Love – Prem

प्रेम

एक बार एक पुत्र अपने पिता से रूठ कर घर छोड़ कर दूर चला गया और फिर इधर उधर यूँही भटकता रहा। दिन बीते, महीने बीते और साल बीत गए |
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एक दिन वह बीमार पड़ गया | अपनी झोपडी में अकेले पड़े उसे अपने पिता के प्रेम की याद आई कि कैसे उसके पिता उसके बीमार होने पर उसकी सेवा किया करते थे | उसे बीमारी में इतना प्रेम मिलता था कि वो स्वयं ही शीघ्र अति शीघ्र ठीक हो जाता था | उसे फिर एहसास हुआ कि उसने घर छोड़ कर बहुत बड़ी गलती की है, वो रात के अँधेरे में ही घर की और हो लिया।
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जब घर के नजदीक गया तो उसने देखा आधी रात के बाद भी दरवाज़ा खुला हुआ है | अनहोनी के डर से वो तुरंत भाग कर अंदर गया तो उसने पाया की आंगन में उसके पिता लेटे हुए हैं | उसे देखते ही उन्होंने उसका बांहे फैला कर स्वागत किया | पुत्र की आँखों में आंसू आ गए |

उसने पिता से पूछा “ये घर का दरवाज़ा खुला है, क्या आपको आभास था कि मैं आऊंगा?” पिता ने उत्तर दिया “अरे पगले ये दरवाजा उस दिन से बंद ही नहीं हुआ जिस दिन से तू गया है, मैं सोचता था कि पता नहीं तू कब आ जाये और कंही ऐसा न हो कि दरवाज़ा बंद देख कर तू वापिस लौट जाये |”
ठीक यही स्थिति उस परमपिता परमात्मा की है | उसने भी प्रेमवश अपने भक्तो के लिए द्वार खुले रख छोड़े हैं कि पता नहीं कब भटकी हुई कोई संतान उसकी और लौट आए।i
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हमें भी आवश्यकता है सिर्फ इतनी कि उसके प्रेम को समझे और उसकी और बढ़ चलें।
🙏🙏
जो प्राप्त है-पर्याप्त है
जिसका मन मस्त है
उसके पास समस्त है!!

The fear of death changes life

मृत्यु का भय जीवन को बदल देता है

एक बार की बात है सन्त तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था! उनके समक्षआया और बोला, *”गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं? ना आप किसी पर क्रोध करते हैंऔर ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं?”
कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए।

सन्त बोले, ”मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जानता हूँ!”
मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?” ,शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।”
तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!”, सन्त तुकाराम दुखी होते हुए बोले।

कोई और कहता तो शिष्य ये बात मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं सन्त तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था?

शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहांँ से चला गया। उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पर क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान-सुमिरणऔर पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया हो और उनसे माफ़ी मांँगता।

देखते-देखते सन्त की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये।
शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं।
वह उनके समक्ष पहुंँचा और बोला, ”गुरु जी, मेरा समय पूरा होने वाला है,कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!”

“मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र! गुरु जी ने प्यार से उसे कहते हुए उससे पूछा, अच्छा, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?”,

शिष्य तत्परता से बोला कि नहीं-नहीं, महाराज, बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे,मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था?मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी’!

सन्त तुकाराम मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरेअच्छे व्यवहार का रहस्य है।”
मैं जानता हूँ कि एक न एक दिन मुझे इस संसार से जाना है इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।

शिष्य समझ गया कि सन्त तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था।

अगर हम नियमित सेवा, सत्संग और साधना अभ्यास करते हैं तो हमको निन्दा, चुगली और तेरी-मेरी व्यर्थ की बातों में पढने की जरुरत ही नहीं है!
भजन-सुमिरण के सतत अभ्यास अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना चाहिए। यही मनुष्य जीवन का सार है।

बाकी एक ना एक दिन जाना सबने है –
आये हैं सो जायेंगे, राजा रंक फकीर!
कोई सिंहासन चढ चला, कोई बंधे जंजीर!!

How much wealth, happiness, prosperity, status, muscle power a person has, these are all external appearances.

