सुलझे हुए संस्कारो वाली

सुलझे हुए संस्कारो वाली

“बिटिया कुछ है क्या खाने को”

दोपहर तीन बजे के आसपास रामेश्वर बाबू ने बहु के कमरे में आवाज लगाते हुए कहा

“ये भी कोई वक्त है खाने का और अभी ग्यारह बजे दिया था ना दूध वाला दलिया फिर अब तीन बजे है जो रोटी सब्जी बनाई थी खत्म हो गई है। और आपको कोई काम तो है नहीं सिवाय खाना खाने के।

रसोई है या कोई फैक्ट्री जो आपके लिए चौबीस घंटे चलती रहेगी। जाइए शाम को देखेंगे अभी मेरा फेवरेट सीरियल आ रहा है। ये कहते हुए बहु ने नजरें फिर से टीवी पर टिका दी।

रामेश्वर बाबू चुपचाप वहां से अपने कमरे की और बढ़ गये। ये सब कुछ वहां झाड़ू पोंछा बर्तन का काम करने वाली सुधा देख रही थी। वह मन ही मन सोचने लगी कि कहने को इतना बड़ा बंगला है। बड़ी बड़ी गाडियां हैं। पैसा है, मगर इतने बड़े बंगले पैसे होने के बावजूद दिल बहुत छोटा है इनका। जो अपने घर के पिता तुल्य ससुरजी की सेवा नहीं कर सकते, कम से कम उन्हें भूखे पेट तो मत रखो। काश… अगर मेरे ससुर जी होते, तो मैं पिता की भांति उनकी सेवा करती।

काम करते करते, अचानक उसे स्मरण हुआ, ना जाने कितने फल और बादाम काजू डायनिंग टेबल पर पड़े-पड़े सड़ते रहते है। अधिकतर बासी होने पर फेंक दिए जाते है। घर के बच्चे उन्हें देखते तक नहीं है क्योंकि उन्हें फ्रेश चीजें खाने का शौक है। उसपर आजकल वो क्या कहते हैं, हां जंक फ्रूड। वह तो उन चीजों के शौकीन है। ये फल मेवे वह देखकर अनदेखा कर देते हैं।

साहब मालकिन को जहां अपने काम और किटी पार्टी से फुर्सत नहीं है तो वह क्या खाएंगे और क्या देखेंगे। बचे बेचारे बुजुर्ग दादाजी तो उनका मुंह तो बिना दांतों की बस्ती है उनकी दाल तो खिचड़ी-दलिया से ही गल सकती है तो वह क्या खाएंगे फल मेवे।

तभी कुछ सोचते हुए सुधा का चेहरा खिल उठा। उसने एक मुट्ठी मेवा सिलबट्टे पर पीसे और जरा से दूध में एक पके केले के साथ मसलकर बुजुर्ग रामेश्वर बाबू को पकड़ा दिए।

बोली बाबूजी-“चुपचाप खा लीजिए आपको भूख लगी है ना”

अब प्यासे को थोड़ा सा पानी मिल जाएं तो वो अमृत समान होता है। बुजुर्ग रामेश्वर बाबू भीगी हुई पलकों को साफ करते हुए तेजी से खाने लगे। उन्हें संतुष्टि से खाते हुए देखकर सुधा को भी संतुष्टि मिल रही थी।

ऐसे में अब ये रोज का नियम हो गया। सुधा रोज ऐसे व्यंजन, दोपहर में टीवी से चिपकी बहू की नज़र बचाकर, बुजुर्ग रामेश्वर बाबू को दे देती। कभी आते जाते बच्चे देख लेते, तो सोचते दादाजी की आंखें कितनी कमजोर हो गई है, जो मम्मी की जगह कामवाली से ना जाने क्या-क्या माँगकर खाते रहते है।

वहीं दूसरी ओर घर की बहु ये सोचकर खुश होती की मेरी डांट डपट से बूढ़े पिताजी काबू में रहते हैं। घर का बेटा पिताजी की सुधरती सेहत देखकर सोचता, कि उसकी पत्नी अपने ससुरजी का भरपूर ख्याल रखती है।

घर की कामवाली सुधा सोचती है, उसकी तो नौकरी भी यही है और जिन्दगी भी यही है। झाड़ू-बरतन करते-करते, जाने कब सांसें साथ छोड़ जाएं। अपने ससुरजी की सेवा करने का सौभाग्य तो उसे मिला नहीं। तो क्यों ना यहां घर के बुजुर्ग की सेवा करके कुछ पुण्य कमा ले।

