how to be happy

😌आनंदित कैसे रहें?😌

एक राजा बहुत दिनों से विचार कर रहा था कि वह राजपाट छोड़कर अपना शेष जीवन अध्यात्म (ईश्वर की खोज) में समय लगाए ।

राजा ने इस बारे में बहुत सोचा और फिर अपने गुरु को अपनी समस्या बताते हुए कहा कि उसे राज्य को सम्भालने वाला कोई योग्य वारिस नहीं मिल पाया है। राजकुमार भी बच्चा छोटा है, इसलिए वह राजा बनने के योग्य नहीं है।

सोचता हूँ कि जब भी मुझे कोई पात्र इंसान मिलेगा- जिसमें राज्य सँभालने के सारे गुण हों; तो वह राजपाट छोड़कर शेष जीवन अध्यात्म के लिए समर्पित कर देगा!

गुरु जी ने कहा:- “अगर ऐसा ही विचार है तो राज्य की बागड़ोर मेरे हाथों में क्यों नहीं दे देते? क्या तुम्हें मुझसे ज्यादा पात्र, ज्यादा सक्षम कोई मिल सकता है?”

राजा ने कहा – “मेरे राज्य को आप से अच्छी तरह भला कौन संभल सकता है? लीजिए, मैं इसी समय राज्य की बागडोर आपके हाथों में सौंप देता हूँ।”

गुरु जी ने पूछा:- “अब तुम क्या करोगे?” राज्य तो तुमने मुझे सौंप ही दिया है!

राजा बोला- “मैं राज्य के खजाने से थोड़े पैसे ले लूँगा, जिससे मेरा बाकी जीवन चल जाए।”

गुरु जी ने कहा – “मगर अब खजाना तो मेरा है, मैं तुम्हें एक पैसा भी लेने नहीं दूँगा।”

राजा बोला – “फिर ठीक है, मैं कहीं कोई छोटी-मोटी नौकरी कर लूँगा! उससे जो भी मिलेगा गुजारा कर लूँगा।”

गुरु जी ने कहा- “अगर तुम्हें काम ही करना है तो मेरे यहाँ एक नौकरी खाली है। क्या तुम मेरे यहाँ नौकरी करना चाहोगे?”

राजा बोला – “कोई भी नौकरी हो! मैं करने को तैयार हूँ।”

गुरु जी ने कहा – “मेरे यहाँ राजा की नौकरी खाली है।
मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे लिए यह नौकरी करो और हर महीने राज्य के खजाने से अपनी तनख्वाह लेते रहना।”

एक वर्ष बाद गुरु जी ने वापस लौटकर देखा कि राजा बहुत खुश था। अब तो दोनों ही काम हो रहे थे। जिस अध्यात्म के लिए राजपाट छोड़ना चाहता था, वह भी चल रहा था ( यानि भजन सुमिरन) और राज्य सँभालने का काम भी अच्छी तरह चल रहा था। अब उसे कोई चिंता नहीं थी।

यह प्रसंग हमें यह सोचने के लिय मजबूर करता है कि –
👉राजा के जीवन में क्या परिवर्तन हुआ ?
कुछ भी तो नहीं! राज्य वही! राजा वही! काम वही!

बस दृष्टिकोण बदल गया!

हम भी इसी तरह जीवन में अपना दृष्टिकोण बदलें क्योंकि दृष्टि में ही श्रृष्टि है!

मालिक बनकर नहीं बल्कि यह सोचकर सारे कार्य करें कि “मैं ईश्वर की नौकरी कर रहा हूँ”
अपनी सांसारिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारियों का निर्वहन मालिक बनकर नहीं बल्कि निमित्त बनकर कर्तव्यभाव से ईमानदारी और मेहनत से करें!
बाकि सब ईश्वर ही जाने। सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दें। फिर आप हर समस्या और परिस्थिति में खुशहाल रह पाएँगे!
🙏🙏🙏🙏🙏

Don’t give anything to the unworthy!

कुपात्र को कुछ मत दो!

एक व्यक्ति एक जंँगल से गुजर रहा था कि उसने झाड़ियों के बीच एक सांँप फंँसा हुआ देखा।

सांँप ने उससे सहायता मांँगी तो उसने एक लकड़ी की सहायता से सांँप को वहांँ से निकाला।

बाहर आते ही सांँप ने उस व्यक्ति से कहा कि मैं तुम्हें डसूंँगा।

उस व्यक्ति ने कहा कि मैंने तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार किया तुम्हें झाड़ियों से निकाला और तुम मेरे साथ गलत करना चाहते हो।

सांँप ने कहा कि हांँ भलाई का जवाब बुराई ही है।

उस आदमी ने कहा कि चलो किसी से फैसला कराते हैं।

चलते चलते एक गाय के पास पहुंँचे और उसको सारी बातें बताकर फैसला पूछा तो उसने कहा कि वाकई भलाई का जवाब बुराई है! क्योंकि जब मैं जवान थी और दूध देती थी तो मेरा मालिक मेरा ख्याल रखता था और चारा पानी समय पर देता था। लेकिन अब मैं बूढ़ी हो गई तो उसने भी ख्याल रखना छोड़ दिया है।

ये सुन कर सांँप ने कहा कि अब तो मैं डसूंँगा!

उस आदमी ने कहा कि एक और फैसला ले लेते हैं।

सांँप मान गया और उन्होंने एक गधे से फैसला करवाया।
गधे ने भी यही कहा कि भलाई का जवाब बुराई है! क्योंकि जब तक मेरे अन्दर दम था मैं अपने मालिक के काम आता रहा जैसे ही मैं बूढ़ा हुआ उसने मुझे भगा दिया।

सांँप उसको डंँसने ही वाला था कि उसने मिन्नत करके कहा कि एक आखरी अवसर और दो!
सांँप के हक़ में दो फैसले हो चुके थे इसलिए वह आखरी फैसला लेने पर मान गया।

अबकी बार वह दोनों एक बन्दर के पास गये और उसे भी सारी बातें बताई और कहा फैसला करो।

बन्दर ने आदमी से कहा कि मुझे उन झाड़ियों के पास ले चलो, सांँप को अन्दर फेंको और फिर मेरे सामने बाहर निकालो तभी उसके बाद ही मैं फैसला करुँगा।

वह तीनों वापस उसी जगह पर गये, उस आदमी ने सांँप को झाड़ियों में फेंक दिया और फिर बाहर निकालने ही लगा था कि बन्दर ने मना कर दिया और कहा कि उसके साथ भलाई मत करो! ये भलाई के काबिल नहीं है!