राजा के दरबार में.
एक आदमी नौकरी मांगने के लिए आया! तो उस व्यक्ति से उसकी क़ाबलियत पूछी गई।

तो वो बोला-
मैं आदमी हो चाहे जानवर, उसकी शक्ल देख कर उसके बारे में बता सकता हूँ.!
राजा ने उसे अपने खास “घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज” बना दिया।

कुछ ही दिन बाद राजा ने उससे अपने सब से महंगे और मनपसन्द घोड़े के बारे में पूछा, तो उसने कहा..
घोड़ा नस्ली नही है.!

राजा को हैरानी हुई,
उसने जंगल से घोड़े वाले को बुला कर पूछा, उसने बताया घोड़ा नस्ली तो हैं, पर इसके पैदा होते ही इसकी मां मर गई थी।
इसलिए ये एक गाय का दूध पी कर उसके साथ पला बढ़ा है।
राजा ने अपने नौकर को बुलाया और पूछा तुम को कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं??
“उसने कहा- “जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके खाता है, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुह में लेकर सर उठा लेता है।

राजा उसकी काबलियत से बहुत खुश हुआ,
उसने नौकर के घर अनाज ,घी, मुर्गे, और ढेर सारी बकरियां बतौर इनाम भिजवा दिए।
और अब उसे रानी के महल में तैनात कर दिया।
कुछ दिनो बाद राजा ने उससे रानी के बारे में राय मांगी,
उसने कहा,
“तौर तरीके तो रानी जैसे हैं, लेकिन पैदाइशी नहीं हैं।
राजा के पैरों तले जमीन निकल गई, उसने अपनी सास को बुलाया,

सास ने कहा..
ये हक़ीक़त है कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था,लेकिन हमारी बेटी 6 महीने में ही मर गई थी, लिहाज़ा हम ने आपके रजवाड़े से करीबी रखने के लिए किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया।

राजा ने फिर अपने नौकर से पूछा,
“तुम को कैसे पता चला??

“”उसने कहा-
“रानी साहिबा का नौकरो के साथ सुलूक गंवारों से भी बुरा है,
एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक तरीका होता है,
जो रानी साहिबा में बिल्कुल नही है।

राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ,
और फिर से बहुत सारा अनाज भेड़ बकरियां बतौर इनाम दी।
साथ ही उसे अपने दरबार मे तैनात कर लिया!
कुछ वक्त गुज़रा,
राजा ने फिर नौकर को बुलाया, और अपने बारे में पूछा,
नौकर ने कहा
“जान की सलामती हो तो कहूँ”
राजा ने वादा किया तो उसने कहा, “न तो आप राजा के बेटे हो”
और न ही आपका चलन राजाओं वाला है।

राजा को बहुत गुस्सा आया,
मगर जान की सलामती का वचन दे चुका था, राजा सीधा

अपनी मां के महल पहुंचा…मां ने कहा,
ये सच है,
तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी, तो तुम्हे गोद लेकर हम ने पाला।
राजा ने नौकर को बुलाया और पूछा,
बता, “भोई वाले तुझे कैसे पता चला???
उसने कहा
जब राजा किसी को “इनाम दिया करते हैं, तो हीरे मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं।
लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें दिया करते हैं।
ये रवैया किसी राजा का नही, किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है।

किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, बाहुबल हैं ये सब बाहरी दिखावा हैं।

इंसान की असलियत की पहचान,
उसके व्यवहार और उसकी नियत से होती है।

The person whose breath goes away, his everything ends.

जिस भी मनुष्य का स्वांस चला जाता है उसका सबकुछ खत्म हो जाता है ।

सारे जीवन मनुष्य और सारी चीजों पर ध्यान देता है, रखता है पर अपनी स्वांस पर कभी ध्यान वो नहीं देता है।

जिस स्वांस की वजह से मनुष्य इस जीवन के अस्तित्व में है और सबकुछ है।
सबसे पहले वो उसी को बिसरा देता है, भूल जाता है।

ऐसी स्थिति में मनुष्य का कल्याण कैसे संभव है?

मनुष्य को स्वांस का ध्यान आता कब है जब उसका जाने लगता है तब उसको ख्याल आता है कि अरे बाप रे बाप अब क्या होगा, ये तो जा रहा है!

तब वह घबराता है, रोता है, पछताता है कि जिस स्वांस पर मुझे ध्यान देना चाहिए था उसको तो मैं भूल ही गया!

