कष्ट और धैर्य

कष्ट और धैर्य

एक बार की बात है! एक गुरू अपने कुछ शिष्यों के साथ पैदल ही यात्रा पर थे। वे चलते-चलते किसी गांव में पहुंच गए। ये गांव काफी बड़ा था, वहां घूमते हुए उन्हें काफी देर हो गयी थी। गुरू जी थक चुके थे और उन्हें बहुत प्यास लगी, तो उन्होनें अपने एक शिष्य से कहा कि हम इसी गांव में कुछ देर रूकते हैं! तुम मेरे लिए पानी ले आओ। जब शिष्य गांव के अंदर थोड़ा घुमा तो उसने देखा कि वहां एक नदी थी, जिसमें कई लोग कपड़े धो रहे थे, तो कई लोग नहा रहे थे और इसी वजह से नदी का पानी बहुत ही गंदा सा दिख रहा था।

शिष्य को लगा कि ऐसा गंदा पानी गुरू जी के स्वास्थ्य को खराब कर सकता है, उन्हें ये पानी नहीं पिलाया जा सकता। इसलिए शिष्य बिना पानी लिए ही वापस लौट आया और नदी के गंदे पानी की सारी बात गुरू जी को बता दी।

इसके बाद गुरू जी ने किसी दूसरे शिष्य को पानी लाने के लिए भेजा। तो वह कुछ देर बाद वह शिष्य पानी साथ लेकर लौटा।

गुरू जी ने इस दूसरे शिष्य से पूछा कि नदी का पानी तो गंदा था फिर तुम ये पानी कहाँ से लाए?

शिष्य बोला कि गुरू जी, नदी का पानी वास्तव में बहुत ही गंदा था। लेकिन लोगों के नदी से चले जाने के बाद मैंने कुछ देर इंतजार किया और कुछ देर बाद नदी में मिट्टी नीचे बैठ गई और साफ पानी ऊपर आ गया। उसके बाद मैं उसी नदी से आपके लिए पानी भरकर ले आया।

गुरू जी उस शिष्य बात सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और बाकी शिष्यों को भी सीख दी कि हमारा जीवन भी इसी नदी के पानी की तरह है। जीवन में कई बार दुख और समस्याएं आती है तो जीवन रूपी पानी गंदा लगने लगता है लेकिन थोड़े इंतजार और सब्र के बाद ये सतही दुख और समस्याएं नीचे दब जाती है और अच्छा समय ऊपर आ जाता है।

यह हकीकत है कि कुछ लोग पहले वाले शिष्य की तरह दुख और समस्याओं को देख कर घबरा जाते हैं और मुसीबत देखकर वापस लौट आते हैं। ऐसे लोग जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते!
वहीं दूसरी ओर कुछ लोग जो धैर्यशील होते हैं, इंतजार करते है कि कुछ समय बाद गंदगी रूपी समस्याएं और दुख खत्म हो जाएंगे! वे ही सफल होते हैं!

समय समय पर संत यही समझाते हैं कि –
जीवन में उतार-चड़ाव आना जीवन का ही एक हिस्सा (Part of Life) है!
लेकिन
धेर्य और समझदारी के साथ उसका मुकाबला करना, उससे उबर पाना ही (Art of Life) हमारी कुशलता है!

आपका जीवन मंगलमय बना रहे!
🙏🙏🌸🌸🌸🙏🙏

क्या हम भी गुलामों के गुलाम हैं?

क्या हम भी गुलामों के गुलाम हैं?😐

सिकंदर महान ने अपने रण कौशल से ग्रीस, इजिप्ट समेत उत्तर भारत तक अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। सालों से युद्ध करती सिकंदर की सेना बहुत थक चुकी थी और अब वो अपने परिवारों के पास वापस लौटना चाहती थी। सिकंदर को भी अपने सैनिकों की इच्छा का सम्मान करना पड़ा और उसने भी भारत से लौटने का मन बना लिया।

पर जाने से पहले वह किसी ज्ञानी व्यक्ति को अपने साथ ले जाना चाहता था। स्थानीय लोगों से पूछने पर उसे एक पहुंचे हुए बाबा के बारे में पता चला जो कुछ दूरी पर स्थित एक नगर में रहते थे।

सिकंदर दल-बल के साथ वहां पहुंचा। बाबा निःवस्त्र एक पेड़ के नीचे ध्यान लगा कर बैठे थे। सिकंदर उनके ध्यान से बाहर आने का इंतज़ार करने लगा। कुछ देर बाद बाबा ध्यान से बाहर निकले और उनके आँखें खोलते ही सैनिक ”सिकंदर महान – सिकंदर महान” के नारे लगाने लगे।

बाबा अपने स्थान पर बैठे उन्हें ऐसा करते देख मुस्कुरा रहे थे।

सिकंदर उनके सामने आया और बोला, ” मैं आपको अपने देश ले जाना चाहता हूँ। चलिए हमारे साथ चलने के लिए तैयार हो जाइये।“

बाबा बोले, ”मैं तो यहीं ठीक हूँ! मैं यहाँ से कहीं नहीं जाना चाहता! मैं जो चाहता हूँ सब यहीं उपलब्ध है! तुम्हे जहाँ जाना है जाओ।“

एक मामूली से संत का यह जवाब सुनकर सिकंदर के सैनिक भड़क उठे। भला इतने बड़े राजा को कोई मना कैसे कर सकता था।

सिकंदर ने सैनिकों को शांत करते हुए बाबा से कहा, ”मैं ‘ना’ सुनने का आदि नहीं हूँ, आपको मेरे साथ चलना ही होगा।“

बाबा बिना घबराये बोले, ”यह मेरा जीवन है और मैं ही इसका फैसला कर सकता हूँ कि मुझे कहाँ जाना है और कहाँ नहीं!”

