सम्बन्ध- स्वार्थ के!

सम्बन्ध- स्वार्थ के!
एक बूढ़ा मर रहा था। मरा नहीं था, बस मर ही रहा था।

उसके चार बेटे उसके पास ही खड़े थे।
उनके नाम थे- सोम, मंगल, बुध, वीर। वह चाहता तो सात बेटे था, पर मंहगाई के चलते चार पर ही संतोष कर लिया था।

ये चारों बेटे आपस में अपने पिता की अंतिम यात्रा की तयारी कर रहे थे –

पहला बेटा सोम सलाह देता है कि, भाई! जब पिताजी मर जाएँगे तो उनकी शवयात्रा हम गुप्ता जी की मर्सिडीज़ में निकालेंगे। लोग भी तो देखें कि किसका बाप मरा है।

दूसरे बेटे मंगल ने कहा – भैया! गुप्ता जी कार दे तो देंगे पर सारी उम्र सुनाएँगे कि तुम्हारा बाप मरा था, तो मैंने कार दी थी। मैं अपने दोस्त बंटी की होंडा माँग लाऊँगा। होंडा भी कोई छोटी कार नहीं।

तीसरा बेटा बुध कहने लगा – अरे मंगल भाई! मालूम भी है कि होंडा धुलवाना कितना मंहगा है?
मैंने कल ही अपनी आल्टो ठीक करा ली है, उसी में ले चलेंगे। कार तो कार है, छोटी हो या बड़ी? और सारी जिंदगी पिताजी ने कंजूसी में बिताई है, क्या यह बात लोग नहीं जानते?

इतने में चौथे बेटे वीर ने भी अपनी राय दी कि – देखो भैया! बुरा न मानना। आल्टो में पिताजी की लाश ले तो जाएँगे पर फिर हमेशा उसमें बैठते वहम आया करेगा। श्मशान वालों ने इस काम के लिए एक ठेला बनाया हुआ है। अब कार हो या ठेला, मरने वाला तो मर ही गया, तब क्या फर्क पड़ता है?

जैसा कि शुरुआत में बताया कि अभी बूढ़ा मर रहा था, मरा नहीं था और वह तो अपने बेटों की बातों सब सुन रहा था।
वह बूढा व्यक्ति उठ कर बैठ गया और बोला- मेरी साइकिल कहाँ है? मेरी साइकिल लाओ! वह उठा और साइकिल चलाकर श्मशान घाट पहुँच गया! साइकिल से उतरा! साइकिल खड़ी की, भूमि पर लेटा और मर गया।

यही जगत के संबंधों की सच्चाई है। प्राण छूट जाने पर इस शरीर को कोई नाम ले कर भी नहीं बुलाता, सभी “लाश-लाश” कहते हैं। अभी भी समय है, जीते जी अपने अन्दर बैठे असली भगवान् से अपना संबंध बना लो। यही श्रेयष्कर होगा!
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सुप्रभात और सादर जय सच्चिदानंद
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नज़र का ऑपरेशन संभव है लेकिन नजरिए का नहीं!

एक गांव के एक किनारे के समीप कुछ मजदूर पत्थर के खंभे बना रहे थे। इत्तेफाक से उसी समय उधर से एक साधु गुजरे। पत्थरों से बनते खंभे देखकर उन्होंने उन्होंने एक मजदूर से प्रश्न किया – “यहां क्या बन रहा है?”

झुंझलाकर उस मजदूर ने कहा – “देखते नहीं, पत्थर काट रहा हूं?”

साधु ने कहा- ‘हां, देख तो रहा हूं। लेकिन यहां बनेगा क्या?”

मजदूर झुंझला कर बोला- “मालूम नहीं। यहां पत्थर तोड़ते- तोड़ते जान निकल रही है और इनको यह चिंता है कि यहां क्या बनेगा।”

मजदूर की बात सुनकर साधु महाराज आगे बढ़ गए। आगे एक दूसरा मजदूर मिला। साधु ने उससे भी पूछा- “यहां क्या बनेगा?”

मजदूर ने साधु को ऊपर से नीचे निहारते हुए कहा- “देखिए साधु बाबा, यहां कुछ भी बने। चाहे मंदिर बने या जेल, मुझे क्या! मुझे तो दिन भर की मजदूरी के रूप में १०० ₹ मिलते हैं। बस शाम को ₹ मिलें और मेरा काम बने।मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि यहां क्या बन रहा है!”