और अपनी पूरी की पूरी शक्ति लगा देता है कि एक और मिल जाय पर ना भाई ना और अब नहीं, अब तुम्हारा समय समाप्त!

स्वांस का कानून ही यही है भाई चाहे कोई भी हो चाहे राजा हो या भिखारी ये किसी को नहीं जानता है ।

स्वांस का भी अपना एक अटल कानून है कि ये जबतक आता है तो आता है जब जाता है तो जाता है फिर संसार कि कोई भी ताकत इसको वापस नहीं बुला सकती है, इसके साथ किसी की भी सिफारिश काम नहीं आती है ।इसके मामले में किसी भी रिश्वत का आदान-प्रदान नहीं होता है, ये पूर्णतया ईमानदार है ।
इसलिए,
शुक्रगुजार रहें। सकारात्मक रहें, सच्चे रहें! सच्चाई को समझें।

  • Prem Rawat

glory of satsang

सतसंग की महिमा

अशान्ति, परेशानियाँ तब शुरू हो जाती हैं । जब मनुष्य के जीवन में सतसंग नहीं होता।

मनुष्य का जीवन आगे बढ़ता चला जा रहा है। लेकिन मनुष्य इस बारे में नहीं सोचता कि जीवन को कैसे जीना चाहिए!
मनुष्य ने धन कमा लिया, मकान बना लिया, शादी घर परिवार बच्चे सब हो गये, गाड़ी खरीद ली, – यह सब कर लेने के बाद भी मनुष्य का जीवन सफल नहीं हो पायेगा।

क्योंकि जिसके लिए यह जीवन मिला उसको तो मनुष्य ने समय दिया ही नहीं और संसार की वस्तुयें जुटाने में समय नष्ट कर दिया।
जीवन मिला था भगवान के भजन सुमिरण के लिए।
लेकिन मनुष्य माया का दास बनकर माया की प्राप्ति के लिए इधर – उधर भटकने लगता है और इस तरह मनुष्य का यह कीमती जीवन नष्ट हो जाता है।

जिस अनमोल रतन मानव जीवन को पाने के लिए देवता लोग भी तरसते रहते हैं। उस मानव जीवन को मनुष्य ब्यर्थ गवाँ देता है।

देवता लोगों के पास भोगों की कमी नहीं है! लेकिन फिर भी देवता लोग मनुष्य जीवन जीना चाहते हैं।

क्योंकि मनुष्य देह पाकर ही भक्ति का पूर्ण आनन्द और श्री गुरू महाराज जी की सेवा और सन्तों की कृपा से सतसंग का सानिध्य मिलता है।

सन्तो के संग से मिलने वाला आनन्द तो बैकुण्ठ में भी दुर्लभ है।

कबीर जी कहते हैं कि –
राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय!
जो सुख साधु संग में, सो बैकुण्ठ न होय!

रामचरित्रमानस मेंं भी लिखा है कि–
तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिए तुला एक अंग!
तुल न ताहि सकल मिली, जो सुख लव सतसंग!
हे तात ! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जायें।
तब भी वह सब सुख मिलकर भी दूसरे पलड़े पर रखे हुए सत्संग बराबर नहीं हो सकते। जो क्षण मात्र की सतसंग से मिलता है ।

सतसंग से मनुष्य को जीवन जीने का तरीका पता चलता है।

सतसंग से ही मनुष्य को अपने वास्तविक कर्तव्य का पता चलता है।
मानस में लिखा है कि –
सत संगत मुद मंगल मूला!
सोईं फल सिद्धि सब साधन फूला!
अर्थात सतसंग सब मंँगलों का मूल है।

जैसे फूल से फल और फल से बीज और बीज से बृक्ष होता है । उसी प्रकार सतसंग से विवेक जागृत होता है और विवेक जागृत होने पर भगवान से प्रेम होता है और प्रेम से प्रभु की प्राप्ति होती है। सतसंग से मनुष्य के करोड़ों – करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं – सतसंग से मनुष्य का मन बुद्धि शुद्ध होती है। सतसंग से ही भक्ति मजबूत होती है ।भगवान की जब कृपा होती है । तब मनुष्य को सतसंग और सन्तों का संग प्राप्त होता है।

कहा है –
एक घडी आधी घडी आधी ते पुनि आध!
तुलसी संगत साध की हरे कोटि अपराध!