यह सुन सिकंदर गुस्से से लाल हो गया उसने फ़ौरन अपनी तलवार निकाली और बाबा के गले से सटा दी, ”अब क्या बोलते हो , मेरे साथ चलोगे या मौत को गले लगाना चाहोगे?”

बाबा अब भी शांत थे और बोले कि ” मैं तो कहीं नहीं जा रहा! अगर तुम मुझे मारना चाहते हो तो मार दो, पर आज के बाद से कभी अपने नाम के साथ “महान” शब्द का प्रयोग मत करना , क्योंकि तुम्हारे अंदर महान होने जैसी कोई बात नहीं है … तुम तो मेरे गुलाम के भी गुलाम हो!”

सिकंदर अब और भी क्रोधित हो उठा, भला दुनिया जीतने वाले इतने बड़े योद्धा को एक निर्बल –निःवस्त्र , व्यक्ति अपने गुलाम का भी गुलाम कैसे कह सकता था?

”तुम्हारा मतलब क्या है?”, सिकंदर क्रोधित होते हुए बोला।

बाबा बोले, ”क्रोध मेरा गुलाम है! मैं जब तक नहीं चाहता मुझे क्रोध नहीं आता, लेकिन तुम अपने क्रोध के गुलाम हो, तुमने बहुत से योद्धाओं को पराजित किया पर अपने क्रोध से नहीं जीत पाये! वो जब चाहता है तुम्हारे ऊपर सवार हो जाता है! तो बताओ हुए ना तुम *मेरे गुलाम के गुलाम?“

सिकंदर बाबा की बातें सुनकर स्तब्ध रह गया। वह उनके सामने नतमस्तक हो गया और अपने सैनिकों के साथ वापस लौट गया।
डाक्टरों के कहना है कि हम जितनी बार गुस्सा होते हैं – उतनी बार हमारे शरीर में एसिड बनता है। और हम यह जानते ही हैं कि एसिड जिस बर्तन में होता है उसे नष्ट कर देता है।

हकीकत में, गुस्से का सबसे बड़ा शिकार खुद गुस्सा करने वाला ही होता है।

इस प्रेरणादायक प्रसंग से सीख लेते हुए हम भी अपने गुस्से को काबू में करने का प्रयास करें क्योंकि जाने अनजाने हम भी अपने को गुस्से का गुलाम बनाकर खुद का बहुत बड़ा नुकसान कर बैठते हैं!

आपका जीवन मंगलमय हो!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌸🌸

समय और भाग्य

समय और भाग्य

चमनलाल सारा दिन धूप में इधर-उधर घूम-फिर कर टूटा-फूटा सामान और कबाड़ जमा करता, फिर शाम को उसे बड़े कबाड़ी की दुकान पर बेचकर पेट भरने लायक कमा लेता था।

एक दिन वह एक घर से पुराना सामान खरीद रहा था। घर के मालिक ने उसे एक पुराना पानदान भी दिया, जो उसने मोल-भाव करके एक रुपये में खरीद लिया।

कुछ आगे बढ़ने पर एक और घर ने उसे कुछ कबाड़ बेचा, लेकिन घर के मालिक को वह पानदान पसंद आ गया और उसने पांच रुपये में उसे खरीद लिया। लेकिन जब काफी कोशिश के बाद भी वह पानदान उससे नहीं खुला तो अगले दिन उसने उसे चमनलाल को वापस करके अपने पांच रुपये ले लिए।

शाम को बड़े कबाड़ी ने भी वह पानदान न खुलने के कारण उससे नहीं खरीदा। अगले दिन रविवार था। रविवार को बाजार के चौक पर चमनलाल पुराना सामान बेचता था।

वहां उससे कोई ग्राहक पांच रुपये देकर वह पानदान ले गया। लेकिन अगले रविवार को वह ग्राहक वह पानदान उसे वापिस कर गया क्योंकि वह उससे भी नहीं खुला।

बार-बार पानदान उसी के पास पहुंच जाने के कारण चमनलाल को बहुत गुस्सा आया और उसने उसे जोर से जमीन पर पटककर मारा। अबकी पानदान खुल गया। पानदान के खुलते ही चमनलाल की आंखें खुली-की-खुली रह गईं! उसमें से कई छोटे-छोटे बहुमूल्य हीरे छिटककर जमीन पर बिखर गए थे। अगले दिन प्रातः वह उसी घर में गया जहां से उसने पानदान खरीदा था। पता चला कि वे लोग मकान बेचकर किसी दूसरे शहर में चले गये हैं।

चमनलाल ने उनका पता लगाने की कोशिश भी की लेकिन नाकामयाब रहा। बाद में चमनलाल उन हीरों को बेचकर संपन्न व्यापारी बन गया और सेठ चमनलाल कहलाने लगा।

समय से पहले भाग्य से ज्यादा किसी को नहीं मिलता। यही चमनलाल के साथ हुआ। वह तो किसी तरह उस पानदान से छुटकारा पाना चाह रहा था, जो बार-बार लौटकर उसी के पास आ जाता था।

शिक्षा:-किस्मत बार-बार उसके दरवाजे पर दस्तक दे रही थी, तभी तो वह पानदान उसे कबाड़ी से सेठ बना गया…. कई बार किस्मत हमें कुछ नहीं अपॉर्चुनिटी दिखाना और दिखाना चाहती है हमें उसे पॉजिटिव तरीके से देखना चाहिए

राधा अष्टमी की बधाई एवं शुभकामनाएं

जय श्री राम

शुभ रात्री

कर्मो का खेल – कर्म का लेन देन

कर्मो का खेल – कर्म का लेन देन

एक फौजी था। उसके मां नहीं, बाप नहीं, शादी नहीं, बच्चे नहीं, भाई नहीं, बहन नहीं। अकेला ही कमा कमा के फौज में जमा करता जा रहा था, तो थोड़े दिन में एक सेठ जी जो फौज में माल सप्लाई करते थे तो उनसे उनका परिचय हो गया और दोस्ती हो गई।

