You go to sleep hugging your wife at night, and hug her all night, and wake up in the morning happy.

रात में पत्नी से लिपट कर सो जाओ, और रात भर आलिंगन करो, सुबह उठो तो पत्नी खुश। और जब पत्नी खुश तो मैं खुश, और जब मैं खुश तो पूरा परिवार खुश।

शादी की उम्र हो रही थी और मेरे लिए लड़कियां देखी जा रही थीं। मैं मन ही मन में काफी खुश था कि चलो कोई तो ऐसा होगा जिसे मैं अपना हमसफर बोलूंगा, जिसके साथ जब मन करे प्यार करूंगा। मेरी अच्छी खासी नौकरी थी, घर में बूढ़ी मां और पापा थे, और इतनी कमाई थी कि अपने पत्नी का खर्चा उठा सकूं। ये सारी बातें सोच-सोचकर खुश होता था। मां की उम्र भी हो गई थी, तो एक प्वाइंट ये भी लोगों को बताता कि मुझे शादी की कोई जल्दी नहीं, ये तो मां हैं जिनकी उम्र निकल रही है, उनके लिए शादी करनी है। मां ने भी लोग मेरी बात मानते, लेकिन मन ही मन में तो मैं भी चाहत थी कि मेरी शादी हो जाए।

मेरी शादी दिव्या से फिक्स हो गई। मैंने दिव्या को बोला कि हम आगे जाकर बहुत अच्छी जिंदगी जीने वाले हैं, क्योंकि मेरे घर में कोई नहीं है। बस तुम्हें मेरे मां-बाप का ध्यान रखना होगा। दिव्या ने तुरंत बोला, “आपके मां-बाप भी मेरे मां-बाप हो जाएंगे शादी के बाद।” दिव्या की अच्छी बातों से मुझे दिन-रात और ज्यादा प्रेम होने लगा था। कभी परिवार संभालने की बातें, कभी शरारत भरी रोमांटिक बातें सुनकर मैं बहुत खुश था।

मानो एक परफेक्ट जिंदगी मुझे मिल गई हो। शादी के बाद हम दोनों घूमने गए, सब कुछ बहुत अच्छा था। ना जाने क्यों इस पल हम दोनों को ऐसा लगता था कि बस हम एक-दूसरे से लिपटे रहें। अब जिनकी शादी हुई होगी, वो समझ पा रहे होंगे कि मैं क्या बोलना चाहता हूं।

घूमने के बाद जब घर आया, तो ज्यादातर समय ऑफिस के लिए ही होता था। छुट्टी में जब कभी मम्मी-पापा बाहर जाते, तो दिव्या मैडम मूड में रहती थी। कब, क्या, कहां, कैसे हो जाता था, पता नहीं चलता था।

मुझे अब लगने लगा था कि एक ऐसी पत्नी मिली है, जो घर की जरूरतों को समझती है, साथ में मेरी शारीरिक जरूरतों का भी ध्यान रखती है। संबंध बनाने के लिए खुद ही पहल करती है, और यदि कभी मैं कर दूं तो माना नहीं करती बल्कि पूरा साथ देती है। अब जिंदगी में इससे अच्छा क्या होगा? फालतू में मेरे दोस्त बोलते थे कि शादी मत करो, लाइफ खराब हो जाती है।

हमारी शादी को 2 महीने हुए थे, दिव्या ने बोला, “अजी, मुझे साड़ी में दिक्कत होती है, क्या मैं घर पर सूट पहन सकती हूं?”

मैंने तुरंत बोला, “हां, क्यों नहीं पहन सकती हो, चलो अभी दिलाता हूं।” हम दोनों बाजार से घर आए, मम्मी ने उसके हाथ में सूट देखा, कुछ बोली नहीं।

अगली सुबह जब वह नहाकर सूट पहनकर निकली, तो मम्मी ने बोला, “तुमने सूट क्यों पहन लिया? हमारे यहां शादी के 6 महीने तक नई बहू को सिर्फ साड़ी पहननी होती है। रोज कोई न कोई देखने आता है, सबके सामने सूट पहनकर जाओगी, अच्छा नहीं लगेगा। और बार-बार दिन भर कपड़ा बदलो, ये भी अच्छा नहीं है।”

इस पर दिव्या ने मां को सॉरी बोला और बोली, “मैंने तो इनसे पूछकर लिया था।”

तभी मां बोलती हैं, “ये कौन होता है ये सब डिसाइड करने वाला? अभी मैं हूं तो मैं करूंगी, जब मैं मर जाऊं तो जैसे मन वैसे रहना।”

इसे सुनने के बाद आज मुझे पहली बार घर में अपनी औकात का पता चला। मासूमियत से दिव्या मेरी तरफ देख रही थी, शायद ये बताना चाहती थी कि मेरी वजह से उसे डांट पड़ गई।

पत्नी प्रेम में लिप्त होकर मैंने मां से बोल दिया, “अरे मम्मी, उसकी गलती नहीं है, मुझसे पूछी थी वो।”

मां ने तुरंत बोला, “2 महीने हुआ नहीं और आगए पत्नी का पक्ष लेने। इस घर में मालिक मैं हूं या तुम हो?”

अब मेरे पास कोई जवाब नहीं था, हम दोनों एक-दूसरे को देखे और अंदर चले गए।

इस बात से दिव्या डर गई थी और अब वह हर काम मां से पूछकर करने लगी। लेकिन मां के लिए ये भी एक आफत था, अब उनका कहना था कि तुम 28 साल की हो, तुम्हें खुद बुद्धि होनी चाहिए कि क्या करना है, क्या नहीं। हर चीज के लिए मेरे पास मत आया करो।

लेकिन अब इस बार दिव्या भी चिढ़ गई, पर मां कुछ बोली नहीं। जब मैं ऑफिस से आया तो अंदर आते ही मां बोलने लगी, “तुम्हारी धर्मपत्नी को बुद्धि नाम की चीज नहीं है।” मैंने मां को समझाया कि जाने दो, सीख जाएगी, थोड़ा समय दो। इस पर मां ने मुझसे मुंह फूला लिया और उदास रोते मन से कहा, “तुम बदल गए हो।” और पीछे से धीरे-धीरे मेरे पिता जी देखते हुए हंस रहे थे, मानो ऐसा जता रहे हों कि कैसे उन्होंने पहले ही भविष्य देखा हुआ था।

