेरे द्वारा जिंदगी में यदि किसी से ठेस पहुंची है तो मैं उनसे माफी मागूंगा।*

किसी ने लिखा कि *मैं अपनी जिंदगी में मुस्कुराना बढ़ा दूंगा।जिंदगी में किसी से भी शिकायत नहीं करूंगा और ना किसी को शिकायत का मौका दूंगा। किसी को भी मन दुख ना ऐसा काम करूंगा।*

बहुत से लोगों ने तरह-तरह की बातें लिखी।

डॉक्टर आपरेशन करने के बाद जब मरीज को छुट्टी देते तब वह लिखा हुआ फार्म उन्हे वापस कर देते थे।

मरीज से कहते कि *आपने जो फॉर्म में लिखा है वह आप अपनी जिंदगी में कितना पूरा कर पा रहे हैं उस पर निशान लगाते जाए्।* वापस आए और मुझे बताएं कि *आपने इसमें से किस तरह की जिंदगी जी है।*

डॉक्टर ने कहा कि एक भी व्यक्ति ने ऐसा नहीं लिखा कि –
*अगर मैं बच गया तो मुझे किसी से बदला लेना है।*
*अपने दुश्मन को खत्म कर दूंगा!*
*मुझे बहुत धन कमाना है।*
*अपने आपको बहुत व्यस्त रखना है।*

*प्रत्येक का जीवन जीने का नजरिया अपना-अपना था।*

डॉक्टर ने प्रश्न किया कि *जब आप स्वस्थ थे तब आपने इस तरह का जीवन क्यों नहीं जिया? आप को कौन रोक रहा था? अभी कौन सी देरी हो गई है?*

हम भी कुछ क्षण अपने जीवन के बारे में चिंतन मनन करें। हमें अपनी जिंदगी में किस तरह का जीवन जीना शेष रह गया है जो हम जीवन जीना चाहते थे?

*बस उस तरह का जीवन जीना प्रारम्भ करें।*

जीवन का आनंद तभी ही है कि *जब लगे जीवन यात्रा पूर्ण हो तब कोई कामना नहीं रहे!
कोई अफ़सोस ना रहे। मन में यह ना रहे कि *मैं जैसा जीवन जीना चाहता था वैसा जीवन नहीं जी सका!*

और वह तभी सम्भव है जब हम *अपने आप को जानना शुरू कर देंगे! अन्तर्मुखी होना प्रारंभ करेंगे!*

सम्यक द्रष्टि- तेरे साथ कुछ नही जायेगा

सम्यक द्रष्टि- तेरे साथ कुछ नही जायेगा

एक बहुत प्रभावशाली, बुद्धि और वैभव से संपन्न राजा था! आस-पास के राजा भी समय-समय पर उससे परामर्श लिया करते थे! एक दिन राजा अपनी शैया पर लेेटे-लेटे सोचने लगा, मैं कितना भाग्यशाली हूं! कितना विशाल है मेरा परिवार! कितना समृद्ध है मेरा अंत:पुर! कितनी मजबूत है मेरी सेना! कितना बड़ा है मेरा राजकोष! ओह! मेरे खजाने के सामने कुबेर के खजाने की क्या बिसात! मेरे राजनिवास की शोभा को देखकर अप्सराएं भी ईर्ष्या करती होंगी! मेरा हर वचन आदेश होता है! राजा कवि हृदय था और संस्कृृत का विद्वान था!

उन्होंने अपने इन्हीं भावों को शब्दों में पिरोना शुरू किया! तीन चरण बन गए, लेकिन चौथी लाइन पूरी नहीं हो रही थी! जब तक पूरा श्लोक नहीं बन जाता, तब तक कोई भी रचनाकार उसे बार-बार दोहराता है! राजा भी अपनी वे तीन लाइनें बार-बार गुनगुना रहा था!

चेतोहरा: युवतय: स्वजनाऽनुकूला:,
सद्बान्धवा: प्रणयगर्भगिरश्च भृत्या:
गर्जन्ति दन्तिनिवहास्विरलास्तुरंगा:
यानी मेरी चित्ताकर्षक रानियां हैं, अनुकूल स्वजन वर्ग है, श्रेष्ठ कुटुंबी जन हैं! कर्मकार विनम्र और आज्ञापालक हैं! हाथी, घोड़ों के रूप में विशाल सेना है!

लेकिन बार-बार गुनगुनाने पर भी चौथा-चरण बन नहीं रहा था!
संयोग की बात है कि उसी रात एक चोर राजमहल में चोरी करने के लिए आया था! मौका पाकर वह राजा के शयनकक्ष में घुस गया और पलंग के नीचे दुबक कर कर बैठ गया!