सेठ जी ने कहा, ”जो तुम्हारे पास पैसा है वो उतने के उतने ही पड़ा हैं उसे तुम मुझे दे दो मैं कारोबार में लगा दूं तो पैसे से पैसा बढ़ जायेगा।”

फौजी ने सेठ जी को पैसा दे दिया। सेठ जी ने कारोबार में लगा दिया। कारोबार उनका चमक गया, खूब कमाई होने लगी, कारोबार बढ़ गया।

थोड़े ही दिन में लड़ाई लग गई। लड़ाई में फौजी घोड़ी पर चढ़कर लड़ने गया। घोड़ी इतनी बदतमीज थी कि जितनी ज़ोर ज़ोर से लगाम खींचे उतनी ही तेज़ भागे। खींचते खींचते उसके गल्फर तक कट गये लेकिन वो दौड़कर दुश्मनों के गोल में जाकर खड़ी हो गई। दुश्मनों ने वार किया, फौजी भी मर गया और घोड़ी भी मर गई।

अब सेठ जी को मालूम हुआ कि फौजी मर गया तो सेठ जी बहुत खुश हुए कि उसका कोई वारिस तो है नहीं, अब ये पैसा किसको देना। अब मेरे पास पैसा भी हो गया, कारोबार भी चमक गया, लेने वाला भी नहीं रहा। यह सोचकर सेठजी बहुत खुश हुए।

कुछ ही दिन के बाद सेठजी के घर में लड़का पैदा हो गया! अब सेठजी और खुश कि भगवान की बड़ी दया है। खूब पैसा भी हो गया, कारोबार भी हो गया, लड़का भी हो गया,लेने वाला भी मर गया सेठ जी बहुत खुश।

वो लड़का होशियार था और पढ़ने में समझदार था। सेठजी ने उसे पढ़ाया लिखाया! जब वह पढ़ लिखकर बड़ा हो गया तो सोचा कि अब ये कारोबार सम्हाल लेगा, चलो अब इसकी शादी कर दें।

शादी करते ही घर में बहुरानी आ गई। अब उसने सोचा कि चलो, बच्चे की शादी हो गई अब कारोबार सम्हालेगा।

लेकिन कुछ दिन में बच्चे की तबियत खराब हो गई। अब सेठ जी डाक्टर के पास, हकीम के पास, वैद्य के पास दौड़ रहे हैं। वैद्य जी जो दे रहे हैं, दवा खिला रहे हैं, और दवा असर नहीं कर रही, बीमारी बढ़ती ही जा रही। पैसा बरबाद हो रहा है,और बीमारी बढ़ती ही जा रही है, रोग कट नहीं रहा, पैसा खूब लग रहा है। अब अन्त में डाक्टर ने कह दिया कि ला-इलाज मर्ज़ हो गया, इसको अब असाध्य रोग हो गया है! ये बच्चा दो दिन में मर जायेगा।

डाक्टरों के जवाब देने पर सेठ जी निराश होकर बच्चे को लेकर रोते हुए आ रहे थे तो रास्ते में एक आदमी मिला। उसने पूछा कि सेठजी क्या हुआ बहुत दुखी लग रहे हो?

सेठ जी ने कहा, “ये बच्चा जवान था, हमने सोचा बुढ़ापे में मदद करेगा। शादी होते ही अब ये बीमार हो गया।

हमने इसके लिये खूब पैसा लगा दिया! जिस डाक्टर ने जितना मांगा उतना दिया लेकिन आज डाक्टरों ने जवाब दे दिया और कहा, ”अब ये बचेगा नहीं। असाध्य रोग हो गया, लाइलाज मर्ज़ है। अब घर ले जाओ दो दिन भी काटना मुश्किल लगता है।“

आदमी ने कहा, ”अरे सेठ जी! तुम क्यों दिल छोड़ रहे हो। मेरे पड़ोस में वैद्य जी दवा देते हैं। दो आने की पुड़िया खाकर मुर्दा भी उठकर खड़ा हो जाता है। जल्दी से तुम वैद्य जी की दवा ले आओ।”

सेठ जी दौड़कर गये! दो आने की पुड़िया ले आये और पैसा दे दिया। पुड़िया ले आये बच्चे को खिलाई! बच्चा पुड़िया खाते ही मर गया।

अब सेठजी रो रहे हैं! सेठानी भी रो रही और घर में बहुरानी और पूरा गांव भी रो रहा है। गांव में शोर मच गया कि बहुरानी सेठ की कमर जवानी में टूट गई! सब लोग रो रहे हैं। तब वहां एक महात्मा जी आ गये।

उन्होनें कहा कि सेठ जी क्यों रो रहे हैं?
लोग बोले, इस सेठ का एक ही जवान लड़का था वो मर गया इसलिए सब लोग रो रहे हैं। सब दुखी हो रहे हैं।

महात्मा फिर सेठ से बोले, ”सेठजी ! क्यों रो रहे हैं?”
सेठ बोले, ”महाराज ! जिसका जवान बेटा मर जाये वो रोयेगा नहीं तो क्या करेगा?”

महात्मा जी गंभीर होकर बोले कि *आपको याद है जब एक फोजी मरा था और उस दिन बहुत खुश थे कि चलो मर गया – पैसा भी वापस नहीं देना पड़ेगा! माल बहुत हो गया! कारोबार खूब चमक गया!

