cost of man

मनुष्य की कीमत

एक बालक अपने पिता के साथ लोहे की दुकान में काम करता था। एक दिन बालक ने अचानक ही अपने पिता से पूछा – “पिताजी इस दुनिया में मनुष्य की क्या कीमत होती है?”

पिताजी एक छोटे से बच्चे से ऐसा गम्भीर सवाल सुन कर हैरान रह गये। फिर वे बोले “बेटे एक मनुष्य की कीमत आँकना बहुत मुश्किल है, वो तो अनमोल है।”
बालक ने फिर पूछा – क्या सभी उतना ही कीमती और महत्त्वपूर्ण हैं?
पिताजी – हाँ बेटे।
बालक कुछ समझा नहीं उसने फिर सवाल किया – तो फिर इस दुनिया में कोई गरीब तो कोई अमीर क्यो है? किसी की कम रिस्पेक्ट तो किसी की ज्यादा क्यो होती है?
सवाल सुनकर पिताजी कुछ देर तक शान्त रहे और फिर बालक से स्टोर रूम में पड़ा एक लोहे का रॉड लाने को कहा!
लोहे की रॉड लाते ही पिताजी ने पूछा – इसकी क्या कीमत होगी?
बालक बोला – करीब 200 रूपये!
पिताजी बोले – *अगर मैं इसके बहुत से छोटे-छटे कील बना दूँ तो इसकी क्या कीमत हो जायेगी?
बालक कुछ देर सोच कर बोला – *तब तो ये और महंँगा बिकेगा लगभग 1000 रूपये का!?
फिर पिताजी कहा कि – अगर मैं इस लोहे से घड़ी के बहुत सारे स्प्रिंग बना दूँ तो?

बालक कुछ देर गणना करता रहा और फिर एकदम से उत्साहित होकर बोला – ”तब तो इसकी कीमत बहुत ज्यादा हो जायेगी।”

फिर पिताजी उसे समझाते हुए बोले – “ठीक इसी तरह मनुष्य की कीमत इसमें नहीं है कि अभी वो क्या है, बल्कि इसमें है कि वो अपने आप को क्या बन सकता है!”
अब बालक अपने पिता की बात समझ चुका था।

यह बात सत्य हैं कि यह मानव चोला जो हमें मिला है यह देव दुर्लभ है!
इसमें अथाह शक्ति और संभावनाएं निहित हैं! हमारा यह जीवन हमेशा सम्भावनाओ से भरा होता है। हमारे जीवन में कई बार परिस्थितियाँ अच्छी नही होती है,पर इससे हमारी कीमत कम नहीं होती है।

मनुष्य के रूप में हमारा जन्म इस दुनिया मे भगवान का भजन-सुमिरण करने के लिए हुआ है ।हमें अपने सदगुरु जी की सेवा करके, उनसे आत्मज्ञान जानकर मनुष्य जीवन को सफल बनाना चाहिए। यही जीवन का सच्चा उद्देश्य है!
संतों ने भी कहा है कि –
नर तन पाय यतन कर ऐसा, जिससे वह करतार मिले!
एसी उत्तम योनी पदारथ, फिर नहीं बारम्बार मिले!
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account for four annas

चार आने का हिसाब

बहुत समय पहले की बात है! चंदनपुर का राजा बड़ा प्रतापी था! दूर-दूर तक उसकी समृद्धि की चर्चाएं होती थी! उसके महल में हर एक सुख-सुविधा की वस्तु उपलब्ध थी! पर फिर भी अंदर से उसका मन अशांत रहता था। बहुत से विद्वानो से मिला! किसी से कोई हल प्राप्त नहीं हुआ! उसे शांति नहीं मिली।

एक दिन भेष बदल कर राजा अपने राज्य की सैर पर निकला। घूमते- घूमते वह एक खेत के निकट से गुजरा ही था कि तभी उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी , किसान ने फटे-पुराने वस्त्र धारण कर रखे थे और वह पेड़ की छाँव में बैठ कर भोजन कर रहा था।

किसान के वस्त्र देख राजा के मन में आया कि वह किसान को कुछ स्वर्ण मुद्राएं दे दें ताकि उसके जीवन मे कुछ खुशियां आ पाये।

राजा किसान के सम्मुख जा कर बोला – मैं एक राहगीर हूँ! मुझे तुम्हारे खेत पर ये चार स्वर्ण मुद्राएँ गिरी मिलीं ! चूँकि यह खेत तुम्हारा है इसलिए *ये मुद्राएं तुम ही रख लो।

किसान बोला – ना – ना सेठ जी, ये मुद्राएं मेरी नहीं हैं! इसे आप ही रखें या किसी और को दान कर दें! मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं।

राजा को किसान की यह प्रतिक्रिया राजा को बड़ी अजीब लगी! वह बोला – धन की आवश्यकता किसे नहीं होती भला आप लक्ष्मी को ना कैसे कर सकते हैं?

किसान बोला – सेठ जी, मैं रोज चार आने कमा लेता हूँ और उतने में ही प्रसन्न रहता हूँ!

राजा ने अचरज से पूछा कि क्या? आप सिर्फ चार आने की कमाई करते हैं और उतने में ही प्रसन्न रहते हैं , यह कैसे संभव है?

किसान बोला – सेठ जी, प्रसन्नता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आप कितना कमाते हैं या आपके पास कितना धन है! प्रसन्नता उस धन के प्रयोग पर निर्भर करती है।

राजा ने उपहास के लहजे में प्रश्न किया कि तो तुम इन चार आने का क्या-क्या कर लेते हो?

किसान भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहता था उसने आगे बढ़ते हुए उत्तर दिया कि –
इन चार आनो में से –
एक को मैं कुएं में डाल देता हूँ!
दूसरे से कर्ज चुका देता हूँ!
तीसरा उधार में दे देता हूँ!
और चौथा मिटटी में गाड़ देता हूँ!

