जीव का आखिरी सत्य

जीव का आखिरी सत्य

जब किसी भी व्यक्ति की स्वांसों की माला टूट जाती है तो उसका अस्तिव ही समाप्त हो जाता है! आश्चर्य की बात है कि इस परम सत्य से हमारा कई बार सामना भी हुआ है! और हमने शव यात्रा में जाते समय राम नाम सत्य है का उद्धोष भी किया है! इतना ही नहीं उस स्वांस विहीन व्यक्ति ने जिनके लिय मैं-मेरी का भाव रखकर जीवन जिया और स्वांस जैसी कृपा को नजरअंदाज किया – वही लोग उसे अग्नि को समर्पित करते हुए – तत्काल ही रिश्ता खत्म कर देते हैं और परिजन समाज के लोगों को सूचित भी करते हैं कि उनके फलां प्रिय जन का नि+धन हो गया है! कहीं कहीं तो कुछ लोग बाद के क्रियाकर्म भी इस डर के मारे हैं कि कहीं वह भूत बनकर हमें या हमारे परिवार को सताना न शुरू करे!
कहावत भी है कि –
हाड जले ज्यों लाकड़ी, केश जले ज्यों घास!
सोना जैसी क्या जल गयी, कोई ना रहा पास!!

जब लग जीवै माता रोये , बहन रोये दश मासा!
तेरह दिन तक तिरीया रोये, फिर ढूंढे घर वासा!

मैंने भी कई बार ऐसी पूर्व निर्धारित परलोक गमन का, लोगों को पूरी तरह से नि+धन होते लोगों को देखा है! उस सर्वभोमिक अकाट्य सत्य से हम सबने गुजरना है! उस समय की वह हृदय विदारक स्थिति हर व्यक्ति को भरे मन से स्वीकार करनी पड़ती है!

अर्थी पर पड़े हुए शव पर लाल कपड़ा बाँधा जा रहा है! गिरती हुई गरदन को सँभाला जा रहा है! पैरों को अच्छी तरह रस्सी बाँधी जा रही है, कहीं रास्ते में मुर्दा गिर न जाए! गर्दन के इर्दगिर्द भी रस्सी के चक्कर लगाये जा रहे हैं। पूरा शरीर लपेटा जा रहा है! अर्थी बनाने वाला बोल रहा है: ‘तू उधर से खींच’ दूसरा बोलता है : ‘मैने खींचा है, तू गाँठ मार!’

लेकिन यह गाँठ भी कब तक रहेगी? वह बंधी जाने वाली रस्सियाँ भी कब तक रहेंगी? अभी जल जाएँगी और रस्सियों से बाँधा हुआ शव भी जलने को ही जा रहा है बाबा! धिक्कार है इस नश्वर जीवन को! धिक्कार है इस नश्वर देह की ममता को ! धिक्कार है इस शरीर के अभिमान को!

अर्थी को कसकर बाँधा जा रहा है! आज तक उसका नाम सेठ, साहब की लिस्ट (सूची) में था! अब वह मुर्दे की लिस्ट में आ गया!
लोग कहते हैं: ‘मुर्दे को बाँधो जल्दी से’ अब ऐसा नहीं कहेंगे कि ‘सेठ को, साहब को, मुनीम को, नौकर को, संत को, असंत को बाँधो…’ पर कहेंगे, ‘मुर्दे को बाँधो !’

हम सभी के लिय विचारणीय है कि –
हो गया हमारे पूरे जीवन की उपलब्धियों का अंत – आज तक हमने जो कमाया था वह हमारा न रहा! आज तक हमने जो जाना था वह मृत्यु के एक झटके में छूट गया। हमारे सारे इन्कम टेक्स (आयकर) के कागजातों को, हमारे प्रमोशन और रिटायरमेन्ट की बातों को, हमारी उपलब्धि और अनुपलब्धियों को, यहाँ तक कि हमें एक पल भी ही अपने सगे सम्बन्धियों से भी सदा-सदा के लिए अलविदा होना पड़ा!

हाय रे, मनुष्य! तेरा श्वास! हाय रे, तेरी कल्पनाएँ! हाय रे तेरी नश्वरता ! हाय रे, मनुष्य; तेरी वासनाएँ ! आज तक इच्छाएँ कर रहा था कि इतना पाया है और इतना पाँऊगा! इतना जाना है और इतना जानूँगा! इतना को अपना बनाया है और इतनों को अपना बनाँऊगा! इतनों को सुधारा है, औरों को सुधारुँगा!

अरे! हम अपने को मौत से तो न बचा पाए ! अपने को जन्म मरण से भी न बचा पाए! देखी तेरी ताकत! देखी तेरी कारीगरी बाबा !

समझने योग बात तो यह है कि कहाँ चले गया हमारा वह हम और अहम!

हमारा शव बाँधा जा रहा है! हम अर्थी के साथ एक हो गये हैं शमशान यात्रा की तैयारी हो रही है। लोग रो रहे हैं। चार लोगों ने अर्थी को उठाया और घर के बाहर हमें ले जा रहे हैं पीछे-पीछे अन्य सब लोग चल रहे हैं!!

हमारी शव यात्रा में कोई स्नेहपूर्वक आया है, कोई मात्र दिखावा करने आये है। कोई निभाने आये हैं कि समाज में बैठे हैं तो पाँच-दस आदमी सेवा के हेतु आये हैं। उन लोगों को पता नहीं कि उनकी भी यही हालत होगी।

जो अभी भी जीवित हैं, जिनकी स्वासें चल रही हैं – उनके लिय भी संदेश है कि अपने को कब तक अच्छा दिखाओगे? अपने को समाज में कब तक ‘सेट’ करते रहोगे? सेट करना ही है तो अपने को परमात्मा में ‘सेट’ क्यों नहीं करते भैया?

