समस्या का समाधान❔

समस्या का समाधान❔

एक व्यक्ति अपने परिवार, रिश्तेदार, मित्र, मोहल्ला के निवासी, अपनी फैक्ट्री के कार्यकर्ताओं से अति दुःखी होकर समाधान हेतु अपने गुरु के पास पहुंचा और अपनी पीड़ा गुरुदेव को बताते हुए बोला- “मेरे कर्मचारी, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और मेर आसपास के सभी लोग बेहद स्वार्थी हैं। कोई भी सही नहीं है, क्या करूं गुरुदेव?”

उस व्यक्ति की वेदना को समझ गुरुजी उसकी समस्या को भली-भांति समझ गए।

मुस्कान के साथ उन्होंने कहा- “पुत्र, नि:संदेह तुम्हारी समस्या अति गंभीर है। समय रहते इसका समाधान आवश्यक है। तुम आज रात आश्रम में ही रहो। मैं रात्रि में मंथन करूंगा और सुबह समाधान बताऊंगा।”

उस व्यक्ति को अपने गुरु पर अटूट विश्वास था।
उसने आश्रम में रात्रिविश्राम की बात स्वीकार ली और आश्रम के निवासियों के पास जा पहुंचा।भोर की पूजा-अर्चना के पश्चात अपने अन्य शिष्यों की समस्याओं को निबटा कर गुरुजी ने अंत में उस व्यक्ति को अपने पास बुलाया।

एक रात आश्रम में बिताने के अनुभव को भी वह व्यक्ति अपने गुरु को बताने से स्वय को रोक न सका और बोला- “गुरुदेव, आपके आश्रम में भी स्वार्थियों ने अपना डेरा जमा रखा है। हर कोई आपसे कुछ न कुछ चाहकर ही यहां रुका है।”

गुरुदेव ने उसकी हर बात को गंभीरता से सुना और अंत में कहा- “मैं एक कहानी सुना रहा हूं, उसे गंभीरता से सुनना। इस कहानी में ही तुम्हारी समस्या का समाधान छिपा है।

एक गाँव में एक विशेष कमरा था जिसमे 1 हजार आईने लगे थे । एक छोटी लड़की उस कमरे में गई और खेलने लगी। उसने देखा 1 हजार बच्चे उसके साथ खेल रहे हैं और वो उन बच्चों के प्रतिबिंब के रहकर खुश रहने लगी।
जैसे ही वो अपने हाथ से ताली बजाती सभी बच्चे उसके साथ ताली बजाते।

उसने सोचा यह दुनियां की सबसे अच्छी जगह है और यहां वह बार बार आना चाहेगी।

बच्ची के प्रस्थान के पश्चात थोड़ी देर बाद इसी जगह पर एक उदास आदमी कहीं से आया।

उसने अपने चारों तरफ हजारों दु:ख से भरे चेहरे देखे। वह बहुत दु:खी हुआ।
उसने हाथ उठा कर सभी को धक्का लगाकर हटाना चाहा तो उसने देखा हजारों हाथ उसे धक्का मार रहे हैं।

उसने कहा, यह दुनियां की सबसे खराब जगह है वह यहां दोबारा कभी नहीं आएगा और उसने वो जगह छोड़ दी।

इस प्रसंग से यही समझा जा सकता है कि ठीक इसी तरह यह दुनिया एक कमरा है जिसमें हजारों शीशे लगे हैं। जो कुछ भी हमारे अंदर भरा होता है वो ही प्रकृति हमें लौटा देती है। संसार हमें अपने मन के अनुरूप ही दिखता है!

इसलिए
अपने मन और दिल को साफ़ रखें, यक़ीनन तब यह दुनिया आपके लिए स्वर्ग की तरह अनुभव होगी।

संसार को सुधारने की आकांक्षा रखने वालों के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है कि हम स्वयं में सुधार करें! संसार अपने आप सुधर जाएगा। हम अपने अंदर की शान्ति का साम्राज्य लाएं – जब हर एक का प्रयास और सोच इसी तरह की होगी तो संसार में ख़ुद ब ख़ुद शान्ति हो जायेगी!

