मजदूर के जूते

मजदूर के जूते

एक बार एक शिक्षक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक युवा शिष्य के साथ कहीं टहलने निकले . उन्होंने देखा की रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं , जो संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे जो अब अपना काम ख़त्म कर घर वापस जाने की तैयारी कर रहा था .

शिष्य को मजाक सूझा उसने शिक्षक से कहा , “ गुरु जी क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा कर झाड़ियों के पीछे छिप जाएं ; जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा !!”

शिक्षक गंभीरता से बोले , “ किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है . क्यों ना हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छिप कर देखें की इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है !!”

शिष्य ने ऐसा ही किया और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए .

मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया . उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ , उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा की अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे , उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट -पलट कर देखने लगा . फिर उसने इधर -उधर देखने लगा , दूर -दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए . अब उसने दूसरा जूता उठाया , उसमे भी सिक्के पड़े थे …मजदूर भावविभोर हो गया , उसकी आँखों में आंसू आ गए , उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा – “हे भगवान् , समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए उस अनजान सहायक का लाख -लाख धन्यवाद , उसकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दावा और भूखें बच्चों को रोटी मिल सकेगी .”

मजदूर की बातें सुन शिष्य की आँखें भर आयीं . शिक्षक ने शिष्य से कहा – “ क्या तुम्हारी मजाक वाली बात की अपेक्षा जूते में सिक्का डालने से तुम्हें कम ख़ुशी मिली ?”

शिष्य बोला , “ आपने आज मुझे जो पाठ पढाया है , उसे मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा . आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है! देने का आनंद असीम है ! देना देवत्त है !”

वास्तव में सुखी कौन

वास्तव में सुखी कौन

एक भिखारी किसी किसान के घर भीख माँगने गया। किसान की स्त्री घर में थी, उसने चने की रोटी बना रखी थी। किसान जब घर आया, उसने अपने बच्चों का मुख चूमा, स्त्री ने उनके हाथ पैर धुलाये, उसके बाद वह रोटी खाने बैठ गया। स्त्री ने एक मुट्ठी चना भिखारी को डाल दिया, भिखारी चना लेकर चल दिया।

रास्ते में भिखारी सोचने लगा, “हमारा भी कोई जीवन है? दिन भर कुत्ते की तरह माँगते फिरते हैं। फिर स्वयं बनाना पड़ता है। इस किसान को देखो कैसा सुन्दर घर है। घर में स्त्री है, बच्चे हैं, अपने आप अन्न पैदा करता है। बच्चों के साथ प्रेम से भोजन करता है। वास्तव में सुखी तो यह किसान है।

इधर वह किसान रोटी खाते-खाते अपनी स्त्री से कहने लगा, “नीला बैल बहुत बुड्ढा हो गया है, अब वह किसी तरह काम नहीं देता, यदि कहीं से कुछ रुपयों का इन्तजाम हो जाये तो इस साल का काम चले। साधोराम महाजन के पास जाऊँगा, वह ब्याज पर दे देगा।”

भोजन करके वह साधोराम महाजन के पास गया। बहुत देर चिरौरी विनती करने पर 1रु. सैकड़ा सूद पर साधों ने रुपये देना स्वीकार किया। एक लोहे की तिजोरी में से साधोराम ने एक थैली निकाली और गिनकर रुपये किसान को दे दिये।

रुपये लेकर किसान अपने घर को चला, वह रास्ते में सोचने लगा- “हम भी कोई आदमी हैं, घर में 5 रु. भी नकद नहीं। कितनी चिरौरी विनती करने पर उसने रुपये दिये हैं। साधो कितना धनी है, उसके पास सैकड़ों रुपये हैं।” वास्तव में सुखी तो यह साधो राम ही है। साधोराम छोटी सी दुकान करता था, वह एक बड़ी दुकान से कपड़े ले आता था और उसे बेचता था।

