दौड़ रहा दिन रात सदा,जग के सब काज विहारन में!

एक दिन एक राजा ने राजपंडित को बुलाया और उसे बहुत सख्ती से आदेश दिया, “राजा परीक्षित ने सुखदेव से भगवत गीता सुनकर मोक्ष प्राप्त किया था। उन्हें केवल सात दिन लगे। मैं आपको सभी बंधनों से मुझे मुक्त कराने के लिए एक महीने का समय दे रहा हूँ ताकि मैं मोक्ष प्राप्त कर सकूँ। यदि आप ऐसा नहीं कर पाए तो मैं आपकी सारी संपत्ति जब्त कर लूँगा और आप को मृत्यु दण्ड दूँगा।”

इस आदेश ने राजपंडित को अत्यधिक चिंतित कर दिया और वह इस चिंता में अब न तो खा सकता था और न ही सो सकता था। उसका तनाव दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा था।

एक दिन संयोग से जब वह अपने परिवार के साथ भोजन कर रहा था तो उसका बेटा, जो आमतौर पर अपना भोजन अलग से करता था और जो अपने पिता से यदा-कदा ही मिलता था। एक दिन बेटे ने गौर किया कि उसके पिता बहुत उदास दिख रहे थे। उसने अपने पिता से उदासी का कारण पूछा।

राजपंडित उत्तर देने के लिए अनिच्छुक थे क्योंकि उन्होंने अपने बेटे से कुछ उम्मीद नहीं थी।

हालांकि उसकी माँ ने उसे परेशानी का पूरा कारण बता दिया।
पुत्र बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ और उसने शांति से अपने पिता से कहा, “पिताजी, आप चिंता न करें। और राजा से कहें के मुझे अपना गुरु स्वीकार करके मेरे निर्देशों का अक्षरशः पालन करने के लिये कहें।”

पिता ने सोचा कि बेटा शायद उन्हें बचाने के लिए कोई तरकीब सोच रहा होगा, इसलिए वह उसे राजा के पास लेे गया और राजा को अपने बेटे के प्रस्ताव के बारे में बताया।

राजा मान गया और अगले दिन राजपंडित अपने पुत्र के साथ दरबार में आया।

सभी बंधनों से मुक्त होने के लिए, राजा ने राजपंडित के पुत्र को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया और निर्देशों की प्रतीक्षा में उसके चरणों में बैठ गया।

दरबार में भीड़ थी और सभी की निगाहें राजा और उनके गुरु पर टिकी थीं।

सभी को आश्चर्य हुआ जब राजपंडित के पुत्र ने राजा से एक बहुत मजबूत रस्सी लाने को कहा।

राजपंडित यह सोचकर बहुत परेशान हो गया कि उसका बेटा भला यह क्या मूर्खता कर रहा है।

वह डर गया, और सोचा कि क्या उसका बेटा किसी को रस्सी से बांधेगा, या कहीं वो स्वयं राजा को ही तो नहीं बांध देगा?

तभी पुत्र ने आज्ञा दी, “राजा को उस खम्भे से बान्ध दिया जाए।”

राजा वचन से बंधा था इसलिए वह खंभे से बंधने के लिए सहमत हो गया।

इसके बाद पुत्र ने अपने पिता को दूसरे खम्भे से बाँधने का आदेश दिया। तो अब स्वयं राजपंडित भी बंधा हुआ था।

अब तो राजपंडित बहुत उत्तेजित हो गया। वह अपने बेटे को मन ही मन कोस रहा था और उसे दंडित करने की सोच रहा था।

तभी उसके बेटे ने उसे निर्देश दिया, “अब, पिताजी आप राजा को खोल दीजिए।”

राजपंडित क्रोधित हो गया और क्रोध में चिल्लाया, “अरे मूर्ख! क्या तुम देख नहीं सकते कि मैं स्वयं बंधा हुआ हूं? क्या एक आदमी जो खुद बंधा हुआ है, दूसरे आदमी के बंधन को खोल सकता है? क्या तुम नहीं समझते कि यह एक असंभव कार्य है?”