आज मनुष्य हर पल चिन्तित रहने लगता है और हमेशा परेशान रहता है।

इन सब का कारण अज्ञानता है!
जब हम कोई मशीन घर में लेकर आते हैं तो उसके साथ एक बुकलेट भी मिलती है । जिसमें मशीन को कैसे चलाना है, इस बारे में लिखा होता है।

उसी प्रकार भगवान ने जब यह मानव शरीर दिया और इस मानव जीवन को सफल कैसे करना है – यह भी वेद-शास्त्र रुपी बुकलेट के सतसंग और सन्तों से पता चलता है।

इसलिए जीवन से सतसंग को अलग नहीं करना चाहिए!

जब सतसंग जीवन में नहीं रहेगा तो संसार के प्रति आकर्षण बढ़ेगा और संसार के प्रति मोह, मनुष्य के जीवन को विनाश की तरफ ले जाता है।

सतसंग की अग्नि में मनुष्य के सारे विकार नष्ट हो जाते हैं –

आनन्द कहीं बाहर नहीं है वो भीतर ही है लेकिन मनुष्य के मन के चारों तरफ संसार के मोह की चादर लपेट रखीं है।

इसलिए वो आनन्द ढक जाता है और महसूस नहीं होता – और जब सतसंग से और गुरु दरबार की सेवा से, महाराज जी के दर्शन करने से मोह रुपी चादर हट जाती है।

तब आनन्द ही आनन्द मिलने लगता है। जीवन में जो भी अशान्ति, परेशानी, विकार आदि रहते हैं उनको सतसंग हटा देता है और मनुष्य को एक निर्मल चरित्र बना देता है । इसलिए कहा है कि –
जाने बिनु न होय परतीति,
बिनु परतिती होई न प्रीति!!

जब तक श्री गुरु महाराज जी के चरणों में पूर्ण समर्पण नहीं होगा।तब तक विवेक जागृत नहीं होगा –
बिनु सतसंग विवेक न होई –

इसलिए जीवन में सतसंग को हमेशा बनाये रखना चाहिए और जब भी जहांँ भी सतसंग सुनने या सतसंग में जाने का मौका मिले तो दुनिया वालों की परवाह कियें बिना ही पहुंँच जाना चाहिये!

  जय सच्चिदानन्द

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Find the way in yourself!

खुद में रा़स्ता ढूढ़े!

एक बार स्वामी विवेकानन्द के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुःखी लग रहा था। वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला कि महाराज मैं अपने जीवन से बहुत दुःखी हूँ! मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ – काफी लगन से भी काम करता हूँ; लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया।
भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ।
स्वामी जी उस व्यक्ति की परेशानी को पल भर में ही समझ गए। उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा सा पालतू कुत्ता था!
उन्होंने उस व्यक्ति से कहा– तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा।

आदमी ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा। काफी देर तक अच्छी खासी सैर करा कर जब वो व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहुँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था जबकि कुत्ता हाँफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था।

स्वामी जी ने व्यक्ति से कहा कि ये कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया जबकि तुम तो अभी भी साफ सुथरे और बिना थके दिख रहे हो?

तो उस व्यक्ति ने कहा कि मैं तो सीधा साधा अपने रास्ते पर चल रहा था लेकिन ये कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था। हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसीलिए ये थक गया है।

स्वामी जी ने मुस्कुरा कर कहा- यही तुम्हारे सभी प्रश्नों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आस पास ही है वो ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पर जाने की बजाय; दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले जाते हो!

जब आत्म ज्ञान प्राप्त होता है तो मतभेदों की धारणा से उत्पन्न होने वाले सभी भय दूर होने लगते हैं और व्यक्ति इस संसार के दुखों को पार करने में सक्षम हो जाता है। 
यही एक ब्रह्मज्ञानी के अनुभव की स्थिति और सच्ची भक्ति का आधार है!
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We don’t want money, we want peace!

धन नही चैन चाहिए!