दूसरे दिन साधोराम कपड़े लेने गया, वहाँ सेठ पृथ्वीचन्द की दुकान से कपड़ा लिया। वह वहाँ बैठा ही था कि इतनी देर में कई तार आए कोई बम्बई का था तो कोई कलकत्ते का, किसी में लिखा था 5 लाख मुनाफा हुआ, किसी में एक लाख का। साधो महाजन यह सब देखता रहा, कपड़ा लेकर वह चला आया। रास्ते में सोचने लगा, “हम भी कोई आदमी हैं, सौ दो सौ जुड़ गये महाजन कहलाने लगे। पृथ्वीचन्द कैसे हैं, एक दिन में लाखों का फायदा। “वास्तव में सुखी तो यह है, उधर पृथ्वीचन्द बैठा ही था, कि इतने ही में तार आया कि 5 लाख का घाटा हुआ। वह बड़ी चिन्ता में था कि नौकर ने कहा, आज लाट साहब की रायबहादुर सेठ के यहाँ दावत है। आपको जाना है, मोटर तैयार है।”

पृथ्वीचन्द मोटर पर चढ़ कर रायबहादुर की कोठी पर चला गया। वहाँ सोने चाँदी की कुर्सियाँ पड़ी थी, रायबहादुर जी से कलक्टर-कमिश्नर हाथ मिला रहे थे। बड़े-बड़े सेठ खड़े थे। वहाँ पृथ्वीचन्द सेठ को कौन पूछता, वे भी एक कुर्सी पर जाकर बैठ गया। लाट साहब आये, राय बहादुर से हाथ मिलाया, उनके साथ चाय पी और चले गये।

पृथ्वीचन्द अपनी मोटर में लौट रहें थे, रास्ते में सोचते आते हैं, हम भी कोई सेठ हैं, 5 लाख के घाटे से ही घबड़ा गये। राय बहादुर का कैसा ठाठ है, लाट साहब उनसे हाथ मिलाते हैं। “वास्तव में सुखी तो ये ही है।”

अब इधर लाट साहब के चले जाने पर रायबहादुर के सिर में दर्द हो गया, बड़े-बड़े डॉक्टर आये एक कमरे वे पड़े थे। कई तार घाटे के एक साथ आ गये थे। उनकी भी चिन्ता थी, कारोबार की भी बात याद आ गई। वे चिन्ता में पड़े थे, तभी खिड़की से उन्होंने झाँक कर नीचे देखा, एक भिखारी हाथ में एक डंडा लिये अपनी मस्ती में जा रहा था। राय बहादुर ने उसे देखा और बोले, “वास्तव में तो सुखी यही है, इसे न तो घाटे की चिन्ता न मुनाफे की फिक्र, इसे लाट साहब को पार्टी भी नहीं देनी पड़ती, सुखी तो यही है।”

💐💐शिक्षा:-💐💐

इस प्रसंग से हमें यह पता चलता है कि हम एक-दूसरे को सुखी समझते हैं, पर वास्तव में सुखी कौन है, इसे तो वही जानता है जिसे आन्तरिक शान्ति है, जिसे आन्तरिक सुकून है। आप चाहे भिखारी हों चाहे करोड़पति हों। लेकिन आप के मन में जब तक शांति नहीं है तब तक आपको सुकून नहीं मिल सकता।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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माँ-बाप भगवान का रूप होते हैं। उनकी सेवा कीजिये, और प्यार दीजिये क्योंकि एक दिन आप भी बूढ़े होंगे।

एक पुत्र अपने वृद्ध पिता को रात्रिभोज के लिये एक अच्छे रेस्टोरेंट में लेकर गया। खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया। रेस्टोरेंट में बैठे दूसरे खाना खा रहे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे लेकिन उसका पुत्र शांत था। खाने के बाद पुत्र बिना किसी शर्म के वृद्ध को वॉशरूम ले गया। उनके कपड़े साफ़ किये, चेहरा साफ़ किया, बालों में कंघी की, चश्मा पहनाया, और फिर बाहर लाया। सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे। फ़िर उसने बिल का भुगतान किया और वृद्ध के साथ बाहर जाने लगा। तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने उसे आवाज दी, और पूछा – क्या तुम्हें नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो?

उसने जवाब दिया – नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा। वृद्ध ने कहा – बेटे, तुम यहाँ प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा, सबक और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद छोड़कर जा रहे हो। आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नहीं करते, और कहते हैं – क्या करोगे, आपसे चला तो जाता नहीं, ठीक से खाया भी नहीं जाता, आप तो घर पर ही रहो, वही अच्छा होगा।

लेकिन क्या आप भूल गये कि जब आप छोटे थे, और आपके माता पिता आपको अपनी गोद में उठाकर ले जाया करते थे। आप जब ठीक से खा नहीं पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी, और खाना गिर जाने पर डाँट नही प्यार जताती थी।

फिर वही माँ बाप बुढ़ापे में बोझ क्यों लगने लगते हैं?

