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श्री गुरु महिमा श्री गुरु स्तोत्रम्🌸

श्री गुरु महिमा
श्री गुरु स्तोत्रम्🌸

।। श्रीमहादेव्युवाच ।।🌸
गुरुर्मन्त्रस्य देवस्य धर्मस्य तस्य एव वा ।
विशेषस्तु महादेव ! तद् वदस्व दयानिधे ।।
श्री महादेवी (पार्वती) ने कहा : हे दयानिधि शंभु ! गुरुमंत्र के देवता अर्थात् श्रीगुरुदेव एवं उनका आचारादि धर्म क्या है – इस बारे में विशेष वर्णन करें ।

।। श्रीमहादेव उवाच ।।🌸
जीवात्मनं परमात्मनं दानं ध्यानं योगो ज्ञानम् ।
उत्कल काशीगंगामरणं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।1।।
श्री महादेवजी बोले : जीवात्मा-परमात्मा का ज्ञान, दान, ध्यान, योग, पुरी, काशी या गंगा तट पर मृत्यु- इन सबमें से कुछ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।1।।
🌸
प्राणं देहं गेहं राज्यं स्वर्गं भोगं योगं मुक्तिम् ।
भार्यामिष्टंं पुत्रं मित्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।2।।
प्राण, शरीर, गृह, राज्य, स्वर्ग, भोग, योग, मुक्ति, पत्नी, इष्ट, पुत्र, मित्र – इन सबमें से कोई भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।2।।
🌸
वानप्रस्थं यतिविधधर्मं पारमहंस्यं भिक्षुकचरितम् ।
साधोः सेवां बहुसुखभुक्तिं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।3।।
वानप्रस्थ धर्म, यति विषयक धर्म, परमहंस के धर्म, भिक्षुक अर्थात् याचक के धर्म, साधु-सेवारूपी गृहस्थ-धर्म व बहुत से सुखों का भोग – इनमें से कुछ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।3।।
🌸
विष्णो भक्तिं पूजनरक्तिं वैष्णवसेवां मातरि भक्तिम् ।
विष्णोरिव पितृसेवनयोगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।4।।
भगवान श्रीविष्णु की भक्ति, उनके पूजन में अनुरक्ति, विष्णु-भक्तों की सेवा, माता की भक्ति, श्रीविष्णु ही पिता रूप में हैं, इस प्रकार की पिता की सेवा -इनमें से कुछ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।4।।
🌸
प्रत्याहारं चेन्द्रिययजनं प्राणायां न्यासविधानम् ।
इष्टे पूजा जप तपभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।5।।
प्रत्याहार और इन्द्रियों का दमन, प्राणायाम, न्यास-विन्यास का विधान, इष्टदेव की पूजा, मंत्र-जप, तपस्या व भक्ति- इनमें से कुछ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।5।।
🌸
काली दुर्गा कमला भुवना त्रिपुरा भीमा बगला पूर्णा ।
श्रीमातंगी धूमा तारा न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम्। ।6।।
काली, दुर्गा, लक्ष्मी, भुवनेश्वरी, त्रिपुरासुंदरी, भीमा, बगलामुखी (पूर्णा), मातंगी, धूमावती व तारा- ये सभी मातृशक्तियाँ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।।6।।
🌸
मात्स्यं कौर्मं श्रीवाराहं नरहरिरूपं वामनचरितम् ।
नरनारायण चरितं योगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।7।।
भगवान के मत्स्य, कूर्म, वाराह, नरसिंह, वामन, नर-नारायण आदि अवतार, उनकी लीलाएँ, चरित्र एवं तप आदि भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।।7।।
🌸
श्रीभृगुदेवं श्रीरघुनाथं श्रीयदुनाथं बौद्धं कल्क्यम् ।
अवतारा दश वेदविधानं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।8।।
भगवान के श्री भृगु, राम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि आदि वेदों में वर्णित दस अवतार श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।।8।।
🌸
गंगा काशी काञ्ची द्वारा मायाऽयोध्याऽवन्ती मथुरा ।
यमुना रेवा पुष्करतीर्थं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।9।।
गंगा, यमुना, रेवा आदि पवित्र नदियाँ, काशी, कांची, पुरी, हरिद्वार, द्वारिका, उज्जयिनी, मथुरा, अयोध्या आदि पवित्र पुरियाँ व पुष्करादि तीर्थ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।।9।।
🌸
गोकुलगमनं गोपुररमणं श्रीवृन्दावन-मधुपुर-रटनम् ।
एतत् सर्वं सुन्दरि ! मातर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।10।।
हे सुंदरी ! हे मातेश्वरी ! गोकुल यात्रा, गौशालाओं में भ्रमण एवं श्रीवृन्दावन व मधुपुर आदि शुभ नामों का रटन – ये सब भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं ।।10।।
🌸
तुलसीसेवा हरिहरभक्तिः गंगासागर-संगममुक्तिः ।
किमपरमधिकं कृष्णेभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।11।।
तुलसी की सेवा, विष्णु व शिव की भक्ति, गंगासागर के संगम पर देह-त्याग और अधिक क्या कहूँ परात्पर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।11।।
🌸
एतत् स्तोत्रं पठति च नित्यं मोक्षज्ञानी सोऽपि च धन्यम् ।
ब्रह्माण्डान्तर्यद्-यद् ध्येयं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ।।12।।
इस स्तोत्र का जो नित्य पाठ करता है वह आत्मज्ञान एवं मोक्ष दोनों को पाकर धन्य हो जाता है । निश्चय ही समस्त ब्रह्माण्ड में जिस-जिसका भी ध्यान किया जाता है, उनमें से कुछ भी श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्रीगुरुदेव से बढ़कर नहीं है ।।12।।

