मधुर व्यवहार

मधुर व्यवहार

एक राजा था। उसने एक सपना देखा। सपने में उससे एक परोपकारी साधु कह रहा था कि बेटा! कल रात को तुम्हें एक विषैला सांप काटेगा और उसके काटने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है। वह तुमसे पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेना चाहता है।

सुबह हुई, राजा सोकर उठा और सपने की बात अपनी आत्मरक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए? इसे लेकर विचार करने लगा। सोचते-सोचते राजा इस निर्णय पर पहुंचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया।

शाम होते ही राजा ने उस पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुंचाने की कोशिश न करें।

रात को सांप अपनी बांबी में से बाहर निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया। वह जैसे आगे बढ़ता गया, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख देखकर आनन्दित होता गया। कोमल बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का रसास्वादन करता हुआ, जगह-जगह पर मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता था।

इस तरह क्रोध के स्थान पर सन्तोष और प्रसन्नता के भाव उसमें बढ़ने लगे। जैसे-जैसे वह आगे चलता गया, वैसे ही वैसे उसका क्रोध कम होता गया। राजमहल में जब वह प्रवेश करने लगा तो देखा कि प्रहरी और द्वारपाल सशस्त्र खड़े हैं, परन्तु उसे जरा भी हानि पहुंचाने की चेष्टा नहीं करते।

यह असाधारण सी लगने वाले दृश्य देखकर सांप के मन में स्नेह उमड़ आया। सदव्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसे मंत्रमुग्ध कर लिया था। कहां वह राजा को काटने चला था, परन्तु अब उसके लिए अपना कार्य असंभव हो गया। हानि पहुंचाने के लिए आने वाले शत्रु के साथ जिसका ऐसा मधुर व्यवहार है, उस धर्मात्मा राजा को काटूं तो किस प्रकार काटूं? यह प्रश्न के चलते वह दुविधा में पड़ गया।

राजा के पलंग तक जाने तक सांप का निश्चय पूरी तरह से बदल गया। उधर समय से कुछ देर बाद सांप राजा के शयन कक्ष में पहुंचा। सांप ने राजा से कहा, राजन! मैं तुम्हें काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था, परन्तु तुम्हारे सौजन्य और सदव्यवहार ने मुझे परास्त कर दिया।

अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं, मित्र हूं। मित्रता के उपहार स्वरूप अपनी बहुमूल्य मणि मैं तुम्हें दे रहा हूं। लो इसे अपने पास रखो। इतना कहकर और मणि राजा के सामने रखकर सांप चला गया।

शिक्षा:-

यह महज कहानी नहीं जीवन की सच्चाई है। अच्छा व्यवहार कठिन से कठिन कार्यों को सरल बनाने का उपाय रखता है। यदि व्यक्ति का व्यवहार कुशल है तो वो सब कुछ पा सकता है जो पाने की वो हार्दिक इच्छा रखता है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

दो खरगोश

दो खरगोश

एक बार की बात है, दो खरगोश थे. एक का नाम वाईजी था और दूसरे का नाम फूली। वाईजी अपने नाम के अनुसार वाइज यानी बुद्धिमान था और फूली अपने नाम के अनुरूप फूलिश यानी बेवकूफ था।
दोनों में गहरी दोस्ती थी. एक दिन उन्हें गाजर खाने का बड़ा मन किया और वे फ़ौरन इनकी खोज में निकल पड़े।

कुछ दूर चलने पर उन्हें अगल-बगल लगे दो गाजर दिखे. एक गाजर के ऊपर बड़े-बड़े पत्ते लगे थे जबकि दूसरे के पत्ते काफी छोटे थे।

फूली बिना देर किये बड़े पत्तों वाले गाजर के पास दौड़ा और उसे उखाड़ते हुए कहने लगा, “ये वाला मेरा है… ये वाला मेरा है…”

वाईजी उसकी इस हरकत को देख कर मुस्कुराया और बोला, “ठीक है भाई तुम उसे ले लो मैं ये बड़ा वाला ले लेता हूँ?”

और जब उसने गाजर उखाड़ा तो सचमुच वो फूली के गाजर से बड़ा था.

यह देख कर फूली को बड़ा आश्चर्य हुआ, वह बोला, “लेकिन मेरे गाजर के पत्ते तो काफी बड़े थे!”

“तुम गाजर के पत्ते देखकर उसकी साइज़ का अनुमान नहीं लगा सकते!”, वाईजी ने समझाया।

गाजर चट कर दोनों दोस्त आगे बढ़ गए।

थोड़ी दूरी पर उन्हें फिर से दो गाजर दिखाई दिए।

फूली बोला, “जाओ इस बार तुम पहले अपना गाजर चुन लो।

वाईजी बारी-बारी से दोनों गाजरों के पास गया और सावधानी से उन्हें देखने लगा…. उसने उनके पत्ते छुए और कुछ देर सूंघने के बाद बड़े पत्ते वाला गाजर ही चुन लिया।

“ये क्या तुमने इस बार छोटा गाजर क्यों चुन लिया.” फूली बोला।

“मैंने छोटा नहीं बड़ा गाजर ही चुना है!” वाईजी ने जवाब दिया।

और सचमुच इस बार भी वाईजी का ही गाजर बड़ा था.

फूली कुछ नाराज़ होते हुए बोला, “लेकिन तुमने तो कहा था कि जिसके पत्ते बड़े होते हैं वो गाजर छोटा होता है!”

“ना-ना, मैंने तो बस इतना कहा था कि तुम गाजर के पत्ते देखकर उसकी साइज़ का अनुमान नहीं लगा सकते! कोई भी चुनाव करने से पहले सोच-विचार करना ज़रूरी है.” वाईजी बोला.