सुप्रभात

अष्टावक्र का ज्ञान

अष्टावक्र का ज्ञान

ऋषि को अपने शिष्य कहोड़ की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी पुत्री सुजाता का विवाह कहोड़ से कर दिया। सुजाता के गर्भ ठहरने के बाद ऋषि कहोड़ सुजाता को वेदपाठ सुनाते थे। तभी सुजाता के गर्भ से बालक बोला- ‘पिताजी! आप गलत पाठ कर रहे हैं। इस पर कहोड़ को क्रोध आ गया और शाप दिया तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) होकर पैदा होगा। कुछ दिन बाद कहोड़, राजा जनक के दरबार में एक महान विद्वान बंदी से शास्त्रार्थ में हार गए और नियम अनुसार, कहोड़ को जल समाधि लेनी पड़ी। कुछ दिनों बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ।

एक दिन मां से पिता की सचाई पता चली, तो अष्टावक्र दुखी हुआ और बारह साल का अष्टावक्र बंदी से शास्त्रार्थ करने के लिए राजा जनक के दरबार में पहुंचा। सभा में आते ही बंदी को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी, लेकिन अष्टावक्र को देखकर सभी पंडित और सभासद हंसने लगे, क्योंकि वो आठ जगह से टेढ़े थे, उनकी चाल से ही लोग हंसने लगते थे। सभी अष्टावक्र पर हंस रहे थे और अष्टावक्र सब लोगों पर। जनक ने पूछा- ‘हे बालक! सभी लोगों की हंसी समझ आती है, लेकिन तुम क्यों हंस रहे हो?

अष्टावक्र बोले- महाराज आपकी सभा चमारों की सभा है, जो मेरी चमड़ी की विकृति पर हंस रहे हैं, इनमें कोई विद्वान नहीं! ये चमड़े के पारखी हैं। मंदिर के टेढ़े होने से आकाश टेढ़ा नहीं होता है और घड़े के फूटे होने से आकाश नहीं फूटता है। इसके बाद शास्त्रार्थ में बंदी की हार हुई। अष्टावक्र ने बंदी को जल में डुबोने का आग्रह किया। बंदी बोला मैं वरुण-पुत्र हूं और सब हारे ब्राह्मणों को पिता से पास भेज देता हूं। मैं उनको वापस बुला लेता हूं। सभी हारे हुए ब्राह्मण वापस आ गए, उनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे। इसके बाद राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरु बना लिया और उनके आत्मज्ञान प्राप्त किया। राजा जनक और अष्टावक्र के इस संवाद को अष्टावक्र गीता के नाम से जाना जाता है।

💐💐शिक्षा:-💐💐

जैसे आभूषण के पुराने या कम सुंदर होने से सोने की कीमत कम नहीं हो जाती, वैसे शरीर की कुरूपता से आत्म तत्व कम नहीं होता। कभी किसी व्यक्ति के शरीर की सुंदरता को देखकर प्रभावित या किसी की कुरूपता को देखता घृणा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि शरीर तो हाड़-मांस से बना है। देखना है तो उसका ज्ञान, प्रेम और दिव्यता देखो, क्योंकि आत्मा सबका समान है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

अपनी क्षमता पहचानो

अपनी क्षमता पहचानो

एक गाँव में एक आलसी आदमी रहता था! वह कुछ काम-धाम नहीं करता था। बस दिन भर निठल्ला बैठकर सोचता रहता था कि किसी तरह कुछ खाने को मिल जाये।

एक दिन वह यूं ही घूमते-घूमते आम के एक बाग़ में पहुँच गया। वहाँ रसीले आमों से लदे कई पेड़ थे। रसीले आम देख उसके मुँह में पानी आ गया और आम तोड़ने वह एक पेड़ पर चढ़ गया लेकिन जैसे ही वह पेड़ पर चढ़ा, बाग़ का मालिक वहाँ आ पहुँचा।

बाग़ के मालिक को देख आलसी आदमी डर गया और जैसे-तैसे पेड़ से उतरकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ। भागते-भागते वह गाँव में बाहर स्थित जंगल में जा पहुँचा! वह बुरी तरह से थक गया था। इसलिए एक पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने लगा।

तभी उसकी नज़र एक लोमड़ी (Fox) पर पड़ी! उस लोमड़ी की एक टांग टूटी हुई थी और वह लंगड़ाकर चल रही थी।

लोमड़ी को देख आलसी आदमी सोचने लगा कि ऐसी हालत में भी इस जंगली जानवरों से भरे जंगल में ये लोमड़ी बच कैसे गई? इसका अब तक शिकार कैसे नहीं हुआ होगा?

जिज्ञासा में वह  एक पेड़ पर चढ़ गया और वहाँ बैठकर देखने लगा कि अब इस लोमड़ी के साथ आगे क्या होगा?