इसके बाद कमरे में गया तो वहां दिव्या का मुंह खुला हुआ था। कमरे में घुसते ही उसने मुझसे बोला, “मैं कितनी भी कोशिश कर लूं, मां कभी खुश नहीं होती। हर चीज की एक सीमा होती है और यह सारी बातें सीमा से भी ऊपर हैं।”

मैंने उसे पकड़ा और बोला, “घबराओ मत, थोड़ा समय लगेगा मां को संभालने में, क्योंकि तुम्हारे अलावा उनका कोई और नहीं है। वह तुम्हें अपना मानती हैं इसलिए तुमसे ऐसी बातें करती हैं। चलो, चल के नीचे खाना खाते हैं, बहुत तेज भूख लगी है।”

ऐसा बोलकर हम नीचे आते हैं और मैं मन में ही सोचता हूं, दिव्या को तो मैं धीरे से किसी भी तरह से मना लूंगा, एक रात की बात है, एक बार जहां लिपट के सोया, सब कुछ सुबह ठीक हो जाएगा। मां के लिए कुछ सोचना पड़ेगा।

नीचे खाना खाने के बाद मैं और दिव्या अपने कमरे में जाते हैं। दिव्या अभी भी थोड़ी नाराज लग रही थी। मैंने उसे बोला, “क्यों मन की बात का इतना बुरा मानती हो?” उसने तुरंत मुझसे बोला, “मेरी कोई गलती भी नहीं होती और हर चीज के लिए मुझे दोषी ठहरा दिया जाता है। मैं कुछ अच्छा भी करने जाती हूं तो उसमें भी मेरी बुराई निकल जाती है।”

मैंने उसे जोर से गले लगाया और बोला, “ऐसा कुछ नहीं है, समय के साथ सारी चीज ठीक हो जाएगी।” और अब बारी थी कुछ करने की, लेकिन उसने मुझे अपने से दूर कर दिया और बोला, “मेरा मन नहीं है।”

अब जो मुझे लगता था कि एक रात लिपट के सोने से अगली सुबह सब कुछ ठीक हो जाएगा, यह बातें झूठी समझ आने लगीं। धीरे-धीरे हर छोटी-छोटी चीज पर घर में लड़ाई झगड़ा होने लगे। मां को दिव्या की कुछ चीजें पसंद नहीं आतीं और दिव्या को मां की बहुत सारी चीजें नहीं पसंद आतीं।

दिव्या का कहना था कि घर उसका भी है और हर छोटी चीज के लिए परमिशन लेना उसे ठीक नहीं लगता। उधर मां का कहना था कि इस गृहस्थी को मैंने बसाया है और तुम्हें हैंडओवर किया है, इसलिए अभी भी इसकी मालकिन मैं ही हूं। तुम्हें जो भी पूछना है मुझसे पूछ कर करो।

दोनों अपनी बात पर बिल्कुल सही थीं। एक तरफ दिव्या, जिसके साथ मुझे पूरी जिंदगी बितानी थी, दूसरी तरफ मेरी मां, जिन्होंने इस गृहस्ती को संभाला था, मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया था। लेकिन इन दोनों की लड़ाई का असर सीधा-सीधा मेरे ऊपर दिख रहा था और मैं पिसता जा रहा था।

धीरे-धीरे बात कहीं ज्यादा बढ़ने लगी और घर में प्रतिदिन लड़ाई झगड़े की नौबत आ गई। अब मुझे भी लगने लगा था कि जो मेरे दोस्त बोलते थे कि शादी करने से बहुत ज्यादा खुशी नहीं मिलती, बल्कि लाइफ में टेंशन आता है, वह क्यों बोलते थे।

इसी तरह एक दिन अत्यधिक बात बढ़ने पर मैं रात को दोनों लोगों के कमरे में गया। सबसे पहले मैं मां के कमरे में गया और मां को समझाया, “देखो मां, तुम दोनों के झगड़े की वजह से मेरा करियर खराब हो रहा है और मैं ठीक से रह नहीं पा रहा हूं। मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता और ना मैं दिव्या को छोड़ सकता हूं। तो इसलिए थोड़ी नरम हो जाओ, जो चीज जैसे चल रही है, चलने दो।” इस बार मैं थोड़ा कठोर था।

मां से तुरंत बोलने के बाद मैं अपनी पत्नी के कमरे में गया और यही बात उससे भी कही, “देखो, मां की उम्र हो चुकी है। यदि तुम यह सोच रही हो कि मां अपने आप को बदल सकती हैं, तो यह होना मुमकिन नहीं है। बदलना तुम्हें खुद को होगा, जिसमें मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगा। मैं ना तुम्हें छोड़ सकता हूं, क्योंकि तुम मेरा भविष्य हो, और ना मैं अपनी मां को छोड़ सकता हूं, क्योंकि उन्होंने मुझे पाल-पोस कर इस लायक बनाया है।

तो कोई बीच का रास्ता निकालो और घर में शांति से रहो।”

यह बात होने के कुछ दिन बाद तक तो चीजें ठीक थीं, लेकिन धीरे-धीरे चीजें फिर से बिगड़ने लगीं। जब भी मैं ऑफिस से घर आता तो घर में घुसते ही मां दिव्या की बुराई करतीं और अपने कमरे में घुसते ही दिव्या मां की बुराई करती। मुझे समझ में नहीं आता था कि मैं किस जंजाल में फंस गया हूं।

दिव्या का पक्ष लेता तो मां बुरा मान जातीं, मां का पक्ष लेता तो दिव्या बुरा मान जातीं। और ये दोनों वही औरतें थीं जिनसे इस दुनिया में मैं सबसे ज्यादा प्रेम करता हूं।

एक समय में स्थिति ऐसी आ गई कि मुझे घर पर आने का मन नहीं करता। काम हो गया, मुझे लगता है जितना ज्यादा समय घर से बाहर रहूं, उतना अच्छा है। क्योंकि दो बार समझाने के बाद भी मेरी मां और मेरी पत्नी के बीच विवाद नहीं सुलझा रहा था।

इसी दौरान मैं अपने पापा के साथ उनके पेंशन के काम के लिए ऑफिस जाता हूं और मेरे पापा मुझसे पूछते हैं कि इतना परेशान क्यों रहते हो। मैंने उन्हें बताया कि पापा, यह दिक्कत है। तो पापा ने बोला, “यह तो दुनिया की रीति है, हर मर्द को इससे गुजरना पड़ता है। आज तुम परेशान हो, लेकिन यह चीज कभी खत्म नहीं होगी, तो तुम्हें इसी के साथ जीने की आदत डालनी होगी।”