राजा ने अपने युवा गुरु को संबोधित करते हुए एक शांत और सम्मानजनक स्वर में कहा, “मैं समझ गया मेरे गुरु। जो स्वयं सांसारिक मामलों में बंधा हुआ है, ‘माया’ से बंधा हुआ है, वह संभवतः दूसरे व्यक्ति को मुक्त नहीं कर सकता है ।

जो संसार का त्याग कर, माया के संसार से परे चले गए हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है – वे ही दूसरे मनुष्य को मुक्त कर सकते हैं। वे ही दूसरों के बंधनों को तोड़ सकते हैं।”

अतःएव आप सभी अगर अपनी समस्याओं से मुक्ति चाहते है तो ऐसे गुरु की तलाश करें जो खुद को संसार के बंधनों से आज़ाद कर चुका हो।

भाग्यशाली हैं हम सब जिनको समय के सद्गुरु मिले हैं जिन्होंने हमको अनावश्यक भटकाव से रोककर उस अविनाशी से जोड़ दिया!
कहा है ना कि –
दौड़ रहा दिन रात सदा,
जग के सब काज विहारन में!
सपने सम विश्व दिखाय मुझे,
मेरे चंचल चित्त को मोड़ दिया!
इसलिए
🌸 सद्गुरु की उस दया को हमेशा याद रखें! 🌸
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

गलत व अभोज्य वस्तुओं के खान-पान से मनुष्य विकार ग्रस्त हो जाता है।

बोल तो अमोल है जो कोई बोले जान।
हिये तराजू तौल के तव मुख बाहर आन॥
एक दिन गुरुकुल के शिष्यों में इस बात पर बहस छिड़ गयी कि आखिर इस संसार की सबसे शक्तिशाली वस्तु क्या है?
कोई कुछ कहता तो कोई कुछ! जब पारस्परिक विवाद का कोई निर्णय ना निकला तो फिर सभी शिष्य गुरुजी के पास पहुँचे!

सबसे पहले गुरूजी ने उन सभी शिष्यों की बातों को सुना और कुछ सोचने के बाद बोले- तुम सब की बुद्धि ख़राब हो गयी है! क्या ये अनाप-शनाप निरर्थक प्रश्न कर रहे हो? इतना कहकर वे वहां से चले गए।

हमेशा शांत स्वभाव रहने वाले गुरु जी से किसी ने इस प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं की थी। सभी शिष्य क्रोधित हो उठे और आपस में गुरु जी के इस व्यवहार की आलोचना करने लगे।

अभी वे आलोचना कर ही रहे थे कि तभी गुरु जी उनके समक्ष पहुंचे और बोले- *मुझे तुम सब पर गर्व है! तुम लोग अपना एक भी क्षण भी व्यर्थ नहीं करते और अवकाश के समय भी ज्ञान चर्चा किया करते हो।

गुरु जी से प्रसंशा के बोल सुनकर शिष्य गदगद हो गए! उनका स्वाभिमान जागृत हो गया और सभी के चेहरे खिल उठे।

गुरूजी ने फिर अपने उन सभी शिष्यों को समझाते हुए कहा – “मेरे प्यारे शिष्यो! आज ज़रूर आप लोगों को मेरा व्यवहार कुछ विचित्र सा लगा होगा! दरअसल, मैंने ऐसा जानबूझ आपके प्रश्न का उत्तर देने के लिए किया था।

देखिये,
जब मैंने आपके प्रश्न के बदले में आपको भला-बुरा कहा तो आप सभी क्रोधित हो उठे और मेरी आलोचना करने लगे!
लेकिन जब मैंने आपकी प्रसंशा की तो आप सब प्रसन्न हो उठे!

पुत्रो, इस संसार में वाणी से बढकर दूसरी कोई शक्तिशाली वस्तु नहीं है।
वाणी से ही मित्र को शत्रु और शत्रु को भी मित्र बनाया जा सकता है।
ऐसी शक्तिशाली वस्तु का प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति को सोच समझ कर करना चाहिए।
वाणी का माधुर्य लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।
गुरूजी की बातें सुनकर शिष्यगण संतुष्ट होकर गुरुदेव को प्रणाम कर लौट आए और उस दिन से मीठा बोलने का अभ्यास करने लगे।

