निमित्तमात्र

निमित्तमात्र

उस दिन सबेरे 6 बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर जाने के लिए निकला, मैं रेलवे स्टेशन पहुचा , पर देरी से पहुचने कारण मेरी ट्रेन निकल चुकी थी, मेरे पास 9.30 की ट्रेन के आलावा कोई चारा नही था

मैंने सोचा कही नाश्ता कर लिया जाए, बहुत जोर की भूख लगी थी मैं होटल की ओर जा रहा था।

अचानक रास्ते में मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे दो बच्चों पर पड़ी, दोनों लगभग 10-12 साल के रहे होंगे बच्चों की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। कमजोरी के कारण अस्थिपिंजर साफ दिखाई दे रहे थे, वे भूखे लग रहे थे।

छोटा बच्चा बड़े को खाने के बारे में कह रहा था, बड़ा उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था, मैं अचानक रुक गया दौड़ती भागती जिंदगी में यह ठहर से गये।

जीवन को देख मेरा मन भर आया l

सोचा इन्हें कुछ पैसे दे दिए जाए, मैंने उन्हें 10 रु दे कर आगे बढ़ गया। तुरंत मेरे मन में एक विचार आया कितना कंजूस हु मैं, 10 रु क्या मिलेगा, चाय तक ढंग से न मिलेगी, स्वयं पर शर्म आयी फिर वापस लौटा।

मैंने बच्चों से कहा: कुछ खाओगे ?

बच्चे थोड़े असमंजस में पड़े मैंने कहा बेटा मैं नाश्ता करने जा रहा हु, तुम भी कर लो, वे दोनों भूख के कारण तैयार हो गए।

उनके कपड़े गंदे होने से होटल वाले ने डाट दिया और भगाने लगा, मैंने कहा भाई साहब उन्हें जो खाना है वो उन्हें दो पैसे मैं दूंगा।
होटल वाले ने आश्चर्य🤔🤔 से मेरी ओर देखा..

उसकी आँखों में उसके बर्ताव के लिए शर्म साफ दिखाई दी। बच्चों ने नाश्ता मिठाई व् लस्सी मांगी। सेल्फ सर्विस के कारण मैंने नाश्ता बच्चों को लेकर दिया बच्चे जब खाने लगे, उनके चेहरे की ख़ुशी😊😊 कुछ निराली ही थी।

मैंने बच्चों को कहा बेटा अब जो मैंने तुम्हे पैसे दिए है उसमे 1 रु का शैम्पू ले कर हैण्ड पम्प के पास नहा लेना।

और फिर दोपहर शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले लंगर में खा लेना, और मैं नाश्ते के पैसे दे कर फिर अपनी दौड़ती दिनचर्या की ओर बढ़ निकला।

वहा आसपास के लोग बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे होटल वाले के शब्द आदर मे परिवर्तित हो चुके थे।

मैं स्टेशन की ओर निकला, थोडा मन भारी लग रहा था मन थोडा उनके बारे में सोच कर दुखी हो रहा था।

रास्ते में मंदिर आया मैंने मंदिर की ओर देखा और कहा हे भगवान ! आप कहा हो ? इन बच्चों की ये हालत ये भूख, आप कैसे चुप बैठ सकते है।

दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया, पुत्र अभी तक जो उन्हें नाश्ता दे रहा था वो कौन था?
क्या तुम्हें लगता है तुमने वह सब अपनी सोच से किया।
मैं स्तब्ध हो गया, मेरे सारे प्रश्न समाप्त हो गए
ऐसा लगा जैसे मैंने ईश्वर से बात की हो।
मुझे समझ आ चुका था हम निमित्त मात्र है उसके कार्य कलाप के वो महान है।

शिक्षा:-भगवान हमे किसी की मदद करने तब ही भेजता है जब वह हमे उस काम के लायक समझता है, किसी मदद को मना करना वैसा ही है जैसे भगवान के काम को मना करना।

जय श्रीराम

शुभरात्रि

प्राथमिकता मुख्य उत्तरदायित्व को दें!

प्राथमिकता मुख्य उत्तरदायित्व को दें!

जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी वो एकांत जगह की तलाश में घूम रही थी कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये वहां पहुँचते ही उसे प्रसव पीडा शुरू हो गयी।

उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी।

उसने बायें देखा तो एक शिकारी तीर का निशाना उस की तरफ साध रहा था।
घबराकर वह दाहिने मुड़ी तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था।
सामने सूखी घास आग पकड चुकी थी और पीछे मुड़ी तो नदी में जल बहुत था।

मादा हिरनी करती तो क्या ही करती?