“जब मेरी शादी हुई थी तो मैं भी यह चीज झेली है। जब तुम्हारे दादाजी की शादी हुई थी तो उन्होंने भी झेली है। तुम्हारे नाना की शादी हुई थी तो उन्होंने भी झेली है। तो अब तुम्हारी बारी है। लेकिन मैं तुम्हें एक तरीका बताता हूं जिससे हो सकता है कि चीजें काफी हद तक सुधर जाएं।” पापा ने मुझे एक तरीका बताया।

मैं घर आता हूं, चीजें ठीक चलती हैं, लेकिन धीरे-धीरे कुछ समय बाद फिर झगड़ा होना शुरू हो जाता है। इस बार मैंने दोनों को आमने-सामने बैठकर बोला, “लास्ट टाइम मैंने आप लोगों से बात की थी, पर उसका कोई भी मतलब निकाल कर नहीं आ रहा है। यदि आज के बाद फिर घर में कभी झगड़ा होता है तो मैं यह घर छोड़कर चला जाऊंगा। मैं कहीं बाहर रहूंगा और हर महीने की सैलरी आधी मां को और आधी दिव्या को दे दिया करूंगा।”

इस बात का दोनों पर कोई फर्क नहीं पड़ा।

हफ्ता बीतता है और घर में फिर झगड़ा होता है। इस बार समय था एक्शन लेने का। मैं झगड़ा होते हुए देखता हूं, पर इस बार कुछ भी नहीं बोलता। मैं ऑफिस जाता हूं और इस बार देर रात तक ऑफिस में ही रुकता हूं। जब दिव्या मुझे फोन करती है कि आप कहां हैं, तो मैं उनसे बोलता हूं, “मुझे नहीं पता मैं कहां हूं।” कुछ देर बाद मां का फोन आता है और मां भी मुझसे यही पूछती है कि तुम कहां हो, इतना देर क्यों हो रहा है? मैंने मां को भी बोल दिया कि मैं कहां हूं, मुझे भी नहीं पता।

इस दौरान मैं अपने एक अविवाहित दोस्त के घर पर रुका हुआ था, जिसके बारे में मेरे घर में किसी को नहीं पता था, सिर्फ मेरे पिता जानते थे। जब दिव्या का फोन आता है या मां का फोन आता है, तो मैं उनसे नॉर्मली बात करता हूं और उन्हें यह बोल देता हूं कि कई बार मैंने उन लोगों को समझाया है कि घर में लड़ाई झगड़ा मत करो, जिससे घर की शांति भंग होती है। इस वजह से मैं अब घर छोड़कर बाहर आ गया हूं और मैं हमेशा के लिए बाहर हूं।

यह सुनने के बाद मेरी मां घबरा गईं, दिव्या घबरा गईं कि आखिर ऐसा क्या हो गया। और दोनों मुझे फोन करके समय-समय पर यह एहसास दिलाते कि दोबारा उनसे यह गलती कभी नहीं होगी, मुझे जल्दी से जल्दी घर आ जाना चाहिए।

मां ने तो यह तक बोल दिया कि “तू क्या चाहता है, मैं बिना पोते का मुंह देखे मर जाऊं।” और दिव्या फोन करके मुझे यह बोलती कि “आपकी मां आपके लिए बहुत परेशान हैं, मेरे लिए ना सही, कम से कम उनके लिए तो वापस आ जाइए।”

मुझे यह देखकर बहुत खुशी हो रही थी कि दोनों लोग मेरे चक्कर में एक-दूसरे के बारे में सोच रहे थे। बस फर्क इतना था कि दिव्या खुलकर के मुझे बोल रही थी, पर मां इशारों में बोल रही थी।

एक हफ्ते बाद मैं घर आता हूं और घर जाकर सबसे पहले देखता हूं और पिताजी से मिलता हूं। पापा मुझे बताते हैं कि एक हफ्ते से घर में काफी शांति है और उम्मीद है आगे भी ऐसा झगड़ा नहीं होगा।

और यकीन मानिए, उस दिन के बाद से ऐसा झगड़ा दोबारा कभी नहीं हुआ। मेरी मां मेरी पत्नी के साथ अच्छे से रहती हैं और मेरी पत्नी मेरे मां के साथ अच्छे से रहती है। आज दिव्या के साथ मुझे पूरे 5 साल हो चुके हैं और हमारा एक बेटा भी है। लेकिन आज हमारे घर में गृहकलह नाम की चीज नहीं है। और इसका पूरा श्रेय मैं अपने पिता को देना चाहता हूं।

क्योंकि उस दिन जब हम पेंशन का काम करने कचहरी गए थे, तो उन्होंने ही मुझे यह आईडिया दिया था कि “तुम एक हफ्ते के लिए घर से बाहर भाग जाओ और बोल देना कि अब तुम दोबारा लौट के कभी नहीं आओगे।”

मुझे पता है मेरा यह कदम काफी ज्यादा हास्यास्पद और कुछ लोगों को बेकार लगे, पर यकीन मानिए, इस चीज ने मेरी जिंदगी बदल दी। अगर मैं आज यह कदम न उठाया होता, तो शायद हर घर की तरह मेरे घर में भी रोज लड़ाई झगड़ा हो रहा होता।

भारत में शादी सिर्फ लड़के और लड़की की नहीं होती, बल्कि लड़की और लड़के की फैमिली की भी होती है। शादी के बाद सिर्फ पत्नी के साथ जी भर के सेक्स करने से खुशी नहीं प्राप्त होती। असली खुशी तब मिलती है जब आपका परिवार भी खुश हो। और परिवार को खुश करने की जिम्मेदारी सिर्फ लड़की की नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की होती है। इसमें

Some special things related to Rajpal Yadav’s wife Radha:

राजपाल यादव की पत्नी राधा से जुड़ी कुछ खास बातें:

  • राजपाल यादव ने साल 2003 में राधा से शादी की थी.
  • राजपाल और राधा के बीच उम्र का अंतर नौ साल है.
  • राधा कनाडा की रहने वाली हैं.
  • राजपाल ने बताया था कि राधा ने उनकी पहली पत्नी की बेटी ज्योति को भी अपनी बेटी की तरह पाला है.
  • राजपाल ने बताया था कि उनकी पत्नी ने उन्हें ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा सपोर्ट किया है.
  • राजपाल और राधा की दो बेटियां हैं, जिनका नाम हर्षिता और रेहांशी है.