सचमुच में, हमारी बोली या हमारी वाणी बेहद शक्तिशाली होती है! आवश्यकता है – इसका सही प्रयोग करने की।
यदि हम अपनी बोली अच्छी रखते हैं और अपनी बात बिना औरों को ठेस पहुंचाए हुए कहते हैं तो ये हमारे व्यक्तित्व को संवारता है और हमें लोगों के बीच लोकप्रिय बनाता है।
वहीं, अगर हम साधारण बात भी अपमानजनक या क्रोध के साथ कहते हैं तो ना हम ठीक से अपने विचारों को समझा पाते हैं और ना ही दूसरों के हृदय में अपने लिए कोई जगह बना पाते हैं। अतः हमें हमेशा सही शब्दों और सही लहजे का चुनाव करना चाहिए!
कहा भी है कि –
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आप खोय!
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ।
भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि इंसान को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को बहुत अच्छी लगे। ऐसी भाषा दूसरे लोगों को तो सुख पहुँचाती ही है, इसके साथ खुद को भी बड़े आनंद का अनुभव होता है।

सचमुच में, वाणी की शक्ति मनुष्य के लिए वरदान व अभिशाप दोनों है। आवश्यकता है सदुपयोग एवं दुरुपयोग की। निंदा, प्रशंसा, आलोचना के शब्दों को सुन-सुनकर मनुष्य का हृदय इधर-उधर डोलता है। वाणियां ही मनुष्य के मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह के विकार उत्पन्न करते हैं। वाणी सुनकर ही राजा धन, ऐश्वर्य व राजपाट छोड़कर वैरागी बन जाता है। उपदेश सुनकर ही मनुष्य विवेक द्वारा इस संसार की नि:सारता को समझता है।

गलत व अभोज्य वस्तुओं के खान-पान से मनुष्य विकार ग्रस्त हो जाता है। उसी प्रकर गलत वाणियां बोलकर मनुष्य स्वयं व दूसरों को अशांत करता है। कई लोग बातें ज्यादा काम कम करते हैं तो कई लोग बातें कम तथा काम ज्यादा करते हैं!
कबीर साहेब कहते हैं – मधुर वचन है औषधि कटुक वचन है तीर।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 सुप्रभात 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

जब हृदय में शांति का अनुभव मनुष्य ने कर लिया तो यह मनुष्य के लिए सबसे बड़ी चीज है।

एक बक्सा है। उस बक्से के अंदर अनमोल चीज रखी है और बक्से में ताला लगा है।

पहले आप यह बात समझ लें कि यह बक्सा कौन सा बक्सा है ? मैं किस बक्से की बात कर रहा हूँ ? यह साधारण बक्सा नहीं है। जिस बक्से की मैं बात कर रहा हूँ, वह है – यह मनुष्य शरीर और इस मनुष्य शरीर में कुछ रखा हुआ है।

बाहर से एक बक्सा ऐसा है, जो साधारण है। एक बक्सा है, जो चांदी से जड़ा हुआ है। एक बक्सा है, जो सोने से जड़ा हुआ है। एक बक्सा है, जिसमें कारीगरों ने तरह-तरह का काम किया है। एक बक्सा है, जिसमें किसी ने काम नहीं किया है, कच्ची लकड़ी का बना हुआ है। कोई बात नहीं। बक्से के बाहर जो कुछ है, मैं उसकी बात नहीं कर रहा हूँ। मैं उस चीज की बात कर रहा हूँ, जो इस बक्से के अंदर है।

इस मनुष्य रूपी बक्से के बारे में भी समझ लीजिये कि इस बक्से के कुछ नियम हैं। यह बक्सा भी प्रकृति के नियमों में बंधा हुआ है। एक दिन यह बक्सा बना और एक दिन यह बक्सा नहीं रहेगा। जबतक यह बक्सा है, तबतक इसके अंदर रखी हुई चीज उपलब्ध है। जिस दिन यह बक्सा नहीं रहेगा, उस दिन वह अंदर रखी हुई चीज भी नहीं मिलेगी। पर जबतक यह बक्सा है, इसके अंदर एक ऐसी चीज रखी हुई है, जो अनमोल है। चाहे किसी ने इस पर कुर्ता पहन रखा हो या किसी ने सूट पहन रखा हो, किसी ने टाई पहन रखी हो, किसी भी तरीके से इसको सजाया हुआ हो। इस बक्से के अंदर जो चीज रखी हुई है, मेरा मतलब उससे है।

आजतक तो लोग बक्से के बाहर क्या है, इस बारे में सोचते आये हैं। बक्सा कैसा होना चाहिए, लोगों ने इसके लिए रीति-रिवाज बनाये हैं। किस तरीके से इस बक्से को रखना चाहिए ? इन्हीं नियमों को बनाते-बनाते बड़े-बड़े देश बन गए; बड़े-बड़े धर्म बन गए; बड़े-बड़े कानून बन गए – इस बक्से के कारण। अगर यह बक्सा नहीं होता तो कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं होती, देशों की कोई जरूरत नहीं होती, इसको सजाने की कोई जरूरत नहीं होती, कोई अमीर नहीं होता और कोई गरीब नहीं होता।

