धैर्य

धैर्य

एक बार एक व्यक्ति अकेला उदास बैठा कुछ सोच रहा था कि उसके पास भगवान आये और भगवान को अपने समक्ष देख उस व्यक्ति ने पूछा, मुझे ज़िन्दगी में बहुत असफलताएं मिली! अब मैं निराश हो चूका हूँ! हे भगवन, मुझे बताओ कि मेरे इस जीवन की क्या कीमत है?

भगवान ने उस व्यक्ति को एक लाल रंग का चमकदार पत्थर दिया और कहा “जाओ इस पत्थर की कीमत का पता लगा लो! तुम्हे अपनी ज़िन्दगी की कीमत का भी पता चल जाएगा! लेकिन ध्यान रहे कि इस पत्थर को बेचना नहीं है!”

वो व्यक्ति उस लाल चमकदार पत्थर को लेकर सबसे पहले एक फल वाले के पास गया और कहा “भाई..ये पत्थर कितने का खरीदोगे?”

फल वाले ने पत्थर को ध्यान से देखा और कहा “मुझसे 10 संतरे ले जाओ और ये पत्थर मुझे दे दो!”

उस व्यक्ति ने कहा कि, नहीं, मैं ये पत्थर बेच नहीं सकता! फिर वो आदमी एक सब्ज़ी वाले के पास गया और उसे कहा, “भाई …ये लाल पत्थर कितने का खरीदोगे?”

सब्ज़ी वाले ने कहा कि मुझसे एक बोरी आलू की ले जाओ और ये पत्थर मुझे बेच दो! लेकिन भगवान् के कहे अनुसार उस व्यक्ति ने कहा कि नहीं, मैं ये बेच नहीं सकता!

फिर वो व्यक्ति उस पत्थर को लेकर एक सुनार की दूकान में गया जहाँ कई तरह-तरह के आभूषण पड़े हुए थे! उस व्यक्ति ने सुनार को वो पत्थर दिखाया और उस सुनार ने बड़े गौर से उस पत्थर को देखा और फिर कहा, “मैं तुम्हे 1 करोड़ रुपये दूंगा, ये पत्थर मुझे बेच दो!” फिर उस व्यक्ति ने सुनार से माफ़ी मांगी और कहा कि ये पत्थर मैं बेच नहीं सकता। सुनार ने फिर कहा “अच्छा चलो ठीक है! मैं तुम्हे 2 करोड़ दूंगा! ये पत्थर मुझे बेच दो!”

सुनार की बात सुनकर वो व्यक्ति चौंक गया लेकिन सुनार को मना कर वो आगे बढ़ गया और एक हीरे बेचने वाले की दूकान में गया!

हीरे के व्यापारी ने उस लाल चमकदार पत्थर को पूरे 10 मिनट तक देखा और फिर एक मलमल का कपडा लिया और उस पत्थर को उस पे रख दिया। फिर उस व्यापारी ने अपना सर उस पत्थर पर लगा कर माथा टेका और कहा “तुम्हे ये कहा मिला! ये इस दुनिया में सबसे अनमोल रत्न है! अगर इस दुनिया की पूरी दौलत भी लगा दी जाए तो इस पत्थर को नहीं खरीद सकता!”

ये सुन वो व्यक्ति बहुत हैरान हुआ और सीधा भगवान के पास गया और उन्हें आप बीती बताई और फिर उसने भगवान से पूछा, “हे भगवन अब मुझे बताईये कि मेरे इस जीवन की क्या कीमत है?”

भगवान ने कहा “फल वाले ने, सब्ज़ी वाले ने, सुनार ने और हीरे के व्यापारी ने तुम्हें जीवन की कीमत बता दी थी! हे मनुष्य, किसी के लिए तुम एक पत्थर के टुकड़े सामान हो और किसी के लिए बहुमूल्य रत्न समान।

हर किसी ने अपनी जानकारी के अनुसार तुम्हें उस पत्थर की कीमत बताई लेकिन उस हीरे के व्यापारी ने इस पत्थर को पहचान लिया। ठीक उसी तरह कुछ लोग तुम्हारी कीमत नहीं पहचानते! इसलिए ज़िन्दगी में कभी निराश मत हो!

इस दुनिया में हर मनुष्य के पास कोई ना कोई ऐसा हुनर होता है जो सही वक़्त पर निखार कर आता है लेकिन उसके लिए परिश्रम और धैर्य की ज़रूरत है!
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कर्मों का खेल

कंस को मारने के बाद भगवान श्रीकृष्ण कारागृह में गए और वहां से माता देवकी तथा पिता वसुदेव को छुड़ाया।

तब माता देवकी ने श्रीकृष्ण से पूछा, “बेटा, तुम तो भगवान हो, तुम्हारे पास असीम शक्ति है, फिर तुमने चौदह साल तक कंस को मारने और हमें यहां से छुड़ाने की प्रतीक्षा क्यों की?”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “क्षमा करें आदरणीय माता जी, क्या आपने मुझे पिछले जन्म में चौदह साल के लिए वनवास में नहीं भेजा था।”