दूसरों की शवयात्राओं में जाने का नाटक करते हो? ईमानदारी से शवयात्राओं में जाया करो। अपने मन को समझाया करो कि तेरी भी यही हालत होनेवाली है। तू भी इसी प्रकार उठनेवाला है, इसी प्रकार जलनेवाला है। बेईमान मन! तू अर्थी में भी ईमानदारी नहीं रखता? जल्दी करवा रहा है? घड़ी देख रहा है? ‘आफिस जाना है… दुकान पर जाना है…’ अरे! आखिर में तो शमशान में जाना है ऐसा भी तू समझ ले। आफिस जा, दुकान पर जा, सिनेमा में जा, कहीं भी जा लेकिन आखिर तो शमशान में ही जाना है। तू बाहर कितना जाएगा?
हम यह ना भूलें कि हम पल -पल मृत्यु की और बढ़ रहे हैं और एक न एक दिन हमें यहाँ से जाना है!
जीते जी परमात्मा की कृपा का अहसास करना, हर स्वांस में कृतज्ञता का भाव बने रहना बहुत जरूरी है ताकि हर पल का आनन्द हमको मिलता रहे!
रामायण में बताया गया है कि –
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा॥
यानी, यह मनुष्य का शरीर भवसागर (से तारने) के लिए बेड़ा (जहाज) है। वायु रूप में इस स्वांस का आना जाना ही मेरी कृपा है। सद्गुरु इस मजबूत जहाज के कर्णधार (खेने वाले) हैं। इस प्रकार दुर्लभ (कठिनता से मिलने वाले) साधन सुलभ हो गए हैं!

इसलिय हमेशा अपने को समझाएं कि –
स्वान स्वान सुमिरन करें, बिरधा स्वांस ना खोय!
न जाने इस सवांस का, आवन होय ना होय!

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अपनी ही गठरी टटोलें!

अपनी ही गठरी टटोलें! 🌹
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एक राह पर चलते-चलते
दो व्यक्तियों की मुलाकात हुई।
दोनों का गंतव्य स्थान एक था,
तो दोनों यात्रा में साथ हो चले।

सात दिन बाद दोनों के अलग
थलक होने का समय आया तो
एक ने कहा- “भाई साहब!
एक सप्ताह तक दोनों साथ रहे,
क्या आपने मुझे पहचाना?”
दूसरे ने कहा:- “नहीं,
मैंने तो नहीं पहचाना।”
*पहला यात्री बोला😘
“महोदय, मैं एक नामी ठग हूँ,
परन्तु आप तो महाठग हैं।
आप मेरे भी गुरू निकले।”
दूसरा यात्री बोला:- “कैसे ?”
पहला यात्री- “कुछ पाने की
आशा में मैंने निरंतर सात दिन
तक आपकी तलाशी ली,
मुझे कुछ भी नहीं मिला।
इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं
तो क्या आपके पास कुछ नहीं है?
आप बिल्कुल खाली हाथ हैं?”

दूसरा यात्री:- “मेरे पास
एक बहुमूल्य हीरा है और
थोड़ी-सी रजत मुद्राएं भी हैं।”
*पहला यात्री बोला😘
“तो फिर इतने प्रयत्न के बावजूद
वह मुझे मिले क्यों नहीं?”
दूसरा यात्री- “मैं जब भी बाहर
जाता, हीरा और मुद्राएं तुम्हारी
पोटली में रख देता था और तुम
सात दिन मेरी झोली टटोलते रहे।
अपनी पोटली सँभालने की
जरूरत ही नहीं समझी, तो
फिर तुम्हें कुछ मिलता कहाँ से?”

यही समस्या हर इंसान की है।
इंसान अपने सुख से सुखी नहीं है
पर दूसरे के सुख से दुखी है,
क्योंकि निगाह सदैव दूसरे
की गठरी पर ही होती है !!

ईश्वर नित नई खुशियाँ हमारी
झोल़ी में डालता है, परन्तु
हमें अपनी गठरी पर निगाह
डालने की फुर्सत ही नहीं है।
यही सबकी मूलभूत समस्या है।
जिस दिन से इंसान दूसरे की
ताकझांक बंद कर देगा, उस क्षण
समस्या का समाधान हो जाऐगा!

“अपनी गठरी ही टटोलें।”
जीवन में सबसे बड़ा गूढ़ मंत्र है।
स्वयं को टटोले और आगे बढ़े
सफलतायें आप की प्रतीक्षा में हैं।

🙏🙏🙏🙏🙏

आधुनिक युग का
*सबसे बड़ा आश्चर्य है कि-
इंसान इंटरनेट द्वारा
समग्र ब्रह्मांड में स्थित
वस्तुओ का रहस्य
जानना चाहता है!
किन्तु…
मैं कौन हूँ ?
मैं कहाँ से आया हूँ ?
मुझे कहाँ जाना है ?
यह जानने का
प्रयास ही नहीं करता।

आज का दिन आपका शुभ हो l
🌹🙏🌹

भगवान की कृपा

भगवान की कृपा

भगवत कृपा तो निरंतर बह रही है परंतु उसको पाने का पात्र बनने के लिए समर्पण आवश्यक होता है।
परमात्मा के प्रति समर्पण दृढ़ निश्चय और अनुशासन का प्रतीक है। इस से मनुष्य स्वत: ही भगवत कृपा का पात्र बन जाता है।
कहा भी है –
सोई सेवक प्रीतम मम सोई, मम अनुशासन माने जोई!

महाभारत में एक घटना सुनाई जाती है कि जब युद्ध के पश्चात शिविर वापस पहुंचने पर श्री कृष्ण रथ से उतरे और अपने पैर के अंगूठे को रथ पर टिका कर अर्जुन को आदेश दिया कि तत्काल रथ से उतर कर दूर खड़े हो जाओ।
लेकिन अर्जुन कुछ समझे नहीं और श्री कृष्ण की आज्ञा मानते हुए वे तत्काल उतरे और दूर जाकर खड़े हो गए।
ज्योंही श्रीकृष्ण ने अपना पांव रथ से नीचे रखा, रथ धूं धूं कर जलने लगा और कुछ ही समय में आग में तब्दील हो गया।

तब आश्चर्यवत् अर्जुन ने भगवान से इसका कारण पूछा।

श्री कृष्ण बोले युद्ध में तुम्हारे ऊपर जिन दिव्य शस्त्रों का प्रयोग हुआ था, उनके तेज से यह रथ तो कभी का जल चुका था।
मैंने अपनी शक्ति से इस को बचाए रखा था। यदि तुम तत्काल ना उतरते तो रथ के साथ तुम भी भस्म हो जाते।
तुम्हारे समर्पण ने ही तुम्हारे प्राणों की रक्षा की है।

समर्पण – स्वयं को विनम्र और गहरा बनाकर ईश्वर की कृपा का पात्र होने की प्रक्रिया है।

सुप्रभात 🙏

सबसे बड़ा पुण्य

सबसे बड़ा पुण्य

एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था, हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था. वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था. यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था।

एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए. राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा-

“महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?”