बक्सा हैं आप और अनमोल चीज है आपके अंदर। अज्ञानता का ताला लगा हुआ है। ज्ञान की चाबी मेरे पास है। अगर किसी को चाहिए तो मैं उसे दे सकता हूँ। मैं बात कर रहा हूँ ‘शांति’ की, मैं बात कर रहा हूँ ‘सच्ची खुशी’ की। अगर मनुष्य को कुछ भी करना नहीं आता हो, तब भी वह अपने हृदय में उस सच्ची खुशी का अनुभव कर सके तो इतना ही पर्याप्त है! इसके बाद जब संतोष हो गया, जब हृदय में शांति का अनुभव मनुष्य ने कर लिया तो यह मनुष्य के लिए सबसे बड़ी चीज है।

सचमुच संचयात्मक सोच ही संशय और लोभ की जननी है!

एक बहुत धनी व्यापारी था। उसने बहुत धन संपत्ति इकट्ठा कर रखी थी। उसका एक नौकर था संभु। जो अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा गरीबों की मदद में खर्च कर देता था। व्यापारी रोज उसे धन बचाने की शिक्षा देता। लेकिन संभु पर कोई असर नहीं होता था।

इससे तंग आकर एक दिन व्यापारी ने संभु को एक डंडा दिया और कहा कि जब तुझे अपने से भी बड़ा कोई मूर्ख मिले तो इसे उसको दे देना।

इसके बाद व्यापारी अक्सर उससे पूछता कि कोई तुझसे बड़ा मूर्ख मिला?

संभु विनम्रता से इनकार कर देता। एक दिन व्यापारी बीमार हो गया। रोग इतना बढ़ा कि वह मरणासन्न हो गया।

अंतिम समय उसने संभु को अपने पास बुलाया और कहा कि अब मैं इस संसार को छोड़कर जाने वाला हूँ।
संभु ने कहा, “मालिक मुझे भी अपने साथ ले चलिए।”
व्यापारी ने प्यार से डांटते हुए कहा, “वहां कोई किसी के साथ नहीं जाता।”

संभु ने फिर कहा, ”फिर तो आप धन-दौलत, सुख- सुविधा के सामान जरूर ले जाइए और आराम से वहां रहिएगा।”

व्यापारी ने कहा, ”पगले! वहां कुछ भी लेकर नहीं जाया जा सकता। सबको अकेले और खाली हाथ ही जाना पड़ता है।”

इस पर संभु बोला, “मालिक! तब तो यह डंडा आप ही रखिये। जब कुछ लेकर जाया नहीं जा सकता। तो आपने बेकार ही पूरा जीवन धन दौलत और सुख सुविधाओं को एकत्र करने में नष्ट कर दिया। न तो दान पुण्य किया, न ही भगवान का भजन। इस डंडे के असली हकदार तो आप ही हो।”

सचमुच संचयात्मक सोच ही संशय और लोभ की जननी है! इसलिय अधिक धन और साथ ना ले जा सकने वाली चीजों के संचय का लोभ नहीं करना चाहिए क्योंकि अंत समय में मनुष्य के साथ कुछ नहीं जाता!
🙏🏾🙏🏼🙏 सुप्रभात🙏🏻🙏🏿🙏🏽