फूली ने हामी भरी और फिर दोनों ने गाजर के मजे उठाये और आगे बढ़ गए…

तीसरी बार भी उन्हें दो अलग-अलग साइज़ की पत्तियों वाले गाजर दिखे.

फूली कुछ कन्फ्यूज्ड दिख रहा था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे. तभी वाईजी ने उससे कहा कि पहले वो अपना गाजर चुन सकता है.

बेचारा फूली धीरे-धीरे आगे बढ़ता है और गाजरों का निरिक्षण करने का दिखावा करता है, उसे समझ नहीं आता कि कौन सा गाजर चुने. वह मायूस हो वाईजी की ओर देखता है.

वाईजी मुस्कुराता है और कूद कर गाजरों के पास पहुँच जाता है. वह उन्हें सावधानी से देखता है और फिर एक गाजर उखाड़ लेता है.

फूली चुप-चाप दूसरे गाजर की ओर बढ़ने लगता है, तभी वाईजी उसे रोकते हुए कहता है, “नहीं, फूली, ये वाला गाजर तुम्हारा है.”

“लेकिन इसे तो तुमने चुना है और ये ज़रूर दूसरे वाले से बड़ा होगा. मुझे नहीं पता तुम ये कैसे करते हो, शायद तुम मुझसे अधिक बुद्धिमान हो.” फूली उदासी भरे शब्दों में बोला.

इस पर वाईजी ने उसका हाथ थामते हुए कहा-

फूली, उस बुद्धी का क्या लाभ जिससे मैं अपने दोस्त की मदद ना कर सकूँ… तुम मेरे दोस्त हो और मैं चाहता हूँ कि तुम ये गाजर खाओ. एक बुद्धिमान खरगोश जिसका पेट भरा हो पर उसका कोई दोस्त ना हो…क्या सचमुच बुद्धिमान कहलायेगा?

“सही कहा!”, फूली ने उसे गले लगाते हुए कहा.

और फिर दोनों दोस्त गाजर खाते-खाते अपने घरों को लौट गए।

💐💐 शिक्षा 💐💐

दोस्तों, ईश्वर ने हमें जो भी कला दी हैं उनका सही इस्तेमाल इसी में है कि वे औरों की मदद में काम आयें. सिर्फ अपने फायदे के लिए काम करने वाले लोगों के पास पैसा हो सकता है…प्रसन्नता नहीं! इसलिए अगर कोई ऐसा है जिसकी लाइफ आपकी मदद से बेहतर बन सकती है तो उसकी मदद ज़रूर करिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

परोपकार

परोपकार

एक युवक था! उस को जीवन से बड़ी ख्वाहिशें थीं! उसे लगता था कि उसे बचपन में वह सब नहीं मिल सका; जिसका वह हकदार था!

बचपन निकल गया! किशोरावस्था में आया! वहां भी उसे बहुत कुछ अधूरा ही लगा! उसे महसूस होता कि उसकी बहुत सारी इच्छाएं पूरी नहीं हो सकीं! उसके साथ न्याय नहीं हुआ!

इसी असंतोष की भावना में युवा हो गया! उसे लगता था – जब वह अपने पैरों पर खड़ा होगा तो वह अपनी सारी इच्छाएं पूरी करेगा!
वह अवस्था भी आएगी! पर उसकी इच्छाएं इतनी ज्यादा थीं कि लाख कोशिशों पर भी वह पूरा नहीं कर पा रहा था!

वह युवक बेचैन रहने लगा! इसी बीच किसी सत्संगी के संपर्क में आया और उसे वैराग्य हो गया! वह स्वभाव से और कर्म दोनों से संत हो गया! संत होने से उसे किसी चीज की लालसा ही न रही!

जिन संत की संगति से उसमें वैराग्य आया था – वह लगातार भगवान की भक्ति में लगे रहते! उनकी इच्छाएं बहुत थोड़ी थीं! वह पूरी हो जातीं तो वह योग, साधना और यज्ञ-हवन करते!

इस युवक में भी वह संत के गुण आ गए! अब वह भी संत हो गया! इससे उसे मानसिक सुख मिलने लगा और उसमें दैवीय गुण भी आने लगे! अब वह भी एक बार वह ईश्वर की लंबी साधना में बैठ गया!

इनकी साधना से एक देवता प्रसन्न हो गए! उन्होंने दर्शन दिए और कोई इच्छित वरदान मांगने को कहा! संत ने कुछ पल सोचा फिर देवता से बोले कि मुझे कुछ भी नहीं चाहिए!

देवता ने प्रश्न किया- जहां तक मैं जानता हूं; आपकी ज्यादातर आकांक्षाएं पूरी ही न हो सकी हैं!

इस पर संत ने कहा- जब मेरे मन में इच्छाएं थीं तब तो कुछ मिला ही नहीं! अब कुछ नहीं चाहिए तो आप सब कुछ देने को तैयार है! आप प्रसन्न हैं यही काफी है! मुझे कुछ नहीं चाहिए!

देवता मुस्कुराने लगे! उन्होंने कहा- इच्छा पर विजय प्राप्त करने से ही आप महान हुए!
भगवान और आपके बीच की एक ही बाधा थी- आपकी अनंत इच्छाएं!

जब आपने अपनी उस बाधा को खत्म कर दिया तो आप पवित्र हुए! मुझे स्वयं परमात्मा ने आपके भेजा है! इस लिए आप कुछ न कुछ स्वीकार करके हमारा मान अवश्य रखें!

