मनोबल

एक राजा के पास एक हाथी था। उस हाथी पर चढ़कर राजा ने कई युद्ध जीते थे। छोटे पन से ही वह हाथी राजा के पास था और हाथी युद्ध कला में प्रवीण हो चुका था। यह पर्वत सा हाथी जब गुस्से से सिंघाड़ा हुआ कोमा दुश्मन सेना में घूमता था तो दुश्मनों के छक्के छूट जाते थे पुलिस डॉग धीरे-धीरे हाथी बूढ़ा होने लगा। उसका जोश और पराक्रम जाता रहा। अब उसका ध्यान भी पहले से कम रखा जाता था। कई बार उसे समय पर खाना भी नहीं मिलता था।

एक बार हाथी हाथीशाला से निकल गए एक पुराने तालाब के किनारे चला गया। वहां उसने खूब छत पर पानी पिया और नहाने के लिए गहरे पानी में उतर गया। पर तालाब में ज्यादा कीचड़ होने के कारण वह वृद्ध हाथी उसमें फंस गया। वह जितना कीचड़ से निकलने का प्रयास करता कोमा उतना वह अंदर दस्त आ जाता। आसपास के लोगों से संदेश राजा तक पहुंचाया। राधा ने भी हर तरह के प्रयास करवाएं, पर कोई नतीजा नहीं निकला।

तभी एक मंत्री ने राजा को 1 उपाय सुझाया। सारे आदमियों को युद्ध सैनिकों की वेशभूषा पहनाई गई और वह सभी वाद्य यंत्र मंगवाए गए कोमा जो युद्ध के मौके पर काम लिए जाते थे। हाथी के सामने युद्ध के नगाड़े बजने लगे और सैनिक इस तरह से उस हाथी की ओर बढ़ने लगे, जैसे वह दुश्मन पक्ष के हो। यह दृश्य देखकर उस हाथी में गजब का जोश से आ गया। उसने जोर से सिंघाड़ा और दुश्मन पर हमला करने के लिए अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल करते हुए कीचड़ को रोते हुए तालाब के किनारे पहुंच गया।

कुल मिलाकर मनुष्य की सफलताएं उसके मनोबल पर निर्भर करती है। मनोबल के दम पर हम असंभव को संभव बना देते हैं।

लक्ष्य प्राप्ति की राह

लक्ष्य प्राप्ति की राह

एक किसान के घर एक दिन उसका कोई परिचित मिलने आया। उस समय वह घर पर नहीं था।

उसकी पत्नी ने कहा: वह खेत पर गए हैं। मैं बच्चे को बुलाने के लिए भेजती हूं। तब तक आप इंतजार करें।

कुछ ही देर में किसान खेत से अपने घर आ पहुंचा। उसके साथ-साथ उसका पालतू कुत्ता भी आया।

कुत्ता जोरों से हांफ रहा था। उसकी यह हालत देख, मिलने आए व्यक्ति ने किसान से पूछा क्या तुम्हारा खेत बहुत दूर है ?

किसान ने कहा: नहीं, पास ही है। लेकिन आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?

उस व्यक्ति ने कहा: मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि तुम और तुम्हारा कुत्ता दोनों साथ-साथ आए!

लेकिन तुम्हारे चेहरे पर रंच मात्र थकान नहीं जबकि कुत्ता बुरी तरह से हांफ रहा है।

किसान ने कहा: मैं और कुत्ता एक ही रास्ते से घर आए हैं। मेरा खेत भी कोई खास दूर नहीं है। मैं थका नहीं हूं। मेरा कुत्ता थक गया है।

इसका कारण यह है कि मैं सीधे रास्ते से चलकर घर आया हूं, मगर कुत्ता अपनी आदत से मजबूर है।