जागने की संभावना

जागने की संभावना
.
एक विश्रामालय में दो व्यक्ति आराम-कुर्सियों पर बैठे हुए थे। एक युवा था और एक वृद्ध था।
.
जो वृद्ध था वह आंखें बंद किये बैठा था, पर बीच-बीच में मुस्करा उठता था।
.
और कभी-कभी हाथ से और चेहरे से ऐसे इशारे करता था, जैसे कुछ दूर हटा रहा हो।
.
युवक से बिना पूछे न रहा गया। वृद्ध ने एक बार आंखें खोली, तो उसने पूछ ही लिया…
.
‘इस अत्यंत कुरूप विश्रामगृह में ऐसा क्या है, जो आप में मुस्कराहट ला देता है?’
.
वृद्ध बोला, ‘मैं अपने से कुछ कहानियां कह रहा हूं, उनमें ही हंसी आ जाती है।’
.
उस युवक ने पूछा, ‘और बार-बार हाथ से हटाते क्या हैं?’
.
वृद्ध हंसने लगा और बोला, ‘उन कहानियों को जिन्हें बहुत बार सुन चुका हूं।’
.
युवक ने कहा, ‘आप भी क्या कहानियों से मन समझा रहे हैं।’
.
उत्तर में वृद्ध ने कहा था, ‘बेटे, एक दिन समझोगे कि पूरा ही जीवन कहानियों से अपने को समझा लेने का नाम है।’
.
निश्चित ही जीवन जैसा मिलता है, वह कहानी ही है। और कहानियों से अपने को समझा लेने का ही नाम जीवन है।
.
जिसे हम जीवन समझते हैं, वह जीवन नहीं, केवल एक सपना है। नींद टूटने पर ज्ञात होता है कि हाथ में कुछ भी नहीं है- जो था, वह था नहीं, बस, केवल दिखता था।
.
पर, इस स्वप्न-जीवन से सत्य-जीवन में जागा जा सकता है। निद्रा छोड़ी जा सकती है।
.
जो सो रहा है, वह जाग भी सकता है। उसके सो सकने की संभावना ही, उसके जागने की भी संभावना है!
🙏🙏🙏🙏🙏

निष्काम कर्म

निष्काम कर्म

एक गरीब विधवा के पुत्र ने एक बार अपने राजा को देखा। राजा को देख कर उसने अपनी माँ से पूछा- “माँ! क्या कभी मैं राजा से बात कर पाऊँगा?”

माँ हंसी और चुप रह गई।

पर वह लड़का तो मन ही मन निश्चय कर चुका था।
उन्हीं दिनों गाँव में एक संत आए हुए थे।
तो युवक ने उनके चरणों में अपनी इच्छा रखी।

संत ने कहा- “बेटा, अमुक स्थान पर राजा का महल बन रहा है, तुम वहाँ चले जाओ और मजदूरी करो। पर ध्यान रखना, वेतन न लेना अर्थात् बदले में कुछ माँगना मत। निष्काम रहना।”

वह लड़का गया। वह मेहनत दोगुनी करता पर वेतन न लेता।

एक दिन राजा निरीक्षण करने आया। उसने लड़के की लगन देखी। प्रबंधक से पूछा- “यह लड़का कौन है, जो इतनी तन्मयता से काम में लगा है? इसे आज अधिक मजदूरी देना।”

प्रबंधक ने राजा को लडके के बारे में पूरी जानकारी देते हुये बतलाया कि – “महाराज! इसका अजीब हाल है, दो महीने से इसी उत्साह से काम कर रहा है।
पर हैरानी यह है कि यह मजदूरी नहीं लेता। कहता है – मेरे घर का काम है। घर के काम की क्या मजदूरी लेनी?”

राजा ने उसे बुला कर कहा- “बेटा! तू मजदूरी क्यों नहीं लेता? बता तू क्या चाहता है?”

लड़का राजा के पैरों में गिर पड़ा और बोला- “महाराज! आपके दर्शन हो गए! आपकी कृपा दृष्टि मिल गई, मुझे मेरी मजदूरी मिल गई। अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए।”

राजा उसे मंत्री बना कर अपने साथ ले गया और कुछ समय बाद अपनी इकलौती पुत्री का विवाह भी उसके साथ कर दिया। राजा का कोई पुत्र था नहीं, तो कालांतर में उसे ही राज्य भी सौंप दिया।

इस कथानक से हमें भी यह सन्देश मिलता है कि –
भगवान ही राजा हैं।
हम सभी भगवान के मजदूर हैं।
भगवान का भजन करना ही मजदूरी करना है।
संत ही मंत्री है।
भक्ति ही राजपुत्री है।
मोक्ष ही वह राज्य है।*
हम भगवान के भजन के बदले में कुछ भी न माँगें
तो वे भगवान स्वयं दर्शन देकर पहले संत बना देते हैं
और अपनी भक्ति प्रदान कर, कालांतर में मोक्ष ही दे देते हैं।

वह लड़का
अगर सकाम कर्म करता
तो मजदूरी ही पाता!
निष्काम कर्म किया
तो राजा बन बैठा।
यही सकाम और निष्काम कर्म के फल में भेद है।
इसलिय भक्त होने के नाते हमें निष्काम भाव से ही सेवा करनी चाहिय
क्योंकि उनके दरवार में दिमांड और कमांड का भाव रखने वालों को कुछ भी नहीं मिलता!
तुलसी विलम्ब न कीजिए, निश्चित भजिए राम।
जगत मजूरी देत है, क्यों राखे भगवान॥
🙏🙏🙏🙏🌸🌸🌸🙏🙏🙏

वैरागी कौन ??