चोर भी संस्कृत भाषा का विज्ञ और आशु कवि था! समस्यापूर्ति का उसे अभ्यास था! राजा द्वारा गुनगुनाए जाते श्लोक के तीन चरण चोर ने सुन लिए थे! राजा के दिमाग में चौथी लाइन नहीं बन रही है! यह भी वह जान गया लेकिन तीन लाइनें सुन कर उस चोर का कवि मन भी उसे पूरा करने के लिए मचलने लगा।

भावातिरेक में वह भूल गया कि वह चोर है और राजा के कक्ष में चोरी करने घुसा है!

अगली बार राजा ने जैसे ही वे तीन लाइनें पूरी कीं! चोर के मुंह से चौथी लाइन निकल पड़ी!
और वह इस प्रकार थी –
👇
सम्मीलने नयनयोर्नहि किंचिदस्ति॥
यानी राज्य, वैभव आदि सब तभी तक है, जब तक आँखें खुली हैं। आंख बंद होने के बाद कुछ नहीं है। अत : किस पर गर्व कर रहे हो?

चोर की इस एक पंक्ति ने सचमुच में राजा की आंखें खोल दीं और उसे सम्यक् दृष्टि मिल गई!

वह चारों ओर विस्फारित नेत्रों से देखने लगा कि ऐसी ज्ञान की बात किसने कही? कैसे कही?

उसने आवाज दी कि पलंग के नीचे जो भी है, वह मेरे सामने उपस्थित हो!

चोर सामने आ कर खड़ा हुआ फिर हाथ जोड़ कर राजा से बोला – हे राजन ! मैं आया तो चोरी करने था! पर आप के द्वारा पढ़ा जा रहा श्लोक सुनकर यह भूल गया कि मैं चोर हूं। मेरा काव्य प्रेम उमड़ पड़ा और मैं चौथे चरण की पूर्ति करने का दुस्साहस कर बैठा! हे राजन ! मैं अपराधी हूं। मुझे क्षमा कर दें।
राजा ने कहा, तुम अपने जीवन में चाहे जो कुछ भी करते हो, उससे मुझे कोई सरोकार नहीं है! इस क्षण तो आप मेरे गुरु हो क्योंकि आपने मुझे जीवन के यथार्थ का परिचय कराया है!
आंख बंद होने के बाद कुछ भी नहीं रहता – यह कह कर तुमने मेरा सत्य से साक्षात्कार करवा दिया!*
इसलिय गुरु होने के कारण तुम मुझसे जो चाहो मांग सकते हो!

चोर की समझ में कुछ नहीं आया लेकिन राजा ने आगे कहा -आज मेरे ज्ञान की आंखें खुल गईं। इसलिए शुभस्य शीघ्रम् – इस सूक्त को आत्मसात करते हुए मैं शीघ्र ही संन्यास लेना चाहता हूं! राज्य अब तृण के समान प्रतीत हो रहा है! तुम यदि मेरा राज्य चाहो तो मैं उसे भी सहर्ष देने के लिए तैयार हूं!

चोर बोला, राजन! आपको जैसे इस वाक्य से बोध पाठ मिला है, वैसे ही मेरा मन भी बदल गया है। मैं भी संन्यास स्वीकार करना चाहता हूं।

राजा और चोर दोनों संन्यासी बन गए।

एक ही पंक्ति ने दोनों को स्पंदित कर दिया। यह है सम्यक द्रष्टि का परिणाम।

जब तक राजा की दृष्टि सम्यक् नहीं थी, वह धन – वैभव, भोग-विलास को ही सब कुछ समझ रहा था!* ज्यों ही उनके आंखों से मायावी रंगीन चश्मा उतरा – दृष्टि सम्यक् बनी कि पदार्थ पदार्थ हो गया और आत्मा-आत्मा!! यानी नाशी और अविनाशी का साक्ष्यातकार हो गया!

इसलिय हमारा सम्बन्ध उस शाश्वत शक्ति से होना चाहिय जो था, है और हमेशा रहेगा! यही समय के महापुरुष हमें बार-बार समझाते हैं!

फकीर का भरोसा

फकीर का भरोसा
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एक फकीर के घर रात चोर घुसे। घर में कुछ भी न था। सिर्फ एक कंबल था, जो फकीर ओढ़े लेटा हुआ था। सर्द रात, पूर्णिमा की रात। फकीर रोने लगा क्योंकि घर में चोर आएं और चुराने को कुछ नहीं है, इस पीड़ा से रोने लगा।

उसकी सिसकियां सुन कर चोरों ने पूछा कि भई क्यों रोते हो?
फकीर से न रहा गया! उस फकीर ने कहा कि आप चोरी करने आए थे— कभी तो आए! जीवन में पहली दफा तो आए! यह सौभाग्य तुमने दिया! मुझ फकीर को भी यह मौका दिया! लोग फकीरों के यहां चोरी करने नहीं जाते, सम्राटों के यहां जाते हैं! तुम चोरी करने क्या आए, तुमने तो मुझे सम्राट बना दिया!

