भगवान की कृपा

भगवान की कृपा

एक बार की बात है बहुत तेज बारिश हो रही थी। दो मटके(घड़े) बाहर रखे हुए थे। बारिश में दोनों भीग रहे थे। थोड़ी देर के बाद जब बारिश बंद हुई तो एक मटका भर गया और दूसरा खाली रह गया।

जो मटका खाली रह गया गया वो वर्षा से कहता है अरी वर्षा, तू पक्षपात (भेदभाव) करती है। तूने इसे भर दिया है लेकिन मुझे नहीं भरा।

तब बारिश कहती है – अरे मटके, तू ऐसा क्यों बोल रहा है? मैंने तुम दोनों मटको पर बराबर बारिश की है; लेकिन तू अपना मुंह तो देख। तेरा मुंह नीचे की ओर है।

क्योंकि वह मटका उल्टा पड़ा हुआ था। गलती खुद की है लेकिन दोष दूसरों पर!

ठीक इसी तरह भगवान भी हम पर कृपा करते हैं लेकिन गलती हमारी ही होती है कि हम उनकी ओर उन्मुख नहीं रहते! अपनी झोली को फैलाकर नहीं रखते!

यदि हमारी ही झोली छोटी पड़ जाये तो भगवान को दोषी क्यों ठहराए?

जिस तरह से सूर्य देव सब पर बराबर प्रकाश डालते हैं- अब हम खुद ही मुख मोड़ के बैठ जाये तो हमारी गलती है ना कि सूर्यदेव की। भगवान की कृपा का अनुभव संत महापुरुषों के सानिध्य से मिलता है! वे अपने ज्ञान के द्वारा उस अविनाशी – जो हमारे ही अन्दर है उसका का अनुभव कराते हैं! समय चाहे कुछ अच्छा हो या बुरा- हर परिस्थति का मुकाबला करने योग बनाते हैं!

  • श्री हंस जी महाराज
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गुरु आज्ञाकारी भक्त का स्वभाव

गुरु आज्ञाकारी भक्त का स्वभाव

गीता में भगवान श्रीकृष्ण जी अर्जुन को समझाते हैं कि आत्मज्ञानी व्यक्ति का सबसे पहला गुण है कि उसमें संसार के सारे ही जीवित प्राणियों के प्रति सच्चा प्रेम और सेवाभाव होना चाहिए।
स्वयं के भीतर सच्चे प्रेम के बीज का रोपण ही दुनिया की सारी समस्याओं और शान्ति का समाधान है। कोई आत्मज्ञान लेकर स्वयं को ज्ञानी मानता है लेकिन, वह कह कुछ रहा है और कर कुछ रहा है, ऐसा करके चाहे जितनी चालाकियांँ कर ले लेकिन, हृदय में विराजमान अविनाशी शक्ति के आगे उसकी एक नहीं चलेगी क्योंकि वो पूर्ण सत्य का निर्देशक है। उसे कभी-कभी कुछ नाट़्य भी करना पड़ता है!

लेकिन, चूंकि वह सिर्फ नाट़्य होता है तो कोई कटुता नहीं उपजती। समस्या तब पैदा होती है जब कुछ लोग आत्म ज्ञान के सिद्धान्तों को बढ़ा चढ़ा कर बखान करने लगते हैं और वही लोग उसका फायदा उठाने लगते हैं।

गीता की शुरुआत ही संन्यास की परिभाषा से होती है। ऐसी क्रिया जो स्वार्थ रहित हो। वही बात दूसरे रूप में कही गई है।
भगवान श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि जब तक मन की लालसायें शान्त नहीं होती तब तक हमें हमारा कर्म करना ही होगा।

अर्जुन वही प्रश्न पूछता है जो हमारे दिमाग में हैं। वह श्रीकृष्ण से कहता है कि मन की चंँचलता सच्चा प्रेम करने में मुख्य बाधा है। इसमें इतनी उथल-पुथल और न झुकने की प्रवृत्ति है कि इसे काबू करने की बजाय हवा को काबू करना आसान है।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन को नियमित ध्यान के अभ्यास से,”नाम-सुमिरण के अभ्यास करके मन को काबू किया जा सकता है। यदि नाकाम रहे तो भी आपका बैंक बैलेंस बना रहेगा।