वैरागी कौन ??

एक साधु को एक नाविक रोज इस पार से उस पार ले जाता था, बदले मैं कुछ नहीं लेता था, वैसे भी साधु के पास पैसा कहां होता था।

नाविक सरल था, पढा लिखा तो नहीं, पर समझ की कमी नहीं थी। साधु रास्ते में ज्ञान की बात कहते, कभी भगवान की सर्वव्यापकता बताते और कभी अर्थसहित श्रीमदभगवद्गीता के श्लोक सुनाते।

नाविक मछुआरा बङे ध्यान से सुनता, और बाबा की बात ह्रदय में बैठा लेता।

एक दिन उस पार उतरने पर साधु नाविक को कुटिया में ले गये और बोले, वत्स, मैं पहले व्यापारी था, धन तो कमाया था पर अपने परिवार को आपदा से नहीं बचा पाया था। अब ये धन मेरे किसी का काम का नहीं। तुम ले लो, तुम्हारा जीवन संवर जायेगा, तेरे परिवार का भी भला हो जाएगा।

नाविक बोला, नहीं बाबाजी, मैं ये धन नही ले सकता, मुफ्त का धन घर में जाते ही आचरण बिगाड़ देगा, कोई मेहनत नहीं करेगा, आलसी जीवन लोभ लालच और पाप बढायेगा।

आप ही ने मुझे ईश्वर के बारे में बताया! मुझे तो आजकल लहरों में भी कई बार वो नजर आता है। जब मै उसकी नजर में ही हूँ तो फिर अविश्वास क्यों करूं? मैं अपना काम करूं और शेष उसी पर छोङ दूं।

प्रसंग तो समाप्त हो गया, पर एक सवाल छोड़ गया, इन दोनों पात्रों में साधु कौन था ?

एक वो था; जिसने दुःख आया, तो भगवा पहना, संन्यास लिया, धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया, याद किया और समझाने लायक स्थिति में भी आ गया लेकिन फिर भी धन की ममता नहीं छोङ पाया और सुपात्र की तलाश करता रहा।

और दूसरी तरफ वो निर्धन नाविक, सुबह खा लिया, तो शाम का पता नहीं, फिर भी पराये धन के प्रति कोई ललक नहीं! संसार में लिप्त रहकर भी निर्लिप्त रहना आ गया! भगवा नहीं पहना, सन्यास नहीं लिया, पर उस का ईश्वरीय सत्ता में विश्वास जम गया!

उसने श्रीमदभगवद्गीता के श्लोक को ना केवल समझा बल्कि उन्हें व्यवहारिक जीवन में कैसे उतारना है ये सीख गया, और पल भर में धन के मोह को ठुकरा गया।

आप भी विचार कीजिए कि वास्तव में वैरागी कौन? और स्वयं के जीवन का अवलोकन कीजिए कि हमारे अन्दर उस अविनाशी के प्रति कितना प्रगाढ़ विश्वास है!

अकर्मण्य बनकर नहीं कर्म करके उसके परिणाम को उस अन्दर के साक्षी के समक्ष अपने को समर्पित करने का भाव ही वैराग्य की उच्चतम अवस्था है! जहां आनंद, शान्ति, करुणा, दयाभाव के अलावा कुछ भी नहीं है!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