एक गरीब आदमी था।वो हर रोज नजदीक के मंदिर में जाकर वहां साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था। अक्सर वो अपने भगवान से कहता कि मुझे आशीर्वाद दीजिए तो मेरे पास ढेर सारा धन-दौलत आ जाए।

एक दिन ठाकुर जी ने बाल रूप में प्रगट हो उस आदमी से पूछ ही लिया कि क्या तुम मन्दिर में केवल इसीलिए, काम करने आते हो।

उस आदमी ने पूरी ईमानदारी से कहा कि हां!
मेरा उद्देश्य तो यही है कि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाए, इसीलिए तो आपके दर्शन करने आता हूं। पटरी पर सामान लगाकर बेचता हूं। पता नहीं, मेरे सुख के दिन कब आएंगे।

बाल रूप ठाकुर जी ने कहा कि – तुम चिंता मत करो। जब तुम्हारे सामने अवसर आएगा तब ऊपर वाला तुम्हें आवाज थोड़ी लगाएगा। बस, चुपचाप तुम्हारे सामने अवसर खोलता जाएगा।

युवक चला गया।
समय ने पलटा खाया, वो अधिक धन कमाने लगा। इतना व्यस्त हो गया कि मन्दिर में जाना ही छूट गया।

कई वर्षों बाद वह एक दिन सुबह ही मन्दिर पहुंचा और साफ-सफाई करने लगा।

ठाकुर जी फिर प्रगट हुए और उस व्यक्ति से बड़े ही आश्चर्य से पूछा- क्या बात है, इतने बरसों बाद आए हो, सुना है बहुत बड़े सेठ बन गए हो।

वो व्यक्ति बोला- बहुत धन कमाया। अच्छे घरों में बच्चों की शादियां की! पैसे की कोई कमी नहीं है पर दिल में चैन नहीं है। ऐसा लगता था रोज सेवा करने आता रहूं पर आ ना सका।

फिर व्यक्ति भरे मन से बोला, हे प्रभू, आपने मुझे सब कुछ दिया पर जिंदगी का चैन नहीं दिया?

प्रभू जी ने कहा कि तुमने वह मांगा ही कब था? जो तुमने मांगा वो तो तुम्हें मिल गया ना। फिर आज यहां क्या करने आए हो?

उसकी आंखों में आंसू भर आ गये; ठाकुर जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला – अब कुछ मांगने के लिए सेवा नहीं करूंगा। बस दिल को शान्ति मिल जाए।

ठाकुर जी ने कहा- पहले तय कर लो कि अब कुछ मागने के लिए मन्दिर की सेवा नहीं करोगे और मन की शांति के लिए ही आओगे!

ठाकुर जी ने समझाया कि चाहे मांगने से कुछ भी मिल जाए पर दिल का चैन कभी नहीं मिलता! इसलिए सेवा के बदले कुछ मांगना नहीं है।
वो व्यक्ति बड़ा ही उदास होकर ठाकुर जी को देखता रहा और बोला- मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप बस, मुझे सेवा करने का मौका दीजिए।

सच में, मन की शांति सबसे अनमोल है जिसे समय के सद्गुरु की सेवा से महसोस किया जाता सकता है!
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Don’t keep unaccountable desires..Take care of what you have got first.

बे हिसाब इच्छाएं न पालिए..
जो मिला है पहले उसे सम्भालिए।

एक सिद्ध महात्मा के दर्शन करने पहुंचे एक गरीब दम्पत्ति ने देखा कि कूडे के ढेर पर सोने का चिराग पड़ा हुआ है।

दंपत्ति ने महात्मा से पूछा तो महात्मा ने बताया कि ये तीन इच्छायें पूरी करने वाला बेकार चिराग है।

बहुत खतरनाक भी है, जो इसको उठाकर ले जाता है वापस यहीं कूड़े में फेंक जाता है।

गरीब दम्पत्ति ने जाते समय वो चिराग उठा लिया और घर पहुंचकर उससे तीन वरदान मांगने के बैठ गये।

दम्पत्ति गरीब थे और उन्होंने सबसे पहले दस लाख रूपये मांगकर चिराग की जांच करने की सोची।

जैसे ही उन्होंने रूपये मांगे तभी दरवाजे पर दस्तक हुयी जाकर दरवाजा खोला तो एक आदमी ने रूपये से भरा बैग और एक लिफाफा थमा गया।

लिफाफे में एक पत्र था जिसमे लिखा हुआ था कि मेरी कार से टकराकर आपके पुत्र की मृत्यु हो गयी है – जिसके पश्चात्ताप स्वरूप ये दस लाख रूपये भेज रहा हूँ! मुझे माफ़ करियेगा।