साधु महाराज आगे बढ़े तो तीसरा मजदूर मिला। साधु ने उससे भी वही प्रश्न किया तो मजदूर ने कहा- “मंदिर। इस गांव में कोई बड़ा मंदिर नहीं है! इस गांव के लोगों को दूसरे गांव में उत्सव मनाने जाना पड़ता था। मैं भी इसी गांव का हूं। ये सारे मजदूर इसी गांव के हैं। मैं एक- एक छैनी चला कर जब पत्थरों को गढ़ता हूं तो छैनी की आवाज में मुझे मधुर संगीत सुनाई पड़ता है। मुझे आनंद की अनुभूति होती है। कुछ दिनों बाद यह मंदिर बन कर तैयार हो जाएगा और यहां धूमधाम से पूजा होगी। मेला लगेगा। कीर्तन होगा। मैं यही सोच कर मस्त रहता हूं। मेरे लिए यह काम, काम नहीं है। मैं हमेशा मंदिर बनाने की मस्ती में रहता हूं। मैं रात को सोता हूं तो मंदिर की कल्पना के साथ और सुबह जगता हूं तो मंदिर के खंभों को तराशने के लिए चल पड़ता हूं। बीच- बीच में जब ज्यादा मस्ती आती है तो भजन गाने लगता हूं। जीवन में इससे ज्यादा काम करने का आनंद कभी नहीं आया।”

साधु ने उसकी बातों को गंभीरता से सुनकर कहा- “यही जीवन का रहस्य है मेरे भाई। बस नजरिया का फर्क है।
कोई काम को बोझ समझ रहा है और पूरा जीवन झुंझलाते और हाय- हाय करते बिता रहा है लेकिन कोई काम को आनंद समझ कर जीवन का लुत्फ ले रहा है।जीवन से सम्बद्ध हर पल के प्रति हमारा नजरिया सकारात्मक होना चाहिए। सकारात्मकता सफलता की जननी है।

अपनी ज़िंदगी में बोई सकारात्मकता की फ़सल हमारे जीवन को तनावमुक्त कर हरा-भरा रखती। बस, अपने नज़रिए को बदलिए जीवन अपने आप बदल जायेगा!*
🙏🙏 सुप्रभात 🙏🏻🙏

रेत का घर

रेत का घर

एक गाँव में नदी के किनारे कुछ बच्चे खेलते हुए रेत के घर बना रहे थे। किसी का पैर किसी के घर को लग जाता और वो बिखर जाता! इस बात पर झगड़ा हो जाता। थोड़ी बहुत बचकानी उम्र वाली मारपीट भी हो जाती। फिर वह बदले की भावना से सामने वाले के घर के ऊपर बैठ जाता और उसे मिटा देता और फिर से अपना घर बनाने में तल्लीन हो जाया करता। यही बच्चो का काम था!

महात्मा बुद्ध चुपचाप एक ओर खड़े ये सारा तमाशा अपने शिष्यों के साथ देख रहे थे।

बच्चे अपने आप में ही मशगूल थे तो किसी ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया।

इतने में एक स्त्री आकर बच्चो को कहती है – साँझ हो गयी है तुम सब की माताएं तुम्हारा रास्ता देख रही है।
बच्चो ने चौंकते हुए देखा दिन बीत गया है! साँझ हो गयी है और अँधेरा होने को है!

इसके बाद वो अपने ही बनाये घरों पर उछले कूदे सब मटियामेट कर दिया और किसी ने नहीं देखा कि कौन किसका घर तोड़ रहा है। सब बच्चे भागते हुए अपने घरों की और चल दिए!

महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा – तुम मानव जीवन की कल्पना इन बच्चों की इस क्रीडा से कर सकते हो!
क्योंकि
तुम्हारे बनाये शहर, राजधानियां सब ऐसे ही रह जाती है और तुम्हें एक दिन यह सब छोड़कर जाना ही होती है!तुम यहां जिन्दगी की भागदौड में सब भूल जाते हो और खुद से कभी मिल ही नहीं पाते!
जबकि
जाना तो सबका तय ही है!

इसलिए
कभी भी अधिक लम्बा सोचकर समय बर्बाद नहीं करना चाहिए और वर्तमान में जीना चाहिए।
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कर्म और ज्ञान

कर्म और ज्ञान

एक बार एक जंगल में आग लग गई! उसमें दो व्यक्ति फँस गए थे!
उनमें से एक अँधा तथा दूसरा लंगड़ा था! दोनों बहुत डर गए थे। अंधे ने आव देखा न ताव बस दौड़ना शुरू कर दिया!
अंधे को यह भी ख्याल नहीं रहा कि वो आग की तरफ दौड़ रहा था! लंगड़ा उसे आवाज़ देता रहा पर अंधे ने पलटकर जवाब नहीं दिया।
लंगड़ा आग को अपनी तरफ आती तो देख रहा था पर वह भाग नहीं सकता था।
अंत में दोनों आग में जलकर मर गए।

अंधे ने भागने का कर्म किया था पर उसे ज्ञान नहीं था की किस तरफ भागना है।
लंगड़े को ज्ञान था कि किस तरफ भागना है पर वो भागने का कर्म नहीं कर सकता था।

अगर दोनों एक साथ रहते और अँधा, लंगड़े को अपने कंधे पर बिठा कर भागता तो दोनों की जान बच सकती थी।

इस प्रसंग से यही अर्थ निकलता है कि कर्म के बिना ज्ञान व्यर्थ है और ज्ञान के बिना कर्म व्यर्थ है!