इसलिए कहा है कि:-
मूर्ख को न समझाइए,
ज्ञान गांँठ का जाए।
जैसे कोयला उजला ना होइए,
चाहे सौ मन साबुन लगाइए।।
इसलिए दूसरों की कमी देखने में अपना समय ना लगाकर अपनी कमियां दूर करने में मगन रहिए!
और नेकी कर कुंए में डाल! वाली बात के अनुरूप किसी से कोई अपेक्षा मत कीजिए!
क्योंकि जब हमारी अपेक्षा की उपेक्षा होगी तो हमको दुःख होगा!

जय सच्चिदानन्द।
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

rule of law

विधि का विधान

एक समय की बात है- एक बहुत ही ज्ञानी पण्डित था। वह अपने एक बचपन के घनिष्‍ट मित्र से मिलने के लिए किसी दूसरे गाँव जा रहा था- जो कि बचपन से ही गूंगा व एक पैर से अपाहिज था। उसका गांव काफी दूर था और रास्‍ते में कई और छोटे-छोटे गांव भी पढ़ते थे।

पण्डित अपनी धुन में चला जा रहा था कि रास्‍ते में उसे एक आदमी मिल गया, जो दिखने मे बडा ही हष्‍ठ-पुष्‍ठ था!
वह भी पण्डित के साथ ही चलने लगा। पण्डित ने सोचा कि चलो अच्‍छा ही है, साथ-साथ चलने से रास्‍ता जल्‍दी कट जायेगा।

पण्डित ने उस आदमी से उसका नाम पूछा तो उस आदमी ने अपना नाम महाकाल बताया। पण्डित को ये नाम बडा अजीब लगा लेकिन उसने नाम के विषय में और कुछ पूछना उचित नहीं समझा। ‍दोनों धीरे-धीरे चलते रहे तभी रास्‍त में एक गाँव आया।

महाकाल ने पण्डित से कहा- तुम आगे चलो, मुझे इस गाँव मे एक संदेशा देना है। मैं तुमसे आगे मिलता हूँ।

ठीक है कहकर पण्डित अपनी धुन में चलता रहा! तभी एक भैंसे ने एक आदमी को मार दिया और जैसे ही भैंसे ने आदमी को मारा- लगभग तुरन्‍त ही महाकाल वापस पण्डित के पास पहुंच गया।

चलते-चलते दोनों एक दूसरे गांव के बाहर पहुंचे – जहां एक छोटा सा मन्दिर था। ठहरने की व्‍यवस्‍था ठीक लग रही थी और क्‍योंकि पण्डित के मित्र का गांव अभी काफी दूर था! साथ ही रात्रि होने वाली थी! सो पण्डित ने कहा- रात्रि होने वाली है। पूरा दिन चले हैं! थकावट भी बहुत हो चुकी है! इसलिए आज की रात हम इसी मन्दिर में रूक जाते हैं। भूख भी लगी है, सो भोजन भी कर लेते हैं और थोड़ा विश्राम करके सुबह फिर से प्रस्‍थान करेंगे।

महाकाल ने जवाब दिया- ठीक है लेकिन मुझे इस गाँव में किसी को कुछ सामान देना है, सो मैं देकर आता हूॅं! तब तक तुम भोजन कर लो! मैं बाद मे खा लूंगा।

और इतना कहकर वह चला गया! लेकिन उसके जाते ही कुछ देर बाद उस गाँव से धुंआ उठना शुरू हुआ और धीरे-धीरे पूरे गांव में आग लग गई थी। पण्डित को आश्चर्य हुआ। उसने मन ही मन सोचा कि- जहां भी ये महाकाल जाता है, वहां किसी न किसी तरह की हानि क्‍यों हो जाती है? जरूर कुछ गडबड है।

लेकिन उसने महाकाल से रात्रि में इस बात का कोई जिक्र नहीं किया। सुबह दोनों ने फिर से अपने गन्‍तव्‍य की ओर चलना शुरू किया। कुछ देर बाद एक और गाँव आया और महाकाल ने फिर से पण्डित से कहा कि- पण्डित जी, आप आगे चलें। मुझे इस गांव में भी कुछ काम है, सो मैं आपसे आगे मिलता हूँ!*

इतना कहकर महाकाल जाने लगा। लेकिन इस बार पण्डित आगे नहीं बढा बल्कि खडे होकर महाकाल को देखता रहा कि वह कहां जाता है और करता क्‍या है।

तभी लोगों की आवाजें सुनाई देने लगीं कि एक आदमी को सांप ने डस लिया, और उस व्‍यक्ति की मृत्‍यु हो गई। ठीक उसी समय महाकाल फिर से पण्डित के पास पहुंच गया।

लेकिन इस बार पण्डित को सहन न हुआ। उसने महाकाल से पूछ ही लिया कि- तुम जिस गांव में भी जाते हो, वहां कोई न कोई नुकसान हो जाता है!
क्‍या तुम मुझे बता सकते हो कि आखिर ऐसा क्‍याें होता है?

महाकाल ने जवाब दिया, पण्डित जी, आप मुझे बडे ज्ञानी मालुम पडे थे, इसीलिए मैं आपके साथ चलने लगा था क्‍योंकि ज्ञानियाें का संग हमेंशा अच्‍छा होता है। लेकिन क्‍या सचमुच आप अभी तक नहीं समझे कि मैं कौन हूँ?

पण्डित ने कहा, मैं समझ तो चुका हूॅं लेकिन कुछ शंका है! यदि आप ही अपना उपयुक्‍त परिचय दे दें तो मेरे लिए आसानी होगी।

महाकल ने जवाब दिया कि- मैं यमदूत हूॅं और यमराज की आज्ञा से उन लोगों के प्राण हरण करता हूॅं, जिनकी आयु पूर्ण हो चुकी है।

हालांकि पण्डित को पहले से ही इसी बात की शंका थी। फिर भी महाकाल के मुंह से ये बात सुनकर पण्डित थोडा घबरा गया लेकिन फिर हिम्‍मत करके पूछा कि- अगर ऐसी बात है और तुम सचमुच ही यमदूत हो, तो बताओ अगली मृत्‍यु किसकी है?