देव बोले- “राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं।”

राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा- “कृपया देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?”

देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया।

राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा- “महाराज ! आप चिंतित ना हों , आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है. वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम यहाँ नहीं है।”

उस दिन राजा के मन में आत्म-ग्लानि-सी उत्पन्न हुई लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे नजर-अंदाज कर दिया और पुनः परोपकार की भावना लिए दूसरों की सेवा करने में लग गए।

कुछ दिन बाद राजा फिर सुबह वन की तरफ टहलने के लिए निकले तो उन्हें वही देव महाराज के दर्शन हुए, इस बार भी उनके हाथ में एक पुस्तक थी. इस पुस्तक के रंग और आकार में बहुत भेद था, और यह पहली वाली से काफी छोटी भी थी।

राजा ने फिर उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा- “महाराज ! आज कौन सा बहीखाता आपने हाथों में लिया हुआ है?”

देव ने कहा- “राजन! आज के बहीखाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय हैं!”

राजा ने कहा- “कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग? निश्चित ही वे दिन रात भगवत-भजन में लीन रहते होंगे! क्या इस पुस्तक में कोई मेरे राज्य का भी नागरिक है?”

देव महाराज ने बहीखाता खोला, और ये क्या, पहले पन्ने पर पहला नाम राजा का ही था।

राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- “महाराज, मेरा नाम इसमें कैसे लिखा हुआ है, मैं तो मंदिर भी कभी-कभार ही जाता हूँ?

देव ने कहा- “राजन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं. जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है. ऐ राजन! तू मत पछता कि तू पूजा-पाठ नहीं करता, लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है। परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना से बढ़कर हैं।

देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा- “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥”

अर्थात ‘इस संसार में कर्म करते हुए ही मनुष्य को सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिये। हे मानव! तेरे लिए इस प्रकार का ही विधान है, इससे भिन्न किसी और प्रकार का नहीं है, इस प्रकार कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करने से मनुष्य में कर्म का लेप नहीं होता।’

राजन! भगवान दीनदयालु हैं. उन्हें खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है.. सच्ची भक्ति तो यही है कि परोपकार करो. दीन-दुखियों का हित-साधन करो. अनाथ, विधवा, किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो और यही परम भक्ति है..”

राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चुका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बड़ा कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं।

💐💐शिक्षा💐💐

मित्रों, जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं, परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है. हमारे पूर्वजों ने कहा भी है- “परोपकाराय पुण्याय भवति” अर्थात दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सेवा को ही पूजा समझकर कर्म करना, परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पुण्य है. और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप वह ईश्वर के प्रिय भक्तों में शामिल हो जाएंगे।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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क्रोध पर नियंत्रण

क्रोध पर नियंत्रण

एक बार एक राजा घने जंगल में भटक जाता है जहाँ उसको बहुत ही प्यास लगती है। इधर उधर हर जगह तलाश करने पर भी उसे कहीं पानी नही मिलता। प्यास से उसका गला सुखा जा रहा था तभी उसकी नजर एक वृक्ष पर पड़ी; जहाँ एक डाली से टप टप करती थोड़ी-थोड़ी पानी की बून्द गिर रही थी।

वह राजा उस वृक्ष के पास जाकर नीचे पड़े पत्तों का दोना बनाकर उन बूंदों से दोने को भरने लगा! जैसे तैसे लगभग बहुत समय लगने पर वह दोना भर गया और राजा प्रसन्न होते हुए जैसे ही उस पानी को पीने के लिए दोने को मुँह के पास ऊचा करता है तब ही वहाँ सामने बैठा हुआ एक तोता टेटे की आवाज करता हुआ आया और उस दोने को झपट्टा मार के वापस सामने की डाली पर बैठ गया! उस दोने का पूरा पानी नीचे गिर गया।

राजा निराश हुआ कि बड़ी मुश्किल से पानी नसीब हुआ और वो भी इस पक्षी ने गिरा दिया लेकिन अब क्या हो सकता है। ऐसा सोचकर वह वापस उस खाली दोने को भरने लगता है।

काफी मशक्कत के बाद वह दोना फिर भर गया और राजा पुनः हर्षचित्त होकर जैसे ही उस पानी को पीने दोने को उठाया तो वही सामने बैठा तोता टे टे करता हुआ आया और दोने को झपट्टा मार के गिराके वापस सामने बैठ गया।

अब राजा हताशा के वशीभूत हो क्रोधित हो उठा कि मुझे जोर से प्यास लगी है! मैं इतनी मेहनत से पानी इकट्ठा कर रहा हूँ और ये दुष्ट पक्षी मेरी सारी मेहनत को आकर गिरा देता है! अब मैं इसे नहीं छोडूंगा – अब ये जब वापस आएगा तो इसे खत्म कर दूंगा।

इस प्रकार वह राजा अपने हाथ में चाबुक लेकर वापस उस दोने को भरने लगता है। काफी समय बाद उस दोने में पानी भर जाता है! तब राजा पीने के लिए उस दोने को ऊँचा करता है और वह तोता पुनः टे टे करता हुआ जैसे ही उस दोने को झपट्टा मारने पास आता है, वैसे ही राजा उस चाबुक को तोते के ऊपर दे मारता है और उस तोते के वहीं प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।

तब राजा सोचता है कि इस तोते से तो पीछा छूंट गया लेकिन ऐसे बून्द -बून्द से कब वापस दोना भरूँगा और कब अपनी प्यास बुझा पाउँगा इसलिए जहा से ये पानी टपक रहा है वहीं जाकर झट से पानी भर लूँ! ऐसा सोचकर वह राजा उस डाली के पास जाता है जहां से पानी टपक रहा था वहाँ जाकर जब राजा देखता है तो उसके पाँवो के नीचे की जमीन खिसक जाती है।

क्योकि उस डाली पर एक भयंकर अजगर सोया हुआ था और उस अजगर के मुँह से लार टपक रही थी! राजा जिसको पानी समझ रहा था; वह अजगर की जहरीली लार थी।

अब राजा के मन में पश्चॉत्ताप का समन्दर उठने लगता है कि हे प्रभु! मैने यह क्या कर दिया। जो पक्षी बार बार मुझे जहर पीने से बचा रहा था क्रोध के वशीभूत होकर मैने उसे ही मार दिया। काश, मैंने सन्तों के बताये उत्तम क्षमा मार्ग को धारण किया होता! अपने क्रोध पर नियंत्रण किया होता तो ये मेरे हितैषी निर्दोष पक्षी की जान नहीं जाती। हे भगवान मैने अज्ञानता में कितना बड़ा पाप कर दिया?