यदि कोई अपने को ज्ञानी समझता हो तो उसे सतत्त ज्ञान का अभ्यास करना होगा अन्यथा ज्ञान होने के बाद भी खतरा निश्चित है!

पिता की प्रार्थना

पिता की प्रार्थना

एक बार पिता और पुत्र जलमार्ग से यात्रा करते समय रास्ता भटक कर एक टापू पर पहुंच गये। उनकी नौका उन्हें ऐसी जगह ले आई थी जहाँ दो टापू आस-पास थे और फिर वहाँ पहुंच कर उनकी नौका टूट गई।
         
परिस्थितियों से चिंतित होकर पिता ने पुत्र से कहा- “लगता है, हम दोनों का अंतिम समय निकट आ गया है। यहां तो दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिख रहा है तो क्यों न हम ईश्वर से प्रार्थना करें।”
         
उन्होंने दोनों टापू आपस में बाँट लिए। एक पर पिता और एक पर पुत्र और दोनों अलग-अलग टापू पर ईश्वर की प्रार्थना करने लगे।

पुत्र ने ईश्वर से कहा- “हे भगवन! इस टापू पर पेड़-पौधे उग जाए जिसके फल-फूल से हम अपनी भूख मिटा सकें।” ईश्वर ने उसकी प्रार्थना अविलंब सुनी। तत्काल वहां पेड़-पौधे उग गये और उसमें फल-फूल भी आ गये। यह देखकर उसके मुख से बरबस ही निकल गया- “ये तो चमत्कार हो गया।”
         
अपनी पहली प्रार्थना पूर्ण होते देखकर उसने पुनः प्रार्थना की-” एक सुंदर स्त्री आ जाए जिससे हम यहाँ उसके साथ रहकर अपना परिवार बसाएँ।” तत्काल एक सुंदर स्त्री प्रकट हो गयी। अब उसने सोचा कि मेरी हर प्रार्थना सुनी जा रही है, तो क्यों न मैं ईश्वर से यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता माँगे लूँ ?

उसने ऐसा ही किया और उसने प्रार्थना की-” एक नई नाव आ जाए जिसमें सवार होकर मैं यहाँ से बाहर निकल सकूँ।”

तत्काल वहां नाव प्रकट हुई और पुत्र उसमें सवार होकर बाहर निकलने लगा। तभी एक आकाशवाणी ने उसे चोंका दिया- “बेटा! तुम अकेले जा रहे हो? अपने पिता को साथ नहीं लोगे ?”

आकाशवाणी सुनकर पुत्र ने कहा- “उनको छोड़ो! प्रार्थना तो उन्होंने भी की होगी लेकिन आपने उनकी एक भी नहीं सुनी।  शायद उनका मन पवित्र नहीं है, तो उन्हें इसका फल भोगने दो ?’

पूत्र की बात का आशय समझ कर पुनः आकाशवाणी में कहा गया- “क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे पिता ने क्या प्रार्थना की ?क्या तुम यह नहीं जानना चाहोगे कि उनकी कौन सी प्रार्थना स्वीकार हुई और कौन सी अस्वीकार?”
         
पुत्र बोला-“हां, मैं अवश्य जानना चाहूंगा।”
         
आकाशवाणी में कहा गया-” तो सुनो!तुम्हारे पिता ने एक ही प्रार्थना की- हे भगवन! मेरा बेटा आपसे जो माँगे, उसे दे देना और इस प्रकार आज तुम्हें जो कुछ तुम्हें मिल रहा है उन्हीं की प्रार्थना का परिणाम है।”

         
💐💐शिक्षा💐💐

स्वार्थ की राह पर निकल कर हम अपने सगे-संबंधियों और शुभचिंतकों से दूर हो जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि हमें जो भी सुख, प्रसिद्धि, मान, यश, धन, संपत्ति और सुविधाएं मिल रही है उसके पीछे किसी अपने की प्रार्थना और शक्ति जरूर होती है लेकिन हम नादान रहकर अपने अभिमान वश इस सबको अपनी उपलब्धि मानने की भूल करते रहते हैं। और जब ज्ञान होता है तो असलियत का पता लगने पर पछताना पड़ता है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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चूहा और हम।

चूहा और हम।

एक वन में एक ऋषि रहते थे। उनके डेरे पर बहुत दिनों से एक चूहा भी रहता आ रहा था। यह चूहा ऋषि से बहुत प्यार करता था। जब वे तपस्या में मग्न होते तो वह बड़े आनंद से उनके पास बैठा भजन सुनता रहता। यहाँ तक कि वह स्वयं भी ईश्वर की उपासना करने लगा था!

लेकिन कुत्ते-बिल्ली और चील-कौवे आदि से वह सदा डरा-डरा और सहमा हुआ सा रहता।
एक बार ऋषि के मन में उस चूहे के प्रति बहुत दया आ गयी। वे सोचने लगे कि यह बेचारा चूहा हर समय डरा-सा रहता है,क्यों न इसे शेर बना दिया जाए!