महात्मा जी ने आगे बतलाया कि – सेठजी! वहीं फौजी पैसा लेने के लिये बेटा बन कर आ गया। पढ़ने में, लिखने में, खाने में, पहनने में और शौक में, श्रृंगार में जितना लगाना था लगाया। शादी ब्याह में सब लग गया। और ब्याज दर ब्याज लगाकर डाक्टरों को दिलवा दिया। अब जब दो आने पैसे बच गये, वो भी वैद्य जी को दिलवा दिये और पुड़िया खाकर चल दिया। यही सोचकर कि अब कर्मो का लेना देना पूरा हुआ।

सेठजी ने कहा, ‘हमारे साथ तो कर्मो का लेन देन था। चलो हमारे साथ तो जो हुआ सो हुआ। लेकिन वो जवान बहुरानी घर में रो रही है, जवानी में उसको धोखा देकर, विधवा बनाकर चला गया! उसका क्या जुर्म था कि उसके साथ ऐसा गुनाह किया।’

महात्मा बोले, ’यह वही घोड़ी है। जिसने जवानी में उसको धोखा दिया तो इसने भी जवानी में उसको धोखा दे दिया।’

इसलिय हमें याद रखना चाहिय कि –
बेटा बन कर, बेटी बनकर, दामाद बनकर और बहू बनकर वही आते हैं – जिनका हमारे साथ कर्मों का लेना देना होता है। लेना देना नहीं होगा तो नहीं आयेगा। जिसके सन्तान लायक होगी तो समझो कि उसने अच्छे कर्म किये होंगे! कर्म हमेशा अपने कर्ता को खोजते हैं!
🙏🌹😊

मनुष्य का ध्यान

मनुष्य का ध्यान

समय और स्थान
जनवरी की एक सर्द सुबह थी, और यह घटना थी अमेरिका के वाशिंगटन डीसी का मेट्रो स्टेशन की!

एक आदमी वहां करीब घंटा भर तक वायलिन बजाता रहा… इस दौरान लगभग 2000 लोग वहां से गुज़रे – उनमें से अधिकतर लोग अपने काम से जा रहे थे।

जब उस व्यक्ति ने वायलिन बजाना शुरू किया। उसके तीन मिनट बाद एक अधेड़ आदमी का ध्यान उसकी तरफ गया। उसकी चाल धीमी हुई और वह कुछ पल उसके पास रुका और फिर जल्दी से निकल गया।

4 मिनट बाद वायलिन वादक को पहला सिक्का मिला… एक महिला ने उसकी टोपी में सिक्का फेंका और बिना रुके चलती बनी।

6 मिनट बाद एक युवक दीवार के सहारे टिककर उसे सुनता रहा, फिर उसने अपनी घड़ी पर नजर डाली और चलता बना…

10 मिनट बाद एक 3 वर्षीय बालक वहां रुक गया, पर जल्दी में दिख रही उसकी माँ उसे खींचते हुए वहां से ले गयी। माँ के साथ लगभग घिसटते हुए चल रहा बच्चा मुड़ मुड़कर वायलिन वादक को देख रहा था…

ऐसा ही कई बच्चों ने किया और हर बच्चे के अभिभावक उसे घसीटते हुए ही ले गये…

45 मिनट तक वह लगातार बजा रहा था – अब तक केवल छः लोग ही रुके थे और उन्होंने भी कुछ देर ही उसे सुना।

लगभग 20 लोगों ने सिक्का उछाला पर रुके बगैर अपनी सामान्य चाल में चलते रहे… उस आदमी को कुल मिलकर 32 डॉलर मिले!

1 घंटे बाद उसने अपना वादन बंद किया। फिर से शांति छा गयी।

इस बदलाव पर भी किसी ने ध्यान नहीं दिया। किसी ने वादक की तारीफ नहीं की और ना ही किसी व्यक्ति ने उसे नहीं पहचाना!!

वह था… विश्व के महान वायलिन वादकों में से एक -“जोशुआ बेल।*

उस समय यह विश्वविख्यात वायलन वादक जोशुआ 16 करोड़ रुपए की अपनी वायलिन🎻 से इतिहास की सबसे कठिन धुन🎶 बजा रहे थे! महज कुछ दिन पहले ही उन्होंने बोस्टन शहर में मंचीय प्रस्तुति दी थी!जहाँ प्रवेश टिकटों का औसत मूल्य 100 डॉलर 💵था।

यह बिलकुल सच्ची घटना है।

जोशुआ बेल प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘WASHINGTON POST’ द्वारा ग्रहणबोध और समझ को लेकर किये गए एक सामाजिक प्रयोग का हिस्सा बने थे।

📌इस प्रयोग का उद्देश्य यह पता लगाना था कि किसी सार्वजनिक जगह पर किसी व्यस्त समय में हम खास चीजों और बातों पर कितना ध्यान देते हैं?

  • क्या हम सुन्दरता या अच्छाई की सराहना करते हैं?*
    क्या हम आम अवसरों पर प्रतिभा की पहचान कर पाते हैं?

इसका एक सामान्य अर्थ यह निकलता हैं, जब दुनिया का एक श्रेष्ठ वादक एक बेहतरीन साज़ से इतिहास की सबसे कठिन धुनों में से एक बजा रहा था – तब अगर हमारे पास इतना समय नहीं था कि कुछ पल रुककर उसे सुन सकें, तो सोचिये… हम कितनी सारी अन्य बातों से वंचित हो गये हैं और लगातार वंचित हो रहे हैं?

संभवतः ये वक़्त बेहद गंभीरता से सोचने का है कि जिंदगी की भागदौड़ में हमने कितनी खूबसूरत चीज़ों को नज़रअंदाज़ कर दिया है और कितने अवसरों की हमने उपेक्षा कर दी है।

इसका दूसरा पहलू यह भी है कि बेशक हमारे पास उस वॉयलिन वादक की तरह बेशकीमती वस्तु हो, लोगों के भले के लिए अद्भुत तोहफा ही क्यों ना हो – अगर हमारे समय व स्थान के चयन में कमी हो तो सामान्य लोगों के लिए वह तोहफ़ा आकर्षण का केन्द्र नहीं हो सकता!