कुछ ही पल बीते थे कि पूरा जंगल शेर (Lion) की भयंकर दहाड़ से गूंज उठा! जिसे सुनकर सारे जानवर डरकर भागने लगे लेकिन लोमड़ी अपनी टूटी टांग के साथ भाग नहीं सकती थी – वह वहीं खड़ी रही।

शेर लोमड़ी के पास आने लगा! आलसी आदमी ने सोचा कि अब शेर लोमड़ी को मारकर खा जायेगा लेकिन आगे जो हुआ, वह कुछ अजीब था।

शेर लोमड़ी के पास पहुँचकर खड़ा हो गया!
उसके मुँह में मांस का एक टुकड़ा था – जिसे उसने लोमड़ी के सामने गिरा दिया। लोमड़ी इत्मिनान से मांस के उस टुकड़े को खाने लगी! थोड़ी देर बाद शेर वहाँ से चला गया।

यह घटना देख आलसी आदमी सोचने लगा कि भगवान सच में सर्वेसर्वा है – उसने धरती के समस्त प्राणियों के लिए चाहे वह जानवर हो या इंसान – खाने-पीने का  प्रबंध कर रखा है!

वह अपने घर लौट आया। घर आकर वह २-३ दिन तक बिस्तर पर लेटकर प्रतीक्षा करने लगा कि जैसे भगवान ने शेर के द्वारा लोमड़ी के लिए भोजन भिजवाया था, वैसे ही उसके लिए भी कोई न कोई खाने-पीने का सामान ले आएगा।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ! भूख से उसकी हालात ख़राब होने लगी। आख़िरकार उसे घर से बाहर निकलना ही पड़ा। घर के बाहर उसे एक पेड़ के नीचे बैठे हुए बाबा दिखाए पड़े। वह उनके पास गया और जंगल का सारा वृतांत सुनाते हुए वह बोला, “बाबा जी! भगवान मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? उनके पास जानवरों के लिए भोजन का प्रबंध है, लेकिन इंसानों के लिए नहीं।

बाबा जी ने उत्तर दिया, “बेटा! ऐसी बात नहीं है, भगवान के पास सारे प्रबंध है। दूसरों की तरह तुम्हारे लिए भी, लेकिन बात यह है कि वे तुम्हें लोमड़ी नहीं शेर बनाना चाहते हैं।

सचमुच में, हम सबके भीतर क्षमताओं का असीम भंडार है! अपनी अज्ञानतावश हम उन्हें पहचान नहीं पाते और स्वयं को कमतर समझकर दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
इसलिय –
स्वयं की क्षमता पहचानिए। दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा मत करिए। इतने सक्षम बनिए ताकि आप भी दूसरों की सहायता कर सकें।
👆🙏🙏🙏🌸🙏🌸🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

आपका जीवन मंगलमय बना रहे!

गुरु आज्ञा

गुरु आज्ञा

बहुत समय पहले की बात है एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे! उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे।

वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी!

“आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं।”

आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा ही किया।

ऋषिवर बोले , “प्रिय शिष्यों , आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है! मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें! यह एक बाधा दौड़ होगी और इसमें आपको कहीं कूदना तो कहीं पानी में दौड़ना होगा और इसके आखिरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से भी गुजरना पड़ेगा!” तो क्या आप सब तैयार हैं?”

”हाँ, हम तैयार हैं!”, शिष्य एक स्वर में बोले!

दौड़ शुरू हुई!

सभी तेजी से भागने लगे! वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुंचे! वहाँ बहुत अँधेरा था और उसमे जगह–जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे – जिनके चुभने पर असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था!

सभी असमंजस में पड़ गए! जहाँ अभी तक दौड़ में सभी एक सामान बर्ताव कर रहे थे! वहीं अब सभी अलग -अलग व्यवहार करने लगे!
खैर, सभी ने ऐसे-तैसे दौड़ ख़त्म की और ऋषिवर के समक्ष एकत्रित हुए।

“पुत्रों ! मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ बहुत जल्दी पूरी कर ली और कुछ ने बहुत अधिक समय लिया , भला ऐसा क्यों?” ऋषिवर ने प्रश्न किया।

यह सुनकर एक शिष्य बोला , “गुरु जी, हम सभी लगभग साथ–साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुचते ही स्थिति बदल गयी! कोई दुसरे को धक्का देकर आगे निकलने में लगा हुआ था तो कोई संभल -संभल कर आगे बढ़ रहा था और कुछ तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा-उठाकर अपनी जेब में रख ले रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगों को पीड़ा ना सहनी पड़े! इसलिए सब ने अलग-अलग समय में दौड़ पूरी की!”

“ठीक है ! जिन लोगों ने पत्थर उठाये हैं वे आगे आएं और मुझे वो पत्थर दिखाएँ”, ऋषिवर ने आदेश दिया.