वह प्रसव पीडा से व्याकुल थी।
अब क्या होगा?
क्या हिरनी जीवित बचेगी?
क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी?
क्या शावक जीवित रहेगा?
क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी?
क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी?
क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी?
वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है।
क्या करेगी वो?

हिरनी ने अपने आप को शून्य में छोड़ अपने प्राथमिक उत्तरदायित्व अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी।

कुदरत का करिश्मा देखिये –
बिजली चमकी
और तीर छोडते हुए
शिकारी की आँखे चौंधिया गयी
उसका तीर हिरनी के पास से गुजरते
शेर की आँख में जा लगा!
शेर दहाडता हुआ इधर उधर भागने लगा
और
शिकारी
शेर को घायल ज़ानकर
भाग गया!
घनघोर बारिश शुरू हो गयी
और
जंगल की आग
बुझ गयी!
इस प्रकार
हिरनी ने शावक को जन्म दिया।
किसी ने सही कहा है कि –
जाको राखे साइयां, मार सके न कोय!
बाल न बांका करि सके जो जग बैरी होय!!

हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते हैं-
जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं!
और
कोई निर्णय नहीं ले पाते!
तो
तब समर्पण भाव से
सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर
अपने उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
अन्तत:
यश- अपयश, लाभ-हानी, हार-जीत, जीवन-मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है।

हमें उस परम शक्ति पर विश्वास कर उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए।

सर्व निंदक महाराज

सर्व निंदक महाराज

एक थे सर्वनिंदक महाराज। काम-धाम कुछ आता नहीं था पर निंदा गजब की किया करते थे। हमेशा औरों के काम में टाँग फँसाते थे।

अगर कोई व्यक्ति मेहनत करके सुस्ताने भी बैठता तो कहते, ‘मूर्ख एक नम्बर का कामचोर है। अगर कोई काम करते हुए मिलता तो कहते, ‘मूर्ख जिंदगी भर काम करते हुए मर जायेगा।’

कोई पूजा-पाठ में रुचि दिखाता तो कहते, ‘पूजा के नाम पर देह चुरा रहा है। ये पूजा के नाम पर मस्ती करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता।’ अगर कोई व्यक्ति पूजा-पाठ नहीं करता तो कहते, ‘मूर्ख नास्तिक है! भगवान से कोई मतलब ही नहीं है। मरने के बाद पक्का नर्क में जायेगा।’

माने निंदा के इतने पक्के खिलाड़ी बन गये कि आखिरकार नारदजी ने अपने स्वभाव अनुसार.. विष्णु जी के पास इसकी खबर पहुँचा ही दिया। विष्णु जी ने कहा ‘उन्हें विष्णु लोक में भोजन पर आमंत्रित कीजिए।’

नारद तुरंत भगवान का न्योता लेकर सर्वनिंदक महाराज के पास पहुँचे और बिना कोई जोखिम लिए हुए उन्हें अपने साथ ही विष्णु लोक लेकर पहुँच गये कि पता नहीं कब महाराज पलटी मार दे।

उधर, लक्ष्मी जी ने नाना प्रकार के व्यंजन अपने हाथों से तैयार कर सर्वनिंदक महाराज को परोसा। सर्वनिंदक जी ने जमकर हाथ साफ किया। वे बड़े प्रसन्न दिख रहे थे। विष्णु जी को पूरा विश्वास हो गया कि सर्वनिंदक जी लक्ष्मी जी के बनाये भोजन की निंदा कर ही नहीं सकते। फिर भी नारद जी को संतुष्ट करने के लिए पूछ लिया, और महाराज भोजन कैसा लगा?

सर्वनिंदक जी बोले, महाराज भोजन का तो पूछिए मत, आत्मा तृप्त हो गयी। लेकिन… भोजन इतना भी अच्छा नहीं बनना चाहिए कि आदमी खाते-खाते प्राण ही त्याग दे।

विष्णु जी ने माथा पीट लिया और बोले, ‘हे वत्स, निंदा के प्रति आपका समर्पण देखकर मैं प्रसन्न हुआ। आपने तो लक्ष्मी जी को भी नहीं छोडा़, वर माँगो।

सर्वनिंदक जी ने शर्माते हुए कहा — हे प्रभु मेरे वंश में वृद्धि होनी चाहिए।

तभी से ऐसे निरर्थक सर्वनिंदक हमारे आसपास ही नहीं वरन सभी जगहों में पाए जाने लगे..।