यह भौतिक बैंक बैलेंस नहीं है कि आप चले गए तो किसी और ने उस पर कब्जा कर लिया।

आत्मज्ञानी विद्वान से श्रेष्ठ होता है। विद्वान को बहुत मौखिक ज्ञान हो सकता है पर सम्भव है उसे अपने स्वांँसों के भीतर की शक्ति की पहचान न हो।

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम योगी बनो और ध्यान के अभ्यास से मन को प्राणों में रमण करने वाली शक्ति के साथ एकाकार करके स्वयंँ को जानो। तभी हृदय में विराजमान ईश्वर के सानिध्य में शान्ति के अनुभव से मनुष्य जीवन सफल होता है।

  • श्री हंस जी महाराज

मोह का ताना – बाना

मोह का ताना – बाना

मैं एक सूफी कहानी पढ़ता था।

एक युवक ने आकर अपने गुरु को कहा,
अब बहुत हो गया, मैं जीवन छोड़ देना चाहता हूं।
लेकिन पत्नी है, बच्चा है, घर—द्वार है।
गुरु ने कहा, तेरे बिना वे न हो सकेंगे?

उसने कहा कि ऐसा तो कुछ नहीं है,
सब सुविधा है, मेरे बिना हो सकेंगे।
लेकिन मुझे लगता है ऐसा कि
मैं मर जाऊंगा तो मेरी पत्नी जी न सकेगी,

मेरे बच्चे मर जाएंगे। इतना उनका प्रेम है मेरे प्रति।

उस फकीर ने कहा,
फिर ऐसा कर, कुछ दिन यह श्वास की विधि है,
इसका अभ्यास कर, फिर आगे देखेंगे।

श्वास की विधि का उसने अभ्यास किया ।
विधि ऐसी थी कि अगर तुम थोड़ी देर के लिए श्वास साधकर पड़ जाओ, तो मरे हुए मालूम पड़ो।

फिर उस फकीर ने उसे भेजा घर कि आज सुबह तू जाकर लेट जा और मर जा; फिर आगे सोचेंगे। मैं आता हूं पीछे से!
वह आदमी गया। लेट गया सांस साधकर,
मर गया। मर गया मालूम हुआ।

छाती पिटाई मच गयी, रोना— धोना हुआ,
बच्चे चिल्लाने लगे, पत्नी चिल्लाने
लगी कि मैं मर जाऊंगी।
तभी वह फकीर आया।

द्वार पर आकर उसने अपनी घंटी बजायी।
भीतर आया, उसने कहा, अरे! यह युवक मर गया?
यह बच सकता है अभी,
लेकिन कोई इसके बदले में मरने को राजी हो तो।
सन्नाटा हो गया।

न बेटा मरने को राजी, न बेटी मरने को राजी,
न मा मरने को राजी, न बाप मरने को राजी।
पत्नी, जो अभी तक चिल्ला रही थी मर जाऊंगी,
वह भी चुप हो गयी। अब वह भी नहीं चिल्लाती कि मर जाऊंगी।

फकीर ने पूछा, कोई भी तुममें से राजी हो इसकी जगह मरने को तो यह बच सकता है। अभी यह गया नहीं है, लौटाया जा सकता है।अभी बहुत दूर नहीं निकला है, बुलाया जा सकता है। मगर किसी को तो जाना ही पड़ेगा।

पत्नी ने कहा, *अब यह तो मर ही गया,अब हमको और क्यों मारते हो? अब जो हो गया सो हो गया।

गुरु ने उस युवक से कहा, अब तू अपनी स्वांस को साधना छोड़ और उठ। उसने स्वांस को साधना छोड़ी, उठा।
अब तेरा क्या खयाल है? फकीर ने ने कहा!
वह बोला – जब ये लोग कहते हैं कि हम मर ही गए और इनमें से कोई मेरे बदले मरने को राजी नहीं तो मैं मर ही गया। मैं आपके पीछे आता हूं।

