Programs will run for nine days in Sitamarhi

सीतामढ़ी में नौ दिन – चलेंगे कार्यक्रम

भदोही। अवध में राममंदिर में प्राण- प्रतिष्ठा की तैयारियां चरम पर हैं तो वहीं सीता समाहित स्थल (सीतामढ़ी) भी भव्य समारोह को तत्पर है। उधर जब ‘अवधपति’ की प्राण प्रतिष्ठा हो रही होगी, ‘वैदेही’ यहां दुल्हन के शृंगार में होंगी। मंदिर प्रबंधन इसके लिए जुटा है। यहां नौ दिनों कार्यक्रम की तैयारी है।

पौराणिक मान्यताओं में सीतामढ़ी में ही निर्वासन के दौरान मां जानकी धरती में समा गईं थीं। यहीं पर वाल्मिकी आश्रम में लव-कुश कुमारों का जन्म हुआ। वाल्मीकि ने यहीं पर रामायण की रचना की थी। गोस्वामी तुलसीदास ने 500 साल पहले कवितावली में इस स्थान का जिक्र किया है।

Bhadohi. While preparations for the consecration of the Ram temple in Awadh are at their peak, the place where Sita resides (Sitamarhi) is also ready for a grand ceremony. On the other hand, when ‘Avadhapati’ is being consecrated, ‘Vaidehi’ will be here adorning the bride. The temple management is busy for this. There is preparation for the program here for nine days.

According to mythological beliefs, Mother Janaki had disappeared into the earth during her exile in Sitamarhi itself. It was here in Valmiki Ashram that Luv-Kush Kumar were born. Valmiki composed Ramayana here. Goswami Tulsidas has mentioned this place in his poetry 500 years ago.

Thirty-three gods are thirty-three crore gods

तैंतीस देव ही तैंतीस कोटि देवता हैं

एक बार राजा जनक की सभा में ऋषि शाकल्य ने ब्रह्मवेत्ता याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया, ‘देवता कितने हैं ?’ याज्ञवल्क्य ने उत्तर देते हुए कहा, ‘तीन सहस्र तीन सौ छह।’ शाकल्य ने कहा, ‘ठीक है।’ लेकिन उनका प्रश्न फिर वही का वही था कि कितने देवता हैं? याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘तैतीस।’ ‘ठीक है,’ शाकल्य ने कहा। परंतु फिर से अपना प्रश्न दोहराते हुए उन्होंने पूछा, ‘कितने देवता हैं?’ याज्ञवल्क्य ने एक बार फिर उत्तर देते हुए कहा, ‘छह देव हैं।’ शाकल्य का फिर वही कहना था, ‘ठीक है।’ और फिर से उन्होंने अपना प्रश्न दोहरा दिया कि कितने देवता हैं? याज्ञवल्क्य ने पुनः उनकी जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा, ‘केवल तीन देव हैं।’ शाकल्य ने कहा, ‘ठीक है।’ और फिर प्रश्न किया, ‘मैं आपसे जानना चाहता हूं कि कितने देवता हैं?’ याज्ञवल्क्य ने हर बार की तरह शांत भाव से उत्तर दिया, ‘दो देवता हैं।’ उत्तर के जवाब में शाकल्य ने कहा, ‘ठीक है।’ लेकिन शाकल्य ने फिर पूछा, ‘कितने देवता हैं?’ याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, ‘एक देव है।’ शाकल्य ने कहा, ‘ठीक है, तो फिर तीन सहस्र तीन सौ छह देव कौन हैं?’ याज्ञवल्क्य ने इस ‘तो’ के उत्तर में कहा, ‘परमपिता तो एक हैं लेकिन देवता तैंतीस हैं और बाकी देवगण हैं।’ शाकल्य के प्रश्नों का सिरा छूट नहीं रहा था। उन्होंने फिर पूछा,’ तैंतीस देवता कौन हैं?’ याज्ञवल्क्य ने इस प्रश्न के उत्तर में कहा, ‘आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इंद्र तथा प्रजापति सहित तैंतीस देव हैं।’

शाकल्य का फिर प्रश्न था, ‘वसु कौन हैं?’ याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चंद्रमा एवं नक्षत्र- ये आठ वसु हैं।’ ‘रुद्र कौन हैं?’ शाकल्य का प्रश्न था। याज्ञवल्क्य ने उत्तर देते हुए कहा, ‘मनुष्य में दस प्राण और ग्यारहवीं आत्मा। रुद्र इस मरणशील शरीर