माँ-बाप भगवान का रूप होते हैं। उनकी सेवा कीजिये, और प्यार दीजिये क्योंकि एक दिन आप भी बूढ़े होंगे।

शिक्षा:-अपने माता पिता का सर्वदा सम्मान करें..!!

जय श्रीराम

ऋषि और एक चूहा

ऋषि और एक चूहा

एक वन में एक ऋषि रहते थे। उनके डेरे पर बहुत दिनों से एक चूहा भी रहता आ रहा था। यह चूहा ऋषि से बहुत प्यार करता था। जब वे तपस्या में मग्न होते तो वह बड़े आनंद से उनके पास बैठा भजन सुनता रहता. यहाँ तक कि वह स्वयं भी ईश्वर की उपासना करने लगा था। लेकिन कुत्ते-बिल्ली और चील-कौवे आदि से वह सदा डरा-डरा और सहमा हुआ सा रहता।

एक बार ऋषि के मन में उस चूहे के प्रति बहुत दया आ गयी। वे सोचने लगे कि यह बेचारा चूहा हर समय डरा-सा रहता है, क्यों न इसे शेर बना दिया जाए। ताकि इस बेचारे का डर समाप्त हो जाए और यह बेधड़क होकर हर स्थान पर घूम सके।

ऋषि बहुत बड़ी दैवीय शक्ति के स्वामी थे। उन्होंने अपनी शक्ति के बल पर उस चूहे को शेर बना दिया और सोचने लगे कि अब यह चूहा किसी भी जानवर से नहीं डरेगा और निर्भय होकर पूरे जंगल में घूम सकेगा।

लेकिन चूहे से शेर बनते ही चूहे की सारी सोच बदल गई।वह सारे वन में बेधड़क घूमता। उससे अब सारे जानवर डरने लगे और प्रणाम करने लगे। उसकी जय-जयकार होने लगी. किन्तु ऋषि यह बात जानते थे कि यह मात्र एक चूहा है, वास्तव में शेर नहीं है।

अतः ऋषि उससे चूहा समझकर ही व्यवहार करते।यह बात चूहे को पसंद नहीं आई कि कोई भी उसे चूहा समझ कर ही व्यवहार करे।
वह सोचने लगा कि ऐसे में तो दूसरे जानवरों पर भी बुरा असर पड़ेगा. लोग उसका जितना मान करते हैं, उससे अधिक घृणा और अनादर करना आरम्भ कर देंगे।

अतः चूहे ने सोचा कि क्यों न मैं इस ऋषि को ही मार डालूं,फिर न रहेगा बाँस, न बजेगी बांसुरी।

यही सोचकर वह ऋषि को मारने के लिए चल पड़ा!
ऋषि ने जैसे ही क्रोध से भरे शेर को अपनी ओर आते देखा तो वे उसके मन की बात समझ गये! उनको शेर पर बड़ा क्रोध आ गया।

अतः उसका घमंड तोड़ने के लिए  ऋषि ने अपनी दैवीय शक्ति से उसे एक बार फिर चूहा बना दिया।

खुद को पूर्व स्थिति में चूहा बनता देख उसके सारे सपने धरे के धरे रहा गये! उसके हाथ अपने व्यवहार के लिए पछतावा के अलावा कुछ नहीं बचा!

यह प्रसंग हमें यही सीख देता है कि
हमें भी कभी भी अपने हितैषी का अहित नहीं करना चाहिए!
चाहे हम कितने ही बलशाली क्यों न हो जाए!
हमें उन लोगों को हमेशा याद रखना चाहिए;
जिन्होंने हमारे बुरे वक्त में हमारा साथ दिया होता है..
चूहा यदि अपनी असलियत याद रखता
तो उसे फिर से चूहा नहीं बनना पड़ता!