माता देवकी आश्चर्यचकित हो गईं और फिर पूछा, “बेटा कृष्ण, यह कैसे संभव है? तुम ऐसा क्यों कह रहे हो ?”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “माता, आपको अपने पूर्व जन्म के बारे में कुछ भी स्मरण नहीं है। परंतु तब आप कैकेई थीं और आपके पति राजा दशरथ थे।”

माता देवकी ने और ज्यादा आश्चर्यचकित होकर पूछा, “फिर महारानी कौशल्या कौन हैं ?”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “वही तो इस जन्म में माता यशोदा हैं। चौदह साल तक जिनको पिछले जीवन में मां के जिस प्यार से वंचित रहना पड़ा था, वह उन्हें इस जन्म में मिला है।”अर्थात्, प्रत्येक प्राणी को इस भू मृत्युलोक में अपने कर्मों का भोग भोगना ही पड़ता है । यहां तक कि देवी-देवता भी इससे अछूते नहीं हैं।

इसलिय शास्त्रों में कहा है कि –
शुभाशुभफलं प्रेत्य लभते भूतसाक्षिकम्।
अतिरिच्येत यो यत्र तत्कर्ता लभते फलम्।।
मनुष्य के अच्छे और बुरे कर्म के साक्षी पंचमहाभूत होते हैं इन कर्मों का फल मृत्यु के बाद मिलता है अच्छे और बुरे कर्मों में जैसे कर्म अधिक होते हैं उनका फल पहले मिलता है।
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एक कौवा और गरुड़

एक कौवा और गरुड़

एक बार एक कौआ मांस के एक टुकड़े को पकड़कर कहीं एकांत में बैठने और उसे खाने के लिए उड़ रहा था। ईगल्स का एक झुंड उसका पीछा कर रहा था। कौवा चिन्तित था और ऊँची और ऊँची उड़ान भर रहा था, फिर भी चील गरीब कौवे के पीछे थी।

तभी “गरुड़” ने कौवे की आंखों में दुर्दशा और पीड़ा देखी। कौवे के करीब आकर उसने पूछा: “क्या दिक्कत है? आप बहुत परेशान और तनाव में हैं?”

कौवा रोया – “इन बाजों को देखो! वे मुझे मारने के लिए मेरे पीछे हैं!”

गरुड़ ज्ञान का पक्षी होने के कारण बोला “अरे मेरे मित्र, वे तुम्हें मारने के लिए तुम्हारे पीछे नहीं हैं! वे मांस के उस टुकड़े के पीछे हैं – जिसे आप अपनी चोंच में पकड़े हुए हैं!
बस इसे गिराएं और देखें कि क्या होगा।

कौवे ने गरुड़ के निर्देशों का पालन किया और मांस का टुकड़ा गिरा दिया! और तुम जहाँ जाना चाहते हो – वहाँ जाओ! सभी चील उसका पीछा छोड़ – गिरते हुए मांस की ओर उड़ गए।

गरुड़ ने मुस्कुराते हुए कहा *”दर्द केवल तब तक है- जब तक आप इसे पकड़ते हैं!
उपाय एक ही है कि उसे छोड़ दीजिये!”

कौवा झुककर बोला, “मैंने मांस का यह टुकड़ा गिरा दिया तो अब, मैं और भी ऊंची उड़ान भर सकता हूँ!

इस कहानी से हमारे लिए भी एक संदेश भी है:

  1. लोग “अहंकार” नामक विशाल बोझ को ढोते हैं, जो हमारे बारे में एक झूठी पहचान बनाता है! हम अपने लिए यह कहते हुए पैदा करते हैं कि “मुझे प्यार की ज़रूरत है, मुझे आमंत्रित करने की आवश्यकता है, मैं ऐसा हूं और इसलिए ..” आदि-आदि!
    इस अहंकार से बचने का उपाय – बस गिरा दो!
  2. लोग “अन्य कार्यों” से तेजी से चिढ़ जाते हैं, यह मेरा दोस्त, मेरे माता-पिता, मेरे बच्चे, मेरा सहयोगी, मेरा जीवन साथी हो सकता है … और मुझे “क्रोध”आता है – उस क्रोध से बचने का उपाय – बस गिरा दो!
  3. लोग खुद की तुलना दूसरों से करते हैं .. सुंदरता, धन, जीवन शैली, अंक, प्रतिभा और मूल्यांकन में और परेशान महसूस करते हैं … हमें जो कुछ भी है उसके प्रति आभारी होना चाहिए! तुलना, नकारात्मक भावनाएं घर कर जाती हैं – उनसे बचने का उपाय – बस गिरा दो!

मनुष्य के बार-बार जन्म-मरण का क्या कारण है?

मनुष्य के बार-बार जन्म-मरण का क्या कारण है?