संत ने बहुत सोच-विचारकर कहा- मुझे वह शक्ति दीजिए कि यदि मैं किसी बीमार व्यक्ति को स्पर्श कर दूं तो वह भला-चंगा हो जाए! किसी सूखे वृक्ष को छू दूं तो उसमें जान आ जाए!

देवता ने कहा- आप जैसा चाहते हैं वैसा ही होगा! ऐसा वरदान देकर देवता चलने को हुए तो संत ने कहा- रुकिए, मैं अपना विचार बदल रहा हूं!

देवता को लगा कहीं क्या इसमें फिर से लालसा पैदा हो गईं? उन्होंने कहा- अब क्या विचार किया है, बताएं? आपको एक अवसर विचार बदलने का मैं देता हूं!

संत ने कहा- मैं अपने वरदान में संशोधन चाहता हूं! मैंने आपसे मांगा कि यदि मैं बीमार व्यक्ति को छूं दूं तो उसे स्वास्थ्य लाभ हो जाए! सूखे वृक्ष को छूं दूं तो हरा भरा हो जाए!

अब मैं इस वरदान में एक संशोधन यह चाहता हूं कि रोगी और वृक्ष का कल्याण मेरे छूने से नहीं मेरी छाया पड़ने ही होने लगे और मुझे इसका पता भी न चले!

देवता को बड़ा आश्चर्य हुआ! उन्होंने पूछा- क्या आप ऐसा इसलिए मांग रहे हैं क्योंकि आप किसी मलिन या बीमार को स्पर्श करने से बचना चाहते हैं?

संत ने कहा- ऐसा बिल्कुल नहीं है! रोगी या मलिन व्यक्ति से दूर रहने के लिए नहीं; मैं ऐसा मांग रहा! मैं नहीं चाहता कि संसार में यह बात फैले कि मेरे स्पर्श करने से लोगों को लाभ होता है!

एक बार यह बात फैली तो फिर संसार में मुझे लोग एक चमत्कारिक शक्तियों वाला सिद्ध प्रचारित कर देंगे! मैं लोगों का कल्याण तो चाहता हूं लेकिन उस कल्याण के साथ मेरी प्रसिद्धि हो यह नहीं चाहता!

देवता ने प्रश्न किया- पर आप ऐसा क्यों चाहते हैं! इससे क्या नुकसान हो सकता है!

संत बोले- शक्ति का अहसास मन को मलिन करके कुच्रकों की रचना शुरू करता है चाहे वह कोई दैवीय सिद्धि ही हो क्यों न हो! यदि प्रचार शुरू हुआ और मेरे मन में श्रेष्ठता का अभिमान होने लगा तो फिर यह वरदान मेरे लिए शाप बन जाएगा! इससे तो अच्छा है कि लोगों का कल्याण चुपचाप ही हो जाए! न मुझे पता चलेगा न अभिमान की संभावना रहेगी!

देवता प्रसन्न हो गए! उन्होंने कहा- परमात्मा ने ऐसे वरदान के लिए सर्वथा योग्य व्यक्ति का चयन किया है! आपकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी!

यह सच है कि जब हमारी किसी चीज के लिए बहुत ज्यादा इच्छा होती है तब वह वस्तु आसानी से नहीं मिलती! लालसा घटते ही वह सरलता से उपलब्ध होने लगती है!

बहुत ज्यादा इच्छाएं मानसिक अशांति का कारण बनती हैं! परोपकार का भाव रखना बहुत अच्छा है लेकिन उस परोपकार के बदले उपकार का भाव रखना लालसा है!

लालसा आते ही परोपकार का आपका सामर्थ्य कम होता है! आजमाई हुई बात है! ध्यान से सोचिए, सत्य लगेगा!

परमात्मा मनुष्य की तरह-तरह से परीक्षा लेते हैं! किसी दिन परमात्मा ने सच में कोई दैवीय शक्ति देने का मन बना लिया तो इस कथा को याद रखिएगा!

परमात्मा उसी को चमत्कारी शक्तियां देते हैं जो इसका प्रयोग स्वार्थ के लिय नहीं बल्कि परमार्थ के लिए करता है।

सच्ची प्रार्थना

सच्ची प्रार्थना
एक पंडित जी समुद्री जहाज से यात्रा कर रहे थे। रास्ते में एक रात तुफान आने से जहाज को एक द्वीप के पास लंगर डालना पडा,
सुबह पता चला कि रात आये तुफान में जहाज में कुछ खराबी आ गयी है, जहाज को एक दो दिन वहीं रोक कर उसकी मरम्मत करनी पडेगी!

पंडित जी ने सोचा क्यों ना एक छोटी बोट से द्वीप पर चल कर घूमा जाये!
अगर कोई मिल जाये तो उस तक प्रभु का संदेश पहँचाया जाय और उसे प्रभु का मार्ग बता कर प्रभु से मिलाया जाये!

तो वह जहाज के कैप्टन से इज़ाज़त ले कर एक छोटी बोट से द्विप पर गये!
वहाँ इधर उधर घूमते हुवे तीन द्वीपवासियों से मिले जो बरसों से उस सूने द्विप पर रहते थे पंडित जी उनके पास जा कर बातचीत करने लगे!

उन्होंने उनसे ईश्वर और उनकी आराधना पर चर्चा की उन्होंने उनसे पूछा- “क्या आप लोग अराधना करना चाहेंगे?

वे सब बोले- “हाँ!

फिर उन्होंने ने पूछा- “आप ईश्वर की आराधना कैसे करते हैं?”