वहीं बुजुर्ग रामेश्वर बाबू सोचते की, अब सोचना-समझना क्या है, दिन ही तो काटने है। भूखे रहकर मरने से अच्छा, आखिरी वक्त में जो सेवा और सम्मान दे रहा है ले लो। वह अक्सर सुधा को आशिर्वाद देते हुए सोचते, अगले जन्म में भगवान मुझे अमीर बनाना चाहें मत बनाना। बस बेटी देना या बहु देना तो ऐसे सुलझे हुए संस्कारों वाली सुधा जैसी देना !

जय श्री राम

शुभरात्री

क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता

क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता

एक देवरानी और जेठानी में किसी बात पर जोरदार बहस हुई और दोनो में बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक दूसरे का मुँह तक न देखने की कसम खा ली और अपने-अपने कमरे में जाकर खुद को दरवाजा बंद कर लिया।

परंतु थोड़ी देर बाद जेठानी के कमरे के दरवाजे पर खट-खट हुई। जेठानी तनिक ऊँची आवाज में बोली,कौन है?
बाहर से आवाज आयी, दीदी मैं ! जेठानी ने जोर से दरवाजा खोला और बोली अभी तो बड़ी कसमें खा कर गई थी। अब यहाँ क्यों आयी हो ?

देवरानी ने कहा, दीदी सोच कर तो वही गई थी परंतु माँ की कही एक बात याद आ गई कि जब कभी किसी से कुछ कहा सुनी हो जाए तो उसकी अच्छाइयों को याद करो! और मैंने भी वही किया और मुझे आपका दिया हुआ प्यार ही प्यार याद आया और मैं आपके लिए चाय ले कर आ गई।

बस फिर क्या था दोनों रोते रोते, एक दूसरे के गले लग गईं और साथ बैठ कर चाय पीने लगीं।
जीवन मे  क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता, बोध से जीता जा सकता है। अग्नि अग्नि से नहीं बुझती जल से बुझती है।

समझदार व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिगड़ती स्थितियों को विनम्र होकर, दो शब्द प्रेम के बोलकर संभाल लेते हैं।

हर स्थिति में संयम और बड़ा दिल रखना ही श्रेष्ठ है।

नानक जी समझाते हैं कि –
“नानक नन्हे बने रहो,
जैसे नन्ही दूब ।
“बड़े-बड़े बही जात हैं,
दूब खूब की खूब ।।
भावार्थः श्री गुरुनानक देव जी कहते हैं कि *”झुक कर चलने वालो का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता! जैसे सैलाब आने पर दूब (घास) लेट जाती है और सैलाब ऊपर से निकल जाता है। जिससे दूब तो और बढ़ जाती है लेकिन न झुकने वाले बड़े-बड़े पेड़ सैलाब में टूट कर बह जाते हैं!
इसलिय,
तू झुक के चल बंदया, झुकयां नूं प्रभ मिलदा !!
😊
           सुप्रभात
       🙏🥰🙏

भगवान आप अपना ध्यान रखना

भगवान आप अपना ध्यान रखना

एक बच्चा रोज अपने दादा जी को सायंकालीन पूजा करते देखता था। बच्चा भी उनकी इस पूजा को देखकर अंदर से स्वयं इस अनुष्ठान को पूर्ण करने की इच्छा रखता था, किन्तु दादा जी की उपस्थिति उसे अवसर नही देती थी।

एक दिन दादा जी को शाम को आने में विलंब हुआ, इस अवसर का लाभ लेते हुए बच्चे ने समय पर पूजा प्रारम्भ कर दी।

जब दादा जी आये, तो दीवार के पीछे से बच्चे की पूजा देख रहे थे।

बच्चा बहुत सारी अगरबत्ती एवं अन्य सभी सामग्री का अनुष्ठान में यथाविधि प्रयोग करता है और फिर अपनी प्रार्थना में कहता है,

भगवान जी प्रणाम। आप मेरे दादा जी को स्वस्थ रखना और दादी के घुटनो के दर्द को ठीक कर देना क्योकि दादा-दादी को कुछ हो गया, तो मुझे चॉकलेट कौन देगा। फिर आगे कहता है, भगवान जी मेरे सभी दोस्तों को अच्छा रखना, वरना मेरे साथ कौन खेलेगा।