वह आसपास दूसरे कुत्ते देखकर उनको भगाने के लिए उसके पीछे दौड़ता था और भौंकता हुआ वापस मेरे पास आ जाता था। फिर जैसे ही उसे और कोई कुत्ता नजर आता, वह उसके पीछे दौड़ने लगता। अपनी आदत के अनुसार उसका यह क्रम रास्ते भर जारी रहा। इसलिए वह थक गया है।

देखा जाए तो यही स्थिति आज के इंसान की भी है।

जीवन के लक्ष्य तक पहुंचना यूं तो कठिन नहीं है, लेकिन राह में मिलने वाले कुत्ते, व्यक्ति को उसके जीवन की सीधी और सरल राह से भटका रहे हैं।

इंसान अपने लक्ष्य से भटक रहा है और यह भटकाव ही इंसान को थका रहा है।

यह लक्ष्य प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है। आपकी ऊर्जा को रास्ते में मिलने वाले कुत्ते बर्बाद करते है।

भौंकने दो इन कुत्तो को और लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में सीधे बढ़ते रहो.. फिर एक ना एक दिन मंजिल मिल ही जाएगी।

लेकिन इनके चक्कर में पड़ोगे तो थक ही जाओगे। अब ये आपको सोचना है कि किसान की तरह सीधी राह चलना है या उसके कुत्ते की तरह।

सफलता के लिए सही समय कि नहीं, सही निर्णय की जरूरत होती है।

प्रेम दुर्लभ है –
उसे पकड़ कर रखें!
क्रोध बहुत खराब है-
उसे दबाकर रखें।
भय बहुत भयानक है-
उसका सामना करें!
स्मृतियाँ बहुत सुखद हैं-
उन्हें संजोकर रखें।

Quiz conversation between Yudhishthira and Yaksha

युधिष्ठिर और यक्ष की प्रश्नोतरी वार्तालाप

दुर्योधन को गंधर्व चित्रसेन के बंधन से मुक्त करा कर जब पांडव द्वैत वन वापस आए, उसी समय एक ब्राह्मण युधिष्ठिर के पास आकर बोला महाराज मैंने अरणीय के साथ अपना सामान एक वृक्ष पर टांग रखा था। एक मेरी उसे लेकर भाग गया है। आप उसे वापस दिलाने की कृपया करें। युधिष्ठिर ने ब्राह्मण को आश्वस्त करते हुए पहले जल पीने के लिए कहा और नकुल से जल लाने के लिए कहा।

समीप ही एक जलकुंड था। नकुल ने कुंड में जैसे ही पात्र डाला कोमा उसमें से आवाज आई ठहरो पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो कोमा तभी तुम जल ले सकते हो। नकुल ने उस आवाज की अनसुनी करते हुए पानी लेना चाहा। आवाज लगाने वाले यक्ष ने तुरंत उसे अचेत कर दिया। इसी प्रकार सहदेव कोमा अर्जुन और भीम भीम क्रम से पानी भरने आए और यक्ष के प्रश्नों की और ध्यान ना देने के कारण अचेत हो गए। अंत में युधिष्ठिर आएं। उनसे भी यक्ष ने वही बात कही। युधिष्ठिर ने धैर्य पूर्वक यक्ष से प्रश्न पूछने के लिए कहा।

यक्ष ने प्रश्न किया धर्म का एकमात्र साधन क्या है? यश प्राप्ति व स्वर्ग प्राप्ति का एकमात्र साधन क्या है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया दक्षता धर्म का एकमात्र साधन है। दान यश का एकमात्र उपाय है। सत्य ही स्वर्ग प्राप्ति का एकमात्र साधन है।

यक्ष ने प्रश्न किया मनुष्य की आत्मा कौन है? भाग्य द्वारा प्राप्त मित्र कौन है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया पुत्र मनुष्य की आत्मा है। पत्नी भाग्य द्वारा प्राप्त मित्र है।

यक्ष ने प्रश्न किया सर्वोत्तम लाभ व सुख क्या है।
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया निरोग इता सर्वोत्तम लाभ है। संतोष सर्वोत्तम सुख है।