से आत्मा को बांधे रखते हैं। शरीर से दस रुद्रों के जाते ही आत्मा भी शरीर को त्याग देती है। रुला देने के कारण इन्हें रुद्र कहा गया है।’ शाकल्य ने पूछा, ‘और आदित्य कौन हैं?’ याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, ‘संवत्सर में बारह मास होते हैं, ये ही आदित्य हैं। ये सबको ग्रहण करते हुए चलने के कारण आदित्य कहलाते हैं।’ शाकल्य का फिर प्रश्न, ‘इंद्र और प्रजापति कौन हैं?’ याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘स्तनयित्नु इंद्र हैं और यज्ञ प्रजापति हैं।’ इस प्रकार आठ वसु, बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र तथा इंद्र और प्रजापति सहित तैंतीस कोटि देवता हैं। कुछ विद्वान इंद्र और प्रजापति के स्थान पर दो अश्वनी कुमारों की गिनती तैंतीस कोटि देवताओं में करते हैं।’

‘शतपथ ब्राह्मण’ में ऋषि शाकल्य का दूसरा नाम विदग्ध भी मिलता है। इन्होंने ही सबसे पहले ऋग्वेद के पदपाठ को ठीक करके वाक्यों की संधियों को तोड़कर पदों को अलग-अलग स्मरण करने की पद्धति चलाई थी। ‘स्कंद पुराण’ के अनुसार पांड्य नरेश शंकर ने व्याघ्र के धोखे में पत्नी सहित इनका वध कर दिया था। शाकल्य राजा जनक की विद्वत सभा में सभा पंडित थे और वे याज्ञवल्क्य के प्रतिद्वंद्वी थे।

Once in the meeting of King Janak, sage Shakalya asked Brahmaveta Yajnavalkya a question, ‘How many gods are there?’ Yajnavalkya replied, ‘Three thousand three hundred and six.’ Shakalya said, ‘Okay.’ But his question was the same again, how many gods are there? Yajnavalkya said, ‘Thirty-three.’ ‘Okay,’ said Shakalya. But repeating his question again he asked, ‘How many gods are there?’ Yajnavalkya once again replied, ‘There are six gods.’ Shakalya again had the same thing to say, ‘Okay.’ And again he repeated his question, how many gods are there? Yajnavalkya again satisfied his curiosity and said, ‘There are only three gods.’ Shakalya said, ‘Okay.’ And then asked the question, ‘I want to know from you how many gods are there?’ Like every time, Yajnavalkya replied calmly, ‘There are two gods.’ In response Shakalya said, ‘Okay.’ But Shakalya again asked, ‘How many gods are there?’ Yajnavalkya replied, ‘There is a god.’ Shakalya said, ‘Okay, then who are the three thousand three hundred and six gods?’ Yajnavalkya replied to this question, ‘There is only one Supreme Father but there are thirty-three gods and the rest are gods.’ There was no end to Shakalya’s questions. He then asked, ‘Who are the thirty-three gods?’ Yajnavalkya said in answer to this question, ‘There are thirty-three gods including eight Vasus, eleven Rudras, twelve Adityas, Indra and Prajapati.’

Shakalya’s next question was, ‘Who is Vasu?’ Yajnavalkya said, ‘Fire, earth, air, space, Aditya, heaven, moon and stars – these are the eight Vasus.’ ‘Who is Rudra?’ It was Shakalya’s question. Yajnavalkya replied, ‘There are ten souls and eleventh soul in man. Rudra this mortal body

Keeps the soul bound to. As soon as the ten Rudras leave the body, the soul also leaves the body. He has been called Rudra because he makes people cry. Shakalya asked, ‘And who is Aditya?’ Yajnavalkya replied, ‘There are twelve months in Samvatsara, these are the Adityas. He is called Aditya because he accepts everyone and moves around. Shakalya then asked, ‘Who are Indra and Prajapati?’ Yajnavalkya said, ‘Stanayitnu is Indra and Yagya is Prajapati.’ Thus there are eight Vasus, twelve Adityas, eleven Rudras and thirty-three crore gods including Indra and Prajapati. Some scholars count two Ashwani Kumars among the thirty-three crore gods in place of Indra and Prajapati.