सार : हम चाहे कुछ भी कर लें.. इन सर्वनिंदकों की प्रजाति को संतुष्ट नहीं कर सकते!अतः ऐसे लोगों की परवाह किये बिना अपने कर्तव्य पथ पर हमें अग्रसर रहना चाहिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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माया का बन्धन

माया का बन्धन

एक बहुत ही प्रसिद्ध महात्मा थे। उनके पास रोज ही बड़ी संख्या में लोग उनसे मिलने आते थे। एक बार एक बहुत ही अमीर व्यापारी उनसे मिलने पहुंचा। व्यापारी ने सुन रखा था कि महात्मा बड़ी ही सरलता से रहते है। जब वह व्यापारी महात्मा के दरबार में पहुंचा तो उसने देखा कि कहने को तो वह महात्मा है, लेकिन वे जिस आसन पर बैठे है, वह तो सोने का बना है, चारों ओर सुगंध है, जरीदार पर्दे टंगे है, सेवक है जो महात्माजी की सेवा में लगे है और आश्रम में समस्त सुख सुविधाओं का अंबार लगा है
व्यापारी यह देखकर भौंचक्का रह गया कि हर तरफ विलास और वैभव का साम्राराज्य है। ये कैसे महात्मा है? महात्मा उसके बारे में कुछ कहते, इसके पहले ही व्यापारी ने कहा, “महात्माजी आपकी ख्याति सुनकर आपके दर्शन करने आया था, लेकिन यहाँ देखता हूँ, आप तो भौतिक सपंदा के बीच मजे से रह रहे हैं लेकिन आप में साधु के कोई गुण 1नजर नही आ रहे है।“
महात्मा ने व्यापारी से कहा, “व्यापारी… तुम्हें ऐतराज है तो मैं इसी पल यह सब वैभव छोड़कर तुम्हारे साथ चल देता हूँ।“
व्यापारी ने कहा, “हे महात्मा, क्या आप सच मे इस विलास पूर्ण जीवन को छोड़ पाएंगे?“ महात्माजी कुछ न बोले और उस व्यापारी के साथ चल दिए और जाते-जाते अपने सेवको से कहा कि यह जो कुछ भी है सभी सुख सुविधा की वस्तुओं को गरीबो में बाँट दें।

दोनो कुछ ही दूर चले होंगे कि अचानक व्यापारी रूका और पीछे मुड़ा, कुछ सोचने लगा। महात्मा ने पूछा, “क्या हुआ रूक क्यों गए?“ व्यापारी ने कहा, “महात्मा जी, मैं आपके दरबार में अपना कांसे का लोटा भूल आया हूँ। मैं जाकर उसे ले आता हूँ, उसे लेना जरूरी है।”
महात्माजी हंसते हुए बोले, “बस यही फर्क है तुममें और मुझमें। मैं सभी भौतिक सुविधाओं का उपयोग करते हुए भी उनमें बंधता नहीं,मेरे लिए संसार के समस्त पदार्थ शून्य है वे मेरे बन्धन का कारण कदापि नही बन सकते।यही मेरे महात्मा होने का प्रमाण है, इसीलिए जब चाहूँ तब उन्हें छोड़ सकता हूँ और तुम जैसे साधारण मनुष्य इतने अमीर होकर भी एक छोटे से लोटे के बंधन से भी मुक्त नहीं हो।“वास्तव में लोटा तो मात्र एक छोटा सा भौतिक पदार्थ हैं, और तुम इसी तुच्छ पदार्थ के बन्धन से मुक्त नही हो पा रहे तो फिर इस संसार सागर के रिश्ते,नाते,धन संपदा से कैसे मुक्त हो पाओगे।आओ मेरे साथ सांसारिक विरह का अभ्यास करों।। इतना कहते हुए महात्माजी फिर से अपने दरबार की ओर जानें लगे और वह व्यापारी उन्हें जाता हुआ देखता रहा क्योंकि महात्मा उसे जीवन का सबसे अमूल्य रहस्य बता चुके थे।

इस छोटी सी कहानी का सारांश ये है कि चीजों का उपयोग करना, लेकिन उनके मोह में न पड़ना, यही जीवन का अन्तिम उद्देश्य होना चाहिए क्योंकि मोह ही दु:खों का कारण है और जिसे चीजों का मोह नहीं, वह उनके बंधन में भी नहीं पड़ता और जो बंधन में नही पड़ता, वो हमेंशा मुक्त ही रहता है ।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

सुख कैसे मिले?

सुख कैसे मिले?