हमारी योग्यता और प्रसिद्धि को लोग तभी समझेंगे, तभी स्वीकार करेंगे – जब हमारा प्रजेंटेशन देश काल परिस्थिति के अनुरूप हो और विधिवत् हो!

महाराजी के ज्ञान प्रचार में सहयोग करने वाले प्रेमियों के लिए यह वाकया प्रेरित करेगा कि महाराजी के अनमोल ज्ञान का प्रचार, जन जन तक उनके सन्देश की पहुंच बनाने के लिए हमें भी समय, स्थान और व्यक्तिगत व्यवहार को सलीके से रखना होगा! तभी इस अनमोल ज्ञान की ओर लोगों का रुझान बन पायेगा!

हम सभी को इस दिशा में गहन चिंतन करना है!
मुझे विश्वास है कि आशातीत परिणाम अवश्य निकलेंगे।
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

अजनबी हमसफ़र

अजनबी हमसफ़र

वो ट्रेन के रिजर्वेशन के डब्बे में बाथरूम के तरफ वाली एक्स्ट्रा सीट पर बैठी थी,…☺️😢😢उसके चेहरे से पता चल रहा था कि थोड़ी सी घबराहट है उसके दिल में कि कहीं टीसी ने आकर पकड़ लिया तो।
कुछ देर तक तो पीछे पलट-पलट कर टीसी के आने का इंतज़ार करती रही।

शायद सोच रही थी कि थोड़े बहुत पैसे देकर कुछ निपटारा कर लेगी। देखकर यही लग रहा था कि जनरल डब्बे में चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें
आकर बैठ गयी, शायद ज्यादा लम्बा सफ़र भी नहीं करना होगा।

सामान के नाम पर उसकी गोद में रखा एक छोटा सा बेग दिख रहा था। मैं बहुत देर तक कोशिश करता रहा पीछे से उसे देखने की कि शायद चेहरा
सही से दिख पाए लेकिन हर बार असफल ही रहा।

फिर थोड़ी देर बाद वो भी खिड़की पर हाथ टिकाकर सो गयी। और मैं भी वापस से अपनी किताब पढ़ने में लग गया।
लगभग 1 घंटे के बाद टीसी आया और उसे हिलाकर उठाया।
“कहाँ जाना है बेटा”

“अंकल अहमदनगर तक जाना है”
“टिकेट है ?”
“नहीं अंकल …. जनरल का है ….

लेकिन वहां चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें बैठ गयी”
“अच्छा 300 रुपये का पेनाल्टी बनेगा”

“ओह … अंकल मेरे पास तो लेकिन 100 रुपये ही हैं”
“ये तो गलत बात है बेटा …. पेनाल्टी तो भरनी पड़ेगी”

“सॉरी अंकल …. मैं अलगे स्टेशन पर जनरल में चली जाउंगी …. मेरे पास सच में पैसे नहीं हैं …. कुछ परेशानी आ गयी, इसलिए
जल्दबाजी में घर से निकल आई …

और ज्यदा पैसे रखना भूल गयी…. ” बोलते बोलते वो लड़की रोने लगी टीसी उसे माफ़ किया और 100 रुपये में उसे अहमदनगर तक उस डब्बे
में बैठने की परमिशन देदी।

टीसी के जाते ही उसने अपने आँसू पोंछे और इधर-उधर देखा कि कहीं कोई उसकी ओर देखकर हंस तो नहीं रहा था।

थोड़ी देर बाद उसने किसी को फ़ोन लगाया और कहा कि उसके पास बिलकुल भी पैसे नहीं बचे हैं … अहमदनगर स्टेशन पर कोई
जुगाड़ कराके उसके लिए पैसे भिजा दे, वरना वो समय पर गाँव नहीं पहुँच पायेगी।

मेरे मन में उथल-पुथल हो रही थी, न जाने क्यूँ उसकी मासूमियत देखकर उसकी तरफ खिंचाव सा महसूस कर रहा था,
दिल कर रहा था कि उसे पैसे देदूं और कहूँ कि तुम परेशान मत हो … और रो मत …. लेकिन एक अजनबी के लिए इस तरह की बात
सोचना थोडा अजीब था।

उसकी शक्ल से लग रहा था कि उसने कुछ खाया पिया नहीं है शायद सुबह से … और अब तो उसके पास पैसे भी नहीं थे।

बहुत देर तक उसे इस परेशानी में देखने के बाद मैं कुछ उपाय निकालने लगे जिससे मैं उसकी मदद कर सकूँ और फ़्लर्ट भी ना कहलाऊं। फिर
मैं एक पेपर पर नोट लिखा,

“बहुत देर से तुम्हें परेशान होते हुए देख रहा हूँ, जनता हूँ कि एक अजनबी हम उम्र लड़के का इस तरह तुम्हें नोट भेजना अजीब भी होगा और शायद तुम्हारी नज़र में गलत भी, लेकिन तुम्हे इस तरह परेशान देखकर मुझे बैचेनी हो रही है इसलिए यह 500 रुपये दे रहा हूँ , तुम्हे कोई अहसान न लगे इसलिए मेरा एड्रेस भी लिख रहा हूँ ….. जब तुम्हें सही लगे मेरे एड्रेस पर पैसे वापस भेज सकती हो ….वैसे मैं नहीं चाहूँगा कि तुम वापस करो ….. अजनबी हमसफ़र ”

एक चाय वाले के हाथों उसे वो नोट देने को कहा, और चाय वाले को मना किया कि उसे ना बताये कि वो नोट मैंने उसे भेजा है। नोट मिलते ही उसने दो-तीन बार पीछे पलटकर देखा कि कोई उसकी तरह देखता हुआ नज़र आये तो उसे पता लग जायेगा कि किसने भेजा। लेकिन मैं तो नोट भेजने के बाद ही मुँह पर चादर डालकर लेट गया था। थोड़ी देर बाद चादर का कोना हटाकर देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कराहट महसूस की। लगा जैसे कई सालों से इस एक मुस्कराहट का इंतज़ार था। उसकी आखों की चमक ने मेरा दिल उसके हाथों में जाकर थमा दिया …. फिर चादर का कोना हटा- हटा कर हर थोड़ी देर में उसे देखकर
जैसे सांस ले रहा था मैं। पता ही नहीं चला कब आँख लग गयी। जब आँख खुली तो वो वहां नहीं थी …

ट्रेन अहमदनगर स्टेशन पर ही रुकी थी। और उस सीट पर एक छोटा सा नोट रखा था ….. मैं झटपट मेरी सीट से उतरकर उसे उठा लिया .. और उस पर लिखा था…

Thank You मेरे अजनबी हमसफ़र ….