Another name of sage Shakalya, Vidagdha, is also found in ‘Shatapatha Brahmana’. He was the first to correct the text of Rigveda and introduced the method of memorizing the verses separately by breaking the joints of the sentences. According to ‘Skanda Purana’, Pandya King Shankar had killed him along with his wife under the influence of a tiger. Shakalya was the sabha pandit in the learned assembly of king Janak and he was the rival of Yajnavalkya.

Moon makes the mind both clean and dirty

मन को साफ और मैला दोनों बना देता है चंद्रमा

कुंडली में चंद्रमा के बारह भायों में क्या फल होते हैं ?

-अतुल्य वैभव, नोएडा (उ.प्र.)

प्रथम भाव : चंद्रमा कारक हो तो व्यक्ति आकर्षक होगा। घनी और दीर्घायु होगा। चंद्रमा मारक या नीच हो तो व्यक्ति गूंगा, बहरा, अंघा, पागल या जड़ बुद्धि हो सकता है। डिप्रेशन का शिकार भी हो सकता है।

दूसरा भाव : चंद्रमा कारक या उच्च का है तो व्यक्ति धनवान होगा। कलाकार भी हो सकता है। ऐसा व्यक्ति अपने कुटुंब के लिए बहुत भाग्यशाली होगा। द्वितीय भाव में चंद्रमा मारक है तो व्यक्ति की वाणी कठोर होगी। व्यक्ति भोग-विलासी हो सकता है।

तीसरा भाव : कारक चंद्रमा व्यक्ति को भाइयों का सुख देगा। बहादुर लेकिन कंजूस होगा। स्मरणशक्ति अच्छी होगी। चंद्रमा मारक हो तो भाइयों से कोई सहायता नहीं मिलती।

चतुर्थ भाव : चंद्रमा कारक है तो व्यक्ति सुखी होगा। माता का बहुत प्रेमी होगा। चंद्रमा मारक हो तो माता को बीमारी होगी। भवन या वाहन सुख में कमी रहेगी।

पंचम भाव : चंद्रमा कारक है तो व्यक्ति धनवान होगा। संतान सुख, मधुर भाषी होगा। चंद्रमा मारक है तो असफल प्रेम संबंध हंगि। संतान सुख में कमी। पेट का रोगी होगा।

छटा भाव : ऐसे व्यक्ति की पाचन शक्ति में दिक्कत होगी। मंदबुद्धि होगा। व्यवसाय में अड़चन और कानूनी मामलों में भी दिक्कत होगी।

सप्तम भाव : चंद्रमा कारक हो तो व्यक्ति व्यापार में बहुत लाभ कमाएगा। अगर चंद्रमा मारक है तो स्त्री सुख में कमी रहेगी। पार्टनरशिप में धोखा मिलेगा। ऐसा व्यक्ति वाद- विवाद में सफल हो सकता है।

अष्टम भाव: चंद्रमा कारक है तो ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान, रोगी, अल्पायु होगा। ऐसा जातक झूठ बोलने में बिलकुल नहीं झिझकेगा।

नवम भावः कारक चंद्रमा पिता-पुत्र के संबंध अच्छा रखेगा। व्यक्ति चतुर, पराक्रमी, भाग्यवान होगा। चंद्रमा मारक है तो व्यक्ति के भाग्य में रुकावट आएगी। पिता से संबंध अच्छे नहीं रहेंगे।

दशम भाव: चंद्रमा कारक है तो व्यक्ति धनी, बुद्धिमान होगा। ऐसा व्यक्ति राज्य में ऊंचे पद पर रहेगा। चंद्रमा मारक है तो व्यक्ति को काम- धंधे में सफलता नहीं मिलेगी।

एकादश भाव: चंद्रमा कारक है तो व्यक्ति दीर्घायु होगा। उसके घर में नौकर-चाकर रहेंगे। चंद्रमा मारक है तो अभावों से ग्रस्त रहेगा।

द्वादश भाव : चंद्रमा होने से व्यक्ति क्रूर, शेखीबाज, दुखी, क्रोधी व धोखेबाज होगा। चंद्रमा नीच का होकर बैठे तो व्यक्ति खूब रिश्वत लेता है। जेल योग भी बन सकता है

raksha bandhan 2023

Wed, 30 Aug, 2023

Raksha Bandhan 2023 Date and Muhrat Timing

Raksha Bandhan is celebrated every year with enthusiasm by people of all cultures alike. Raksha Bandhan 2023 date is 30th August, Wednesday. The Muhrat or the auspicious beginning of this year’s Raksha Bandhan is between 9:28 to 21:14 on the 11th August 2023.