हाय ये मेरे द्वारा क्या हो गया ऐसे घोर पाश्चाताप से प्रेरित हो वह राजा दुखी हो उठता है।

इसीलिये कहते हैं कि-
क्षमा औऱ दया धारण करने वाला सच्चा वीर होता है।

क्रोध में व्यक्ति दुसरो के साथ साथ अपने खुद का ही बहुत नुकसान कर देता है। क्रोध वो जहर है जिसकी उत्पत्ति अज्ञानता से होती है और अंत पाश्चाताप से होता है। इसलिए हमेशा क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए।

संत तुलसीदास जी कहते हैं कि –
काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान!
तौ लौं ज्ञानी मूरखौं, तुलसी एक समान!!
यानी जब तक व्यक्ति के मन में काम, गुस्सा, अहंकार और लालच भरे हुए होते हैं – तब तक एक ज्ञानी और मूर्ख व्यक्ति में कोई भेद नहीं रहता! दोनों एक जैसे ही हो जाते हैं!

लेकिन भक्ति मार्ग में इस पर अंकुश लगाने की विधि है!
यदि हम चाहें तो समय के सदगुरु की शरण में जाकर इन व्याधियों का समन कर सकते हैं!

रामायण में स्पष्ट संकेत दिया है कि –
“सद्गुरु वैद्य वचन विश्वासा, सञ्जम यह न विषय के आसा।
रघुपति भगति सजीवन मुरी, अनुपान श्रद्धा मति पूरी!
एहि बिधि भलेहि सो रोग नसाही, नाहि त कोटि जतन नहि जाही।”
सद्गुरु के वचन में विश्वास हो। विषयो का संयम हो। उनकी भक्ति सञ्जीवनी जड़ी है तथा श्रद्धा पूर्ण बुद्धि है! तभी इन सांसारिक तापो से मुक्ति मिल सकती है।
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मानस रोग – काम, क्रोध, मद और लोभ!

मानस रोग – काम, क्रोध, मद और लोभ!

सांसारिक ज्ञान हमें बचपन से ही हमारे सांसारिक गुरुजनों ने दिया!
जैसे उन्होंने हमें सागर, महासागर के बारे में विस्तार से ज्ञान दिया और उनके द्वारा मिलने वाले लाभ हानी की जानकारियां भी मिली!
लेकिन हम जब बड़े हुए तो हमको संतों महात्माओं के द्वारा भवसागर के होने और उसे पार करने की बातें भी तरह तरह से बताई गयी; और हमने कभी इसे संजीदगी से नहीं लिया – बस, कभी काल्पनिक रूप में इसके अस्तित्त्व को स्वीकार किया और कभी इसे नकार भी दिया!

इसी प्रकार हम सभी बचपन से लेकर अपने जीवन की अन्तिम अवस्था तक किसी न किसी बीमारी का सामना करते आ रहे हैं और जब डाक्टरों के पास जाते हैं तो उन बीमारियों से मुक्क्ति पाने के लिय सलाह और दवा भी लेते हैं! इस तरह हमें कई बीमारियों के बारे में भी पता चलता है! चिकित्सा जगत के विशेषज्ञ सतत शोध में लगे हुए हैं कि इन्सान के बीमार होने के मूल कारण क्या हैं!

हमारे ऋषि मनीषियों ने पुरातन काल से मन, वचन और कर्म की समीक्षा की है! और रामायण में मानस रोग के बारे में बतलाया गया है और उसका निदान भी बताया है!

मुझे इस मानस रोग का उल्लेख पढने को मिला; रामायण का यह अनमोल प्रसंग आपके साथ शेयर किया जा रहा है!

कहावत है कि मन दुरुस्त तो तन दुरुस्त!

गरुड़जी और काकभुशुण्डि जी बीच का यह सम्वाद है जिसमें गरुड़जी ने सात प्रश्न किए थे।
छ: प्रश्नों के उत्तर देने के बाद अब मानस रोग संबंधित सातवें प्रश्न का उत्तर काकभुशुण्डिजी दे रहे।

मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥
तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती॥

गरुड़जी काकभुशुण्डि जी से कहते हैं कि अब मानस रोगों को समझाकर कहिए। आप सर्वज्ञ हैं और मुझ पर आपकी कृपा भी बहुत है।
काकभुशुण्डिजी ने कहा- हे तात अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ॥
काकभुशुण्डिजी कह रहे हैं कि व्यक्ति के दुख का कारण कोई अन्य व्यक्ति या वस्तु नहीं है। मानस रोग ही दुख के कारण हैं।

फिर ये रोग अथवा ब्याधि क्या हैं? तो वे कहते हैं -“मोह सकल ब्याधिन कर मूला”। अर्थात मोह (अज्ञान ) से ही सारे मानस रोग उत्पन्न होते हैं।

शारीरिक रोगों का प्रमुख कारण शास्त्रों के अनुसार “प्रज्ञापराध” है। यानी हमारी श्रेष्ठ बुद्धि जिस प्रकार से हमारे रहन सहन, खान पान को चाहती है, हम जब उसकी अवहेलना करके निषिद्ध आचरण करते हैं तो शरीर में वात, पित्त, कफ का संतुलन बिगड़ जाता है और हम बीमार हो जाते हैं!