ताकि इस बेचारे का डर समाप्त हो जाए और यह बेधड़क होकर हर स्थान पर घूम सके। ऋषि बहुत बड़ी दैवीय शक्ति के स्वामी थे। उन्होंने अपनी शक्ति के बल पर उस चूहे को शेर बना दिया और सोचने लगे कि अब यह चूहा किसी भी जानवर से नहीं डरेगा और निर्भय होकर पूरे जंगल में घूम सकेगा!

लेकिन चूहे से शेर बनते ही चूहे की सारी सोच बदल गई! वह सारे वन में बेधड़क घूमता। उससे अब सारे जानवर डरने लगे और प्रणाम करने लगे।

उसकी जय-जयकार होने लगी।
किन्तु ऋषि यह बात जानते थे कि यह मात्र एक चूहा है वास्तव में शेर नहीं है।

अतः ऋषि उससे चूहा समझकर ही व्यवहार करते यह बात चूहे को पसंद नहीं आई कि कोई भी उसे चूहा समझ कर ही व्यवहार करे!

वह सोचने लगा कि ऐसे में तो दूसरे जानवरों पर भी बुरा असर पड़ेगा! लोग उसका जितना मान करते हैं, उससे अधिक घृणा और अनादर करना आरम्भ कर देंगे।

अतः चूहे ने सोचा कि क्यों न मैं इस ऋषि को ही मार डालूं!

फिर न रहेगा बाँस, न बजेगी बांसुरी; यही सोचकर वह ऋषि को मारने के लिए चल पड़ा!

ऋषि ने जैसे ही क्रोध से भरे शेर को अपनी ओर आते देखा तो वे उसके मन की बात समझ गये।उनको शेर पर बड़ा क्रोध आ गया।

अतः उसका घमंड तोड़ने के लिए  ऋषि ने अपनी दैवीय शक्ति से उसे एक बार फिर चूहा बना दिया!

इस प्रसंग हमें सचेत करता है कि हमको भी कभी भी अपने हितैषी का अहित नहीं करना चाहिए, चाहे हम कितने ही बलशाली क्यों न हो जाए!
हमें उन लोगों को हमेशा याद रखना चाहिए जिन्होंने हमारे बुरे वक्त में हमारा साथ दिया होता है! इसके अलावा हमें अपने बीते वक्त को भी नहीं भूलना चाहिए!
चूहा यदि अपनी असलियत याद रखता तो उसे फिर से चूहा नहीं बनना पड़ता! बीता हुआ समय हमें घमंड से बाहर निकालता है!
ज्ञान मार्ग में यह अक्सर देखने को मिलता है कि जब व्यक्ति अपने गुरु महाराजी के शरण में जाता है तो उस समय उसकी हालात भी उस चूहे के समान होती है!
जब महाराज जी अपनाते हैं, दया और करुणावश ज्ञान देते हैं, उसका हर प्रकार से डर दूर करके ज्ञान का उपहार देकर उसे सबल करते हैं, सेवा का अवसर भी देते हैं तो कुछ भक्त*ज्ञान अभ्यास से विमुख होकर वह अपनी पूर्व स्थिति को भूलकर उस चूहे की तरह अहंकारी बन जाते हैं और उनके मन में सद्गुरु के प्रति कृतज्ञता भाव को भी खो देते हैं!
कहावत है कि –
धोबी का कुत्ता, घर का ना घाट का।
वही हाल अहंकारी और संवेदनहीन भक्त का होता है।
इसलिए,
एक अच्छे और सच्चे भक्त को बिना मन बुद्धि लगाए महाराजी की सेवा करना ही उसके लिए अभीष्ट है।

🙏🏻 सुप्रभात🙏

बिना मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह जाता है!

एक ब्राह्मण यात्रा करते-करते किसी नगर से गुजरा बड़े-बड़े महल एवं अट्टालिकाओं को देखकर ब्राह्मण भिक्षा माँगने गया किन्तु किसी ने भी उसे दो मुट्ठी अऩ्न नहीं दिया आखिर दोपहर हो गयी ब्राह्मण दुःखी होकर अपने भाग्य को कोसता हुआ जा रहा थाः “कैसा मेरा दुर्भाग्य है इतने बड़े नगर में मुझे खाने के लिए दो मुट्ठी अन्न तक न मिला? रोटी बना कर खाने के लिए दो मुट्ठी आटा तक न मिला?

इतने में एक सिद्ध संत की निगाह उस पर पड़ी उन्होंने ब्राह्मण की बड़बड़ाहट सुन ली वे बड़े पहुँचे हुए संत थे उन्होंने कहाः
“ब्राह्मणदेव, तुम मनुष्य से भिक्षा माँगो, पशु क्या जानें भिक्षा देना?”

ब्राह्मण दंग रह गया और कहने लगाः “हे महात्मन् आप क्या कह रहे हैं? बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले मनुष्यों से ही मैंने भिक्षा माँगी है!”