अब दम्पत्ति को काटो तो खून नही पत्नी दहाड़े मारकर रोने लगी।

तभी पति को ख्याल आया और उसने चिराग से दूसरी इच्छा बोल दी कि उसका बेटा वापस आ जाये ।

थोड़ी देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई और पूरे घर में अजीब सी आवाजें आने लगीं घर के बल्ब तेजी से जलने बुझने लगे – उसका बेटा प्रेत बनकर वापस आ गया था ।

दम्पत्ति ने प्रेतरूप देखा तो बुरी तरह डर गयेऔर हड़बड़ी में चिराग से तीसरी इच्छा के रूप में प्रेत रूपी पुत्र की मुक्ति मांग कर दी। बेटे की मुक्ति के बाद रातों रात वो आश्रम पहुंचे और चिराग को कूड़े के ढेर पर फेंककर दुखी मन से वापस लौट आये।

हम सभी अपनी जिंदगी में उस दम्पत्ति की तरह हैं! हमारी भी इच्छायें बेहिसाब हैं! जब एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी सताने लगती है और जब दूसरी पूरी हो जाये तो तीसरी।

इसलिए ईश्वर ने हमें जो भी दिया है – उसमे संतुष्ट रहना चाहिये और सफलता के लिऐ कभी जल्दबाजी नहीं अपनाना चाहिए।क्योकि सफलता केवल संघर्ष से ही मिलती है!

🙏🏽🙏🏾सुप्रभात 🙏🙏🏻

How far do the sinful deeds go?

पाप कर्म कहांँ-कहांँ तक जाते हैं ?

एक बार एक ऋषि ने सोचा कि लोग गंगा में पाप धोने जाते हैं,तो इसका मतलब हुआ कि सारे पाप गंगा में समा गए और गंगा भी पापी हो गयी।

अब यह जानने के लिए ऋषि ने तपस्या की और समझाना चाहा कि ये पाप कहाँ जाते हैं?

तपस्या करने के फलस्वरूप देवता प्रकट हुए।

ऋषि ने पूछा कि भगवन जो पाप गंगा में धोया जाता है वह पाप कहाँ जाता है?

भगवन ने कहा कि चलो गंगा से ही पूछते हैं!

दोनों लोग गंगा के पास गए और कहा कि, हे गंगे ! सब लोग तुम्हारे यहाँ पाप धोते हैं, तो इसका मतलब आप भी पापी हुई।

गंगा ने कहा, मैं क्यों पापी हुई , मैं तो सारे पापों को ले जाकर समुद्र को अर्पित कर देती हूँ!

अब वे लोग समुद्र के पास गए और बोले, हे सागर ! गंगा जो पाप आपको अर्पित कर देती है तो इसका मतलब आप भी पापी हुए?

समुद्र ने कहा, मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को लेकर भाप बना कर बादल बना देता हूँ।

अब वे लोग बादल के पास गए और पूछने लगे, हे बादल! समुद्र जो पापों को भाप बनाकर बादल बना देता हैतो इसका मतलब आप पापी हुए।

बादलों ने कहा मैं क्यों पापी हुआ!मैं तो सारे पापों को वापस पानी बरसा कर धरती पर भेज देता हूँ। पापियों का नुकसान होता है और धर्मी ज्ञानीयों के लिए अन्न उपजता है, जिसको मानव खाता है; उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है। जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, उसी अनुसार मानव की मानसिकता बनती है।

शायद इसीलिये कहते हैं – “जैसा खाए अन्न, वैसा बनता मनl”

अन्न को जिस वृत्ति ( कमाई ) से प्राप्त किया जाता हैऔर जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है। वैसे ही विचार मानव के बन जाते हैं!