एक बार द्वारकानाथ श्रीकृष्ण अपने महल में दातुन कर रहे थे। रुक्मिणी जी स्वयं अपने हाथों में जल लिए उनकी सेवा में खड़ी थीं। अचानक द्वारकानाथ हंसने लगे। रुक्मिणी जी ने सोचा कि शायद मेरी सेवा में कोई गलती हो गई है; इसलिए द्वारकानाथ हंस रहे हैं।

रुक्मिणी जी ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, ‘प्रभु! आप दातुन करते हुए अचानक इस तरह हंस क्यों पड़े, क्या मुझसे कोई गलती हो गई? कृपया, आप मुझे अपने हंसने का कारण बताएं।’

श्रीकृष्ण बोले, ‘नहीं, प्रिये! आपसे सेवा में त्रुटि होना कैसे संभव है? आप ऐसा न सोचें, बात कुछ और है।’

रुक्मिणी जी ने कहा, ‘आप अपने हंसने का रहस्य मुझे बता दें तो मेरे मन को शान्ति मिल जाएगी; अन्यथा मेरे मन में बेचैनी बनी रहेगी।’

तब श्रीकृष्ण ने मुसकराते हुए रुक्मिणी जी से कहा, ‘देखो, वह सामने एक चींटा चींटी के पीछे कितनी तेजी से दौड़ा चला जा रहा है। वह अपनी पूरी ताकत लगा कर चींटी का पींछा कर उसे पा लेना चाहता है। उसे देख कर मुझे अपनी मायाशक्ति की प्रबलता का विचार करके हंसी आ रही है।’”

रुक्मिणी जी ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, ‘वह कैसे प्रभु? इस चींटी के पीछे चींटे के दौड़ने पर आपको अपनी मायाशक्ति की प्रबलता कैसे दीख गई?’

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, ‘मैं इस चींटे को चौदह बार इंद्र बना चुका हूँ। चौदह बार देवराज के पद का भोग करने पर भी इसकी भोगलिप्सा समाप्त नहीं हुई है। यह देख कर मुझे हंसी आ गई।’

इंद्र की पदवी भी भोग योनि है। मनुष्य अपने उत्कृष्ट कर्मों से इंद्रत्व को प्राप्त कर सकता है। सौ अश्वमेध यज्ञ करने वाला व्यक्ति इंद्र-पद प्राप्त कर लेता है। लेकिन जब उनके भोग पूरे हो जाते हैं तो उसे पुन: पृथ्वी पर आकर जन्म ग्रहण करना पड़ता है।

प्रत्येक जीव इंद्रियों का स्वामी है; परंतु जब जीव इंद्रियों का दास बन जाता है तो जीवन कलुषित हो जाता है और बार-बार जन्म-मरण के बंधन में पड़ता है। वासना ही पुनर्जन्म का कारण है। जिस मनुष्य की जहां वासना होती है, उसी के अनुरूप ही अंतसमय में चिंतन होता है और उस चिंतन के अनुसार ही मनुष्य की गति, ऊंच-नीच योनियों में जन्म होता है। अत: वासना को ही नष्ट करना चाहिए। वासना पर विजय पाना ही सुखी होने का उपाय है।

बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ,
विषय भोग बहु घी ते ।

अग्नि में घी डालते जाइये, वह और भी धधकेगी, यही दशा काम की है। उसे बुझाना हो तो संयम रूपी शीतल जल डालना होगा।

संसार का मोह छोड़ना बहुत कठिन है। वासनाएं बढ़ती हैं तो भोग बढ़ते हैं, इससे संसार कटु हो जाता है। वासनाएं जब तक क्षीण न हों तब तक मुक्ति नहीं मिलती है। पूर्वजन्म का शरीर तो चला गया परन्तु पूर्वजन्म का मन नहीं गया।

नास्ति तृष्णासमं दु:खं नास्ति त्यागसमं सुखम्।
सर्वांन् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ।।

तृष्णा के समान कोई दु:ख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है। समस्त कामनाओं मान, बड़ाई, स्वाद, शौकीनी, सुख-भोग, आलस्य आदि का परित्याग करके केवल भगवान की शरण लेने से ही मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है। अपने अन्दर के अविनाशी से उसका सम्बन्ध जुड़ जाता है!