संत बोले, नहीं ब्राह्मणदेव, मनुष्य शरीर में दिखने वाले वे लोग भीतर से मनुष्य नहीं हैं! अभी भी वे पिछले जन्म के हिसाब ही जी रहे हैं; कोई शेर की योनी से आया है तो कोई कुत्ते की योनी से आया है! कोई हिरण की से आया है तो कोई गाय या भैंस की योनी से आया है! उन की आकृति मानव-शरीर की जरूर है किन्तु अभी तक उन में मनुष्यत्व निखरा नहीं है और जब तक मनुष्यत्व नहीं निखरता, तब तक दूसरे मनुष्य की पीड़ा का पता नहीं चलता!
‘दूसरे लोगों में भी मेरा ही दिलबर ही है’- यह ज्ञान नहीं होता!
अतः तुमने मनुष्यों से नहीं, पशुओं से भिक्षा माँगी है!”

ब्राह्मणदेव के चेहरे के हावभाव देख दूरदृष्टि के धनी सिद्धपुरुष ने कहाः “देखो ब्राह्मणदेव, मैं तुम्हें यह चश्मा देता हूँ। इस चश्मे को पहन कर जा और कोई भी मनुष्य दिखे, उस से भिक्षा माँगना फिर देखना, क्या होता है?”

ब्राह्मणदेव जहाँ पहले गए थे; वहीं पुनः गये और योगसिद्ध कला वाले संत का चश्मा पहनकर गौर से देखाः ‘ओहोऽऽऽऽ…. वाकई कोई कुत्ता है! कोई बिल्ली है तो कोई बघेरा है! आकृति तो मनुष्य की है लेकिन संस्कार पशुओं के हैं! मनुष्य होने पर भी मनुष्यत्व के संस्कार नहीं हैं!
घूमते-घूमते वह ब्राह्मण थोड़ा सा आगे गये तो देखा कि एक मोची जूते सिल रहा है! ब्राह्मण ने उसे गौर से देखा तो *उस में मनुष्यत्व का निखार पाया!

ब्राह्मण ने उस के पास जाकर कहाः “भाई तेरा धंधा तो बहुत हल्का है औऱ मैं हूँ ब्राह्मण रीति रिवाज एवं कर्मकाण्ड को बड़ी चुस्ती से पालता हूँ मुझे बड़ी भूख लगी है लेकिन तेरे हाथ का नहीं खाऊँगा फिर भी मैं तुझसे माँगता हूँ क्योंकि मुझे तुझमें मनुष्यत्व दिखा है!”

उस मोची की आँखों से टप-टप आँसू बरसने लगे वह बोलाः “हे प्रभु, आप भूखे हैं? हे मेरे रब आप भूखे हैं? इतनी देर आप कहाँ थे?”

यह कहकर मोची उठा एवं जूते सिलकर टका, आना-दो आना वगैरह जो इकट्ठे किये थे, उस चिल्लर ( रेज़गारी ) को लेकर हलवाई की दुकान पर पहुँचा और बोलाः “हलवाई भाई, मेरे इन भूखे भगवान की सेवा कर लो ये चिल्लर यहाँ रखता हूँ जो कुछ भी सब्जी-पराँठे-पूरी आदि दे सकते हो, वह इन्हें दे दो मैं अभी जाता हूँ!”

यह कहकर मोची भागा घर जाकर अपने हाथ से बनाई हुई एक जोड़ी जूती ले आया एवं चौराहे पर उसे बेचने के लिए खड़ा हो गया!

उस राज्य का राजा जूतियों का बड़ा शौकीन था! उस दिन भी उस ने कई तरह की जूतियाँ पहनीं किंतु किसी की बनावट उसे पसंद नहीं आयी तो किसी का नाप नहीं आया! दो-पाँच बार प्रयत्न करने पर भी राजा को कोई पसंद नहीं आयी तो मंत्री से क्रुद्ध होकर बोलाः “अगर इस बार ढंग की जूती लाया तो जूती वाले को इनाम दूँगा और ठीक नहीं लाया तो मंत्री के बच्चे तेरी खबर ले लूँगा!”

दैव योग से मंत्री की नज़र इस मोची के रूप में खड़े असली मानव पर पड़ गयी जिसमें मानवता खिली थी! जिस की आँखों में कुछ प्रेम के भाव थे! चित्त में दया-करूणा थी! उसमें ब्राह्मण के संग का थोड़ा रंग लगा था!

मंत्री ने मोची से जूती ले ली एवं राजा के पास ले गया राजा को वह जूती एकदम ‘फिट’ आ गयी, मानो वह जूती राजा के नाप की ही बनी थी!

राजा ने कहाः “ऐसी जूती तो मैंने पहली बार ही पहन रहा हूँ किस मोची ने बनाई है यह जूती?”

मंत्री बोला “हुजूर यह मोची बाहर ही खड़ा है!”