क्षण भर को मुझे भी लगा कि अपने घर भी क्या चोर आ सकते हैं? ऐसा सौभाग्य! इसलिय मेरी आंखें आंसुओ से भर गई हैं! मैंने अपने को बहुत रोका कि कहीं तुम्हारे काम में बाधा न पड़े, लेकिन न रुक पाया, सिसकियां निकल गईं, क्योंकि घर में कुछ है नहीं है! तुम अगर जरा दो दिन पहले खबर कर देते तो मैं इंतजाम कर रखता। दुबारा जब आओ तो सूचना तो दे देना। मैं गरीब फकीर हूं। दो—चार दिन का समय होता तो कुछ न कुछ मांग—मूग कर इकट्ठा कर लेता।अभी तो यह कंबल भर है मेरे पास, यह तुम ले जाओ। और देखो इनकार मत करना। इनकार करोगे तो मेरे हृदय को बड़ी चोट पहुंचेगी।

चोर तो घबड़ा गए! उनकी कुछ समझ में ही नहीं आया। ऐसा आदमी उन्हें कभी मिला न था। चोरी तो जिंदगी भर से की थी, मगर आदमी से पहली बार मिलना हुआ था। मन ही मन बुदबुदाने लगे कि *दुनिया में भीड़— भाड़ तो बहुत है, आदमी कहां! शक्लें हैं आदमी की, आदमी कहां हैं?

पहली बार चोरों की आंखों में शर्म आई, हया उठी और पहली बार किसी के सामने नतमस्तक हुए, फ़क़ीर के आग्रह को मना नहीं कर सके! सोचने लगे कि मना करके इसे क्या दुख देना, कंबल तो ले लिया। पर लेना भी मुश्किल हो रहा था! इस पर कुछ और तो है नहीं!

कंबल छूटा तो पता चला कि फकीर नंगा है। कंबल ही ओढ़े हुए था, वही एकमात्र वस्त्र था— वही ओढ़नी, वही बिछौना।

लेकिन फकीर ने कहा. तुम मेरी फिकर मत करो, मुझे नंगे रहने की आदत है और तुम तो तीन मील चल कर गांव से आए, सर्द रात, कौन घर से निकलता है। कुत्ते भी दुबके पड़े हैं। तुम चुपचाप इस एक मात्र कम्बल को ले जाओ और दुबारा जब आओ मुझे खबर कर देना।

चोर तो ऐसे घबड़ा गए कि एकदम निकल कर बाहर हो गए। जब बाहर हो रहे थे! तभी फकीर चिल्लाया कि सुनो, कम से कम दरवाजा बंद करो और मुझे धन्यवाद दो!

चोर सोचने लगे कि यह फकीर भी अजीब है! उन्होंने उसे धन्यवाद दिया, दरवाजा बंद किया और भागे।

फिर फकीर खिड़की पर खड़े होकर दूर जाते उन चोरों को देखता रहा और उसने एक गीत लिखा—

जिस गीत का अर्थ है कि
मैं बहुत गरीब हूं मेरा वश चलता तो आज पूर्णिमा का चांद भी आकाश से उतार कर उनको भेंट कर देता!
कौन कब किसके द्वार आता है आधी रात!
यह नास्तिक है। इसे ईश्वर में भरोसा नहीं है, लेकिन इसे प्रत्येक व्यक्ति के ईश्वरत्व में भरोसा है।
कोई व्यक्ति नहीं है ईश्वर जैसा, लेकिन सभी व्यक्तियों के भीतर जो धड़क रहा है, जो प्राणों का मंदिर बनाए हुए विराजमान है,
जो श्वासें ले रहा है, उस फैले हुए ईश्वरत्व के सागर में इसकी आस्था है।

कुछ समय बाद चोर पकड़े गए। अदालत में मुकदमा चला, वह कंबल भी पकड़ा गयाऔर वह कंबल तो जाना—माना कंबल था। वह उस प्रसिद्ध फकीर का जो कंबल था।

मजिस्ट्रेट भी तत्क्षण पहचान गया कि यह उस फकीर का कंबल है!
उसने चोरों से कहा कि तो तुम उस गरीब फकीर के यहां से भी चोरी किए हो!
फकीर को भी बुलाया गया और मजिस्ट्रेट ने कहा कि अगर फकीर ने कह दिया कि यह कंबल मेरा है और तुमने चुराया है तो फिर हमें और किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। उस फ़क़ीर का एक वक्तव्य, हजार आदमियों के वक्तव्यों से बड़ा हैफिर जितनी सख्त सजा मैं तुम्हें दे सकता हूं दूंगा। फिर बाकी तुम्हारी चोरियां सिद्ध हों या न हों, मुझे फिकर नहीं है। उस एक आदमी ने अगर कह दिया…।