राजपाल यादव की पहली पत्नी करुणा से जुड़ी कुछ खास बातें:

  • राजपाल की पहली पत्नी करुणा का निधन ज्योति के जन्म के समय हो गया था.
  • राजपाल ने बताया था कि वह अगले दिन अपनी पत्नी से मिलने वाले थे, लेकिन जब वह पहुंचे तब तक बहुत देर हो गई थी.
  • राजपाल ने बताया था कि उनकी मां, भाभी समेत परिवार ने उनकी बेटी ज्योति का इतना ख्याल रखा कि उसे कभी भी मां की कमी नहीं खली. राजपाल यादव की पत्नी राधा से जुड़ी कुछ खास बातें:
  • राजपाल यादव ने साल 2003 में राधा से शादी की थी.
  • राजपाल और राधा के बीच उम्र का अंतर नौ साल है.
  • राधा कनाडा की रहने वाली हैं.
  • राजपाल ने बताया था कि राधा ने उनकी पहली पत्नी की बेटी ज्योति को भी अपनी बेटी की तरह पाला है.
  • राजपाल ने बताया था कि उनकी पत्नी ने उन्हें ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा सपोर्ट किया है.
  • राजपाल और राधा की दो बेटियां हैं, जिनका नाम हर्षिता और रेहांशी है.

राजपाल यादव की पहली पत्नी करुणा से जुड़ी कुछ खास बातें:

  • राजपाल की पहली पत्नी करुणा का निधन ज्योति के जन्म के समय हो गया था

Who is the father of sin?

पाप का बाप कौन है?

एक बार एक विद्वान व्यक्ति अपनी सारी शिक्षा संपन्न करके घर आया और उसकी शादी करा दी गई तो उसकी पत्नी ने उससे एक प्रश्न पूछा कि बताओ कि पाप का बाप कौन है तो पति यानी विद्वान व्यक्ति यह सुनकर हैरानी में पड़ गया।

कहने लगा पाप को तो जानता हूं मैंने अपने सारे अध्ययन में पाप के बारे में तो पढ़ा है पर ये पाप का बाप कौन है यह नहीं जाना, पाप के बाप को जानने के लिए विद्वान व्यक्ति अपने गुरु जी से मिलने चल दिए चलते चलते रास्ते में एक वेश्या का घर आया उस वेश्या ने यूं ही कहा राम राम जी कहां जा रहे हैं आप।

विद्वान व्यक्ति ने जवाब दिया कि मैं एक प्रश्न का उत्तर खोजने अपने गुरु के पास जा रहा हूं ।

वेश्या ने पूछा- प्रश्न क्या है?

विद्वान व्यक्ति ने कहा मेरा प्रश्न है “पाप का बाप कौन है?”

ये सुनते ही वैश्या बोली इस प्रश्न का जवाव तो मै ही आपको बता सकती हूँ ,

विद्वान व्यक्ति ने सोचा ये तो और भी अच्छा है यहीं पता चल जायेगा तो बताओ कौन है पाप का बाप ?

वेश्या बोली बता तो दूंगी लेकिन आपको मेरे यहाँ भोजन करना पड़ेगा।

ये सुनकर विद्वान व्यक्ति कहने लगे नहीं नहीं, रहने दो मैं अपने गुरुजी से ही पूछ लूँगा ।

तब वेश्या ने एक सौ का नोट उस व्यक्ति को दिया तो उस विद्वान व्यक्ति के मन में लोभ आ गया और वह खाना खाने के लिए तैयार हो गया।

फिर जब वेश्या खाना बना कर लाई तो उसने कहा कि अगर आपको ऐतराज ना हो तो मैं आपको अपने हाथों से ही खाना खिला दूं?

विद्वान व्यक्ति ने फिर ऐतराज जताया तो फिर से वेश्या ने उसे सौ का नोट दे दिया अब वह व्यक्ति उसके हाथ से खाना खाने को तैयार हो गया जैसे ही वेश्या ने भोजन का एक निवाला विद्वान के मुख की तरफ बढ़ाया और जैसे ही उसने मुंह खोला तो वेश्या ने उसके गाल पर जोरदार एक थप्पड़ जड़ दिया और कहा कि यही है पाप का बाप और कहा कि तुम लोभ के कारण अपनी मर्यादा भूल गए लेकिन मैं अपनी मर्यादा को बखूबी जानती हूं।

जब भी कोई सम्मानीय या सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति लोभ के कारण नीच की संगति करता है वही पाप है और लोभ ही पाप का बाप है।

Once a learned person came home after completing all his education and when he got married, his wife asked him a question that tell me who is the father of sin. The husband i.e. the learned person was surprised to hear this.

He said that I know sin, I have read about sin in all my studies but I do not know who is the father of sin. To know the father of sin, the learned person went to meet his Guru Ji. On the way, he came to the house of a prostitute. That prostitute said Ram Ram Ji, where are you going?

The learned person replied that I am going to my Guru to find the answer to a question.

The prostitute asked – what is the question?

The learned person said my question is “Who is the father of sin?”

On hearing this, the prostitute said that only I can tell you the answer to this question.

The learned person thought that this is even better, I will get to know here, so tell me who is the father of sin?

The prostitute said, I will tell you but you will have to eat at my place.

Hearing this, the learned man said, no no, let it be, I will ask my Guru.

Then the prostitute gave a hundred rupee note to that man, then greed came in the mind of that learned man and he got ready to eat the food.

Then when the prostitute brought the food, she said, if you don’t mind, can I feed you with my own hands?

The learned man again objected, then again the prostitute gave him a hundred rupee note, now the man got ready to eat the food from her hand. As soon as the prostitute took a morsel of food towards the scholar’s mouth and as soon as he opened his mouth, the prostitute slapped him hard on his cheek and said that this is the father of sin and said that you forgot your limits due to greed, but I know my limits very well.

Whenever a respectable or the best person keeps company with a low person due to greed, that is a sin and greed is the father of sin.