यमदूत ने जवाब दिया कि- अगली मृत्‍यु तुम्‍हारे उसी मित्र की है, जिसे तुम मिलने जा रहे हो और उसकी मृत्‍यु का कारण भी तुम ही होगे।

ये बात सुनकर पण्डित ठिठक गयाऔर बडे पशोपेश में पड़ गया कि यदि वास्‍तव में वह महाकाल एक यमदूत हुआ तो उसकी बात सही होगी और उसके कारण मेरे बचपन के सबसे घनिष्‍ट मित्र की मृत्‍यु हो जाएगी!

इसलिए बेहतर यही है कि मैं अपने मित्र से मिलने ही न जाऊं! कम से कम मैं तो उसकी मृत्‍यु का कारण नहीं बनूँगा।

तभी महाकाल ने कहा कि- तुम जो सोंच रहे हो! वो मुझे भी पता है लेकिन तुम्‍हारे अपने मित्र से मिलने न जाने के विचार से नियति नहीं बदल जाएगी। तुम्‍हारे मित्र की मृत्‍यु निश्चित है और वह अगले कुछ ही क्षणों में घटित होने वाली है।

महाकाल के मुख से ये बात सुनते ही पण्डित को झटका लगा! क्‍योंकि महाकाल ने उसके मन की बात जान ली थी! जो कि किसी सामान्‍य व्‍यक्ति के लिए तो सम्‍भव ही नहीं थी। फलस्‍वरूप पण्डित को विश्‍वास हो गया कि महाकाल सचमुच यमदूत ही है। इसलिए वह अपने मित्र की मृत्‍यु का कारण न बने इस हेतु वह तुरन्‍त पीछे मुडा और फिर से अपने गांव की तरफ लौटने लगा।

परन्‍तु जैसे ही वह मुड़ा- सामने से उसे उसका मित्र उसी की ओर तेजी से आता हुआ दिखाई दिया जो कि पण्डित को देखकर अत्‍यधिक प्रसन्‍न लग रहा था। अपने मित्र के आने की गति को देख पण्डित को ऐसा लगा जैसे कि उसका मित्र काफी समय से उसके पीछे-पीछे ही आ रहा था लेकिन क्‍योंकि वह बचपन से ही गूूंगा व एक पैर से अपाहिज था इसलिए न तो पण्डित तक पहुंच पा रहा था और न ही पण्डित को आवाज देकर रोक पा रहा था।

लेकिन जैसे ही वह पण्डित के पास पहुंचा- अचानक न जाने क्‍या हुआ और उसकी मृत्‍यु हो गई।
पण्डित हक्‍का-बक्‍का सा आश्‍चर्य भरी नजरों से महाकाल की ओर देखने लगा – जैसे कि पूछ रहा हो कि आखिर हुआ क्‍या उसके मित्र को।

महाकाल, पण्डित के मन की बात समझ गया और बोला- तुम्‍हारा मित्र पिछले गांव से ही तुम्‍हारे पीछे-पीछे आ रहा था लेकिन तुम समझ ही सकते हो कि वह अपाहिज व गूंगा होने की वजह से ही तुम तक नहीं पहुंच सका। उसने अपनी सारी ताकत लगाकर तुम तक पहुंचने की कोशिश की लेकिन बुढापे में बचपन जैसी शक्ति नहीं होती शरीर में, इसलिए हृदयाघात की वजह से तुम्‍हारे मित्र की मृत्‍यु हो गई और उसकी वजह हो तुम क्‍योंकि वह तुमसे मिलने हेतु तुम तक पहुंचने के लिए ही अपनी सीमाओं को लांघते हुए तुम्‍हारे पीछे भाग रहा था!

अब पण्डित को पूरी तरह से विश्‍वास हो गया कि महाकाल सचमुच ही यमदूत है और जीवों के प्राण हरण करना ही उसका काम है।

चूंकि पण्डित एक ज्ञानी व्‍यक्ति था और जानता था कि मृत्‍यु पर किसी का कोई बस नहीं चल सकता और सभी को एक न एक दिन मरना ही है, इसलिए उसने जल्‍दी ही अपने आपको सम्‍भाल लिया लेकिन सहसा ही उसके मन में अपनी स्‍वयं की मृत्‍यु के बारे में जानने की उत्‍सुकता हुई। इसलिए उसने महाकाल से पूछा- अगर मृत्‍यु मेरे मित्र की होनी थी, तो तुम शुरू से ही मेरे साथ क्‍यों चल रहे थे?

महाकाल ने जवाब दिया- मैं तो सभी के साथ चलता हूॅं और हर क्षण चलता रहता हूॅं केवल लोग मुझे पहचान नहीं पाते क्‍योंकि लोगों के पास अपनी समस्‍याओं के अलावा किसी और व्‍यक्ति, वस्‍तु या घटना के संदर्भ में सोचने या उसे देखने,समझने का समय ही नहीं है।

पण्डित ने आगे पूछा- तो क्‍या तुम बता सकते हो कि मेरी मृत्‍यु कब और कैसे होगी?

महाकाल ने कहा- हालांकि किसी भी सामान्‍य जीव के लिए ये जानना उपयुक्‍त नहीं है, क्‍योंकि कोई भी जीव अपनी मृत्‍यु के संदर्भ में जानकर व्‍यथित ही होता है! लेकिन तुम ज्ञानी व्‍यक्ति हो और अपने मित्र की मृत्‍यु को जितनी आसानी से तुमने स्‍वीकार कर लिया है, उसे देख मुझे ये लगता है कि तुम अपनी मृत्‍यु के बारे में जानकर भी व्‍यथित नहीं होगे। सो, तुम्‍हारी मृत्‍यु आज से ठीक छ: माह बाद आज ही के दिन लेकिन किसी दूसरे राजा के राज्‍य में फांसी लगने से होगी! और आश्‍चर्य की बात ये है कि तुम स्‍वयं खुशी से फांसी को स्‍वीकार करोगे।
इतना कहकर महाकाल जाने लगा क्‍योंकि अब उसके पास पण्डित के साथ चलते रहने का कोई कारण नहीं था।