इसलिय भक्त ह्रदय से हमेशा उनके दर्शनों की आस बनी रहनी चाहिय –
नहीं है भोग की वांछा, न दिल में लालसा धन की ।
प्यास दरसन की भारी है, सफल कर आस को मेरी ।।
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तीन पुतले

तीन पुतले

महाराजा चन्द्रगुप्त का दरबार लगा हुआ था। सभी सभासद अपनी अपनी जगह पर विराजमान थे। महामन्त्री चाणक्य दरबार की कार्यवाही कर रहे थे।

महाराजा चन्द्र्गुप्त को खिलौनों का बहुत शौक था। उन्हें हर रोज़ एक नया खिलौना चाहिए था। आज भी महाराजा के पूछने पर कि क्या नया है; पता चला कि एक सौदागर आया है और कुछ नये खिलौने लाया है। सौदागर का ये दावा है कि महाराज या किसी ने भी आज तक ऐसे खिलौने न कभी देखें हैं और न कभी देखेंगे। सुन कर महाराज ने सौदागर को बुलाने की आज्ञा दी। सौदागर आया और प्रणाम करने के बाद अपनी पिटारी में से तीन पुतले निकाल कर महाराज के सामने रख दिए और कहा कि अन्नदाता ये तीनों पुतले अपने आप में बहुत विशेष हैं। देखने में भले एक जैसे लगते हैं मगर वास्तव में बहुत निराले हैं। पहले पुतले का मूल्य एक लाख मोहरें हैं, दूसरे का मूल्य एक हज़ार मोहरे हैं और तीसरे पुतले का मूल्य केवल एक मोहर है।

सम्राट ने तीनों पुतलों को बड़े ध्यान से देखा। देखने में कोई अन्तर नहीं लगा, फिर मूल्य में इतना अन्तर क्यों? इस प्रश्न ने चन्द्रगुप्त को बहुत परेशान कर दिया। हार के उसने सभासदों को पुतले दिये और कहा कि इन में क्या अन्तर है मुझे बताओ। सभासदों ने तीनों पुतलों को घुमा फिराकर सब तरफ से देखा मगर किसी को भी इस गुत्थी को सुलझाने का जवाब नहीं मिला। चन्द्रगुप्त ने जब देखा कि सभी चुप हैं तो उस ने वही प्रश्न अपने गुरू और महामन्त्री चाणक्य से पूछा।

चाणक्य ने पुतलों को बहुत ध्यान से देखा और दरबान को तीन तिनके लाने की आज्ञा दी। तिनके आने पर चाणक्य ने पहले पुतले के कान में तिनका डाला। सब ने देखा कि तिनका सीधा पेट में चला गया, थोड़ी देर बाद पुतले के होंठ हिले और फिर बन्द हो गए। अब चाणक्य ने अगला तिनका दूसरे पुतले के कान में डाला। इस बार सब ने देखा कि तिनका दूसरे कान से बाहर आगया और पुतला ज्यों का त्यों रहा। ये देख कर सभी की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी कि आगे क्या होगा। अब चाणक्य ने तिनका तीसरे पुतले के कान में डाला। सब ने देखा कि तिनका पुतले के मुँह से बाहर आगया है और पुतले का मुँह एक दम खुल गया। पुतला बराबर हिल रहा है जैसे कुछ कहना चाहता हो।
चन्द्रगुप्त के पूछ्ने पर कि ये सब क्या है और इन पुतलों का मूल्य अलग अलग क्यों है, चाणक्य ने उत्तर दिया।

राजन, चरित्रवान सदा सुनी सुनाई बातों को अपने तक ही रखते हैं और उनकी पुष्टी करने के बाद ही अपना मुँह खोलते हैं। यही उनकी महानता है। पहले पुतले से हमें यही ज्ञान मिलता है और यही कारण है कि इस पुतले का मूल्य एक लाख मोहरें है।

कुछ लोग सदा अपने में ही मग्न रहते हैं। हर बात को अनसुना कर देते हैं। उन्हें अपनी वाह-वाह की कोई इच्छा नहीं होती। ऐसे लोग कभी किसी को हानि नहीं पहुँचाते। दूसरे पुतले से हमें यही ज्ञान मिलता है और यही कारण है कि इस पुतले का मूल्य एक हज़ार मोहरें है।

कुछ लोग कान के कच्चे और पेट के हलके होते हैं। कोई भी बात सुनी नहीं कि सारी दुनिया में शोर मचा दिया। इन्हें झूठ सच का कोई ज्ञान नहीं, बस मुँह खोलने से मतलब है। यही कारण है कि इस पुतले का मूल्य केवल एक मोहर है।

आप कौन से पुतले है

💐💐शिक्षा💐💐

दोस्तों, जीवन मे किसी भी बात को पहले जांच परख करने के बाद ही उस पर अपने विचार प्रकट करने चाहिए,सुनी सुनाई बातों पर कभी विश्वास नही करना चाहिए।

कहाँ छुपी हैं शक्तियां

कहाँ छुपी हैं शक्तियां

एक बार देवताओं में चर्चा हो रहो थी। चर्चा का विषय था मनुष्य कि हर मनोकामनाओं को पूरा करने वाली गुप्त चमत्कारी शक्तियों को कहाँ छुपाया जाये?
सभी देवताओं में इस पर बहुत वाद- विवाद हुआ।
एक देवता ने अपना मत रखा और कहा कि इसे हम एक जंगल की गुफा में रख देते हैं।
दूसरे देवता ने उसे टोकते हुए कहा कि, नहीं-नहीं, हम इसे पर्वत की चोटी पर छिपा देंगे।
उस देवता की बात ठीक पूरी भी नहीं हुई थी कि कोई कहने लगा, “न तो हम इसे कहीं गुफा में छिपायेंगे और न ही इसे पर्वत की चोटी पर, हम इसे समुद्र की गहराइयों में छिपा देते हैं। यही स्थान इसके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा।”

सबकी राय खत्म हो जाने के बाद एक बुद्धिमान देवता ने कहा, क्यों न हम मानव की चमत्कारिक शक्तियों को मानव -मन की गहराइयों में छिपा दें?