मोची को बुलाया गया उस को देखकर राजा की भी मानवता थोड़ी खिली; राजा ने कहाः “जूती के तो पाँच रूपये होते हैं किन्तु यह पाँच रूपयों वाली नहीं, पाँच सौ रूपयों वाली जूती है! जूती बनाने वाले को पाँच सौ और जूती के पाँच सौ, कुल एक हजार रूपये इसको दे दो!”

मोची बोलाः “राजा साहिब तनिक ठहरिये यह जूती मेरी नहीं है! जिसकी है उसे मैं अभी ले आता हूँ!”

मोची जाकर विनयपूर्वक ब्राह्मण को राजा के पास ले आया एवं राजा से बोलाः “राजा साहब यह जूती इन्हीं की है!”

राजा को आश्चर्य हुआ वह बोलाः “यह तो ब्राह्मण है इसकी जूती कैसे?”

राजा ने ब्राह्मण से पूछा तो ब्राह्मण ने कहा, मैं तो ब्राह्मण हूँ यात्रा करने निकला हूँ!”

राजा ने कहा, “मोची जूती तो तुम बेच रहे थे! इस ब्राह्मण ने जूती कब खरीदी और बेची?”

मोची ने कहाः “राजन् मैंने मन में ही संकल्प कर लिया था कि जूती की जो रकम आयेगी वह इन ब्राह्मणदेव की होगी!

जब रकम इनकी है तो मैं इन रूपयों को कैसे ले सकता हूँ ? इसीलिए मैं इन्हें ले आया हूँ।

न जाने किसी जन्म में मैंने दान करने का संकल्प किया होगा और मुकर गया होऊँगा तभी तो यह मोची का चोला मिला है अब भी यदि मुकर जाऊँ तो तो न जाने मेरी कैसी दुर्गति हो?

इसीलिए राजन् ये रूपये मेरे नहीं हुए ना। मेरे मन में आ गया था कि इस जूती की रकम इनके लिए होगी फिर पाँच रूपये मिलते तो भी इनके होते और एक हजार मिल रहे हैं तो भी इनके ही हैं!
हो सकता है मेरा मन बेईमान हो जाता इसीलिए मैंने रूपयों को नहीं छुआ और इसके असली अधिकारी को ले आया!”

राजा ने आश्चर्य चकित होकर ब्राह्मण से पूछाः “ब्राह्मण मोची से तुम्हारा परिचय कैसे हुआ?”

ब्राह्मण ने सारी आप बीती सुनाते हुए सिद्ध पुरुष संत के चश्मे वाली बात बतलाते हुए कहा कि “आप के राज्य में पशुओं के दीदार तो बहुत हुए लेकिन मनुष्यत्व का विकास इस मोची में ही नज़र आया!”

राजा ने कौतूहलवश कहाः “लाओ, वह चश्मा जरा हम भी देखें!”

राजा ने चश्मा लगाकर देखा तो दरबारी वगैरह में उसे भी कोई सियार दिखा तो कोई हिरण, कोई बंदर दिखा तो कोई रीछ!

राजा दंग रह गया कि यह तो पशुओं का दरबार भरा पड़ा है उसे हुआ कि ये सब पशु हैं तो मैं कौन हूँ ?
उस ने आईना मँगवाया एवं उसमें अपना चेहरा देखा तो शेर!

उस के आश्चर्य की सीमा न रही! ये सारे जंगल के प्राणी और मैं जंगल का राजा शेर यहाँ भी इनका राजा बना बैठा हूँ !’

राजा ने कहाः “ब्राह्मणदेव योगी महाराज का यह चश्मा तो बड़ा गज़ब का है वे योगी महाराज कहाँ होंगे?”

ब्राह्मण बोले – “वे तो कहीं चले गये ऐसे महापुरुष कभी-कभी ही और बड़ी कठिनाई से मिलते हैं!

श्रद्धावान ही ऐसे महापुरुषों से लाभ उठा पाते हैं! बाकी तो जो मनुष्य के चोले में पशु के समान हैं वे महापुरुष के निकट रहकर भी अपनी पशुता नहीं छोड़ पाते!

ब्राह्मण ने आगे कहाः ‘राजन् अब तो बिना चश्मे के भी मनुष्यत्व को परखा जा सकता है! व्यक्ति के व्यवहार को देखकर ही पता चल सकता है कि वह किस योनि से आया है!
एक मेहनत करे और दूसरा उस पर हक जताये तो समझ लो कि वह सर्प योनि से आया है क्योंकि बिल खोदने की मेहनत तो चूहा करता है लेकिन सर्प उस को मारकर बल पर अपना अधिकार जमा बैठता है!”

अब इस चश्मे के बिना भी विवेक का चश्मा काम कर सकता है और दूसरे को देखें उसकी अपेक्षा स्वयं को ही देखें कि हम सर्पयोनि से आये हैं कि शेर की योनि से आये हैं या सचमुच में हम में मनुष्यता खिली है? यदि पशुता बाकी है तो वह भी मनुष्यता में बदल सकती है!