उन्होंने बताया- “हम अपने दोनों हाथ ऊपर करके कहते हैं कि “हे ईश्वर हम आपके हैं! आपको याद करते हैं! आप भी हमें याद रखना”!

पंडित जी ने कहा- “यह प्रार्थना तो ठीक नहीं है!

एक ने कहा- “तो आप हमें सही प्रार्थना सिखा दीजिये!

उन्होंने उन सबों को धार्मिक पुस्तके पढना और प्रार्थना करना सिखाया!

तब तक जहाज बन गया और पंडित जी अपने सफर पर आगे बढ गये!

तीन दिन बाद पंडित जी ने जहाज के डेक पर टहलते हुवे देखा कि वह तीनो द्वीपवासी जहाज के पीछे-पीछे पानी पर दौडते हुवे आ रहे हैं!

उन्होने हैरान होकर जहाज रुकवाया और उन्हे ऊपर चढवाया। फिर उनसे इस तरह आने का कारण पूछा- “वे बोले – आपने हमें जो प्रार्थना सिखाई थी; हम उसे अगले दिन ही भूल गये! इसलिये आपके पास उसे दुबारा सीखने आये हैं! हमारी मदद कीजिये!
पण्डित जी ने कहा- “ठीक है, पर यह तो बताओ तुम लोग पानी पर कैसे दौड सके?”

उसने कहा- “हम आपके पास जल्दी पहुँचना चाहते थे सो हमने ईश्वर से विनती करके मदद माँगी!

और ईश्वर से कहा – “हे ईश्वर दौड तो हम लेगें; बस, आप हमें गिरने मत देना और हम सब दौड पडे!“

अब पंडित जी सोच में पड गये! उन्होने कहा- “आप लोग और ईश्वर पर आपका विश्वास धन्य है! आपको अन्य किसी प्रार्थना की आवश्यकता नहीं है! आप लोग पहले की तरह प्रार्थना करते रहें!

ये कहानी बताती है कि ईश्वर पर विश्वास, ईश्वर की आराधना प्रणाली से अधिक महत्वपूर्ण है!

इसीलिए कहा गया है कि –
विश्वासम फल दयाकम

संत कबीरदास ने भी कहा है –
“माला फेरत जुग गया,
फिरा ना मन का फेर!
कर का मन का डारि दे,
मनका-मनका फेर॥“

सच्चे भक्त के दिल से यही पुकार होनी चाहिए कि –
“हे ईश्वर!! दौड तो हम लेंगे, बस, आप हमें गिरने मत देना।
सुप्रभात

शरणागति

शरणागति
एक संत एक छोटे से आश्रम का संचालन करते थे।
एक दिन पास के रास्ते से एक राहगीर को रोककर अंदर ले आए और शिष्यों के सामने उससे प्रश्न किया कि यदि तुम्हें सोने की अशर्फियों की थैली रास्ते में पड़ी मिल जाए तो तुम क्या करोगे?

वह आदमी बोला – “तत्क्षण उसके मालिक का पता लगाकर उसे वापस कर दूंगा अन्यथा राजकोष में जमा करा दूंगा।”

संत हंसे और राहगीर को विदा कर शिष्यों से बोले – “यह आदमी मूर्ख है।”

शिष्य बड़े हैरान कि गुरुजी क्या कह रहे हैं? इस आदमी ने ठीक ही तो कहा है तथा सभी को ही यह सिखाया गया है कि ऐसे किसी परायी वस्तु को ग्रहण नहीं करना चाहिए।

थोड़ी देर बाद फिर संत किसी दूसरे को रोककर अंदर ले आए और उससे भी वही प्रश्न दोहरा दिया।

उस दूसरे राहगीर ने उत्तर दिया कि क्या मुझे निरा मूर्ख समझ रखा है, जो स्वर्ण मुद्राएं पड़ी मिलें और मैं लौटाने के लिए मालिक को खोजता फिरूं? तुमने मुझे समझा क्या है?

वह राहगीर जब चला गया तो संत ने कहा – “यह व्यक्ति शैतान है।

शिष्य बड़े हैरान हुए कि पहला मूर्ख और दूसरा शैतान, फिर गुरुजी चाहते क्या हैं?

अबकी बार संत तीसरे राहगीर को अंदर ले आए और वही प्रश्न दोहराया।

राहगीर ने बड़ी सज्जनता से उत्तर दिया- “महाराज! अभी तो कहना बड़ा मुश्किल है।

इस चाण्डाल मन का क्या भरोसा, कब धोखा दे जाए?
एक क्षण की खबर नहीं।

“यदि परमात्मा की कृपा रही और सद्बुद्धि बनी रही तो लौटा दूंगा।”

संत खुश होकर बोले कि –
” यह आदमी सच्चा है। इसने अपनी डोर परमात्मा को सौंप रखी है। ऐसे व्यक्तियों द्वारा कभी गलत निर्णय नहीं होता।

लेकिन जिनका मन शान्त नहीं है, जो इच्छाओं के पीछे भागते हैं – वह सबकुछ होने के बावजूद भी शान्ति को नहीं पाते।

ज्येष्ठ पांडव – सूर्यपुत्र कर्ण – कर्म, धर्म का भी ज्ञाता – क्या कारण था कि – अपने छोटे भाई अर्जुन से हार गया?

जबकि कर्म और धर्म दोनों में वो अर्जुन से कम नहीं था!

कारण यही था कि अर्जुन ने अपनी घर से निकलने से पहले ही अपनी जीवन रथ की डोरी भगवान श्री कृष्ण के हाथ में दे रखी थी! उसने अक्षणी सेना के बदले केवल कृष्ण को मांगा!