अब किसी के लिय भी उसको रोक पाना आसान नहीं था!
पत्नी या और किसी के पास कहने को कोई कारण भी न बचा।

फ़क़ीर ने लोगों को समझाया कि तुम जिसे जीवन कह रहे हो, तुम जिसे जीवन का लगाव कहते हो, तुमने जीवन में जो आसक्ति के बहुत से घर बनाए हैं, मोह के बहुत ताने—बाने बुने हैं, तंबू लगाए हैं, उनको जरा गौर से तो देखोगे तो या सब पानी के बुलबुले जैसे हैं, क्षणभंगुर हैं। कोई यहां किसी का साथी नहीं, कोई यहां किसी का संगी नहीं। जब तुम अपनी ही देह पर भरोसा नहीं कर सकते तो और किसका भरोसा होगा किया जा सकता है!

इसलिय उस अविनाशी से जुडो, हर स्वांस में उसका सुमिरन करो!
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जाको राखे साँईयां, मार सके न कोई।
बाल ना बाँका करि सकें,जो जग बैरी होई।।

संसार के सारे रिश्ते झूठे हैं,
केवल आत्मा का रिश्ता सच्चा है!

एक राजा था! उसके कोई पुत्र नहीं था।राजा बहुत दिनों से पुत्र की प्राप्ति के लिए आशा लगाए बैठा था! लेकिन पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई! उसके सलाहकारों ने तान्त्रिकों से सहयोग लेने को कहा।तान्त्रिकों की तरफ से राजा को सुझाव मिला कि यदि किसी बच्चे की बलि दी जाए, तो राजा को पुत्र की प्राप्ति हो सकती है।

राजा ने राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि जो अपना बच्चा बलि चढ़ाने के लिए राजा को देगा, उसे राज्य की तरफ से बहुत सारा धन किया जाएगा।

एक परिवार में कई बच्चे थे! गरीबी भी बहुत थी। एक ऐसा बच्चा भी था – जो गुरु महाराज जी पर आस्था रखता था तथा सन्तों के सतसंग में अधिक समय देता था।

राजा की मुनादी सुनकर परिवार को लगा कि क्यों न इसे राजा को दे दिया जाए? क्योंकि यह निकम्मा है, कुछ काम धाम भी नहीं करता है और हमारे किसी काम का भी नहीं है और इसे देने पर, राजा प्रसन्न होकर, हमें बहुत सारा धन देगा।
ऐसा ही किया गया,बच्चा राजा को दे दिया गया।

राजा ने बच्चे के बदले उसके परिवार को काफी धन दिया। राजा के तान्त्रिकों द्वारा बच्चे की बलि देने की तैयारी हो गई। राजा को भी बुला लिया गया! बच्चे से पूछा गया कि तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है? और यह बात राजा ने बच्चे से पूछी और तान्त्रिकों ने भी पूछी।

बच्चे ने कहा कि- मेरे लिए रेत मंँगा दी जाए!
राजा ने कहा- बच्चे की इच्छा पूरी की जाये।

अतः रेत मंँगाया गया। बच्चे ने रेत से चार ढेर बनवाए! एक-एक करके बच्चे ने तीन रेत की ढेरों को लात मार दी और चौथे ढेर के सामने हाथ जोड़ कर बैठ गया और खूब रोने लगा! गुरु महाराज जी का आशीर्वाद प्राप्त करके राजा से कहा कि अब जो करना है,आप लोग कर लें!