चोर तो घबड़ा रहे थे, कंप रहे थे, पसीना—पसीना हुए जा रहे थे…

फकीर अदालत में आया और फकीर ने आकर मजिस्ट्रेट से कहा कि नहीं, ये लोग चोर नहीं हैं, ये बड़े भले लोग हैं। मैंने कंबल भेंट किया था और इन्होंने मुझे धन्यवाद दिया था। और जब धन्यवाद दे दिया, बात खत्म हो गई। मैंने कंबल दिया, इन्होंने धन्यवाद दिया। इतना ही नहीं, ये इतने भले लोग हैं कि जब बाहर निकले तो दरवाजा भी बंद कर गए थे। यह आस्तिकता है।
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मजिस्ट्रेट ने तो चोरों को छोड़ दिया, क्योंकि फकीर ने कहा. इन्हें मत सताओ, ये प्यारे लोग हैं, अच्छे लोग हैं, भले लोग हैं।
फकीर के पैरों पर गिर पड़े चोर और उन्होंने कहा हमें दीक्षित करो। वे संन्यस्त हुए। और फकीर बाद में खूब हंसा।

और उसने कहा कि तुम संन्यास में प्रवेश कर सको इसलिए तो कंबल भेंट दिया था। इसे तुम पचा थोड़े ही सकते थे। इस कंबल में मेरी सारी प्रार्थनाएं बुनी थीं। इस कंबल में मेरे सारे सिब्दों की कथा थी। यह साधारण कंबल नहीं था।

जैसे कबीर कहते हैं-
झीनी—झीनी बीनी रे चदरिया!
ऐसे उस फकीर ने कहा *प्रार्थनाओं से बुना था इसे! इसी को ओढ़कर ध्यान किया था। इसमें मेरी समाधि का रंग था, गंध थी।
तुम इससे बच नहीं सकते थे। यह मुझे पक्का भरोसा था, कंबल ले आएगा तुमको भी। और तुम आखिर आ गए।*

उस दिन रात में आए थे, आज दिन में आए। उस दिन चोर की तरह आए थे, आज शिष्य की तरह आए हो। मुझे भरोसा था कि तुम एक ना एक दिन सन्मार्ग का अनुसरण करोगे!
यह सही कहावत है कि कीट न जाने भृंग को, गुरु कर ले आप समान!
संतों की संगति मात्र से ही मानव विकार रहित होने लगते हैं!

लालची गड़रिया

💐💐*लालची गड़रिया* 💐💐

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किसी गांव में एक गड़रिया रहता था। वह लालची स्वभाव का था, हमेशा यही सोचा करता था कि किस प्रकार वह गांव में सबसे अमीर हो जाये। उसके पास कुछ बकरियां और उनके बच्चे थे। जो उसकी जीविका के साधन थे।

एक बार वह गांव से दूर जंगल के पास पहाड़ी पर अपनी बकरियों को चराने ले गया। अच्छी घास ढूँढने के चक्कर में आज वो एक नए रास्ते पर निकल पड़ा। अभी वह कुछ ही दूर आगे बढ़ा था कि तभी अचानक तेज बारिश होने लगी और तूफानी हवाएं चलने लगीं। तूफान से बचने के लिए गड़रिया कोई सुरक्षित स्थान ढूँढने लगा। उसे कुछ ऊँचाई पर एक गुफा दिखाई दी। गड़रिया बकरियों को वहीँ बाँध उस जगह का जायजा लेने पहुंचा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं। वहां बहुत सारी जंगली भेड़ें मौजूद थीं।

मोटी- तगड़ी भेड़ों को देखकर गड़रिये को लालच आ गया। उसने सोचा कि अगर ये भेड़ें मेरी हो जाएं तो मैं गांव में सबसे अमीर हो जाऊंगा। इतनी अच्छी और इतनी ज्यादा भेड़ें तो आस-पास के कई गाँवों में किसी के पास नहीं हैं।

उसने मन ही मन सोचा कि मौका अच्छा हैं मैं कुछ ही देर में इन्हें बहला-फुसलाकर अपना बना लूंगा। फिर इन्हें साथ लेकर गांव चला जाऊंगा।

यही सोचते हुए वह वापस नीचे उतरा। बारिश में भीगती अपनी दुबली-पतली कमजोर बकरियों को देखकर उसने सोचा कि अब जब मेरे पास इतनी सारी हट्टी-कट्टी भेडें हैं तो मुझे इन बकरियों की क्या ज़रुरत उसने फ़ौरन बकरियों को खोल दिया और बारिश में भीगने की परवाह किये बगैर कुछ रस्सियों की मदद से घास का एक बड़ा गट्ठर तैयार कर लिया!