पण्डित ने अपने मित्र का यथास्थिति जो भी कर्मकाण्‍ड सम्‍भव था, किया और फिर से अपने गांव लौट आया। लेकिन कोई व्‍यक्ति चाहे जितना भी ज्ञानी क्‍यों न हो, अपनी मृत्‍यु के संदर्भ में जानने के बाद कुछ तो व्‍यथित होता ही है और उस मृत्‍यु से बचने के लिए कुछ न कुछ तो करता ही है- सो पण्डित ने भी किया।*

चूंकि पण्डित विद्वान था! इसलिए उसकी ख्‍याति- उसके राज्‍य के राजा तक थी। उसने सोंचा कि राजा के पास तो कई ज्ञानी मंत्री होते हैं और वे उसकी इस मृत्‍यु से सम्‍बंधित समस्‍या का भी कोई न कोई समाधान तो निकाल ही देंगे।
इसलिए वह पण्डित राजा के दरबार में पहुंचा और राजा को सारी बात बताई।

राजा ने पण्डित की समस्‍या को अपने मंत्रियों के साथ बांटा और उनसे सलाह मांगी!

अन्‍त में सभी की सलाह से ये तय हुआ कि यदि पण्डित की बात सही है, तो जरूर उसकी मृत्‍यु 6 महीने बाद होगी! लेकिन मृत्‍यु तब होगी, जब कि वह किसी दूसरे राज्‍य में जाएगा। यदि वह किसी दूसरे राज्‍य में जाए ही न, तो मृत्‍यु नहीं होगी। ये सलाह राजा को भी उपयुक्‍त लगी!

सो उसने पण्डित के लिए महल में ही रहने हेतु उपयुक्‍त व्‍यवस्‍था करवा दी। अब राजा की आज्ञा के बिना कोई भी व्‍यक्ति उस पण्डित से नहीं मिल सकता था लेकिन स्‍वयं पण्डित कहीं भी आ-जा सकता था ताकि उसे ये न लगे कि वह राजा की कैद में है। हालांकि वह स्‍वयं ही डर के मारे कहीं आता-जाता नहीं था।

धीरे-धीरे पण्डित की मृत्‍यु का समय नजदीक आने लगा और आखिर वह दिन भी आ गया, जब पण्डित की मृत्‍यु होनी थी।
तो जिस दिन पण्डित की मृत्‍यु होनी थी, उससे पिछली रात पण्डित डर के मारे जल्‍दी ही सो गया – ताकि जल्‍दी से जल्‍दी वह रात और अगला दिन बीत जाए और उसकी मृत्‍यु टल जाए।

लेकिन स्‍वयं पण्डित को नींद में चलने की बीमारी थी और इस बीमारी के बारे में वह स्‍वयं भी नहीं जानता था! इसलिए राजा या किसी और से इस बीमारी का जिक्र करने अथवा किसी चिकित्‍सक से इस बीमारी का ईलाज करवाने का तो प्रश्‍न ही नहीं था।

चूंकि पण्डित अपनी मृत्‍यु को लेकर बहुत चिन्तित था और नींद में चलने की बीमारी का दौरा अक्‍सर तभी पड़ता है – जब ठीक से नींद नहीं आ रही होती! सो उसी रात पण्डित रात को नींद में चलने का दौरा पडा! वह उठा और राजा के महल से निकलकर अस्‍तबल में आ गया। चूंकि वह राजा का खास मेहमान था, इसलिए किसी भी पहरेदार ने उसे न ताे रोका न किसी तरह की पूछताछ की। अस्‍तबल में पहुंचकर वह सबसे तेज दौडने वाले घोडे पर सवार होकर नींद की बेहोशी में ही राज्‍य की सीमा से बाहर दूसरे राज्‍य की सीमा में चला गया। इतना ही नहीं, वह दूसरे राज्‍य के राजा के महल में पहुंच गया और संयोग हुआ ये कि उस महल में भी किसी पहरेदार ने उसे नहीं रोका न ही कोई पूछताछ की क्‍योंकि सभी लोग रात के अन्तिम प्रहर की गहरी नींद में थे।

वह पण्डित सीधे राजा के शयनकक्ष में पहुंच गया। जहाँ उस राज्‍य का राजा सो रहा था उनके बगल में स्‍वयं पण्डित जाकर लेट गया।
सुबह हुई, तो राजा ने पण्डित को रानी की बगल में सोया हुआ देखा। राजा बहुत क्रोधित हुआ। पण्डित काे गिरफ्तार कर लिया गया!

पण्डित को तो खुद ही समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह आखिर दूसरे राज्‍य में और सीधे राजा के ही शयनकक्ष में कैसे पहुंच गया।

लेकिन वहां उसकी सुनने वाला कौन था। राजा ने पण्डित को राज दरबार में हाजिर करने का हुक्‍म दिया। कुछ समय बाद राजा का दरबार लगा, जहां राजा ने पण्डित को देखा और देखते ही इतना क्रोधित हुआ कि पण्डित को फांसी पर चढ़ा दिए जाने का फरमान सुना दिया।

फांसी की सजा सुनकर पण्डित कांप गया। फिर भी हिम्‍मत कर उसने राजा से कहा कि महाराज, मैं नहीं जानता कि मैं इस राज्‍य में कैसे पहुंचा। मैं ये भी नहीं जानता कि मैं आपके शयनकक्ष में कैसे आ गया और आपके राज्‍य के किसी भी पहरेदार ने मुझे रोका क्‍यों नहीं लेकिन मैं इतना जानता हुं कि आज मेरी मृत्‍यु होनी थी और होने जा रही है।

राजा को ये बात थोड़ी अटपटी लगी। उसने पूछा- तुम्‍हें कैसे पता कि आज तुम्‍हारी मृत्‍यु होनी थी? कहना क्‍या चाहते हो तुम?_

राजा के सवाल के जवाब में पण्डित से पिछले 6 महीनों की पूरी कहानी बता दी और कहा कि- महाराज, मेरा क्‍या! किसी भी सामान्‍य व्‍यक्ति का इतना साहस कैसे हो सकता है कि वह राजा राजा के ही कक्ष में और उनके बगल में सो जाए। ये तो सरासर आत्‍महत्‍या ही होगी और मैं दूसरे राज्‍य से इस राज्‍य में आत्‍महत्‍या करने क्‍यों आऊंगा?