यह सब देखकर तान्त्रिक डर गये और उन्होंने बच्चे से पूछा। पहले तुम यह बताओ कि यह तुमने क्या किया है?
राजा ने भी यही सवाल बच्चे से पूछा।

तो बच्चे ने कहा कि – पहली ढेरी मेरे माता-पिता के नाम की थी। मेरी रक्षा करना इनका कर्तव्य था परन्तु उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन न करके पैसे के लिए मुझे बेच दिया! इसलिए मैंने इस रेत की ढेरी को लात मार दी। मुझे ऐसे माता-पिता से कोई मोह नहीं है।

दूसरी रेत की ढेर मेरे सगे सम्बन्धियों की थी। उन्होंने भी मेरे माता पिता को नहीं समझाया कि ये सतसंग में ही तो जाता है, किसी की चोरी, ठगी नहीं करता!इसे मत बेचो! ऐसा किसी भी गाँव परिवार वालों ने नहीं कहा।अतः मैंने दूसरी ढेरी को भी लात मार दिया। इनसे भी मुझे कोई मोह नहीं है।

और तीसरी रेत की ढेरी हे राजन, ये आपके नाम की है। क्योंकि राज्य की प्रजा की रक्षा करना, राजा का ही धर्म होता है परन्तु जब राजा ही मेरी बलि देना चाह रहा है तो ये रेत की ढेरी को भी मैंने लात मार दी। मुझे ऐसे राजा पर भी कोई मोह नहीं है, कोइ विश्वास भी नहीं है।

और चौथी ढेरी, हे राजन,ये मेरे सच्चे गुरु दरबार में मेरे महाराज जी के नाम की है।अब सिर्फ और सिर्फ अपने श्री सदगुरुदेव महाराज जी पर ही मुझे भरोसा है। इसलिए यह एक रेत की ढेरी मैंने छोड़ दी है।इसको मैंने लात नहीं मारा! इसको मैंने प्रणाम किया। श्री गुरु महाराज जी से मैंने निर्भय होने का आशीर्वाद लिया इसीलिए मैं अब मौत से भी नहीं डर रहा हूंँ।

बच्चे का उत्तर सुनकर राजा अन्दर तक हिल गया। उसने सोचा,कि पता नहीं, बच्चे की बलि देने के पश्चात भी पुत्र की प्राप्ति होगी भी या नहीं होगी। इसलिए क्यों ना इस बच्चे को ही अपना पुत्र मान लिया जाये?

इतना समझदार और गुरु भक्त बच्चा है,ऐसा अच्छा बच्चा और कहांँ मिलेगा। काफी सोच-विचार के बाद राजा ने उस बच्चे को अपना पुत्र बना लिया और राजकुमार घोषित कर दिया।

राजा ने बच्चे से पूछा कि इतना बैराग्य और समझदारी तुम्हें कहांँ से प्राप्त हुई?
बच्चे ने कहा कि मेरे गुरु महाराज जी ने मुझे आत्मज्ञान दिया है जो मुझे काल से भी निर्भय बना दिया है।

राजा ने कहा मुझे भी ऐसा ज्ञान प्राप्त करना है और अब तुम राजा बनकर राज्य की सेवा करो! मैं श्री गुरु महाराज जी की सेवा करूंँगा! अपने जीवन का कल्याण करूंँगा। उधर बच्चे के माता-पिता परिवार गांँव वाले डर रहे थे कि ये बच्चा हम सबको बन्द करके, हमें सजा देगा।

लेकिन बच्चे ने कहा कि यह सब आप सबकी तथा गुरु महाराज जी की कृपा से आपने अगर मुझे नहीं बेचा नहीं होता? तो मैं राजा नहीं बन पाता।
बच्चे ने अपनी सकारात्मक सोच महाराजी के ज्ञान अभ्यास से जो निडरता मिली – उस विवेक के आधार पर सबको माफ भी कर दिया।
कहावत है –
कबीरदास जी कहते हैं कि-
जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥
यानि जो तुम्हारे लिए काँटा बोये (परेशानी या मुसीबत खड़ी करे), तुम उसके लिए भी फूल ही बोना (उसके आचरण के विरोध में भी अपने अच्छे स्वभाव को बनाये रखो), इससे तुमको तो फूल ही फूल मिलेंगे (तुम्हारा स्वभाव और मन-बुद्धि शीतल रहेगी) और उसको त्रिशूल/कांटे मिलेंगे (उसने जो नफरत रुपी बीज तुम्हारे लिए बोये हैं उसका फल उसको ही मिलेगा)!