भगवान हमेशा से शरणागत की रक्षा करते हैं!

काल की चेतावनी !!

एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था और वह सोचता था कि मेरी किसी भी क्षण मृत्यु हो सकती है। वह करे तो क्या करे?
एक दिन उसे चतुराई सूझी और उसने काल को ही अपना मित्र बना लिया।

उसने अपने मित्र काल से कहा- मित्र! तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो- किसी दिन मुझे भी गाल में धर लोगे!

काल ने कहा:- ये मृत्यु लोक है। जो आया है उसे मरना ही है। सृष्टि का यह शाश्वत नियम है! इसलिए मैं मजबूर हूं पर तुम मित्र हो इसलिए मैं जितनी रियायत कर सकता हूं, करूंगा। मुझसे तुम क्या आशा रखते हो, साफ-साफ कहो।

व्यक्ति ने कहा- मित्र! मैं इतना ही चाहता हूं कि आप मुझे अपने लोक ले जाने के लिए आने से कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल- बच्चों को कारोबार की सभी बातें अच्छी तरह से समझा दूं और स्वयं भी भगवान भजन में लग जाऊं।

काल ने प्रेम से कहा- यह कौन सी बड़ी बात है – मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेज दूंगा और चिंता मत करो ये चारों पत्रों के बीच समय भी अच्छा खासा दूंगा। ताकि तुम सचेत होकर काम निपटा लो।

वह व्यक्ति बड़ा ही प्रसन्न हुआ। सोचने लगा कि आज से मेरे मन से काल का भय भी निकल गया! मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊंगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे।

दिन बीतते गये – आखिर मृत्यु की घड़ी आ पहुंची! काल अपने दूतों सहित उसके समीप आकर बोला- मित्र! अब समय पूरा हुआ – मेरे साथ चलिए। मैं सत्यता और दृढ़तापूर्वक अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए एक क्षण भी तुम्हें और यहां नहीं छोडूगा।

उस व्यक्ति के माथे पर बल पड़ गए! भृकुटी तन गयी और कहने लगा – धिक्कार है तुम्हारे जैसे मित्रों पर! मेरे साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती?” तुमने मुझे वचन दिया था कि आने से पहले पत्र लिखूंगा परंतु तुम तो बिना किसी सूचना के अचानक दूतों सहित मेरे ऊपर चढ़ आए। मित्रता तो दूर रही तुमने अपने वचनों को भी नहीं निभाया।

काल हंसा और बोला “मित्र इतना झूठ तो न बोलो। मैंने आपको एक नहीं चार पत्र भेजे – आपने एक भी उत्तर नहीं दिया।

उस व्यक्ति ने चौंककर पूछा, कौन से पत्र? कोई प्रमाण है? मुझे पत्र प्राप्त होने की कोई डाक रसीद आपके पास है? तो दिखाओ!
काल ने कहा मित्र, घबराओ नहीं, मेरे चारों पत्र इस समय आपके पास मौजूद हैं।

मेरा पहला पत्र आपके सिर पर चढ़कर बोला! आपके काले सुन्दर बाल, उन्हें सफ़ेद कर दिया और यह भी कहा कि सावधान हो जाओ, जो करना है कर डालो। लेकिन आपने मेरे संदेश को अनसुना करके बनावटी रंग लगा कर अपने बालों को फिर से काला कर लिया और पुनः जवान बनने के सपनों में खो गए आज तक मेरे श्वेत अक्षर आपके सिर पर लिखे हुए हैं।

कुछ दिन बाद मैंने दूसरा पत्र आपके नेत्रों के प्रति भेजा! नेत्रों की ज्योति मंद होने लगी। फिर भी आंखों पर मोटे शीशे चढ़ा कर आप जगत को देखने का प्रयत्न करने लगे! आपने दो मिनिट भी संसार की ओर से आंखे बंद करके, ज्योतिस्वरूप प्रभु का ध्यान मन में नहीं किया।

इतने पर भी सावधान नहीं हुए तो मुझे आपकी दीनदशा पर बहुत तरस आया और मित्रता के नाते मैंने तीसरा पत्र भी भेजा। इस पत्र ने आपके दांतो को छुआ, हिलाया और तोड़ दिया। आपने इस पत्र का भी जवाब न दिया बल्कि नकली दांत लगवाये और जबरदस्ती संसार के भौतिक पदार्थों का स्वाद लेने लगे।

मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं सदा इसके भले की सोचता हूँ और यह हर बार एक नया, बनावटी रास्ता अपनाने को तैयार रहता है।

अपने अन्तिम पत्र के रूप में मैंने रोग-क्लेश तथा पीड़ाओ को भेजा परन्तु आपने अहंकार वश सब अनसुना कर दिया।

वह व्यक्ति काल के भेजे हुए इन पत्रों के बारे में सुन कर फूट-फूट कर रोने लगा और अपने विपरीत कर्मो पर पश्चाताप करने लगा उसने स्वीकार किया कि मैंने गफलत में शुभ चेतावनी भरे इन पत्रों को नहीं पढ़ा। मैं सदा यही सोचता रहा कि कल से भगवान का भजन करूंगा, अपनी कमाई अच्छे शुभ कार्यो में लगाऊंगा, पर वह कल कभी भी नहीं आया।

काल ने कहा आज तक तुमने जो कुछ भी किया, राग-रंग, स्वार्थ और भोगों के लिए जान-बूझकर ईश्वरीय नियमों को तोड़कर तुमने कर्म किये। अब तुमको यह सब छोडकर चलना होगा!