Raksha Bandhan is a popular and traditionally Hindu annual rite or ceremony that is central to a festival of the same name celebrated in South Asia. It is also celebrated in other parts of the world significantly influenced by Hindu culture.

Prayer is related to the soul!

प्रार्थना का सम्बन्ध आत्मा से है!

“प्रार्थना” मनुष्य के मन की समस्त चँचलता एवं अनेक दिशाओं में बहकने वाली प्रवृत्तियों को केंन्द्रित कर एकाग्र करने वाले मानसिक व्यायाम का नाम है। चित्त की सारी भावनाओं को मन के केंद्र में एकत्र कर चित्त को दृढ़ करने की एक प्रणाली का नाम प्रार्थना है।

जब मनुष्य के मन में किसी प्रकार की इच्छा उत्पन्न होती है, वह संसार के व्यतिगत, समयानुसार, अशान्त हो जाता है, कोई आश्रय नहीं दृष्टिगोचर होता, तब सब प्रकार से विवश होकर वह शक्ति और साहस के एक कल्पित मार्ग से मन में इच्छाओं की स्थापना करके आश्रय तथा सहायक की खोज में अपने ही आन्तरिक जगत् में प्रवेश करता है।

उसके अंतःकरण में ईश्वर की अमित शक्ति, अद्भुत सामर्थ्य एवं अतुलित बल की एक आत्मशक्ति निवास करती है। इस मन की सृष्टि उसकी व्यक्तिगत श्रद्धा, आत्मविश्वास एवं आस्तिकता के बल पर निर्मित होती है।

यह उसके पिछले कर्मो के चित शुभ संँस्कारों का स्थूल स्वरूप है। उसके संँस्कार ज्यों-ज्यों परिवर्तित होते हैं, त्यों-त्यों यह मन का स्वभाव बदलता और पुनः निर्मित होता है। सर्वशक्ति सम्पन्न अध्यात्म मार्ग की प्रार्थना में हम आन्तरिक आत्मशक्ति की ओर उन्मुख होते हैं।

यहीं से एक प्रकार का ऐसा बल उत्साह प्राप्त होता है, जो मन में किसी गुप्त शक्तिशाली आत्मशक्ति के भण्डार को यकायक खोल देता है।मन की यह आन्तरिक गुप्त आत्मशक्ति शरीर के कण-कण में विराजमान है।

समय के मार्गदर्शक महाराज जी की असीम कृपा से प्रार्थना की सफलता से आशा की ज्योति जगमगा उठती है! जब उनके द्वारा आत्म बोध होता है तो उस आत्मा की शक्ति से मन आत्म विभोर हो उठता है! वहाँ से ऐसी शान्तिदायक विचार धाराएँ प्रस्फुटित होती हैं, जो जीव को प्रतिपल के लिय अभय और सावधान बना देती हैं।

इसीलिय तत्वदर्शी ज्ञानी सन्तों का कथन है कि प्रार्थना का सम्बन्ध मानव के परम पुनीत तत्व आत्मा से है।

आत्मा अनन्त शक्तिवान है, सर्वगुण सम्पन्न, निर्विकार, निर्लेप है। उसमें पवित्र शक्ति का अज्ञेय खजाना है। मन इसके समीप निवास करता है। मन अन्य सब अंँगों की अपेक्षा सूक्ष्म एवंँ शक्तिशाली है। वस्तुतः जिस समय मन की शक्तियाँ आत्मविश्वास से अन्तरमुखी एकाग्र हो जाती हैं, तब इस पर आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ता है, जो मन को अद्भुत सामर्थ्य से सम्पन्न कर देता है। आन्तरिक दैवी प्रेरणा प्राप्त करने का नाम ही “प्रार्थना” है।

असली शान्ति समर्पण भाव तो प्रार्थना से ही सम्भव है। यह प्रार्थना अन्दर के मंदिर में होती है जिसमें तत्वदर्शी महापुरुष के मार्गदर्शन की जरुरत होती है! इसलिय असली प्रार्थना का ज्ञान भी समय के महापुरुष ही कराते हैं!
जिसके लिय बताया गया कि –
परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती॥
मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा॥
वह दिन-रात परम प्रकाश रूप रहता है। उसको दीपक, घी और बत्ती कुछ भी नहीं चाहिए। फिर मोह रूपी दरिद्रता समीप नहीं आती और लोभ रूपी हवा उस मणिमय दीप को बुझा नहीं सकती!
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Three bitter laws of nature which are true….accept or not but cannot be changed, truth will remain true