आपका ये अहसान मैं ज़िन्दगी भर नहीं भूलूँगी …. मेरी माँ आज मुझे छोड़कर चली गयी हैं …. घर में मेरे अलावा और कोई नहीं है इसलिए
आनन – फानन में घर जा रही हूँ।

आज आपके इन पैसों से मैं अपनी माँ को शमशान जाने से पहले एक बार देख पाऊँगी ….

उनकी बीमारी की वजह से उनकी मौत के बाद उन्हें ज्यादा देर घर में नहीं रखा जा सकता। आजसे मैं आपकी कर्ज़दार हूँ …

जल्द ही आपके पैसे लौटा दूँगी। उस दिन से उसकी वो आँखें और वो मुस्कराहट जैसे मेरे जीने की वजह थे …. हर रोज़ पोस्टमैन से पूछता था शायद किसी दिन उसका कोई ख़त आ जाये …. आज 1 साल बाद एक ख़त मिला … आपका क़र्ज़ अदा करना चाहती हूँ …. लेकिन ख़त के ज़रिये नहीं आपसे मिलकर … नीचे मिलने की जगह का पता लिखा था …. और आखिर में लिखा था ..
अजनबी हमसफ़र ……

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

क्या है जीवन का लक्ष्य ?

क्या है जीवन का लक्ष्य ?

कितना विचित्र है यह संसार!
यहाँ राजा सोचता है कि फकीर मजे में है और फकीर सोचता है राजा मजे में है।

दोनों की मनोस्थिति ऐसी है कि सच देख नहीं पा रहे हैं!

क्या ऐसा संभव है कि आप जहाँ है – वहीं आनंदमय हो जाएँ।
न फकीरी में पड़ें, न ही बादशाहत में। जो मिला है, उसे प्रसाद समझकर स्वीकार करें।

सुख आए तो, दुःख आए तो भी चुपचाप मुस्कुराकर साक्षी भाव से देखते रहें और जो परमात्मा दे उसे खुशी से स्वीकार कर लें!

सच यही है कि आपकी पात्रता को देखकर ही उसने आपको सब कुछ दिया है !

प्रायः यह देखने में आता है कि जिनके पास बहुत होता है वे भी अशांत या दुःखी दिखाई देते हैं और बहुत से लोग सीमित साधनों में भी गुजारा कर काफी खुश या सुखी दिखाई देते हैं।

यह बात सिद्ध करती है कि खुशी का आधार हमारी भौतिक वस्तुएं न होकर उनसे भी ज्यादा हमारे जीवन जीने का तरीका, सोचने या विचार करने का तरीका होता है।

इसलिए हमेशा अच्छा ही सोचें क्योंकि यही सोच ही हमारे कर्म का आधार है, बीज है।

इस संसार में न कोई सदा रहा है और न ही रह सकता है!

यह कटु सत्य है कि हम से पहले अनेक लोग यहाँ से जा चुके हैं और हमे भी एक दिन यह संसार छोड़कर चले जाना है!

जीवन-काल अल्‍प है जो हमे कुछ समय के लिये ही खास उद्देश्य की पूति॔ के लिये ही मिला है और सचमुच में हमारे पास समय बहुत कम है!

हम एक बार जन्म लेने के बाद कभी भी मृत्यु से भाग नहीं सकते और हम तो अपने जीवनकाल का अधिक भाग पहले से बिना किसी प्राप्ति के समाप्त भी कर चुके हैं और शेष जीवन तेजी से मौत की और बढ़ता जा रहा है!

यह हमारा अनमोल मनुष्य-जन्म व्‍यथ॔ ही संसार के कामों में बिता जा रहा है! आज हम अपना कीमती समय संसार के कामों में गँवाकर अपने खुद के साथ बहुत बड़ा अन्‍याय कर रहे हैं!

सोचने वाली बात है कि बिना लक्ष्य को प्राप्त किए यदि हमें जाना पड़े तो कैसा अनुभव होगा?.

इसलिए समय के सदगुरु समझाते हैं कि तुम्हारे लिए जीते जी स्वर्ग की अनुभूति संभव है! तुम खाली हाथ आए ज़रूर पर तुमको खाली हाथ संसार से जाने की जरुरत नहीं है!

जिन भाग्यशाली लोगों को सदगुरु का वह सानिध्य प्राप्त है वे अपने हर पल का आनन्द लेते रहें!

आपका जीवन आनंदमय बना रहे!
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

दिल के करीब आ जाओ !

दिल के करीब आ जाओ !

एक सन्यासी अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंछे! वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे!

संयासी यह देख तुरंत पलटेऔर अपने शिष्यों से पूछा ; ”क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं?’

शिष्य कुछ देर सोचते रहे! एक ने उत्तर दिया, ”क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए!”

”पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है? जो कहना है वो आप धीमी आवाज़ में भी तो कह सकते हैं!” सन्यासी ने पुनः प्रश्न किया!

कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देने का प्रयास किया पर बाकी लोग संतुष्ट नहीं हुए!

अंततः सन्यासी ने समझाया कि, “जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते! वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके दिलों के बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा!