Empty

खाली

एक संत घूमते-फिरते एक दुकान पर आए। दुकान पर कई छोटे-बड़े डिब्बे रखे थे। दुकान पर एक बालक बैठा था। संत ने एक डिब्बे की ओर संकेत करते हुए दुकानदार से पूछा, ‘इसमें क्या है?’ बालक ने कहा, ‘नमक है।’

संत ने फिर पूछा, ‘इसके पास वाले में क्या है?”

बालक ने बताया, ‘हल्दी।’

इसी तरह संत हर डिब्बे के बारे में पूछते रहे और बालक बताता रहा। अंत मे संत ने अंतिम डिब्बे के बारे में पूछा। बालक ने कहा, ‘उसमें भगवान हैं।’

संत हैरत में आ गए, ‘भगवान । भला भगवान किस वस्तु का नाम है? मैंने तो ऐसा कभी नहीं सुना है।’

बालक ने बड़े ही भोलेपन से कहा, ‘महात्मन। यहडिब्बा खाली है। हम खाली डिब्बे को खाली नहीं कहते, उसे भगवान कहते हैं।’ संन्यासी आश्चर्य से भरउठा। अचानक उसे लगा कि जिस बात के लिए वह दर-दर भटक रहा था, वो आज इस बच्चे से समझ आ रही है। यही तो सच है, जो खाली होगा, वहीं तो भगवान होगा। पहले से भरे रहेंगे, तो भगवान को जगह कहां? काम, क्रोध, लोभ, मोह, अभिमान, ईष्यां, द्वेष और भली-बुरी, सुख-दुख की बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा, तो उसमें भगवान का वास कैसे होगा? संत आनंद के साथ आगे बढ़ गए।

A saint came to a shop while wandering. There were many small and big boxes kept in the shop. A child was sitting in the shop. Pointing towards a box, the saint asked the shopkeeper, ‘What is in this?’ The child said, ‘There is salt.’

The saint again asked, ‘What is in the box next to this?’

The child said, ‘Turmeric.’

In this way, the saint kept asking about every box and the child kept telling. Finally the saint asked about the last box. The child said, ‘There is God in it.’

The saint was surprised, ‘God. What is the name of God? I have never heard of such a thing.’

The child said very innocently, ‘Mahatma. This box is empty. We do not call an empty box empty, we call it God.’ The sanyasi was filled with surprise. Suddenly he felt that the thing for which he was wandering from door to door, he is understanding it from this child today. This is the truth, God will be there only when it is empty. If we are already full, then where will be the place for God? When the heart and mind are filled with lust, anger, greed, attachment, pride, jealousy, hatred and good-bad, happiness-sorrow, then how will God reside in it? The saint moved forward with joy.

Getting rid of, leaving and getting rid of

The Upanishads have ordered that there should be enjoyment in life with sacrifice. First sacrifice, then enjoyment. To serve the welfare of the world is sacrifice, to serve one’s own welfare is enjoyment. Sacrifice is humanity, divinity and enjoyment is animality and demonism.

India is a country of sacrifice, Ramji gave up the right to rule for 14 years. Mahavira and Buddha renounced the world for all time. Lord Mahavira has said in the second study of Dashvaikali Sutra that a renunciant should be one who gives up the enjoyments under his control.

Not being able to enjoy an object due to compulsion is not sacrifice. Not enjoying an object voluntarily is sacrifice, only such a renunciant enjoys sacrifice. Not enjoying an object under compulsion, not using it gives only pain to the mind, not pleasure.

There are three levels of sacrifice – you gave up an object under someone’s pressure. In reality, you have not given up that object, it has been made to be given up by you. In this situation, the other person put pressure on you and you had to leave. In this, the effort is of the one who is making you leave, not of the one who is leaving. The one who is leaving is helpless and compelled. The doctor said, “Leave the addiction, otherwise I will not treat you.” This is the first level of renunciation.

The second level is to leave voluntarily, to put pressure on your mind yourself that O mind, leave this thing, otherwise your present life and the next life will be ruined. At this level, the person convinces himself, suppresses himself, this is renunciation.

The first level of leaving is to get someone to leave, the second is to leave. The third level is to leave. In this, the seeker becomes so comfortable that he does not have any attachment, right or affection for any thing. He makes himself so neutral that the thing is left and he does not even realize that he has left something.

There is a famous incident – ​​Ranka-Banka husband and wife were going from the hut to the forest. The husband saw gold coins lying on the way. A thought came to my wife’s mind that if she gets tempted to pick up the coins, I started covering them with mud. My wife came from behind and asked- what were you doing? I had to tell her that they were gold coins and I picked them up, so I covered them with mud. My wife said- how crazy are you? You are covering mud with mud. You are still seeing a difference between gold and mud. For me every substance in the world is mud.

This incident makes it clear that the husband had left the gold, the wife had left the gold. The one who leaves has the thought in his mind that he has left something, but the one who leaves the substance does not even have this feeling.

There are three levels of renunciation- getting rid of, leaving and leaving.

Bahushrut Jai Muni

retirement

💐💐रिटायरमेंट💐💐

तक़रीबन 26 साल नौकरी करने के बाद तन्विक बाबू इसी महीने रिटायर होने वाले थे । वे एक प्राइवेट कंपनी में आदेशपाल(चपरासी) के पद पर कार्यरत थे ।

एक तरफ़ जहाँ तन्विक जी को इस बात का सुकून था कि चलो अब तो एक खड़ूस , बत्तमीज औऱ क्रूर बॉस से छुटकारा मिलेगा , वहीं दूसरी ओर उन्हें इस बात की भी चिंता सता रही थी कि रिटायरमेंट के बाद अब उनका समय कैसे बीतेगा औऱ उनपर जो जबरदस्त आर्थिक जिम्मेदारी है , उसका निर्वहन वे कैसे करेंगे ??