चूँकि बचपन से ही मानव मन इधर -उधर दौड़ता रहता है तो मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकेगा कि ऐसी अदभुत और विलक्षण शक्तियांँ उसके भीतर छिपी हो सकती हैं और वह इन्हें बाह्य जगत में खोजता रहेगा!

अतः इन बहुमूल्य शक्तियों को हम उसके मन की निचली तह में छिपा देंगे।

बाकी सभी देवता भी इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए और ऐसा ही किया गया। मनुष्य के भीतर ही चमत्कारी शक्तियों का भण्डार छुपा दिया गया!
इसलिए कहा भी जाता है कि, मानव मन में अद्भुत शक्तियांँ निहित हैं।

यह कहानी यही संदेश देती है कि मानव मन असीम ऊर्जा का कोष है।
इन्सान जो भी चाहे वो हासिल कर सकता है। मनुष्य के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।

लेकिन बड़े दुःख की बात है उसे स्वयं ही विश्वास नहीं होता कि उसके भीतर इतनी शक्तियांँ विद्यमान हैं।
इसलिय लोगों के लिय जरूरी है कि अपने अन्दर की शक्तियों को पहचानिये, उन्हें पर्वत, गुफा या समुद्र में मत ढूंँढिए बल्कि अपने अन्दर खोजिये और अपनी शक्तियों को निखारिए।

वर्तमान में, सुविख्यात शांति के संदेश को पिछले 56 साल से पूरे संसार के अन्दर फ़ैलाने वाले आदरणीय श्री प्रेम रावत जी ह्रदय स्थित उस आनन्द का व्यावहारिक बोध करा रहे हैं! उनका कहना है कि अगर मनुष्य उस दिशा में एक कदम बढ़ाये तो आज के माहोल में भी हर मनुष्य के लिय शांति सम्भव है!
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बुढ़िया का यकीन

बुढ़िया का यकीन

एक बार कैंसर के एक बहुत मशहूर डॉक्टर डॉ. तेजल को नयी दिल्ली एक अवार्ड सेरेमनी में लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड देने के लिए बुलाया जाता है।

इस आवर्ड को लेकर डॉ. तेजल ही नहीं पूरा झुंझुनूं शहर बहुत उत्साहित था क्योंकि डॉ. साहब न सिर्फ एक काबिल डॉक्टर थे बल्कि एक बहुत नेक दिल इंसान भी थे।

अवार्ड सेरेमनी वाले दिन वो सुबह फ्लाइट पकड़ने के लिए एअरपोर्ट पहुँचते हैं,पर कुछ टेक्निकल खराबी आ जाने के कारण वो फ्लाइट कैंसिल हो जाती है.. और दुर्भ्ग्यवाश कोई अगली फ्लाइट भी मौजूद नहीं होती है।

डॉ. तेजल सोचते हैं चलो कोई बात नहीं सेरेमनी तो शाम को है… और झुंझुनूं से दिल्ली 6-7 घंटे का ही रास्ता है तो चलो टैक्सी से निकल लेते हैं।

वे जल्द ही एक टैक्सी हायर करके दिल्ली की तरफ बढ़ने लगते हैं…आधे रास्ते तक तो सब ठीक रहता है लेकिन अचानक ही ड्राईवर कहता — “साहब! सामने देखिये… बहुत बड़ा जाम लगा हुआ है… अगर हम इस रास्ते से जाते हैं तो पहुँचने में रात लगा जायेगी! अगर आप कहें तो कोई दूसरा रास्ता ट्राई करूँ…”

डॉ तेजल पहले तो ड्राईवर को मना कर देते हैं पर जब 10-15 मिनट बाद भी गाड़ियाँ टस से मस नहीं होती हैं तो वे ड्राईवर से दूसरा रास्ता ट्राई करने को कहते हैं।

ड्राईवर अपने अंदाजे पर गाड़ी सर्विस लेन पर ले लेता है और जो पहले कट मिलता है उससे बायीं तरफ मुड़ जाता है। उबड़-खाबड़ रास्तों पर घंटे भर चलने के बाद भी कोई पक्की सड़क या रास्ता नहीं दिखाई देता।

डॉ. तेजल बिलकुल मायूस हो जाते हैं तभी उनको दूर एक झोपड़ी दिखाई देती है।

वो देखिये ड्राईवर साहब उधर एक झोपड़ी है, चलिए वहीं चल कर पता पूछते हैं।

ड्राईवर तुरंत गाड़ी रोकता है और वे दोनों उतर कर उस झोपड़ी के पास पहुँचते है।

“अरे कोई है!”, ड्राईवर जोर से पुकारता है।

झोपड़ी से एक बूढी सी औरत बाहर निकलती है।

“क्या बात है बेटा, क्यों पुकार रहे हो?”
“माता जी हम लोगों को दिल्ली जाना है पर हम रास्ता भटक कर इधर आ गए हैं क्या आप हमारी मदद कर सकती हैं?”, ड्राईवर वृद्धा से निवेदन करता है.