आदेश सुनते ही कुछ शिष्य सामने आये और पत्थर निकालने लगे पर ये क्या जिन्हे वे पत्थर समझ रहे थे दरअसल वे बहुमूल्य हीरे थे! सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे।

“मैं जानता हूँ आप लोग इन हीरों के देखकर आश्चर्य में पड़ गए हैं!” ऋषिवर बोले।

“दरअसल इन्हें मैंने ही उस सुरंग में डाला था और यह अपने गुरुभाइयों के विषय में सोचने वालों शिष्यों को मेरा इनाम है।”

उन्होंने अपने शिष्यों को समझाया कि, पुत्रो, यह दौड़ जीवन की भागमभाग को दर्शाती है! जहाँ हर कोई कुछ न कुछ पाने के लिए भाग रहा है! पर अंत में वही सबसे समृद्ध होता है जो इस भागमभाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चूकता है।

उन्होंने आगे कहा कि, यहाँ से जाते-जाते इस बात को गाँठ बाँध लीजिये कि एक सदशिष्य को हमेशा अपने सहयोगी गुरु भाई-बहनों के प्रति प्रेम और करुणा का भाव होना चाहिए! तभी गुरुकृपा के पात्र बने रहेंगे और स्वांस रूपी हीरों को को समेटने में सहजता होगी!

यह प्रसंग से हम सभी गुरु भक्तों को भी यही प्रेरणा देता है कि हम भी आपस में मिलकर, एकजुट होकर, ईमानदारी के साथ अपने गुरु महाराजी की आज्ञा का पालन करते हुए – सेवा, सत्संग का आनन्द लें! तभी हम भी आनंद रुपी हीरे समेट पाएंगे!

अन्यथा गुरु आज्ञा ना मानने वालों के लिय कहा गया है कि –
गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल।
लोक वेद दोनों गए, आए सिर पर काल॥
कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं कि जो मनुष्य अपने गुरु की बात नहीं मानता और उसकी अवहेलना करता है वो गलत राह को चुनता है। धीरे-धीरे ऐसा मनुष्य दुनिया, समाज और धर्म से भी पतित हो जाता है और एक दिन ऐसा आता है जब वो सदा दुख व कष्टों से घिरा रहता हैं।

🙏🏾🙏🏿🙏🏻आपका हर पल आनन्दमय बना रहे!🙏🏼🙏🙏🏽

मुमकिन नहीं कि वक़्त हमेशा मेहरबान रहे

एक लड़का एक गांव के एक छोटे से घर में रहता था, उसके माँ-बाप इस दुनिया मे नहीं थे इसलिए वह मज़बूरी में नजदीक के ही एक दुकान पर काम भी करता था. अक्सर उसे काम की वजह से उसे बाहर भी जाना पड़ता था .

एक दिन वो लड़का अपने घर में बेहतर रौशनी के मकसद से चार मोमबत्ती जलाकर किसी काम से बाहर चला गया.

रात का समय था। चारो तरफ गहरा अँधेरा छाया हुआ था। केवल एक ही कमरे में उजाला था जिसमें चार मोमबत्तियां जल रही थी। चारो मोमबत्तियां एकांत देखकर आपस में बातें करने लगी।

पहली मोमबत्ती बोली, “मैं शांति हूँ। जब मैं इस दुनिया को देखती हूँ तो बहुत दुखी हो जाती हूँ। चारो ओर मारामारी, लूटखसोट और हिंसा का बोलबाला है। ऐसे में मेरा यहाँ रहना मुश्किल है। अब मैं यहाँ और नहीं रह सकती।” इतना कहकर पहली मोमबत्ती बुझ गई।

दूसरी मोमबत्ती भी अपनी मन की बात कहने लगी, “मैं विश्वास हूँ। मुझे लगता है कि झूठ, धोखा, फरेब और बेईमानी मेरा वजूद खत्म करते जा रहे हैं। यह जगह मेरे लायक नहीं है। मैं भी जा रही हूँ।” इतना कहकर दूसरी मोमबत्ती भी बुझ जाती है।

तीसरी मोमबत्ती दुखी थी। वह कहने लगी, “मैं प्रेम हूँ। मैं हर किसी के लिए हर पल जल सकती हूँ पर अब किसी के लिए मेरे पास वक्त नहीं बचा। स्वार्थ और नफरत मेरी जगह लेते जा रही है। लोगों के मन में अपनों के प्रति प्रेम-भावना नहीं बची। मैं और सहन नहीं कर सकती। मेरे लिए जाना ही ठीक होगा।” यह कहकर तीसरी मोमबत्ती भी बुझ गई।

तीसरी मोमबत्ती के बुझते ही कमरे में वो लड़का वापस आ गया ।

मोमबत्तियों को बुझा देखकर उसे बहुत दुख होता है। उसके आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
वह दुखी मन से बोला, “इस तरह बीच में ही मेरे जीवन में अँधेरा कर कैसे जा सकती हो तुम। तुम्हे तो अंत तक जलना था लेकिन तुमने मेरा साथ छोड़ दिया। अब मैं क्या करूँगा?”