गट्ठर लेकर वह एक बार फिर गुफा में पहुंचा और काफी देर तक उन भेड़ों को अपने हाथ से हरी-हरी घास खिलाता रहा। जब तूफान थम गया, तो वह बाहर निकला। उसने देखा कि उसकी सारी बकरियां उस स्थान से कहीं और जा चुकी थीं।

गड़ेरिये को इन बकरियों के जाने का कोई अफ़सोस नहीं था, बल्कि वह खुश था कि आज उसे मुफ्त में एक साथ इतनी अच्छी भेडें मिल गयी हैं। यही सोचते-सोचते वह वापस गुफा की ओर मुड़ा लेकिन ये क्या… बारिश थमते ही भेडें वहां से निकल कर दूसरी तरफ जान लगीं। वह तेजी से दौड़कर उनके पास पहुंचा और उन्हें अपने साथ ले जाने की कोशिश करने लगा। पर भेडें बहुत थीं, वह अकेला उन्हें नियंत्रित नहीं कर सकता था… कुछ ही देर में सारी भेडें उसकी आँखों से ओझल हो गयीं।

मन ही मन बडबडा रहा था कि तुम्हारे लिए मैंने अपनी बकरियों को बारिश में बाहर छोड़ दिया। इतनी मेहनत से घास काट कर खिलाई… और तुम सब मुझे छोड़ कर चली गयी… सचमुच कितनी स्वार्थी हो तुम सब।

गड़रिया बदहवास होकर वहीं बैठ गया। गुस्सा शांत होने पर उसे समझ आ गया कि दरअसल स्वार्थी वो भेडें नहीं बल्कि वो खुद हैं, जिसने भेड़ों की लालच में आकर अपनी बकरियां भी खो दीं।

शिक्षा:-
आज हम इंसान भी यही कर रहे हैं । जिससे हमें कुछ लाभ मिल सकता हैं उसी से हम आत्मीय संबंध रखते हैं!
जो व्यक्ति स्वार्थ और लोभ में फंसकर अपनों का साथ छोड़ता हैं, उसका कोई अपना नहीं बनता और अंत में उसे पछताना ही पड़ता हैं!

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सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।

मुठ्ठी खोलो बंधन मुक्त हो जाओ

*मुठ्ठी खोलो बंधन मुक्त हो जाओ*
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एक बार एक संत अपनी कुटिया में शांत बैठे थे! तभी उन्हें कुछ शोर सुनाई दिया जा कर देखा तो एक बंदर ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था!*

*उसका एक हाथ एक घड़े के अंदर था और वह बंदर अपना हाथ छुड़ाने के लिए चिल्ला रहा था!*

संत को देख वह बंदर संत से आग्रह करने लगा – *महाराज कृपया कर के मुझे इस बंधन से मुक्त करवाए!*

संत ने बंदर को कहा – *जब तुमने घड़े के अंदर हाथ डाला तो वह आसानी से उसमे चला गया! परन्तु अब इसलिए बाहर नहीं निकल रहा है कयोंकि तुमने अपने हाथ में लड्डू पकड़ा हुआ है जो कि उस घड़े के अंदर है, अगर तुम वह लड्डू हाथ से छोड़ दो तो तुम आसानी से मुक्त हो सकते हो!**

बंदर ने कहा – *महाराज, लड्डू तो मैं नहीं छोड़ने वाला! अब आप मुझे बिना लड्डू छोड़े ही मुक्त होने की कोई युक्ति सुझाए!*

संत मुस्कुराए और कहा – *लड्डू छोड़ दो अन्यथा तुम कभी भी मुक्त नही हो सकते!*

हज़ार कोशिशों के बाद बंदर को इस बात का एहसास हुआ कि *बिना लड्डू छोड़े मेरा हाथ इस घड़े से बाहर नही निकल सकता और मैं मुक्त नही हो सकता!*

*आख़िरकार बंदर ने वो लड्डू छोड़ा और सहजता से ही उस घड़े से मुक्त हो गया!*

यह कहानी सिर्फ़ उस बंदर की ही नहीं बल्कि *आज के हर उस इंसान की है जो की इस संसार रुपी घड़े में स्वयं को फंसा बैठा है! और सांसारिक वस्तुओं रुपी लड्डू को छोड़ना भी नहीं चाहता और उस घड़े (84 के फेरे से) से मुक्त भी होना चाहता है!*