एक व्यक्ति के पास बहुत धन था। इतना कि अब और धन पाने से कुछ सार नहीं था। जितना था, उसका भी उपयोग नहीं हो पा रहा था। मृत्यु समीप आने लगी थी। न बेटे थे, न बेटियां थीं, कोई पीछे न था और जीवन धन बटोरने में बीत गया था।

वह तथाकथित महात्माओं के पास गया कि मुझे कुछ आनंद का सूत्र दो।
महात्मा, पंडित, पुरोहित, सब के द्वार खटखटाए। खाली हाथ लौटा।

फिर किसी ने कहा कि एक साधू को हम जानते हैं, शायद वही कुछ कर सके। उनके ढंग जरूर अनूठे हैं; इसलिए चौंकना मत।

उनके रास्ते उनके निजी हैं; उनकी समझाने की विधियां भी थोड़ी बेढब होती हैं। मगर अगर कोई न समझा सके, तो *जिनका कहीं कोई इलाज नहीं है, उस तरह के लोगों को हम वहां भेज देते हैं और उनके लिए वहाँ सुनिश्चित उपाय है।

उस धनी व्यक्ति ने एक बड़ी पोटली भरी हीरे-जवाहरातों से और पहुंच गया साधू के पास।

साधू बैठे थे एक झाड़ के नीचे। धनी व्यक्ति ने पोटली रख दी उनके सामने और कहा कि इतने हीरे-जवाहरात मेरे पास हैं, मगर सुख का कण भी मेरे पास नहीं। मैं कैसे सुखी होऊं?

साधू ने आव देखा न ताव, उठाई पोटली और भागे!
वह व्यक्ति तो एक क्षण समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हो रहा है!

महात्मागण तो ऐसा नहीं करते! एक क्षण तो ठिठका रहा, अवाक! फिर उसे होश आया कि इस साधू ने तो लूट लिया, मारे गए, सारी जिंदगी भर की कमाई साधु ले भागा!

हम सुख की तलाश में आए थे और ज्यादा दुःखी हो गए। व्यक्ति भागा, चिल्लाया कि लुट गया, बचाओ ! साधु चोर है, बेईमान है, भागा जा रहा है!

साधु ने पूरे गांव में उस व्यक्ति को चक्कर कटवाया। साधू का गांव तो जाना-पहचाना था, सारे गली-कूंचे की पहचान थी, इधर से निकले, उधर से निकल जाए।

भीड़ भी पीछे हो ली- भीड़ तो साधू को जानती थी कि जरूर कोई विधि होगी! क्योंकि पूरा गांव तो साधू से परिचित था, उसके ढंगों से परिचित था। धीरे-धीरे आश्वस्त हो गया था कि वह जो भी करे, वह चाहे कितना बेबूझ मालूम पड़े लेकिन भीतर कुछ राज होता है।

लेकिन उस धनी व्यक्ति को तो कुछ पता नहीं था। वह पसीना-पसीना हो चला था क्योंकि जीवन मे कभी इतना भागा भी नहीं था! इतना, थका-मांदा; साधू उसे भगाता हुआ, दौड़ाता हुआ, पसीने से लथपथ कराता हुआ वापिस अपने झाड़ के पास लौटा लाया। जहां उसका घोड़ा खड़ा था। साधु ने पोटली वहीं घोड़े के पास लाकर पटक दी और स्वयं झाड़ के पीछे छिप कर खडे हो गए।

वह व्यक्ति लौटा, पोटली नीचे पड़ी थी, घोड़ा खड़ा था उसने पोटली उठा कर छाती से लगा ली और कहा कि हे! परमात्मा ! तेरा बहुत बहुत धन्यवाद! आज मुझ जैसा सुखी व्यक्ति इस दुनिया में और कोई भी नहीं क्योंकि मुझे मेरा धन वापिस मिल गया!

साधू वृक्ष के पीछे से झांकर कहा : कुछ सुख मिला?
यही राज है।

यही पोटली पहले तुम्हारे पास थी! इसी को लिए तुम यहां वहाँ लिय घूम रहे थे और सुख का कोई पता नहीं था और अब भी यही पोटली वापिस तुम्हारे हाथ में है; लेकिन बीच में फासला हो गया! थोड़ी देर को पोटली तुम्हारे हाथ में नही थी! थोड़ी देर को पोटली से तुम वंचित हो गए थे! और अब तुम कह रहे हो- हे प्रभु, धन्यवाद तेरा कि आज मैं आह्लादित हूं! आज पहली बार आनंद की थोड़ी झलक मिली।

मुझे चोर और बेईमान कहते तुमको शर्म नहीं आयी! बैठो घोड़े पर और भाग जाओ! नहीं तो मैं पोटली फिर छीन लूंगा। रास्ते पर लगो ! रास्ता तुम्हें मैंने बता दिया।

हम सबके हालत भी यही हैं कि अनमोल जीवन की कभी भी जीते जी कदर नहीं करते! इसका मूल्य का पता तबतक नहीं चलता जब तक कि इसको गंवाते नहीं!