मानस रोगों में वात, पित्त, कफ की तुलना काम, क्रोध, लोभ से की गई है।

शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वात -पित्त -कफ को एक समुचित अनुपात में ही रहना चाहिए।
यह तीनों बराबर बराबर मात्रा में भी नहीं होने चाहिए।
उस स्थिति में व्यक्ति का जीवित रहना भी मुश्किल है।
बराबर की स्थिति को सन्निपात कहते हैं, जो असाध्य है।

कफ की अतिशय बहुलता में जब पेट से कंठ तक कफ भर जाता है तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।
वात की बहुलता दर्द और ज्वर पैदा करती है।
पित्त की बहुलता से ऐसीडिटी पैदा होती है, ज्वर पैदा होता है तथा छाती आदि में जलन होती है। क्रोध यही करता है।*

यह भी विचारणीय है कि कफ और पित्त गतिशील नहीं होते!
लेकिन वात (वायु) गतिशील होता है। पूरे शरीर में इसका संचार रहता है। वात ही पित्त और कफ को शरीर के विभिन्न हिस्सों में लेजाकर, एकत्र करता है और पीड़ा कष्ट पैदा करता है।
वात की ही तरह काम अथवा कहें कि कामनाएँ ही मुख्य रोग है। इसी से लोभ और क्रोध भी उत्पन्न होते हैं।

एक सिद्धांत है कि शारीरिक रोगों के पीछे बहुधा कोई मानसिक कारण अवश्य होता है।
चलते चलते किसी जगह फिसल जाना, गड्ढे में गिर जाना, एक्साडेन्ट हो जाना, किसी जानवर द्वारा काट लेना या सींग से लात से प्रहार कर देना- इन सबके पीछे मानसिक असावधानी होती ही है।

क्रोध से पित्त बढ़ता है। क्रोधी व्यक्ति के अनुभव में पित्त जनित बीमारियॉं अवश्य आती हैं।

लोभी व्यक्ति नानाप्रकार की कामनाएँ करता है। जब वे कामनाएँ पूर्ण नहीं होती हैं तो एक कुंठा उत्पन्न करती है; जिससे शरीर में वात रोग पैदा होता है। कभी कभी व्यक्ति अप्राप्य वस्तुओं की कामना करता है तो उसके यह मनोरथ ही कुछ समय बाद उसको कुछ न कुछ ग़लत करने को विवश कर देते हैं। व्यक्ति पतन की ओर जाने लगता है।

यहॉं तो पहला क़दम की “विषय मनोरथ” रोग का कारण बताया गया है।

कहते हैं कि –
ममता तो मानो दाद है और ईर्ष्या खुजली।
जैसे खाज खुजाने में मजा आता है ऐसे ही कल्पना में किसी के प्रति ईर्ष्या रखने में भी आता है। दाद और खाज खुजलाने में तो मजा देते हैं लेकिन परिणाम में बहुत कष्टकारी होते हैं!

हर्ष विषाद को गले में होने वाला कण्ठमाला रोग (थायराइड) को बताया है।
इसमें गले में गॉंठों की माला सी बन जाती है। सामान्यतया जो विषाद या हर्ष हृदय में होता है, उसके पीछे कोई विशेष घटना या उपलब्धि कारण होती है। लेकिन जो व्यक्ति छोटी छोटी बात पर पल पल में हर्ष विषादादि का अनुभव करे तो उसमें कोई गम्भीरता नहीं है, वह तो रोग की तरह है।

क्षय रोग छाती के फेफड़ों में होता है। जिस व्यक्ति की छाती दूसरे किसी की उपलब्धि, विभूति या उन्नति देखकर जलती है, काकभुशुण्डिजी ने उसे क्षय रोग बताया है।

व्यक्ति का दुष्ट स्वभाव और मन की कुटिलता कोढ़ के समान है। यह रोग उस व्यक्ति को ही गलाकर उसमें दुर्गंध पैदा करता है।

अहंकार को डमरुआ, जोड़ों के दर्द का रोग बताया है। किसी भी जोड़ को झुकाने में दर्द होता है। घुटने मुड़ने में कष्ट देते हैं। अहंकारी व्यक्ति को झुकने में या अपनी अकड़ के बिरुद्ध मुड़ने में कष्ट होता है।

जब बात रोग के कारण नसों में पीड़ा होने लगती है, उसे नेहरुआ अर्थात शायटिका कहते हैं।
काकभुशुण्डि जी दम्भ, कपट, मद और मान को नस नस में पीड़ा देने वाला शायटिका रोग बता रहे हैं।

पेट में विषैला पानी भर जाता है उसे जलोदर कहते हैं। पेट फूल जाता है। तृष्णा को जलोदर की संज्ञा दी है जो तृप्त नहीं होती फूलती रहती है। लोकेषणा, वित्तेषणा, पुत्रेषणा यह तीन एषणाएँ मानो कि बड़ा भारी तिजारी बुखार हैं जो कभी कभी एक या दो दिन छोड़कर भी आता है।
इसी तृष्णा के कारण उपजे विकारों से आतों में पानी भर जाता है और हर्निया जैसे कष्टदायी रोग जन लेवा भी बन जाते हैं!

“जुग बिधि ज्वर मत्सर अविवेका”:
-बुखार के दो भेद बताए गए हैं।
आयुर्वेद संहिता में इसका विस्तार उपलब्ध होगा। माधव निदान में एक माहेश्वर ज्वर बताया है दूसरा वैष्णव ज्वर। यह दोनों ज्वर हृदय में मत्सर और अविवेक या विचारहीनता के रूप में रहते हैं।

अब काकभुशुण्डिजी बड़ी गम्भीर बात कह रहे हैं।
संसार में तो लोग एक ही रोग से मर जाते हैं लेकिन ये मानस रोग तो इतने सारे हैं कि गिनाए नहीं जा सकते।
इनमें बहुत से असाध्य रोग भी हैं और जीव इस धरा पर निरंतर इनसे पीड़ित रहते हैं!

“पीड़हिं संतत जीव”।
इतना ही नहीं जीव जिस शरीर में भी जाएगा; उस शरीर में भी यह रोग साथ जाऐंगे।

मतलब यह कि हमारा जो जन्म से स्वभाव है, रुचि है उसमें हमारे पूर्व कृत्यों के आधार पर बने इन मानस रोगों की विशेष भूमिका है।
इसके लिए हमारे इस जन्म के कर्म ही अकेले ज़िम्मेदार नहीं हैं इनमें प्रारब्ध की भी भूमिका है और वह जन्म से ही है।
हमारे चाहने न चाहने की बात नहीं है।

काकभुशुण्डिजी कह रहे हैं कि हे हरि के वाहन गरुड़जी ! शास्त्रों में इन रोगों के उपचार के बहुत से उपाय बताए तो हैं किंतु उन सब साधनों से भी यह रोग नष्ट नहीं होते। शास्त्र तो धर्म, नियम, तप, जप, ज्ञान, यज्ञ आदि साधन बताते हैं किंतु उनसे इन रोगों से लड़ने की शक्ति तो आएगी पर रोग का नाश नहीं होता।

ऐसी स्थिति में इन भव रोगों से मुक्ति की युक्ति का भी वर्णन किया है –

राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा॥
सदगुर बैद बचनबिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा॥
इस रोगों से मुक्ति तो केवल एक ही विशेष संयोग के कारण ही हो सकती है – जब मनुष्य को श्री राम की कृपा से समय के सदगुरु का सानिध्य मिले और उनके वचनों (दवा) का सेवन; संयमी (परहेज) के साथ दृढ विश्वास के साथ करे तो – यह मानस रोग पूरी तरह से समाप्त हो सकते हैं यानी जीव जन्म-जन्मान्तरों की पीड़ा से मुक्त हो सकता है!