🔅 अपने गुरु महाराजी के श्रीचरणों में बारम्बार प्रणाम🙏🙏🙏🙏🙏🙏

संज्ञा क्या है

किसी जाति, द्रव्य, गुण, भाव, व्यक्ति, स्थान और क्रिया आदि के नाम को संज्ञा कहते हैं। जैसे – पशु (जाति), सुन्दरता (गुण), व्यथा (भाव), मोहन (व्यक्ति), दिल्ली (स्थान), मारना (क्रिया)। जिस संज्ञा शब्द से पदार्थों की अवस्था, गुण-दोष, भाव या दशा, धर्म आदि का बोध हो उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं।

संज्ञा परिभाषा क्या है दो उदाहरण दीजिए?

संज्ञा की परिभाषा: किसी भी व्यक्ति, प्राणी, वस्तु, स्थान, गुण, जाति या भाव, दशा आदि के नाम को संज्ञा (sangya) कहते हैं। … ‘उपरोक्त वाक्य में चार नाम हैं जो संज्ञा (noun) को व्यक्त कर रहे, ‘शाहजहाँ’ एक व्यक्ति का, ‘कश्मीर’ एक स्थान का, ‘सेब’ एक वस्तु का, ‘सुंदरता’ एक गुण का नाम है। ये चारों शब्द संज्ञा के उदाहरण हैं।

संज्ञा कैसे पहचाने?

संज्ञा के भेद (Kinds of Noun)


1- जातिवाचक – (क)समूहवाचक (ख)द्रव्यवाचक

2- व्यक्तिवाचक

3- भाववाचक

संज्ञा Noun
उदाहरण-

1.मैं कानपुर में रहता हूँ |

2.कुत्ता एक पालतू पशु है |

3.सभी भैयाओं को दूध पीने को दिया जाता है |

4.मुझे प्यास लगी है

ऊपर लिखे उदहारण में कानपुर एक स्थान का नाम है, कुत्ता पशु प्राणी का नाम है, दूध वस्तु का नाम है, प्यास एक भाव है |

संज्ञा की परिभाषा – किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान और भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं |

1-जातिवाचक – जिस शब्दों से किसी जाति का बोध होता है , उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं |

जैसे- विद्यालय से छात्रों की भीड़ आ रही है |

(i)-द्रव्यवाचक संज्ञा – जिस शब्दों से किसी धातु एवं तरल पदार्थों का बोध होता है, उसे द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं |

जैसे- आजकल सोना मंहगा हो गया है |

(ii)-समूहवाचक संज्ञा – जिस शब्दों से किसी समूह का बोध होता है, उन्हें समूहवाचक संज्ञा कहते हैं |

जैसे- कक्षा में सभी विद्यार्थी उपस्थित थे |

2-व्यक्तिवाचक-
जिस शब्दों से किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, प्राणी आदि के नाम का बोध होता है, उन्हें व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं |

जैसे- राहुल रोज गीता पढ़ता है |

3-भाववाचक –
परिभाषा- जिन शब्दों से किसी गुण, दशा, स्वभाव, कार्य, दोष आदि भावों का बोध होता है, उन्हें भाववाचक संज्ञा कहते हैं |

जैसे- मुझे परीक्षा में प्रथम आने की आशा है |

मूलरूप से संज्ञा के दो भेद होते हैं-

क-दृश्य वाचक /मूर्त संज्ञा- वे संज्ञा जो हमें दिखाई देते हैं-

इसके अंतर्गत आते हैं-

1-जातिवाचक संज्ञा

2-व्यक्तिवाचक संज्ञा

ख-अदृश्य वाचक /अमूर्त संज्ञा- वे संज्ञा जो हमें दिखाई नहीं देते बल्कि महसूस होते हैं।

इसके अंतर्गत भाववाचक संज्ञा आता है ।

1-जातिवाचक संज्ञा को पहचानने की ट्रिक-
जो संज्ञा शब्द एकवचन से बहुवचन और बहुवचन से एकवचन में परिवर्तित हो जाता है, तो वह संज्ञा शब्द जातिवाचक संज्ञा होगा।

जैसे- लड़का=लड़के

लड़की =लडकियाँ

पुस्तक=पुस्तकें

नदियाँ =नदी

नगरों=नगर

मंदिरों -मंदिर

स्पष्टीकरण- ये सभी संज्ञा शब्द एकवचन से बहुवचन और बहुवचन से एकवचन में परिवर्तित हो रहे हैं, इस लिए ये सभी संज्ञा शब्द जातिवाचक संज्ञा हैं।

2-व्यक्तिवाचक संज्ञा को पहचानने की ट्रिक-
जो संज्ञा शब्द हमेशा एकवचन में रहता है, तो वह व्यक्तिवाचक संज्ञा होगा ।
जैसे- सीता, मोहन, अमित, विनायक, संजुलाता, दमयंती देवी, दीपक, संजीव, प्रमोद, गंगा नदी, आगरा, भारत, उषा फैन, टाटा इंडिका आदि ।

स्पष्टीकरण- ये सभी संज्ञा शब्द एकवचन में ही रहते हैं इनका किसी भी दशा में परिवर्तिन नहीं हो सकता , इस लिए ये सभी संज्ञा शब्द व्यक्तिवाचक संज्ञा हैं ।

वर्णमाला

वर्णों के व्यवस्थित एवं क्रमिक लेखन को वर्णमाला कहते हैं हिंदी वर्णमाला में निम्नलिखित वर्ण हैं|

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ (स्वर वर्ण)
अं अः (अयोगवाह)
क ख ग घ ङ    ( क वर्ग )
च छ ज झ ञ  ( च वर्ग )
ट ठ ड ढ ण    ( ट वर्ग )
त थ द ध न ( त वर्ग )
प फ ब भ म ( प वर्ग )
क से म तक के सभी 25 वर्ण वर्गीय अथवा स्पर्श व्यंजन कहलाते हैं।
य र ल व (अंतस्थ व्यंजन)
श ष स ह (ऊष्म व्यंजन)
क्ष त्र ज्ञ श्र    (संयुक्त व्यंजन)
ड़ ढ़    (द्विगुण व्यंजन)

वर्ण विच्छेद

किसी शब्द के निर्मित होने में जितने भी वर्ण सम्मिलित होते हैं उन सब को अलग अलग करना वर्ण विच्छेद कहलाता है| वर्ण विच्छेद करते समय हमें स्वरों की मात्रा को पहचानना पड़ता है और उस मात्रा के स्थान पर उस स्वर को प्रयोग में किया जाता है। इसमें हम शब्द के स्वर और व्यंजन को अलग- अलग करते है.