जो हमें स्वांसें मिली हैं; उसकी हमारे लिय कोई कदर नहीं है। जो खो गया, उसके लिए हम रोते हैं! जो खो गया, हमको उसका अभाव खलता है और उस धनी व्यक्ति की तरह हम महपुरुषों के इशारे को नजरंदाज कर देते हैं!
कहा भी है कि –
मानुष जनम अनमोल रे, मिट्टी मे ना रोल रे!
अब जो मिला है, फ़िर ना मिलेगा, कभी नहीं, कभी नहीं रे!!

कर्म का फल

कर्म का फल

एक राजा के दरबार मे कर्म के ऊपर बहस छिड़ी हुई थी!

कोई कहता कर्म का फल ऊपर वाले पर छोड़ दीजिए!
तो कोई कहता मरने के बाद जीव का क्या होता है- आजतक किसी को कुछ पता नहीं!
तो कोई कहता कर्म का फल सबको इसी जन्म में मिलता है!

राजा ने निर्णय लिया कि इसे प्रत्यक्ष व्यवहार में लाकर परिणाम देखा जाए !

राजा ने अपने तीन मन्त्रियो को दरबार में बुलाया और तीनो को आदेश दिया कि एक-एक थैला ले कर बगीचे में जाएं और वहां से अच्छे से अच्छे और बढ़िया से बढ़िया फल तोड़कर लाएं!

वो तीनों अलग-अलग बाग़ में प्रविष्ट हो गए!

पहले मन्त्री ने कोशिश की कि राजा के लिए उसकी पसंद के अच्छेअच्छे और मज़ेदार फल जमा किए जाएं तो उस ने काफी मेहनत के बाद बढ़िया और ताज़ा फलों से अपना थैला भर लिया!

दूसरे मन्त्री ने सोचा कि राजा हर फल का परीक्षण तो करेगा नहीं इस लिए उसने जल्दी -जल्दी थैला भरने में ताज़ा , कच्चे , गले सड़े फल भी थैले में भर लिए!

तीसरे मन्त्री ने सोचा कि राजा की नज़र तो सिर्फ भरे हुए थैले की तरफ होगी वो खोल कर देखेगा भी नहीं कि इसमें क्या है? उसने समय बचाने के लिए जल्दी-जल्दी इसमें घास और पत्ते भर लिए और वक़्त बचाया!

दूसरे दिन राजा ने तीनों मन्त्रियो को उनके थैलों समेत दरबार में बुलाया और उनके थैले खोल कर भी नही देखे और आदेश दिया कि इन तीनों को उनके थैलों समेत दूर स्थान के एक जेल में 15 दिन के लिए एकांतवास में रखा जाए!

अब जेल में उनके पास खाने-पीने को कुछ भी नहीं था सिवाए उन फल से भरे थैलों के! तो जिस मन्त्री ने अच्छे-अच्छे फल जमा किये थे – वो तो मज़े से उनको खाता रहा और उसके 15 दिन अच्छे से गुज़र भी गए!

फिर दूसरा मन्त्री जिसने ताज़ा, कच्चे गले सड़े फल जमा किये थे – वह कुछ दिन तो ताज़ा फल खाता रहा फिर उसे ख़राब फल खाने पड़े! जिस से वो बीमार होगया और बहुत तकलीफ उठानी पड़ी!

और तीसरा मन्त्री जिसने अपने थैले में सिर्फ घास और पत्ते जमा किये थे वो कुछ ही दिनों में भूख से व्याकुल हो गया!

राजा ने सबकी निगरानी के लिए गुप्तरुप से एक संतरी रखा हुआ था! बचा तो सबको लिया गया मगर उन्हें अपने कर्म का फल समझ में आ गया!

हमको भी विचार करना है कि हम अपने जीवन की झोली में क्या जमा कर रहे हैं?

हम भी इस समय उस बनाने वाले के बगीचे में एक निश्चित समय के लिय आये हैं और हर पल काल रूपी गुप्तचर के पहरे में हैं! और दाता की दुनिया में हमारे कर्मों का खाता खुला हुआ है – इसलिय अपने हमें ही खुद तय करना है कि चाहें तो अच्छे कर्म की पूजी जमा करें और चाहें तो बुरे कर्मों से अपनी पोटली को भरें!