भक्त होने के नाते हमें यह तो कभी नहीं भूलना चाहिय कि –
सद्गुरु के बड़ा हमारा कोइ हितैषी हो नहीं सकता!
हम सभी ने

याचक बनकर उनके शरण में ज्ञान की भीख मांगी!
जब उन्होंने कृपा करके अपनाया, ज्ञानदान दिया
और इसको फलने फूलने के लिय
सेवा, सत्संग और अभ्यास का अवसर दिया

पर हमने अपने उस परम दयालु मालिक के साथ क्या किया?
हम उस चूहे की तरह अहसान फरामोशी करने लग गये!
हम याचक से मालिक बनने का प्रयास करने लग गये!

हम उनके भोले-भाले भक्तों के बीच
ग्रुपवाजी करके खुद को ही गुरु मनवाने का गरूर पाल बैठे!

तो जरा विचार करें –
गुरु महाराजी के साथ हमारा यह व्यवहार
हमारा क्या हस्र करेगा?

पिछले साल के टूर में महाराजी ने पब्लिकली समझाया कि –
छल-कपट और झूठ का व्यवहार गुरु दरवार में नहीं चलेगा!

इसलिय हम सभी शरणागत भक्तों के लिय यही हितकर होगा कि –
उनकी आज्ञा में रहकर, उनकी इच्छा अनुसार, सेवक की तरह, उनके द्वारा दिए अवसरों को आनन्द लिया जाय!
ताकि मनुष्य जीवन का सही मायने में आनन्द मिल सके!

अन्यथा पुनः मूषकः भव् का आप्सन भी सभी के लिय खुला हुआ है!
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मौन और मुस्कान की सफलता

मौन और मुस्कान की सफलता

मैं मौमु सेठ के बारे में बहुत तो नहीं जानता! पर इतना तो जानता ही हूँ कि वह पहले से ही सेठ नहीं था। वह तो एक गरीब आदमी था! झन्नु उसका नाम था।
झन्नु हमेशा झन्नाया रहता। बिना बात का झगड़ा करना तो उसके स्वभाव में ही था। किसी ने पूछ लिया कि झन्नु भाई टाईम क्या हुआ होगा? तो झन्नु झनझना जाता और कहता- यह घड़ी तेरे बाप ने ले कर दी है? यहाँ टाईम पहले ही खराब चल रहा है, तूं और आ गया मेरा टाईम खाने। भाग यहाँ से!

अब ऐसे आदमी के साथ कौन काम करे? न उसके पास कोई ग्राहक टिकता, न नौकर। यही कारण था कि वो जो भी काम करता था, उसमें उसे नुकसान ही होता था।

कहते हैं कि एक संत एक बार झन्नु के पास से गुजरे। वे कभी किसी से कुछ माँगते नहीं थे!
पर न मालूम उनके मन में क्या आया, सीधे झन्नु के सामने आ खड़े हुए। बोले- बेटा! संत को भोजन करा देगा?

अब झन्नु तो झन्नु ही ठहरा। झन्ना कर बोला- मैं खुद भूखे मर रहा हूँ, तूं और आ गया। चल चल अपना काम कर।

संत मुस्कुराए और बोले- मैं तो अपना काम ही कर रहा हूँ और वह भी बिल्कुल सही से कर रहा हूँ। असल में, तुम ही अपना काम सही से नहीं कर रहे हो!

झन्नु झटका खा गया। उसे ऐसे उत्तर की उम्मीद नहीं थी। पूछने लगा- क्या मतलब?

संत उसके पास बैठ गए। बोले- बेटा! मालूम है तुम्हारा नाम झन्नु क्यों है? क्योंकि झन्नाया रहना और नुकसान उठाना, यही तुम करते आए हो।
अगर तुम अपना स्वभाव बदल लो, तो तुम्हारा जीवन बदल सकता है। मेरी बात मानो तो चाहे कुछ भी हो जाए, खुश रहा करो।

झन्नु बोला- महाराज! खुश कैसे रहूँ? मेरा तो नसीब ही खराब है।

संत बोले- खुशनसीब वह नहीं है- जिसका नसीब अच्छा है!
बल्कि खुशनसीब वह है जो अपने नसीब से खुश है।
तुम खुश रहने लगो तो नसीब बदल भी सकता है।

तुम नहीं जानते कि कामयाब आदमी खुश रहे न रहे, पर खुश रहने वाला एक ना एक दिन कामयाब जरूर होता है।

झन्नु बोला- महाराज! दुनिया बड़ी खराब है! और मेरा ढंग ही ऐसा है कि मुझसे झूठ बोला नहीं जाता।

संत बोले- झन्नु! झूठ नहीं बोल सकते पर चुप तो रह सकते हो?