राजा को पण्डित की बात थोडी उपयुक्‍त लगी लेकिन राजा ने सोंचा कि शायद वह पण्डित मृत्‍यु से बचने के लिए ही महाकाल और अपनी मृत्‍यु की भविष्‍यवाणी का बहाना बना रहा है। इसलिए उसने पण्डित से कहा कि- यदि तुम्‍हारी बात सत्‍य है और आज तुम्‍हारी मृत्‍यु का दिन है, जैसा कि महाकाल ने तुमसे कहा है तो तुम्‍हारी मृत्‍यु का कारण मैं नहीं बनूंगा!

लेकिन यदि तुम झूठ कह रहे हो तो निश्चित ही आज तुम्‍हारी मृत्‍यु का दिन है।_

चूंकि पड़ोसी राज्‍य का राजा उसका मित्र था इसलिए उसने तुरन्‍त कुछ सिपाहियों के साथ दूसरे राज्‍य के राजा के पास पत्र भेजा और पण्डित की बात की सत्‍यता का प्रमाण मांगा।

शाम तक भेजे गए सैनिक फिर से लौटे और उन्‍होंने आकर बताया कि- महाराज, पण्डित जो कह रहा है, वह सच है। दूसरे राज्‍य के राजा ने पण्डित को अपने महल में ही रहने की सम्‍पूर्ण व्‍यवस्‍था दे रखी थी और पिछले 6 महीने से ये पण्डित राजा का मेहमान था। कल रात राजा स्‍वयं इससे अन्तिम बार इसके शयन कक्ष में मिले थे और उसके बाद ये इस राज्‍य में कैसे पहुंच गया, इसकी जानकारी किसी को नहीं है। इसलिए उस राज्‍य के राजा के अनुसार पण्डित को फांसी की सजा दिया जाना उचित नहीं है।

लेकिन अब राजा के लिए एक नई समस्‍या आ गई। चूंकि उसने बिना पूरी बात जाने ही पण्डित को फांसी की सजा सुना दी थी इसलिए अब यदि पण्डित को फांसी न दी जाए तो राजा के कथन का अपमान हो और यदि राजा द्वारा दी गई सजा का मान रखा जाए तो पण्डित की बेवजह मृत्‍यु हो जायेगी

राजा ने अपनी इस समस्‍या का जिक्र अपने अन्‍य मंत्रियों से किया और सभी मंत्रियों ने आपस में चर्चा कर ये सुझाव दिया कि- महाराज! आप पण्डित को कच्‍चे सूत के एक धागे से फांसी लगवा दें। इससे आपके वचन का मान भी रहेगा और सूत के धागे से लगी फांसी से पण्डित की मृत्‍यु भी नहीं होगी, जिससे उसके प्राण भी बच जाऐंगे।

राजा को ये विचार उपयुक्‍त लगा और उसने ऐसा ही आदेश सुनाया। पण्डित के लिए सूत के धागे का फांसी का फन्‍दा बनाया गया और नियमानुसार पण्डित को फांसी पर चढाया जाने लगा। सभी खुश थे कि न तो पण्डित मरेगा, न राजा का वचन झूठा पड़ेगा।
पण्डित को भी विश्‍वास था कि सूत के धागे से तो उसकी मृत्‍यु नहीं होगी इसलिए वह भी खुशी- खुशी फांसी चढ़ने को तैयार था! जैसा कि महाकाल ने उसे कहा था।

लेकिन जैसे ही पण्डित को फांसी दी गई- सूत का धागा तो टूट गया! लेकिन टूटने से पहले उसने अपना काम कर दिया क्योंकि पण्डित के गले की नस कट चुकी थी उस सूत के धागे से और पण्डित जमीन पर पड़ा तड़प रहा था! हर धड़कन के साथ उसके गले से खून की फूहार निकल रही थी और देखते ही देखते कुछ ही क्षणों में पण्डित का शरीर पूरी तरह से शान्‍त हो गया। सभी लोग आश्‍चर्यचकित, हक्‍के-बक्‍के से पण्डित को मरते हुए देखते रहे! किसी को विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि एक कमजाेर से सूत के धागे से किसी की मृत्‍यु हो सकती है?
लेकिन घटना घट चुकी थी! नियति ने अपना काम कर दिया था।

सच ही कहा है कि – नियति के आगे सभी को नत मस्तक होना होता है!
जब, जो होना होता है, वह होकर ही रहता है। हम चाहे जितनी सावधानियां बरतें या चाहे जितने ऊपाय कर लें लेकिन हर घटना और उस घटना का सारा ताना-बाना पहले से निश्चित है – जिसे हम रत्‍ती भर भी इधर-उधर नहीं कर सकते।

इसीलिए ईश्‍वर ने सभी को भविष्‍य जानने की क्षमता नहीं दी है ताकि लोग अपने जीवन को ज्‍यादा बेहतर तरीके से जी सकें।

विधिना ने लिख दिया, छठी रात के अंत!
राई घटे न तिल बड़े, रह रे जीव निशंक !!

Love – Prem

प्रेम

एक बार एक पुत्र अपने पिता से रूठ कर घर छोड़ कर दूर चला गया और फिर इधर उधर यूँही भटकता रहा। दिन बीते, महीने बीते और साल बीत गए |
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एक दिन वह बीमार पड़ गया | अपनी झोपडी में अकेले पड़े उसे अपने पिता के प्रेम की याद आई कि कैसे उसके पिता उसके बीमार होने पर उसकी सेवा किया करते थे | उसे बीमारी में इतना प्रेम मिलता था कि वो स्वयं ही शीघ्र अति शीघ्र ठीक हो जाता था | उसे फिर एहसास हुआ कि उसने घर छोड़ कर बहुत बड़ी गलती की है, वो रात के अँधेरे में ही घर की और हो लिया।
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जब घर के नजदीक गया तो उसने देखा आधी रात के बाद भी दरवाज़ा खुला हुआ है | अनहोनी के डर से वो तुरंत भाग कर अंदर गया तो उसने पाया की आंगन में उसके पिता लेटे हुए हैं | उसे देखते ही उन्होंने उसका बांहे फैला कर स्वागत किया | पुत्र की आँखों में आंसू आ गए |