लेकिन याद रहे जो आप जमा करेंगे, वही आपके जन्मों-जन्मों तक काम आएगा !

जीवन के इस रहस्य को समझें कि –
जैसे रास्ते पर
गति की सीमा है!
बैंक में
पैसों की सीमा है!
परीक्षा में
समय की सीमा है!
परंतु
हमारी सोच (विचार शक्ति) की
कोई सीमा नहीं है!
इसलिए
सदा श्रेष्ठ सोचें, श्रेष्ठ करें एवं श्रेष्ठ बोलें तब श्रेष्ठ पाएं!
क्योकि
कर्म
प्रबलता के साथ
अपने कर्ता
का पीछा करते हैं!
किसी ने सही फ़रमाया कि –

नियत तेरी अच्छी है तो, किस्मत तेरी दासी है!
कर्म तेरे यदि अच्छे हैं तो, घर ही में मथुरा-काशी है!

मिटाने से मिटता नहीं, कभी कर्म का ये लेख!
कर्म तू अच्छा कर, फिर ईश्वर की रहमत देख!!
🙏🙏🙏🙏🌸🌸🌸🌸🙏🙏🙏🙏

change the password of MySQL user

change the password of MySQL user

Open the bash shell and connect to the server as root user:

mysql -u root -h localhost -p

Run ALTER mysql command:

ALTER USER 'userName'@'localhost' IDENTIFIED BY 'New-Password-Here';

Finally type SQL command to reload the grant tables in the mysql database:

FLUSH PRIVILEGES;

संगत का प्रभाव

संगत का प्रभाव

एक भंँवरे की मित्रता एक गोबरी (गोबर में रहने वाले) कीड़े से थी। एक दिन कीड़े ने भंँवरे से कहा- भाई, तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र हो, इसलिए मेरे यहांँ भोजन पर आओ।

भंँवरा भोजन खाने पहुंँचा! बाद में भंँवरा सोच में पड़ गया कि मैंने बुरे का संग किया इसलिए मुझे गोबर खाना पड़ा!

अब भंँवरे ने भी कीड़े को अपने यहांँ आने का निमन्त्रण दिया कि तुम कल मेरे यहांँ आओ|

अगले दिन कीड़ा भंँवरे के यहांँ पहुंँचा!
भंँवरे ने कीड़े को उठा कर गुलाब के फूल में बिठा दिया! कीड़े ने पराग रस पिया!

वह भंवरे का धन्यवाद कर ही रहा था कि पास के मन्दिर का पुजारी आया और फूल तोड़ कर ले गया और उसे भगवान के श्रीचरणों चढ़ा दिया! कीड़े को भगवान् जी के दर्शन हुए! उनके चरणों में बैठने का सौभाग्य भी मिला! संँध्या में पूजारी ने सारे फूल इकट्ठा किये और गंगाजी में छोड़ दिये! कीड़ा अपने सौभाग्य पर हैरान था!

इतने में भंँवरा उड़ता हुआ कीड़े के पास आया और पूछा – मित्र! क्या हाल है?
गोबरी कीड़े ने कहा – भाई ! जन्म – जनम के पापों से मुक्ति हो गयी! ये सब तुम्हारी संगत का ही फल है|

कहा भी है-
संगत से गुण उपजे, संगत से गुण जाय!
लोहा लगा जहाज में, पानी में उतराय!!

कोई भी नहीं जानता कि हम इस जीवन के सफर में एक-दूसरे को क्यों मिलते हैं? सबके साथ हमारे रक्त सम्बन्ध नहीं हो सकते परन्तु महाराजी हमें अपने ज्ञान के संसार में प्रवेश करते हुए हमको आपस में अद्भुत रिश्तो में बांँध देते है! हमें उन रिस्तों को हमेशा संँजोकर कर रखना चाहिए! उनके द्वारा दिए ज्ञान का मिलकर अभ्यास करना चाहिय! वास्तव में, ज्ञान के इस अटूट रिश्ते को संजोकर रखना चाहिय!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

क्रोध और अहंकार की गांठें

क्रोध और अहंकार की गांठें

भगवान महावीर अक्सर अपने गणधर गौतम के साथ अन्य शिष्यों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। एक दिन प्रातः काल बहुत से श्रावक श्राविकाओं के साथ शिष्यगण उनका प्रवचन सुनने के लिए बैठे थे। भगवान महावीर समय पर सभा में पहुंचे! लेकिन आज शिष्य उन्हें देखकर चकित थे क्योंकि आज पहली बार वे अपने हाथ में कुछ लेकर आए थे। करीब आने पर शिष्यों ने देखा कि उनके हाथ में एक रस्सी थी। भगवान महावीर ने आसन ग्रहण किया और बिना किसी से कुछ कहे वे रस्सी में गांठें लगाने लगे।