राजा सोचने लगा , उसे यह उत्तर समझ नहीं आया। वह किसान से इसका अर्थ पूछना चाहता था पर वो जा चुका था।

राजा ने अगले दिन ही सभा बुलाई और पूरे दरबार में कल की घटना कह सुनाई और सबसे किसान के उस कथन का अर्थ पूछने लगा।

दरबारियों ने अपने-अपने तर्क पेश किये पर कोई भी राजा को संतुष्ट नहीं कर पाया तो अंत में किसान को ही दरबार में बुलाने का निर्णय लिया गया।

बहुत खोज-बीन के बाद किसान मिला और उसे कल की सभा में प्रस्तुत होने का निर्देश दिया गया।

राजा ने किसान को उस दिन अपने भेष बदल कर भ्रमण करने के बारे में बताया और सम्मान पूर्वक दरबार में बैठाया और उस किसान से पुछा कि मैं तुम्हारे उत्तर से प्रभावित हूँ और तुम्हारे चार आने का हिसाब जानना चाहता हूँ! बताओ, तुम अपने कमाए चार आने किस तरह खर्च करते हो जो तुम इतना प्रसन्न और संतुष्ट रह पाते हो?

किसान बोला, *हुजूर , जैसा की मैंने बताया था कि –
मैं एक आना कुएं में डाल देता हूँ यानि अपने परिवार के भरण-पोषण में लगा देता हूँ!
दूसरे से मैं कर्ज चुकता हूँ यानि इसे मैं अपने वृद्ध माँ-बाप की सेवा में लगा देता हूँ!
तीसरा मैं उधार दे देता हूँ यानि अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में लगा देता हूँ!
और चौथा मैं मिटटी में गाड़ देता हूँ यानि मैं एक पैसे की बचत कर लेता हूँ ताकि समय आने पर मुझे किसी से माँगना ना पड़े और मैं इसे धार्मिक ,सामजिक या अन्य आवश्यक कार्यों में लगा सकूँ।

राजा को अब किसान की बात समझ आ चुकी थी। राजा की समस्या का समाधान हो चुका था! वह जान चुका था कि यदि उसे प्रसन्न एवं संतुष्ट रहना है तो उसे भी अपने अर्जित किये धन का सही-सही उपयोग करना होगा।

आज के माहोल में देखा जाए तो पहले की अपेक्षा लोगों की आमदनी बढ़ी है पर क्या उसी अनुपात में हमारी प्रसन्नता भी बढ़ी है?

पैसों के मामलों में हम भी कहीं न कहीं गलती कर रहे हैं! जीवन को संतुलित बनाना ज़रूरी है और इसके लिए हमें अपनी आमदनी और उसके इस्तेमाल पर ज़रूर गौर करना चाहिए, नहीं तो भले हम लाखों रूपये कमा लें पर फिर भी उस राजा के समान प्रसन्न एवं संतुष्ट नहीं रह पाएंगे!

कहा भी है कि –
विपत्ति भए धन ना रहें, रहें जो लाख करोर।
नभ तारे छिप जात है, ज्यों रहीम यह भोर।
यानी – जिस प्रकार सवेरा होते ही समस्त तारे छिप जाते हैं उसी प्रकार विपत्ति आने पर धन संपत्ति भी चली जाती है- भले वह लाखों करोड़ों में क्यों न हो!

The witness of our deeds – resides within us!

हमारे कर्मों का साक्षी – हमारे ही अन्दर विराजमान है!

बात पुरानी बात है, उन दिनों आज की तरह स्कूल नही होते थे! गुरुकुल शिक्षा प्रणाली थी और छात्र गुरुकुल में ही रहकर पढ़ते थे! उन्हीं दिनों की बात है!

एक विद्वान पण्डित थे, उनका नाम था- राधे गुप्त! उनका गुरुकुल बड़ा ही प्रसिद्ध था! जहाँ दूर दूर से बालक शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे।

राधे गुप्त की पत्नी का देहांत हो चुका था! उनकी उम्र भी ढलने लगी थी! घर में विवाह योग्य एक कन्या थी – जिसकी चिंता उन्हें हर समय सताती थी! पण्डित राधे गुप्त उसका विवाह ऐसे योग्य व्यक्ति से करना चाहते थे- जिसके पास सम्पति भले न हो पर बुद्धिमान हो।

एक दिन उनके मन में विचार आया! उनहोंने सोचा कि क्यों न वे अपने शिष्यों में ही योग्य वर की तलाश करें!
ऐसा विचार कर उन्होंने बुद्धिमान शिष्य की परीक्षा लेने का निर्णय लिया!

उन्होंने सभी शिष्यों को एकत्र किया और उनसे कहा-*मैं एक परीक्षा आयोजित करना चाहता हूँ!
इसका उद्देश्य यह जानना है कि कौन सबसे ज्यादा बुद्धिमान है।

मेरी पुत्री विवाह योग्य हो गईं है और मुझे उसके विवाह की चिंता है! लेकिन मेरे पास पर्याप्त धन नहीं है!
इसलिए मैं चाहता हूँ कि सभी शिष्य विवाह में लगने वाली सामग्री एकत्र करें! भले ही इसके लिए चोरी का रास्ता क्यों न चुनना पड़े! लेकिन सभी को एक शर्त का पालन करना होगा! शर्त यह है कि किसी भी शिष्य को चोरी करते हुए कोई देख न सके।

अगले दिन से सभी शिष्य अपने अपने काम में जुट गये! हर दिन कोई न कोई न कोई शिष्य अलग अलग तरह की वस्तुएं चुरा कर ला रहा था और गुरूजी को दे रहा था! राधे गुप्त उन वस्तुओं को सुरक्षित स्थान पर रखते जा रहे थे! क्योंकि परीक्षा के बाद उन्हें सभी वस्तुएं उनके मालिक को वापिस करनी थी।

परीक्षा से वे यही जानना चाहते थे कि कौन सा शिष्य उनकी बेटी से विवाह करने योग्य है!
सभी शिष्य अपने अपने दिमाग से कार्य कर रहे थे!