हमें तो अपने गुरु महाराजी पर विश्वास होना चाहिय !
जाको राखे साँईयां, मार सके न कोई।
बाल ना बाँका करि सकें,जो जग बैरी होई।।
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प्रेम रावत – जो व्यक्ति शान्ति को अपने जीवन में साक्षात रूप में लाना चाहता है, उनका मैं मार्गदर्शन कर सकता हूँ

इस जीवन की पुस्तक में जो कुछ भी लिखा है-
अगर उसे पढ़ना है तो बड़े ध्यान से पढ़ना चाहिए।

क्योंकि
इसमें जो लिखा है-
वह दुःख के लिए नहीं, बल्कि सुख पाने के लिए लिखा है।

उस परम आनंद,
परम शांति के लिए लिखा है,
जो पहले से तुम्हारे अन्दर मौजूद है!
पर तुम उससे अनभिज्ञ हो।

अगर
इस पुस्तक को पढ़ना है तो –
“हृदय की भाषा” को सीखो।

जिस दिन तुमको
हृदय की भाषा समझ में आने लगेगी,
उस दिन
तुमको यह बात समझ आने लगेगी कि –
सचमुच में यह जीवन अत्यंत अनमोल है।

यदि तुम अपने हृदय की भाषा को नहीं समझ पा रहे हो
तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।
-प्रेम रावत
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चश्मा और एक गाँव वाला

चश्मा और एक गाँव वाला

एक ग्रामीण था। वह अनपढ़ था। वह पढ़ना-लिखना नहीं जानता था। उन्होंने अक्सर लोगों को किताबें या पेपर पढ़ने के लिए चश्मा पहना हुआ देखा था। उसने सोचा, अगर मेरे पास चश्मा हो, तो मैं भी इन लोगों की तरह पढ़ सकता हूँ। मुझे शहर जाना चाहिए और अपने लिए एक जोड़ी चश्मा खरीदना चाहिए।

इसलिए एक दिन वह एक शहर में गया। एक चश्मे की दुकान में पहुंचा। उसने दुकानदार से एक जोड़ी चश्मा दिखाने के लिए कहा। दुकानदार ने उन्हें कई जोड़े चश्मे और एक किताब दी।

ग्रामीण ने एक-एक कर सभी चश्मों को आजमाया। लेकिन वह कुछ पढ़ नहीं सका। उसने दुकानदार से कहा कि – ये सब चश्में तो बेकार हैं।

दुकानदार ने उसे ऊपर से नीचे तक घूरा। फिर उसने किताब की तरफ देखा। वह उल्टी थी! दुकानदार ने कहा, शायद आप नहीं जानते कि कैसे पढ़ना है।

ग्रामीण ने कहा, नहीं, मैं नहीं जानता। मैं चश्मा खरीदना चाहता हूं ताकि मैं दूसरों की तरह पढ़ सकूं। लेकिन ये सभी चश्में तो बकवास हैं।
दुकानदार ने हंसी आ गयी. उसने बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोकी. अब उसको अनपढ़ ग्राहक की असली समस्या समझ आ गई थी।

उसने गाँव वाले को समझाया, “मेरे प्यारे दोस्त, तुम बहुत अनजान हो। चश्मा पढ़ने या लिखने में मदद नहीं करते हैं। वे केवल आपको ठीक से देखने में मदद करते हैं। सबसे पहले, आपको पढ़ना और लिखना सीखना चाहिए।”

सीख: अज्ञानता अंधापन है। अज्ञानता का कोई चश्मा नहीं होता है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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लालच का फल

लालच का फल

किसी गांव में एक गड़रिया रहता था। वह लालची स्वभाव का था, हमेशा यही सोचा करता था कि किस प्रकार वह गांव में सबसे अमीर हो जाये। उसके पास कुछ बकरियां और उनके बच्चे थे। जो उसकी जीविका के साधन थे।