‘अ’ स्वर के कुछ उदाहरण

नमक = न् + अ + म् + अ + क‌् + अ
कथन = क् + अ + थ् + अ + न् + अ
कमल = क् +अ + म् + अ + ल् + अ

‘आ’ स्वर के उदाहरण

बाजार = ब् + आ + ज् + आ + र् + अ
मामा = म् + आ + म् + आ
आज्ञा=आ + ज् + ञ् + आ

‘इ’ स्वर के उदाहरण

दिन = द् + इ + न् + अ
किला = क् + इ + ल् + आ
किसान = क् + इ + स् + आ + न् + अ

‘ई’ स्वर के उदाहरण

श्रीमान= श् + र् + ई+ म् + आ +न् +अ 
मीठा = म् + ई + ठ् + आ
पीला = प् + ई + ल् + आ

‘उ’ स्वर के उदाहरण

बुलबुल = ब् + उ + ल् + अ + ब् + उ + ल् + अ
चुनाव = च् + उ + न् + आ + व् + अ
गुलाब = ग् + उ + ल् + आ + ब् + अ

‘ऊ’ स्वर के उदाहरण

फूल = फ् + ऊ + ल् + अ
सूरज = स् + ऊ + र् + अ + ज् +अ
झूला = झ् + ऊ + ल् + आ

‘ऋ’ स्वर के उदाहरण

अमृत = अ + म् + ऋ + त् + अ
गृह = ग् + ऋ + ह् + अ 
नृत्य = न् + ऋ + त् + य् + अ

‘ए’ स्वर के उदाहरण

देश = द् + ए + श् + अ
ऐनक = ऐ + न् + अ + क् + अ
ठेला = ठ् + ए + ल् + आ

‘ऎ’ स्वर के उदाहरण

मैदान = म् + ऐ + द् + आ + न् + अ
शैतान = श् + ऐ + त् + आ + न् +अ
फैशन = फ् + ऐ + श् + अ + न्‌ + अ

‘ओ’ स्वर के उदाहरण

टोकरी = ट् + ओ + क् + अ + र् + ई
बोतल = ब् + ओ + त् + अ + ल् + अ
गोल = ग् + ओ + ल् + अ
ओखली =ओ + ख् + अ + ल् + ई

‘औ’ स्वर के उदाहरण

औरत = औ+ र् + अ + त् + अ
नौकर= न् + औ + क् + अ + र् +अ
मौजूद = म् + औ + ज् + ऊ + द् + अ

विद्यार्थी – व्+इ+द्+य्+आ+र्+ थ्+ई.

छात्र – छ्+आ+त्+र्+अ

विद्यालय – व् + इ + द् + य् + आ + ल् + अ + य् + अ

संपर्क – स् + अ + म + प् + अ + र् + क् + अ

वर्ण संयोजन

अलग-अलग वर्णों को मिलाकर शब्द बनाने की क्रिया को वर्ण संयोजन कहते हैं जैसे

  • क् + अ + क् +ष् + आ – कक्षा
  • ग्+उ+ल्+आ+ब्+अ – गुलाब
  • ग् + इ + र् + ई + श् + अ – गिरीश
  • प् + उ + स् + त् + अ + क् + अ – पुस्तक

वर्ण

हमारे मुख से निकलने वाली सभी सार्थक धनिया वर्ण कहीं जाती हैं|

वर्ण में वैसे तो सभी तरह की ध्वनियां आती है किंतु सारथी ध्वनियों को ही वर्ण कहा जाता है इस आधार पर वर्ण के दो भेद हुए सार्थक वर्ण निरर्थक वर्ण

सार्थक वर्ण

जिन शब्दों का कुछ-न-कुछ अर्थ हो वे शब्द सार्थक शब्द कहलाते हैं।

  • चिड़िया
  • मकान
  • बस्ता
  • अध्यापिका

निरर्थक वर्ण

निरर्थक वर्णन वे होते हैं जिनका न तो कोई अर्थ होता है और ना ही उस नाम की कोई वस्तु आदि होती है|