बहुत ही अच्छी कहानी है कृपया जरूर पढ़ें

एक जौहरी के निधन के बाद उसका
परिवार संकट में पड़ गया।
,
खाने के भी लाले पड़ गए।
,
एक दिन उसकी पत्नी ने अपने बेटे
को नीलम का एक हार
देकर कहा- ‘बेटा, इसे अपने चाचा की
दुकान पर ले जाओ।
,
कहना इसे बेचकर कुछ रुपये दे दें।
,
बेटा वह हार लेकर चाचा जी के पास गया।
,
चाचा ने हार को अच्छी तरह से देख
परखकर कहा- बेटा,
मां से कहना कि अभी बाजार
बहुत मंदा है।
,
थोड़ा रुककर बेचना,
अच्छे दाम मिलेंगे।
,
उसे थोड़े से रुपये देकर कहा कि
तुम कल से दुकान पर आकर बैठना।
,
अगले दिन से वह लड़का रोज दुकान
पर जाने लगा और वहां हीरों
रत्नो की परख का काम सीखने लगा।
,
एक दिन वह बड़ा पारखी बन गया।
लोग दूर-दूर से अपने हीरे की परख कराने
आने लगे।
,
एक दिन उसके चाचा ने कहा, बेटा अपनी
मां से वह हार लेकर आना और कहना
कि अब बाजार बहुत तेज है,
,
उसके अच्छे दाम मिल जाएंगे।
,
मां से हार लेकर उसने परखा तो
पाया कि वह तो नकली है।
,
वह उसे घर पर ही छोड़ कर
दुकान लौट आया।
,
चाचा ने पूछा, हार नहीं लाए?
,
उसने कहा, वह तो नकली था।
,
तब चाचा ने कहा- जब तुम पहली बार
हार लेकर आये थे, तब मैं उसे
नकली बता देता तो तुम सोचते कि
आज हम पर बुरा वक्त आया तो चाचा
हमारी चीज को भी नकली
बताने लगे।
,
आज जब तुम्हें खुद ज्ञान हो गया तो
पता चल गया कि हार सचमुच नकली है।
,
सच यह है कि ज्ञान के बिना इस संसार में
हम जो भी सोचते, देखते और जानते हैं,
सब गलत है।
,
और ऐसे ही गलतफहमी का शिकार
होकर रिश्ते बिगडते है।
Think and Live Long Relationship
ज़रा सी रंजिश पर ,ना छोड़
किसी अपने का दामन.
,
ज़िंदगी बीत जाती है
अपनो को अपना बनाने में..! 👍

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

घमंड नही करने का ज्ञान

घमंड नही करने का ज्ञान

बात उस समय की है, जब स्वामी विवेकानंद अपने लोकप्रिय शिकागो धर्म सम्मेलन के भाषण के बाद भारत वापस आ गये थे। अब उनकी चर्चा विश्व के हर देश में हो रही थी। सब लोग उन्हें जानने लगे थे।

स्वामी जी भारत वापस आकर अपने स्वभाव अनुरूप भ्रमण कर रहे थे। इस समय वे हिमालय और इसके आसपास के क्षेत्रों में थे। एक दिन वो घूमते घूमते एक नदी के किनारे आ गये।  वहां उन्होंने देखा कि एक नाव है पर वह किनारा छोड़ चुकी है। तब वे नाव के वापस आने के इंतजार में वहीं किनारे पर बैठ गए।

एक साधु वहां से गुजर रहा था। साधु ने स्वामी जी को वहां अकेला बैठा देखा तो वह स्वामी जी के पास गया और उनसे पूछा, तुम यहां क्यों बैठे हुए हो?
स्वामी जी ने जवाब दिया, मैं यहां नाव का इंतजार कर रहा हूं।
साधु ने फिर पूछा, तुम्हारा नाम क्या है?
स्वामी जी ने कहा, मैं विवेकानंद हूं।

साधु ने स्वामी जी का मजाक उड़ाते हुए उनसे कहा, अच्छा! तो तुम वो विख्यात विवेकानंद हो जिसको लगता है कि विदेश में जा कर भाषण दे देने से तुम बहुत बड़े महात्मा साधु बन सकते हो।
स्वामी जी ने साधु को कोई जवाब नहीं दिया।
फिर साधु ने बहुत ही घमंड के साथ, नदी के पानी के ऊपर चल कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया।
कुछ दूर तक चलने के बाद साधु ने स्वामी जी कहा, क्या तुम मेरी तरह पानी पर पैदल चल कर इस नदी को पार कर सकते हो?
स्वामी जी ने बहुत ही आदर और विनम्रता के साथ साधु से कहा, इस बात में कोई शक नहीं कि आपके पास बहुत ही अद्भुत शक्ति है। लेकिन क्या आप मुझे यह बता सकते हो, कि आपको यह असाधारण शक्ति प्राप्त करने में कितना समय लगा। बहुत ही अभिमान के साथ साधु ने जवाब दिया, यह बहुत ही कठिन कार्य था। मैंने बीस सालों की कठिन तपस्या  और साधना के बाद यह महान शक्ति प्राप्त की है।
साधु का यह बताने का अंदाज बहुत ही अहंकार भरा था।
यह देख कर स्वामी जी बहुत ही शांत स्वर में बोले, आपने अपनी जिन्दगी के बीस साल ऐसी विद्या को सीखने में बर्बाद कर दिए, जो काम एक नाव पांच मिनिट में कर सकती है। आप ये बीस साल निर्धन बेसहारा गरीबों की सेवा में लगा सकते थे। या अपने ज्ञान और शक्ति का प्रयोग देश और देशवासियों की प्रगति में लगा सकते थे। परंतु आपने अपने बीस साल सिर्फ पांच मिनट बचाने के लिए व्यर्थ कर दिए, ये कोई बुद्धिमानी नहीं है।
साधु सिर झुकाए खड़े रह गये और स्वामी जी नाव में बैठ कर नदी के दूसरी किनारे चले गए।