फिर मेरे पापा और मम्मी को ठीक रखना, घर के कुत्ते को भी ठीक रखना, क्योकि उसे कुछ हो गया, तो घर को चोरों से कौन बचाएगा।

लेकिन भगवान यदि आप बुरा न मानो तो एक बात कहूँ, सबका ध्यान रखना, लेकिन उससे पहले आप अपना ध्यान रखना, क्योंकि आपको कुछ हो गया, तो हम सबका क्या होगा

इस सहज प्रार्थना को सुनकर दादा की आंखों में भी आंसू आ गए, क्योंकि ऐसी प्रार्थना उन्होंने न कभी की थी और न सुनी थी।

जय श्री राम

शुभरात्री

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।
जोग न मख जप तप उपवासा।।

सरल सुभाऊ न मन कुटिलाई।
जथा लाभ संतोष सदाई।।
~(उत्तरकांड ४५/१)

राज्याभिषेक उपरांत एक बार रामजी ने सभी नगरवासियों को बुलाया है। सभी को इसलोक व परलोक दोनों जगह सुखी होने का उपाय अपनी भक्ति बताया है। वे आगे कहते हैं कि भक्ति में कौन का परिश्रम लगता है। इसमें योग, यज्ञ, जप, तप, उपवास की कोई आवश्यकता नहीं है। बस सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो तथा जो कुछ मिले उसी में संतोष रखें।

सुखी होने का यह सरलतम मार्ग रामजी हमें आपको बताया है। हम आप योग, यज्ञ, उपवास आदि तो खूब कर लेते हैं, पर सरलता है कि आती नहीं और कुटिलता है कि जाती नहीं है। वस्तुतः ये दोनों तो सतत आत्मचिंतन करने पर ही आती व छूटती हैं!
इसलिय सहज और सरल बनकर ही हमको संतुष्टि का बोध हो सकता है!
🙏🙏🌸🌸🌸🙏🙏

एक अदृश्य स्टिकर

एक अदृश्य स्टिकर

आगे वाली कार कछुए की तरह चल रही थी और बार-बार हॉर्न देने पर भी रास्ता नहीं दे रही थी…

मैं अपना आपा खो कर चिल्लाने ही वाला था कि मैंने कार के पीछे लगा एक छोटा सा स्टिकर देखा जिस पर लिखा था _”शारीरिक विकलांग ; कृपया धैर्य रखें” !

और यह पढ़ते ही जैसे सब-कुछ बदल गया…

मैं तुरंत ही शांत हो गया और कार को धीमा कर लिया …यहाँ तक की मैं उस कार और उसके ड्राईवर का विशेष खयाल रखते हुए चलने लगा कि कहीं उसे कोई तक़लीफ न हो मैं ऑफिस कुछ मिनट देर से ज़रुर पहुँचा मगर मन में एक संतोष था।

इस घटना ने दिमाग को हिला दिया … क्या मुझे हर बार शांत रहने और धैर्य रखने के लिए किसी स्टिकर की ही ज़रुरत पड़ेगी ?

हमें लोगों के साथ धैर्यपूर्वक व्यवहार करने के लिए हर बार किसी स्टिकर की ज़रुरत क्यों पड़ती है ?

क्या हम लोगों से धैर्यपूर्वक अच्छा व्यवहार सिर्फ तब ही करेंगे जब वे अपने माथे पर कुछ ऐसे स्टिकर्स चिपकाए घूम रहे होंगे कि…….

“मेरी नौकरी छूट गई है”,
“मैं कैंसर से संघर्ष कर रहा हूँ”,
“मेरी शादी टूट गई है”,
“मैं भावनात्मक रुप से टूट गया हूँ”,
“मेरे प्यारे दोस्त की अचानक ही मौत हो गई”,

“लगता है इस दुनिया को मेरी ज़रुरत ही नहीं”,
“मुझे व्यापार में बहुत घाटा हो गया है”……आदि !

दोस्तों , हर इंसान अपनी ज़िंदगी में कोई न कोई ऐसी जंग लड़ रहा है जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते . बस हम यही कर सकते हैं कि लोगों से धैर्य और प्रेम से बात करें .

शिक्षा:- हमे इन सभी अदृश्य स्टिकर्स को भी सम्मान देना चाहिए

जय श्रीराम

शुभरात्री

!! पैरों के निशान !!