संत (सदगुरु) ने सभी को समझने के लिय कह तो दिया कि *भूले मन समझ के लाद लदनिया!* अब किसे कब समझ आए और वह कब मुक्त होगा यह उसकी अपनी समझ है।*
✴️✴️✴️✴️✴️
*मंगलमय प्रभात*
*स्नेह वंदन*
*प्रणाम*

सच्चा साधु

*सच्चा साधु*
🌸🌸🌸

एक साधु को एक नाविक रोज इस पार से उस पार ले जाता था, बदले मैं कुछ नहीं लेता था! वैसे भी पहले ज़माने में साधु के पास पैसा कहां होता था!*

नाविक सरल था, पढा-लिखा तो नहीं था पर समझ की कमी नहीं थी। साधु रास्ते में ज्ञान की बात कहते, कभी भगवान की सर्वव्यापकता बताते और कभी अर्थसहित श्रीमदभगवद्गीता के श्लोक सुनाते!

नाविक मछुआरा बङे ध्यान से सुनता और बाबा की बात ह्रदय में बैठा लेता!

एक दिन उस पार उतरने पर साधु नाविक को कुटिया में ले गयेऔर बोले, *वत्स, मैं पहले व्यापारी था! धन तो कमाया था पर उस धन के द्वारा अपने परिवार को आपदा से नहीं बचा पाया था! अब ये धन मेरे किसी का काम का नहीं, तुम ले लो! तुम्हारा जीवन संवर जायेगा! तेरे परिवार का भी भला हो जाएगा।*

नाविक ने विनम्रता पूर्वक कहा कि, *नहीं, बाबाजी, मैं ये धन नहीं ले सकता! मुफ्त का धन घर में जाते ही मेरा आचरण बिगाड़ देगा! कोई मेहनत नहीं करेगा! आलसी जीवन लोभ लालच और पाप बढायेगा!*

*आप ही ने मुझे ईश्वर के बारे में बताया! मुझे तो आजकल लहरों में भी कई बार वो परमात्मा नजर आया!जब मै उसकी नजर में ही हूँ तो फिर उस पर अविश्वास क्यों करूं? मैं अपना काम करूं और शेष उसी पर छोङ दूं। जब उनको मैंने अपना सबकुछ मान ही लिया तो निशचित ही उनको भी मेरा ख्याल होगा ही!*

प्रसंग तो समाप्त हो गया पर एक सवाल छोड़ गया कि *इन दोनों पात्रों में साधु कौन था?*

एक वो था- *जिसको दुःख आया तो उसने भगवा पहना, संन्यास लिया, धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया, भगवान को याद किया और समझाने लायक स्थिति में भी आ गया फिर भी धन की ममता नहीं छोङ पाया! सुपात्र की तलाश करता रहा!*

और दूसरी तरफ, *वो निर्धन नाविक था जिसने सुबह खा लिया, तो शाम का पता नहीं, फिर भी जिसमें पराये धन के प्रति कोई लालसा नहीं, संसार में लिप्त रहकर भी निर्लिप्त रहना आ गया! उसने भगवा नहीं पहना, सन्यास नहीं लिया, पर उस का ईश्वरीय सत्ता में विश्वास जम गया।*

*उसने श्रीमदभगवद्गीता के श्लोक को ना केवल समझा बल्कि उन्हें व्यवहारिक जीवन में कैसे उतारना है ये सीख गया, और पल भर में धन के मोह को ठुकरा गया।*

*वास्तव में वैरागी कौन?*
*विचार कीजिए।*

*शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*

अनोखा पात्र

अनोखा पात्र

एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ लगी थी। किसी फकीर ने सम्राट से भिक्षा मांगी थी। सम्राट ने उससे कहा, “जो भी चाहते हो, मांग लो!

उस राजा के दरवार में दिवस के प्रथम याचक की कोई भी इच्छा पूरी करने का उसका नियम था।

उस फकीर ने अपने छोटे से भिक्षापात्र को आगे बढ़ाया और कहा, “बस इसे स्वर्ण मुद्राओं से भर दें।”

सम्राट ने सोचा इससे सरल बात और क्या हो सकती है! लेकिन जब उस भिक्षा पात्र में स्वर्ण मुद्राएं डाली गई, तो ज्ञात हुआ कि उसे भरना असंभव था!

वह तो जादुई पात्र था। जितनी अधिक मुद्राएं उसमें डाली गई, वह उतना ही अधिक खाली होता गया!

सम्राट को दुखी देख वह फकीर बोला, “न भर सकें तो वैसा कह दे। मैं खाली पात्र को ही लेकर चला जाऊंगा !
ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा कि लोग कहेंगे कि सम्राट अपना वचन पूरा नहीं कर सके!”

सम्राट ने अपना सारा खजाना खाली कर दिया, उसके पास जो कुछ भी था, सभी उस पात्र में डाल दिया गया, लेकिन वह अद्भुत पात्र न भरा, सो न भरा!