वहाँ उपस्थित सभी लोग यह देख सोच रहे थे कि अब महावीर आगे क्या करेंगे; तभी महावीर ने सभी से एक प्रश्न किया, ‘मैंने इस रस्सी में तीन गांठें लगा दी हैं , अब मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि क्या यह वही रस्सी है, जो गाँठें लगाने से पूर्व थी ?’

एक शिष्य ने उत्तर में कहा, ”गुरूजी इसका उत्तर देना थोड़ा कठिन है! ये वास्तव में हमारे देखने के तरीके पर निर्भर है।
एक दृष्टिकोण से देखें तो रस्सी वही है, इसमें कोई बदलाव नहीं आया है।
दूसरी तरह से देखें तो अब इसमें तीन गांठें लगी हुई हैं जो पहले नहीं थीं; अतः इसे बदला हुआ कह सकते हैं!
पर ये बात भी ध्यान देने वाली है कि “बाहर से देखने में भले ही ये बदली हुई प्रतीत हो पर अंदर से तो ये वही है जो पहले थी; इसका बुनियादी स्वरुप अपरिवर्तित है।”

“तुम्हारा कथन सत्य है !” भगवान महावीर ने कहा, ”अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ।”
यह कहकर महावीर रस्सी के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे।
उन्होंने पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, इस प्रकार इन्हें खींचने से क्या मैं इन गांठों को खोल सकता हूँ?”

एक शिष्य ने शीघ्रता से उत्तर दिया कि, “नहीं-नहीं, ऐसा करने से तो या गांठें तो और भी कस जाएंगी और इन्हें खोलना और भी मुश्किल हो जाएगा।“

महावीर ने कहा, ‘ठीक है! अब एक आखिरी प्रश्न यह बताओ कि इन गांठों को खोलने के लिए हमें क्या करना होगा?’

शिष्य बोला ,’ ”इसके लिए हमें इन गांठों को गौर से देखना होगा! ताकि हम जान सकें कि इन्हे कैसे लगाया गया था और फिर हम इन्हे खोलने का प्रयास कर सकते हैं।“

भगवान महाबीर नै प्रसन्नतापूर्वक कहा कि “मैं यही तो सुनना चाहता था।
मूल प्रश्न यही है कि जिस समस्या में तुम फंसे हो; वास्तव में उसका कारण क्या है यह जानना बहुत जरूरी है! बिना कारण जाने निवारण असम्भव है।

मैं देखता हूँ कि अधिकतर लोग बिना कारण जाने ही निवारण करना चाहते हैं!
कोई मुझसे ये नहीं पूछता कि मुझे क्रोध क्यों आता है?
लोग यह भी पूछते हैं कि मैं अपने क्रोध का अंत कैसे करूँ?

कोई यह प्रश्न नहीं करता कि मेरे अंदर अंहकार का बीज कहाँ से आया!
लोग पूछते हैं कि मैं अपना अहंकार कैसे ख़त्म करूँ?

प्रिय शिष्यों,
जिस प्रकार रस्सी में में गांठें लग जाने पर भी उसका बुनियादी स्वरुप नहीं बदलता; उसी प्रकार मनुष्य में भी कुछ विकार आ जाने से उसके अंदर से अच्छाई के बीज ख़त्म नहीं होते।

जैसे हम रस्सी की गांठें खोल सकते हैं वैसे ही हम मनुष्य की समस्याएं भी हल कर सकते हैं।
इस बात को समझो कि जीवन है तो समस्याएं भी होंगी ही! और समस्याएं हैं तो समाधान भी अवश्य होगा!
आवश्यकता है कि यदि हम किसी भी समस्या के कारण को अच्छी तरह से जानेंगे, समझेंगे तो निवारण का रास्ता स्वतः ही खुलने लगेगा!

यह भक्तों का सौभाग्य ही है कि *जब उनको समय के महापुरुषों का सानिध्य और मार्ग दर्शन मिलता है तो तत्काल सहज रूप उनकी शंकाओं का समाधान हो जाता है!