!! पैरों के निशान !!

जन्म से ठीक पहले एक बालक भगवान से कहता है, ”प्रभु आप मुझे नया जन्म मत दीजिये! मुझे पता है पृथ्वी पर बहुत बुरे लोग रहते हैं! मैं वहाँ नहीं जाना चाहता!” और ऐसा कह कर वह उदास होकर बैठ जाता है।

भगवान् स्नेह पूर्वक उसके सर पर हाथ फेरते हैं और सृष्टि के नियमानुसार उसे जन्म लेने की महत्ता समझाते हैं! बालक कुछ देर हठ करता है पर भगवान् के बहुत मनाने पर वह नया जन्म लेने को तैयार हो जाता है।

“ठीक है प्रभु, अगर आपकी यही इच्छा है कि मैं मृत लोक में जाऊं तो वही सही , पर जाने से पहले आपको मुझे एक वचन देना होगा।” बालक भगवान् से कहता है।

भगवान् बोले – पुत्र तुम क्या चाहते हो?

बालक ने कहा : आप वचन दीजिये कि जब तक मैं पृथ्वी पर हूँ तब तक हर एक क्षण आप भी मेरे साथ होंगे।
भगवान् ने कहा, अवश्य ऐसा ही होगा।

बालक ने फिर संशय वयक्त किया कि प्रभु, पर पृथ्वी पर तो आप अदृश्य हो जाते हैं! भला मैं कैसे जानूंगा कि आप मेरे साथ हैं कि नहीं?

भगवान् बोले : जब भी तुम आँखें बंद करोगे तो तुम्हें दो जोड़ी पैरों के चिन्ह दिखाइये देंगे, उन्हें देखकर समझ जाना कि मैं तुम्हारे साथ हूँ।

फिर कुछ ही क्षणो में बालक का जन्म हो जाता है।

जन्म के बाद वह संसारिक बातों में पड़कर भगवान् से हुए वार्तालाप को भूल जाता है! जीवन के अन्तकाल में मरते समय उसे इस बात की याद आती है तो वह भगवान के वचन की पुष्टि करना चाहता है।

वह आखें बंद कर अपना जीवन याद करने लगता है। वह देखता है कि उसे जन्म के समय से ही दो जोड़ी पैरों के निशान दिख रहे हैं| परंतु जिस समय वह अपने सबसे बुरे वक़्त से गुजर रहा था उस समय केवल एक जोड़ी पैरों के निशान ही दिखाइये दे रहे थे!

यह देख वह बहुत दुखी हो जाता है कि भगवान ने अपना वचन नही निभाया और उसे तब अकेला छोड़ दिया जब उनकी सबसे अधिक ज़रुरत थी।

मरने के बाद वह भगवान् के समक्ष पहुंचा और रूठते हुए बोला, ”प्रभु ! आपने तो कहा था कि आप हर समय मेरे साथ रहेंगे, पर मुसीबत के समय मुझे दो की जगह एक जोड़ी ही पैर दिखाई दिए – बताइये आपने उस समय मेरा साथ क्यों छोड़ दिया?”

भगवान् मुस्कुराये और बोले, पुत्र ! जब तुम घोर विपत्ति से गुजर रहे थे तब मेरा ह्रदय द्रवित हो उठा और मैंने तुम्हे अपनी गोद में उठा लिया, इसलिए उस समय तुम्हे सिर्फ मेरे पैरों के चिन्ह दिखायी पड़ रहे थे।

बार हमारे जीवन में जब बुरा वक़्त आता है तो लगता है कि हमारे साथ बहुत बुरा होने वाला है और जब बाद में हम पीछे मुड़ कर देखते हैं तो पाते हैं कि हमने जितना सोचा था उतना बुरा नहीं हुआ, क्योंकि शायद यही वो समय होता है जब ईश्वर हम पर सबसे ज्यादा कृपा करता है।

अपनी अल्पज्ञता के कारण हम सोचते हैं कि भगवान् भी हमारा हमसे मुंह मोड़कर हमारा साथ नहीं दे रहे हैं लेकिन हकीकत में वो हमें अपनी गोद में उठाये होता है।

जब ज्ञान के द्वारा हमें पता चलता है कि वह परम शक्ति तो हर पल हमारे साथ ही है – बस थोडा सा बाहर की आँखों को बंद करके अन्दर की ओर से झांकने की जरूरत है!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

हर परीक्षा पास करने की कुन्जी- अटूट विश्वास!