लेकिन उनमें से एक छात्र रामास्वामी, जो गुरुकुल का सबसे होनहार छात्र था, चुपचाप एक वृक्ष के नीचे बैठा कुछ सोच रहा था।

उसे सोच में बैठा देख राधे गुप्त ने कारण पूछा!
रामास्वामी ने बताया कि आपने परीक्षा की शर्त के रूप में कहा था कि चोरी करते समय कोई देख न सके!
लेकिन जब हम चोरी करते हैं, तब हमारी अंतरात्मा तो सब देखती है! हम खुद से उसे छिपा नहीं सकते!
इसका अर्थ यही हुआ न कि चोरी करना व्यर्थ है।

उसकी बात सुनकर राधे गुप्त का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा! उन्होंने उसी समय सभी शिष्यों को एकत्र किया और उनसे पूछा- आप सबने जब चोरी की तो क्या किसी ने आपको देखा?

सभी ने इनकार में सिर हिलाया!

तब राधे गुप्त बोले – बच्चों ! क्या आप अपने अंतर्मन से भी इस चोरी को छुपा सके?

इतना सुनते ही सभी बच्चों ने सिर झुका लिया! इस तरह गुरूजी ने अपनी पुत्री के लिए योग्य और बुद्धिमान वर मिल गया! उन्होंने रामास्वामी के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया! साथ ही शिष्यों द्वारा चुराई गई वस्तुएं उनके मालिकों को वापिस कर बड़ी विनम्रता से क्षमा मांग ली!
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ज्ञान प्राप्त लोगों के लिय यह बात समझना ज्यादा आसान इसलिय हो जाता है कि महाराजी ने हमको प्रत्यक्ष बोध कराया कि तुम्हारा असली मित्र तो तुम्हारे ही अन्दर है!

इसलिय हमें हमेशा अपने हृदय की आवाज को सुनना जरुरी है क्योंकि वही हमारे हर कर्म का साक्षी है!
जिसके माध्यम से हमें सुख-दुःख भोगना होगा!
प्रकृति का नियम यही है कि कर्म हमेशा अपने कर्ता का पीछा करता है!
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When Mother Saraswati broke the pride of Saint Kalidas.

जब माँ सरस्वती जी ने तोड़ा संत कालिदास जी का घमंड।

एक बार कालिदास जी मार्ग से कही जा रहे थे उसी समय उन्हें बहुत प्यास लगी, पास में कुछ महिलाएं कुएं से पानी भर रही थी।

कालिदास बोले :- “माते पानी पिला दीजिए बड़ा पुण्य होगा” !

स्त्री बोली :- बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो।

मैं अवश्य पानी पिला दूंगी।

कालिदास ने कहा :- मैं पथिक हूँ, कृपया पानी पिला दें।

स्त्री बोली :- “तुम पथिक कैसे हो सकते हो?

पथिक तो केवल दो ही हैं सूर्य व चन्द्रमा, जो कभी रुकते नहीं ! हमेशा चलते रहते हैं। तुम इनमें से कौन हो सत्य बताओ।

कालिदास ने कहा :- मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें।

स्त्री बोली :- “तुम मेहमान कैसे हो सकते हो” ? संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन ! इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम ?

(अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे)

कालिदास बोले :- मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें।

स्त्री ने कहा :- “नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है” ! उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है, दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ?

(कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले)

कालिदास बोले :- मैं हठी हूँ ।
.
स्त्री बोली :- “फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें कौन हैं आप” ?

(पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे)

कालिदास ने कहा :- फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ ।
.
स्त्री ने कहा :- “नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो।
मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है!
और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है” !

(कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे)

वृद्धा ने कहा :- उठो वत्स ! (आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी, कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए)

माता ने कहा :- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार । तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा !!

कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े!

इसलिए भक्त को समर्पित और दीनभाव से दीनानाथ के चरणों में शरणागत होना चाहिए!

क्योंकि परमात्मा को दीनानाथ भी कहा गया है ना कि सेठनाथ।

Sudama once asked Shri Krishna – ‘Kanha, I want to see your illusion, how is it?’

सुदामा ने एक बार श्रीकृष्ण से पूछा–‘ कान्हा, मैं आपकी माया के दर्शन करना चाहता हूँ, कैसी होती है?’

श्रीकृष्ण ने टालना चाहा, लेकिन सुदामा की जिद पर श्रीकृष्ण ने कहा–‘अच्छा, कभी वक्त आएगा तो बताऊंगा।

एक दिन कृष्ण ने कहा- सुदामा ! आओ, गोमती में स्नान करने चलें। दोनों गोमती के तट पर गए। वस्त्र उतारे। दोनों नदी में उतरे। श्रीकृष्ण स्नान करके तट पर लौट आए। पीतांबर पहनने लगे।

सुदामा ने देखा – कृष्ण तो तट पर चले गये हैं! मैं एक डुबकी और लगा लेता हूँ और जैसे ही सुदामा ने डुबकी लगाई सुदामा को लगा – गोमती में बाढ़ आ गई है, और वह बहे जा रहे हैं। सुदामा जैसे-तैसे तक घाट के किनारे रुके। घाट पर चढ़े। घूमने लगे। घूमते-घूमते गांव के पास आए और वहाँ एक हथिनी ने उनके गले में फूल माला पहना दी। सुदामा हैरान!