यक्ष ने प्रश्न किया धर्म से बढ़कर क्या है? कौन सा धर्म सर्वोत्तम है? वह क्या है, जिसको नियंत्रण करके प्रसन्नता होती है? किन के साथ मित्रता करके दुख नहीं होता?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया उदारता धर्म से बढ़कर है। सेवा सर्वोत्तम धर्म है। मन का नियंत्रण करके प्रसन्नता होती है। सज्जनों की मित्रता से कभी दुख नहीं होता।

यक्ष ने प्रश्न किया किसके त्याग कर मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है? किस वस्तु के त्याग से शोक नहीं होता?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया अहंकार का त्याग करने से मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है। क्रोध के त्याग से शोक नहीं होता।

यक्ष ने प्रश्न किया तब का लक्षण क्या है? सबसे बड़ी क्षमा क्या है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया स्वधर्म का पालन करना ही तपस्या है। सुख दुख को सहन करना सबसे बड़ी क्षमा है।

यक्ष ने प्रश्न किया दुर्जय शत्रु कौन है? अंत ना होने वाली बीमारी क्या है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया क्रोध दुर्जय शत्रु है। लोग कभी समाप्त ना होने वाली बीमारी है।

यक्ष ने प्रश्न किया सबसे बड़ा स्नान व दान क्या है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया मनोविकार ओं का त्याग सबसे बड़ा स्नान है। प्राणी की रक्षा ही सबसे बड़ा दान है।

यक्ष ने प्रश्न किया उत्तम मार्ग क्या है? सबसे अधिक प्रश्न व्यक्ति कौन है?
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया सज्जनों द्वारा सेवन किया मार्ग उत्तम मार्ग है। जो परिवार के साथ प्रसन्न रहता है कोमा वही सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति है।

युधिष्ठिर ने यक्ष के सभी प्रश्नों के सही उत्तर दिए। इससे प्रसन्न होकर यक्ष ने उनके सभी भाइयों को पुनः जीवित कर दिया।

भगवान पर विश्वास

एक आदमी की नई नई शादी हुई और वो अपनी पत्नि के साथ वापिस आ रहा था। रास्ते में उन दोनों को एक बडी झील को नाव के द्वारा पार करना था, तभी अचानक भयंकर तूफ़ान आ गया!

पति तो निड़र था लेकिन पत्नी बहुत डरी हुई थी क्योंकि हालात बिल्कुल खराब हो चुके थे। नाव बहुत छोटी थी और तूफ़ान बहुत भयंकर था दोनों किसी भी समय डूब सकते थे। लेकिन पति चुपचाप, निश्चल और शान्त बैठा था जैसे कि कुछ नहीं होने वाला!

वही दूसरी तरफ पत्नि डर के मारे कांप रही थी और पति से बोली – क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा कि ये हमारे जीवन का आखरी क्षण भी हो सकता है? ऐसा नहीं लगता कि हम दूसरे किनारे पर कभी पहुंच भी पायेंगे। अब तो कोई चमत्कार ही हमें बचा सकता है वर्ना हमारी मौत निश्चित ही है!

पत्नि बड़बड़ाए जा रही थी – क्या तुम्हें बिल्कुल भी डर नहीं लग रहा ? कहीं तुम पागल-वागल या पत्थर- वत्थर तो नहीं हो ?

पति खूब हँसा और एकाएक उसने “म्यान से तलवार” निकाल ली!

पत्नि अब और परेशान हो गई कि पति क्या कर रहा है फिर पति उस नंगी तलवार को पत्नि की गर्दन के पास ले आया, इतना पास कि उसकी गर्दन और तलवार के बीच बिल्कुल कम फासला बचा था बल्कि ये कहें कि तलवार लगभग उसकी गर्दन को छू रही थी!

फिर पति अपनी पत्नि से बोला – क्या तुम्हें डर लग रहा है?