यदपि आज भी अनेक लोग अपने अपने तरीके से स्वयंभू बनकर अनेकानेक दावा किया करते हैं लेकिन जब समय के सद्गुरु मिलते हैं तो वे एक ही बात पर जोर देते हैं कि -तुम्हारी सुख-शान्ति और आनन्द का भण्डार तो पहले से ही तुम्हारे अन्दर रखा है; बस अपनी बाहर की चित्तवृतियों को अपने अन्दर मुड़ना होगा!

ख़ुशी की बात यह है कि आज भी मेरे जैसे लाखों लाख लोग हैं – जिन्होंने महाराजी द्वारा प्राप्त युक्ति के द्वारा अपने अन्दर ही वह विलक्ष्ण, व्यावहारिक अनुभव किया है!
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‼️शुभ अरुणोदय ‼️
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वास्तविक मूल्य

वास्तविक मूल्य

एक सेठ बड़ा साधु सेवी था। जो भी सन्त-महात्मा नगर में आते वह उन्हें अपने घर बुला कर उनकी सेवा करता। एक बार एक महात्मा जी सेठ के घर आये। सेठानी महात्मा जी को भोजन कराने लगी। सेठ जी उस समय किसी काम से बाज़ार चले गये।

भोजन करते करते महात्मा जी ने स्वाभाविक ही सेठानी से कुछ प्रश्न किये।

पहला प्रश्न यह था कि तुम्हारे बच्चे कितने हैं?
सेठानी ने उत्तर दिया कि ईश्वर की कृपा से चार बच्चे हैं!

महात्मा जी ने दूसरा प्रश्न किया कि तुम्हारा धन कितना है?
उत्तर मिला कि महाराज! ईश्वर की अति कृपा है लोग हमें लखपति कहते हैं।
महात्मा जी जब भोजन कर चुके तो सेठ जी भी बाज़ार से वापिस आ गये और सेठ जी महात्मा जी को विदा करने के लिये साथ चल दिये।

मार्ग में महात्मा जी ने वही प्रश्न सेठ से भी किये जो उन्होंने सेठानी से किये थे।

पहला प्रश्न था कि तुम्हारे बच्चे कितने हैं?

सेठ जी ने कहा महाराज ! मेरा एक पुत्र है।

महात्मा जी दिल में सोचने लगे कि ऐसा लगता है सेठ जी झूठ बोल रहे हैं। इसकी पत्नी तो कहती थी कि हमारे चार बच्चे हैं और हमने स्वयं भी तीन-चार बच्चे आते-जाते देखे हैं और यह कहता है कि मेरा एक ही पुत्र है।

महात्मा जी ने दुबारा वही प्रश्न किया, सेठ जी तुम्हारा धन कितना है?
सेठ जी ने उत्तर दिया कि मेरा धन पच्चीस हज़ार रूपया है।
महात्मा जी फिर चकित हुए इसकी सेठानी कहती थी कि लोग हमें लखपति कहते हैं। इतने इनके कारखाने और कारोबार चल रहे हैं और यह कहता है मेरा धन पच्चीस हज़ार रुपये है।

महात्मा जी ने तीसरा प्रश्न किया कि सेठ जी ! तुम्हारी आयु कितनी है?
सेठ ने कहा- महाराज मेरी आयु चालीस वर्ष की है! महात्मा जी यह उत्तर सुन कर हैरान हुए सफेद इसके बाल हैं, देखने में यह सत्तर-पचहत्तर वर्ष का वृद्ध प्रतीत होता है और यह अपनी आयु चालीस वर्ष बताता है। सोचने लगे कि सेठ अपने बच्चों और धन को छुपाये परन्तु आयु को कैसे छुपा सकता है?

महात्मा जी बोले बिना रह न सके और पूछने लगे – सेठ जी! ऐसा लगता है कि तुम झूठ बोल रहे हो?
सेठ जी ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक बतलाया कि, महाराज! झूठ बोलना तो वैसे ही पाप है और विशेषकर सन्तोंं के साथ झूठ बोलना और भी बड़ा पाप है।

आपका पहला प्रश्न मेरे बच्चों के विषय में था। वस्तुतः मेरे चार पुत्र हैं किन्तु मेरा आज्ञाकारी पुत्र एक ही है। भक्ति भाव पूजा पाठ में लगा हुआ है मैं उसी एक को ही अपना पुत्र मानता हूँ। जो मेरी आज्ञा में नहीं रहते कुसंग के साथ रहते हैं वे मेरे पुत्र कैसे?

दूसरा प्रश्न आपका मेरा धन के विषय में था। महाराज! मैं उसी को अपना धन समझता हूँ जो परमार्थ की राह में लगे। मैने जीवन भर में पच्चीस हज़ार रुपये ही परमार्थ की राह में लगाये हैं वही मेरी असली पूँजी है। जो धन मेरे मरने के बाद मेरे पुत्र बन्धु-सम्बन्धी ले जावेंगे वह मेरा क्यों कर हुआ?

तीसरे प्रश्न में आपने मेरी आयु पूछी है। चालीस वर्ष पूर्व मेरा मिलाप एक संत जी से हुआ था। उनकी सेवा, चरण-शरण ग्रहण करके गुरु मान लिया , उनसे भजन-साधना की विधि समझी और मैं तब से भजन-अभ्यास और साधु सेवा कर रहा हूँ। इसलिये मैं इसी चालीस वर्ष की अवधि को ही अपनी आयु समझता हूँ।

उस सेठ के विचारों को सुनकर महात्मा जी निरुत्तर हो गये!