क्या होता है जब दो लोग प्रेम में होते हैं? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं क्योंकि “उनके दिल करीब होते हैं ! उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है!”

सन्यासी ने बोलना जारी रखा , ”और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है?

तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं!
और यह स्थिति भक्त और भगवान् के बीच के प्रेम में परिलक्षित होती है! वह अविनाशी ब्रह्म जो हमारे अन्दर बैठा है – जब सद्गुरु की कृपा से उसका दीदार होता हैं तो वहाँ बाहरी इन्द्रियों के द्वारा प्रतिक्रिया गौण हो जाती है! उस सर्वव्यापी ब्रह्म के लिय कहा है कि –
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥

आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥
अर्थात्, वह (ब्रह्म) बिना ही पैर के चलता है! बिना ही कान के सुनता है! बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है! बिना मुँह (जिह्वा) के ही सारे (छहों) रसों का आनंद लेता है और बिना वाणी के बहुत योग्य वक्ता है।

आज हम बहिर्मुखी हो चुके हैं तभी मनचाहा न होने के कारण अपनों पर ही चिल्लाना शुरू कर देते हैं! जबकि आनन्द और प्रेम का श्रोत हमारे अन्दर है – जिसके लिय हमें अंतर्मुखी होना होगा!

अतः किसी से बात करें तो इस बात का ध्यान रहे कि, हमारे हृदय आपस में दूर न होने पाएं!
हम ऐसे शब्द कभी भी ना बोलें कि जिससे हमारे दिलों के बीच की दूरी बढे!

अन्यथा तो एक समय ऐसा आएगा कि ये दूरी इतनी अधिक बढ़ जाएगी कि *हमें लौटने का रास्ता भी नहीं मिलेगा और केवल पश्चाताप की अग्नि में झुलसना पड़ेगा!

इसलिय हमको संकल्यपित होना होगा कि हमको यथासंभव अंतर्मुखी बने रहना है और हर स्वांस में जीवन का आनन्द लेते रहना है!

🌹🙏🏻आपका जीवन ज्ञान के आनन्द में महकता रहे!🙏🏻🌹

मोह – सकल वय्धीन कर मूला!

मोह – सकल वय्धीन कर मूला!

श्रीमद्भगवत गीता में भगवान अर्जुन से कहते हैं, काम महाशत्रु है। क्रोध के लिए भी कहा गया है क्रोध करने वाला क्रोधाग्नि में दूसरे से पहले स्वयं को जलाता है। इन दो बड़े विकारों के साथ-साथ मोह भी कम नहीं है। मोह प्रत्यक्ष में तो बहुत मीठा लगता है किंतु इसका प्रभाव बहुत ही हानिकारक होता है। मोह से ग्रसित व्यक्ति अपने साथ-साथ अपने वंश के विनाश का भी निमित्त बनता है।
यादगार ग्रंथ महाभारत का पात्र धृतराष्ट्र इसका ज्वलंत उदाहरण है। मोह कैसे मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है!

प्रस्तुत है एक कहानी –

एक अधेड़ उम्र के सेठ जी अपनी दुकान में बैठे चक्की पर दाना दल रहे थे। दलते जाते, कहते जाते- “इस जीवन से तो मौत अच्छी है।” तभी एक साधू ने वहां से गुजरते हुए, सेठ जी के शब्द सुने, सोचा कितना दुखी है यह व्यक्ति! इसकी सहायता करनी चाहिये।

सेठ के पास जाकर बोले – “सेठ, बहुत दुखी लगता है तू ! मेरे पास एक विद्या है ! यदि तू चाहे तो तुझे स्वर्ग ले जा सकता हूँ।” चल, तुझे दुखों से छुटकारा मिल जायगा।

सेठ साधु की ओर देखकर बोला – “अभी कैसे चल सकता हूं? मेरे कोई संतान नहीं है, संतान हो जाय तो चलूँगा।” सुनकर साधु चला गया।

कुछ वर्षों बाद सेठ के दो बेटे हुए। एक दिन फिर वही साधु आया और बोला – “चलो सेठ ! अब तो तुम्हारी सन्तान भी हो गई।”

सेठ ने कहा – “हाँ हो तो गई, परन्तु लड़के तनिक बड़े होकर किसी लायक हो जाएँ, तब तुम आना, मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।

लड़के बड़े हो गये। साधु फिर आया, सेठ नहीं दिखाई दिया। पूछने पर पता लगा की सेठ मर गया। साधु ने योगबल से देखा कि मर कर वह सेठ दुकान के बाहर बैल बनकर बंधा हुआ है।

उसके पास जाकर साधु ने कहा – “अब चलेगा स्वर्ग को?”
बैल रूपी सेठ ने सर हिला कर कहा- “कैसे जाऊँ? बच्चे अभी नासमझ हैं, मैं चला गया तो बच्चे दूसरा बैल ले आयेंगे। जितनी सेवा मैं करता हूं, दूसरा बैल बोझ नहीं करेगा और मेरे बच्चों को हानि हो जायेगी। ना भाई! अभी तो मैं नहीं जा सकता। कुछ समय बाद आना।”

पांच वर्ष बाद साधु फिर आया। देखा- दुकान के सामने अब बैल नहीं है। पता करने पर ज्ञात हुआ, बोझ ढोते ढोते मर गया।

साधु ने फिर अपने योग बल से पता लगाया – वह सेठ अपने ही घर के द्वार पर कुत्ता बन कर बैठा है।

साधु ने उसके पास जाकर कहा – “अब तो बोझ ढोने की बात भी नहीं रही। अब चल, तुझे स्वर्ग ले चलूँ।”

कुत्ते के शरीर में बैठे सेठ ने कहा- “अरे कैसे चलूं! देखो मेरी बहू ने कितने आभूषण पहन रखे हैं? मेरे लड़के घर में नहीं हैं। यदि कोई चोर आया तो बहु को बचायेगा कौन?” तुम फिर आना।