उस व्यक्ति को जब कोई मार्ग दिखाई नहीं दिया तो उसने काल को करोड़ों की सम्पत्ति का लोभ दिखाया।

काल ने हंसकर कहा मित्र! यह मेरे लिए धूल से अधिक कुछ भी नहीं है। धन-दौलत, शोहरत, सत्ता ये सब लोभ संसारी लोगो को वश में कर सकता है मुझे नहीं।

कल ने समझया कि यदि तुम मुझे लुभाना ही चाहते थे तो सच्चाई और शुभ कर्मो का धन संग्रह करते यह ऐसा धन है जिसके आगे मैं विवश हो सकता था,अपने निर्णय पर पुनर्विचार को बाध्य हो सकता था पर तुम्हारे पास तो यह धन धेले भर का भी नहीं है। तुम्हारे ये सारे रूपए-पैसे, जमीन-जायदाद,तिजोरी में जमा धन-संपत्ति सब यहीं छूट जाएगा, मेरे साथ तुम भी उसी प्रकार निर्वस्त्र जाओगे जैसे कोई भिखारी की आत्मा जाती है।

अंततः काल ने जब मनुष्य की एक भी बात नहीं सुनी तो वह हाय-हाय करके रोने लगा। सभी सम्बन्धियों को पुकारा पर कोई उसका साथ नहीं दे सका!

इस प्रकार काल ने उसके प्राण पकड़ लिए और चल पड़ा अपने गन्तव्य की ओर।

यह कथा हम सबके लिय भी लागू होती हैं! हमारे पास भी वे चार पत्र (अल्टीमेटम) आ रहे हैं या आयेंगे और हम अभी भी गफलत की नीद में उन संदेशों को अन्देखा करते रहते हैं! भूल जाते हैं कि हमको अविनाशी से जितनी जल्दी हो जुड़ जाना चाहिय!
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
हमको याद दिलाने के लिय समय के सदगुरु आते हैं! वे हमारे और अविनाशी के बीच ज्ञान का पुल बनाते हैं! हमें समय समय पर आगाह भी करते हैं कि इस पुल पर बने रहना! नीचे भवसागर की नदी में मत कूदना! क्योंकि वे हमें अनन्त के साथ मिला देना चाहते हैं! अजर-अमर बना देना चाहते हैं!
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

वास्तव में एक यही कटुसत्य है – जो अटल है – वह है कि हम एक दिन मरेेंगे जरूर! हम जीवन में कितनी दौलत जमा करेंगे, कितनी शोहरत पाएंगे, कैसी संतान होगी यह सब अनिश्चित होता है- समय के गर्भ में छुपा होता है। परंतु हम मरेगे एक दिन बस यही एक ही बात जन्म के साथ ही तय हो जाती है। समय के साथ उम्र की निशानियों को देख कर तो कम से कम हमें प्रभु परमेश्वर की याद में रहने का अभ्यास करना चाहिए। कम से कम समय के सदगुरु के इशारों को समझना चाहिय!

बहुत ही सौभाग्य की बात है कि आज हमको श्री प्रेम रावत जी के दर्शनों का एक मौका मिलने वाला है! हमें उनके सानिध्य के पलों का बेसब्री से इंतजार है! जो भी आज का सन्देश होगा आपके साथ कल शेयर करेंगे!

जीवन में संतुलन

जीवन में संतुलन

एक कालेज का छात्र था जिसका नाम था – रवि। वह हमेशा बहुत चुपचाप सा रहता था। किसी से ज्यादा बात नहीं करता था!

इसलिए उसका कोई दोस्त भी नहीं था। वह हमेशा कुछ परेशान सा रहता था। पर लोग उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।

एक दिन वह क्लास में पढ़ रहा था। उसे गुमसुम बैठे देख कर अध्यापक महोदय उसके पास आये और क्लास के बाद मिलने को कहा।

क्लास खत्म होते ही रवि अध्यापक महोदय के कमरे में पहुंचा।

रवि मैं देखता हूँ कि तुम अक्सर बड़े गुमसुम और शांत बैठे रहते हो, ना किसी से बात करते हो और ना ही किसी चीज में रूचि दिखाते हो। इसलिए इसका सीधा असर तुम्हारी पढ़ाई में भी साफ नजर आ रहा है! इसका क्या कारण है ?” अध्यापक महोदय ने पूछा।

रवि बोला, मेरा भूतकाल का जीवन बहुत ही खराब रहा है, मेरी जिन्दगी में कुछ बड़ी ही दुखदायी घटनाएं हुई हैं, मैं उन्ही के बारे में सोच कर परेशान रहता हूँ, और किसी चीज में ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता हूँ।

अध्यापक महोदय ने ध्यान से रवि की बातें सुनी और मन ही मन उसे फिर से सही रास्ते पर लाने का विचार करके *रविवार को घर पर बुलाया।

रवि निश्चित समय पर अध्यापक महोदय के घर पहुँच गया।

रवि क्या तुम नीबू शरबत पीना पसंद करोगे? अध्यापक ने पूछा।

जी। रवि ने झिझकते हुए कहा।

अध्यापक महोदय ने नीम्बू शरबत बनाते वक्त जानबूझ कर नमक अधिक डाल दिया और चीनी की मात्रा कम ही रखी।

शरबत का एक घूँट पीते ही रवि ने अजीब सा मुंह बना लिया।

अध्यापक महोदय ने पूछा, क्या हुआ, तुम्हे ये पसंद नहीं आया क्या?

जी, वो इसमे नमक थोड़ा अधिक पड़ गया है…. रवि अपनी बात कह ही रहा था कि अध्यापक महोदय ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा, ओफ़-ओ, कोई बात नहीं मैं इसे फेंक देता हूँ, अब ये किसी काम का नहीं रहा!