हर परीक्षा पास करने की कुन्जी- अटूट विश्वास!

एक बार श्री कृष्ण जी के गुरु अपने शिष्यों के साथ कही जा रहे थे।

रास्ते में किसी जंगल में रूककर उन्होंने आराम किया। उसी के पास ही द्वारका नगरी थी।

गुरुदेव ने अपने शिष्यों को भेजा कि श्री कृष्ण को बुला कर लाओ। तब उनके शिष्य द्वारका गये और द्वारकाधीश को उनके गुरुदेव का सन्देश दिया।

सन्देश सुनते ही श्री कृष्ण जी दौड़े-दौड़े अपने गुरुदेव के पास गए और उन्हें दण्डवत प्रणाम किया साथ ही उनसे द्वारका चलने के लिए विनती की लेकिन गुरुदेव ने चलने के लिए मना कर दिया और फरमाया कि हम फिर कभी आपके पास आयेंगे।

श्री कृष्ण जी ने पुन: गुरुदेव से विनती की! तब गुरुदेव ने फरमाया कि ठीक है कृष्ण हम तुम्हारे साथ चलेंगे!

लेकिन हमारी एक शर्त है कि हम जिस रथ पर जायेंगे, उसे घोड़े नहीं खीचेंगें एक तरफ से तुम और एक तरफ से तुम्हारी पटरानी रुकमणि खीचेंगी।

श्री कृष्ण उसी समय दौड़ते हुए रुकमणि के पास गए और उन्हें बताया कि मुझे तुम्हारी सेवा की जरुरत है।

तब रुकमणि को उन्होंने सारी बात बताई तब वह दोनों अपने गुरुदेव के पास आये और उन्हें रथ पर बैठने के लिए विनती की।

जब उनके गुरुदेव रथ पर बैठे तो उन्होंने अपने शिष्यों को भी रथ पर बैठने के लिए कहा!

लेकिन श्री कृष्ण जी ने परवाह ना की क्योंकि वे जानते थे कि गुरुदेव उनकी परीक्षा ले रहे है।

रुकमणि और श्री कृष्ण जी ने रथ को खींचना आरम्भ किया और उस रथ को खींचते-खींचते द्वारका ले पहुँचे।

जब गुरुदेव द्वारका पहुँचे तो श्री कृष्ण जी ने उन्हें राज सिंघासन पर बिठाया। उनका आदर सत्कार किया फिर श्री कृष्ण जी ने अपने गुरुदेव के लिए 56 तरह के व्यंजन भी बनवाये!

लेकिन जैसे ही वह व्यंजन गुरुदेव के पास पहुँचे उन्होंने सारे व्यंजनों का तिरस्कार कर दिया।

श्री कृष्ण जी ने पुन: अपने गुरुदेव से पूछा कि गुरुदेव आप क्या लेंगे?

तब गुरुदेव ने खीर बनवाने के लिए कहा। श्री कृष्ण जी ने आज्ञा मानकर खीर बनवाई।
खीर बनकर आई वो खीर से भरा पतीला गुरुदेव के पास पहुँचा उन्होंने खीर का भोग लगाया और थोड़ी-सी खीर का भोग लगा कर उन्होंने श्री कृष्ण जी को खाने के लिए कहा‌।

उस पतीले में से श्री कृष्ण जी ने थोड़ी सी खीर को खाया।
तब उनके गुरुदेव ने श्री कृष्ण को बाकी खीर अपने शरीर पर लगाने की आज्ञा दी। श्री कृष्ण जी ने आज्ञा पाकर खीर को अपने शरीर पर लगाना शुरू कर दिया।

उन्होंने पूरे शरीर पर खीर लगा ली। लेकिन जब पैर पर लगाने की बारी आई तो श्री कृष्ण जी ने अपने गुरुदेव को अपने पैरों पर खीर लगाने के लिए मना कर दिया।

श्री कृष्ण जी ने कहा ‘हे गुरुदेव यह खीर आपका भोग-प्रसाद है, मैं इस भोग को अपने पैरों पर नहीं लगाऊंगा।’

उनके गुरुदेव श्री कृष्ण जी से बहुत खुश हुए।

उन्होंने फरमाया ‘हे कृष्ण मैं तुमसे बहुत खुश हूँ तुम हर परीक्षा में सफल रहे, मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि पूरे शरीर में तुमने जहाँ-जहाँ खीर लगाईं है वह अंग आपका वज्र के समान हो गया है! और इतिहास साक्षी है कि महाभारत के युद्ध में श्री कृष्ण जी का कोई भी अस्त्र-शास्त्र बाल भी बाँका नहीं कर पाया।

जो शिष्य अपने गुरुदेव की आज्ञा में तत्पर रहता है उन भक्तों को ही गुरुदेव का सच्चा प्यार और आशीर्वाद नसीब होता है!