उसने पिता से पूछा “ये घर का दरवाज़ा खुला है, क्या आपको आभास था कि मैं आऊंगा?” पिता ने उत्तर दिया “अरे पगले ये दरवाजा उस दिन से बंद ही नहीं हुआ जिस दिन से तू गया है, मैं सोचता था कि पता नहीं तू कब आ जाये और कंही ऐसा न हो कि दरवाज़ा बंद देख कर तू वापिस लौट जाये |”
ठीक यही स्थिति उस परमपिता परमात्मा की है | उसने भी प्रेमवश अपने भक्तो के लिए द्वार खुले रख छोड़े हैं कि पता नहीं कब भटकी हुई कोई संतान उसकी और लौट आए।i
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हमें भी आवश्यकता है सिर्फ इतनी कि उसके प्रेम को समझे और उसकी और बढ़ चलें।
🙏🙏
जो प्राप्त है-पर्याप्त है
जिसका मन मस्त है
उसके पास समस्त है!!

The fear of death changes life

मृत्यु का भय जीवन को बदल देता है

एक बार की बात है सन्त तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था! उनके समक्षआया और बोला, *”गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं? ना आप किसी पर क्रोध करते हैंऔर ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं?”
कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए।

सन्त बोले, ”मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जानता हूँ!”
मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?” ,शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।”
तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!”, सन्त तुकाराम दुखी होते हुए बोले।

कोई और कहता तो शिष्य ये बात मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं सन्त तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था?

शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहांँ से चला गया। उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पर क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान-सुमिरणऔर पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया हो और उनसे माफ़ी मांँगता।

देखते-देखते सन्त की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये।
शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं।
वह उनके समक्ष पहुंँचा और बोला, ”गुरु जी, मेरा समय पूरा होने वाला है,कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!”

“मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र! गुरु जी ने प्यार से उसे कहते हुए उससे पूछा, अच्छा, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?”,

शिष्य तत्परता से बोला कि नहीं-नहीं, महाराज, बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे,मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था?मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी’!

सन्त तुकाराम मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरेअच्छे व्यवहार का रहस्य है।”
मैं जानता हूँ कि एक न एक दिन मुझे इस संसार से जाना है इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।

शिष्य समझ गया कि सन्त तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था।

अगर हम नियमित सेवा, सत्संग और साधना अभ्यास करते हैं तो हमको निन्दा, चुगली और तेरी-मेरी व्यर्थ की बातों में पढने की जरुरत ही नहीं है!
भजन-सुमिरण के सतत अभ्यास अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना चाहिए। यही मनुष्य जीवन का सार है।

बाकी एक ना एक दिन जाना सबने है –
आये हैं सो जायेंगे, राजा रंक फकीर!
कोई सिंहासन चढ चला, कोई बंधे जंजीर!!

How much wealth, happiness, prosperity, status, muscle power a person has, these are all external appearances.

राजा के दरबार में.
एक आदमी नौकरी मांगने के लिए आया! तो उस व्यक्ति से उसकी क़ाबलियत पूछी गई।

तो वो बोला-
मैं आदमी हो चाहे जानवर, उसकी शक्ल देख कर उसके बारे में बता सकता हूँ.!
राजा ने उसे अपने खास “घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज” बना दिया।

कुछ ही दिन बाद राजा ने उससे अपने सब से महंगे और मनपसन्द घोड़े के बारे में पूछा, तो उसने कहा..
घोड़ा नस्ली नही है.!

राजा को हैरानी हुई,
उसने जंगल से घोड़े वाले को बुला कर पूछा, उसने बताया घोड़ा नस्ली तो हैं, पर इसके पैदा होते ही इसकी मां मर गई थी।
इसलिए ये एक गाय का दूध पी कर उसके साथ पला बढ़ा है।
राजा ने अपने नौकर को बुलाया और पूछा तुम को कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं??
“उसने कहा- “जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके खाता है, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुह में लेकर सर उठा लेता है।

राजा उसकी काबलियत से बहुत खुश हुआ,
उसने नौकर के घर अनाज ,घी, मुर्गे, और ढेर सारी बकरियां बतौर इनाम भिजवा दिए।
और अब उसे रानी के महल में तैनात कर दिया।
कुछ दिनो बाद राजा ने उससे रानी के बारे में राय मांगी,
उसने कहा,
“तौर तरीके तो रानी जैसे हैं, लेकिन पैदाइशी नहीं हैं।
राजा के पैरों तले जमीन निकल गई, उसने अपनी सास को बुलाया,

सास ने कहा..
ये हक़ीक़त है कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था,लेकिन हमारी बेटी 6 महीने में ही मर गई थी, लिहाज़ा हम ने आपके रजवाड़े से करीबी रखने के लिए किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया।

राजा ने फिर अपने नौकर से पूछा,
“तुम को कैसे पता चला??

“”उसने कहा-
“रानी साहिबा का नौकरो के साथ सुलूक गंवारों से भी बुरा है,
एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक तरीका होता है,
जो रानी साहिबा में बिल्कुल नही है।

राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ,
और फिर से बहुत सारा अनाज भेड़ बकरियां बतौर इनाम दी।
साथ ही उसे अपने दरबार मे तैनात कर लिया!
कुछ वक्त गुज़रा,
राजा ने फिर नौकर को बुलाया, और अपने बारे में पूछा,
नौकर ने कहा
“जान की सलामती हो तो कहूँ”
राजा ने वादा किया तो उसने कहा, “न तो आप राजा के बेटे हो”
और न ही आपका चलन राजाओं वाला है।

राजा को बहुत गुस्सा आया,
मगर जान की सलामती का वचन दे चुका था, राजा सीधा

अपनी मां के महल पहुंचा…मां ने कहा,
ये सच है,
तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी, तो तुम्हे गोद लेकर हम ने पाला।
राजा ने नौकर को बुलाया और पूछा,
बता, “भोई वाले तुझे कैसे पता चला???
उसने कहा
जब राजा किसी को “इनाम दिया करते हैं, तो हीरे मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं।
लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें दिया करते हैं।
ये रवैया किसी राजा का नही, किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है।

किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, बाहुबल हैं ये सब बाहरी दिखावा हैं।

इंसान की असलियत की पहचान,
उसके व्यवहार और उसकी नियत से होती है।

The person whose breath goes away, his everything ends.