कबीर दास जी कहते हैं कि –
🌹🥀पीछे लागा जाई था, लोक वेद के साथि।
आगैं थैं सतगुरु मिल्या, दीपक दीया साथि।।🌷🌷

पहले वे जीवन में सांसारिक मोह माया में व्यस्त थे। लेकिन जब उनकी इससे विरक्ति हुई तो उन्हें सद्गुरु के दर्शन हुए। सद्गुरु के मार्गदर्शन में उन्हें ज्ञान रूपी दीपक मिला और उसी से उन्हें परमात्मा के महत्व का ज्ञान हुआ। यह सब कुछ गुरु की कृपा से ही संभव हुआ था।

🙏🙏🙏🙏🌸🌸🌸🌸🙏🙏🙏🙏

सत्संग बड़ा है या तप

सत्संग बड़ा है या तप

एक बार विश्वामित्र जी और वशिष्ठ जी में इस बात‌ परृ बहस हो गई कि सत्संग बड़ा है या तप?
विश्वामित्र जी ने कठोर तपस्या करके ऋद्धि-सिध्दियों को प्राप्त किया था! इसीलिए वे तप को बड़ा बता रहे थे।जबकि वशिष्ठ जी सतसंग को बड़ा बताते थे।

वे इस बात का फैसला करवाने ब्रह्मा जी के पास चले गए।

उनकी बात सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा- मैं सृष्टि की रचना करने में व्यस्त हूं। आप विष्णु जी के पास जाइये। विष्णु जी आपका फैसला अवश्य कर देगें।

अब दोनों विष्णु जी के पास चले गए। विष्णु जी ने सोचा- यदि मैं सत्संग को बड़ा बताता हूं तो विश्वामित्र जी नाराज होंगे और यदि तप को बड़ा बताता हूं तो वशिष्ठ जी के साथ अन्याय होगा।

इसीलिए उन्होंने भी यह कहकर उन्हें टाल दिया कि मैं सृष्टि का पालन करने मैं व्यस्त हूंँ। आप शंकर जी के पास चले जाइये।

अब दोनों शंकर जी के पास पहुंचे तो शंकर जी ने उनसे कहा- ये मेरे वश की बात नहीं है। इसका फैसला तो शेषनाग जी कर सकते हैं।

अब दोनों शेषनाग जी के पास गए। शेषनाग जी ने उनसे पूछा- कहो ऋषियों! कैसे आना हुआ?

वशिष्ठ जी ने बताया- हमाre इस संसय का निवारण कीजिए कि तप बड़ा है या सत्संग बड़ा है? विश्वामित्र जी कहते हैं कि तप बड़ा है और मैं सत्संग को बड़ा बताता हूं।

शेषनाग जी ने कहा- मैं अपने सिर पर पृथ्वी का भार उठाए हूंँ। यदि आप में से कोई भी थोड़ी देर के लिए पृथ्वी के भार को उठा लें तो मैं आपका फैसला कर दूंगा।

तप में अहंकार होता है और विश्वामित्र जी तपस्वी थे।

उन्होंने तुरन्त अहंकार में भरकर शेषनाग जी से कहा- पृथ्वी को आप मुझे दीजिए।

विश्वामित्र ने पृथ्वी अपने सिर पर ले ली।

अब जब पृथ्वी नीचे की और चलने लगी तो शेषनाग जी बोले- विश्वामित्र जी! रोको। पृथ्वी रसातल को जा रही है।

विश्वामित्र जी ने कहा- मैं अपना सारा तप देता हूं कि पृथ्वी रूक जाये परन्तु पृथ्वी नहीं रूकी।

ये देखकर वशिष्ठ जी ने कहा- मैं आधी घड़ी का सत्संग देता हूं और विनय किया कि पृथ्वी माता रूक जा और पृथ्वी वहीं रूक गई।

अब शेषनाग जी ने पृथ्वी को अपने सिर पर ले लियाऔर उनको कहने लगे- अब आप जाइये।

विश्वामित्र जी कहने लगे- लेकिन हमारी बात का फैसला तो हुआ नहीं है।

शेषनाग जी बोले- विश्वामित्र जी! फैसला तो हो चुका है।

आपके पूरे जीवन का तप देने से भी पृथ्वी नहीं रूकी और वशिष्ठ जी के आधी घड़ी के सतसंग से ही पृथ्वी अपनी जगह पर रूक गई।

फैसला तो हो गया है कि तप से सत्संग ही बड़ा होता है।

—इसीलिए—
हमें नियमित रूप से सतसंग सुनना चाहिएऔर उस पर अमल करना चाहिए।

सत्संग की आधी घड़ी, तप के वर्ष हजार!
तो भी नहीं बराबरी, संतन कियो विचार!!

आपका आज का दिन मंगलमय हो!
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