अपने गुरु महाराज जी की सेवा में किन्तु, परन्तु, अगर, मगर लगाने की आवश्यकता ही नहीं हैं! यह बात हमारे ऋषि मुनियों ने अनेकानेक प्रसंगों के माध्यम से समझायी है! कहा है –
राम कृष्ण ते को बड़ों, तिनहूँ भी गुरु कीन!
तीन लोक के नायका, गुरु आगे आधीन!!
हम अपनी मन बुद्धि लगाकर अपने जीवन के आनंद के पलों को गवां देते हैं! थोड़ी सी परेशानी में हमारा विश्वास दम तोड़ देता है!

भगवान के परम भक्त प्रह्लाद को उसके पिता दुष्ट हिरण्यकश्यप ने बड़ा कष्ट दिया और प्रहलाद को मारने तक का प्रयास किया लेकिन वह प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं कर पाया!

क्योंकि कहते हैं कि –
जाको राखे साइयां मार सके कोय!
बाल बांका कर सके जो जग बैरी होय!!
प्रहलाद को अपने भगवान् पर अटूट विश्वास था कि जिसकी भगवान रक्षा करते हैं, उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।

हमको भी शिष्य के नाते खुद अपने आप से पूछना चाहिय कि क्या हमारा विस्वास भी अपने मालिक के प्रति भक्त प्रह्लाद की तरह अटूट बना रह सकता है?
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गुरु नानक देव जी और गरीब की रोटी

गुरु नानक देव जी और गरीब की रोटी

गुरु नानक देव जी के समय एक प्रतिष्ठित व धनी व्यक्ति रहता था जिसका नाम मलिक भागो था| एक दिन उसने अपने पिता का श्राद्ध किया| दूर-दूर से संत महात्मा बुलाए गए और भोजन खिलाया गया, ताकि उसे धर्म लाभ मिल सके।

उन दिनों गुरु नानक देव जी भी उस स्थान पर आए हुए थे| गुरु नानक देव जी एक बढ़ई (लालो) की विनती करने पर वहां आए थे और उन्हीं के घर का खाना खाते थे।

किसी व्यक्ति ने मलिक भागों से शिकायत की कि यहां एक महात्मा आए हुए हैं परंतु वह एक बढ़ई के घर का खाना खाते हैं।

जब मलिक भागों को इस बात का पता चला कि लालो के घर एक महात्मा ठहरे हुए हैं तो उसमें अपने आदमी भेज कर गुरु नानक और उनके साथियों को भोजन पर आमंत्रित किया| परंतु गुरु साहिब ने उनके निमंत्रण को ठुकरा दिया।

मलिक भागो ने सोचा कि जब तक सभी महात्मा उसके घर का भोजन नहीं खा लेंगे तब तक उसका भोज अधूरा रहेगा| आखिर में गुरु नानक देव जी मलिक भागों के घर आ गए और लालो भी उनके पीछे-पीछे वहां आ गया|

मलिक भागो ने गुरु साहिब से पूछा:-” आप ब्रह्म भोज में क्यों नहीं आए थे महाराज?”

गुरु साहिब ने कहा:-” ला मालिक! अब खिला दे।

जब गुरु साहिब ने पीछे पलट कर देखा कि लालो बढ़ई खड़ा है, तो गुरु साहिब ने उससे कहा:-“लालो! तू भी अपनी रोटी ले आ|”

लालो दौड़कर गया और कुछ रोटी तथा बिना नमक का साग ले आया| उधर मलिक भागों के आदमी पूरी कचोरी और अन्य पकवान ले आए।

गुरु साहिब ने अपने दाहिने हाथ में रोटी और उसके ऊपर साग रखा हुआ था तथा बाएं हाथ में पूरी कचोरी पकड़ी हुई थी| उन्होंने सबके सामने उनको निचोड़ा तो लालो की रोटी से दूध निकला और मलिक भागों की पूरी कचोरी से खून।