तुम दो सूत्र पकड़ लो और वह है – मौन और मुस्कान।
मुस्कान समस्या का समाधान कर देती है।
मौन समस्या का बंद कर देता है।

चाहे जो भी हो जाए – तुम चुप रहा करो और मुस्कुराया करो। फिर देखो क्या होगा?

झन्नु को संत की बात जंच गई और भगवान की कृपा से उसका स्वभाव और भाग्य दोनों बदल गए।
फल क्या मिला? समय बदल गया, झन्नु मौन और मुस्कान के सहारे चलते चलते मौमु सेठ बन गया।

यह बात सभी को सोचनी चाहिय कि आप टेलिविज़न नहीं हैं जो आपका रिमोट दूसरे के हाथ रहे।
वह चाहे तो आप हंसें! और वह चाहे तो रोएँ।
हमारा चेहरा हमारा है। यह हंसेगा या रोएगा, इसका निर्णय दूसरा क्यों करे?
अपने जीवन में अभी निर्णय करो, कि सचाहे कुछ भी क्यों न हो जाए, हम सदा मुस्कुराएँगे।
तब दुनिया में कोई भी आपके चेहरे की मुस्कान न छीन पाएगा।

याद रहे-
“गुजरी हुई जिंदगी को कभी याद ना कर,
तकदीर में जो नहीं तो फ़रियाद ना कर।
जो होना होगा वो होकर ही रहेगा!
कल की फिक्र में, आज हंसी बर्बाद ना कर॥”

इसलिय
सदैव प्रसन्न रहिये और अधिकतर मौन धारण कीजिय!
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।

आपका आज का दिन मंगलमय हो और आपको सपरिवार लोहड़ी, मकरसंक्रांति, पोंगल और बिहु आदि पर्वों की हार्दिक शुभकामनायें।
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तुम बचे गये तो चरण दूर। तुम मिट गये तो चरण पास।

मन बेचें सतगुरु के पास तिस सेवक के सब कारज रास
अहंकार जिस भेंट के साथ जुड़ा है वह अपवित्र हो जाती है। चाहे दुनियाँ का साम्राज्य भी लेकर जाओ। निरंहकार भाव से तुम खाली हाथ लेकर भी गये तो वह भेंट स्वीकार हो जाती है।
महात्मा बुद्ध के जीवन में उल्लेख है। एक सम्राट बुद्ध से मिलने आया। स्वभावतः सम्राट है तो उसने एक बहुमुल्य कोहेनूर जैसा हीरा अपने हाथ में ले लिया। चलते वक्त उसकी पत्नी ने कहा कि पत्थर ले जा रहे हो। माना कि मुल्यवान है लेकिन बुद्ध के लिये इसका क्या मूल्य, जिसने सब साम्राज्य छोड़ दिया उसके लिये पत्थर ले जा रहे हो। यह भेंट कुछ जँचती नहीं। अच्छा तो हो कि अपने महल के सरोवर में पहला कमल खिला है मौसम का, वही ले जाओ। वह कम से कम जीवित तो है। इस पत्थर में क्या है? यह तो जड़ है बिल्कुल बन्द है।