लड़के की बात सुनकर चौथी मोमबत्ती बोली, “तुम घबराओ मत, मैं उम्मीद हूँ और मैं तुम्हारे साथ हूँ। जब तक मैं जल रही हूँ तुम मेरी लौ से दूसरी मोमबत्तियों को जला दो।”

चौथी मोमबत्ती की बात सुनकर उस लड़के को विश्वास हो गया। उसने उम्मीद के साथ शांति, विश्वास और प्रेम को फिर से जलाकर रौशन कर दिया।

इसलिए मनुष्य के जीवन में समय एक सा नहीं रहता, कभी उजाला तो कभी अँधेरा होता है। जीवन में अगर क़भी भी अँधकार आए, मन अशांत हो जाए, विश्वास डगमगाने लगे और दुनिया पराई लगने लगे तब उम्मीद का दीपक जला लेना। जब तक उम्मीद का दीपक जलता रहेगा जीवन में कभी अँधेरा नहीं हो सकता। इसलिए उम्मीद का साथ कभी न छोड़े।

मुमकिन नहीं कि वक़्त हमेशा मेहरबान रहे…
कुछ लम्हे जीने का तज़ुर्बा भी सिखाते हैं…!!

🌸🌻🌸

हीरों का हार

हीरों का हार

पुराने समय में किसी शहर में एक जौहरी रहता था, उसकी असमय मृत्यु हो गई। उसके परिवार में पत्नी और उसका एक बेटा था। जौहरी की मृत्यु के बाद उनके परिवार में पैसों की कमी आ गई। एक दिन मां ने अपने बेटे को हीरों का हार दिया और कहा कि “इसे अपने चाचा की दुकान पर बेच दो, इससे जो पैसा मिलेगा, वह हमारे काम आएगा।”

लड़का हार लेकर अपने चाचा की दुकान पर पहुंच गया। चाचा ने हार देखा और कहा *“बेटा अभी बाजार मंदा चल रहा है, इस हार को बाद में बेचनाके। तुम्हें पैसों की जरूरत है तो अभी मुझसे ले लो। तुम चाहो तो मेरी दुकान पर काम भी कर सकते हो।” 

लड़के ने चाचा की बात मान ली और अगले दिन से लड़का अपने चाचा की दुकान पर काम करने लगा। समय के साथ वह लड़का भी हीरों की अच्छी परख करने लगा था। वह असली और नकली हीरे को तुरंत ही पहचान लेता था।

एक दिन उसके चाचा ने कहा “अभी बाजार बहुत अच्छा चल रहा है, तुम अपना हीरों का हार बेच सकते हो।” 
लड़का अपनी मां से वह हार लेकर दुकान आ गया और चाचा को दे दिया। लड़के से उसके चाचा ने कहा “अब तो तुम खुद भी हीरों की परख कर लेते हो, इस हार को देखकर इसकी कीमत का अंदाजा लगा सकते हो। इसीलिए तुम खुद इस हार की परख करो।” लड़के ने हार को ध्यान से देखा तो उसे मालूम हुआ कि हार में नकली हीरे लगे हैं और इसकी कोई कीमत नहीं है।

लड़के ने पूरी बात बताई तो चाचा ने कहा “मैं तो शुरू से जानता हूं कि ये हीरे नकली हैं, लेकिन अगर मैं उस दिन तुम्हें ये बात कहता तो तुम मुझे ही गलत समझते। तुम्हें यही लगता कि मैं ये हार हड़पना चाहता हूं, इसीलिए इसे नकली बता रहा हूं। तुम्हें उस समय हीरों का कोई ज्ञान नहीं था। बुरे समय में अज्ञान की वजह से हम अक्सर दूसरों को ही गलत समझते हैं।”

शिक्षा:-विपरीत समय में हमारे ऊपर निगेटिविटी हावी हो जाती है और सोचने- समझने की शक्ति कमजोर होने लगती है। ऐसी स्थिति में की गई जल्दबाजी से नुकसान हो सकता है, रिश्ते खराब भी हो सकते हैं। इसीलिए बुरे समय में धैर्य से काम लेना चाहिए।

जय श्री राम

शुभरात्री

आशक्ति और अनाशक्ति भाव

🌸आशक्ति और अनाशक्ति भाव🌸

भारतीय परंपरा में मनुष्य जीवन जीने की व्यवस्था दी गई है। इसमें केवल अर्थोपार्जन, काम- सेवन या सिर्फ दुनियादारी की ही व्यवस्था नहीं है बल्कि पूरे जीवन की व्यवस्था की गई है।

जीवन का एक भाग शिक्षा के लिए, दूसरा भाग धनोपार्जन, परिवार के पालन-पोषण एवं बच्चों की परवरिश लिए, जीवन का तीसरे भाग घर में रहते हुए भी अनासक्त जीवन जीने के लिए और चौथा भाग मुक्ति एवं सन्यास के लिए।