दरअसल तन्विक बाबू को एक मात्र लड़की थी जिसकी पढ़ाई औऱ फ़िर व्याह की चिंता उन्हें खाए जा रही थी ।रिटायमेंट के बाद इस महंगाई में घर के ख़र्च के साथ साथ बेटी की शादी उनके लिए एक बड़ी चुनौती से कम न थी। ऊपर से उनकी बीमार पत्नी के इलाज़ का ख़र्च अलग से मुँह बाए खड़ा था ।

हालांकि लगभग 60 कर्मचारियों वाले उस दफ़्तर में अपने सुप्रीम बॉस सहित कुछ लोगों के बुरे बर्ताव के कारण वे मन ही मन बड़े दुखी रहते थे । फ़िर भी जब महीने की एक तारीख़ को उनके हाथों पर उनकी तनख्वाह आ जाती थी तब उनका सारा दुख दर्द फ़ुर्र हो जाता था ।

तन्विक बाबू ख़ुद भी शारीरिक रूप से दुरुस्त न थे । उनकी याददाश्त तो कुछ कमजोर हो ही चली थी , उनका अब हांथ भी कांपने लगा था । न चाहते हुए भी कुछ न कुछ गलती अक़्सर उनसे भी हो ही जाती थी ।वे क़भी दफ़्तर की सफ़ाई करना भूल जाते तो क़भी चाय में चीनी डालना। क़भी कभार तो गंदे ग्लास से ही किसी कर्मचारी को पानी पिला देते थे जिसके लिए उन्हें कुछ न कुछ भला बुरा सुनना पड़ता था । फ़िर भी सबकुछ चलते जा रहा था ।

आख़िरकार वो दिन भी आ ही गया जिस दिन तन्विक बाबू का दफ़्तर में आख़री दिन था । तन्विक जी वक़्त से कुछ पहले ही दफ़्तर पहुँच कर अपने नियमित कार्य में जुट गए। सबकुछ रोज़ की ही तरह था , बस आज दफ़्तर में ख़ामोशी कुछ ज़्यादा थी ।

शाम में जब आख़री बार दफ़्तर से घर जाने का वक़्त हुआ तो तन्विक बाबू ने टूटे मन से सोचा कि अंतिम बार खड़ूस बॉस के केबिन में जाकर उससे मिल लिया जाए लेकिन उन्हें बताया गया कि अन्य कर्मचारियों के साथ बॉस एक जरुरी मीटिंग कर रहे हैं , फ़िलहाल उन्हें कुछ देर इंतज़ार करना होगा ।

दो घंटे इंतज़ार के बाद भी जब मीटिंग ख़त्म नहीं हुई तो तन्विक बाबू मन ही मन चिढ़ गए औऱ बॉस को कोसने लगे……साला क्या अहंकारी आदमी है, सिर्फ़ एक मिनट के लिए मुझें बुलाकर मिल लेता …अकड़ू साला ।

अंत में मायूस होकर तन्विक बाबू ने बिना बॉस से मिले ही अपने घर लौटने का मन बना लिया , ठीक तभी किसी ने आवाज़ दी….साहब तुम्हें बुला रहे हैं।

तन्विक बाबू झटपट अंदर दाख़िल हुए लेकिन बॉस के केबिन का नज़ारा कुछ बदला बदला सा था।तन्विक जी को देखते ही सभी कर्मचारियों ने ज़ोर से ताली बजाकर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया ।फ़िर बॉस ने मेज़ पर रखे एक केक को काटने के लिए तन्विक जी को धीरे से इशारा किया ।

पार्टी समाप्ति के बाद अब बॉस ने बोलना शुरु किया….तन्विक , हम सब ने आज मिलकर सामुहिक रूप से ये फैसला लिया है कि तुम्हें फ़िलहाल नौकरी से कार्यमुक्त न किया जाए औऱ तुम्हारी सेवाएं पहले की तरह ही बहाल रखी जाए क्योंकि हमें एक ईमानदार, जिम्मेदार औऱ वफ़ादार व्यक्ति की सख़्त आवश्यकता है । कुछ मामूली लापरवाहियों को अगर नज़रंदाज़ कर दिया जाए तो तुम एक बेहद ही कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति हो। तुम्हें तुम्हारी सेवाओं के बदले प्रत्येक कर्मचारी की तरफ़ से महीने के अंत में पाँच सौ रुपये दिए जाएंगे ।हालांकि ये हमारे ऑफिस के नियम के खिलाफ है , फ़िर भी तुम्हारी आर्थिक जरुरतों के देखते हुए तुम्हारे लिए ऐसा करना पड़ रहा है लेकिन ध्यान रहे तुम्हारी गलतियों के लिए तुम्हें मिलने वाली डांट में कोई रियासत नहीं मिलेगी ।

बॉस ने अपनी बातों को बीच में रोकते हुए रूपयों का एक बंडल तन्विक बाबू के हाथों में थमाया औऱ फ़िर बोलना शुरू किया….आज ही ये पाँच लाख रुपए हम सब ने मिलकर तुम्हारे लिए जमा किए हैं ताकि तुम अपनी बेटी की शादी धूमधाम से कर सको ।

बॉस ने जैसे ही अपनी वाणी को विराम दी तालियां फ़िर से गड़गड़ा उठी ।

तन्विक बाबू रोते हुए बॉस के चरणों में झुक गए लेकिन बॉस ने उन्हें पकड़कर अपने गले से लगा लिया ।

ऑफिस से निकलने के बाद डबडबाई आँखों को लेकर तन्विक बाबू अपने घर की ओर जाते हुए बस यही सोच रहे थे कि आज तक जिन लोगों को वे खड़ूस औऱ बेरहम समझ रहे थे , वे हक़ीक़त में कुछ औऱ ही निकल गए ।

💐💐शिक्षा💐💐

अक़्सर हमारे नकारात्मक विचारों के कारण किसी भी व्यक्ति के प्रति हमारे मन में जो धारणा बन जाती है वो हमेशा सही नहीं होती । क़भी क़भी लोग इतने भी बुरे नहीं होते जितने हम उन्हें मान बैठते हैं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

mouth and tongue exercises

मुख और जीभ का व्यायाम

  1. कच्चा पापड़, पक्का पापड़

सबसे ज़्यादा फेमस और हमारे दिल के सबसे क़रीब. एक बार में 15 बार बोल के दिखाओ तो जानें.

  1. फालसे का फासला

चैलेंज है कि 20 बार बिना रुके बोल कर दिखाओ.

  1. पीतल के पतीले में पपीता पीला पीला

मुस्कुरा का रहे हो, 12 बार इसे बोल कर दिखाओ.

  1. पके पेड़ पर पका पपीता पका पेड़ या पका पपीता

मेरी जीभ तो लगभग फ्रैक्चर होते-होते बची है.

  1. ऊंट ऊंचा, ऊंट की पीठ ऊंची. ऊंची पूंछ ऊंट की

क्या हुआ?

  1. समझ समझ के समझ को समझो, समझ समझना भी एक समझ है. समझ समझ के जो न समझे, मेरे समझ में वो ना समझ है.