बात उसे जँची सोचा कि एक हाथ खाली भी है पत्थर तो ले ही जाऊँगा। क्योंकि मुझे तो यही कीमती लगता है। वही चढ़ाऊँगा जिसका कुछ मुल्य है लेकिन तू कहती है हो सकता है तेरी बात भी ठीक हो। बुद्ध को मैं जानता नहीं कि किस प्रकार के आदमी है। एक हाथ में कमल एक हाथ में हीरा लेकर सम्राट, बुद्ध के चरणों में गया। जैसे ही बुद्ध के पास पहुँचा और हीरे का हाथ उसने आगे बढ़ाया बुद्ध ने कहा गिरा दो। मन में उसके अहंकार को बड़ी चोट लगी। चढ़ा दो नहीं, गिरा दो कहा। बहुमुल्य चीज़ है गिराने के लिये कहा। अगर अब गिराया नहीं तो भी फज़ीहत होगी हज़ारों भिक्षु देख रहे हैं। उसने बड़े बेमन से गिरा दिया। सोचा शायद पत्नी ने ठीक ही कहा था। दूसरा हाथ आगे बढ़ाया और ज़रा ही आगे बढ़ा था कि बुद्ध ने फिर कहा गिरा दो। सम्राट सोचने लगा कि ये कुछ भी नहीं समझते। न बुद्धि की बात, न ह्मदय की बात समझते हैं। बुद्धि के लिये हीरा था, गणित था धन था। प्रेम, कमल है, ह्मदय का भाव है और इसको भी कहते हैं गिरा दो। मेरी पत्नी तो इनके चरणों में रोज़ आती है। वह इन्हें पहचानती है। उसने जब गिरा दिया तो वह खाली हाथ बुद्ध की तरफ झुकने लगा। बुद्ध ने कहा, गिरा दो। सोचने लगा अब कुछ है ही नहीं गिराने को दोनों हाथ खाली हैं। उसने कहा अब क्या गिरा दूँ? बुद्ध तो चुप रहे बुद्ध के एक भिक्षु सारिपुत्त ने कहा, अपने को गिरा दो। हीरे और कमलों को गिराने से क्या होगा? शुन्यवत हो जाओ तो ही उनके चरणों का स्पर्श हो पाएगा। तुम बचे गये तो चरण दूर। तुम मिट गये तो चरण पास। तब कहते हैं सम्राट को उसी क्षण बोध हुआ। वह गिर गया। जब उठा दूसरा ही आदमी था, महल की तरफ वापिस न गया भिक्षु हो गया। किसी ने समझाया इतनी जल्दी। उसने कहा जब मैं ही न रहा तो वापिस कौन जाये? जो आया था वह अब नहीं है, अब बुद्ध मुझमें समा गये हैं

हे दीनानाथ ! मैं भी तो खोटा सिक्का हूँ इसलिए मैंने खोटा सिक्का ले लिया!

एक मालिक का प्यारा भक्त था – जिसका नाम करतार था!
वह छोले बेचने का काम करता था! उसकी पत्नी रोज सुबह-सवेरे उठ छोले बनाने में उसकी मदद करती थी!
एक बार की बात है कि एक फकीर – जिसके पास खोटे सिक्के थे उसको सारे बाजार में कोई वस्तु नहीं देता हैं तो वह करतार के पास छोले लेने आता है! करतार ने खोटा सिक्का देखकर भी *उस मालिक के प्यारे बंदे फ़क़ीर को छोले दे दिए।

ऐसे ही चार-पांच दिन उस फकीर ने करतार को खोटे सिक्के देकर छोले ले लिए और उसके खोटे सिक्के चल गए और जब सारे बाजार में अब यह बात फैल गयी की करतार तो खोटे सिक्के भी चला लेता हैं पर करतार लोगों की बात सुनकर कभी जबाव नहीं देते थे और अपने मालिक की मौज में खुश रहते थे।

एक बार जब करतार अरदास करके उठे तो अपनी पत्नी से बोले – “क्या छोले तैयार हो गए?”
पत्नी बोली – “आज तो घर में हल्दी-मिर्च नहीं थी और मैं बाजार से लेने गयी तो सब दुकानदारों ने कहा कि-यह तो खोटे सिक्के हैं और उन्होंने सामान नहीं दिया।”

पत्नी के शब्द सुनकर करतार मालिक की याद में बैठ गए और मालिक से बोले – “जैसी तेरी इच्छा! तेरे भाणे को कौन जान सका हैं!”

तभी आकाशवाणी हुई – ” क्यों करतार तू जानता नहीं था कि यह खोटे सिक्के हैं?”

करतार बोला – “सच्चे पातशाह ! मैं जानता था!”

मालिक ने कहा – “फिर भी तूने खोटे सिक्के ले लिए? ऐसा क्यूँ भले मानुष?

करतार बोला – “हे दीनानाथ ! मैं भी तो खोटा सिक्का हूँ इसलिए मैंने खोटा सिक्का ले लिया!