संत कबीर भी यही कहते है –
कबीर संगत साध की, साहिब आवे याद।
लेखे में सोई घड़ी, बाकी दे दिन बाद।।

जब कभी सच्चे सन्त-महापुरुषों से मिलाप होता है, तब उनकी संगति में जाकर मालिक की याद आती है, भजन की शुरुआत होती है। वास्तव में वही घड़ी सफल है, शेष दिन जीवन के निरर्थक हैं!

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जगह का महत्व

जगह का महत्व

पिता ने बेटे से कहा, “तुमने बहुत अच्छे नंबरों से ग्रेजुएशन पूरी की है। अब क्यूंकि तुम नौकरी पाने के लिए प्रयास कर रहे हो , मैं तुमको यह कार उपहार स्वरुप भेंट करना चाहता हूँ, यह कार मैंने कई साल पहले हासिल की थी, यह बहुत पुरानी है। इसे कार डीलर के पास ले जाओ और उन्हें बताओ कि तुम इसे बेचना चाहते हो। देखो वे तुम्हें कितना पैसा देने का प्रस्ताव रखते हैं।”

बेटा कार को डीलर के पास ले गया, पिता के पास लौटा और बोला, “उन्होंने 60,000 रूपए की पेशकश की है क्योंकि कार बहुत पुरानी है।”

पिता ने कहा, “ठीक है, अब इसे कबाड़ी की दुकान पर ले जाओ।”

बेटा कबाड़ी की दुकान पर गया, पिता के पास लौटा और बोला, “कबाड़ी की दुकान वाले ने सिर्फ 6000 रूपए की पेशकश की, क्योंकि कार बहुत पुरानी है।”

पिता ने बेटे से कहा कि कार को एक क्लब ले जाए जहां विशिष्ट कारें रखी जाती हैं।

बेटा कार को एक क्लब ले गया, वापस लौटा और उत्साह के साथ बोला, “क्लब के कुछ लोगों ने इसके लिए 60 लाख रूपए तक की पेशकश की है! क्योंकि यह निसान स्काईलाइन आर34 है, एक प्रतिष्ठित कार, और कई लोग इसकी मांग करते हैं।”

पिता ने बेटे से कहा, “कुछ समझे? मैं चाहता था कि तुम यह समझो कि सही जगह पर ही तुम्हें सही महत्व मिलेगा। अगर किसी प्रतिष्ठान में तुम्हें कद्र नहीं मिल रही, तो गुस्सा न होना, क्योंकि इसका मतलब एक है कि तुम गलत जगह पर हो।

शिक्षा:-सफलता केवल अपने हुनर और परिश्रम से नहीं मिल जाती, लोगों के साथ मिलती है, और तुम किन लोगों के बीच में हो , कुछ समय में तुमको स्वतः ही ज्ञात हो जाएगा I तुम्हें सही जगह पर जाना होगा, जहाँ लोग तुम्हारी कीमत जानें और सराहना करें, प्रोत्साहित करें

जय श्री राम

शुभरात्री

एक साधु से किसी व्यक्ति ने कहा कि उसके विचारों का प्रवाह उसे बहुत परेशान कर रहा है।

एक साधु से किसी व्यक्ति ने कहा कि उसके विचारों का प्रवाह उसे बहुत परेशान कर रहा है।

उस साधु ने उसे निदान और चिकित्सा के लिए अपने एक मित्र साधु के पास भेजा और उससे कहा, जाओ और उसकी समग्र जीवन-चर्या ध्यान से देखो। उससे ही तुम्हें मार्ग मिलने को है।
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वह व्यक्ति गया। जिस साधु के पास उसे भेजा गया था – वह सराय में रखवाला था।
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उसने वहां जाकर कुछ दिन तक उस साधू की दैनिकचर्या देखी। लेकिन, उसे उसमें कोई खास बात सीखने जैसी दिखाई नहीं पड़ी।
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वह साधु अत्यंत सामान्य और साधारण व्यक्ति था। उसमें कोई ज्ञान के लक्षण भी दिखाई नहीं पड़ते थे।
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हां, बहुत सरल था और शिशुओं जैसा निर्दोष मालूम होता था, लेकिन उसकी चर्या में तो कुछ भी न था।
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फिर भी उस व्यक्ति ने साधु की पूरी दैनिकचर्या देखी थी कि केवल रात्रि में सोने के पहले और सुबह जागने के बाद वह क्या करता था; वही भर उसे ज्ञात नहीं हुआ था।
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उसने उस साधू से ही उसकी दिनचर्या के बारे में पूछा।
साधु ने कहा, मेरी दिन मेरी दिनचर्या में कुछ भी नहीं। मैं रात्रि को सारे बर्तन मांजता हूं और चूंकि रात्रि भर में उनमें थोड़ी बहुत धूल पुन: जम जाती है, इसलिए सुबह उन्हें फिर धोता हूं।
.मैं समझता हूँ कि –
बरतन गंदे और धूल भरे न हों, यह ध्यान रखना आवश्यक है। मैं इस सराय का रखवाला जो हूं।

उस व्यक्ति के समझ में कुछ भी नहीं आया और वह व्यक्ति इस साधु के पास से अत्यंत निराश होकर अपने गुरु के पास लौटा।
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उसने साधु की दैनिकचर्या और उससे हुई बातचीत गुरु को बताई।
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उसके गुरु ने कहा, जो जानने योग्य था, वह तुम सुन और देख आये हो। लेकिन समझ नहीं सके।
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उसने इशारे से ही तुमको बतला दिया कि –
रात्रि तुम भी अपने मन रुपी बर्तन को मांजो और सुबह उसे पुन: धो डालो। धीरे-धीरे तुम्हारा चित्त निर्मल हो जाएगा।

हमारा शरीर एक सराय ही तो है और हम उसके रखवाले। अतः चित्त की नित्य सफाई अत्यंत आवश्यक है। उसके स्वच्छ होने पर ही समग्र जीवन की स्वच्छता या अस्वच्छता निर्भर है।

इसलिय सदगुरु से ज्ञान प्राप्त भक्तों को प्रतिदिन भजन-अभ्यास करके अपने अन्तरमन को साफ़ रखना चाहिय!