पत्नि खूब हँसी और बोली – जब तलवार आपके हाथ में है तो डर कैसा क्योंकि मैं जानती हूँ कि आप मुझे बहुत प्यार करते हो इसलिए कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते!

पति ने तलवार वापिस म्यान में डाल दी, और बोला कि यही मेरा जवाब है मैं भी जानता हूँ कि भगवान मुझे बहुत प्यार करते है और ये तूफ़ान उनके हाथ में है, इसलिए जो भी होगा अच्छा ही होगा!

अगर हम बच गये तो भी अच्छा और अगर नहीं बचे तो भी अच्छा क्योंकि सब कुछ उस परमात्मा के हाथ में है और वो कभी भी कुछ भी गलत नहीं कर सकते, वो जो भी करेंगे, हमारे भले के लिए ही करेंगे!

इस कहानी से हमें यह सीखने को मिलता है कि व्यक्ति को हमेशा उस परमपिता-परमात्मा पर विश्वास रखना चाहिये, जो एक क्षण में हमारे पूरे जीवन को बदल सकते है!

जीवन में सच्चे गुरु की सार्थकता

महत्वपूर्ण यह नहीं है कि कहांँ जा रहे हो और किस मार्ग से जा रहे हो।
महत्वपूर्ण यह है कि जो जा रहा है, वह कौन है?
स्वयं को जानने से ही परमानन्द की मन्जिल मिलती है।
जिसने स्वयंँ को नहीं जाना – वह कितने ही शास्त्र, कितने ही सिद्धान्त और कितनी ही ज्ञान कुन्जी लेकर चलता रहे, उसके पैर सत्य के रास्ते पर नहीं पड़ेंगे, गलत रास्ते पर ही पड़ते रहेंगे।
बिना जाने जब वह चलता है तो डगमगाता है इसलिए उसके चलने के साथ ज्ञान कुन्जी भी डगमगाएगी।
पूर्ण गुरु शिष्य को एक ही दिशा की तरफ इशारा करते हैं कि जागो और स्वयंँ को जानो।
इसलिए जागकर स्वयंँ को जानना महत्वपूर्ण है और जानने की पहली शर्त यह है कि मैं कुछ भी नहीं जानता।
पूर्ण गुरु से ज्ञान लेकर लोग इतने अकड़े हुए हैं कि वे स्वयंँ को महाज्ञानी मान बैठे हैं और इसी से उनका चित्त भरा हुआ है।

उनसे पूछो कि क्या तुम स्वांँसों के पूर्ण सत्य को जानते हो?
तो उनका उत्तर होता है – हांँ थोड़ा-थोड़ा जानता हूंँ और यह थोड़ा-थोड़ा जानना ही धोखा है।

स्वांँसों के भीतर की शक्ति को खन्ड में नहीं बांँटा जा सकता। सत्य को या तो पूरा जाना जाता है और या बिल्कुल भी नहीं जाना जा सकता। कोई यह नहीं कह सकता कि मैं थोड़ा-थोड़ा जागा हूंँ या थोड़ा-थोड़ा सोया हूंँ। जो हृदय में उतरता है तो पूरा उतरता है और नहीं उतरता तो बिल्कुल नहीं उतरता, वही स्वांँसों के भीतर की शक्ति का पूर्ण सत्य है।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि सच्चे गुरु से ज्ञान नहीं लेना चाहिए।

इसका अर्थ है कि सच्चे गुरु से ज्ञान लेकर ध्यान के अभ्यास से स्वयंँ को शून्य करना चाहिए।
तभी स्वांँसों के भीतर प्रवेश करने के लिए जगह मिलेगी।
जिज्ञासु उसे कहते हैं – जो थोड़ा जानता है, थोड़ा और जानने को उत्सुक है तथा जानकारी की खोज में है।