ऐसा कह कर अध्यापक महोदय गिलास उठा ही रहे थे कि रवि ने उन्हें रोकते हुए कहा, नमक थोड़ा सा अधिक हो गया है तो क्या, हम इसमें थोड़ी और चीनी मिला दें तो ये बिलकुल ठीक हो जाएगा।

बिलकुल ठीक, रवि यही तो मैं तुमसे सुनना चाहता था…. अब इस स्थिति की तुम अपनी जिन्दगी से तुलना करो! शरबत में नमक का ज्यादा होना जिन्दगी में हमारे साथ हुए बुरे अनुभव की तरह है!

और अब इस बात को समझो, शरबत का स्वाद ठीक करने के लिए हम उसमे में से नमक नहीं निकाल सकते!
इसी तरह हम अपने साथ हो चुकी दुखद घटनाओं को भी अपने जीवन से अलग नहीं कर सकते पर जिस तरह हम चीनी डाल कर शरबत का स्वाद ठीक कर सकते हैं – उसी तरह पुरानी कड़वाहट और दुखों को मिटाने के लिए जिन्दगी में भी अच्छे अनुभवों की मिठास घोलनी पड़ती है।

यदि तुम अपने अतीत का ही रोना रोते रहोगे तो ना तुम्हारा वर्तमान सही होगा और ना ही भविष्य उज्ज्वल हो पाएगा। अध्यापक महोदय ने अपनी बात पूरी की।

रवि को अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था! उसने मन ही मन एक बार फिर अपने जीवन को सही दिशा देने का प्रण लिया।

अक्सर बंद होते हुए दरवाजे की तरफ इतनी देर तक देखते रहते हैं कि हमें खुलते हुए अच्छे दरवाजों की भनक तक नहीं लगती और हमारा जीवन दुखों के सागर में ही डूबा रह जाता है!
जरुरी है कि हम अपनी पुरानी गलतियों या फिर तकलीफ़ों को भूलना सीखें और जिंदगी को फिर से नयी दिशा की और मोड़ें।
इसलिए –
सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

नदी का घमंड

नदी का घमंड

एक बार नदी ने समुद्र से बड़े ही गर्वीले शब्दों में कहा बताओ पानी के प्रचंड वेग से मैं तुम्हारे लिए  क्या बहा कर लाऊं ? तुम चाहो तो मैं पहाड़, मकान, पेड़, पशु, मानव आदि सभी को उखाड़ कर ला सकती हूं ।

समुद्र समझ गया कि नदी को अहंकार आ गया है । उसने कहा, यदि मेरे लिए कुछ लाना ही चाहती हो तो थोड़ी सी घास उखाड़ कर ले आना । समुद्र की बात सुनकर नदी ने कहा, बस, इतनी सी बात ! अभी आपकी सेवा में हाजिर कर देती हूं । नदी ने अपने पानी का प्रचंड प्रवाह घास उखाड़ने के लिए लगाया परंतु घास नहीं उखड़ी । नदी ने हार नहीं मानी और बार-बार प्रयास किया पर घास बार-बार पानी के वेग के सामने झुक जाती और उखड़ने से बच जाती । नदी को सफलता नहीं मिली ।

थकी हारी निराश नदी समुंद्र के पास पहुंची और अपना सिर झुका कर कहने लगी, मैं मकान, वृक्ष, पहाड़, पशु, मनुष्य आदि बहाकर ला सकती हूं परंतु घास उखाड़ कर नहीं ला सकी क्योंकि जब भी मैंने प्रचंड वेग से खास पर प्रहार किया उसने झुककर अपने आप को बचा लिया और मैं ऊपर से खाली हाथ निकल आई ।

नदी की बात सुनकर समुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा, जो कठोर होते हैं वह आसानी से उखड़ जाते हैं लेकिन जिसने घास जैसी विनम्रता सीख ली हो उसे प्रचंड वेग भी नहीं अखाड़ सकता । समुद्र की बात सुनकर नदी का घमंड भी चूर चूर हो गया ।

विनम्रता अर्थात् जिसमें लचीलापन है, जो आसानी से मुड़ जाता है, वह टूटता नहीं । नम्रता में जीने की कला है, शौर्य की पराकाष्ठा है । नम्रता में सर्व का सम्मान संचित है । नम्रता हर सफल व्यक्ति का गहना है । नम्रता ही बड़प्पन है । दुनिया में बड़ा होना है तो नम्रता को अपनाना चाहिए । संसार को विनम्रता से जीत सकते हैं । ऊंची से ऊंची मंजिल हासिल कर लेने के बाद भी अहंकार से दूर रहकर विनम्र बने रहना चाहिए ।

विनम्रता के अभाव में व्यक्ति पद में बड़ा होने पर भी घमंड का ऐसा पुतला बनकर रह जाता है जो किसी के भी सम्मान का पात्र नहीं बन पाता । स्थान कोई भी हो, विनम्र व्यक्ति हर जगह सम्मान हासिल करता है । जहां विरोध हो जहां प्रतिरोध और बल से काम नहीं चल सकता । विनम्रता से ही समस्याओं का हल संभव है । विनम्रता के बिना सच्चा स्नेह नहीं पाया जा सकता । जो व्यक्ति अहं कार और वाणी की कठोरता से बचकर रहता है वही सर्वप्रिय बन जाता है ।