एक वर्ष बाद उसने वापस आकर देखा कि कुत्ता भी मर चुका है।

साधु ने अपने योग बल द्वारा पुनः उस सेठ को खोजा तो ज्ञात हुआ कि वह अपने घर के पास बहने वाली गन्दी नाली में कीड़ा बन के बैठा है।

साधु ने उसके पास जाकर कहा- “देखो सेठ! क्या अब इससे बड़ी दुर्गति भी होगी?” कहाँ से कहाँ पहुँच गये तुम ! अब भी मेरी बात मानो। “चलो, तुम्हें स्वर्ग ले चलूँ।”

कीड़े के शरीर में बैठे सेठ ने चिल्ला कर कहा – “चला जा यहाँ से! क्या मैं ही रह गया हूँ स्वर्ग जाने के लिए?” यहाँ पोते पोतियों को आते जाते देख कर प्रसन्न होता हूं। “स्वर्ग में क्या मैं तेरा मुख देखा करूँगा?”

यह है – मोह के चक्र में फंसे रहने का परिणाम।

मोह का चक्र आत्मा को नीचे ही नीचे ढकेलता चला जाता है। हे मानव! अब तो इस मोह जाल से निकल और अपने उद्धार की सोच!

संतों ने कहा भी है कि –
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला!
काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा!!
अर्थात्, सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है!

इसलिय, इन रोगों से बचने का उपाय जीते जी कर लेना चाहिय!

जिसके लिय संतों ने समय के सदगुरु रूपी वैद्य के पास जाने के लिय कहा गया है!
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा!
सदगुरू वैद्य बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय करि आसा!!
अर्थात्, यदि श्रीराम जी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाए तो ये सब रोग नष्ट हो जाएँ यानी सद्गुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

विजय कैसे प्राप्त करें

विजय कैसे प्राप्त करें

एक समय बात है एक तालाब में बहुत सारे मेंढक रहते थे। सरोवर के बीचों बीच एक बहुत पुराना का खम्भा भी लगा हुआ था। खम्भा बहुत ऊँचा था और उसकी सतह भी चिकनी थी। एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया की क्यों ना एक प्रतियोगिता करवाई जाये। इसमें भाग लेने वाले को खम्भे पर चढ़ना होगा और जो सबसे पहले ऊपर पहुंच जायेगा, उसे विजेता घोषित कर दिया जायेगा। तो उन्होंने प्रतियोगता का दिन फिक्स कर दिया। प्रतियोगिता का दिन आ गया, खम्भे के चारो और बहुत भीड इक्कठी हो गयी। आसपास के इलाकों से भी कई मेंढक इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने पहुंचे।

माहौल में सरगर्मी थी। हर तरफ शोर ही शोर था। प्रतियोगिता शुरू हुई… लेकिन खम्भे को देखकर भीड में से किसी भी मेंढक को यकीन नहीं हुआ, की कोई भी मेंढक इस खम्भे के ऊपर पहुंच पायेगा। चारो ओर यही शोर हो रहा था – “अरे ये बहुत कठिन हैं ” “वो कभी भी इसे नहीं जीत पाएंगे। “ऊपर पहुंचने का तो कोई सवाल ही नहीं हैं, इतने चिकने खम्भे पर नहीं चढ़ा जा सकता” और यह हो भी रहा था की जो भी मेंढक कोशिश करते, वो थोडा ऊपर जाकर फिसलने के कारण नीचे गिर जाते।

कई मेंढक तो बार बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में में लगे हुए थे। पर भीड तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी, “ ये नहीं हो सकता, ये असंभव हैं ” तो अब जो भी मेंढक उत्साहित थे, कोशिश कर रहे थे , वो भी ये सुन सुनकर हताश हो गए और उन्होंने अपना प्रयास करना छोड़ दिया। लेकिन उन्ही मेंढकों के बीच एक छोटा सा मेंढक था। जो बार बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर चढ़ने में लगा हुआ था…. वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा और आखिरकार वह खम्भे के ऊपर पहुच गया।

और इस प्रतियोगिता का विजेतां बना। उसकी जीत पर सभी को बडा आश्यर्य हुआ, सभी मेंढक उसे घेर कर खडे हो गए और पूछने लगे ,” तुमने ये असंभव काम कैसे कर दिखाया, कैसे तुमने सबको पीछे छोड़ कर जीत प्राप्त करी?” तभी पीछे से किसी ने बोला … “अरे उससे क्या पूछते हो , ये तो बहरा है ” आपको समझ आया वो कैसे जीता ? जी हां उसके आसपास जितने भी टांग खींचने वाले थे, उनकी आवाज उसको नहीं सुनाई दी, जिससे वो नकारात्मक नहीं सोच पाया, और वो अपने लक्ष्य पर ज्यादा फोकस कर पाया और जीत गया।

शिक्षा:-दोस्तों, हमारे अंदर भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की काबिलियत होती हैं, और हम शुरुआत भी करते हैं। लेकिन अपने आसपास के ज्ञान चंदो के कारण और अपने नकारात्मक माहौल के कारण, हम अपना काम या तो शुरू नहीं करते हैं या फिर बीच में ही छोड़ देते हैं। तो दोस्तों आपको जो भी पीछे रखने वाली आवाजे हैं वो कोई भी, कुछ भी हो सकती हैं। चाहे वो दोस्त हो, रिश्तेदार हो, या फिर आप खुद हो। इन सबको ignore करना ही होगा। अपने आपको एक मजबूत इंसान बनाते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हरसंभव प्रयास करने चाहिए। यदि आपने नकारात्मकता से दूरी बना ली,तो आपको सफलता के शिखर पर पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता..!!

जय श्रीराम

शुभरात्री