इसे एक बार ही बोल के दिखाएँ

  1. दूबे दुबई में डूब गया

अच्छा ठीक है.ज़्यादा ख़ुश मत हों. ये आपकी फूलती सांसों को आराम देने के लिए था.

  1. चंदु के चाचा ने चंदु की चाची को, चांदनी चौक में, चांदनी रात में, चांदी के चम्मच से चटपटी चटनी चटाई

अब चाहे जो कुछ भी करना, मगर अपने बाल मत नोंचना.

  1. जो हंसेगा वो फंसेगा, जो फंसेगा वो हंसेगा

आपको ये आसान लग रहा है. जरा इसे 10 बार से ज़्यादा बार बोल कर दिखाइए.

  1. खड़क सिंह के खड़कने से खड़कती हैं खिड़कियां, खिड़कियों के खड़कने से खड़कता है खड़क सिंह मेरे तो पूरे बदन में खड़कन हो रही है.
  2. मर हम भी गए, मरहम के लिए, मरहम न मिला. हम दम से गए, हमदम के लिए, हमदम न मिला

बोलो-बोलो मुंह मत चुराओ.

  1. तोला राम ताला तोल के तेल में तल गया, तला हुआ तोला तेल के तले हुए तेल में तला गया

ऐसे देख का रहे होे?

  1. डाली डाली पे नज़र डाली, किसी ने अच्छी डाली, किसी ने बुरी डाली, जिस डाली पर मैने नज़र डाली वो डाली किसी ने तोड़ डाली

बोलो बोलो…

  1. पांच आम पंच चुचुमुख-चुचुमुख, पांचों मुचुक चुचुक पंच चुचुमुख

If Buddha is born within you then there is happiness.

तुम्हारे भीतर बुद्ध का जन्म हो जाए तो सुख है।

बोध कथा

एक दिन कुछ बौद्ध भिक्षुओं में चर्चा हो रही थी। चर्चा का विषय था-‘संसार में सबसे बड़ा सुख क्या है ?’ अगर संसार में सुख ही सुख है तो फिर हम सब या दूसरे लोग उसे छोड़कर भिक्षु क्यों बन जाते हैं? सुख तो इसका कारण नहीं है। दुख होने पर ही व्यक्ति भिक्षु होता है। जबकि असल बात यह है कि व्यक्ति यदि यह समझ ले कि सुख-दुख कुछ नहीं है, तो फिर सारी परेशानी ही खत्म हो जाएगी। व्यक्ति यदि समभाव से परिस्थितियों का सामना करना सीख जाए ती फिर उसे गृहस्थ से भिक्षु होने की आवश्यकता ही नहीं होगी। लेकिन व्यक्ति भिक्षु ही तब होता है, जब उसे लगता है कि यह संसार ही व्यर्थ है। रिश्ते-नाते सब मोह-माया है। यहां आने वालें भिक्षु भी ऐसे ही घर से भागकर यहां आए हंगि। किसी की पत्नी मर गई होगी, तो किसी का दीवाला निकल गया होगा, तो कोई जीवन में कुछ न कर पाने की पीड़ा से भागकर भिक्षु हो गया होगा। कोई भिक्षु साारिक वस्तुओं के भांग को सुख बता रहा था। उसका मानना था कि सुख भोगने वाला व्यक्ति भिक्षु नहीं बनता। इन भिक्षुओं में काफी देर से आपस में ऐसी ही चर्चा चल रही थी।

तभी अचानक भगवान बुद्ध वहां आ गए और भिक्षुओं के पीछे खड़े होकर मौन भाव से उनकी बातें सुनने लगे। उनकी बातें सुनकर वह चौक। उन्होंने भिक्षुओं से कहा, ‘भियु होकर भी तुम किस तरह की बातें कर रहे हो?’ कोई राज्य की सुख बता रहा है, तो कोई सुस्वादु भोजन में सूख ढूंढ़ रहा है तो कोई स्वाद में। अगर इन सब वस्तुओं में सुख है तो फिर तुम सब यहां भिश्व बनने क्यों चले आए? मुझे तुम्हारी ये बातें सुनकर आश्चर्य हुआ। ये सुख ती आभास मात्र हैं।

बुद्ध ने कहा ‘दुख सत्य है। और सुख नहीं है, ऐसा नहीं है। संसार का अर्थ ही यह है कि जहां सुख दिखाई देता है। वहां हर परत सुख का आभास होता है, इशारे

मिलते हैं। लेकिन जैसे-जैसे पास जाओगे, पता चलता है कि सुख है ही नहीं।’ ‘फिर सुख कहां है?’ बुद्ध ने कहा, ‘बुद्धत्व में सुख है। तुम्हारे भीतर बुद्ध का जन्म हो जाए, तो सुख है। तुम्हारे भीतर बुद्ध का अवतरण हो जाए, तो सुख है।’ बुद्धत्य बहुत अनूठा शब्द है।

तुम्हारे भीतर बुद्ध उत्पन्न हो जाएं तो सुख है। तुम जब जागो तो सुख है। सोने में दुख है। मूर्च्छा में दुख है। जागने में सुख है। धर्म का श्रवण करना सुख है। सबसे परम सुख तो है, बुद्धत्व; कि तुम्हारे भीतर बुद्धत्व पैदा हो जाए। अगर अभी यह नहीं हुआ तो नंबर दो का सुख है-जिनका बुद्ध जाग गया है, उनकी बात सुनने में सुख है।

‘तो सुनो उनकी, जो जाग गए हैं, जिन्हें कुछ दिखाई पद्म है। लेकिन उसी सुख पर रुक मत जाना। सुन- सुनकर अगर रुक गए, तो एक तरह का सुख तो मिलेगा, लेकिन यह भी बहुत दूर जानेवाला नहीं है।’ इसलिए, बुद्ध ने कहा, ‘समाधि में सुख है। बुद्धत्व में सुख है, यह तो परम व्याख्या हुई सुख की। फिर यह भी नहीं हुआ तो उनके वचन सुनो, उनके पास उठो-बैठो, जिनके भीतर यह क्रांति घटी है। जिनके भीतर यह सूरज निकला है। जिनका प्रभात हो गया है। जहां सूर्योदय हुआ है, उनके पास रमो, इसमें सुख है। मगर इसमें ही रुक मत जाना। ध्यान रखना कि जो उनको हुआ है, वह तुम्हें भी करना है। उस करने के उपाय का नाम समाधि है।

ego of mind

मन का अहँकार

एक घर के मुखिया को यह अभिमान हो गया कि उसके बिना उसके परिवार का काम नहीं चल सकता।
उसकी छोटी सी दुकान थी। उससे जो आय होती थी, उसी से उसके परिवार का गुजारा चलता था।
चूंँकि कमाने वाला वह अकेला ही था इसलिए उसे लगता था कि उसके बगैर कुछ नहीं हो सकता। वह लोगों के सामने डींग हांँका करता था।