परिवार से जुड़े रहे – जोड़ते रहे 🙏💐

अहँकार और विनम्रता

अहँकार और विनम्रता

एक बार नदी ने समुद्र से बड़े ही अहंकारी शब्दों में कहा, बताओ पानी की प्रचंँड वेग से मैं तुम्हारे लिए क्या बहा कर लाऊंँ? तुम चाहो तो मैं पहाड़, मकान, पेड़, पशु, मानव आदि सभी को उखाड़ कर ला सकती हूंँ।

समुद्र समझ गया कि नदी को अहंकार आ गया है। उसने कहा, यदि मेरे लिये कुछ लाना ही चाहती हो तो थोड़ी सी घास उखाड़ कर ले आना।

समुद्र की बात सुनकर नदी ने कहा, बस, इतनी सी बात ! अभी आपकी सेवा में हाजिर कर देती हूंँ।

नदी ने अपने पानी का प्रचन्ड प्रवाह घास उखाड़ने के लिये लगाया परन्तु घास नहीं उखड़ी। नदी ने हार नहीं मानी और बार-बार प्रयास किया पर घास बार-बार पानी बहाव के सामने झुक जाती और उखड़ने से बच जाती। नदी को सफलता नहीं मिली। थकी हारी निराश नदी समुद्र के पास पहुंँची और अपना सिर झुका कर कहने लगी, मैं मकान बृक्ष, पहाड़, पशु, मनुष्य आदि बाहर कर ला सकती हूंँ परन्तु घास उखाड़कर नहीं ला सकी क्योंकि जब भी मैंने प्रचन्ड वेग से घास पर प्रहार किया उसने झुककर अपने आप को बचा लिया और मैं ऊपर से खाली हाथ निकल आयीं।

नदी की बात सुनकर समुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा, जो कठोर होते हैं वह आसानी से उखड़ जाते हैं लेकिन जिसने घास जैसी विनम्रता सीख ली हो उसे प्रचन्ड पानी का वेग भी नहीं उखाड़ सकता।

समुद्र की बात सुनकर नदी का घमन्ड भी चूर-चूर हो गया।

इसलिए ज्ञान मार्ग में विनम्रता अर्थात जिसमें लचीलापन है, जो आसानी से मुड़ जाता है, वह टूटता नहीं। जिसमें नम्रता में जीने की कला है, शौर्य की पराकाष्ठा है – वही आनन्द प्राप्त करता है!
क्योंकि नम्रता में सबका सम्मान संँचित है। नम्रता हर सफल व्यक्ति का गहना है।नम्रता ही बड़प्पन है।

अगर दुनिया में बड़ा होना है तो नम्रता को अपनाना चाहियें। संँसार को विनम्रता से ही जीत सकते हैं। उँची से ऊँची मंँजिल हासिल कर लेने के बाद भी अहंकार से दूर रहकर विनम्र बने रहना चाहिये।

विनम्रता के अभाव में व्यक्ति पद में बड़ा होने पर भी घमन्ड का ऐसा पुतला बनकर रह जाता है जो किसी के भी सम्मान का पात्र नहीं बन पाता। स्थान कोई भी हो, विनम्र व्यक्ति हर जगह सम्मान हासिल करता है।

जहांँ विरोध हो, जहांँ प्रतिरोध और बल से काम नहीं कर सकता। विनम्रता से ही समस्याओं का हल सम्भव है। विनम्रता के बिना सच्चा स्नेह नहीं पाया जा सकता है। जो व्यक्ति अहंँकार और वाणी की कठोरता से बचकर रहता है वही सर्वोपरि बन जाता है।
गुरु दरबार में भी विनम्रता से ही ज्ञान समझ में आता है।

क्रोध और नियंत्रण

क्रोध और नियंत्रण

एक समय की बात है। एक राजा घने जंगल में भटक गया। कई घंटों के बाद वह प्यास से व्याकुल होने लगा। तभी उसकी नजर एक वृक्ष पर पड़ी जहां एक डाली से टप-टप करती पानी की छोटी-छोटी बूंदें गिर रही थीं… राजा ने पत्तों का दोना बनाकर पानी इकट्ठा किया, राजा जैसे ही पानी पीने लगा।

एक तोता आया और झपट्टा मार दोने को गिरा दिया। राजा ने सोचा पंछी को प्यास लगी होगी इसलिए वह भी पानी पीना चाहता था लेकिन गलती से उसने झपट्टा मारकर पानी को गिरा दिया…

यह सोचकर राजा फिर से खाली दोने को भरने लगा, काफी देर के बाद वह दोना फिर भर गया। राजा ने हर्षचित्त होकर जैसे ही दोने को उठाया तो तोते ने वापस उसे गिरा दिया।

राजा को बहुत तेज गुस्सा आया और उसने चाबुक उठाकर तोते पर वार किया और उसके प्राण निकल गए…

राजा ने सोचा अब मैं शांति से पानी इकट्ठा कर अपनी प्यास बुझा पाऊंगा। यह सोचकर वह डाली के पास वापस पानी इकट्ठा होने वाली जगह पहुंचा तो उसके पांव के नीचे की जमीन खिसक गई…

उस डाली पर एक जहरीला सांप सोया हुआ था और उस सांप के मुंह से लार टपक रही थी। राजा जिसको पानी समझ रहा था वह सांप की जहरीली लार थी… राजा का मन ग्लानि से भर गया। उसने कहा काश मैंने संतों के बताए उत्तम क्षमा मार्ग को धारण कर क्रोध पर नियंत्रण किया होता तो… मेरे हितैषी निर्दोष पक्षी की जान नहीं जाती..!!

शिक्षा:-

जल्दबाजी और बिना सोचे-विचारे किया काम हमेशा परेशानी और पश्चाताप का कारण बनता है..!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।