जिज्ञासु यानी विद्यार्थी। शिष्य विद्यार्थी नहीं है, वह सत्यार्थी है। शिष्य जानकारी की खोज में नहीं निकला है, शिष्य स्वयं को जानने की खोज में निकला है। शिष्य होने की पहली शर्त यह है कि जिसने समर्पण स्वीकार कर लिया हो। जिसने सच्चे गुरु के चरणों में सिर रख दिया और कहा कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूंँ! जिसने अपने मन के साथ अपनी बुद्धि की जानकारी भी सब गुरु के चरणों में रख दी, वही सीखने व जानने को कुशल होता है।

जिस पल वह अभ्यास से अपने भीतर भरी हुई सारी जानकारी से स्वयं को खाली कर लेता है – उसी पल ही स्वांँसों के भीतर की शक्ति उसे जगाकर हृदय के द्वार पर ले जाती है। तब शिष्य का पहला कदम हृदय द्वार की चौखट पर पड़ता है। तभी जीवन में सच्चे गुरु की सार्थकता का ज्ञान होता है।

  • श्री हंस जी महाराज

न माया मिली न राम

न माया मिली न राम
किसी गाँव में दो दोस्त रहते थे। एक का नाम हीरा था और दूसरे का मोती!
दोनों में गहरी दोस्ती थी और वे बचपन से ही खेलना-कूदना, पढना-लिखना हर काम साथ करते आ रहे थे।

जब वे बड़े हुए तो उनपर काम-धंधा ढूँढने का दबाव आने लगा! लोग ताने मारने लगे कि दोनों निठल्ले हैं और एक पैसा भी नही कमाते।

एक दिन दोनों ने विचार-विमर्श कर के शहर की ओर जाने का फैसला किया!अपने घर से रास्ते का खाना पीना ले कर दोनों भोर होते ही शहर की ओर चल पड़े।

शहर का रास्ता एक घने जंगल से हो कर गुजरता था! दोनों एक साथ अपनी मंजिल की ओर चले जा रहे थे! रास्ता लम्बा था सो उन्होंने एक पेड़ के नीचे विश्राम करने का फैसला किया! दोनों दोस्त विश्राम करने बैठे ही थे कि इतने में एक साधु वहां पर भागता हुआ आया. साधु तेजी से हांफ रहा था और बेहद डरा हुआ था।

मोती ने साधु से उसके डरने का कारण पूछा।
साधु ने बताय कि- आगे के रास्ते में एक डायन है और उसे हरा कर आगे बढ़ना बहुत मुश्किल है, मेरी मानो तुम दोनों यहीं से वापस लौट जाओ।

इतना कह कर साधु अपने रास्ते को लौट गया।

हीरा और मोती साधु की बातों को सुन कर असमंजस में पड़ गए! दोनों आगे जाने से डर रहे थे। दोनों के मन में घर लौटने जाने का विचार आया, लेकिन लोगों के ताने सुनने के डर से उन्होंने आगे बढ़ने का निश्चेय किया।

आगे का रास्ता और भी घना था और वे दोनों बहुत डरे हुए भी थे! कुछ दूर और चलने के बाद उन्हें एक बड़ा सा थैला पड़ा हुआ दिखाई दिया! दोनों दोस्त डरते हुए उस थैले के पास पहुंचे।

उसके अन्दर उन्हें कुछ चमकता हुआ नज़र आया! खोल कर देखा तो उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही न रहा! उस थैले में बहुत सारे सोने के सिक्के थे! सिक्के इतने अधिक थे कि दोनों की ज़िंदगी आसानी से पूरे ऐश-ओ-आराम से कट सकती थी! दोनों ख़ुशी से झूम रहे थे! उन्हें अपने आगे बढ़ने के फैसले पर गर्व हो रहा था।

साथ ही वे उस साधु का मजाक उड़ा रहे थे कि वह कितना मूर्ख था जो आगे जाने से डर गया।