प्रकृति के तीन कड़वे नियम जो सत्य है….स्वीकारे ना स्वीकारे पर बदले ना जा सके सत्य तो सत्य रहेगा

1- प्रकृति का पहला नियम यदि खेत में बीज न डालें जाएं तो कुदरत उसे घास-फूस से भर देती हैं !!…
ठीक उसी तरह से दिमाग में सकारात्मक विचार न भरे जाएँ तो नकारात्मक विचार अपनी जगह बना ही लेते हैं !!…

2- प्रकृति का दूसरा नियम जिसके पास जो होता है वह वही बांटता है !!….
सुखी सुख बांटता है,..
दुःखी दुःख बांटता है,..
ज्ञानी ज्ञान बांटता है,..
भ्रमित भ्रम बांटता है,..
भयभीत भय बांटता हैं !!….

3- प्रकृति का तीसरा नियम आपको जीवन से जो कुछ भी मिलें उसे पचाना सीखो क्योंकि भोजन न पचने पर रोग बढ़ते हैं…!
पैसा न पचने पर दिखावा बढ़ता है…!
बात न पचने पर चुगली बढ़ती है…!
प्रशंसा न पचने पर अंहकार बढ़ता है….!
निंदा न पचने पर दुश्मनी बढ़ती है…!
राज़ न पचने पर खतरा बढ़ता है…!
दुःख न पचने पर निराशा बढ़ती है…!
और सुख न पचने पर पाप बढ़ता है…!

Enlightenment alone pacifies all desires

आत्मज्ञान ही सब इच्छाओं को शान्त करता है……

कोई तन दुखी, कोई मन दुःखी, कोई चित उदास।
थोड़ा-थोड़ा सब दुःखी, सुखिया गुरु का दास।।

आज मनुष्य अपनी आवश्यकताओं से दुखी नहीं है
अपितु अपनी अनन्त इच्छाओं से वह सदैव दुःखी रहता है।
दुःख का मूल कारण हमारी आवश्कतायें नहीं, हमारी इच्छायें हैं।
हमारी आवश्यकतायें तो कभी पूर्ण भी हो सकती हैं मगर इच्छायें नहीं।
इच्छायें आज तक किसी की भी पूरी नहीं हो पाई हैं।
एक इच्छा पूरी होती है कि मन में दूसरी इच्छा का जन्म हो जाता है।
सुखी जीवन जीने का केवल एक ही रास्ता है
और वह है – अध्यात्म मार्ग की तरफ बढ़ना यानि आत्मज्ञान का अभ्यास करना!
आज हमारी स्थिति यह है कि जो हमें प्राप्त है उसका आनन्द तो हम लेते नहीं, वरन जो प्राप्त नहीं है उसका चिन्तन करके जीवन को दुःखमय बना लेते हैं।

वास्तव में, दुःख का मूल कारण हमारी आशा-अपेक्षा ही हैं।

हमें इस संसार में कोई दुःखी नहीं कर सकता, हमारी अपेक्षायें ही हमें रुलाती हैं।
अति इच्छा रखने वाले और असन्तोषी हमेशा दुःखी ही रहते हैं।
जिसकी इच्छायें सीमित हैं- उसके दुःख भी स्वतः ही सीमित अथवा कम हो जाते हैं।

सच्चाई यही है कि पूर्णरूप से आत्मिक सुख की प्राप्ति केवल समय के मार्गदर्शक महाराज जी के श्री चरणों से ही सम्भव है।
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दादू देव दयाल की, गुरू दिखाई बाट।
ताला कूँची लाइ करि, खोले सबै कपाट॥
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जय सच्चिदानन्द
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Gurupurnima is an eternal festival

गुरुपूर्णिमा है एक सनातन महापर्व

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा व व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन सारे शिष्य अपने गुरु के चरणों में समर्पित हो कर उनकी पूजा करते हैं और उनके द्वारा प्राप्त ज्ञान के लिए उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। द्वापर युग में इस दिन महर्षि व्यास जी का भी जन्म हुआ था और वे अपने समय के एक महान गुरु भी थे। उस समय से गुरु पूर्णिमा व्यास जयंती भी कही जाने लगीं। लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि महर्षि व्यास के बाद से ही गुरु पूर्णिमा मनाई जाने लगी।