बिलकुल मदद करुँगी बेटा पहले आप लोग अन्दर आकर पानी तो पी लो।

वह उन दोनों के लिए पानी और कुछ गुड़ लेकर आती है।

डॉ. तेजल उस गरीब की आवभगत से खुश हो जाते हैं और पूछते हैं – “आप यहाँ अकेली रहती हैं क्या?”

नहीं-नहीं, मेरा पोता भी मेरे साथ रहता है. बिचारे के माता-पिता बचपन में ही मर गए थे तबसे मैं ही इसका ख़याल रखती हूँ… देखिये न बेचारा बिस्तर में बीमार पड़ा है…शायद ये भी अब कुछ दिनों बाद मुझे छोड़ कर चला जाएगा…।

और इतना कहते-कहते उनकी आँखों से आंसूं निकलने लगे।

डॉ. तेजल आगे बढ़ते हैं और वृद्धा को ढांढस बंधाते हुए कहते हैं, कुछ नहीं होगा इसे बताइये क्या हुआ है इस नन्हे बालक को।

इस अभागे को कैंसर है साहब…लोग कहते हैं इसका इलाज सिर्फ झुंझुनूं के डॉ. तेजल के पास है… बहुत कोशिश की, कई बार चक्कर लगाए पर डॉ. साहब से मुलाक़ात नहीं हो पायी…अब तो सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दिया है…अगर मैंने सच्चे मन से उसे माना होगा तो एक दिन वो मेरी मदद ज़रूर करेगा।

इतना सुनते ही डॉ. तेजल का गला रुंध गया…आँखों में नमी आ गयी…वे पूरे दिन के घटनाक्रम को सोचने लगे कि कैसे बुढ़िया का यकीन हकीकत बन गया…कैसे उस ऊपर वाले ने अपने बंदे के उन्हें यहाँ भेजा!

गहरी सांस लेते हुए वे बोले, “मैं ही हूँ डॉ. तेजल आपके ईश्वर ने ही मुझे यहाँ भेजा है।चलिए मेरे साथ हम आज से ही इस बालक का इलाज शुरू करेंगे!”

फिर वे ड्राईवर से बोले, “ड्राईवर गाडी वापस ले लो!”

“ल..ल..लेकिन वो आपका लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड!”, ड्राईवर अचरज से बोला.

लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड कभी भी किसी की लाइफ से ज़रूरी नहीं हो सकता है…

जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो” और सभी गाड़ी में बैठ कर झुंझुनूं वापस लौट गए।और बच्चे का इलाज करके उसे एक दम सही कर दिया।

आज लोगों की नज़र में भले डॉ. तेजल ने एक जीवन बचाने के लिए जीवन भर की मेहनत का अवार्ड छोड़ दिया था..पर ऐसा करके उन्हें अन्दर से जो ख़ुशी और संतोष मिला था वो ऐसे हज़ारों अवार्ड से भी बड़ा था।

💐💐शिक्षा💐💐

दोस्तों, कहते हैं ऊपर वाले के घर देर है अंधेर नहीं. यदि आप सच्चे दिल से किसी चीज में यकीन करते हैं और उसके लिए हर संभव प्रयास करते हैं तो एक न एक दिन वो आपको मिल ही जाती है.

इसलिए उस बूढी औरत की तरह दृढ विश्वास के साथ जो कुछ भी आप पाना चाहते हैं उसके लिए कर्म करिए…लेकिन फल कब कैसे कहाँ मिलेगा वो भगवान् पर छोड़ दीजिये।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

हमारे मन बुद्धि से परे

हमारे मन बुद्धि से परे

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त “श्रीकृष्ण” ने अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि, हे पार्थ तराजू पर पैर संभलकर रखना, संतुलन बराबर रखना, लक्ष्य मछली की आंख पर ही केंद्रित हो उसका खास खयाल रखना।

तो अर्जुन ने कहा, “हे प्रभु”, सब कुछ अगर मुझे ही करना है, तो फिर आप क्या करोगे?

वासुदेव हंसते हुए बोले, हे पार्थ जो आप से नहीं होगा वह में करुंगा।

अर्जुन ने कहा, प्रभु ऐसा भी क्या है जो मैं नहीं कर सकता?

वासुदेव फिर हंसे और बोले, जिस अस्थिर, विचलित, हिलते हुए पानी में तुम मछली का निशाना साधोगे, उस विचलित “पानी” को मैं स्थिर रखूंगा!