लोग इकट्ठे हो गए। लोगों ने कहा– ‘हमारे देश के राजा की मृत्यु हो गई है। हमारा नियम है, राजा की मृत्यु के बाद हथिनी, जिस भी व्यक्ति के गले में माला पहना दे, वही हमारा राजा होता है। हथिनी ने आपके गले में माला पहनाई है, इसलिए अब आप हमारे राजा हैं।’

सुदामा हैरान हुए कि मैं राजा बन गया। एक राजकन्या के साथ उनका विवाह भी हो गया। दो पुत्र भी पैदा हो गए।

एक दिन सुदामा की पत्नी बीमार पड़ गई! आखिर में मर गई। सुदामा दुख से रोने लगे, उसकी पत्नी जो मर गई थी! जिन्हें वह बहुत चाहता था! सुंदर थी, सुशील थी। लोग इकट्ठे हो गए, उन्होंने सुदामा को कहा, आप रोएं नहीं, आप हमारे राजा हैं। लेकिन रानी जहाँ गई है, वहीं आपको भी जाना है, यह मायापुरी का नियम है। आपकी पत्नी को चिता में अग्नि दी जाएगी। आपको भी अपनी पत्नी की चिता में प्रवेश करना होगा। आपको भी अपनी पत्नी के साथ जाना होगा।

यह सुनकर तो सुदामा की सांस रुक गई! हाथ-पांव फूल गए! अब मुझे भी मरना होगा! मेरी पत्नी की मौत हुई है, मेरी तो नहीं, भला मैं क्यों मरूँ, यह कैसा नियम है ?’

सुदामा अपनी पत्नी की मृत्यु को भूल गये। उसका रोना भी बंद हो गया। अब वह स्वयं की चिंता में डूब गये, कहा भी–‘भई, मैं तो मायापुरी का वासी नहीं हूँ। मुझ पर आपकी नगरी का कानून लागू नहीं होता, मुझे क्यों जलना होगा?

लोग नहीं माने, कहा– अपनी पत्नी के साथ आपको भी चिता में जलना होगा, मरना होगा, यह यहाँ का नियम है।

आखिर सुदामा ने कहा– ‘अच्छा भई, चिता में जलने से पहले मुझे स्नान तो कर लेने दो, ‘पहले तो लोग माने नहीं। फिर बात मान उन्होंने हथियारबंद लोगों की ड्यूटी लगा दी।

सुदामा को स्नान करने दो, देखना कहीं भाग न जाए। रह-रह कर सुदामा रो उठते। सुदामा इतना डर गये कि उनके हाथ-पैर कांपने लगे, वह नदी में उतरे, डुबकी लगाई और फिर जैसे ही बाहर निकले उन्होंने देखा, मायानगरी कहीं भी नहीं, किनारे पर तो कृष्ण अभी अपना पीतांबर ही पहन रहे थे और वह एक दुनिया घूम आये है। मौत के मुँह से बचकर निकले हैं।

सुदामा नदी से बाहर आये और सुदामा रोए जा रहे थे। श्रीकृष्ण हैरान हुए, सबकुछ जानते थे फिर भी अनजान बनते हुए पूछा– ‘सुदामा तुम रो क्यों रो रहे हो?”

सुदामा ने पूछा – ‘कृष्ण मैंने जो देखा है, वह सच था या यह जो मैं देख रहा हूँ ?’

श्रीकृष्ण मुस्कराए और कहा– ‘जो देखा, भोगा वह सच नहीं था, भ्रम था, स्वप्न था, माया थी मेरी और जो तुम अब मुझे देख रहे हो यही सच है। मैं ही सच हूँ। मेरे से भिन्न, जो भी है, वह मेरी माया ही है और जो मुझे ही सर्वत्र देखता है! महसूस करता है, उसे मेरी माया स्पर्श नहीं करती। माया स्वयं का विस्मरण है माया अज्ञान है, माया परमात्मा से भिन्न, माया नर्तकी है नाचती है, नचाती है।’

जो प्रभु से जुड़ा है, वह भ्रम में नाचता नहीं, भ्रमित नहीं होता। माया से निर्लेप रहता है। वह जान जाता है! सुदामा भी जान गये थे!
जो जान गया – वह प्रभु से अलग कैसे रह सकता है?

हम भाग्यशाली हैं कि हमको समय के सद्गुरु का सानिध्य और मार्गदर्शन मिला है!

जिनके लिय ग्रंथीं में लिखा है कि –
बंदउँ गुरु पद कंज, कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज, जासु बचन रबि कर निकर॥
मैं उन गुरु महाराज के चरण कमल की वंदना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं!

हमें भी यह समझना जरूरी है कि समय के महापुरुष नर रूप में साक्षात् हरि होते हैं – जो हमारी मन बुद्धि से परे की लीलाएं करते हैं!

जो शिष्य ह्रदय से उनकी आज्ञा का पालन करता है और अब में जीने का प्रयास करता है तो उनकी कृपा के आवरण में वह सदा सुरक्षित है और उसे साफ साफ समझ में आता है कि असली आनन्द माया के साथ है या मायापति के साथ रहने में!

समझदार को इशारा काफी है!

सुप्रभात

Even after being born at the same time and moment, why is everyone’s karma and fortune different?

एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके कर्म और भाग्य अलग अलग क्यों ?

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों और ज्योतिष प्रेमियों की सभा सभा बुलाकर प्रश्न किया कि “मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना! किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके! आखिर क्यों?इसका क्या कारण है?

राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये! क्या जबाब दें कि एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं?