इतिहास इस बात का गवाह है कि –
जिन सम्राटों ने अपने राज्य का संचालन राज्य के गुरुओं के मार्गदशन में किया और बुढापे की दहलीज पर आकर अपनी इच्छा से राजसिंघासन का त्याग करके वनवास ग्रहण किया, उन्होंने अपने जीवन को सुखी किया!
लेकिन –
जिन्होंने सत्ता की लिप्सा के चलते राजसिंघासन का त्याग नही किया – वे अपनी ही सन्तानों के द्वारा या तो मारे गए या फिर उन्होंने नाना प्रकार की यंत्रनाए भोगी।

यद्यपि जीवन का आंतरिक आनन्द पाने के लिय हमें अपने जीवन की किसी अवस्था का इंतजार नहीं करना चाहिय! हर स्वास में हरि का सुमिरन पाने की विधि का बोध प्राप्त करके प्रतिपल उस शाश्वत शक्ति के सानिध्य, सामीप्य का आनन्द लेना चाहिय!

लेकिन जो लोग वृध्दावस्था की दहलीज पर पहुंचकर भी गफलत की नीद में सोये हैं और नश्वर संसार को ही अपना समझ बैठे हैं, अपने जीवन में आंतरिक सुख को पाने का प्रयास नहीं करते, उन्हें तो यह अनमोल जीवन, जो 84 लाख योनियों के भ्रमण के बाद मिलता है, इसे खोने का पछतावा तो होगा ही!

कहावत है कि राजा दशरथ ने अपने सिर में एक सफेद बाल देखा और उनके मन में वैराग्य जग गया।

आज भी इस बात की जरूरत है कि व्यक्ति स्वयं में उतर कर जीए।यह सारा संसार,यह सारी दुनिया बन्धन की माया है। व्यक्ति ने स्वयं ही अपने आप को इस बन्धन में बांधे है और स्वयं ही आसक्त हो रहा है। कोई किसी को बांधता नहीं है, हम स्वयं ही जानबूझकर बंधे और नशवर मायावी संसार से जुड़े हैं।

माया के प्रति अनासक्ति भाव और अपने अंदर की परमशक्ति की तरफ आसक्ति भाव ही बन्धन खोलने एवं जीते जी मोक्ष प्राप्ति का साधन है। जो समय के सदगुरु के सानिध्य और मार्गदर्शन से मिलता है!

जैसे भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को बतलाया कि – तू युद्ध भी कर और सुमिरन भी कर!

हमको भी अपने जीवन के महाभारत को जितने के लिय श्री कृष्ण जैसा सारथी खोजना होगा! तभी हम जीवन में भरपूर आनन्द ले पाएंगे!

💐💐 सुप्रभात💐💐

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आपके जीवन डोर कहां बंधी है?

🌸आपके जीवन डोर कहां बंधी है?🌸

एक पूर्णिमा की रात में एक छोटे-से गांव में, कुछ जवान लड़कों ने शराबखाने में जाकर शराब पी ली और जब वे शराब के नशे में मदमस्त हो गये और शराब-घर से बाहर निकले तो चांद की बरसती चांदनी में उन्हें यह खयाल आया कि नदी पर जायें और नौका-विहार करें।

रात बड़ी सुन्दर और नशे से भरी हुई थी। वे गीत गाते हुए नदी के किनारे पहुंच गये। नाव वहां बंधी थी। मछुए नाव बांधकर घर जा चुके थे। रात आधी हो गयी थी।

वे एक नाव में सवार हो गये। उन्होंने पतवार उठा ली और नाव खेना शुरू किया। फिर वे रात देर तक नाव खेते रहे।

सुबह की ठण्‍ड़ी हवाओं ने उन्हें सचेत किया। जब उनका नशा कुछ कम हुआ तो उनमें से किसी ने पूछा, ‘‘कहां आ गये होंगे अब तक हम। आधी रात तक हमने यात्रा की है!

न-मालूम कितनी दूर तक निकल आये होंगे। नीचे उतर कर कोई देख ले कि किस दिशा में हम चल रहे हैं, कहां पहुंच रहे हैं?”

जो व्यक्ति नीचे उतरा था, वह नीचे उतर कर हंसने लगा।
उसने कहा, ‘‘दोस्तो! तुम भी उतर आओ। हम कहीं भी नहीं पहुंचे हैं। हम वहीं खड़े हैं, जहां रात नाव खडी थी।”

वे बहुत हैरान हुए। रात भर उन्होंने पतवार चलायी थी और पहुंचे कहीं भी नहीं थे!