कहने का तात्पर्य यह है कि –
आप चाहे
कितने ही निपुण क्यूँ ना हो!
कितने ही बुद्धिवान क्यूँ ना हो!
कितने ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हो!

लेकिन आप
स्वयं हरेक परिस्थिति के उपर
पूर्ण नियंत्रण नहीँ रख सकते।

आप सिर्फ
अपना प्रयास कर सकते हो।
लेकिन
उसकी भी एक सीमा है।
और जो उस सीमा से आगे की बागडोर संभालता है!
उसी का नाम “भगवान” है!

यही सच है कि शरनागत भाव से भगवान का साक्षात्कार हो सकता है!
इसलिए
अपने मन बुद्धि का बृधा अभिमान नहीं करना चाहिए!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

ईर्ष्या, निंदा, घृणा, धोखा से मुक्त मन

श्री हंस जी महाराज जी की अनमोल सीख!

लोग निन्दा करें तो करने दो बल्कि सब लोगों को अपनी तरफ से छुट्टी दे दो!
वे चाहे निन्दा करें, चाहे प्रशंँसा करें! जिसमें लोग राजी हों – करें।

आप सबको छुट्टी दे दो तो आप स्वतः ही मुक्त हो जाओगे।

प्रशंसा में तो मनुष्य फँस जाता है, पर निन्दा में पाप नष्ट होते हैं।
कोई झूठी निन्दा करे तो चुप रहो सफाई भी मत दो।
कोई पूछे तो सत्य बात कह दें।
बिना पूछे लोगों को कुछ भी कहने की जरुरत नहीं।
बिना पूछे सफाई देने का मतलब है सत्य की सफाई देना जो सत्य का अनादर होता है।

भरत जी कहते हैं😘
जानहुँ रामु कुटिल करी मोही, लोग कहउ गुरु साहिब द्रोही।
सीता राम चरण रति मोरें, अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।

दूसरा आदमी हमें खराब समझे तो इसका कोई मूल्य नहीं है
क्योंकि श्री गुरुमहाराज जी किसी दूसरे की गवाही नहीं लेते हैं!
दूसरा आदमी अच्छा कहे तो आप अच्छे हो जाओगे? ऐसा कभी नहीं होगा।

अगर आप स्वयं बुरे हो तो आपको स्वयं पता है और बुरे ही रहोगे।
अगर आप अच्छे हो तो अच्छे ही रहोगे, भले ही पूरी दुनियां बुरी कहे।
लोग निन्दा करें तो भी आनन्द आना चाहिए।

श्री महाराजी जी आगे बतलाते हैं कि –
मेरी निन्दा से यदि किसी को सन्तोष होता है, तो बिना प्रयत्न के ही मेरी उन पर कृपा हो गयी; क्योंकि कल्याण चाहने वाले पुरुष तो दूसरों के सन्तोष के लिए अपने कष्टपूर्वक कमाए हुए धन का भी परित्याग कर देते हैं – मुझे तो कुछ करना ही नहीं पड़ा।

हम पाप नहीं करते, किसी को दुःख नहीं देते, धोखा नहीं देते, फिर भी हमारी निन्दा होती है तो उसमें दुःख नहीं होना चाहिए बल्कि हमें प्रसन्नता होनी चाहिए।
हृदय में बैठे परम सत्ता ईश्वर की तरफ से जो होता है, सब मंँगलमय ही होता है।
इसलिए मन के विरुद्ध कोई बात हो जायें तो उसमें आनन्द मनाना चाहिए क्योंकि उसमें भी परमात्मा की मर्जी छूपी होती है।

सदैव याद रखें कि हर स्वांस खुशियांँ लाता है। हर कठिन परिस्थिति, दूसरों द्वारा झूठी निन्दा, घृणा, धोखा अनुभव लाते हैं।
एक सफल जीवन और हृदय में शान्ति के अनुभव के लिये यह सब जरूरी होते हैं!
लेकिन तुम किसी की निन्दा मत करना और न ही किसी को धोखा देना। बस”नाम-सुमिरण” द्वारा प्रत्येक पल का आनन्द लेते हुए अभ्यास से स्वयं को जानना और शान्ति के अनुभव से मनुष्य जीवन सफल बनाना है।

  • श्री हंस जी महाराज

समय के सद्गुरु की उस अहेतुकी दया को हमेशा याद रखें!

समय के सद्गुरु की उस अहेतुकी दया को हमेशा याद रखें!