जिस भी मनुष्य का स्वांस चला जाता है उसका सबकुछ खत्म हो जाता है ।

सारे जीवन मनुष्य और सारी चीजों पर ध्यान देता है, रखता है पर अपनी स्वांस पर कभी ध्यान वो नहीं देता है।

जिस स्वांस की वजह से मनुष्य इस जीवन के अस्तित्व में है और सबकुछ है।
सबसे पहले वो उसी को बिसरा देता है, भूल जाता है।

ऐसी स्थिति में मनुष्य का कल्याण कैसे संभव है?

मनुष्य को स्वांस का ध्यान आता कब है जब उसका जाने लगता है तब उसको ख्याल आता है कि अरे बाप रे बाप अब क्या होगा, ये तो जा रहा है!

तब वह घबराता है, रोता है, पछताता है कि जिस स्वांस पर मुझे ध्यान देना चाहिए था उसको तो मैं भूल ही गया!

और अपनी पूरी की पूरी शक्ति लगा देता है कि एक और मिल जाय पर ना भाई ना और अब नहीं, अब तुम्हारा समय समाप्त!

स्वांस का कानून ही यही है भाई चाहे कोई भी हो चाहे राजा हो या भिखारी ये किसी को नहीं जानता है ।

स्वांस का भी अपना एक अटल कानून है कि ये जबतक आता है तो आता है जब जाता है तो जाता है फिर संसार कि कोई भी ताकत इसको वापस नहीं बुला सकती है, इसके साथ किसी की भी सिफारिश काम नहीं आती है ।इसके मामले में किसी भी रिश्वत का आदान-प्रदान नहीं होता है, ये पूर्णतया ईमानदार है ।
इसलिए,
शुक्रगुजार रहें। सकारात्मक रहें, सच्चे रहें! सच्चाई को समझें।

  • Prem Rawat

glory of satsang

सतसंग की महिमा

अशान्ति, परेशानियाँ तब शुरू हो जाती हैं । जब मनुष्य के जीवन में सतसंग नहीं होता।

मनुष्य का जीवन आगे बढ़ता चला जा रहा है। लेकिन मनुष्य इस बारे में नहीं सोचता कि जीवन को कैसे जीना चाहिए!
मनुष्य ने धन कमा लिया, मकान बना लिया, शादी घर परिवार बच्चे सब हो गये, गाड़ी खरीद ली, – यह सब कर लेने के बाद भी मनुष्य का जीवन सफल नहीं हो पायेगा।

क्योंकि जिसके लिए यह जीवन मिला उसको तो मनुष्य ने समय दिया ही नहीं और संसार की वस्तुयें जुटाने में समय नष्ट कर दिया।
जीवन मिला था भगवान के भजन सुमिरण के लिए।
लेकिन मनुष्य माया का दास बनकर माया की प्राप्ति के लिए इधर – उधर भटकने लगता है और इस तरह मनुष्य का यह कीमती जीवन नष्ट हो जाता है।

जिस अनमोल रतन मानव जीवन को पाने के लिए देवता लोग भी तरसते रहते हैं। उस मानव जीवन को मनुष्य ब्यर्थ गवाँ देता है।

देवता लोगों के पास भोगों की कमी नहीं है! लेकिन फिर भी देवता लोग मनुष्य जीवन जीना चाहते हैं।

क्योंकि मनुष्य देह पाकर ही भक्ति का पूर्ण आनन्द और श्री गुरू महाराज जी की सेवा और सन्तों की कृपा से सतसंग का सानिध्य मिलता है।

सन्तो के संग से मिलने वाला आनन्द तो बैकुण्ठ में भी दुर्लभ है।

कबीर जी कहते हैं कि –
राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय!
जो सुख साधु संग में, सो बैकुण्ठ न होय!

रामचरित्रमानस मेंं भी लिखा है कि–
तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिए तुला एक अंग!
तुल न ताहि सकल मिली, जो सुख लव सतसंग!
हे तात ! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जायें।
तब भी वह सब सुख मिलकर भी दूसरे पलड़े पर रखे हुए सत्संग बराबर नहीं हो सकते। जो क्षण मात्र की सतसंग से मिलता है ।

सतसंग से मनुष्य को जीवन जीने का तरीका पता चलता है।

सतसंग से ही मनुष्य को अपने वास्तविक कर्तव्य का पता चलता है।
मानस में लिखा है कि –
सत संगत मुद मंगल मूला!
सोईं फल सिद्धि सब साधन फूला!
अर्थात सतसंग सब मंँगलों का मूल है।

जैसे फूल से फल और फल से बीज और बीज से बृक्ष होता है । उसी प्रकार सतसंग से विवेक जागृत होता है और विवेक जागृत होने पर भगवान से प्रेम होता है और प्रेम से प्रभु की प्राप्ति होती है। सतसंग से मनुष्य के करोड़ों – करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं – सतसंग से मनुष्य का मन बुद्धि शुद्ध होती है। सतसंग से ही भक्ति मजबूत होती है ।भगवान की जब कृपा होती है । तब मनुष्य को सतसंग और सन्तों का संग प्राप्त होता है।

कहा है –
एक घडी आधी घडी आधी ते पुनि आध!
तुलसी संगत साध की हरे कोटि अपराध!

आज मनुष्य हर पल चिन्तित रहने लगता है और हमेशा परेशान रहता है।

इन सब का कारण अज्ञानता है!
जब हम कोई मशीन घर में लेकर आते हैं तो उसके साथ एक बुकलेट भी मिलती है । जिसमें मशीन को कैसे चलाना है, इस बारे में लिखा होता है।

उसी प्रकार भगवान ने जब यह मानव शरीर दिया और इस मानव जीवन को सफल कैसे करना है – यह भी वेद-शास्त्र रुपी बुकलेट के सतसंग और सन्तों से पता चलता है।

इसलिए जीवन से सतसंग को अलग नहीं करना चाहिए!