एक बार वह गांव से दूर जंगल के पास पहाड़ी पर अपनी बकरियों को चराने ले गया। अच्छी घास ढूँढने के चक्कर में आज वो एक नए रास्ते पर निकल पड़ा। अभी वह कुछ ही दूर आगे बढ़ा था कि तभी अचानक तेज बारिश होने लगी और तूफानी हवाएं चलने लगीं। तूफान से बचने के लिए गड़रिया कोई सुरक्षित स्थान ढूँढने लगा। उसे कुछ ऊँचाई पर एक गुफा दिखाई दी। गड़रिया बकरियों को वहीँ बाँध उस जगह का जायजा लेने पहुंचा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं। वहां बहुत सारी जंगली भेड़ें मौजूद थीं।

मोटी- तगड़ी भेड़ों को देखकर गड़रिये को लालच आ गया। उसने सोचा कि अगर ये भेड़ें मेरी हो जाएं तो मैं गांव में सबसे अमीर हो जाऊंगा। इतनी अच्छी और इतनी ज्यादा भेड़ें तो आस-पास के कई गाँवों में किसी के पास नहीं हैं।

उसने मन ही मन सोचा कि मौका अच्छा है मैं कुछ ही देर में इन्हें बहला-फुसलाकर अपना बना लूंगा। फिर इन्हें साथ लेकर गांव चला जाऊंगा।

यही सोचते हुए वह वापस नीचे उतरा। बारिश में भीगती अपनी दुबली-पतली कमजोर बकरियों को देखकर उसने सोचा कि अब जब मेरे पास इतनी सारी हट्टी-कट्टी भेडें हैं तो मुझे इन बकरियों की क्या ज़रुरत उसने फ़ौरन बकरियों को खोल दिया और बारिश में भीगने की परवाह किये बगैर कुछ रस्सियों की मदद से घास का एक बड़ा गट्ठर तैयार कर लिया।

गट्ठर लेकर वह एक बार फिर गुफा में पहुंचा और काफी देर तक उन भेड़ों को अपने हाथ से हरी-हरी घास खिलाता रहा। जब तूफान थम गया, तो वह बाहर निकला। उसने देखा कि उसकी सारी बकरियां उस स्थान से कहीं और जा चुकी थीं।

गड़ेरिये को इन बकरियों के जाने का कोई अफ़सोस नहीं था, बल्कि वह खुश था कि आज उसे मुफ्त में एक साथ इतनी अच्छी भेडें मिल गयी हैं। यही सोचते-सोचते वह वापस गुफा की ओर मुड़ा लेकिन ये क्या… बारिश थमते ही भेडें वहां से निकल कर दूसरी तरफ जान लगीं। वह तेजी से दौड़कर उनके पास पहुंचा और उन्हें अपने साथ ले जाने की कोशिश करने लगा। पर भेडें बहुत थीं, वह अकेला उन्हें नियंत्रित नहीं कर सकता था… कुछ ही देर में सारी भेडें उसकी आँखों से ओझल हो गयीं।

यह सब देख गड़रिये को गुस्सा आ गया। उसने चिल्लाकर बोला

तुम्हारे लिए मैंने अपनी बकरियों को बारिश में बाहर छोड़ दिया। इतनी मेहनत से घास काट कर खिलाई… और तुम सब मुझे छोड़ कर चली गयी… सचमुच कितनी स्वार्थी हो तुम सब।

गड़रिया बदहवास होकर वहीं बैठ गया। गुस्सा शांत होने पर उसे समझ आ गया कि दरअसल स्वार्थी वो भेडें नहीं बल्कि वो खुद है, जिसने भेड़ों की लालच में आकर अपनी बकरियां भी खो दीं।

💐💐शिक्षा💐💐

लोभ का फल नामक यह कहानी हमें सिखाती है कि जो व्यक्ति स्वार्थ और लोभ में फंसकर अपनों का साथ छोड़ता है, उसका कोई अपना नहीं बनता और अंत में उसे पछताना ही पड़ता है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