गुरु साहिब ने कहा:- ” देखो मलिक! मैंने तेरा भोज क्यों नहीं खाया था| यह ब्रह्मभोज नहीं बल्कि लोगों का खून है| ब्रह्मभोज तो हमेशा लालो के घर का ही होता है।

शिक्षा:-मित्रों” सही रास्ते से कमाए हुए धन से ही बरकत होती है| नेक कमाई के बिना परमार्थ में सफलता नहीं मिलती।

जय श्रीराम

शुभरात्री

आत्मसुधार

आत्मसुधार

एक बार एक व्यक्ति दुर्गम पहाड़ पर चढ़ा! वहाँ पर उसे एक महिला दिखीं! वह व्यक्ति बहुत अचंभित हुआ! उसने जिज्ञासा व्यक्त की कि “वे इस निर्जन स्थान पर क्या कर रही हैं?

उन महिला का उत्तर था – “मुझे अत्यधिक काम हैं! इस पर वह व्यक्ति बोला, “आपको किस प्रकार का काम है क्योंकि मुझे तो यहाँ आपके आस-पास कोई दिखाई नहीं दे रहा!

महिला का उत्तर था – “मुझे दो बाज़ों को और दो चीलों को प्रशिक्षण देना है! दो खरगोशों को आश्वासन देना है! एक गधे को आलस्य-प्रमाद से बाहर निकालना है! एक सर्प को अनुशासित करना है और एक सिंह को वश में करना है।

वह व्यक्ति बोला, “वे सब हैं कहाँ? मुझे तो इनमें से कोई नहीं दिख रहा!

महिला ने कहा, “ये सब मेरे ही भीतर हैं।”

वह दो बाज़ जो हर उस चीज पर गौर करते हैं, जो भी मुझे मिलीं – अच्छी या बुरी। मुझे उन पर काम करना होगा, ताकि वे सिर्फ अच्छा ही देखें और ये दो बाज हैं है – मेरी दोनों आँखें।

दो चील जो अपने पंजों से सिर्फ चोट और क्षति पहुंचाते हैं – उन्हें प्रशिक्षित करना होगा; चोट न पहुंचाने के लिए – वे हैं मेरे हाथ।

खरगोश यहाँ-वहाँ भटकते फिरते हैं पर कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं करना चाहते। मुझे उनको सिखाना होगा पीड़ा सहने पर या ठोकर खाने पर भी शान्त रहना – वे हैं मेरे पैर।

गधा हमेशा थका रहता है, यह जिद्दी है। मैं जब भी चलती हूँ, यह बोझ उठाना नहीं चाहता! इसे आलस्य प्रमाद से बाहर निकालना है – यह है मेरा शरीर।

सबसे कठिन है साँप को अनुशासित करना। जबकि यह 32 सलाखों वाले एक पिंजरे में बन्द है, फिर भी यह निकट आने वालों को हमेशा डसने, काटने, और उनपर अपना ज़हर उडेलने को आतुर रहता है! मुझे इसे भी अनुशासित करना है – यह है मेरी जीभ।

मेरा पास एक शेर भी है, आह! यह तो निरर्थक ही घमंड करता है। वह सोचता है कि वह तो एक राजा है। मुझे उसको वश में करना है- यह है मेरा मैं (अहं)।

इस प्रकार उस महिला ने कहा कि देखा आपने, मुझे कितने अधिक काम हैं?

सोचिये और विचारिये हम सब में काफी समानता है! आपने भी मेरी तरह ही अपने उपर बहुत कार्य करना है! तो छोडिए दूसरों को परखना, निंदा करना, टीका टिप्पणी करना और उस पर आधारित नकारात्मक धारणायें बनाना। चलें, पहले अपने उपर काम करें।

इस प्रसंग वास्तव में विचार करने योग्य है ताकि हमारा अपना सुधार हो सके! अधिकांशतः हम दूसरों के दोष देखने में अपना कीमती समय बिताया करते हैं!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
उस व्यक्ति की शक्ति का कोई मुकाबला नहीं। जिसके पास शक्ति के साथ सहनशक्ति भी हो।

You can’t hug yourself, you can’t cry on your own shoulder, life is all about living for one another, so live with those who Love you most.
🙏 सुप्रभात 🙏