मैंने सोचा कि कहीं मैं तेरे दरबार में जाऊँ तो तू मुझे अपने दरबार से नकार ना दे! क्योंकि आप तो खरे सिक्के ही नवाजते हो! वैसे आप स्वयं ज़ानीज़ान हो! खोटे सिक्कों को भी आपके दरबार में जगह मिल सकें – इसलिए; मेरे परवर दिगार मैंने यह हिमाकत की!”

थोड़ी देर में दूसरी आकाशवाणी हुई – “हे भले मानुष! तेरी दरबार में हाज़िरी क़बूल हो गयी है! तू मालिक का खोटा नहीं, खरा सिक्का हैं।
भक्त को हमेशा यही प्रार्थना करनी चाहिय कि –
मैं अपराधी जन्म का, नख शिख भरा विकार!
तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो सम्हार!!

ये कौशल आपको कार्यस्थल और आपकी नौकरी की भूमिका में सफल होने में मदद करते हैं।

➡️ अपने संचार कौशल में सुधार करें (Communication Skills)

➡️ इमोशनल इंटेलिजेंस पर काम करें (Emotional Intelligence)

➡️अपनी टीमवर्क क्षमताओं को मापें (Teamwork)

➡️ लंबे समय तक काम करने की अपनी इच्छा का प्रदर्शन करें

➡️ अपने कार्यस्थल उत्पादकता में सुधार करें (#productivity)

➡️ अपना आत्मविश्वास बढ़ाएं (Self confidence)

➡️ व्यावसायिक संबंध बनाएं (#Networking)

नियोक्ता अक्सर उत्कृष्ट सॉफ्ट स्किल्स वाले उम्मीदवारों की तलाश करते हैं, इसलिए उन्हें अपने नौकरी आवेदनों में उजागर करना हमेशा एक अच्छा विचार है।

इस कारण से, यह आवश्यक है आप अपनी सॉफ्ट स्किल्स पर काम करें।

ज्ञान की पहचान

ज्ञान की पहचान !!

किसी जंगल में एक संत महात्मा रहते थे! सन्यासियों वाली वेशभूषा थी और बातों में सदाचार का भाव, चेहरे पर इतना तेज था कि कोई भी इंसान उनसे प्रभावित हुए नहीं रह सकता था!

एक बार जंगल में शहर का एक व्यक्ति आया और वो जब महात्मा जी की झोपड़ी से होकर गुजरा तो देखा बहुत से लोग महात्मा जी के दर्शन करने आये हुए थे! वो महात्मा जी के पास गया और बोला कि आप अमीर भी नहीं हैं, आपने महंगे कपडे भी नहीं पहने हैं, आपको देखकर मैं बिल्कुल प्रभावित नहीं हुआ फिर ये इतने सारे लोग आपके दर्शन करने क्यों आते हैं?

महात्मा जी ने उस व्यक्ति को अपनी एक अंगूठी उतार कर दी और कहा कि आप इसे बाजार में बेच कर आएं और इसके बदले एक सोने की माला लेकर आना!

अब वो व्यक्ति बाजार गया और सब की दुकान पर जा कर उस अंगूठी के बदले सोने की माला मांगने लगा! लेकिन सोने की माला तो क्या उस अंगूठी के बदले कोई पीतल का एक टुकड़ा भी देने को तैयार नहीं था! थक हार के व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास पहुंचा और बोला कि इस अंगूठी की तो कोई कीमत ही नहीं है!

महात्मा जी मुस्कुराये और बोले कि अब इस अंगूठी को सुनार गली में जौहरी की दुकान पर ले जाओ! वह व्यक्ति जब सुनार की दुकान पर गया तो सुनार एक माला नहीं बल्कि अंगूठी के बदले पांच माला देने को तयार हो गया!

वह व्यक्ति बड़ा हैरान हुआ कि इस मामूली सी अंगूठी के बदले कोई पीतल की माला देने को तैयार नहीं हुआ लेकिन ये सुनार कैसे 5 सोने की माला दे रहा है! व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास गया और उनको सारी बातें बतायीं.

अब महात्मा जी बोले कि चीजें जैसी ऊपर से दिखती हैं, अंदर से वैसी नहीं होती! ये कोई मामूली अंगूठी नहीं है बल्कि *ये एक हीरे की अंगूठी है जिसकी पहचान केवल सुनार ही कर सकता था! इसलिए वह 5 माला देने को तैयार हो गया!