💐💐शिक्षा💐💐

इस कहानी ने हमें बताया कि ज्ञान और शक्ति का सही प्रयोग आवश्यक है। किसी शक्ति को प्राप्त कर के यदि हम उस पर घमंड करते है तो यह मूर्खता है। शक्ति का सही जगह पर सही इस्तेमाल करना ही वास्तविकता में बुद्धिमानी है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

आत्मसुधार

आत्मसुधार
🌸🌸🌸🌸🌸🌸
एक बार एक व्यक्ति दुर्गम पहाड़ पर चढ़ा, वहाँ पर उसे एक महिला दिखीं, वह व्यक्ति बहुत अचंभित हुआ, उसने जिज्ञासा व्यक्त की कि वे इस निर्जन स्थान पर क्या कर रही हैं।

उन महिला का उत्तर था मुझे अत्यधिक काम हैं!

इस पर वह व्यक्ति बोला आपको किस प्रकार का काम है, क्योंकि मुझे तो यहाँ आपके आस-पास कोई दिखाई नहीं दे रहा।

महिला का उत्तर था मुझे दो बाज़ों को और दो चीलों को प्रशिक्षण देना है, दो खरगोशों को आश्वासन देना है, एक गधे को आलस्य-प्रमाद से बाहर निकालना है, एक सर्प को अनुशासित करना है और एक सिंह को वश में करना है।

व्यक्ति बोला पर वे सब हैं कहाँ, मुझे तो इनमें से कोई नहीं दिख रहा!

महिला ने कहा ये सब मेरे ही भीतर हैं।
दो बाज़ जो हर उस चीज पर गौर करते हैं, जो भी मुझे मिलीं अच्छी या बुरी। मुझे उन पर काम करना होगा, ताकि वे सिर्फ अच्छा ही देखें, ये हैं मेरी आँखें।

दो चील जो अपने पंजों से सिर्फ चोट और क्षति पहुंचाते हैं, उन्हें प्रशिक्षित करना होगा, चोट न पहुंचाने के लिए, वे हैं मेरे हाँथ।

खरगोश यहाँ वहाँ भटकते फिरते हैं, पर कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं करना चाहते। मुझे उनको सिखाना होगा पीड़ा सहने पर या ठोकर खाने पर भी शान्त रहना,वे हैं मेरे पैर।

गधा हमेशा थका रहता है, यह जिद्दी है। मै जब भी चलती हूँ, यह बोझ उठाना नहीं चाहता, इसे आलस्य प्रमाद से बाहर निकालना है, यह है मेरा शरीर।

सबसे कठिन है साँप को अनुशासित करना। जबकि यह 32 सलाखों वाले एक पिंजरे में बन्द है, फिर भी यह निकट आने वालों को हमेशा डसने, काटने, और उनपर अपना ज़हर उडेलने को आतुर रहता है, मुझे इसे भी अनुशासित करना है – यह है मेरी जीभ!

मेरा पास एक शेर भी है, आह! यह तो निरर्थक ही घमंड करता है। वह सोचता है कि वह तो एक राजा है। मुझे उसको वश में करना है, यह है मेरा मैं।

तो देखा आपने मुझे कितना अधिक काम है!

सोंचिये और विचरिये हम सब में काफी समानता है! अपने उपर बहुत कार्य करना है, तो छोडिए दूसरों को परखना, निंदा करना, टीका टिप्पणी करना और उस पर आधारित नकारत्मक धारणायें बनाना। चलें पहले अपने उपर काम करें..!!
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
🙏🏽🙏🏾🙏 सुप्रभात🙏🏼🙏🏻🙏🏿