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बेईमानी का पैसा शरीर के एक एक अंग फाड़कर निकलता है।

बेईमानी का पैसा शरीर के एक एक अंग फाड़कर निकलता है।

रमेश चंद्र शर्मा जो पंजाब के ‘खन्ना’ नामक शहर में एक मेडिकल स्टोर चलाते थे,उन्होंने अपने जीवन का एक पृष्ठ खोल कर सुनाया जो पाठकों की आँखें भी खोल सकता है और शायद उस पाप से,जिस में वह भागीदार बना, उससे भी बचा सकता है।
रमेश चंद्र शर्मा का मेडिकल स्टोर जो कि अपने स्थान के कारण काफी पुराना और अच्छी स्थिति में था। लेकिन जैसे कि कहा जाता है कि धन एक व्यक्ति के दिमाग को भ्रष्ट कर देता है और यही बात रमेश चंद्र जी के साथ भी घटित हुई।
रमेश जी बताते हैं कि मेरा मेडिकल स्टोर बहुत अच्छी तरह से चलता था और मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी। अपनी कमाई से मैंने जमीन और कुछ प्लॉट खरीदे और अपने मेडिकल स्टोर के साथ एक क्लीनिकल लेबोरेटरी भी खोल ली। लेकिन मैं यहां झूठ नहीं बोलूंगा। मैं एक बहुत ही लालची किस्म का आदमी था क्योंकि मेडिकल फील्ड में दोगुनी नहीं बल्कि कई गुना कमाई होती है।

शायद ज्यादातर लोग इस बारे में नहीं जानते होंगे कि मेडिकल प्रोफेशन में 10 रुपये में आने वाली दवा आराम से 70-80 रुपये में बिक जाती है। लेकिन अगर कोई मुझसे कभी दो रुपये भी कम करने को कहता तो मैं ग्राहक को मना कर देता। खैर, मैं हर किसी के बारे में बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ अपनी बात कर रहा हूं। वर्ष 2008 में, गर्मी के दिनों में एक बूढ़ा व्यक्ति मेरे स्टोर में आया। उसने मुझे डॉक्टर की पर्ची दी। मैंने दवा पढ़ी और उसे निकाल लिया। उस दवा का बिल 560 रुपये बन गया। बूढ़े ने उसने अपनी सारी जेब खाली कर दी लेकिन उसके पास कुल 180 रुपये थे। मैं उस समय बहुत गुस्से में था क्योंकि मुझे काफी समय लगा कर उस बूढ़े व्यक्ति की दवा निकालनी पड़ी थी और ऊपर से उसके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं थे।

बूढ़ा दवा लेने से मना भी नहीं कर पा रहा था। शायद उसे दवा की सख्त जरूरत थी। फिर उस बूढ़े व्यक्ति ने कहा, “मेरी मदद करो। मेरे पास कम पैसे हैं और मेरी पत्नी बीमार है। हमारे बच्चे भी हमें पूछते नहीं हैं। मैं अपनी पत्नी को इस तरह वृद्धावस्था में मरते हुए नहीं देख सकता।”

लेकिन मैंने उस समय उस बूढ़े व्यक्ति की बात नहीं सुनी और उसे दवा वापस छोड़ने के लिए कहा। यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि वास्तव में उस बूढ़े व्यक्ति की दवा की कुल राशि 120 रुपये ही बनती थी। अगर मैंने उससे 150 रुपये भी ले लिए होते तो भी मुझे 30 रुपये का मुनाफा ही होता। लेकिन मेरे लालच ने उस बूढ़े लाचार व्यक्ति को भी नहीं छोड़ा।
फिर मेरी दुकान पर खड़े एक दूसरे ग्राहक ने अपनी जेब से पैसे निकाले और उस बूढ़े आदमी के लिए दवा खरीदी। लेकिन इसका भी मुझ पर कोई असर नहीं हुआ। मैंने पैसे लिए और बूढ़े को दवाई दे दी।

समय बीतता गया और वर्ष 2009 आ गया। मेरे इकलौते बेटे को ब्रेन ट्यूमर हो गया। पहले तो हमें पता ही नहीं चला। लेकिन जब पता चला तो बेटा मृत्यु के कगार पर था। पैसा बहता रहा और लड़के की बीमारी खराब होती गई। प्लॉट बिक गए, जमीन बिक गई और आखिरकार मेडिकल स्टोर भी बिक गया लेकिन मेरे बेटे की तबीयत बिल्कुल नहीं सुधरी। उसका ऑपरेशन भी हुआ और जब सब पैसा खत्म हो गया तो आखिरकार डॉक्टरों ने मुझे अपने बेटे को घर ले जाने और उसकी सेवा करने के लिए कहा। उसके पश्चात 2012 में मेरे बेटे का निधन हो गया। मैं जीवन भर कमाने के बाद भी उसे बचा नहीं सका।

2015 में मुझे भी लकवा मार गया और मुझे चोट भी लग गई। आज जब मेरी दवा आती है तो उन दवाओं पर खर्च किया गया पैसा मुझे काटता है क्योंकि मैं उन दवाओं की वास्तविक कीमत को जानता हूं। एक दिन मैं कुछ दवाई लेने के लिए मेडिकल स्टोर पर गया और 100 रु का इंजेक्शन मुझे 700 रु में दिया गया। लेकिन उस समय मेरी जेब में 500 रुपये ही थे और इंजेक्शन के बिना ही मुझे मेडिकल स्टोर से वापस आना पड़ा। उस समय मुझे उस बूढ़े व्यक्ति की बहुत याद आई और मैं घर चला गया।
👉मैं लोगों से कहना चाहता हूं कि ठीक है कि हम सभी कमाने के लिए बैठे हैं क्योंकि हर किसी के पास एक पेट है। लेकिन वैध तरीके से कमाएं,ईमानदारी से कमाएं । गरीब लाचारों को लूट कर कमाई करना अच्छी बात नहीं है क्योंकि नरक और स्वर्ग केवल इस धरती पर ही हैं,कहीं और नहीं। और आज मैं नरक भुगत रहा हूं।
पैसा हमेशा मदद नहीं करता। हमेशा ईश्वर के भय से चलो। उसका नियम अटल है क्योंकि कई बार एक छोटा सा लालच भी हमें बहुत बड़े दुख में धकेल सकता है।
जीवन शतरंज के खेल की तरह है और यह खेल आप ईश्वर के साथ खेल रहे हैं …
हमारी हर चाल के बाद अगली चाल ईश्वर चलता है।

जय श्रीराम

शुभरात्री