नीचे उतर कर उन्होंने देखा तो पता चला कि नाव की जंजीरें किनारे से बंधी रह गयी थीं और उन्हें वे खोलना भूल गये थे!

अज्ञानता से, अहंकार के नशे से भरा मनुष्य का जीवन भी इन्हीं शराबियों की तरह पूरी रात नाव खेने जैसा है!

पूरे जीवन पतवार खेने पर कहीं भी पहुंचता हुआ मालूम नहीं पड़ता। मरते समय आदमी वहीं पाता है स्वयं को, जहां वह जन्मा था!

ठीक उसी किनारे पर, जहां आंख खोली थी- आंख बंद करते समय आदमी पाता है कि वहीं खड़ा है और तब बड़ी हैरानी होती है कि जीवन में इतनी जो दौड़- धूप की, उसका क्या हुआ?

वह जो प्रण किया था – कहीं पहुंचने का, वह जो यात्रा की थी कहीं पहुंचने के लिए, वह सब निष्फल गयी!

मृत्यु के क्षण में आदमी वहीं पाता है अपने को, जहां वह जन्म के क्षण में था! तब सारा जीवन एक सपना मालूम पड़ने लगता है और महसूस होने लगता है कि यह जीवन नैया (नाव) भी कहीं न कहीं माया मोह की खूंटी में बंधी रह गयी।

हां, कुछ लोग- कुछ सौभाग्यशाली लोग- गुरू कृपा से मरते के बाद नहीं बल्कि जीते जी वहां पहुंच जाते हैं – जहां जीवन का आकाश है!जहां जीवन का प्रवास है! जहां सत्य है! जहां परमात्मा का असली मंदिर है। जहां शान्ति है! जहां परमानन्द है!

लेकिन, वहां वे ही लोग पहुंचते हैं, जो किनारे से, खूंटे से जंजीर खोलने के लिए अपने जीवन नैय्या की डोर सद्गुरु को पकड़ा देते हैं और सद्गुरु समय समय पर याद दिलाते रहते हैं कि – आपके जीवन का असली आनन्द आपके अंदर ही है – जिसे आप अज्ञानता में बाहर खोज रहे हैं!

🙏🏻🙏 सुप्रभात🙏🏽🙏🏿

संस्कार की रसीद

संस्कार की रसीद
नरोत्तम सेठ ने आज कहीं व्यस्त होने के कारण ईंट भट्टे पर फिर अपने बेटे को ही भेजा था ।

बेटे का मन क़भी भी भट्टा पर नही लगता जिसके कारण वह अक्सर ग्राहकों से उलझ जाता था । जबकि नरोत्तम सेठ चाहते थे कि अब वह अपना अधिक से अधिक समय भट्टा पर दे जिससे वो अपने पुस्तैनी व्यवसाय में दक्ष हो सके।

अभी उनका बेटा आकर अपने केबिन में बैठा ही था कि मुनीम आ गया-
“भईया जी एक बुजुर्ग फटी-पुरानी पुर्जी लेकर आया है और दस हजार ईंट मांग रहा है।”

“क्या मतलब..!” बेटे ने पूछा ।

“कह रहा है कि सन उन्नीस सौ अड़सठ में पन्द्रह रुपया हजार के भाव से उसने दस हजार ईंट का दाम एक सौ पचास रुपया जमा किए थे जो आज लेने आया है।”

“दिमाग खराब है उसका । आज दस हजार ईंट की कीमत अस्सी हजार है, एक सौ पचास रुपये में कैसे दे देंगे , भगा दो उसको यहां से ….।”

“पर बड़े बाबूजी के हाथ की दस्तख़त की हुई रसीद है उसके पास है।”

“तो क्या हुआ…? तब क्यों नही ले गये थे । अब, जब ईंट का मूल्य आठ हजार रुपये प्रति हजार है तब ये पन्द्रह रुपये के भाव से ले जाएंगे ?”

सेठ का लड़का अभी मुंशी और बुजुर्ग को डाट ही रहा था कि नरोत्तम सेठ स्वयं आ गये। देखा, बेटा फिर आज किसी से उलझा हुआ है।
कारण पूछने पर बेटे ने वह मुड़ी तुड़ी पुर्जी सेठ को पकड़ा दी।

सेठ पर्ची को देखते ही चौंक गये। अब बुजुर्ग की तरफ ध्यान से देखा और पहचानते ही मुस्करा पड़े।

“धनीराम कहां गायब हो गये थे भाई, पैसा जमा करके..मैने तब कितनी प्रतीक्षा की थी आपकी ? खैर ,अब ले जाओ ,दस हजार आपकी ईंट तो मेरे पास है ही।”