परीक्षा

परीक्षा

”पापा वैभव बहुत अच्छा है। मैं उससे ही शादी करूंगी,
वरना !! ‘
पापा ने बेटी के ये शब्द सुनकर एक घडी को तो सन्न रह गए।फिर सामान्य होते हुए बोले, ठीक है पर पहले मैं
तुम्हारे साथ मिलकर उसकी परीक्षा लेना चाहता हूँ।तभी होगा तुम्हारा विवाह वैभव से,
कहो मंज़ूर है ? ‘बेटी चहकते हुए बोली, -”हाँ मंज़ूर है मुझे
वैभव से अच्छा जीवन साथी कोई हो ही नहीं सकता।
वो हर परीक्षा में सफल होगा,आप नहीं जानते पापा वैभव को !’

अगले दिन कॉलेज में नेहा जब वैभव से मिली, तो उसका मुंह लटका हुआ था।वैभव मुस्कुराते हुए बोला
क्या बात है स्वीट हार्ट.. इतना उदास क्यों हो।
तुम मुस्कुरा दो वरना मैं अपनी जान दे दूंगा।
नेहा झुंझलाते हुए बोली -‘वैभव मजाक छोडो,पापा ने हमारे विवाह के लिए इंकार कर दिया है।
अब क्या होगा ? वैभव हवा में बात उडाता हुआ बोला होगा।क्या हम घर से भाग जायेंगे, और कोर्ट
मैरिज कर वापस आ जायेंगें।
नेहा उसे बीच में टोकते हुए बोली,
पर इस सबके लिए तो पैसों की जरूरत होगी।
क्या तुम मैनेज कर लोगे ?” ”
ओह बस यही दिक्कत है।मैं तुम्हारे लिए जान दे सकता हूँ, पर इस वक्त मेरे पास पैसे नहीं है।
हो सकता है घर से भागने के बाद हमें कही होटल में छिपकर रहना पड़े।
तुम ऐसा करो तुम्हारे पास और तुम्हारे घर में जो कुछ भी चाँदी -सोना-नकदी तुम्हारे हाथ लगे तुम ले आना।
वैसे मैं भी कोशिश करूंगा।
कल को तुम घर से कहकर आना कि तुम कॉलेज जा रही हो, और यहाँ से हम फुर्ररर हो जायेंगे,सपनों को सच करने के लिए !”
नेहा भोली बनते हुए बोली -”पर इससे तो मेरी व् मेरे परिवार कि बहुत बदनामी होगी ”
वैभव लापरवाही के साथ बोला, -”बदनामी वो तो होती रहती है। तुम इसकी परवाह मत करो..”
वैभव इससे आगे कुछ कहता
उससे पूर्व ही नेहा ने उसके गाल पर जोरदार तमाचा रसीद कर दिया।
नेहा भड़कते हुयी बोली, ‘हर बात पर जान देने को तैयार बदतमीज़ तुझे ये तक परवाह नहीं,जिससे तू प्यार करता है।उसकी और उसके परिवार की समाज में बदनामी हो।
प्रेम का दावा करता है,बदतमीज़ ये जान ले कि मैं वो अंधी प्रेमिका नहीं जो पिता की इज्ज़त की धज्जियाँ उड़ा कर ऐय्याशी करती फिरूं,कौन से सपने सच हो जायेंगे।
जब मेरे भाग जाने पर मेरे पिता जहर खाकर प्राण दे देंगें !
मैं अपने पिता की इज्ज़त नीलाम कर तेरे साथ भाग जाऊँगी, तो समाज में और ससुराल में मेरी बड़ी इज्ज़त होगी।
वे अपने सिर माथे पर बैठायेंगें,
और सपनों की दुनिया इस समाज से कहीं इतर होगी।
हमें रहना तो इसी समाज में हैं। घर से भागकर क्या आसमान में रहेंगे ? है कोई जवाब तेरे पास,पीछे से ताली की आवाज सुनकर वैभव ने मुड़कर देखा तो पहचान न पाया।

नेहा दौड़कर उनके पास चली गयी, और आंसू पोछते हुए बोली,
पापा आप ठीक कह रहे थे। ये प्रेम नहीं केवल जाल है जिसमे फंसकर मुझ जैसी हजारों लडकियां अपना जीवन बर्बाद कर डालती हैं !!’