तुलसीदाज जी ने कहा हैः
बिगड़ी जनम अनेक की,
सुधरे अब और आजु!
तुलसी होई राम को,
रामभजि तजि कुसमाजु!!

कुसंस्कारों को छोड़ दे! बस अपने कुसंस्कार आप निकालेंगे तो ही निकलेंगे!अपने भीतर छिपे हुए पशुत्व को आप निकालेंगे तो ही निकलेगा! यह भी तब संभव होगा जब आप अपने समय की कीमत समझेंगे।

मनुष्यत्व आये तो एक-एक पल को सार्थक किये बिना आप चुप नहीं बैठेंगे। पशु अपना समय ऐसे ही गँवाता है। पशुत्व के संस्कार पड़े रहेंगे तो आपका समय बिगड़ेगा!

अतः पशुत्व के संस्कारों को आप निकालिये एवं मनुष्यत्व के संस्कारों को उभारिये – फिर सिद्धपुरुष का चश्मा नहीं, वरन् अपने विवेक का चश्मा ही कार्य करेगा और इस विवेक के चश्मे को पाने की युक्ति मिलती है!

सत्संग से, मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता है!

बिना मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह जाता है!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

सकारात्मक रवैया !!

सकारात्मक रवैया !!

एक आदमी एक सेठ की दुकान पर नौकरी करता था। वह बेहद ईमानदारी और लगन से अपना काम करता था। उसके काम से सेठ बहुत प्रसन्न था और सेठ द्वारा मिलने वाली तनख्वाह से उस आदमी का गुज़ारा आराम से हो जाता था।

ऐसे ही दिन गुज़र रहे थे। एक दिन वह आदमी बिना बताए काम पर नहीं आया। उसके न आने से सेठ का काम रूक गया।

तब सेठ ने सोचा कि यह आदमी इतने दिनों से ईमानदारी से काम कर रहा है। मैंने कब से इसकी तन्ख्वाह नहीं बढ़ाई। इतने पैसों में इसका गुज़ारा कैसे होता होगा?

सेठ ने सोचा कि अगर इस आदमी की तन्ख्वाह बढ़ा दी जाए, तो यह और मेहनत और लगन से काम करेगा। उसने उसी महीने से ही उस आदमी की तनख्वाह बढ़ा दी।

उस आदमी को जब एक तारीख को बढ़े हुए पैसे मिले, तो वह हैरान रह गया। लेकिन वह कुछ नहीं बोला और चुपचाप पैसे रख लिये! धीरे-धीरे बात आई गई हो गयी। कुछ महीनों बाद वह आदमी फिर कुछ दिन ग़ैर हाज़िर हो गया।

यह देखकर सेठ को बहुत गुस्सा आया। वह सोचने लगा- कैसा कृतघ्न आदमी है। मैंने इसकी तनख्वाह बढ़ाई, पर न तो इसने धन्यवाद दिया और न ही अपने काम की जिम्मेदारी समझी।

इसकी तन्खाह बढ़ाने का क्या फायदा हुआ? यह नहीं सुधरेगा! और उसी दिन सेठ ने बढ़ी हुई तनख्वाह वापस लेने का फैसला कर लिया।

अगली 1 तारीख को उस आदमी को फिर से वही पुरानी तनख्वाह दी गयी। लेकिन हैरानी यह कि इस बार भी वह आदमी चुप रहा।

उसने सेठ से ज़रा भी शिकायत नहीं की। यह देख कर सेठ से रहा न गया और वह पूछ बैठा- बड़े अजीब आदमी हो भाई। जब मैंने तुम्हारे ग़ैर-हाज़िर होने के बाद पहले तुम्हारी तन्ख्वाह बढ़ा कर दी, तब भी तुम कुछ नहीं बोले। और आज जब मैंने तुम्हारी ग़ैर-हाज़री पर तन्ख्वाह फिर से कम करके दी, तुम फिर भी खामोश रहे। इसकी क्या वजह है?

उस आदमी ने जवाब दिया- जब मैं पहली बार ग़ैर हाज़िर हुआ था तो मेरे घर एक बच्चा पैदा हुआ था। उस वक्त आपने जब मेरी तन्ख्वाह बढ़ा कर दी, तो मैंने सोचा कि ईश्वर ने उस बच्चे के पोषण का हिस्सा भेजा है। इसलिए मैं ज्यादा खुश नहीं हुआ!

जिस दिन मैं दोबारा ग़ैर-हाजिर हुआ, उस दिन मेरी माता जी का निधन हो गया था। आपने उसके बाद मेरी तन्ख्वाह कम कर दी, तो मैंने यह मान लिया कि मेरी माँ अपने हिस्से का अपने साथ ले गयीं! फिर मैं इस तनख्वाह की ख़ातिर क्यों परेशान होऊँ?