एक दिन एक राजा ने राजपंडित को बुलाया और उसे बहुत सख्ती से आदेश दिया कि , “राजा परीक्षित ने सुखदेव से भगवत गीता सुनकर मोक्ष प्राप्त किया था। उन्हें केवल सात दिन लगे। मैं आपको सभी बंधनों से मुझे मुक्त कराने के लिए एक महीने का समय दे रहा हूँ ताकि मैं मोक्ष प्राप्त कर सकूँ। यदि आप ऐसा नहीं कर पाए तो, मैं आपकी सारी संपत्ति जब्त कर लूँगा, और आप को मृत्यु दण्ड दूँगा।”

इस आदेश ने राजपंडित को अत्यधिक चिंतित कर दिया और वह इस चिंता में अब न तो खा सकता था और न ही सो सकता था। उसका तनाव दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था। एक दिन संयोग से जब वह अपने परिवार के साथ भोजन कर रहा था तो उसका बेटा, जो आमतौर पर अपना भोजन अलग से करता था और जो अपने पिता से यदा-कदा ही मिलता था। एक दिन बेटे ने गौर किया कि उसके पिता बहुत उदास दिख रहे थे। उसने अपने पिता से उदासी का कारण पूछा। राजपंडित उत्तर देने के लिए अनिच्छुक थे क्योंकि उन्होंने अपने बेटे से कुछ उम्मीद नहीं।

हालांकि उसकी माँ ने उसे परेशानी का पूरा कारण बता दिया। पुत्र बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ और उसने शांति से अपने पिता से कहा, “पिताजी, आप चिंता न करें और राजा से कहें के मुझे अपना गुरु स्वीकार करके मेरे निर्देशों का अक्षरशः पालन करने के लिये कहें।”

पिता ने सोचा कि बेटा शायद उन्हें बचाने के लिए कोई तरकीब सोच रहा होगा, इसलिए वह उसे राजा के पास लेे गया और राजा को अपने बेटे के प्रस्ताव के बारे में बताया। राजा मान गया और अगले दिन राजपंडित अपने पुत्र के साथ दरबार में आया।

सभी बंधनों से मुक्त होने के लिए, राजा ने राजपंडित के पुत्र को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया और निर्देशों की प्रतीक्षा में उसके चरणों में बैठ गया।

दरबार में भीड़ थी और सभी की निगाहें राजा और उनके गुरु पर टिकी थीं। सभी को आश्चर्य हुआ जब राजपंडित के पुत्र ने राजा से एक बहुत मजबूत रस्सी लाने को कहा।

राजपंडित यह सोचकर बहुत परेशान हो गया कि उसका बेटा भला यह क्या मूर्खता कर रहा है। वह डर गया, और सोचा कि क्या उसका बेटा किसी को रस्सी से बांधेगा, या कहीं वो स्वयं राजा को ही तो नहीं बांध देगा?

तभी पुत्र ने आज्ञा दी, “राजा को उस खम्भे से बान्ध दिया जाए।” राजा वचन से बंधा था इसलिए वह खंभे से बंधने के लिए सहमत हो गया।

इसके बाद पुत्र ने अपने पिता को दूसरे खम्भे से बाँधने का आदेश दिया। तो अब स्वयं राजपंडित भी बंधा हुआ था।

अब तो राजपंडित बहुत उत्तेजित हो गया। वह अपने बेटे को मन ही मन कोस रहा था और उसे दंडित करने की सोच रहा था। तभी उसके बेटे ने उसे निर्देश दिया, “पिताजी, अब आप राजा को खोल दीजिए।”

राजपंडित क्रोधित हो गया और क्रोध में चिल्लाया, “अरे मूर्ख! क्या तुम देख नहीं सकते कि मैं स्वयं बंधा हुआ हूं? क्या एक आदमी जो खुद बंधा हुआ है, दूसरे आदमी के बंधन को खोल सकता है? क्या तुम नहीं समझते कि यह एक असंभव कार्य है? “

राजा ने अपने युवा गुरु को संबोधित करते हुए एक शांत और सम्मानजनक स्वर में कहा, “मैं समझ गया मेरे गुरु। जो स्वयं सांसारिक मामलों में बंधा हुआ है, ‘माया’ से बंधा हुआ है, वह संभवतः दूसरे व्यक्ति को मुक्त नहीं कर सकता है।

जो संसार की मोह माया त्याग कर, संसार से परे चले गए हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है, वे ही दूसरे मनुष्य को मुक्त कर सकते हैं। वे ही दूसरों के बंधनों को तोड़ सकते हैं।”

अतःएव आप सभी अगर अपनी समस्याओं से मुक्ति चाहते हैं तो ऐसे गुरु की तलाश करें, जो खुद को मुश्किलो से खुद को आज़ाद कर चुका हो।

भाग्यशाली हैं हम सब जिनको समय के सद्गुरु मिले हैं और अनावश्यक भटकाव से हमको बचाकर, हमें उस अविनाशी से जोड़ दिया!

सच ही कहा है ना कि –
दौड़ रहा दिन रात सदा,
जग के सब काज विहारन में!
सपने सम विश्व दिखाय मुझे,
मेरे चंचल चित्त को मोड़ दिया!

इसलिए
🌸 समय के सद्गुरु की उस अहेतुकी दया को हमेशा याद रखें! 🌸
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