💐💐शिक्षा💐💐

दोस्तों,जिस प्रकार नेहा के पापा ने उसे समझाया उसी प्रकार हर बेटी को भी नेहा की तरह समझदार होना होगा जिससे वैभव जैसे लड़कों से बचा जा सके।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

जितनी अधिक इच्छा, उतनी ही अधिक मन में अशान्ति….

जितनी अधिक इच्छा, उतनी ही अधिक मन में अशान्ति….

हमेशा याद रहे,
चाहे कितना भी धन इकट्ठा कमा करके रख लो, दरिद्रता नहीं मिटती और चाहे कितने ही बड़े पदों पर पहुंँच जाओ, हीन भाव नष्ट नहीं होता।
इसलिए कि दरिद्रता भीतर है और धन बाहर है। हीन भाव भीतर है और पद बाहर है। दोनों का कोई सम्बन्ध नहीं है।
इसलिए तो यह होता है कि एक पद मिले तो उससे बड़े पद की आकांँक्षा पैदा हो जाती है। वह पद मिल जायें तो और बड़े पद की आकांँक्षा पैदा हो जाती है।
यह ऊपर पहुंँच जाने की कोशिश इस बात का सबूत है कि मनुष्य को यह बोध है कि वह बहुत हीन है, उसे सिद्ध करना है कि वह शक्तिशाली है।

इतिहास गवाह है कि दुनिया में जिन लोगों में हीनता की भावना सर्वाधिक होती है, वे लोग मानवता को भी कुचलने में गुरेज नहीं करते। हिटलर, स्टालिन, मुसोलिनी जैसे लोग बहुत हीनता के भाव से पीड़ित थे। सिकन्दर या चंँगेज खांँ, तैमूरलंँग जैसे लोग बहुत हीनता के भाव से पीड़ित लोग थे। इन्हें तब तक चैन न था जब तक उन्होंने यह न दिखा दिया कि लाखों लोग हमारे कब्जे में हैं, उनकी गर्दन पर हमारे हाथ हैं। हम जब चाहें उनकी गर्दन मरोड़ दें।
जब तक उन्हें विश्वास न आ गया कि हम शक्तिशाली हैं तब तक वे भागते गये!
और यह विश्वास कभी नहीं आता आखिरी स्वांँस तक नहीं आता। चाहे सारी दुनिया पर कब्जा हो जाये लेकिन फिर भी ऐसे अभिमानी हीन-बुद्धि व्यक्ति के भीतर डर बना रहता है।
ऐसा व्यक्ति अभिमान से जितना शक्तिशाली होता है, उतनी ही निर्बलता उसको पकड़ने लगती है, उतनी ही उसे अपनी सुरक्षा की व्यवस्था करनी होती है।
लेकिन इतनी भारी भरकम सुरक्षा व्यवस्था होने के बावजूद भी ऐसा व्यक्ति मौत को नहीं जीत सकता क्योंकि ऐसा व्यक्ति प्राणों के भीतर की शक्ति के पूर्ण सत्य से दूर रहता है।
जीवन में समय के महापुरुष के द्वारा मिले ज्ञान के ध्यान -सुमिरण के अभ्यास के प्रति प्रतिबद्धता ही प्राणों के भीतर की शक्ति की पहचान करवाते हुए मृत्यु के पार ले जाती है और अहंँकार जड़ से नष्ट हो जाता है।
तभी व्यक्ति मानवता के प्रति सम्पूर्ण समर्पण करता है। अगर प्रत्येक व्यक्ति”नाम-सुमिरण”के अभ्यास से स्वयं को जानकर हृदय में शान्ति का अनुभव कर ले तो सम्पूर्ण विश्व में शान्ति सम्भव है।

  • श्री हंस जी महाराज
    🙏🙏🌸🌸🙏🙏