इसीलिये सदैव भोजन से पहले श्री सदगुरुदेव महाराज जी के लिए दसवाँ हिस्सा निकाल कर खाना चाहिए। और कम से कम अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन भी श्रम का होना चाहिए।श्रद्धा-प्रेम की सेवा ही गुरु दरबार में काम आती है।

Realize your potential

अपनी क्षमता पहचानो

एक गाँव में एक आलसी आदमी रहता था! वह कुछ काम-धाम नहीं करता था। बस दिन भर निठल्ला बैठकर सोचता रहता था कि किसी तरह कुछ खाने को मिल जाये।

एक दिन वह यूं ही घूमते-घूमते आम के एक बाग़ में पहुँच गया। वहाँ रसीले आमों से लदे कई पेड़ थे।

रसीले आम देख उसके मुँह में पानी आ गया और आम तोड़ने वह एक पेड़ पर चढ़ गया, लेकिन जैसे ही वह पेड़ पर चढ़ा, बाग़ का मालिक वहाँ आ पहुँचा।

बाग़ के मालिक को देख आलसी आदमी डर गया और जैसे-तैसे पेड़ से उतरकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ।

भागते-भागते वह गाँव में बाहर स्थित जंगल में जा पहुँचा, वह बुरी तरह से थक गया था। इसलिए एक पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने लगा।

तभी उसकी नज़र एक लोमड़ी (Fox) पर पड़ी, उस लोमड़ी की एक टांग टूटी हुई थी और वह लंगड़ाकर चल रही थी।
लोमड़ी को देख आलसी आदमी सोचने लगा कि ऐसी हालत में भी इस जंगली जानवरों से भरे जंगल में ये लोमड़ी बच कैसे गई? इसका अब तक शिकार कैसे नहीं हुआ?

जिज्ञासा में वह  एक पेड़ पर चढ़ गया और वहाँ बैठकर देखने लगा कि अब इस लोमड़ी के साथ आगे क्या होगा?

कुछ ही पल बीते थे कि पूरा जंगल शेर (Lion) की भयंकर दहाड़ से गूंज उठा, जिसे सुनकर सारे जानवर डरकर भागने लगे, लेकिन लोमड़ी अपनी टूटी टांग के साथ भाग नहीं सकती थी, वह वहीं खड़ी रही।

शेर लोमड़ी के पास आने लगा, आलसी आदमी ने सोचा कि अब शेर लोमड़ी को मारकर खा जायेगा!
लेकिन आगे जो हुआ, वह कुछ अजीब था।

शेर लोमड़ी के पास पहुँचकर खड़ा हो गया! उसके मुँह में मांस का एक टुकड़ा था- जिसे उसने लोमड़ी के सामने गिरा दिया।
लोमड़ी इत्मिनान से मांस के उस टुकड़े को खाने लगी, थोड़ी देर बाद शेर वहाँ से चला गया।

यह घटना देख आलसी आदमी सोचने लगा कि भगवान सच में सर्वेसर्वा है,उसने धरती के समस्त प्राणियों के लिए, चाहे वह जानवर हो या इंसान, खाने-पीने का  प्रबंध कर रखा है!
यही सोचते वह अपने घर लौट आया।

घर आकर वह २-३ दिन तक बिस्तर पर लेटकर प्रतीक्षा करने लगा कि जैसे भगवान ने शेर के द्वारा लोमड़ी के लिए भोजन भिजवाया था – वैसे ही उसके लिए भी कोई न कोई खाने-पीने का सामान ले आएगा।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ! भूख से उसकी हालात ख़राब होने लगी। आख़िरकार उसे घर से बाहर निकलना ही पड़ा। घर के बाहर उसे एक पेड़ के नीचे बैठे हुए बाबा दिखाए पड़े। वह उनके पास गया और जंगल का सारा वृतांत सुनाते हुए वह बोला, “बाबा जी! भगवान मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? उनके पास जानवरों के लिए भोजन का प्रबंध है, लेकिन इंसानों के लिए नहीं।

बाबा जी ने उत्तर दिया, “बेटा! ऐसी बात नहीं है! भगवान के पास सारे प्रबंध है। दूसरों की तरह तुम्हारे लिए भी!
लेकिन बात यह है कि वे तुम्हें लोमड़ी नहीं शेर बनाना चाहते हैं।

सचमुच में, हम सबके भीतर क्षमताओं का असीम भंडार है!
बस अपनी अज्ञानतावश हम उन्हें पहचान नहीं पाते और स्वयं को कमतर समझकर दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा करते रहते हैं।

अतः स्वयं की क्षमता पहचानिए। दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा मत करिए।
स्वकर्म के द्वारा इतना सक्षम बनिए कि आप दूसरों की सहायता कर सकें। केवल अपने हित का ही ना सोचकर दूसरों का भला भी करने योग्य बनिए!

संतों ने यही समझाया है कि पर हित सरिस धर्म नहीं भाई!