याद रहे, सनातन धर्म के अन्य पर्वों की तरह गुरु पूर्णिमा भी सनातन काल से मनाई जाती रही है। होली दीवाली जैसे पर्वों की तरह इसका भी कोई एक कारण नहीं है। इस सनातन महापर्व की शुरुआत को किसी काल खंड से जोड़ना उचित नहीं। प्रत्येक सनातनी के लिए यह एक महान पर्व है और इसे इसी दिन मनाया जाना चाहिए।
हर हर महादेव।

  • शीलभद्र उपाध्याय

Kindness is the root of religion, pride is the root of sin

दया धर्म का मूल है,पाप मूल अभिमान

जब मनुष्य ज्ञान मार्ग से भटक जाता है।
तब मनुष्य अपने आप को सामान्य स्तर का न समझ कर असाधारण, विशेष बड़ा, महत्त्वपूर्ण समझने लगता है!
तभी उसे अन्दर “अभिमान” का अंँकुर फूट निकलता है जो दिनों दिन बढ़ता हुआ विशाल रूप धारण कर लेता है।
झूठी प्रशंँसा, उद्दन्डता, स्वेच्छाचार, शेखीखोरी से भी मनुष्य अपनी वस्तुस्थिति को न समझकर अभिमान के परों से उड़ने लगता है।

ऐसे लोगों के दिमाग की बागडोर अभिमान और इसे पोषण करने वाले तत्त्वों के हाथों में होती है।
अविवेकी, अज्ञानी, अदूरदर्शी, मोटी बुद्धि के लोग ही “अभिमान” से ग्रस्त होते देखे जाते हैं।
कुछ भी हो अभिमान वह विष की बेल है, जो जीवन की हरियाली, सौंदर्य, बुद्धि, विस्तार-विकास को रोक कर उसे सुखा देती है।

यह ऐसी विष बुझी दुधारी तलवार है,
जो अपने तथा दूसरों के जीवन में विनाश का सूत्र पात कर देती है।
अभिमान का स्वभाव ही दमन, शोषण, पतन, क्रूरता आदि है,
जिससे स्वयं व्यक्ति और उससे सम्बन्धित समाज प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।
किसी भी विषय तथा क्षेत्र में अभिमान हो जाने पर मनुष्य की प्रगति, विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।
विद्या का अभिमान हो जाने पर विद्या नहीं बढ़ती वरन वह घटती ही जाती है।
प्रशंँसा, प्रसिद्धि जिससे अभिमान को पोषण मिलता है, विकास-उन्नति का पथ भुला देती है।
अभिमान हमेशा प्रशंसा की गोद में पलता है!
एक बार न्यूटन से किसी ने कहा था- “आपने तो पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया।”
इस पर उस निरभिमानी वैज्ञानिक ने कहा- “मेरे सामने ज्ञान का अथाह समुद्र फैला पड़ा है जिसके किनारे के कुछ ही रज-कण मैं उठा पाया हूँ।”

एक ओर ऐसे व्यक्तियों की स्थिति पर तरस आता है जो बेचारे कहीं से कुछ पढ़-सुनकर, थोड़ा-बहुत अध्ययन कर अभिमान वश अपने आपको विद्या का धनी, पन्डित, विद्वान मान बैठते हैं।

अपनी विद्वत्ता, पाँडित्य की दुहाई देने वालों की स्थिति एक खोखले, पोले ढोल की तरह ही होती है जो अपनी होशियारी, अध्ययन शीलता का अभिमान रखने वाले विद्यार्थी दूसरों से पिछड़ जाते हैं क्योंकि अभिमान ही है जो *कला, विद्या, शक्ति, सामर्थ्य सभी क्षेत्रों में सफलता और प्रगति का मार्ग बन्द कर देता है।

समय के सदगुरु के मार्गदर्शन में चलने से ही मनुष्य दया, प्रेम व अपने कर्तव्य को समझ सकता है। महाराज जी आत्मज्ञान देकर मनुष्य अन्दर मानवता के बीज बोते हैं जहाँ अभिमान और अहंकार का कोइ स्थान नहीं होता!
कहा है –
अहंकार करना नहीं, बहुत बड़ी यह भूल।
धन, वैभव के संग सब, मिल जाता है धूल।।

एक बात यही सत्य है, मानुष माटी खंड।
माटी में ही मिल गया, रहता नहीं घमंड।।