सब सोच में पड़ गये कि अचानक एक वृद्ध खड़े हुये और बोले – महाराज की जय हो ! आपके प्रश्न का उत्तर भला कौन दे सकता है? आप यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में यदि जाएँ तो वहां पर आपको एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है!

राजा की जिज्ञासा बढ़ी और घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार (गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं!

सहमे हुए राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा; “तेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए मेरे पास समय नहीं है! मैं भूख से पीड़ित हूँ! इसलिय तेरे प्रश्न का उत्तर यहां से कुछ आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं वे दे सकते हैं!”

राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी! पुनः अंधकार और पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा किन्तु यह क्या महात्मा को देखकर राजा हक्का बक्का रह गया! दृश्य ही कुछ ऐसा था!
वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे!

राजा को देखते ही महात्मा ने भी डांटते हुए कहा; ” मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास इतना समय नहीं है, आगे जाओ पहाड़ियों के उस पार एक आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है – जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा! सूर्योदय से पूर्व वहाँ पहुँचो; वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर का दे सकता है!”

सुन कर राजा बड़ा बेचैन हुआ! बड़ी अजब पहेली बन गया उसका प्रश्न! उत्सुकता प्रबल थी! मन ही मन सोचा कि कुछ भी हो यहाँ तक पहुँच चुका हूँ तो वहाँ भी जाकर देखता हूँ- क्या होता है!

राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर किसी तरह प्रातः होने तक उस गाँव में पहुंचा! गाँव में पता किया और उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही और शीघ्रता से बच्चा लाने को कहा; जैसे ही बच्चा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया गया!

राजा को देखते ही बालक ने हँसते हुए कहा; राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है , किन्तु अपना उत्तर सुनो लो –

तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई व राजकुमार थे!

एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में भटक गए। तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे ।
अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली जैसे तैसे हमने चार बाटी सेकीं और अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा आ गये!

अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा – “बेटा मैं दस दिन से भूखा हूँ अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो! मुझ पर दया करो जिससे मेरा भी जीवन बच जाय, इस घोर जंगल से पार निकलने की मुझमें भी कुछ सामर्थ्य आ जायेगी!”

इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले – “तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या आग खाऊंगा? चलो भागो यहां से।

वे महात्मा जी फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही! किन्तु उन भइया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि “बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा? तो मैं क्या अपना मांस नोचकर खाऊंगा!

भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये! मुझ से भी बाटी मांगी तथा दया करने को कहा किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि – चलो, आगे बढ़ो! मैं क्या भूखा मरुँ?

फिर वह बालक बोला – “अंतिम आशा लिये वो महात्मा; हे राजन ! आपके पास आये! आपसे भी दया की याचना की!

सुनते ही आपने उनकी दशा पर दया करते हुये ख़ुशी से अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी!

बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और जाते हुए बोले – “तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा!”

बालक ने कहा – “इस प्रकार हे राजन ! उस घटना के आधार पर हम अपना भोग, भोग रहे हैं!

वास्तव में हम अपने किये का ही भोगते हैं – चाहे इस जन्म का कमे हो या प्रारब्ध का!

धरती पर एक समय में अनेकों फूल खिलते हैं, किन्तु सबके फल रूप, गुण, आकार-प्रकार, स्वाद में भिन्न होते हैं!
इतना कहकर वह बालक मर गया!

आज भी हमारे लिय यह प्रसंग लागू होता है!
जो असंख्य जीवो के लिए दुर्लभ है – वह मनुष्य जन्म हमें दिया!

जहाँ असंख्य जीवो को कूड़ा ढूंढने पर भी भोजन नहीं मिलता
हमें ईश्वर ने धन्यवान कुल में जन्म दिया!

परमात्मा ने शायद हम पर भरोसा किया कि हम सब जीवों में उसका ही प्र्तिरूप देखकर सभी को सुख देंगे!
इसी लिए ईश्वर ने हमे यह सब कुछ दिया!

अब परमात्मा के भरोसे पर खरा उतरने की बारी हमारी है!

between birth and death

जन्म और मृत्यु के बीच

मनुष्य खाली हाथ इस संसार में आता है और खाली हाथ ही यहाँ से विदा लेता है। जन्म और मृत्यु के बीच का उसका समय ऐसा होता है जिसमें वह और और पाने के लिए भटकता रहता है। आयु पर्यन्त वह कोल्हू के बैल की तरह ही खटता रहता है। यह दिन-रात का भटकाव उसका सुख-चैन सब छीन लेता है। वह बिना समय व्यर्थ गंवाए संसार में सब कुछ हासिल कर लेना चाहता है।

वह इस दुनिया के सारे भौतिक सुख अपनी झोली में डाल लेने के लिए आतुर रहता है। पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही उसे सब मिलता है। मनुष्य इस सत्य को भूल जाना चाहता है या नजरअंदाज करना चाहता है कि भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता।

फिर भी हाथ पसारे माँगता रहता है। उसकी एक कामना पूर्ण होती है कि दूसरी के लिए याचना आरंभ हो जाती है। दूसरी के बाद तीसरी, फिर चौथी, पाँचवीं यानी कि यह क्रम चलता रहता है। यदि उसके भाग्य के अनुसार उसकी इच्छा पूरी न हो पाए तो वह उस दाता से नाराज हो जाता है उसे गाली तक दे बैठता है। उस न्यायकारी पर पक्षपात करने का आरोप लगाने से नहीं चूकता।स्वयं को उससे दूर कर लेने की धमकी देता है। हद तो तब होती है जब अपने अहंकार के वशीभूत वह सृष्टि के रचयिता उस स्वामी को रिश्वत देने का प्रयास करता है।