तब उस सम्राट ने पूछा, “भिक्षु, तुम्हारा पात्र साधारण नहीं है। उसे भरना मेरी सामर्थ्य से बाहर है।
क्या मैं पूछ सकता हूं कि इस अद्भुत पात्र का रहस्य क्या है?”

वह फकीर हंसने लगा और बोला, “कोई विशेष रहस्य नहीं। यह पात्र मनुष्य के हृदय से बनाया गया है।
क्या आपको ज्ञात नहीं है कि मनुष्य का हृदय इन सांसारिक द्रव्यों से कभी भी भरा नहीं जा सकता!
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धन से, पद से, सांसारिक ज्ञान से – किसी से भी भरो, वह खाली ही रहेगा क्योंकि इन चीजों से भरने के लिए वह बना ही नहीं है। इस सत्य को न जानने के कारण ही मनुष्य जितना पाता है, उतना ही दरिद्र होता जाता है। हृदय की इच्छाएं कुछ भी पाकर शांत नहीं होती है। क्यों?*

क्योंकि, हृदय तो परमात्मा को पाने के लिए बना है!
यदि तुम शांति चाहते हो! संतृप्ति चाहते हो! तो अपने संकल्प को कहने दो कि परमात्मा के अतिरिक्त और मुझे कुछ भी नहीं चाहिए।”
अपने हृदय की असली पुकार को सुनो और उसे परमात्मा के आनन्द से भरो!
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एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे।

एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे।
रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि *प्रभु – एक जिज्ञासा है मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ?*

श्री कृष्ण ने कहा – *अर्जुन, तुम मुझसे बिना किसी हिचक कुछ भी पूछ सकते हो।*

तब अर्जुन ने कहा कि *मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं?*

यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले कि *आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शांत करूंगा।*

🌤श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को सोने का पहाड़ बना दिया।

इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि *हे अर्जुन, इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो।*

अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया।

उसने सभी गाँव वालों को बुलाया। उनसे कहा कि *वह लोग पंक्ति बना लें अब मैं आपको सोना बाटूंगा और सोना बांटना शुरू कर दिया।*

गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी। अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए।लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे।उनमे अब तक अहंकार आ चुका था। गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे। कुछ समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे।

लेकिन यह क्या? *जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी।*

उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि *अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए।*

प्रभु ने कहा कि *ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण बुला लिया।*

उन्होंने कर्ण से कहा कि *इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो।*

कर्ण भी तुरंत सोना बांटने चल दिये। उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा – *यह सोना आप लोगों का है , जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये।* ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए।

यह देख कर अर्जुन ने कहा कि *ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया?*

तब भगवान श्री कृष्ण ने जवाब दिया कि *तुम्हे सोने से मोह हो गया था। तुममें कर्ताभाव आ चूका था! तुम खुद यह निर्णय कर रहे थे कि *किस गाँव वाले की कितनी जरूरत है और उतना ही सोना तुम पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे। तुम में दाता होने का भाव आ गया था! इसलिय तुमको इस सेवा में अत्यधिक थकान भी हुई और इतनी मेहनत करने के बाद आनंद भी नहीं आया!

दूसरी तरफ कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए। वह नहीं चाहते थे कि *उनके सामने कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे। उनके पीठ पीछे भी लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिय ना वह थके और न ही उन्होंने मन की शांति को खोया!* यह उस आदमी की निशानी है जिसे आत्मज्ञान हांसिल हो चुका है।

*श्री कृष्ण ने खूबसूरत तरीके से अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया! अर्जुन को भी अब अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।*
हमको भी इस कलियुग में समय के महापुरुष का सानिध्य और सेवा के अवसर कर्ण-अर्जुन की तरह ही मिलते हैं! अब यह हमारी सोच पर निर्भर करता है कि *हम अर्जुन की तरह *कर्ताभाव* के बोझ तले संतापित रहते हैं या कर्ण की तरह अपने को निमित्त्त मात्र समझकर सेवाओं का आनन्द लेते हैं!*

*सेवा के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना भी उपहार नहीं सौदा कहलाता है।*
यदि हम किसी भी रूप में सहयोग करना चाहते हैं तो *हमें निमित्त्त मात्र भाव के साथ इस आशा के करना चाहिए कि महापुरुष ने मुझे इस सेवा के लिय चुना ताकि इस सेवा की यादें मुझे ताजिन्दगी प्रफुल्लित कर सके, बजाय इसके पहले कि हममें कर्ताभाव का अहंकार आने लगे।*
*हम सभी के लिय नजदीक और दूर से अब आनन्दित होने के अवसर मिलने जा रहे हैं – जिनका हमें भरपूर लाभ लेना है!*
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आत्मा और प्रभु का चिंतन