ठीक वैसे ही मेरी वेशभूषा को देखकर तुम मुझसे प्रभावित नहीं हुए लेकिन ज्ञान का प्रकाश लोगों को मेरी ओर खींच लाता है!
वह व्यक्ति महात्मा जी की बातें सुनकर बड़ा शर्मिंदा हुआ!

यह सच है की बाहरी वेशभूषा से व्यक्ति की पहचान नहीं होती बल्कि आचरण और ज्ञान से व्यक्ति की पहचान होती है!

संतों ने कहा भी है कि –
भेष देख मत भूलिए, पूछ लिजिय ज्ञान!
मोल करो तलवार की, पड़ी रहन दो म्यान!!
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जीवन की मूल संपदा-परिष्कृत व्यक्तित्व

जीवन की मूल संपदा – परिष्कृत व्यक्तित्व

👉 “व्यक्तित्व” ही मनुष्य की मूल संपदा है । इसकी श्रेष्ठता और निकृष्टता के आधार पर ही किसी व्यक्ति का श्रेष्ठ या निकृष्ट होना निर्भर है।
प्रश्न उठता है कि यह “व्यक्तित्व” क्या है ?
मनुष्य जो दिखाई देता है, आचरण, रहन-सहन व बोल-चाल व्यवहार का जैसा जो कुछ प्रभाव छोड़ता है क्या वही व्यक्तित्व है?
इसका उत्तर निश्चित ही “नहीं” में है।
“व्यक्तित्व” में ये सब बातें समाहित तो है, पर वह इन सबके जोड़ से भी ऊपर बहुत कुछ भिन्न है।

आँख से देखने पर तो व्यक्तित्व शरीर की बनावट, आकर्षक साज-सज्जा, आकर्षक चाल-ढाल और शिष्टाचार पर अवलंबित दीखता है,
पर परख की दृष्टि जब गहराई में प्रवेश करती है, तो गुण, कर्म, स्वभाव का दृष्टिकोण एवं चरित्र का समुच्चय ही “व्यक्तित्व” की कसौटी बन जाता है।

👉 सम्मानित और तिरस्कृत, समुन्नत और पतित, प्रखर और पिछड़े लोगों के बीच पाया जाने वाला अंतर तो परिस्थितिजन्य दीखता है-
पर वस्तुतः यह विभेद अंत:स्थिति का होता है।

यह अंत:स्थिति जो मान्यता-अभिरुचि और आदत के रूप में समूचे अंतराल पर कब्जा जमाए बैठी है। अंत:क्षेत्र से उठने वाली सुगंध अथवा दुर्गंध ही समीपवर्ती वातावरण को उल्लसित एवं कलुषित बनाती है।अंतराल ही बाह्य जगत में प्रतिबिंबित होता है और स्वर्गीय एवं नारकीय प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है ।
अपना ही स्वभाव समीपवर्ती लोगों के साथ सहयोग एवं विग्रह के अवसर रचता और इन्हें चित्र-विचित्र घटनाक्रर्मों के रुप में सामने ला खड़ा करता है!

👉 जीवन का सबसे बड़ा उपार्जन एवं वैभव परिष्कृत “व्यक्तित्व” ही है।
पग-पग पर मानवीय अनुदानों और दैवी वरदानों के उपहार बरसाने वाला सौभाग्य और कुछ नहीं मनुष्य का स्व उपार्जित व्यक्तित्व ही है।

कोई किसी को यदि वस्तुतः कोई ठोस अनुदान दे सकता है तो वह एक ही अनुग्रह है कि व्यक्तित्व को परिष्कृत करने में सहायता की जाए।
अन्य संपदाएँ ऐसी हैं, जिन्हें कोई किसी को कितने ही बडे़ परिमाण में देकर भी वास्तविक साधन नहीं कर सकता।

उपकार वही सार्थक है, जो “व्यक्तित्व” को विकसित करने की सहायता के रूप में लिया या दिया जा सके। अनुग्रह वही धन्य है जो प्रखरता और प्रतिभा निखारने में सहयोग प्रदान करें।
सौभाग्यशाली वे हैं – जिनको “सुसंस्कृत” लोगों का सान्निध्य मिल पाया और उन्होंने अपने व्यव्हार, व्यक्तित्व को गरिमामय बनाने का सतत अभ्यास जारी रख्खा है!