उसे हर उस व्यक्ति से होड़ करनी होती है जिसका भाग्य बलवान है और सब सुविधाओं से संपन्न है। ईश्वर की दया से जिसके पास भौतिक सुख-साधनों की कोई कमी नहीं है।

इस कारण वह कुमार्गगामी हो जाने से परहेज नहीं करता। नीति-अनीति,छल-फरेब, झूठ-सच करने की महारत हासिल कर लेता है।भ्रष्टाचार करना,दूसरों का गला काटना, छीना-झपटी करना,बेईमानी करना,चोरबाजारी करना आदि उसके प्रिय शगल बन जाते हैं। इन समाज विरोधी कार्यों को करते समय वह भूल जाता है कि वह मालिक उसके इन कृत्यों से प्रसन्न नहीं हो रहा।
उसे अच्छा नहीं लगता कि उसके बच्चे ऐसे व्यवहार करने वाले बनें।

इस भौतिक संसार में हम अपने बच्चों से सरलता,ईमानदारी व सच्चाई की अपेक्षा करते हैं वैसा व्यवहार वह ईश्वर हमसे भी चाहता है। बच्चों की गलतियों को सुधारने के लिए हम उन्हें कई प्रकार के दण्ड देते हैं,उनकी पिटाई करते हैं या जेब खर्च बंद कर देते हैं आदि। इसी प्रकार वह परम न्यायकारी भी हमें दण्ड देता है। वह हमें मानसिक व शारीरिक कष्ट देता है, प्रियजनों से वियोग करवा देता है,हमें धन,बल व यश से वंचित कर देता है आदि।

अधर्म से कमाए हुए पैसे के कारण अहंकारी हुए मनुष्य का घमण्ड दूर करने के लिए उसे या उसके परिवारी जनों या बच्चों को बुराइयों में उलझा देता है। गलत रास्ते से कमाई गई धन-संपत्ति को बरबाद कर देता है।

वह प्रभु मनुष्य को सोचने पर विवश कर देता है कि वह इस संसार में खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही उसे यहाँ से जाना है। इस संसार से अपने साथ केवल अपने अच्छे व बुरे कर्मों का लेखा-जोखा लेकर जाता है जो जन्म-जन्मान्तर तक उसके साथी बनते हैं। आने वाले जन्मों की सुख-समृद्धि या बदहाली का कारण बनते हैं।

समय रहते यदि मनुष्य जाग जाए तो अपने लिए मुसीबतों के पहाड़ खड़े करने के स्थान पर वह अपने लिए सुख-शांति का पुरस्कार प्राप्त कर सकता है..!!

विश्वसम फल दायकम

किसी गांँव में राम जी भाई नाम का एक नवयुवक रहता था। वह बहुत मेहनती था,पर हमेशा अपने मन में एक शंका लिए रहता था कि वो अपने कार्य क्षेत्र में सफल होगा या नहीं! कभी-कभी वो इसी चिन्ता के कारण आवेश में आ जाता और दूसरों पर क्रोधित भी हो उठता।_

एक दिन उसके गांँव में एक प्रसिद्ध महात्मा जी का आगमन हुआ। खबर मिलते ही राम जी भाई,महात्मा जी से मिलने पहुंँचा और बोला, “महात्मा जी मैं कड़ी मेहनत करता हूंँ, सफलता पाने के लिए हर-एक प्रयत्न करता हूंँ पर फिर भी मुझे सफलता नहीं मिलती।कृपया आप ही कुछ उपाय बतायें!

महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा, रामजी भाई, तुम्हारी समस्या का समाधान इस चमत्कारी ताबीज में है! मैंने इसके अन्दर कुछ मन्त्र लिख कर डाले हैं जो तुम्हारी हर बाधा दूर कर देंगे। लेकिन इसे सिद्ध करने के लिए तुम्हें एक रात श्मशान घाट में अकेले गुजारनी होगी!”

श्मशान घाट का नाम सुनते ही रामजी भाई का चेहरा पीला पड़ गया।
“लल्ल..ल..लेकिन मैं रात भर अकेले कैसे रहूँगा”…, राम जी भाई काँपते हुए बोला।”
घबराओ मत यह कोई मामूली ताबीज नहीं है! यह हर संकट से तुम्हें बचाएगा! महात्मा जी ने समझाया।_*

रामजी भाई ने पूरी रात श्मशान घाट में बिताई और सुबह होते ही महात्मा जी के पास जा पहुंँचा, “हे महात्मन्!आप महान हैं! सचमुच ये ताबीज दिव्य है! वर्ना मेरा जैसा डरपोक व्यक्ति रात बिताना तो दूर, श्मशान घाट के करीब भी नहीं जा सकता था। निश्चय ही अब मैं सफलता प्राप्त कर सकता हूं!

इस घटना के बाद राम जी भाई बिल्कुल बदल गया! अब वह जो भी करता उसे विश्वास होता कि ताबीज की शक्ति के कारण वह उसमें सफल होगा और धीरे-धीरे यही हुआ भी! वह गांँव के सबसे सफल लोगों में गिना जाने लगा।

इस घटना के करीब एक साल बाद फिर वही महात्मा गांँव में पधारे। रामजी भाई तुरन्त उनके दर्शन करने को गया और उनके दिया गया चमत्कारी ताबीज का गुणगान करने लगा। तब महात्मा जी बोले, रामजी भाई! जरा अपनी ताबीज निकाल कर देना। उन्होंने ताबीज हाथ में दे लिया,और उसे खोला। उसे खोलते ही रामजी भाई का होश उड़ गया। जब उसने देखा कि ताबीज के अन्दर कोई मन्त्र तन्त्र नहीं लिखा हुआ था! वह तो धातु का एक टुकड़ा मात्र था!