*आत्मा और प्रभु का चिंतन*
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*एक बार संत कबीर से किसी ने पूछा, आप दिन भर कपड़ा बुनते रहते हैं तो भगवान का स्मरण कब करते हैं ?*

कबीर उस व्यक्ति को लेकर अपनी झोपड़ी से बाहर आ गए। बोले, यहां खड़े रहो। तुम्हारे सवाल का जवाब सीधे न देकर, मैं उसे दिखा सकता हूं।

*कबीर ने दिखाया कि एक औरत पानी की गागर सिर पर रखकर लौट रही थी। उसके चेहरे पर प्रसन्नता और चाल में रफ्तार थी।*

उमंग से भरी हुई वह नाचती हुई-सी चली जा रही थी। गागर को उसने पकड़ नहीं रखा था, फिर भी वह पूरी तरह संभली हुई थी।

*कबीर ने कहा, उस औरत को देखो। वह जरूर कोई गीत गुनगुना रही है। शायद कोई प्रियजन घर आया होगा।*

वह प्यासा होगा, उसके लिए वह पानी लेकर जा रही है। मैं तुमसे जानना चाहता हूं कि उसे गागर की याद होगी या नहीं।

*कबीर की बात सुनकर उस व्यक्ति ने जवाब दिया, उसे गागर की याद नहीं होती तो अब तक तो गागर नीचे ही गिर चुकी होती।*

कबीर बोले, यह साधारण सी औरत सिर पर गागर रखकर रास्ता पार करती है। मजे से गीत गाती है, फिर भी गागर का ख्याल उसके मन में बराबर बना हुआ है।

*और तुम मुझे इससे भी गया गुजरा समझते हो कि मैं कपड़ा बुनता हूं और परमात्मा का स्मरण करने के लिए मुझे अलग से वक्त की जरूरत है।*
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*मेरी आत्मा हमेशा उसी में लगी रहती है। कपड़ा बुनने के काम में शरीर लगा रहता है और आत्मा प्रभु के चरणों में लीन रहती है।*
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आत्मा हर समय प्रभु के चिंतन में डूबी रहती है। इसलिए ये हाथ भी आनंदमय होकर कपड़ा बुनते रहते हैं।
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आम का मोह

आम का मोह

एक बार..गुरू ने अपने शिष्य को समझाते हुए, आम के पेंड की कहानी सुनाई –

एक आम का वृक्ष था। जिसमे ढेर सारे आम पके हुए थे, एक दिन उस पेड का मालिक आया और पेड पर चढ़कर सारे आम तोड़ने लगा।

परन्तु आम का एक फल वृक्ष से दूर होने का मोह छोड़ नहीं पाया और वही कहीं पत्तों की आड़ में छिप गया। उस पेड के मालिक को जब लगा कि उसने सारे आम तोड़ लिया है तब वह नीचे उतर गया और वहां से चला गया, यह सब वह छिपा हुआ आम देख रहा था।

फिर दूसरे दिन जब उस आम ने देखा के उसके साथ के सारे आम तो जा चुके हैं केवल उसी का मोह उसे पेड से अलग होने नहीं दे रहा है। उसे अपने मित्र आमों की याद सताने लगी।

वह बार-बार सोचता कि नीचे कूद जाऊ और अपने दोस्तों से जा मिलूँ परन्तु उसे पेड का मोह अपनी ओर खींचने लगता, आम रोजाना इसी सोच में डूबा रहता।

चिंता का यह कीड़ा उसे लगातार काटे जा रहा था जल्द ही वह सूखने लगा और एक दिन वह गुठली और छिलका के रूप में ही बस रह गया, उसके अंदर का सारा रस समाप्त हो गया था।

अब अपना आकर्षण खो देने के कारण उसके तरफ कोई देखता भी नहीं था वह बहुत पछताने लगा कि संसार की कोई सेवा नहीं कर सका, वह लोगों का काम भी नहीं आ सका, आखिरकार एक दिन तेज हवा का झोंका आया और वह डाली टूटकर नीचे गिर गया!

“आम का मोह” कहानी का तात्पर्य या प्रेरणा, सन्देश यह है कि जरुरत से ज्यादा मोह आपको व्यर्थ बना सकता है!

वो कहते हैं ना कि कहीं पहुंचे के लिए कहीं से निकलना बहुत जरुरी होता है।

ठीक उसी तरह सफल होने के लिए मोह का त्याग करना आवश्यक होता है चाहे वह मोह आपके घर परिवार दोस्त आदि का हो, या चाहे आपके कम्फर्ट जोन का!
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