अब दोनों दोस्तों ने आपस में धन बांटने और साथ ही भोजन करने का निश्चेय किया।

दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए! हीरा ने मोती से कहा कि वह आस-पास के किसी कुएं से पानी लेकर आये, ताकि भोजन आराम से किया जा सके।मोती पानी लेने के लिए चल पड़ा।

मोती रास्ते में चलते-चलते सोच रहा था कि अगर वो सारे सिक्के उसके हो जाएं तो वो और उसका परिवार हमेशा राजा की तरह रहेगा. मोती के मन में लालच आ चुका था।

वह अपने दोस्त को जान से मार डालने की योजना बनाने लगा! पानी भरते समय उसे कुंए के पास उसे एक धारदार हथियार मिला।उसने सोचा की वो इस हथियार से अपने दोस्त को मार देगा और गाँव में कहेगा की रास्ते में डाकुओं ने उन पर हमला किया था! मोती मन ही मन अपनी योजना पर खुश हो रहा था।

वह पानी लेकर वापस पहुंचा और मौका देखते ही हीरा पर पीछे से वार कर दिया! देखते-देखते हीरा वहीं ढेर हो गया।

मोती अपना सामान और सोने के सिक्कों से भरा थैला लेकर वहां से वापस भागा।

कुछ एक घंटे चलने के बाद वह एक जगह रुका। दोपहर हो चुकी थी और उसे बड़ी जोर की भूख लग आई थी! उसने अपनी पोटली खोली और बड़े चाव से खाना-खाने लगा।

लेकिन ये क्या? थोड़ा खाना खाते ही मोती के मुँह से खून आने लगा और वो तड़पने लगा।

उसे एहसास हो चुका था कि जब वह पानी लेने गया था तभी हीरा ने उसके खाने में कोई जहरीली जंगली बूटी मिला दी थी. कुछ ही देर में उसकी भी तड़प-तड़प कर मृत्यु हो गयी।

अब दोनों दोस्त मृत पड़े थे और वो थैला यानी माया रूपी डायन जस का तस पड़ा हुआ था।

सचमुच में उस साधु ने एकदम ठीक कहा था कि आगे डायन है. वो सिक्कों से भरा थैला उन दोनों दोस्तों के लिए डायन ही साबित हुआ. ना वो डायन रूपी थैला वहां होता; न उनके मन में लालच आता और ना वे एक दूसरे की जाना लेते।

यही हमारे जीवन का सच भी है!
हम माया यानी धन-दौलत-सम्पदा एकत्रित करने में इतना उलझ जाते हैं कि अपने रिश्ते-नातों तक को भुला देते हैं! माया रूपी डायन आज हर घर में बैठी है! इसी माया के चक्कर में इंसान हैवान बन बैठा है!

हमको समझना होगा कि – पैसा बहुत कुछ है पर सबकुछ नहीं है! हमें कभी भी पैसे को ज़रुरत से अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए और अपनी दोस्ती और रिश्तों के बीच में इसको कभी नहीं लाना चाहिए!.
और हमारे पूर्वज भी तो कह गए हैं*-
माया के चक्कर में दोनों गए, न माया मिली न राम
इसलिए हमें हमेशा माया के लोभ व धन के लालच से बचना चाहिए और ज्यादा से जयादा भगवान् की अराधना में अपना ध्यान जरूर लगाना चाहिए!

Revision 5 Syllabus For O Level Course

Syllabus For O Level Course

Paper CodeSyllabusLearning Hours (Theory)Learning Hours
(Practical/ Tutorials/
Project)
First Semester  
M1-R5Information Technology Tools and Network Basics4872
M2-R5Web Designing & Publishing4872
Second Semester  
M3-R5Programming and Problem Solving through Python4872
M4-R5Internet of Things and its Applications4872
PR1-R5Practical based on M1-R5, M2-R5 ,M3-R5 and M4-R5  
PJ1-R5Project4040

भगवान पर विश्वास

एक सन्त कुएं पर स्वयं को लटका कर ध्यान करता था और कहता था जिस दिन यह जंजीर टूटेगी मुझे ईश्वर मिल जाएंगे।