“पर पापा, अस्सी हजार की ईंट एक सौ पचास रुपये में कैसे संभव है ?” बेटे ने कहा ।

“बेटा जब इन्होंने पैसा जमा किया था तब वही भाव था। सन अड़सठ से इनका भी एक सौ पचास रुपया इस ईंट भट्ठा में लगा हुआ है और उससे पैसा कमाया है … जिसके कारण हम अपने इस व्यवसाय को इतना बढ़ा सके । उस एक सौ पचास रुपये की पूंजी का लाभ लगातार सन अडसठ से हम खा भी तो रहे है । ये मेरे हाथ की रसीद हैं । मुझे याद है तब मैंने अपने पिताजी के साथ इस भट्ठा पर आना शुरू किया था । यह मेरी ही उम्र के हैं शायद ।

जब मैने यह रसीद काट कर इन्हें दी थी तो इन्होंने हंसकर कहा था -‘अगर रसीद गायब हो गयी तो क्या होगा ?

तब मेरे पिताजी ने जो जवाब दिया था वह मुझे आज भी याद है। पिताजी ने कहा था कि अगर मेरे जीवन काल में आ गये तो रसीद न भी लाओगे तब भी आपका पैसा मुझ पर रहेगा …ईंट आपको मिलेगी क्योंकि मुझे आपका चेहरा याद है , लेकिन जहां तक रसीद की बात है तो अगर आप इसे रखे रह गये तो मेरे न रहने के बाद भी आपको ईंटें मिलेंगी ..क्योंकि बेईमानी न मुझमें है और न ही मेरे संस्कार व खून में ।”

इतना कहकर सेठ ने दस हजार ईंट बुजुर्ग के यहाँ पहुंचाने के लिए मुंशी को आदेशित कर दिया औऱ अपने बेटे के कंधे पर अपना हाथ रखकर बोला… *”बेटा , तुम्हारे साथ परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल हो लेकिन ईमानदारी का पथ क़भी न छोड़ना। व्यापार ईमानदारी और पक्की जुबान से फलता फूलता है। छल से कमाई लक्ष्मी ज्यादा दिन नही ठहरती ।


🙏राधे राधे 🙏

सच्ची प्रार्थना

सच्ची प्रार्थना
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शिष्य ने गुरु से पूछा – हम प्रार्थना करते हैं, तो होंठ हिलते हैं पर आपके होंठ नहीं हिलते?
आप पत्थर की मूर्ति की तरह खडे़ हो जाते हैं! आप अपने अंदर कहते हैं? क्योंकि, अगर आप अन्दर से भी कुछ कहेंगे! तो होंठो पर थोड़ा कंपन आ ही जाता है! चेहरे पर बोलने का भाव आ जाता है, लेकिन वह भाव भी नहीं आता।

गुरु जी ने कहा – मैं एक बार राजधानी से गुजरा और राजमहल के सामने द्वार पर मैंने सम्राट को खडे़ देखा, और एक भिखारी को भी खडे़ देखा!

वह भिखारी बस खड़ा था! फटे–चीथडे़ थे उसके शरीर पर। जीर्ण – जर्जर देह थी, जैसे बहुत दिनो से भोजन न मिला हो, शरीर सूख कर कांटा हो गया। बस आंखें ही दीयों की तरह जगमगा रही थी!
बाकी जीवन जैसे सब तरफ से विलीन हो गया हो। वह कैसे खड़ा था यह भी आश्चर्य था? लगता था अब गिरा – तब गिरा!
सम्राट उससे बोला – बोलो क्या चाहते हो?

उस भिखारी ने कहा – अगर आपके द्वार पर खडे़ होने से मेरी मांग का पता नहीं चलता, तो कहने की कोई जरूरत नहीं।

महाराज, क्या मुझे कुछ कहने की भी ज़रूरत है। मैं आपके द्वार पर खड़ा हूं! मुझे और मेरे हालात को देख लो मेरा होना ही मेरी प्रार्थना है।

गुरु जी ने कहा – उसी दिन से मैंने प्रार्थना बंद कर दी।

मैं भी परमात्मा के द्वार पर खड़ा हूं – वह देख लेगें। मैं क्या कहूं ? अगर मेरी स्थिति कुछ नहीं कह सकती तो मेरे शब्द क्या कह सकेंगे? अगर वह मेरी स्थिति नहीं समझ सकते, तो मेरे शब्दों को क्या ही समझेंगे?

अतः भाव व दृढ विश्वास ही सच्ची परमात्मा की याद के लक्षण है। यहाँ कुछ मांगना शेष नहीं रहता! आपका प्रार्थना में होना ही पर्याप्त है!

यह विश्वास रखना कि वह अंतर्यामी सर्वज्ञ है!

🙏🙏🏻 सुप्रभात🙏🏾🙏🏽