जब सतसंग जीवन में नहीं रहेगा तो संसार के प्रति आकर्षण बढ़ेगा और संसार के प्रति मोह, मनुष्य के जीवन को विनाश की तरफ ले जाता है।

सतसंग की अग्नि में मनुष्य के सारे विकार नष्ट हो जाते हैं –

आनन्द कहीं बाहर नहीं है वो भीतर ही है लेकिन मनुष्य के मन के चारों तरफ संसार के मोह की चादर लपेट रखीं है।

इसलिए वो आनन्द ढक जाता है और महसूस नहीं होता – और जब सतसंग से और गुरु दरबार की सेवा से, महाराज जी के दर्शन करने से मोह रुपी चादर हट जाती है।

तब आनन्द ही आनन्द मिलने लगता है। जीवन में जो भी अशान्ति, परेशानी, विकार आदि रहते हैं उनको सतसंग हटा देता है और मनुष्य को एक निर्मल चरित्र बना देता है । इसलिए कहा है कि –
जाने बिनु न होय परतीति,
बिनु परतिती होई न प्रीति!!

जब तक श्री गुरु महाराज जी के चरणों में पूर्ण समर्पण नहीं होगा।तब तक विवेक जागृत नहीं होगा –
बिनु सतसंग विवेक न होई –

इसलिए जीवन में सतसंग को हमेशा बनाये रखना चाहिए और जब भी जहांँ भी सतसंग सुनने या सतसंग में जाने का मौका मिले तो दुनिया वालों की परवाह कियें बिना ही पहुंँच जाना चाहिये!

  जय सच्चिदानन्द

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Find the way in yourself!

खुद में रा़स्ता ढूढ़े!

एक बार स्वामी विवेकानन्द के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुःखी लग रहा था। वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला कि महाराज मैं अपने जीवन से बहुत दुःखी हूँ! मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ – काफी लगन से भी काम करता हूँ; लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया।
भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ।
स्वामी जी उस व्यक्ति की परेशानी को पल भर में ही समझ गए। उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा सा पालतू कुत्ता था!
उन्होंने उस व्यक्ति से कहा– तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा।

आदमी ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा। काफी देर तक अच्छी खासी सैर करा कर जब वो व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहुँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था जबकि कुत्ता हाँफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था।

स्वामी जी ने व्यक्ति से कहा कि ये कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया जबकि तुम तो अभी भी साफ सुथरे और बिना थके दिख रहे हो?

तो उस व्यक्ति ने कहा कि मैं तो सीधा साधा अपने रास्ते पर चल रहा था लेकिन ये कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था। हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसीलिए ये थक गया है।

स्वामी जी ने मुस्कुरा कर कहा- यही तुम्हारे सभी प्रश्नों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आस पास ही है वो ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पर जाने की बजाय; दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले जाते हो!

जब आत्म ज्ञान प्राप्त होता है तो मतभेदों की धारणा से उत्पन्न होने वाले सभी भय दूर होने लगते हैं और व्यक्ति इस संसार के दुखों को पार करने में सक्षम हो जाता है। 
यही एक ब्रह्मज्ञानी के अनुभव की स्थिति और सच्ची भक्ति का आधार है!
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We don’t want money, we want peace!

धन नही चैन चाहिए!

एक गरीब आदमी था।वो हर रोज नजदीक के मंदिर में जाकर वहां साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था। अक्सर वो अपने भगवान से कहता कि मुझे आशीर्वाद दीजिए तो मेरे पास ढेर सारा धन-दौलत आ जाए।

एक दिन ठाकुर जी ने बाल रूप में प्रगट हो उस आदमी से पूछ ही लिया कि क्या तुम मन्दिर में केवल इसीलिए, काम करने आते हो।

उस आदमी ने पूरी ईमानदारी से कहा कि हां!
मेरा उद्देश्य तो यही है कि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाए, इसीलिए तो आपके दर्शन करने आता हूं। पटरी पर सामान लगाकर बेचता हूं। पता नहीं, मेरे सुख के दिन कब आएंगे।

बाल रूप ठाकुर जी ने कहा कि – तुम चिंता मत करो। जब तुम्हारे सामने अवसर आएगा तब ऊपर वाला तुम्हें आवाज थोड़ी लगाएगा। बस, चुपचाप तुम्हारे सामने अवसर खोलता जाएगा।

युवक चला गया।
समय ने पलटा खाया, वो अधिक धन कमाने लगा। इतना व्यस्त हो गया कि मन्दिर में जाना ही छूट गया।

कई वर्षों बाद वह एक दिन सुबह ही मन्दिर पहुंचा और साफ-सफाई करने लगा।

ठाकुर जी फिर प्रगट हुए और उस व्यक्ति से बड़े ही आश्चर्य से पूछा- क्या बात है, इतने बरसों बाद आए हो, सुना है बहुत बड़े सेठ बन गए हो।

वो व्यक्ति बोला- बहुत धन कमाया। अच्छे घरों में बच्चों की शादियां की! पैसे की कोई कमी नहीं है पर दिल में चैन नहीं है। ऐसा लगता था रोज सेवा करने आता रहूं पर आ ना सका।

फिर व्यक्ति भरे मन से बोला, हे प्रभू, आपने मुझे सब कुछ दिया पर जिंदगी का चैन नहीं दिया?

प्रभू जी ने कहा कि तुमने वह मांगा ही कब था? जो तुमने मांगा वो तो तुम्हें मिल गया ना। फिर आज यहां क्या करने आए हो?

उसकी आंखों में आंसू भर आ गये; ठाकुर जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला – अब कुछ मांगने के लिए सेवा नहीं करूंगा। बस दिल को शान्ति मिल जाए।

ठाकुर जी ने कहा- पहले तय कर लो कि अब कुछ मागने के लिए मन्दिर की सेवा नहीं करोगे और मन की शांति के लिए ही आओगे!

ठाकुर जी ने समझाया कि चाहे मांगने से कुछ भी मिल जाए पर दिल का चैन कभी नहीं मिलता! इसलिए सेवा के बदले कुछ मांगना नहीं है।
वो व्यक्ति बड़ा ही उदास होकर ठाकुर जी को देखता रहा और बोला- मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप बस, मुझे सेवा करने का मौका दीजिए।

सच में, मन की शांति सबसे अनमोल है जिसे समय के सद्गुरु की सेवा से महसोस किया जाता सकता है!
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