उनसे पूरा गांव प्रभावित था! सभी उनकी भक्ति, उनके तप की तारीफें करते थे। एक व्यक्ति के मन में इच्छा हुई कि मैं भी ईश्वर दर्शन करूँ।

वह कुए पर रस्सी से पैर को बांधकर कुएं में लटक गया और कृष्ण जी का ध्यान करने लगा जब रस्सी टूटी उसे कृष्ण अपनी गोद मे उठा लिए और दर्शन भी दिए।

तब व्यक्ति ने पूछा आप इतनी जल्दी मुझे दर्शन देने क्यों चले आये जबकि वे संत महात्मा तो वर्षों से आपको बुला रहे हैं।

कृष्ण बोले – वो कुएं पर लटकते जरूर हैं किंतु उन्होंने अपने पैर को लोहे की जंजीर से बांधा है।
मतलब कि उसे मुझसे ज्यादा जंजीर पर विश्वास है।

लेकिन तुझे खुद से ज्यादा मुझ पर विश्वास है इसलिए मैं आ गया।
आवश्यक नहीं कि प्रभु दर्शन में वर्षों लगें – *आपकी शरणागति आपको ईश्वर के दर्शन अवश्य कराएगी और शीघ्र ही कराएगी।

प्रश्न केवल इतना है कि आप उन पर कितना विश्वास करते हैं।

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया ॥

हे अर्जुन ! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। शरीररूपी यंत्र पर आरूढ़(चढ़े) हुए सब प्राणियों को, वे अपनी माया से घुमाते रहते हैं।

इसे सदैव याद रखें और बुद्धि में धारण करने के साथ व्यवहार में भी धारण करें। अपने ही अंदर उस अविनाशी के दर्शन अवश्य होंगे।

अहंकार की निशानी

अहंकार की निशानी

दान, पुण्य, उदारता यह धर्म-कर्म के मार्ग में बनाए हुए कुछ ऐसे सिद्धांत हैं, जिनकी आड़ में अनेक लोगों को ठगा भी जाता है। इसका सही अर्थ न जानने के कारण कई लोग अकारण अहंकारी भी हो गए। जबकि लोगों को इसका सही अर्थ समझना चाहिए। इस संदर्भ में एक कहानी है-

एक धनी व्यक्ति थे। वे अपने यहां आने वाले किसी भी व्यक्ति को निराश नहीं लौटाते थे। उन्हें अपनी इस उदारता पर गर्व भी था। वे समझते थे कि उनके समान दूसरा कोई उदार नहीं है।

एक बार वे घूमते हुए खजूर के बाग में पहुंचे। उस समय बाग का चौकीदार भोजन करने की तैयारी में था। तभी वहां कहीं से एक कुत्ता आ गया। चौकीदार ने एक रोटी कुत्ते को दे दी। कुत्ते ने रोटी खा ली और चौकीदार के आगे फिर पूंछ हिलाने लगा। चौकीदार ने उसे दूसरी रोटी भी दे दी। धनवान सज्जन यह सब देख रहे थे। वे चौकीदार के पास आकर बोले, “तुम्हारे लिए कितनी रोटियां आती हैं।” चौकीदार ने कहा, “दो रोटी।”

“तो फिर तुमने दोनों रोटियां कुत्ते को क्यों दे दी ?”

चौकीदार ने जवाब दिया, “कुत्ता पहले कभी नहीं आया था। यह ठीक उस समय आया, जब मेरे लिए रोटियां आईं। मुझे ऐसा लगा कि ये रोटियां आज मेरे लिए नहीं, बल्कि इसके लिए आई है। इसलिए जिसकी वस्तु मैंने उसे दे दी।” उसकी बात सुनकर धनी व्यक्ति का सिर झुक गया। उसका अभिमान तत्काल नष्ट हो गया।

दरअसल कभी-कभी हम स्वयं को ही केंद्र मानने लग जाते हैं और यहाँ से अहंकार का जन्म होता है।
जब तक हम अपने केंद्र से बाहर झांककर नहीं देखें, तब तक हमें अहसास नहीं होता है कि हम कहां पर हैं!