एक दिन वह एक महात्मा जी के सत्संँग में पहुंँचा। महात्मा जी कह रहे थे कि दुनिया में किसी के बिना किसी का काम नहीं रुकता।
यह अभिमान व्यर्थ है कि मेरे बिना परिवार या समाज ठहर जाएगा। सभी को अपने भाग्य के अनुसार प्राप्त होता है।

सतसंँग समाप्त होने के बाद मुखिया ने महात्मा जी से कहा, ‘मैं दिन भर कमाकर जो पैसे लाता हूंँ उसी से मेरे घर का खर्च चलता है। मेरे बिना तो मेरे परिवार के लोग भूखे मर जाएंगे।’
महात्मा जी बोले, ‘यह तुम्हारा भ्रम है। हर कोई अपने भाग्य का खाता है।’

इस पर मुखिया ने कहा, ‘आप इसे प्रमाणित करके दिखाइए।’
महात्मा जी ने कहा, ‘ठीक है। तुम बिना किसी को बताए घर से कुछ महीने के लिए गायब हो जाओ।’

उसने ऐसा ही किया। महात्मा जी ने यह बात फैला दी कि उसे बाघ ने खा लिया है।

मुखिया के परिवार वालों ने कई दिनों तक शोक मनाया।
गांँव वाले आखिरकार उनकी मदद के लिए सामने आए।
एक सेठ ने उसके बड़े लड़के को अपने यहांँ नौकरी दे दी।
गांँव वालों ने मिलकर लड़की की शादी कर दी।
एक व्यक्ति छोटे बेटे की पढ़ाई का खर्च देने को तैयार हो गया।

कुछ महीने बाद मुखिया छिपता-छिपाता रात के वक्त अपने घर आया तो घर वालों ने भूत समझकर दरवाजा नहीं खोला।
जब वह बहुत गिड़गिड़ाया और उसने सारी बातें बताईं तो उसकी पत्नी ने दरवाजे के भीतर से ही उत्तर दिया- अब हमें तुम्हारी जरूरत नहीं है। अब हम पहले से ज्यादा सुखी हैं।
यह सुनकर उस व्यक्ति का सारा अभिमान उतर गया!

यथार्थ में, संसार किसी के लिए भी नहीं रुकता! यहाँ सभी के बिना काम चल सकता है क्योंकि इस संसार को चलाने वाला परम प्रभु ईश्वर है जिसने कुछ समय के लिय हमें अपने संसार में भेजा है!
इसलिए समय के सद्गुरु की शरण में जाकर उनसे प्राप्त ज्ञान का आनन्द लेना ही जीवन जीने का सही उद्देश्य अपनाना चाहिय!

everyone loves their home

हर व्यक्ति को अपना घर प्यारा होता है

इंसान तो क्या पशु पक्षी भी अपने घर को पसंद करते हैं।
छोटे से लेकर बड़े तक हर व्यक्ति जल्दी से काम को निपटा कर घर पहुंचना चाहता है।
छोटा बच्चा स्कूल से छुट्टी होते ही घर की तरफ दौड़ लगाता है।
घर में काम करने वाली नौकरानी जल्दी-जल्दी काम निपटा कर अपने घर जाना चाहती है।
आदमी लोग शाम के समय में दुकान से मंगल करके सबसे पहले अपने घर पहुंचने का प्रयास करते हैं।

कारण है कि –
घर में शांति और सकून मिलता है; एक अलग ही आनंद की प्राप्ति होती है।

यदि शांति, सुकून और आनंद न मिले –
तो फिर वह घर नहीं केवल चूने, पत्थर और मिट्टी से बना मकान कहलाएगा।

याद रखिए –
मकान को बनाया जाता है, मगर घर को तो बसाया जाता है।
घर के वातावरण को स्वर्गमय और नरकमय बनाना-
यह दोनों स्थिती व्यक्ति के स्वयं के हाथों में है।

जिस घर में त्याग का माहौल होता है –
वहीं घर स्वर्गमय बन सकता है। इसके लिए घर के प्रत्येक सदस्य में त्याग की भावना होना अत्यंत आवश्यक होता है।

घर का मुखिया अकेला कुछ नहीं कर सकता अगर आपको सबका सहयोग नहीं मिले!

जैसे डालियों के बिना वृक्ष की शोभा नहीं होती है!
उसी प्रकार घर में भी जब आपसी सहयोग बराबर रहता है तो वह घर भी शोभा पाता है!

मगर सहयोग अपने हितों का, स्वार्थों का त्याग किए बगैर नहीं हो सकता है।

इसके लिए अपने अभिमान क्रोध, लोभ, इर्ष्या का त्याग आवश्यक है।

इसी के साथ घर के वातावरण को स्वर्गमय बनाने के लिए सहनशीलता भी परम आवश्यक है।

अगर घर में पांच बर्तन होते हैं तो उनके खड़कने की भी आवाज आती है।

उसी प्रकार पांच व्यक्ति घर में रहते हैं और पांचों के विचारों की भिन्नता के कारण कुछ कहना और सुनना भी हो सकता है! कुछ कहने और सुनने की स्थिति में यदि सहनशीलता ना हो तो घर का वातावरण बिगड़ते देर नहीं लगेगी।

आपको घर में एकरूपता और प्रेम रखने के लिए सहनशीलता के गुण को कदम कदम पर स्वीकार करना पड़ेगा।

क्योंकि केवल एक बार की सहनशीलता से काम नहीं चलेगा!
घर को नर्कमय स्थितियों से बचाकर अगर स्वर्गमय वातावरण की ओर ले जाना है तो –
आप को त्याग और सहनशीलता के रास्ते को अपनाना होगा!
अगर ऐसा प्रयास और पुरुषार्थ हो पाया –
तो सर्वत्र आनंद का वातावरण निर्मित हो सकेगा!
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