जैसे डिंडा, गनम इत्यादि|

इसके अलावा सभी पशु पक्षियों की आवाजें भी इसी भेद में शामिल हैं

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व्याकरण

व्याकरण

प्रत्येक भाषा का अपना व्याकरण होता है इसी से भाषा की शुद्धता और शुद्धता का निर्धारण किया जाता है इसलिए हम कह सकते हैं कि

भाषा को शुद्ध शुद्ध बोल लिखने का कार्य व्याकरण करता है व्याकरण की भाषा की शुद्धता शुद्धता परखने की कसौटी है|

इस प्रकार जिस भाषा का जितना समृद्धि व्याकरण होगा वह भाषा उतनी ही अधिक समृद्ध होगी|

  1. भाषा व्यक्ति के भाव के आदान प्रदान का साधन है|
  2. भाषा दो प्रकार की होती है मौखिक तथा लिखित|
  3. मौखिक – इसमें सुनना और बोलना क्रियाएं आती हैं|
  4. लिखित – इसमें पढ़ना और लिखना क्रियाएं आती हैं|
  5. लिपि – भाषा को लिखने का ढंग लिपि कहलाता है|
  6. हिंदी भाषा भारत की राजभाषा है|
  7. प्रत्येक 14 सितंबर को हम हिंदी दिवस मनाते हैं|
  8. व्याकरण – भाषा को शुद्ध शुद्ध लिखना व्याकरण के ज्ञान से ही संभव है

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हिंदी भाषा और इसका संवैधानिक रूप

हिंदी भाषा और इसका संवैधानिक रूप

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार हिंदी हमारे देश की राजभाषा है| इस अनुच्छेद में यह व्यवस्था की गई है कि भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी और इसकी लिपि देवनागरी होगी यह व्यवस्था 14 सितंबर 1949 को की गई यही कारण है कि प्रत्येक 14 सितंबर को देश में हिंदी दिवस मनाया जाता है|

लिपि किसी भी भाषा को लिखने का ढंग लिपि कहलाता है हिंदी भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है|

कुछ भारतीय भाषाओं की लिपियां

गुजराती – गुजराती
पंजाबी – गुरमुखी
उर्दू – अरबी/फारसी
बांग्ला – बंगाली
ओड़िया – ओड़िया

कुछ विदेशी भाषाओं की लिपियां

अंग्रेजी – रोमन
चीनी – चीनी
डच – रोमन
स्पेनिश – लेटिन

Hindi Bhasha

भाषा किसे कहते हैं

भाषा किसे कहते हैं?

भाषा के द्वारा हम अपने मन के भाव व विचारों को दूसरों से अभिव्यक्त करते हैं और दूसरों की बातें स्वयं जान व समझ सकते हैं|

भाषा के चार कौशल होते हैं – सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना

भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में भारत की भाषाओं की चर्चा की गई है इसमें कुल 22 भाषाओं को मान्यता प्रदान की गई है जो निम्नलिखित हैं|

  • असमिया
  • उर्दू
  • उड़िया
  • कन्नड़
  • कश्मीरी
  • कोंकणी
  • गुजराती
  • डोगरी
  • तमिल
  • तेलुगू
  • नेपाली
  • पंजाबी
  • बांग्ला
  • बोडो
  • मणिपुरी
  • मराठी
  • मलयालम
  • मैथिली
  • संथाली
  • संस्कृत
  • सिंधी
  • हिंदी

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स्पर्श व्यंजन कौन से होते हैं?

स्पर्श व्यंजन कितने होते हैं|Sparsh Vyanjan kitne hote hain

आपको बता दें स्पर्श व्यंजन की कुल संख्या 25 होती हैं,जैसे क ,ख, ग ,घ, ङ,च ,छ,ज ,झ ,ञ,ट ,ठ ,ड ,ढ ,ण, त ,थ ,द ,ध ,न,प ,फ ,व ,भ और म।

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