यह सुनकर सेठ गदगद हो गया। उसने उस आदमी को गले से लगा लिया और अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी।

उसके बाद उसने न सिर्फ उस आदमी की तनख्वाह पहले जैसे कर दी, बल्कि उसका और ज्यादा सम्मान करने लगा।

हमारे जीवन में अक्सर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की घटनाएं होती रहती हैं।

जो आदमी एक अच्छी घटना से खुश होकर अनावश्यक उछलता नहीं और नकारात्मक घटनाओं पर अनावश्यक दु:ख नहीं मनाता और हर दशा में अपनी सोच को सकारात्मक बनाए रखते हुए सच्ची लगन और ईमानदारी से कार्य करता रहता है, वही आदमी जीवन में स्थाई सफलता प्राप्त करता है!

🙏🙏🏻 सुप्रभात🙏🏽🙏🏾

गिलहरी

गिलहरी

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी!

गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी।

क्यों कि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था !

गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ!
वैसे ही उसे याद आता कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा!

गिलहरी फिर काम पर लग जाती !

गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं , पर उसे अखरोट याद आ जाता और वो फिर काम पर लग जाती !

ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था !

ऐसे ही समय बीतता रहा! एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया!

गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब ये अखरोट मेरे किस काम के?

पूरी जिन्दगी काम करते – करते दाँत तो घिस गये – इन्हें खाऊँगी कैसे!

यह कहानी आज हम सभी के जीवन की हकीकत बन चुकी है!

क्योंकि हर इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है !

60 वर्ष की उम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है या बैंक बैलेंस होता है तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है!

तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है!

क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा कि आपने इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये अपनी कितनी इच्छायें मारी होंगी? आपको कितनी तकलीफें मिली होंगी? आपके कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे?

क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके!

इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके !

इस लिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो,
मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो
भजन करो मस्त जवानी में बुढ़ापा किसने देख्या है।
🌹🌹🌹🌹🌹
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आपका दिन मंगलमय हो!

समय की कीमत

!! समय की कीमत !!

कल्पना कीजिए कि आपके पास एक बैंक अकाउंट है और हर रोज सुबह उस बैंक अकाउंट में 86,400 रूपये जमा हो जाते है, जिसे आप उपयोग में ले सकते है| आप रूपयों को बैंक अकाउंट से निकाल कर अपनी तिजोरी में जमा करके नहीं रख सकते| इस बैंक अकाउंट में कैरी फोरवर्ड का सिस्टम नहीं है यानि कि जिन रूपयों को आप उपयोग में नहीं ले पाते, वह रूपये शाम को वापस ले लिए जाते है और आपका अब उन पर कोई अधिकार नहीं रहता | यह बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है| हो सकता है कि कल ही यह बैंक अकाउंट बंद हो जाए या फिर 2 वर्ष बाद या फिर 50 वर्ष बाद| लेकिन इतना तो निश्चित है कि यह बैंक अकाउंट एक दिन जरूर बंद होगा|

ऐसी परिस्थिति में आप क्या करेंगे ? जाहिर है आप पूरे के पूरे 86,400 रूपयों का उपयोग कर लेंगे और इन 86,400 रूपयों का उपयोग अच्छे कार्यों के लिए करेंगे क्योंकि यह बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है| क्या आप जानते है कि ऐसा ही एक बैंक अकाउंट हमारे पास होता है जिसका नाम है “जिंदगी (Life)” और इस “जीवन” रुपी बैंक अकाउंट में प्रतिदिन 86,400 सेकंड्स जमा होते है जिनका उपयोग कैसे करना है यह हम पर निर्भर करता है| हम चाहें तो इन 86,400 सेकंड्स का उपयोग बेहतरीन कार्यों के लिए कर सकते है और अगर ऐसा नहीं करते तो यह व्यर्थ हो जाएंगे| यह जीवन रुपी बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है इसलिए देर मत कीजिए आपके जीवन का हर पल अमूल्य है इसलिए समय का सदुपयोग कीजिए|

अगर किसी को भी ऐसा बैंक अकाउंट दे दिया जाए जिसमें रोज 86,400 रूपये जमा हो तो वह व्यक्ति बहुत खुश हो जाएगा और एक रूपया भी व्यर्थ नहीं गवाएंगा | क्या हमारे जीवन के एक सेकंड की कीमत एक रूपये से भी कम है| हम कैसे अपने जीवन की सबसे अनमोल सम्पति को ऐसे ही व्यर्थ गँवा सकते है| खोया हुआ धन फिर कमाया जा सकता है, लेकिन खोया हुआ समय वापस नहीं आता| उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है। हर एक दिन को व्यर्थ गंवाना आत्महत्या करने के समान है| बिना समय प्रबंधन के आज तक कोई भी सफल नहीं हुआ|

बीते हुए कल को भूल जाइए, उसका आज कोई वजूद नहीं| आज आपका है, आज एक नयी शुरुआत कीजिए| “जो व्यक्ति अपने समय को नष्ट कर देते है, समय उन्हें नष्ट कर देता है..!!’