रामजी भाई बोला, “ये क्या महात्मा जी! ये तो एक मामूली ताबीज है, फिर इसने मुझे सफलता कैसे दिलाई?”
महात्मा जी ने समझाते हुए कहा- सही कहा तुमने, तुम्हें सफलता इस ताबीज से नहीं बल्कि तुम्हारे विश्वास की शक्ति ने दिलाई है।रामजी भाई!

हम इन्सानों को भगवान ने एक विशेष शक्ति (चेतन शक्ति) देकर भेजा है। वो है- आत्मा के विश्वास की शक्ति।

तुम अपने कार्य क्षेत्र में इसलिए सफल नहीं हो पा रहे थे क्योंकि तुम्हें खुद पर विश्वास नहीं था!

लेकिन जब इस ताबीज की वजह से तुम्हारे अन्दर वो विश्वास पैदा हो गया तो तुम सफल होते चले गये।
इसलिए जाओ किसी ताबीज पर यकीन करने के बजाए अपने कर्म पर, अपनी सोच पर, अपने निर्णय पर विश्वास करना सीखो!

इस बात को समझो कि जो हो रहा है वह अच्छे के लिए हो रहा है और निश्चय ही तुम सफलता के शीर्ष पर पहुंँच जाओगे!”

इसलिए आत्मविश्वास को जगाने के लिए श्री गुरु महाराज जी आत्मज्ञान की दीक्षा देते हैं। तभी जीव के अन्दर आत्मविश्वास पैदा होता है और वह अन्दर का आनन्द बना रहे उसके लिय, उस सतत विश्वास के लिए सेवा, सतसंग, समय के सद्गुरु द्वारा दिए आत्मज्ञान का अभ्यास करना भी भी परमावश्यक है।
गुरु सर्मथ सर पर खड़े, कहाँ कमी तोही दास!
रिद्धि सिद्धि सेवा करें, मुक्ति न छोड़े साथ!!
इसलिय भक्त को सदा जरूरत है – अपने सद्गुरु पर, अपने ज्ञानदाता पर अटूट विस्वास करने की है!

अमीर आदमी का अनुभव।

अमीर आदमी का अनुभव।

जॉन डी रॉकफेलर दुनिया के सबसे अमीर आदमी और पहले अरबपति थे।

25 साल की उम्र में, वे अमेरिका में सबसे बड़ी तेल रिफाइनरियों में से एक के मालिक बने और 31 साल की उम्र में, वे दुनिया के सबसे बड़े तेल रिफाइनर बन गए।

38 साल उम्र तक, उन्होंने यू.एस. में 90% रिफाइंड तेल की कमान संभा ली और 50 की उम्र तक, वह देश के सबसे अमीर व्यक्ति हो गए थे। जब उनकी मृत्यु हुई, तो वह दुनिया के सबसे अमीर आदमी थे।

एक युवा के रूप में वे अपने प्रत्येक निर्णय, दृष्टिकोण और रिश्ते को अपनी व्यक्तिगत शक्ति और धन को बढ़ाने में लगाते थे।

लेकिन 53 साल की उम्र में वे बीमार हो गए। उनका पूरा शरीर दर्द से भर गया और उनके सारे बाल झड़ गए।

नियति को देखिए,
उस पीड़ादायक अवस्था में, दुनिया का एकमात्र अरबपति जो सब कुछ खरीद सकता था, अब केवल सूप और हल्के से हल्के स्नैक्स ही पचा सकता था।

उनके एक सहयोगी ने लिखा, “वह न तो सो सकते थे, न मुस्कुरा सकते थे और उस समय जीवन में उसके लिए कुछ भी मायने नहीं रखता था।”

उनके व्यक्तिगत और अत्यधिक कुशल चिकित्सकों ने भविष्यवाणी की कि वह एक वर्ष ही जी पाएंगे। उनका वह साल बहुत धीरे-धीरे, बहुत पीड़ा से गुजर रहा था।

जब वह मृत्यु के करीब पहुंच रहे थे, एक सुबह उन्हें अहसास हुआ कि वह अपनी संपत्ति में से कुछ भी, अपने साथ अगली दुनिया में नहीं ले जा सकते।

जो व्यक्ति पूरी व्यापार की दुनिया को नियंत्रित कर सकता था, उसे अचानक एहसास हुआ कि उसका अपना जीवन ही उसके नियंत्रण में नहीं हैं।

उनके पास एक ही विकल्प बचा था। उन्होंने अपने वकीलों, एकाउंटेंट और प्रबंधकों को बुलाया और घोषणा की कि वह अपनी संपत्ति को अस्पतालों में, अनुसंधान के कार्यो में और धर्म-दान के कार्यों के लिए उपयोग में लाना चाहते हैं।

जॉन डी. रॉकफेलर ने अपने फाउंडेशन की स्थापना की।

इस नई दिशा में उनके फाउंडेशन के अंतर्गत, अंततः पेनिसिलिन की खोज हुई, मलेरिया, तपेदिक और डिप्थीरिया का इलाज ईजाद हुआ।

लेकिन शायद रॉकफेलर की कहानी का सबसे आश्चर्यजनक हिस्सा यह है कि जिस क्षण उन्होंने अपनी कमाई का हिस्सा धर्मार्थ देना शुरू किया, उसके शरीर की हालात आश्चर्यजनक रूप से बेहतर होती गई।

एक समय ऐसा लग रहा था कि वह 53 साल की उम्र तक ही जी पाएंगे, लेकिन वे 98 साल तक जीवित रहे।

रॉकफेलर ने कृतज्ञता सीखी और अपनी अधिकांश संपत्ति समाज को वापस कर दी और ऐसा करने से वह ना केवल ठीक हो गए बल्कि एक परिपूर्णता के अहसास में भर गए। उन्होंने बेहतर होने और परिपूर्ण होने का तरीका खोज लिया।