सबसे बड़ी समस्या – हमारी सोच

सबसे बड़ी समस्या – हमारी सोच

बहुत समय पहले की बात है! एक महाज्ञानी पंडित हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहते थे। लोगों के बीच रह कर वह थक चुके थे और अब ईश्वर भक्ति करते हुए एक सादा जीवन व्यतीत करना चाहते थे लेकिन उनकी प्रसिद्धि इतनी थी कि लोग दुर्गम पहाड़ियों, सकरे रास्तों, नदी-झरनो को पार कर के भी उससे मिलना चाहते थे!
उनका मानना था कि यह विद्वान उनकी हर समस्या का समाधान कर सकता है।

इस बार भी कुछ लोग ढूंढते हुए उसकी कुटिया तक आ पहुंचे! पंडित जी ने उन्हें इंतज़ार करने के लिए कहा! इस प्रकार तीन दिन बीत गए और भी कई लोग वहां पहुँच गए! जब लोगों के लिए जगह कम पड़ने लगी तब पंडित जी बोले, ”आज मैं आप सभी के प्रश्नो का उत्तर दूंगा!
लेकिन आप सबको वचन देना होगा कि यहाँ से जाने के बाद आप किसी और से इस स्थान के बारे में नहीं बताएँगे ताकि आज के बाद मैं एकांत में रह कर अपनी साधना कर सकूँ!
अगर आप लोगों को मंजूर हो तो अपनी-अपनी समस्याएं बताइये!

यह सुनते ही एक व्यक्ति ने अपनी परेशानियां बतानी शुरू की! लेकिन वह अभी कुछ शब्द ही बोल पाया था कि बीच में किसी और ने अपनी बात कहनी शुरू कर दी!

सभी जानते थे कि आज के बाद उन्हें कभी पंडित जी से बात करने का मौका नहीं मिलेगा; इसलिए वे सब जल्दी से जल्दी अपनी बात रखना चाहते थे!
कुछ ही देर में वहां का दृश्य मछली-बाज़ार जैसा हो गया और अंततः पंडित जी को चीख कर बोलना पड़ा, ”कृपया शांत हो जाइये और आप लोग अपनी -अपनी समस्या एक पर्चे पर लिखकर मुझे दीजिये!“

सभी ने अपनी-अपनी समस्याएं लिखकर आगे बढ़ा दी! पंडित जी ने सारे पर्चे लिए और उन्हें एक टोकरी में डाल कर मिला दिया और बोले, ”इस टोकरी को एक-दूसरे को पास कीजिये और इसमें से हर व्यक्ति एक पर्ची उठाएगा और उसे पढ़ेगा! उसके बाद उसे निर्णय लेना होगा कि *क्या वो अपनी समस्या को इस समस्या से बदलना चाहता है?”

हर व्यक्ति एक पर्चा उठाता, उसे पढता और सहम सा जाता! एक -एक कर के सभी ने पर्चियां देख ली पर कोई भी अपनी समस्या के बदले किसी और की समस्या लेने को तैयार नहीं हुआ!

सबका यही सोचना था कि उनकी अपनी समस्या चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो बाकी लोगों की समस्या जितनी गंभीर नहीं है!

दो घंटे बाद सभी अपनी-अपनी पर्ची हाथ में लिए लौटने लगे! वे खुश थे कि उनकी समस्या उतनी बड़ी भी नहीं है जितना कि वे सोचते थे!

यह हकीकत है कि ऐसा कौन होगा जिसकी जिंदगी में एक भी समस्या न हो?
हम सभी के जीवन में समस्याएं हैं लेकिन हमें भी लगता है कि सबसे बड़ी समस्या हमारी ही है पर यकीन जानिए इस दुनिया में लोगों के पास इतनी बड़ी-बड़ी समस्यायें हैं कि हमारी तो उनके सामने कुछ भी नहीं!

इसलिए, समय के सदगुरु भी यही समझाते हैं कि अगर सुख के समय में दुःख की तयारी कर लोगे तो दुःख का कोई असर नहीं होगा और जो भी अवसर मिला है – उसके लिए आभारी रहना चाहिय और हरहाल में खुशहाल जीवन जीने का प्रयास करना चाहिय! क्योंकि सुख और दुख से परे है असली आनंद – जिसे जीते-जी प्राप्त किया जा सकता है!

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