अज्ञानता और लोभ का परिणाम

एक कुम्हार को मिट्टी खोदते हुए अचानक एक हीरा मिल गया। उसने उसे अपने गधे के गले में बांध दिया। एक दिन एक बनिए की नजर गधे के गले में बंधे उस हीरे पर पड़ गई। उसने कुम्हार से उसका मूल्य पूछा। कुम्हार ने कहा, सवा सेर गुड़। बनिए ने कुम्हार को सवा सेर गुड़ देकर वह हीरा खरीद लिया। बनिए ने भी उस हीरे को एक चमकीला पत्थर समझा था लेकिन अपनी तराजू की शोभा बढ़ाने के लिए उसकी डंडी से बाँध दिया।

एक दिन एक जौहरी की नजर बनिए के उस तराजू पर पड़ गई। उसने बनिए से उसका दाम पूछा। बनिए ने कहा, पांच रुपए। जौहरी कंजूस व लालची था। हीरे का मूल्य केवल पांच रुपए सुनकर समझ गया कि बनिया इस कीमती हीरे को एक साधारण पत्थर का टुकड़ा समझ रहा है। वह उससे भाव-ताव करने लगा-पांच नहीं, चार रुपए ले लो। बनिये ने मना कर दिया क्योंकि उसने चार रुपए का सवा सेर गुड़ देकर खरीदा था। जौहरी ने सोचा कि इतनी जल्दी भी क्या है ? कल आकर फिर कहूँगा, यदि नहीं मानेगा तो पांच रुपए देकर खरीद लूँगा।

संयोग से दो घंटे बाद एक दूसरा जौहरी कुछ जरूरी सामान खरीदने उसी बनिए की दुकान पर आया। तराजू पर बंधे हीरे को देखकर वह चौंक गया। उसने सामान खरीदने के बजाए उस चमकीले पत्थर का दाम पूछ लिया। बनिए के मुख से पांच रुपए सुनते ही उसने झट जेब से निकालकर उसे पांच रुपये थमाए और हीरा लेकर खुशी-खुशी चल पड़ा। दूसरे दिन वह पहले वाला जौहरी बनिए के पास आया। पांच रुपए थमाते हुए बोला- लाओ भाई दो वह पत्थर।

बनिया बोला- वह तो कल ही एक दूसरा आदमी पांच रुपए में ले गया। यह सुनकर जौहरी ठगा सा महसूस करने लगा। अपना गम कम करने के लिए बनिए से बोला- “अरे मूर्ख ! वह साधारण पत्थर नहीं, एक लाख रुपए कीमत का हीरा था।”

बनिया बोला, “मुझसे बड़े मूर्ख तो तुम हो। मेरी दृष्टि में तो वह साधारण पत्थर का टुकड़ा था, जिसकी कीमत मैंने चार रुपए मूल्य के सवा सेर गुड़ देकर चुकाई थी। पर तुम जानते हुए भी एक लाख की कीमत का वह पत्थर, पांच रुपए में भी नहीं खरीद सके।”

💐💐शिक्षा:-💐💐

मित्रों, हमारे साथ भी अक्सर ऐसा होता है हमें हीरे रूपी सच्चे शुभ् चिन्तक मिलते हैं लेकिन अज्ञानतावश पहचान नहीं कर पाते और उसकी उपेक्षा कर बैठते हैं, जैसे इस प्रसंग में कुम्हार और बनिए ने की। और कभी पहचान भी लेते हैं अपने अहंकार के चलते तुरन्त स्वीकार नहीं कर पाते और परिणाम पहले जौहरी की तरह हो जाता है और पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हासिल नहीं हो पाता…!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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