ऐसा कहा जाता हैं कि रॉकफेलर ने जन कल्याण के लिए अपना पहला दान स्वामी विवेकानंद के साथ बैठक के बाद दिया और उत्तरोत्तर वे एक उल्लेखनीय परोपकारी व्यक्ति बन गए।

स्वामी विवेकानंद ने रॉकफेलर को संक्षेप में समझाया कि उनका यह परोपकार, गरीबों और संकटग्रस्त लोगों की मदद करने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।

अपनी मृत्यु से पहले, उन्होंने अपनी डायरी में लिखा – मुझे जीवन ने काम करना सिखाया, मेरा जीवन एक लंबी, सुखद यात्रा है! काम और आनंद से भरपूर, मैंने राह की चिंता छोड़ दी और ईश्वर ने मुझे हर रोज एक अच्छाई से नवाजा!

देने का सुख ही जीवन जी ने का सुख है – “दुनिया की सारी दौलत से ज्यादा जरूरी हैं मन की शांति की।”

इसलिए हमेशा संतों ने कहा है कि – आप वो प्रयास तो करें ही जिससे भगवान मिले पर वो भी काम जरूर करें जिससे दुआ मिले।

क्षमा करने वाला हमेशा सुख की नींद सोता है!

क्षमा करने वाला हमेशा सुख की नींद सोता है!

क्षमा हमेशा व्यक्ति को ऊँचा उठाती है। व्यक्ति बदला लेकर दूसरे को नीचा दिखाना चाहता है, पर इस प्रयास में वो खुद बहुत नीचे उतर जाता है।

जो व्यक्ति अहंँकार बस सतसंग नहीं सुनते, तर्क-कुतर्कों में पड़कर, महाराज की सेवा नहीं करते, ऐसे व्यक्तियों का जीवन गुस्से से व्यर्थ चला जाता है।

उनकी जीवात्मा हमेशा कष्ट पाती है। चौरासी योनियों का दुख पाती है। इस जन्म में भी और चौरासी लाख योनियों में भी कष्ट पाते हैं।

एक बार एक धोबी नदी किनारे की शिला पर रोज की तरह कपडे धोने आया। उसी शिला पर कोई महात्मा जी ध्यानस्थ थे।

धोबी ने आवाज़ लगायी, उसने नहीं सुनी। धोबी को जल्दी थी, दूसरी आवाज़ लगायी,वो भी नहीं सुनी, तो फिर धोबी ने महात्मा जी को धक्का मार दिया।

ध्यानस्थ महात्मा जी की आँखें खुली, क्रोध की जवाला उठी!दोनों के बीच में खूब मार -पीट और हाथा पायी हुई।

लुटपिट कर दोनों अलग अलग दिशा में बैठ गये।

एक व्यक्ति दूर से ये सब बैठकर देख रहा था।

महात्मा जी के नजदीक आकर पूछा, महात्मा जी आपको ज्यादा चोट तो नहीं लगी, उसने बहुत मारा आपको।

महात्मा जी ने कहा, उस समय आप छुडाने क्यों नहीं आये?

व्यक्ति ने कहा, आप दोनों के बीच में, जब युद्ध हो रहा था, उस समय में यह निर्णय नहीं कर पाया कि धोबी कौन है और महात्मा कौन है?

प्रतिशोध और बदले की भावना महात्मा को भी धोबी के स्तर पर उतार लाती है।

इसीलिए कहा जाता है कि, बुरे के साथ बुरे मत बनो, नहीं तो महात्मा और दुष्ट की क्या पहचान।

दूसरी तरफ, क्षमा करके व्यक्ति अपने स्तर से काफी ऊँचा उठ जाता है।

इस प्रतिक्रिया में वो सामने वाले को भी ऊँचा उठने और बदलने की गुप्त प्रेरणा या मार्गदर्शन देता है।

“प्रतिशोध और गुस्से से हम कभी कभार खुद को नुक्सान पहुँचा बैठते हैं। जिससे हमें बाद में खुद बहुत पछतावा होता है!

इसलिए समझना होगा कि गुस्सा अपना ही नुक़सान करता है!

गुस्से में लिया गया फैसला अक्सर गलत ही साबित होता है, इसलिए हमें खुद पर काबू रखना बहुत जरुरी है।

हमेशा निरन्तर भगवान के अव्यक्त-नाम का सुमिरन करना चाहिए।

क्षमा करने से सामने वाले व्यक्ति के नजर में हमारी इज्जत, सम्मान और बढ़ जाती है।

यानी भजन-सुमिरण करने वाले के सिर पर हमेशा परमात्मा का हाथ रहता है।

गुस्से में हमेशा अक्सर वो काम हो जाता है जिससे हम दूसरों को और खुद को भी नुक्सान पहुँचाने के साथ साथ लोगों के दिलों में नफरत पैदा कर देते हैं।

गुरु दरबार की सेवा, ध्यान-सुमिरण से मन के अन्दर दया प्रेम पैदा होता है। गुस्सा शान्त हो रहता है।

आपको जब भी गुस्सा आये या किसी के ऊपर गुस्सा हो तो हमें चाहिए कि उस समय हम अपने दिमाग और मन को शान्त रखें (नियन्त्रण करना सीखें) नाम-सुमिरण या फिर हम वहांँ से कहीं दूसरी जगह पर चले जाएँ।

यह मन बड़ा चंँचल और स्वार्थी है, इसलिए हमेशा समय के महापुरुष के सानिध्य में रहें! नियमित सतसंग सुनें! अभ्यास करें! सेवा करें और अपने मानव जीवन को सार्थक करें!
यही जीवन का सार है।